Wednesday, July 31, 2013

नासिक रोड से ओंकारेश्वर वाया खंडवा- किशोर कुमार की याद


त्रयंबकेश्वर से चलने के बाद हमें क्रूजर के चालक महोदय ने नासिक शहर में नासिक रोड रेलवे स्टेशन के पास शाम को छोड़ दिया। महाराष्ट्र के शहर नासिक के बाद हमारा अगला पड़ाव था मध्य प्रदेश का ओंकारेश्वर। ओंकारेश्वर जाने के लिए हमें नासिक रोड से खंडवा जाएंगे। पर हमारी ट्रेन रात को 1.50 बजे है। शाम से आधी रात के बाद तक का वक्त काटने के लिए हमने नासिक रोड रेलवे स्टेशन के सामने होटल में कमरा ले लिया। रात को रेलवे स्टेशन के पास एक होटल में खाना खाने के बाद आकर कमरे में सोने की कोशिश करने लगे। नासिक रोड स्टेशन के सामने एक मार्केट में दूसरी मंजिल पर होटल। कमरा मिला 350 रुपये में डबल बेड। हालांकि यहां मच्छर बहुत थे इसलिए नींद नहीं आई। वैसे में मध्य रात्रि में ट्रेन थी तो सोना संभव नहीं था। 
नासिक रोड रेलवे स्टेशन के बाहर रात का नजारा। 

रात को एक बजे होटल छोड़कर प्लेटफार्म पर आ गए। रेलवे स्टेशन का नाम नासिक रोड है। आम तौर पर जिस रेलवे स्टेशन के नाम से आगे रोड लगा होता है वह मुख्य शहर से दूर होता है। पर नासिक के साथ ऐसा नहीं है। नासिक रोड स्टेशन नासिक शहर के अंदर आ गया है। हो सकता है कभी शहर के बाहर रहा हो पर अब शहर के अंदर है। खैर हमारी ट्रेन समय पर आई। यह ट्रेन हमारे शहर पटना जाती है, हालांकि हम इस ट्रेन में फिलहाल छोटी यात्रा कर रहे हैं। नासिक रोड के बाद निफाड, लासलगांव, मनमाड जंक्शन, नंदगांव, चालीसगांव, जलगांव, भुसावल के बाद ट्रेन मध्य प्रदेश में प्रवेश कर गई। भुसावल में सुबह हो गई है। बुरहानपुर, नेपानगर के बाद आता है खंडवा। 

किशोर कुमार के शहर खंडवा में - हम सुबह आठ बजे खंडवा जंक्शन पहुंच गए थे। खंडवा गायक अभिनेता किशोर कुमार की जन्मस्थली है। वही जिंदगी एक सफर है सुहाना वाले....किशोर दा। मुझे सन 1986 का दूरदर्शन पर आया उनका आखिरी लाइव शो याद आता है। वे मंच पर ईडीली उडली उ...करते हुए आए और अपना परिचय किशोर कुमार खंडवा वाले कह कर दिया। उसके एक साल बाद 13 अक्तूबर 1987 को किशोर दा नहीं रहे। पर खंडवा के लोग भी किशोर कुमार को खूब याद करते हैं।
किशोर कुमार गांगुली ( 04 अगस्त 1929, खंडवा, मध्य प्रदेश ) 

उनके जन्मदिन पर खंडवा शहर में उनको संगीतमय श्रद्धांजलि दी जाती है। तब दिन भर संगीत की महफिल चलती है। लोग किशोर दा के गीत गाकर उन्हें याद करते हैं। जब मैं ईटीवी में मध्य प्रदेश चैनल में कार्यरत था तो खंडवा में किशोर दादा की जयंती जो चार अगस्त को आती है तब लोगों को दिन भर उनके तरानों को गाते हुए सुना था। पर हमें खंडवा में ज्यादा वक्त गुजारने का मौका नहीं मिल सका। किशोर कुमार अपने आखिरी दिन में खंडवा आकर रहना चाहते थे पर ऐसा नहीं हो सका। तो किशोर कुमार की इस धरती को नमन।  
अनादि  खंडवा से ओंकारेश्वर मीटर गेज पैसेंजर ट्रेन की उपरी बर्थ पर. कभी ऐसे भी सफर करना पड़ता है
मीटर गेज के पैसेंजर ट्रेन का सफर -  खंडवा जिले में ही शहर से 55 किलोमीटर की दूरी पर है ओंकारेश्वर। खंडवा से ओंकारेश्वर के बीच छोटी लाइन यानी मीटर गेज की रेल सेवा है। अकोला-इंदौर-उज्जैन रेल मार्ग। हालांकि अब इस मीटर गेज को ब्रॉड गेज में बदलने की तैयारी चल रही है। खंडवा में ट्रेन से उतरते ही हमें ओंकारेश्वर वाले पैसेंजर ट्रेन के आने की जानकारी मिली जो एक घंटे लेट होने के कारण हमें मिल गई। हमलोग फटाफट टिकट खरीदकर ट्रेन में सवार हो लिए। पर पैसेंजर ट्रेन में बैठने के लिए आसानी से जगह नहीं मिल सकी। अनादि और माधवी के लिए शायद यह मीटर गेज का पहला रेल का सफर है। 




