Sunday, September 29, 2013

मिट्टी के बरतन बड़े लाभकारी

अपने बचपन को याद किजिए, गांव में मिट्टी के बरतनों का खूब इस्तेमाल होता था। गांव में तो कभी घी भी मिट्टी की हांडी से ही निकालती थी और दही का मट्ठा भी मिट्टी की हांडी में ही बना करता था । कुछ दशक पहले तक गांव की शादियों में तो मिट्टी के बर्तन  ही उपयोग में आते थे। घरो में दाल पकाने, दूध गर्म करने चावल बनाने और अचार रखने के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग भी खूब होता रहा है। 
लोग मिट्टी के बरतनों को भूलते जा रहे थे, पर एक बार फिर महानगरों में मिट्टी के बरतन चर्चा में आ गए हैं। लोगों की जागरुकता मिट्टी के बरतनों को लेकर बढ़ी है। दिल्ली के कई बाजारों में मिट्टी के तवे मिल सकते हैं। इनमें सुविधा के लिए स्टील का हैंडल लगा दिया गया है।बताया जाता है कि देश में आज से दो सौ साल पहले ही मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग होना कम होने लगा। इसकी मुख्य वजह थी एल्युमिनियम के बर्तनों का ज्यादा इस्तेमाल करना, जो कि शरीर के लिए हानिकारक है। भले ही आज के विज्ञान ने हमें अपनी रसोई के लिए बहुत ही आधुनिक और सुविधाजनक बर्तन उपलब्ध कराए है किन्तु ऐसे नॉन स्टिक बर्तन तथा अन्य आधुनिक बर्तन भोजन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
देश में प्राचीन काल से ही मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने की प्रथा रही है परन्तु आधुनिक युग में यह लाभदाययक प्रथा बहुत कम हो गई है। हम कोई भी सब्जी या फल या आहार लेते समय यह ध्यान रखते है कि वह सबसे अच्छी गुणवत्ता वाला हों। किन्तु उससे भी अधिक जरुरी है कि पकाते वक़्त और पकाने के बाद उसकी वही गुणवत्ता बनी रहें।
सबसे ज्यादा पोषक तत्व
मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे. इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। पीतल से 93, कांसे से 97 और मिटटी से 100फीसदी पोषक तत्व मिलते हैं।
 कई बीमारियों में लाभकारी
कई बार बैठे-बैठे लोग बड़ी-बड़ी डकारें लेते रहते हैं। ये गैस की समस्या है। अगर आपको भी बिना खाए-पिए बड़ी-बड़ी डकारें आती हैं तो मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करें। खासकर रोटी मिट्टी के तवे पर ही बनाकर खाएं। कभी मिट्टी के बरतन में बिरयानी या दाल बनाकर देखें। स्वाद का फर्क मालूम हो जाएगा। अब भारतीय कुम्हारों के विदेशों से भी मिट्टी के बरतनों के आर्डर मिल रहे हैं

वास्तु में के अनुसार भी मंगलकारी
वास्तु शास्त्र के अनुसार मिट्टी के बर्तनों को बहुत शुभ माना जाता है। वास्तुशास्त्र की मानें तो घर में रखें मिट्टी के बर्तन  आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाते हैं। इसके साथ ही इनके घर या ऑफिस में होने से गुडलक, धन-वैभव, सफलता आदि सब कुछ हासिल किया जा सकता है। पूजा घर से लेकर विवाह के मौके पर पूजा के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सभी बर्तन मिट्टी के होते हैं।
मिट्टी पर भोजपुरी की इन पंक्तियों पर गौर फरमाएं...  
माटी के मनई हईं,  मटिए के बा घर दुआर,  
मटिए से छोह बा,  मटिए के बनल संसार...

-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com


Friday, September 27, 2013

पीएम के तौर पर सादगी भरा जीवन था नेहरू का

इसी कमरे में नेहरु जी ने आखिरी सांस ली थी।
आठ फरवरी 1916 को वसंत पंचमी के दिन पंडित जवाहर लाल नेहरु का विवाह कमला कौल ( शादी के बाद में नेहरु बनीं)  के साथ हुआ था। तो आइए चलते हैं तीन मूर्ति भवन जहां पंडित नेहरु ने आखिरी वक्त गुजारा। उनका बेडरूम अध्ययन कक्ष और बैठक देखकर प्रतीत होता है कि वे पीएम के रूप में सादगी भरा जीवन जीते थे। 

