Friday, August 30, 2013

मिर्जा गालिब और अमीर खुसरो की मजार पर

हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से मुख्य सड़क पर आने के बाद सड़क पार कर इस पार आएंगे तो सामने गली में महान सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह है। लेकिन ठीक उसके पहले उर्दू के महान शायर और दार्शनिक मिर्जा गालिब और उनके परिवार की मजार है। गालिब की मजार के पास उनका प्रसिद्ध शेर लिखा गया है। हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में---
था कुछ तो खुदा था होता कुछ तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, होता तो मैं क्या होता।

आगरा से आने के बाद जीवन भर गालिब रहे बल्लीमरान की गलियों में। पर चिर निद्रा में सोना पसंद किया हजरत निजामुद्दीन औलिया के करीब। शायद इसलिए कि उनके पूर्ववर्ती महान शायर अमीर खुसरो भी वहीं सो रहे हैं।



हमेशा ताजा गुलाबों की पंखुड़ियों से गुलजार इस गली में आगे बढ़ने पर आता है सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया का दरगाह। यहां हमेशा उनकी शान में कव्वालियों का दौर जारी रहता है। 
इस महान सूफी संत के साथ ही उनके प्रिय शिष्य और हिंदी उर्दू के महान कवि शायर, संगीत साधक अमीर खुसरो की मजार। कहते हैं अमीर खुसरो यहां हमेशा अपने गुरू निजामुद्दीन औलिया से मिलने आते थे। आखिरी बार आए तो गुरू से मुलाकात नहीं हुई। क्यों... क्योंकि  गुरू तो दूसरी दुनिया के लिए कूचकर चुके थे। खुसरो बड़े दुखी और निराश हुए । तब खुसरो ने ये शेर पढ़ा-

गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केश। 
चल खुसरो घर आपने,  सांझ भई चहूं देश....


अमीर खुसरो ने संगीत के बड़े जानकार थे। वे भारत की गंगा जमुनी संस्कृति के बड़े हस्ताक्षर हैं। उन्होने बड़ी संख्या मुकरियां लिखीं। वे जन भाषा के कवि थे। उन्होंने मुश्किल शब्दों का इस्तेमाल कम किया। इसलिए उनकी कविताएं शायरी सब की समझ में आ जाती हैं। अबुल हसन यामुनुद्दीन उर्फ अमीर खुसरो का समय 1253-1325 का है। खुसरो का जन्म उत्तर प्रदेश के एटा जिले में पटियाली में हुआ था।
कुल 72 साल के जीवन में वे काफी कुछ देकर गए जिसे हम आज भी गा रहे हैं। गुनगुना रहे हैं। उन्हें खड़ी बोली का पहला कवि भी माना जाता है। पर वे कवि, शायर, संगीतकार, गायक सब कुछ थे। शास्त्रीय संगीत में उनका योगदान बहुत बड़ा है। छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाके..... और बहुत कठिन है डगर पनघट की....जैसी कालजयी रचनाएं खुसरो की हैं। 

अमीर खुसरो की कुछ रचनाओं पर गौर फरमाएं....

रात समय वह मेरे आवे। भोर भये वह घर उठि जावे॥

यह अचरज है सबसे न्यारा। ऐ सखि साजन? ना सखि तारा॥



नंगे पांव फिरन नहिं देत। पांव से मिट्टी लगन नहिं देत॥
पांव का चूमा लेत निपूता। ऐ सखि साजन? ना सखि जूता॥

वह आवे तब शादी होय। उस बिन दूजा और न कोय॥
मीठे लागें वाके बोल। ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल॥

जब मांगू तब जल भरि लावे। मेरे मन की तपन बुझावे॥
मन का भारी तन का छोटा। ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा॥

बेर-बेर सोवतहिं जगावे। ना जागूं तो काटे खावे॥
व्याकुल हुई मैं हक्की बक्की। ऐ सखि साजन? ना सखि मक्खी॥

अति सुरंग है रंग रंगीलो। है गुणवंत बहुत चटकीलो॥
राम भजन बिन कभी न सोता। क्यों सखि साजन? ना सखि तोता॥