अनादि और मैं पैसेंजर ट्रेन के ऊपर वाले बर्थ पर पहुंच गए। पहाड़ी रास्ते से में कई छोटे-छोटे स्टेशन कोटलाखेड़ी, निमाडखेडी, सनावद से गुजरते हुए ट्रेन डेढ़ घंटे बाद ओंकारेश्वर रोड रेलवे स्टेशन आ पहुंची है। यहां से ओंकारेश्वर 12 किलोमीटर है। बसें जाती हैं और आटोरिक्शा भी। हमने एक आटो बुक किया। ओंकारेश्वर रोड से ओंकारेश्वर जाने के लिए आटो  रिक्शा और बस वालों की मनमानी जलती है। बिना किसी टाइम टेबल के घंटों इंतजार के बाद वे चलते हैं। यहां पर इसी चक्कर में हमारे कई घंटे बरबाद हो गए। मध्य प्रदेश में सरकारी रोडवेज बसों की सेवा नहीं है। तो कई जगह निजी बस वालों की मनमानी चलती है। 



ओंकारेश्वर में रहने के लिए सबसे अच्छी जगह गजानन आश्रम - 
गजानन आश्रम में - ओंकारेश्वर पहुंचने पर हमेें रहने के लिए जगह की तलाश करनी थी। पहले से कुछ ब्लॉगर साथियों ( मुकेश भालसे ) ने यहां के गजनान संस्थान के बारे में लिख रखा था। इसलिए हम सीधे गजानन संस्थान ही पहुंचे। कई एकड़ में फैला गुलाबी रंग का अति सुंदर हरित परिसर। हम स्वागत कक्ष पर पहुंचे। थोड़ी औपचरिकता के बाद भक्त निवास -2 में कमरा नंबर छह मिला हमें। तीन बेड वाला विशाल कमरा आधार तल पर।


जीरो प्वाइंट से गजानन आश्रम । 
दो तरफ खिड़की के बाहर हरियाली। विशाल कूलर की ठंडी हवा के साथ। टायलेट अटैच, अलमारी वैगेरह सुविधाओं के साथ कमरे का किराया महज 325 रुपये। कूलर का 50 रुपये अतिरिक्त है। पूरे देश में प्रकृति के गोद में इतना सुंदर और सस्ता आवास शायद ही कहीं उपलब्ध हो।

यहां कुल चार भक्त निवास में कई सौ लोगों के रहने की व्यवस्था है। समूह में आने वालों के लिए बड़े-बड़े हॉल भी हैं। परिसर में नीम और पीपल के पेड़ की ठंडी हवा इतनी अच्छी लगती है की कहीं जाने का जी ही नहीं करता। हरी-हरी घास इतनी नरम की अनादि इस पर ही लेटे रहना चाहते थे। परिसर में गजानन महाराज का सुंदर सा मंदिर भी है जिसमें नियमित पूजा होती है। 

गजानन आश्रम में हमारा कमरा। 
आश्रम में भोजनालय भी - गजनान आश्रम में एक शानदार भोजनालय भी है जहां 30 रुपये में भोजन की थाली उपलब्ध है। भोजनालय में स्वच्छता का खास ख्याल रखा जाता है। नास्ते में 6 रुपये में पोहा तो 9 रुपये में उपमा मिल जाता है। आश्रम में मिनरल वाटर की ठंडी बोतल में महज 11 रुपये में मिल जाती है, जो बाहर 20 रुपये की मिलती है। यहां तक की आश्रम के रिसेप्शन पर बीमारों के लिए दवाएं भी मुफ्त में मिल जाती हैं। आसपास के गरीब लोग भी यहां पर दवाएं लेने के लिए आते दिखाई दिए। 

-    ------   विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( (GAJANAN ASHRAM, OMKARESHWAR, KHANDWA, MP, METER GAUGE ) 

Tuesday, July 30, 2013

त्रयंबकेश्वर में समाहित हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश (08)

भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंग में आठवें स्थान पर आता है त्रयंबकेश्वर। त्रयंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र में नासिक शहर से 36 किलोमीटर दूर है। त्रि- अंबक यानी तीन नेत्रों वाले शिव। शिव का ये मंदिर समुद्र तल से ढाई हजार फीट की ऊंचाई पर पहाड़ों की तलहटी में बना है। गौतम और गंगा जी की प्रार्थना पर शिव यहां संसार के उपकार के लिए त्रयंबक रूप में विराजते हैं।


नाना साहब पेशवा ने बनवाया मंदिर - त्रयंबकेश्वर का मंदिर नाना साहब पेशवा ने बनवाया था। ये मंदिर काले पत्थरों से बना हुआ है। मंदिर के चारों ओर काले पत्थरों पर सुंदर नक्काशी देखने को मिलती है। मंदिर का निर्माण 1755 में आरंभ हुआ था। निर्माण कार्य 1786 में जाकर पूरा हुआ। तब मंदिर के निर्माण में 16 लाख रुपये खर्च किए गए थे।  मुख्य मंदिर के चार द्वार हैं जिनमें उत्तर व पूर्व का द्वार विशाल है। यहां मंदिर के गर्भ गृह में बाकी मंदिरों की तरह शिवलिंग नहीं है। बल्कि यहां एक छोटे से गड्ढे में अंगूठे जैसे तीन लिंग दिखाई देते हैं। ये ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं।