तीन मूर्ति भवन के पहली मंजिल पर एक कमरा दिखाई देता है। इसमें एक लकड़ी का सिंगल बेड पड़ा है। 27 मई 1964 इसी कमरे में दिल का दौरा पड़ा और भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू नहीं रहे।  इससे पहले 1963 में उन्हें पहली बार दिल का हल्का दौरा पड़ा था। फिर जनवरी 1964 में उन्हें और कमजोर कर देने वाला दौरा पड़ा। पर 27 मई को तीसरा दौरा पडा जिसमें वे नहीं बच सके।
पंडित नेहरू का अध्ययन कक्ष 
पंडित जवाहरलाल नेहरू 1947 में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। आजादी के पहले गठित अंतरिम सरकार और आजादी के बाद 1947 में भारत के प्रधानमंत्री बने और 27 मई 1964 को उनके निधन तक वे इस पद पर बने रहे। पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 में इलाहाबाद में हुआ था। इलाहाबाद के आनंद भवन में उनका बचपन गुजरा तो तीनमूर्ति भवन में आखिरी दिन। ये दो भवन उनके जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
तीन मूर्ति भवन की दो मंजिला इमारत लंबे समय तक देश की सत्ता का केंद्र रही। यहां एक दर्शक के तौर पर पहली मंजिल पर आप नेहरू जी का अध्ययन कक्ष देख सकते हैं। लकड़ी की एक बड़ी समान्य सी टेबल। कमरे में चारों तरफ अलमारियों में किताबें। यहां नेहरू जी देर रात तक अध्ययन करते या फिर किताबें पढ़ते रहते। प्रधानमंत्री रहते हुए भी पढ़ना उनका प्रिय शगल था।
तीन मूर्ति भवन में प्रधानमंत्री का मुलाकात कक्ष 

तीन मूर्ति भवन के इस प्रधानमंत्री निवास का एक और कमरा है उनकी बैठक। ये कमरा आकार में अपेक्षाकृत बड़ा है। इसमें सोफा और पीछे कुछ लंबी लंबी बेंच लगी है। इस कमरे की सजावट भी एक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के  प्रधानमंत्री निवास के हिसाब से देखें तो सादगी भरी है।


तीन मूर्ति भवन का गोलचक्कर, यहां लगी हैं तीन फौजियों की मूर्तियां..
अटल जी ने दी थी शानदार श्रद्धांजलि- नेहरु के निधन के बाद  भाजपा नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जो श्रद्धांजलि नेहरू को दीउसे भी अपने आप में एक यादगार भाषण कहा जा सकता है। वाजपेयी ने कहा, "एक सपना अधूरा रह गयाएक गीत मौन हो गया और एक लौ बुझ गई. दुनिया भर को भूख और भय से मुक्त कराने का सपनागुलाब की खुशबू और गीता के ज्ञान से भरा गीत,और रास्ता दिखाने वाली लौ कुछ भी नहीं रहा। वाजपेयी ने एक बार फिर कहा था- नेहरू से बड़ा डेमोक्रेट मैंने देखा नहीं।
वसंत के मौसम में अगर तीन मूर्ति भवन जाएं तो आपको यहां किस्म किस्म के फूल खिले मिलेंगे। इन फूलों को देखकर आप आनंदित हो उठेंगे। कभी इसी उद्यान से पंडित नेहरू अपने कोट में लगाने के लिए फूल चुना करते थे। तो आइए बात करते हैं फूलों की...
जिंदगी है बहार फूलों की...दास्तां बेशुमार फूलों की...
तुम क्या आए तसव्वुर में..आई खुशबू हजार फूलों की।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

Wednesday, September 25, 2013

मेहनतकश किसानों का भोजन है झुणका-भाखर

झुणका भाकर महाराष्ट्र का परंपरागत भोजन है। वास्तव में ये वहां के ग्रामीण क्षेत्र का पौष्टिक भोजन है। मेहनतकश मजदूरों और किसानों का भोजन है जो महाराष्ट्र के बाहर रेस्टोरेंट्स की रेसिपी भी बन रहा है। हालांकि ये ऐसी शाकाहारी रेसीपी है जिसको मसाला डोसा की तरह कम प्रचार मिला है। वास्तव में भाखड़ी या भाखर ज्वार या फिर बाजरे से बनी रोटी है। इसके साथ बेसन से बनी सब्जी परोसी जाती है जिसे झुनका कहते हैं। झुणका में सरसों, मिर्च, जीरा आदि की छौंक होती है। इनके तैयार करने का तरीका खालिस मराठी है। भाखड़ी तवे पर सेंकने के बाद इस पर देसी घी चुपड़ी जाती है। दो ऐसी रोटी आप खा लें तो मन ऐसा तृप्त हो जाता है की पूछो मत।

महाराष्ट्र के सतारा और कोल्हापुर जिले में घूमते हुए मैंने जगह जगह स्थानीय होटलों के मीनू में झुणका भाखरी का नाम देखा। एक जगह कौतूहल हुई तो पूछा। दुकानदार ने बताया कि 20 रुपये में दो भाखर और साथ में झुणका मिल जाएगा। हालांकि महाबलेश्वर में खराब खाना मिलने के कारण मेरा पेट ठीक नहीं था। इसलिए मैं गरिष्ठ भोजन खाने की स्थिति में नहीं था। इसलिए चाहकर भी वहां झुणका भाखर का स्वाद नहीं ले पाया। पर मुझे पता चला कि दिल्ली के महाराष्ट्र सदन के कैंटीन में भी झुणका भाखर मिल सकता है।

