Wednesday, August 28, 2013

देश के तीन महान शायर सो रहे हैं आसपास

दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित अब्दुल रहीम खान खाना का मकबरा।
 तीन महान कवि और शायरों ने जो अपने देश भारत की शान हैं, ने अपने लिए आखिरी जगह आसपास ही चुनी। महान शायर कवि अब्दुल रहीम खान खाना, मिर्जा गालिब और अमीर खुसरो की मजारें दिल्ली में महज आधे किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित है।
दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पास स्थित है रहीम की मजार। मजार का वास्तु शानदार है। पर देखने वाले कम ही पहुंचते हैं। रहीम सांप्रदायिक सौहार्द के कवि और अपने दोहों के लिए जाने जाते हैं। वे अकबर के नौ रत्नों में से थे। उनका जन्म 17 दिसंबर 1556 को हुआ। 

वे अकबर के संरक्षक बैरम खां के बेटे थे। बैरम खां के गुजरात के पाटन में हत्या के बाद अकबर ने बैरम खां की पत्नी से विवाह कर लिया। इस तरह रहीम के अकबर सौतेले पिता भी हो गए। रहीम कवि के साथ संस्कृत और ज्योतिष के बड़े विद्वान थे। जन्म से मुस्लिम होने के बावजूद उनका हिंदू संस्कृति पर अध्ययन गहन था। पर कवि होने के साथ वे बड़े योद्धा भी थे। उनके नाम पर पंजाब के नवांशहर जिले में खान खाना नामक गांव है।
इस मकबरे का निर्माण रहीम ने अपनी पत्नी के निधन पर 1598 में करवाया था। पर 1627 में रहीम की मृत्यु पर उनकी मजार भी उनकी पत्नी के बगल में बना दी गई।



रहीम खान खाना का मकबरा। 
उनका एक दोहा आपने सुना ही होगा -
रहिमन वे नर मर चुके जे कहूं मांगन जाहीं।
उनते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाही।।


रहीम का मकबरा हुमायूं के मकबरे के थोड़ी दूरी पर ही स्थित है। हुमायूं के मकबरे के परिसर में शेरशाह के अमीर रहे इसा खान का अष्टकोणीय शैली में बना मकबरा है। ठीक उसी शैली में जैसा सासाराम में शेरशाह का मकबरा है।

हुमायूं के मकबरे के आसपास कई ऐतिहासिक इमारते हैं। 

नीला गुंबद, गुरुद्वारा दमदमा साहिब आदि। पर जब आप हुमायूं के मकबरे जाएं तो इस महान कवि रहीम खान खाना के मकबरे को भी जरूर देखें। हालांकि रहीम की मजार खंडित अवस्था में है। बाद में इसकी ही ईंटे निकाल कर सफदरजंग के मजार में लगा दी गईं। रहीम के मकबरे के ऊपर से अब बारापुला फ्लाइवे गुजरता है।

पेश है रहीम के कुछ और दोहे

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।।

ऐसी देनी देंन ज्यूं कित सीखे हो सैन।
ज्यों ज्यों कर ऊंच्यो करो, त्यों त्यों नीचे नैन।।

देनहार कोई और है, भेजत जो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करे, तासो नीचे नैन।।

बड़े बड़ाई न करें, बड़े न बोले बोल
रहिमन हीरा कब कहे, लख टका मेरो मोल।।

रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजे डारी।
जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारी।।


खीरा मुख ते काटिए, मलियत लों लगाए।
रहिमन कडवे मुख कों, चहियत इही सजाए।।

जे रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसुंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटात रहत भुजंग।।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य
(RAHIM KHAN I KHANA TOMB , GALIB, AMIR KHUSRO, NIJAMUDDIN, DELHI )