शिव के तीन प्रतीक यानी त्रयंबकेश्वर। इस शिवलिंग पर प्राकृतिक रूप से निरंतर गोदावरी नदी के जल से अभिषेक होता रहता है। यहां तीन लिंग चूंकि गड्ढे मे हैं इसलिए श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मंदिर के गर्भगृह में एक विशाल शीशा लगाया गया है जिसमें आप त्रयंबकेश्वर के दर्शन कर सकते हैं। हर सोमवार को मंदिर में भगवान शिव की पालकी निकाली जाती है। त्रयंबकेश्वर मंदिर में दूर दूर से लोग कालसर्प दोष के निवारण के लिए भी आते हैं।

गोदावरी नदी यहां से निकलती है -  त्रयंबक मंदिर के निकट ब्रह्मगिरी पर्वत से पुण्य सलीला गोदावरी नदी निकलती है। स्कंद पुराण में गोदावरी महात्मय की कथा आती है। कहा जाता है एक समय में सालों इस क्षेत्र में घोर अनावृष्टि के कारण गौतम ऋषि घोर तप किया। तब भगवान वरुण ने प्रसन्न होकर वर दियाकि यहां तुम्हारे नाम से अक्षय जल वाला कुंड होगा। इसके बाद से ये इलाका हरा भरा हो गया। ब्रह्मगिरी पर्वत पर जहां गौतम ऋषि ने लंबा तप किया दो जल कुंड हैं जिन्हें राम कुंड और लक्ष्मण कुंड कहते हैं। यहां से गोदावरी के उदगम तक पहुंचने के लिए पर्वत माला पर 700 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है।



कैसे पहुंचे - त्रयंबकेश्वर मंदिर पहुंचने के लिए आपको नासिक से बसें मिल जाती हैं। या आप टैक्सी बुक करके भी पहुंच सकते हैं। आप नासिक शहर में ही रुक कर त्रयंबकेश्वर मंदिर जाने का कार्यक्रम बना सकते हैं। वैसे मंदिर के आसपास भी आवासीय सुविधाएं उपलब्ध है। अगर आप त्रयंबकेश्वर में ही ठहरना चाहते हैं तो मंदिर से कुछ किलोमीटर पहले गजानन संस्थान अच्छा विकल्प हो सकता है। मंदिर के आसपास सामान रखने के लिए लॉकर, खाने पीने के समान्य होटल और ठहरने के लिए कई गेस्ट हाउस के विकल्प उपलब्ध है। 
महामृत्युंजय मंत्र
ओम त्र्यंबकम यजामहे ,सुगन्धिम पुष्टीवर्धनम।
ऊर्वारुकमीव बंधनात मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।


ज्यादा जानकारी के लिए यहां जाएं - http://trambakeshwar.com/

-    ---- माधवी रंजना
  (JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA, NASIK, MAHARASTRA) 
देश में कहां कहां हैं 12 ज्योतिर्लिंग
1. सोमनाथ ( गुजरात)
2. श्री मल्लिकार्जुन स्वामी ( करनूल, आंध्र प्रदेश)
3. महाकालेश्वर ( उज्जैन, मध्य प्रदेश )
4. ओंकारेश्वर (खंडवा, मध्य प्रदेश )
5. केदारनाथ (रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड )
6. भीमाशंकर (मंचर, पुणे, महाराष्ट्र)
7. काशी विश्वनाथ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
8. त्र्यंबकेश्वर (नासिक, महाराष्ट्र)
9. वैद्यनाथ (देवघर, झारखंड)
10. नागेश्वर (द्वारका, गुजरात)
11. रामेश्वरम (रामनाथपुरम, तमिलनाडु)
12. घृष्णेश्वर मंदिर (औरंगाबाद, महाराष्ट्र)


Monday, July 29, 2013

इस मंदिर में प्रवेश के लिए अंबेदकर ने किया था आंदोलन


नासिक में गोदावरी तट पर पंचवटी में सीता गुफा के बगल में स्थित है कालाराम का प्रसिद्ध मंदिर। मर्यादा पुरूषोत्तम रामचंद्र जी का ये मंदिर कालाराम मंदिर इसलिए कहलता है क्योंकि पूरा मंदिर काले रंग के पत्थरों से बना है। 1790 में बने इस मंदिर की वास्तुकला अद्भुत है। कालाराम मंदिर का शिल्प काफी हद तक त्रयंबकेश्वर मंदिर से मिलता जुलता है।

मंदिर के मुख्य गुंबद की ऊंचाई 70 फीट है। मंदिर का निर्माण सरदार ओढेकर पेशवा ने करवाया था। तकरीबन 12 सालों में ये विशाल मंदिर बन कर तैयार हुआ। इसके निर्माण में 2000 शिल्पी लगे थे। मंदिर में कुल 96 स्तंभ हैं। मंदिर के कलश में 32 टन स्वर्ण का इस्तेमाल हुआ है। मंदिर के निर्माण के लिए काला पत्थर रामसेज की पहाड़ी से लाई गई। मंदिर का परिसर 285 फीट लंबा और 105 फीट चौड़ा है। कहा जाता है इसी स्थान पर वनवास के दौरान श्रीराम चंद्र ने पर्णकुटी बनाई थी।