एक दिन  गाजियाबाद के वैशाली सेक्टर तीन स्थित महागुन मेट्रो माल का फूड कोर्ट में महाराष्ट्र फूड के स्टाल पर पहुंचा। वहां मिलता झुणका भाखर। बिल्कुल कोल्हापुरी स्टाइल में ही बना हुआ. हालांकि यहां पर इसकी कीमत हो जाती है 156 रुपये की प्लेट। इसमें दो भाखर। झुणका के साथ आप अपनी पसंद की सब्जी ले सकते हैं। साथ में रायता भी। झुणका भाखर महाराष्ट्र में तो हर मौसम में खाया जाता है पर खास तौर पर ये सर्दियों में खाया जाने वाला व्यंजन है।
ऐसे बनता है -  बेसन के घोल में प्याज, लाल मिर्च, हल्दी पाउडर, धनिया पत्ता, करी पत्ता आदि के मेल से तैयार किया जाता है झुणका। वहीं भाखर के लिए बाजरे के आटा में नमक, सरसों के बीज, हरी मिर्च और कुछ सब्जियों के हरे पत्ते मिलाए जाते हैं।

लाभ - बाजरे की रोटी खाने वाले को हड्डियों में कैल्शियम की कमी से पैदा होने वाला रोग आस्टियोपोरोसिस और खून की कमी यानी एनीमिया नहीं सता सकता। इसके अलावा बाजरा लीवर से संबंधित रोगों को भी कम करता है। डाक्टर भी मानते हैं कि गेहूं और चावल की तुलना में बाजरे में ऊर्जा कई गुना है। इसे गर्भवती महिलाओं के लिए भी यह अत्यंत लाभकारी माना जाता है। मुंबई में कई जगह झुणका भाकर के सस्ते रेस्टोरेंट देखे जा सकते हैं।
-विद्युत प्रकाश मौर्य  
( JHUNKA BHAKAR ) 

Monday, September 23, 2013

दक्षिण भारत में हिंदी से चलता है काम

अगर आप सोचते हैं कि दक्षिण भारत में घूमते हुए आपका हिंदी बोलकर ही काम चल सकता है तो आप सही हैं . वास्तव में दक्षिण भारत में हिंदी तेजी से लोकप्रिय हो रही है। आप दक्षिण भारत के तमाम पर्यटक स्थलों पर जाएं आपका काम हिंदी बोलकर चल सकता है। कोच्चि, त्रिवेंद्रम के होटल वाले, आटो वाले और दुकानदार हिंदी बोलते, समझते हैं। कन्याकुमारी तमिलनाडु में है लेकिन वहां हर तरफ हिंदी समझी जाती है। दुकानों के साइन बोर्ड भी हिंदी में दिखाई देते हैं। दक्षिण के राज्य तमिलनाडु के परंपरागत शहर मदुरै में रेलवे स्टेशन के बाहर होटलों के साइन बोर्ड और विजिटिंग कार्ड पर हिंदी में नाम प्रकाशित है।
मदुराई में रेलवे स्टेशन के आसपास होटलों के बाहर हिंदी में लिखा दिखाई देता है- यहां कमरे किराए पर मिलते हैं। जाहिर है यह बाजार का असर है। उत्तर भारत के ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने की होड़ लगी है। शापिंग माल्स और शोरूम के सेल्समैन हिंदी बोलते हैं। जिन सेल्समैन को हिंदी आती है उन्हें आसानी से नौकरी मिल जाती है। मैं मदुरै एक सेल में घुसता हूं। मैं हिंदी में संवाद शुरू करता हूं। तुरंत एक हिंदी वाला सेल्समैन हाजिर हो जाता है। वह पूछता है कहिए क्या सेवा करूं। सेल्समैन ने कहा उसे चार भाषाएं आती है। इस प्लस प्वाइंट के कारण उसे वेतन ज्यादा मिलता है। वह एक नौकरी छोड़े तो कई नौकरियां उसे आफर हो जाती हैं। रामेश्वरम शहर में सारे आटो रिक्शा वाले हिंदी समझ और बोल लेते हैं।