अर्ध निशा वह आया भौन। सुंदरता बरने कवि कौन॥
निरखत ही मन भयो अनंद। क्यों सखि साजन? ना सखि चंद॥

शोभा सदा बढ़ावन हारा। आंखिन से छिन होत न न्यारा॥
आठ पहर मेरो मनरंजन। क्यों सखि साजन? ना सखि अंजन॥

जीवन सब जग जासों कहै। वा बिनु नेक न धीरज रहे॥
हरे छिनक में हिय की पीर। क्यों सखि साजन? ना सखि नीर॥

बिन आये सबहीं सुख भूले। आये ते अंग-अंग सब फूले॥
सीरी भई लगावत छाती। क्यों सखि साजन? ना सखि पाती॥

-    विद्युत प्रकाश मौर्य - Email - vidyutp@gmail.com

( MIRJA GALIB, AMIR KHUSRO, NIJAMUDDIN, DELHI )

Wednesday, August 28, 2013

देश के तीन महान शायर सो रहे हैं आसपास

दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित अब्दुल रहीम खान खाना का मकबरा।
 तीन महान कवि और शायरों ने जो अपने देश भारत की शान हैं, ने अपने लिए आखिरी जगह आसपास ही चुनी। महान शायर कवि अब्दुल रहीम खान खाना, मिर्जा गालिब और अमीर खुसरो की मजारें दिल्ली में महज आधे किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित है।
दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पास स्थित है रहीम की मजार। मजार का वास्तु शानदार है। पर देखने वाले कम ही पहुंचते हैं। रहीम सांप्रदायिक सौहार्द के कवि और अपने दोहों के लिए जाने जाते हैं। वे अकबर के नौ रत्नों में से थे। उनका जन्म 17 दिसंबर 1556 को हुआ। 

वे अकबर के संरक्षक बैरम खां के बेटे थे। बैरम खां के गुजरात के पाटन में हत्या के बाद अकबर ने बैरम खां की पत्नी से विवाह कर लिया। इस तरह रहीम के अकबर सौतेले पिता भी हो गए। रहीम कवि के साथ संस्कृत और ज्योतिष के बड़े विद्वान थे। जन्म से मुस्लिम होने के बावजूद उनका हिंदू संस्कृति पर अध्ययन गहन था। पर कवि होने के साथ वे बड़े योद्धा भी थे। उनके नाम पर पंजाब के नवांशहर जिले में खान खाना नामक गांव है।
इस मकबरे का निर्माण रहीम ने अपनी पत्नी के निधन पर 1598 में करवाया था। पर 1627 में रहीम की मृत्यु पर उनकी मजार भी उनकी पत्नी के बगल में बना दी गई।



रहीम खान खाना का मकबरा। 
उनका एक दोहा आपने सुना ही होगा -
रहिमन वे नर मर चुके जे कहूं मांगन जाहीं।
उनते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाही।।


रहीम का मकबरा हुमायूं के मकबरे के थोड़ी दूरी पर ही स्थित है। हुमायूं के मकबरे के परिसर में शेरशाह के अमीर रहे इसा खान का अष्टकोणीय शैली में बना मकबरा है। ठीक उसी शैली में जैसा सासाराम में शेरशाह का मकबरा है।

हुमायूं के मकबरे के आसपास कई ऐतिहासिक इमारते हैं। 

नीला गुंबद, गुरुद्वारा दमदमा साहिब आदि। पर जब आप हुमायूं के मकबरे जाएं तो इस महान कवि रहीम खान खाना के मकबरे को भी जरूर देखें। हालांकि रहीम की मजार खंडित अवस्था में है। बाद में इसकी ही ईंटे निकाल कर सफदरजंग के मजार में लगा दी गईं। रहीम के मकबरे के ऊपर से अब बारापुला फ्लाइवे गुजरता है।

पेश है रहीम के कुछ और दोहे

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।।

ऐसी देनी देंन ज्यूं कित सीखे हो सैन।
ज्यों ज्यों कर ऊंच्यो करो, त्यों त्यों नीचे नैन।।

