Monday, August 19, 2013

मुक्तसर का ऐतिहासिक गुरुद्वारा -40 शहीदों की याद

पंजाब के सीमांत जिलों की यात्रा के तीसरे दिन यानी 3 जनवरी को हमारा अगला पड़ाव था मुक्तसर जिला। अबोहर से हमलोग सुबह के नास्ते के बाद मुक्तसर के लिए निकल पड़े। दोनों शहरों के बीच की दूरी 60 किलोमीटर है। रास्ते में मलोट नामक शहर आया। कुहरे के कारण सफर धीरे-धीरे ही चल रहा है। हमें ड्राईवर बहुत अच्छा मिला है जो बड़ी सूझ-बूझ के साथ ड्राईविंग कर रहा है। हमें रास्ते में कुहरे के कारण कुछ हादसे भी दिखाई दे जाते हैं। इससे हम और सावधान हो गए हैं।

बात मुक्तसर की। मुक्तसर शहर का सिख इतिहास में काफी महत्व है। यह शहादत का शहर है। श्री मुक्तसर साहिब गुरुद्वारा विशाल सरोवर के बीच है। बिल्कुल अमृतसर और तरनतारन की ही तरह। मुक्तसर यानी मुक्ति का सरोवर। इसी जगह पर 1705 में सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगलों से आखिरी लड़ाई लड़ी थी। इस लड़ाई में यहां उनके 40 शिष्य शहीद हो गए थे। इस गुरुद्वारे उनके शिष्यों की मुक्ति की कथा जुड़ी है। इसलिए इस शहर का नाम पड़ा मुक्तसर।

सिख पंथ में मुक्तसर का गुरुद्वारा काफी महत्वपूर्ण है। मुक्तसर में एक और गुरुद्वारा अंगिठा साहिब है, जहां पर गुरु जी ने अपने 40 शहीद शिष्यों का अंतिम संस्कार किया था।

मुक्तसर साहिब गुरुद्वारे में आने वाले श्रद्धालु इस गुरुद्वारे में भी श्रद्धा से शीश झुकाने आते हैं। साल 2019 में एक बार फिर मुक्तसर जाना हुआ तब सुबह सुबह गुरुद्वारा साहिब में मत्था टेकने पहुंचा।

लोहड़ी पर बड़ा मेला - हर साल जनवरी में लोहड़ी के समय मुक्तसर में बहुत बड़ा मेला लगता है। इस मेले में राजनीतिक दल अपने मंच सजाते हैं। इन मंचों से पंजाब की भावी राजनीति तय होती है। भारी सरदी के बीच लगने वाला यह मेला पंजाब की सियासत में गरमाहट ला देता है। 

पंजाब की राजनीति सिख राजनीति के आसपास घूमती है चाहे सरकार किसी भी दल की हो। हम जनवरी के प्रथम सप्ताह में इधर हैं तो लोहड़ी पर लगने वाले विशाल जोड़ मेले की तैयारी चल रही है।
मुक्तसर जिले से पंजाब के कई बड़े राजनेता प्रतिनिधित्व करते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरचरण सिंह बराड़ और उनके बेटे जगमीत बराड़ यहां के हैं। प्रकाश सिंह बादल का गांव भी यहां से दूर नहीं है। पर ये जिला अपेक्षाकृत पिछड़ा हुआ है। वैसे मुक्तसर अपने मुक्तसरी कुरता पायजामा के लिए भी प्रसिद्ध है।


कुछ साल बाद पंजाब प्रवास के दौरान ही एक बार फिर मुक्तसर जाना हुआ ज्ञानचंद शाक्य जी के आमंत्रण पर। वे मुक्तसर में ही बस गए हैं हालांकि यूपी से कभी पंजाब गए थे। मुक्तसर में बड़ी संख्या में ऐसे बिहार-यूपी के परिवार हैं जो पंजाब के बड़े जंमीदारों की जमीन को ठेके पर लेकर खेती करते हैं। ऐसे ही एक परिवार से मिलना हुआ जो जगमीत बराड़ के खेतों को ठेके पर लेकर फसल उगाते हैं। उन्ही की जमीन पर बने अस्थायी घर में रहते हैं। कई साल से पंजाब में हैं पर दिल्ली यूपी के एटा-इटावा-मैनपुरी में ही बसता है। 
  (  यात्रा काल  - जनवरी 2000) 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 
    ( यात्रा मार्ग - अबोहर- मलोट- मुक्तसर- कोटकपूरा -मोगा- शाहकोट- नकोदर-जालंधर )     
(ORANGE, KINNOW, MUKTSAR, FAJILLKA, FARIDKOT, ABOHAR, KOTKAPURA, PUNJAB ) 

No comments:

Post a Comment