ऊटी के बोटानिकल गार्डन में...
हिल स्टेशन ऊटी में जाकर ऐसा लगता ही नहीं कि आप किसी दक्षिण के शहर में हैं। हर दुकान, हर फुटपाथ पर सामान बेचने वाले को हिंदी आती है। होटलों के रिसेप्शन पर भी आपका काम हिंदी बोलकर चल सकता है। वहीं तिरूपति में हिंदी को लेकर कोई समस्या नहीं आती। बेंगलुरु और मैसूर में आप हिंदी बोलकर आराम से काम चला सकते हैं। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार के लिए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा कई दशक से सक्रिय है। इस संस्था को डिम्ड यूनीवर्सिटी का दर्जा है। यह कई तरह के कोर्स कराता है। अब हर साल तमिलनाडु में लाखों लोग हिंदी  का पाठयक्रम कर रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे जान गए हैं कि तमिलनाडु से बाहर जाने रोजी रोजगार पाने के लिए हिंदी जानना जरूरी है। दक्षिण में अब टेलीविजन, फिल्मों और लगातार सैलानियों की आवाजाही के कारण हिंदी का प्रसार दक्षिण में खूब हो रहा है। 
दक्षिण में भी हैं हिंदी के अखबार:
अगर अखबारों की बात करें तो बेंगलुरु से हिंदी दैनिक अखबार राजस्थान पत्रिका प्रकाशन दो दशक से हो रहा है। पत्रिका अपना चेन्नई संस्करण भी शुरू कर चुका है। साल 2012 की यात्रा में  मैंने वहां दक्षिणभारत राष्ट्रमत नामक नया अखबार देखा जो बहुत अच्छे लेआउट डिजाइन में प्रकाशित हो रहा है। यह अखबार भी बेंगलुरु के साथ चेन्नई से भी प्रकाशित होता है। धीरे धीरे इन अखबारों के पाठक बढ़ रहे हैं।



-  ----  विद्युत प्रकाश मौर्य  
http://www.dbhpsabha.org/   

( (HINDI, SOUTH, KERALA, TAMILNADU )     

Saturday, September 21, 2013

सन 1857 के सिपाही विद्रोह की याद - म्युटिनी मेमोरियल

जब 1857 में सिपाही विद्रोह हुआ तो विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली की ओर कूच कर दिया था। इस विद्रोह में ब्रिटिश सेना के कई सिपाही मारे गए थे। उनकी याद में दिल्ली में एक स्मारक बना है। इसे कहते हैं म्युटिनी मेमोरियल। 
यह म्युटिनी मेमोरियल दिल्ली के कश्मीरी गेट बस अड्डे से ज्यादा दूर नहीं है। आप यहां पर तीस हजारी या पुल बंगश मेट्रो स्टेशन से चलकर पहुंच सकते हैं।

द म्यूटिनी मेमोरियल नाम ब्रिटिश सरकार ने दिया था। इसे अब अजीतगढ़ के नाम से जाना जाता है। यह ब्रिटिशकालीन स्मारक ओल्ड टेलीग्राफ बिल्डिंग, कश्मीरी गेट, नई दिल्ली के सामने स्थित है। यह उन सभी की याद में बनाया गया था, जिन्होंने 1857 के भारतीय सिपाही विद्रोह के दौरान दिल्ली फील्ड फोर्स, ब्रिटेन की ओर से लड़ाई लड़ी थी।


इस मेमोरियल का निर्माण 1863 में ब्रिटिश सरकार द्वारा करवाया गया। मतलब सिपाही विद्रोह के छह साल बाद। इसका निर्माण ब्रिटिश पीडब्लूडी विभाग द्वारा करवाया गया। इसके निर्माण में लाल पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इस मेमोरियल को बहुत तेजी से डिजाइन किया गया और उसका निर्माण भी तेजी से किया गया। तब इसके निर्माण को  लेकर काफी आलोचना भी हुई।

मेमोरियल का निर्माण गोथिक शैली में किया गया। इसके निर्माण में लाल बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। इसे एक विशाल चबूतरे पर निर्मित किया गया है। इसकी दीवारों अष्टकोणीय है। यह चार मंजिला संरचना में निर्मित है। इस मेमोरियल के चारों तरफ संगमरमर के पटल पर दिल्ली और मेरठ के आसपास ब्रिटिश सेना के साथ हुए विद्रोह के बारे में जानकारियां भी दी गई हैं।

आजादी के बाद अजीतगढ़
स्वतंत्रता के बाद सन 1972 में जब देश आजादी की रजत जयंती मना रहा था, इस स्मारक का नाम अजीतगढ़ दिया गया। म्युटिनी मेमोरियल में जो सिपाही विद्रोह के दौरान मारे गए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने दुश्मन के तौर पर चित्रित किया है। पर भारत सरकार ने इन्हें रजत जयंती के मौके पर वीर सेनानी घोषित किया।  
क्या म्युटिनी मेमोरियल भुतहा है...
कुछ लोग म्युटिनी मेमोरियल को भुतहा मानते हैं। कई लोगों को कहना है कि रात के समय में यहां पर कई तरह आवाजें सुनाई देती हैं। लोगों का मानना है कि 1857 के विद्रोह में मारे गए सिपाहियों की आत्माएं यहां भटकतीहैं। हालांकि इसमें कोई सच्चाई नजर नहीं आती।

मैं जब एक दोपहर में म्युटिनी मेमोरियल को देखने पहुंचा हूं तो पाता हूं कि यहां पर चौकीदार तैनात है। चौकीदार ने मेमोरियल के दरवाजे पर ताला लगा रखा है। हालांकि मेरे आग्रह पर वह दरवाजे का ताला खोल देता है। मैं अंदर जाकर विशाल मेमोरियल को चारों तरफ से घूम घूम कर देख पाता हूं। हर रोज कुछ लोग इस मीनार को देखने पहुंचते हैं। पर प्रतिदिन कुछ विदेशी नागरिक इसे देखने जरूर पहुंचते हैं।  

