Friday, August 2, 2013

ओंकारेश्वर से उज्जैन वाया पाताल पानी, महू, इंदौर

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन, मां नर्मदा में आस्था की डूबकी और प्रकृति के सुंदर नजारों को आत्मसात करने के बाद हम अब आगे चले उज्जैन की ओर। वैसे ओंकारेश्वर से इंदौर 80 किलोमीटर है और उज्जैन 140 किलोमीटर। ओंकारेश्वर से दोनों जगह के लिए बसें मिल जाती हैं। पर हम एक बार फिर ओंकारेश्वर रोड से उज्जैन के लिए मीटर गेज के पैसेंजर ट्रेन के शयनयान श्रेणी में आरक्षण करा चुके थे। ओंकारेश्वर रोड से दोपहर ढाई बजे आने वाली अकोला उज्जैन पैसेंजर थोड़ी देर से यानी चार बजे पहुंची। इसमें पैसेंजर में भी स्लीपर क्लास के तीन कोच लगते हैं। कम लोग ही दिन में इस रेल में आरक्षण कराते हैं। ट्रेन के टीटीई साहब जैसे हमारा इंतजार ही कर रहे थे। मिलते ही बोले अच्छा तो आप लोग आ गए।


ओंकारेश्वर रोड के बाद अगला स्टेशन आया है बड़वाह। यहां से पहले ट्रेन नर्मदा नदी पर बने पुल को पार करती है।

यहां से जाएं महेश्वर - बड़वाह से एक और पर्यटक स्थल महेश्वर जाया जा सकता है। ( यहां से 40 किलोमीटर है महेश्वर की दूरी। ) महेश्वर में रानी अहिल्याबाई के बनवाए मंदिर और सुंदर नर्मदा तट हैं। तो कभी अगली यात्रा महेश्वर की होगी। देश में बहुत कम जगह अब मीटर गेज की ट्रेने चलती हैं। उज्जैन ,से अकोला मार्ग भी गेज परिवर्तन की प्रक्रिया में है। ये रेल मार्ग इस इलाके के लोगों की जीवन रेखा की तरह है। रेलमार्ग का रास्ता पहाड़ी और मनोरम है।

मुखतियाड़ा, बलवारा, चोरल के बाद आया स्टेशन कालाकुंड। ट्रेन पहाड़ की घाटियों और सुरंगों से होकर गुजर रही है। कालाकुंड के बाद आता है पाताल पानी। यहां बहुत ही गहराई वाला झरना है। इसलिए इसका नाम दिया गया है पाताल पानी। इंदौर के लोग यहां पिकनिक मनाने पहुंचते हैं।

ट्रेन के टीटीई साहब जो टिकट चेक करने के बाद हमारे पास आकर बैठ गए हैं। हमसे बातें करने लगे हैं। उन्होंने  बताया कि बारिश के दिनों में झरने के पानी छींटे ट्रेन के डिब्बे में भी आ जाते हैं। पर पाताल पानी बहुत खतरनाक भी है। कई बार यहां नौजवानों की लापरवाही से जान जा चुकी है। पाताल पानी के बाद आया महू छावनी। यहां ट्रेन 15 मिनट रूकी। महू बाबा साहेब डाक्टर भीमराव आंबेडकर की जन्मस्थली है। डा. आंबेडकर के पिता यहां छावनी में सेना में पदस्थापित थे। 
महू के बाद हमारी छुक-छुक ट्रेन ने हमें पहुंचाया इंदौर। यहां हमने इंदौर के पोहा का स्वाद लिया। शाम को भी पोहा। हां मालवा इलाके के स्टेशनों पर दिन भर पोहा मिलता है। यहां पोहा में चीनी की चासनी मिलाते हैं, जिससे वह थोड़ा मीठा मीठा लगता है। साथ ही उसकी नरमी भी बनी रहती है।

ट्रेन उज्जैन डेढ़ घंटे देर से पहुंची है। हम अपने मेजबान बाबू सिंह कुशवाह के घर घास मंडी (फ्रीगंज) शेयरिंग आटो रिक्शा से सकुशल पहुंच गए। परिवार के लोग हमारा इंतजार कर रहे थे। हमारी लंबी यात्रा का यह आखिरी पड़ाव था जहां हम किसी होटल में न ठहरकर किसी मित्र के घर में ठहरे थे। मैं उज्जैन दूसरी बार पहुंचा हूं तो माधवी और अनादि पहली बार।

-    ---- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com   
 ( METER GAUGE, RAIL, ONKARESHWAR ROAD, PATAL PANI, MAHU, INDORE, UJJAIN )