देनहार कोई और है, भेजत जो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करे, तासो नीचे नैन।।

बड़े बड़ाई न करें, बड़े न बोले बोल
रहिमन हीरा कब कहे, लख टका मेरो मोल।।

रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजे डारी।
जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारी।।


खीरा मुख ते काटिए, मलियत लों लगाए।
रहिमन कडवे मुख कों, चहियत इही सजाए।।

जे रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसुंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटात रहत भुजंग।।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य
(RAHIM KHAN I KHANA TOMB , GALIB, AMIR KHUSRO, NIJAMUDDIN, DELHI )

Monday, August 26, 2013

और तिरंगा लिए शहीद हो गए गुलाब सिंह लोधी

लखनऊ शहर का दिल अमीनाबाद और इसके ठीक बीच में स्थित ऐतिहासिक झंडेवाला पार्क। पार्क में शहीद गुलाब सिंह लोधी की की झंडा लिए विशालकाय प्रतिमा लगी है लेकिन इसके आसपास गंदगी का आलम है।

पार्क में हरियाली का नामोनिशान नहीं है। दरवाजे के आसापास गंदगी का आलम है। तमाम ऐतिहासिक सभाओं का साक्षी पार्क नशेड़ियों का अड्डा बना हुआ है।
अगर इस पार्क के सौंदर्यीकरण और सुरक्षा पर ध्यान दिया जाए तो अमीनाबाद में शापिंग करने आने वालों के लिए थोड़ा वक्त गुजारने के लिए और भी अच्छी जगह हो सकती है।लखनऊ को तहजीब, नजाकत और नफासत के लिए जाना जाता है। इसे बागों और स्मारकों का शहर भी कहा जाता है। लेकिन झंडेवाला पार्क अपनी बदहाली के आंसू रो रहा है। उसे सरकार से भी शिकायत है और आसपास के लोगों से भी। लखनऊ शहर में अंबडेकर पार्क जैसे नए स्मारक बने हैं पर जितना धन उन बड़े पार्कों की ओर बहा है उसका थोड़ा सा हिस्सा इस पार्क की ओर आया होता तो हालात सुधर सकते हैं।

और शहीद हो गए गुलाब सिंह लोधी-
अगस्त 1933 को क्रांतिकारी गुलाब सिंह लोधी भी उस जुलूस में शामिल हुए, जो पार्क में झंडा फहराना चाहते थे। जिस समय झंडारोहण कार्यक्रम होने जा रहा था उस समय अंग्रेजी सैनिकों ने पार्क को चारों तरफ से घेर लिया। लेकिन आज़ादी के मतवाले गुलाब सिंह लोधी ने सैनिकों से बिना डरे पार्क में घुस गए और एक पेड़ पर चढ़कर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया। इसके बाद उन्होंने नारा लगाया महात्मा गांधी की जय। तिरंगा झंडा अमर रहे। उसी समय एक सैनिक ने लोधी को गोलियों से भून दिया और वह शहीद हो गए। उन्नाव जिले के फतेहपुर चौरासी क्षेत्र के ग्राम चंद्रिका खेड़ा के युवक गुलाब सिंह लोधी साहसी युवक थे। उनका जन्म 1903 में राम रतन सिंह लोधी के घर में हुआ था। 

लखनऊ के अमीनाबाद स्थित अमीरुद्दौला पार्क जिसे अब झंडे वाला पार्क के नाम से जानते हैंदरअसल जनवरी 1928 में क्रांतिकारियों ने पहली बार राष्ट्रीय ध्वज अमीनुद्दौला पार्क में ही फहराकर अंग्रेजी हुकूमत को ललकारा था उसी दिन से यह अमीनुद्दौला पार्क झंडे वाला पार्क के नाम से जाना जाने लगा। अवध के चतुर्थ बादशाह अमजद अली शाह के समय में उनके वजीर इमदाद हुसैन खां अमीनुद्दौला को पार्क वाला क्षेत्र भी मिला था, तब इसे इमदाद बाग कहा जाता था।