कैसे पहुंचे -  दिल्ली मेट्रो के पुलबंगश मेट्रो स्टेशन से उतरने के बाद कमला नेहरु रिज वाली सड़क पर चलें। इसमें पहले म्युटिनी मेमोरियल ही आएगा। इससे 200 मीटर आगे बाड़ा हिंदुराव अस्पताल की ओर आगे बढ़ने पर अशोक स्तंभ आ जाता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( DELHI, MUTINY MEMORIAL, KAMLA NEHRU RIDGE )

Thursday, September 19, 2013

नाचने वाली थी कुदुसिया बेगम, बनी मुगल महारानी

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दिल्ली का अति व्यस्त महाराणा प्रताप अंतरराष्ट्रीय बस अड्डा। पर आप बस अड्डे के आसपास कुछ सुकुन के पल गुजारने के लिए किसी हरे भरे स्थान पर जाना चाहते हैं तो एक विकल्प हो सकता है कुदुसिया बाग। ये कुदुसिया बाग कश्मीरी गेट बस अड्डे से यमुना पुल की ओर जा रहे फ्लाईओवर के उत्तरी तरफ है। इस बाग में प्रवेश करते ही आपको एहसास होगा मानो आप दिल्ली से कहीं बाहर आ गए हैं। लंबे चौड़े बाग की हरियाली आपका मन मोह लेगी। इस बाग में पक्षी चहचहाते और मोर नृत्य करते नजर आ सकते हैं। तो चलिए ना चलते हैं कुदुसिया बाग की ओर।


मुहम्मद शाह रंगीला की बेगम 
कुदुसिया बाग के एक ओर कश्मीरी गेट बस अड्डा है तो दूसरी तरफ दिल्ली का सिविल लाइन्स इलाका। सुबह सुबह सिविल लाइन्स में रहने वाले लोग इस बाग में टहलने आते हैं। दिल्ली मे रहने वाले लोग भी इस बाग के बारे में कम ही जानते हैं। इस बाग का निर्माण नवाब कु‍दसिया बेगम द्वारा कराया गया था जो मुगल बादशाह मुहम्‍मद शाह रंगीला की बेगम थीं।   

नाचनेवाली उधम बाई बनीं कुदुसिया बेगम
तो ये कुदुसिया बेगम कौन थीं। कहा जाता है की कु‍दसिया बेगम पहले एक नृत्य करने वाली लड़की थी। उनका नाम ऊधम बाई था। उन पर बादशाह मुहम्मद शाह की नजर पड़ी और वे मोहित हो गए। बादशाह ने उन्हें अपनी रानी बना लिया। महारानी कुदुसिया ने 1748 में इस बाग का निर्माण अपनी ओर से खूब रूचि लेकर करवाया। कभी कु‍दसिया बाग में एक खूबसूरत झरना हुआ करता था। आजकल झरना नहीं दिखाई देता। पर बेगम की बनवाई निजी शाही मस्जिद के अवशेष देखे जा सकते हैं। उन्होंने यहां गर्मियों में निवास करने के लिए एक सुंदर सा आरामगाह भी बनवाया था। बाग में अब भी इनके अवशेष देखे जा सकते हैं। इसमें एक बारादरी बनवाई गई थी। इसके 12 दरवाजे थे। इसके निर्माण में भारतीय और अरबी शैली का मिश्रण दिखाई देता है। कभी यमुना नदी कुदुसिया बाग के बगल में बहती थी। अब यमुना की धारा दूर चली गई है। बीच में रिंग रोड भी आ गया है।

फारस की चार बाग शैली 
आजकल कुदुसिया बाग में आने वाले पर्यटक केवल पश्चिमी प्रवेश द्वार जो फारस की चारबाग शैली में बनाया गया है, उसको देख सकते हैं। कुदुसिया बेगम के बेटे अहमदशाह बहादुर ने 1748 में दिल्ली की गद्ददी संभाली पर वे निक्कमे शासक साबित हुए। तब कुदुसिया बेगम शासन में रूचि लिया करती थीं। पर कुदुसिया बेगम का अंत कैसे हुआ, उनकी कब्र कहां है ये नहीं मालूम। मुहम्मद शाह रंगीला की कब्र हजरत निजामुद्दीन की दरगाह के पास है। रंगीला की गिनती बड़े कमजोर मुगल शासक में होती है। उसके शासन काल में 1739 में नादिरशाह ने दिल्ली को लूटा और धोखे से कोहिनूर हीरा भी उसने रंगीला से हड़प लिया। रंगीला का शासनकाल 1719 से 1748 तक रहा। पर उसके राज में शायरी, संगीत, चित्रकला का खूब विकास हुआ।