आमतौर पर राम मंदिरों में राम जी की मूर्ति तीर धनुष लिए होती है। लेकिन इस मंदिर में ऐसा नहीं है। यहां राम जी का एक हाथ उनके सीने पर है। मंदिर में राम की मूर्ति भी काले पत्थरों से बनी है। कहा जाता है राम जी का हाथ सीने पर इसलिए है क्योंकि वे अपने शरणागत का दुख हरते हैं। लंबे समय से कालाराम मंदिर की महाराष्ट्र में दूर-दूर तक प्रसिद्धि है। मंदिर का प्रबंधन कालाराम संस्थान देखता है। वैसे कालाराम मंदिर के बगल में एक गोराराम मंदिर भी है। कालाराम मंदिर में रामनवमी दशहरा और गुडीपड़वा के त्योहार विशेष तौर पर मनाए जाते हैं।


काल सर्प दोष निवारण -  गोदावरी तट पर कालाराम मंदिर ( भगवान विष्णु के अवतार राम और कपालेश्वर शिव का मंदिर होने के कारण इस क्षेत्र को हरि हर क्षेत्र भी माना जाता है। कालाराम मंदिर में लोग काल सर्प दोष के निवारण के लिए आते हैं। ज्यादा जानकारी के लिए यहां जाएं- http://kalsarp.com/


डाक्टर अंबेडकर की अगुवाई में हुई रक्तविहीन क्रांति -- किसी जमाने में कालाराम मंदिर में शूद्र वर्ण के लोगों के प्रवेश की मनाही थी। डाक्टर अंबेडकर की अगुवाई में कालाराम मंदिर में प्रवेश के लिए 1930 में ऐतिहासिक आंदोलन किया गया। पांच साल तक चले आंदोलन के बाद मंदिर में सबके लिए प्रवेश संभव हो पाया। दो मार्च 1930 को डाक्टर अंबेडकर की अगुवाई में दलित समाज के लोगों ने कालाराम मंदिर में प्रवेश की कोशिश की थी। तब मंदिर के पुजारियों ने ये कहकर दलितों का प्रवेश रोकने की कोशिश की थी कि ये मंदिर सार्वजनिक नहीं है।


डॉक्टर अंबेडकर के इस रक्तिविहीन क्रांतिकारी आंदोलन की कथा अब इतिहास के पन्नो में दर्ज है। हिंदू धर्म में छूआछूत दूर करने को लेकर किए गए आंदोलन में कालाराम मंदिर का आंदोलन प्रमुख था। साल 2008 में कालाराम मंदिर के पूर्वी प्रवेश द्वार पर इस ऐतिहासिक घटना का शीलापट्ट लगाकर वर्णन किया गया है।

-    ----विद्युत प्रकाश मौर्य
-    Dr. Ambedkar writes ……

I started temple entry Satyagraha only because I felt that was the best way of energizing th Depressed Classes and making them conscious of their position. As I believe I have achieved that purpose I have no more use for temple entry. I want the Depressed Classes to concentrate their energy and resource on politics and education and I hope that they will realise the importance of both. ( Volume-XVII. Dr. Babasaheb Ambedkar Writing and Speeches ) 

Sunday, July 28, 2013

नासिक में गोदावरी तीरे लगता है कुंभ

मुक्तिधाम मंदिर के दर्शन के बाद हमलोग अब गोदावरी नदी के तट पर पहुंच गए हैं। हमारे जीप के चालक महोदय ने कह दिया है गोदावरी तट और उसके आसपास के मंदिरों को जीप से नहीं घुमाएंगे आपको स्थानीय स्तर पर आटोरिक्शा बुक करना होगा। पहले आप लोग गोदावरी के दर्शन कर लें उसके बाद आटो से आसपास के मंदिरों के दर्शन कर लेना। उसके बाद हमलोग त्रयंबकेश्वर की ओर चलेंगे। तो हमलोग चल पड़े गोदावरी नदी के तट पर।


नासिक शहर के बीचों बीच बहती है गोदावरी नदी। यहां पर गोदावरी को गौतम गंगा भी कहते हैं। महाराष्ट्र में इस नदी का सम्मान गंगा के सदृश ही है। नासिक में इसी गोदावरी नदी के तट पर ही हर 12 साल बाद विशाल कुंभ का मेला लगता है। पर कुंभ मेला न हो तो भी गोदावरी नदी का तट सालों भर श्रद्धालुओं से गुलजार रहता है। नदी में स्नान करने के बाद लोग आसपास के मंदिरों में पूजा करते हैं। 



नासिक के अलावा कुंभ उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर, प्रयाग में संगम पर और हरिद्वार में गंगा तट पर लगता है। नासिक में गोदावरी के तट पर खूबसूरत पक्के घाट बने हुए हैं। यह काफी कुछ हरिद्वार के हर की पौड़ी की तरह नजर आता है। इनमें रामकुंड घाट प्रमुख है। इस घाट के आसपास ही कई मंदिर हैं। कई जगह पूजा का विधि-विधान लिखा हुआ है। यहां भी पंडे सक्रिय हैं। पर वे आपके साथ ठगी नहीं करते। 

हर शाम को मां गोदावरी की आरती - रामघाट पर ही सिंहस्थ के शाही स्नान का मुख्य घाट है। इस घाट पर रोज शाम को 7.30 बजे गोदावरी मां की महाआरती होती है। 

गोदावरी नदी के घाट पर कई मंदिर बने हैं। इन मंदिरों में प्रचीन गोदावरी मंदिर और महाकुंभ के मुख्य मंदिर आदि प्रमुख हैं। 