इससे पहले ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1914 में अमीनाबाद का पुनर्निर्माण कराया गया चारों तरफ सड़कें निकाली गई बीच में जो जगह बची उसमें एक पार्क का निर्माण कराया गयाजिसका नाम अमीनुद्दौला पार्क का नाम दिया गया। पर आजादी के मतवालों ने यहां पहली बार झंडा फहराया तब से यह पार्क झंडेवाला पार्क कहलाया जाने लगा।

1925 में बापू आए थे यहां - 1925 में 17 अक्टूबर को महात्मा ने लखनऊ में दो सभाएं की थीं। इसमें से एक सभा नगर निगम के अहाते में भाषा पर और दूसरी सभा झंडेवाले पार्क में सांप्रदायिक सौहार्द पर थी। 23 अगस्त 2004 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव में शहीद गुलाब सिंह लोधी की विशाल प्रतिमा का अनावरण अमीरुद्दौला पार्क में किया। साल 2017 के जुलाई माह में जब मैं दुबारा इस पार्क में पहुंचा तो पार्क थोड़ा बदला हुआ नजर आया। पार्क में कुछ इलाके में मार्बल स्टोन लगा दिया गया है। पर पार्क के चारों तरफ पार्किंग और दुकानें सजी हैं। पर इस भीड़ भाड़ में पार्क लोगों को राहत देने का काम करता है, थोड़ी सी हवा और थोड़ी सी खुली जगह। भले ही लखनऊ में नए नए पार्क बन रहें हो पर पार्क को बचाए रखना होगा। 


चिकन के कपड़ों का विशाल बाजार है अमीनाबाद 


लखनऊ की चिकेनकारी का एक नमूना। 
आप जानते होंगे कि लखनऊ चिकन के कपड़ों के लिए खासतौर पर प्रसिद्ध है। झंडेवाला पार्क के पास स्थित अमीनाबाद लखनऊ शहर के केंद्र में स्थित काफी पुराना बाजार है। वही अमीनाबाद जिस पर फिल्मों में गाने लिखे गए हैं... एक दिन मजनू मिला मुझे अमीनाबाद में... इस बाजार में चिकन के कपड़ों की बड़ी संख्या में दुकाने हैं। कुछ फिक्स्ड प्राइस वाली दुकानें हैं तो कुछ हल्की फुल्की मोलभाव वाली। तो अब यहां मजनू मिले या न मिलें पर लखनऊकी लैलाएं यहां शापिंग के लिए जरूर पहुंचती हैं। 

अगर आप लखनऊ जाएं तो अमीनाबाद से खरीददारी कर सकते हैं। चिकन के कपड़े और तैयार सूट, कुरता आदि महिलाएं बच्चें और पुरुषों हर किसी के लिए आते हैं।देश में सबसे सस्ता चिकन का कपड़े आप यहां से खरीद सकते हैं।झंडे वाला पार्क के एक और बड़े बड़े ज्वेलर्स की दुकानें हैं तो दूसरी और अमीनाबाद का प्रसिद्ध बुक मार्केट तो एक ओर कपड़ों का घना बाजार। यहां मोहन मार्केट में और उसके आसपास लखनवी चिकनकारी की तमाम दुकाने हैं।
कैसे पहुंचे - अमीनाबाद कैसरबाग चौराहा से पहुंचा जा सकता है। आपको लखनऊ के चारबाग ( लखनऊ जंक्शन ) रेलवे स्टेशन से कैसरबाग के लिए शेयरिंग आटो रिक्शा और बैटरी रिक्शा मिल जाएंगे। ये आटो गौतम बुद्ध रोड (लाटूश रोड) होकर आते हैं। कैशरबाद में लखनऊ रोडवेज का एक बस डिपो भी है। बगल में नजीराबाद मुहल्ला है। यह लखनऊ के स्थानीय निवासियों के लिेए भी शापिंग की प्रमुख जगह है।  

-    ------ विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com

)   (LUCKNOW, JHANDEWALA PARK, AMINABAD, MOHAN MARKET, NAJIRABAD, KAISHARBAG CIRCLE, LAKHNAWI CHIKEN CLOTH, GULAB SINGH LODHI, UNNAO, FATEHPUR CHARASI )  )