बाग में कई ऐतिहासिक इमारतें
कुदुसिया बाग में कई ऐतिहासिक महत्व की इमारतों के अवशेष भी हैं जिन्हें लाल बलुआ पत्थरों से बनाया गया है। इनकी वास्तुकला बेमिसाल है। पर सन 1857 में ब्रिटिश आक्रमण के दौरान कुदुसिया बाग की कई इमारतें नष्ट हो गईं। इस उद्यान के ही अंदर की दिल्ली की एक और ऐतिहासिक इमारत सेंट जेम्स चर्च भी स्थित है।

उत्तरी दिल्ली निगम की शान
उत्तरी दिल्ली नगर निगम के उद्यान विभाग ने कुदुसिया बाग की हरियाली को बरकरार रखा है। बाग के पास जमुना लॉज स्थित हैं। यहां पर फिजियोथेरेपी केंद्र और चेरिटेबल क्लिनिक का संचालन होता है। कुदुसिया बाग में प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। बाग में आप आएं तो इसे देखने के लिए एक घंटे का समय अपने पास रखें।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmai.com
-     ( KUDUSIA GARDEN, MUHAMAD SHAH RANGEELA )





Tuesday, September 17, 2013

सर्दियों में बाजरा खाइए, हड्डियों के रोग रहेंगे दूर

सर्दियों में बाजरे की रोटी खाएं, काफी लाभ होगा। वैसे बाजरे का किसी भी रूप में सेवन लाभकारी है। मुरमुरे की तरह आप इसे भूनकर भी खा सकते है। बाजार में बाजरा पफ के नाम से भी यह मिलता है। बाजरा में गेहूं के आटे की तरह ग्लूटन नहीं होता है। जिन लोगों को ग्लूटन से एलर्जी है उनके लिए बाजरा अधिक फायदेमंद है।
बाजरे की रोटी का स्वाद जितना अच्छा हैउससे अधिक उसमें गुण भी हैं। बाजरे की रोटी खाने वाले को हड्डियों में कैल्शियम की कमी से पैदा होने वाला रोग (आस्टियोपोरोसिस) और खून की कमी यानी एनीमिया नहीं होता।
बाजारा में लेसिथिन और मिथियोनिन नामक अमीनो अम्ल होते हैं जो अतिरिक्त वसा को हटा कर कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करते हैं। बाजरे में मौजूद रसायन पाचन की प्रक्रिया को धीमा करते हैं। डायबिटीज़ में यह रक्त में शक्कर की मात्रा को नियन्त्रित करने में सहायक होता है।

गेहूं के मुकाबले ज्यादा ऊर्जा -  बाजरा लीवर से संबंधित रोगों को भी कम करता है। गेहूं और चावल के मुकाबले बाजरे में ऊर्जा कई गुना ज्यादा है। बाजरे में भरपूर कैल्शियम होता है जो हड्डियों के लिए रामबाण औषधि है। आयरन भी बाजरे में इतना अधिक होता है कि खून की कमी से होने वाले रोग नहीं हो सकते।
गर्भवती महिलाओं के लिए लाभकारी
गर्भवती महिलाओं को कैल्शियम की गोलियां खाने के स्थान पर रोज बाजरे की दो रोटी खाना चाहिए। बाजरे का सेवन करने वाली महिलाओं में प्रसव में असामान्य पीड़ा के मामले भी न के बराबर पाए जाते हैं। बाजारा खाने से बच्चों को जन्म से लेकर पांच साल की उम्र तक कैल्शियम और आयरन की कमी से होने वाले रोग नहीं होते थे।
उच्च रक्तचापहृदय की कमजोरीअस्थमा से ग्रस्त लोगों तथा दूध पिलाने वाली माताओं में दूध की कमी में यह टॉनिक का कार्य करता है। यदि बाजरे का नियमित रूप से सेवन किया जाय तो यह कुपोषणक्षरण संबंधी रोग और असमय वृद्ध होने की प्रक्रियाओं को दूर करता है।

बाजरे की रोटी बनाना आसान बाजरे के आटे की छोटी छोटी लोई बनाएं। आटे में थोड़ा नमक और सरसों तेल मिला लें। थोड़ा सा सरसों तेल हाथों में लें। इसे चकला बेलन से सहारे बेलने की कोई जरूरत नहीं हाथों से ही बनाएं। रोटी को टूटने से बचाने के लिए हाथों में सरसों तेल चुपड़ लें। छोटी छोटी रोटियां बनाएं और एक साथ तीन चार रोटियां तवे पर पकाएं।  जब रोटी एक तरफ से अच्छे से सेंक लें तब रोटी को दूसरी तरफ पलट लें।  ये ध्यान रखें कि बाजरे की रोटी मोटी बनाएंगे तो अच्छी बनेगी और टूटेगी नहीं। हां, कुछ नया प्रयोग करना हो तो बाजरा के आटा में उबले हुए आलू भी मिला सकते हैं। बेहतर परिणाम के लिए आटे को 15 मिनट के लिए ढक कर रख दें उसके बाद रोटियां बनाएं।