गोदावरी के मनोरम तट पर सालों पर भर लोग आस्था की डुबकी लगाते हैं। वहीं कुंभ के समय तो गोदावरी तट पर श्रद्धालुओं का महासमुद्र नजर आता है। हमने भी गोदावरी नदी में संक्षिप्त स्नान कर लिया है। मां गोदावरी के साथ अच्छा समय गुजारने के बाद हमलोग आगे के मंदिरों के दर्शन के लिए चल पड़े हैं। क्योंकि कम समय में हमें यहां आसपास में कई मंदिरों के दर्शन करने हैं। इसी बीच एक ऐतिहासिक घटना भी हमारा इंतजार कर रही है। 

महादेव का कपालेश्वर मंदिर - गोदावरी के तट के ठीक ऊपर पंचवटी क्षेत्र में शिव कपालेश्वर मंदिर है। यह देश का शायद एकमात्र शिव का ऐसा मंदिर है जहां पर मंदिर के बाहर शिव के वाहन नंदी बैल की कोई प्रतिमा नहीं स्थापित की गई है। यहां पर महादेव शिव अपने वाहन के बिना ही विराजते हैं। ऐसी जानकारी स्थानीय लोग श्रद्धालुओं को देते हैं। 


पंचवटी जहां से हुआ सीता का हरण  - कभी नासिक का पूरा इलाका घने जंगल का हुआ करता था। तभी यहां अयोध्या के राजा राम, लक्ष्मण और सीता वनवास के काल में रहे। नासिक का यह इलाका पंचवटी कहलाता है। पर अब पंचवटी शहर के बिल्कुल मध्य में आ चुका है। पंचवटी में सीता मैया का मंदिर भी है।



इस मंदिर को लोग सीता गुफा कहते हैं। हालांकि गुफा बहुत पुरानी नहीं प्रतीत होती है। इस गुफा के अंदर मां सीता का मंदिर है। यहां दर्शन के लिए काफी भीड़ लगी है। सीता गुफा के बाहर एक बड़ा वट वृक्ष है। कहा जाता है यहीं से रावण ने सीता का हरण किया था। यहां सीता मां की पर्णकुटी भी बनी है। हर रोज बड़ी संख्या में श्रद्धालु पर्णकुटी और पंचवटी मंदिर को देखने के लिए आते हैं। यहां दिन भर मेले जैसा माहल बना रहता है। 
-vidyutp@gmail.com ( NASIK, GODAVARI, RIVER, MAHAKHUMBHA, MAHARASTRA  ) 

Saturday, July 27, 2013

बारह ज्योर्लिंग के दर्शन करें नासिक के विशाल मुक्तिधाम मंदिर में


नासिक रोड रेलवे स्टेशन के पास ही स्थित है विशाल मुक्तिधाम मंदिर। नासिक रोड रेलवे स्टेशन भी अब नासिक शहर अंदर आ चुका है। वैसे आम तौर पर जिन रेलवे स्टेशनों के नाम के आगे रोड लगा होता है वे शहर के बाहर होते हैं। नासिक रोड सुनकर भी ऐसा ही प्रतीत होता है। पर नासिक रोड के साथ ऐसा नहीं है। यहां सारी रात चहल पहल रहती है। स्टेशन के सामने कई होटल और रेस्टोरेंट भी हैं।

मुक्तिधाम मंदिर नासिक शहर को लोकप्रिय मंदिर कांप्लेक्स है। यह नासिक शहर का बेहतर ढंग से प्रबंधित होने वाला मंदिर नजर आता है। यह वास्तव में एक मंदिर कांप्लेक्स हैं। यहां परिसर में कई देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित है। मंदिर में दर्शन के लिए एक से दो घंटे का समय अवश्य निकाल कर रखें। 

बारह ज्योतिर्लिंग की झांकी - उद्योगपति जयराम भाई वाइक्टो द्वारा बनवाए गए इस मंदिर में देश भर के सभी प्रमुख मंदिरों की प्रतिरूप बने हैं। यहां पर आप देश के 12 ज्योतिर्लिंग की झांकी और चार धाम की झांकी देख सकते हैं। मुख्य मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है। मंदिर की दीवारों में कृष्ण लीला और महाभारत के दृश्य को पेंटिंग में उकेरा गया है। यही नहीं मंदिर की दीवारों पर श्रीमदभागत गीता के 18 अध्याय भी उकेरे गए हैं।


मंदिर का निर्माण राजस्थान से लाए गए मकराना के संगमरमर पत्थरों से कराया गया है। यहां आप द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन के अलावा सभी प्रमुख देवी देवताओं के दर्शन कर सकते हैं। नासिक के मुक्तिधाम मंदिर परिसर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए रियायती दरों पर भोजनालय की सुविधा उपलब्ध है। भोजनालय में 50 रुपये में भोजन की थाली उपलब्ध है। इसके अलावा मंदिर परिसर में रियायती दर पर अच्छी आवासीय सुविधा भी उपलब्ध है। रहने के लिए कमरे 350 रुपये प्रतिदिन पर उपलब्ध हैं। मंदिर के आसपास छोटा सा बाजार भी है। यहां आप जरूरत की चीजें खरीद सकते हैं। हमें शिरडी लेकर आए टैक्सी वाले नासिक में सबसे पहले मुक्तिधाम मंदिर ही लेकर आए। यहां से गोदावरी तट की दूरी कोई सात किलोमीटर है।