बाजरे की रोटी में देसी घी चुपड़ कर खा सकते हैं। इसको उरद की दाल और चने के साग के साथ खाया जा सकता है । इसे आप गुड़ के साथ भी खा सकते हैं। क्या आपको पता है कि बाजार इतना गुणकारी होते हुए भी गेहूं की तुलना में सस्ता अनाज है।

वाह भाई बाजरा-
-        11.6 प्रतिशत प्रोटीन, 5 प्रतिशत वसा, 67 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट तथा 2.7 प्रतिशत खनिज लवण पाया जाता है बाजरा में ।

-        40 से 200 सेमी तक वर्षा वाले स्थानों पर बाजरा की खेती की जा सकती है। 

-        51 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में प्रतिवर्ष उगाया जाता है राजस्थान में हर साल। यह राजस्थान के शेखावटी इलाके की प्रमुख फसल है।


-        50 फीसदी बाजार देश भर में कुल उत्पादन का राजस्थान में ही उगाया जाता है। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(BAJRA BREAD, MILLET )


Sunday, September 15, 2013

कोरोनेशन पार्क – यहां हुआ था भव्य दिल्ली दरबार


आपको पता ही होगा दिल्ली भारत की राजधानी कब बनी। वह 1911 का साल था। जब ब्रिटिश शासन ने राजधानी को कोलकाता से दिल्ली लाने की योजना बनाई। इस मौके पर भव्य दिल्ली दरबार का आयोजन किया गया। पर यह दिल्ली दरबार कहां हुआ था। इसका जवाब है कोरोनेशन पार्क। यह कोरोनेशन पार्क कहां है। जवाब है उत्तरी दिल्ली में।  

1911 में दिल्ली बनी राजधानी राष्ट्रीय राजधानी के किंग्जवे कैंप के निकट बुराडी इलाके में, जिस जगह पर इस शाही दरबार का आयोजन किया गया था। अब वह जगह कोरोनेशन पार्क का एक हिस्सा है । वर्ष 1911 के दिल्ली दरबार में सम्राट जार्ज पंचम एवं महारानी मैरी को भारत के तमाम शासकों ने यहीं पर सलामी दी थी। 12 दिसंबर को इस शाही मजलिस में किंग जार्ज पंचम ने भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की थी । 
दिल्ली के इतिहास में इस जगह का काफी महत्व है। वर्ष 1911 के दिल्ली दरबार में सम्राट जार्ज पंचम एवं महारानी मैरी को भारत के सम्राट और सम्राज्ञी के तौर पर ताजपोशी हुई थी । इसके साथ ही नई शाही राजधानी की आधारशिला रखी गई थी।

 लुटियन की नई दिल्ली : सर एडविन लुटियंस नामक वास्तुकार ने शहर का खाका तैयार किया था और 31 दिसंबर 1926 को इसका नाम नई दिल्ली रखा गया था। पहले राजधानी के सभी प्रमुख दफ्तर इधर ही बनाए जाने थे। पर बाद में यमुना के करीब होने और बाढ़ के खतरे को देखते हुए इसे रायसीना की पहाडियों की तरफ शिफ्ट किया गया।


दिल्ली दरबार 1911 में आयोजित एक भव्य समारोह था। इसका आयोजन लॉर्ड हार्डिंग द्वारा करवाया गया था। सन 1877 से 1911के बीच तीन दरबार लगे थे। सन 1911 का दरबार एकमात्र ऐसा था, कि जिसमें सम्राट जॉर्ज पंचम खुद पधारे थे। इसमें लगभग 26,800 पदक दिए गए, जो कि अधिकांशतः ब्रिटिश रेजिमेंट के अधिकारी एवं सैनिकों को दिए गए थे।

नया मुकुट बनाया गया: ब्रिटेन शाही घराने की मान्यता थी कि इंपीरियरल के मुकुट यूनाइटेड किंगडम के बाहर नहीं जा सकते, इसलिए दिल्ली दरबार के लिए नया मुकुट बनाया गया। इसे इंपीरियल क्राउन कहा गया। इस क्राउन में छः हजार एक सौ सत्तर उत्कृष्ट तराशे हीरे, जिनके साथ नीलम, पन्ना और माणिक्य जड़े थे। साथ ही एक शनील और मिनिवर टोपी भी थी, जिन सब का भार 965 ग्राम था।

 इस दरबार में प्रत्येक रियासत के राजकुमार, महाराजा एवं नवाब तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति, सभापतियों को अपना आदर व्यक्त करने पहुंचे। सभी सम्राट भी अपनी शाही राजतिलक की वेशभूषा में यहां आए थे। पर उदयपुर के मेवाड़ राजा इसमें नहीं आए। उन्होंने विरोध किया था। उनकी कुर्सी खाली रही।

कई साल वीरान रहा: कोरोनेशन पार्क का यह स्थल कई दशक तक वीरान रहा। पर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की सरकार ने इस कोरोनेशन पार्क के तौर पर दोबारा विकसित करने का फैसला किया। इस पार्क को विकसति करने का काम 2011 में पूरा हुआ जब दिल्ली दरबार की सौंवी सालगिरह थी। यह पार्क 57 एकड़ में फैला है। यहां पर जार्ज पंचम समेत कई ब्रिटिश अधिकारियों की विशाल मूर्तियां स्थापित की गई हैं।

आजकल कोरोनेशन पार्क गुलजार रहता है। यहां प्रेमी प्रेमिकाओं की जोड़ियां टाइम पास करने पहुंचती हैं। इसमें प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। पार्क के प्रवेश द्वार पर पार्किंग का इंतजाम है। आप दिल्ली मेट्रो के जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन से ढका गांव होते हुए कोरोनेशन पार्क पहुंच सकते हैं।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( CORONATION PARK, DELHI ) 


Friday, September 13, 2013

आखिर कितने की आती है हमारी खाने की थाली

पेट की भूख मिटाने के लिए थाली का गणित क्या है। एक मध्यमवर्गीय इन्सान का पेट कितने रूपये में भर सकता है। इस पर इन दिनों खूब चर्चा हुई। लेकिन क्या जनता के नुमाइंदे इन नेताओं को सच्चाई पता है।

कोई 1980 का साल रहा होगा। तब हम वैशाली जिले के कन्हौली नामक गांव में रहते थे। हमारे घर जलवान की लकड़ी काटने के लिए एक मजदूर बुलाया गया। दिन भर की मजदूरी के अलावे दोपहर का खाना उसे दिया जाना था। तय था कि वह खाने में चने का सत्तू खाएगा। शारीरिक श्रम करने वाला वह मजदूर एक किलो चने का सत्तू खा गया। तब सत्तू 8 रुपये किलो था। आज 80 रुपये किलो है। कहने का मतलब है कि जो लोग शारीरिक श्रम करते हैं उनको मानसिक श्रम करने वालों की तुलना में ज्यादा भोजन की जरूरत होती है।
आज साल 2013 में हमारे देश के तीन अलग अलग नेताओं ने ये फरमाया है कि दिल्ली में 5 रुपये में और मुंबई में 12 रुपये में तो कश्मीर में 1 रुपये में पेट भरा जा सकता है। ये तीनों जानकारियां सच्चाई से परे है। ये इस ओर भी संकेत करती हैं कि हमारे ये राजनेता आम आदमी के रोटी के लिए रोज के संघर्ष और दर्द से कितने दूर हैं।

अगर हम दिल्ली के बात करें फुटपाथ पर चलने वालों ढाबों या ठेले पर लगने वाले भोजनालयों में भी अब 15 रुपये में भी पेट नहीं भरा जा सकता। दिल्ली सरकार ने कुछ एनजीओ की सहायता से ठेले पर भोजनालय शुरू कराए हैं वहां भी 15 रुपये में लिमिटेड भोजन मिलता है। आज की तारीख में आप फुटपाथ पर चलने वाले भोजनालयों में 30 रुपये में लिमिटेड थाली खा सकते हैं। भरपेट खाने के लिए 60 से 70 रुपये चाहिए।

मैं 2012-13 में कुछ राज्यों में भ्रमण के दौरान के अपने अनुभवों के आधार पर कह सकता हूं कि भरपेट खाना 50 रुपये या उसके ऊपर में ही कहीं मिल सकता है। आप कोच्चि (केरल) में 50 रुपये, तिरुवनंतपुरम में 70 रुपये,  कन्याकुमारी में 70 रुपये, मदुराई में 60 रुपये, रामेश्वरम में 60 रुपये में भरपेट खा सकते हैं। मैसूर में 50 से 70 रुपये में भरपेट खाया जा सकता है। इसी तरह गुजरात के शहरों पोरबंदर, द्वारका में 70 रुपये में तो अहमदाबाद में 100 रुपये में भरपेट खा सकते हैं। ये सारी दरें मध्यमवर्गीय रेस्टोरेंट्स की हैं। मुंबई में आपको 40 से 70 रुपये में मिनी मील ही नसीब हो सकता है। भरपेट खाने के लिए 100 से ज्यादा रुपये मुंबई के किसी भी कोने में खर्च करने पड़ेंगे।

मैं 1995 में जब दिल्ली आया था तब 12 से 15 रुपये में ढाबे में भोजन किया जा सकता था, पर आज 2013 में 40 से 60 रुपये देने पड़ते हैं। दिल्ली में आप आंध्र भवन की कैंटीन में 100 रुपये में भरपेट खा सकते हैं। शायद दिल्ली में भरपेट खाने की इससे कोई सस्ती जगह नहीं है। अलग अलग संस्थाओं द्वारा चलाए जाने वाले सब्सिडी युक्त कैंटीनों में भी अब आपको 40 से 50 रुपये के आसपास लिमिटेड थाली ही मिल सकती है। हमारे सम्मानित नेतागण अब आम आदमी की तरह सड़कों और गलियों में नहीं घूमते इसलिए शायद उन्हें थाली का गणित नहीं पता।

-    विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com 

 ( THALI FOOD, CANTEEN, RICE AND DAL ROTI )