कहां ठहरें - अगर आप सीधे नासिक पहुंचे हैं तो मुक्तिधाम मंदिर परिसर में स्थित अतिथि गृह में भी ठहर सकते हैं। इसके लिए आप इन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं - 0253 – 2465494 मंदिर के इंतजाम के लिए मुक्तिधाम ट्रस्ट बना हुआ है। मंदिर की स्थापना 1971 में हुई थी। उसके बाद से मंदिर का लगातार विस्तार हो रहा है। मंदिर सुबह 6 बजे लेकर रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है। वैसे आप नासिक में पंचवटी के पास सीता भवन में भी ठहर सकते हैं। SITA BHAWAN, NASIK, +91 253-2629926/29 www.sitabhavan.co.in

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   

 (NASIK, MUKTIDHAM TEMPLE, MAHARASTRA ) 

Friday, July 26, 2013

मीठे अंगूरों और प्याज का शहर है नासिक

हमने साईं बाबा के दर्शन के बाद नासिक जाने का कार्यक्रम पहले से तय कर रखा था। शिरडी से नासिक की दूरी 90 किलोमीटर है। थोड़ी पूछताछ के बाद पता चला कि यहां से टैक्सी वाले दिन भर में नासिक व त्रयंबकेश्वर घूमाने के बाद शिरडी वापस लाने का पैकेज देते हैं। हमने भी ऐसी टैक्सी बुक की 220 रुपये प्रति सवारी।हालांकि हमें वापस शिरडी लौटना नहीं था, पर ये पैकेज सही था। शिरडी नगर पंचायत भवन के टैक्सी स्टैंड के पास से शेयरिंग टैक्सी बुक की। हमारे साथ कुछ कालेज के छात्र हैं। ड्राईवर महोदय काफी तेज तर्रार हैं। दोपहर की तेज गर्मी है। पर शिरडी से नासिक का रास्ता काफी अच्छा है। लिहाजा गाड़ी सड़क पर सरपट भाग रही है। हम डेढ़ घंटे में नासिक शहर की सीमा में थे। 


नासिक महाराष्ट्र का औद्योगिक और व्यापारिक शहर है। नासिक नाम इसलिए क्योंकि यहीं पर वनवास के दौरान लक्ष्मण ने सूर्पनखा की नाक का विच्छेद किया था। रावण की बहन सूर्पनखा ने राम लक्ष्मण से प्रणय निवेदन किया था। जो राम और लक्ष्मण को पसंद नहीं आया। कटी नाक लेकर शूर्पनखा ने रावण से जाकर गुहार लगाई। इसके बाद नासिक के ही पंचवटी से रावण ने सीता का हरण किया। यूं समझे तो शूर्पनखा के कारण ही सारी रामायण हुई। 


नासिक जाना जाता है मीठे अंगूर के लिए। यहां के अंगूर को जीआई प्रमाण पत्र ( ग्लोबल इंडेक्स) मिल चुका है, महाबलेश्वर और पंचगनी के स्ट्राबरी की तरह। वहीं नासिक में देश की प्याज की सबसे बड़ी मंडी है। देश विदेश में प्याज का नासिक सबसे बड़ा प्रेषक है। नासिक शहर के पास ही लासलगांव में प्याज की बड़ी मंडी है।

आगरा मुंबई हाईवे पर अवस्थित नासिक शहर नोट छापने वाले टकसाल के लिए जाना जाता है। तो यहां पर हिंदुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड, सीएट टायर, महिंद्रा एंड महिंद्रा के वाहन, कई शराब फैक्ट्रियां और भी कई बड़े उद्योग लगे हैं। बड़ी संख्या में श्रमिकों को रोजगार देने वाला शहर है नासिक।


नासिक रेलवे स्टेशन का नाम नासिक रोड है। पर यह नासिक शहर के अंदर आ चुका है। गोदावरी नदी के तट पर बसे नासिक शहर की आबादी 2011 की जनगणना के मुताबिक 18 लाख 62 हजार को पार कर चुकी है।




नासिक पहुंच कर मैं अपने ससुर जी स्वर्गीय बृजनंदन मेहता को याद करना चाहूंगा जो प्याज के बड़े व्यापारी थे। रहने, खाने-पीने और घूमने के शौकीन। वे साल के कुछ महीने नासिक शहर में गुजारते थे। फिल्म स्टार डैनी से उनकी दोस्ती थी। डैनी का भी नासिक में व्यापार था। माधवी नासिक पहुंच कर भावुक हो गई। पिताजी की यादें जो जुड़ी हैं इस शहर के नाम के साथ। पिता बचपन में छोड़कर इस दुनिया से चले गए थे।

-         - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( ( NASIK, NASHIK, ONION, GRAPE, PANCHWATI, MAHARASTRA ) 

Thursday, July 25, 2013

साईं बाबा ने कहा था एक दिन हजारों लोग आएंगे


शिरडी के बारे में साईं बाबा ने कहा था कि एक दिन यहां हजारों लोग आएंगे। जब ऐसा कहा था तब शिरडी एक वीराना गांव था। वाकई साईं बाबा का प्रताप है कि आज यहां पर न सिर्फ महाराष्ट्र से बल्कि पूरी दुनिया से हजारों लोग हर रोज आते हैं। साईं बाबा को लेकर कई तरह के विवाद उठते हैं कि वे कौन थे,कहां से आए थे किस धर्म को मानते थे। पर इन सबके बीच उनके भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। न सिर्फ शिरडी में बल्कि देश के तमाम शहरों में साईं बाबा के मंदिर बनते जा रहे हैं।  

साईं बाबा का समाधि मंदिर - शिरडी में साईं बाबा का समाधि मंदिर है। कई श्रद्धालु यहां बाबा की समाधि पर चादर चढ़ाते हैं। यह चादर सवा दो मीटर लंबी और एक मीटर चौड़ी होती है। समान्य दिनों में भी यहां श्रद्धालुओं की इतनी भीड़ होती है कि दर्शन में एक घंटे तो लग ही जाते हैं। गुरुवार को आपको कई घंटे लग सकते हैं। क्योंकि गुरुवार सांई भक्तों के लिए पवित्र दिन माना जाता है।
 
साईं भक्त अब्दुल्ला की झोपड़ी - समाधि मंदिर के अलावा यहां द्वारका माई का मंदिर चावडी और ताजिमखान बाबा चौक पर साईं भक्त अब्दुल्ला की झोपड़ी है। साई बाबा ने शिरडी में 1918 में समाधि ली।  
हिंदू पंचांग के अनुसार माना जाता है कि 22 अक्टूबर को शिरडी के साईं बाबा का निर्वाण दिवस था। 1918 में दशहरा के दिन उन्होंने आखिरी सांस ली थी। इससे पहले वे कई दशक शिरडी में रहे और इस दौरान कई चमत्कार किए। लोग कहते हैं कि साई बाबा ने कहा था कि एक समय आएगा जब शिरडी में दूर-दूर से लोग आएंगे। 

हर रोज चार बार आरती - वाकई हर रोज दूर दूर से लोग यहां आने लगे हैं। आजकल साईं मंदिर में चार समय आरती होती है। ये है काकड़ आरती ( प्रातःकालीन), मध्याह्न आरती, धूप आरती और सेज आरती।

साईं मंदिर से ही खरीदें प्रसाद - शिरडी के साईं मंदिर में ट्रस्ट का अपना प्रसाद काउंटर है। आप पेड़े आदि वहीं से खरीदें। मंदिर के अंदर कैमरा मोबाइल आदि प्रतिबंधित है। इन्हें जमा करने के लिए बाहर काउंटर बने हैं। मंदिर में प्रवेश के लिए तीन द्वार हैं। आप कहीं से भी प्रवेश कर सकते हैं। साईं बाबा महान संत थे। कई लोग उन्हें कबीर की श्रेणी में मानते हैं।



अपने सरल संदेशों के कारण साईं बाबा अमीर गरीब, हिंदू मुसलमान सबके बीच लोकप्रिय हैं। उन्होंने सभी जीवों के प्रति श्रद्धा रखने और सब्र करने का संदेश दिया। इसलिए उनके मूर्ति के आगे लिखा होता है – श्रद्धा सबूरी। अगर हम उनके संदेश को माने तो आपस में होने वाली लड़ाइयां बिल्कुल बंद हो सकती हैं। आज देश के हर शहर में साईं बाबा के मंदिर बन चुके हैं। और देश भर से सालों पर साईं भक्तों का शिरडी आने का सिलसिला चलता रहता है।

फिल्मी सितारे भी हैं साईं के भक्त -  देश भर में साईं बाबा का गुणगान करने वाले गीतकारों की लंबी संख्या है। कई फिल्मी सितारों ने साईं बाबा में आस्था जताई है, इनमें फिल्म स्टार मनोज कुमार प्रमुख हैं। हर भाषा में साईं बाबा के भजन गाए जाते हैं। अब तो साईं जागरण और साईं चौकी की शुरुआत हो चुकी है।

गणपति का स्वरूप भी मानते हैं -  साईं के भक्त मानते हैं कि साईं सभी कामों को निर्विघ्न संपन्न कराने वाले गणपति के ही स्वरूप हैं। साईं बाबा के भीतर भगवती सरस्वती का भी अंश माना गया है। साईं संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्तिपालन और संहार के अधिष्ठाता देवों यानि ब्रह्माविष्णु और महेश का भी अभिन्न अंग हैं। साईं ही स्वयं गुरु बनकर भवसागर से पार उतारते हैं। भारत की तरह अमेरिकाब्रिटेनपाकिस्तान और हांगकांग में भी साईं बाबा के मंदिर है।
शिरडी आने वाले श्रद्धालु अक्सर शिरडी से शनि मंदिर शिगणापुर भी जाते हैं। यहां से शिगणापुर के लिए शेयरिंग टैक्सियां मिलती रहती हैं। पर हमलोग वहां नहीं जा रहे हैं। 
--माधवी रंजना

 ( SHIRDI, SAI BABA, MAHARASTRA, SAI BHAKTA ABDULLA, SAINT  ) 




Wednesday, July 24, 2013

शिरडी - साई बाबा के शहर में

उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक शिरडी वाले साईं बाबा की बड़ी महिमा है। शिरडी आज देश विदेश के साईं बाबा के करोड़ो भक्तों के लिए पवित्र स्थान बन चुका है। साल का कोई ऐसा दिन नहीं होता है जब हजारों लोग शिरडी नहीं पहुंचते हों। गुरुवार को तो यहां भीड़ काफी बढ़ जाती है। अब दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद आदि शहरों से शिरडी के लिए सीधी रेलगाड़ियां चलने लगी हैं। कभी वीरान गांव शिरडी आज बहुत बड़ा आस्था का स्थल बन चुका है। साई की महिमा के कारण ये वीरान सा गांव अब आबाद हो चुका है। वैसे शिरडी महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में राहटा तहसील के अंतर्गत आता है। शिरडी कभी छोटा सा गांव हुआ करता था। ये अहमदनगर मनमाड स्टेट हाईवे पर स्थित है। तो चलिए चलते हैं शिरडी वाले साई बाबा के पास...


सतारा से चलकर हमारी ट्रेन सुबह के 4 बजे कोपरगांव रेलवे स्टेशन पहुंची। बाहर अभी अंधेरा था। पर शिरडी जाने वाली टाटा मैजिक जैसी गाड़ियां आवाज लगा रही थीं। हम भी एक गाड़ी में बैठ गए। उजाला होने तक हम साईं बाबा के शहर में  पहुंच चुके थे। हमने पहले से तय कर रखा था कि हमें शिरडी में  साईं बाबा के दर्शन करने के बाद नासिक जाना है। इसलिए हमें यहां होटल लेने का कोई मतलब नहीं था।

शिरडी  में उतरते ही हमें मैजिक स्टैंड के पास कुछ एजेंट मिले। उनका प्रस्ताव था कि आप 300 रुपये में हमसे प्रसाद खरीदें तो हम आपको एक होटल में कुछ घंटे के लिए कमरा दिलाएंगे जहां आप स्नान आदि करके तैयार होकर मंदिर में दर्शन के लिए जा सकते हैं। प्रस्ताव सही था। वे हमें मंदिर के पीछे अब्दुल्ला की झोपड़ी के पास ले गए, वहां एक होटल में हम तैयार हुए। उसके बाद सामान कमरा खाली कर रिसेप्शन पर रखवा दिया। हालांकि 300 रुपये  में कमरा देने के बाद उन्होंने जो प्रसाद दिलवाया वह वैसे 100 रुपये में मिल जाता। सुबह-सुबह हमें भूख लगी थी इसलिए दर्शन से पहले पेट पूजा करने की सोची। तो साईं मंदिर के पीछे वाली गली में एक दुकान में मसाला डोसा , उपमा और इडली खाई। इन सबका स्वाद बेहतरीन था। 

कैसे पहुंचे - मनमाड पुणे लाइन पर कोपरगांव नामक छोटे से रेलवे स्टेशन से शिरडी की दूरी 15 किलोमीटर है। यहां से हर ट्रेन के पहुंचने बाद छोटी गाड़ियां शिरडी के लिए चलती रहती हैं। वैसे आप मनमाड उतर कर भी शिरडी जा सकते हैं। मनमाड बड़ा रेलवे स्टेशन है। यहां से शिरडी 80 किलोमीटर है। 




वैसे अब शिरडी भी रेल लिंक से जुड़ चुका है। मुंबई से रोज रात को 10.55 बजे शिरडी पैसेंजर खुलती है तो दादर से हफ्ते में तीन दिन शिरडी के लिए एक्सप्रेस ट्रेन भी है। अगर आप नासिक में हैं तो नासिक से भी बस और टैक्सी से शिरडी जा सकते हैं। नासिक से शिरडी कोई 90 किलोमीटर है। गरमियों में शिरडी का मौसम काफी गर्म रहता है। पानी की भी कमी रहती है। बेहतर होगा कि आप यहां सरदी के दिनों में जाएं। वैसे साईं भक्त तो यहां सालों भर आते रहते हैं।


कहां ठहरें - शिरडी में साईं भक्तों के लिए शिरडी ट्रस्ट की ओर बड़ी संख्या में आवासीय सुविधा का प्रावधान है। सामान रखने के लिए लॉकर भी बनाए गए हैं। आप साई ट्रस्ट में अपने आवास की एडवांस बुकिंग भी करा सकते हैं। वैसे शिरडी में बड़ी संख्या में प्राइवेट होटल भी हैं। हालांकि बड़ी संख्या में शिरडी पहुंचने वाले साईं भक्त यहां कुछ घंटे रूकने के बाद आसपास के तीर्थ स्थलों की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। शिरडी पहुंचने वाले श्रद्धालु अक्सर शिंगणापुर स्थित शनि मंदिर और नासिक , त्रयंबकेश्वर आदि की यात्रा पर भी जाते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

Hotel SAI GEETA, Tazimkhan baba chauk, Dwarka mai Street,
SHIRDI.  Ashok 9850054337, Iswar – 9921773130
Hotel Sai DWAR, Tazimkhan Baba chawk, KD NAWAL - 9657123677, 9881678103
शिरडी का साई नगर रेलवे स्टेशन

Tuesday, July 23, 2013

सतारा से कोपरगांव, महाराष्ट्र एक्सप्रेस से




इस यात्रा में पोरबंदर, द्वारका, सोमनाथ, दीव, अहमदाबाद, वडोदरा, मुंबई, महाबलेश्वर, पंचगनी, वाई के बाद हम चल पड़े साई बाबा के शहर शिरडी की ओर। कुछ घंटे सतारा के बस स्टैंड में गुजारने के बाद हमलोग एक आटो रिक्शा बुक करके रेलवे स्टेशन के लिए चल पड़े हैं। सतारा रेलवे स्टेशन यहां के बस स्टैंड से सात किलोमीटर आगे शहर के बाहर है। स्टेशन से बस स्टैंड के बीच सिटी बस सेवा चलती है। या फिर आरक्षित आटो रिक्शा से स्टेशन जाया जा सकता है। 
हमें टैक्सी ड्राईवर चंद्रकांत ने पहले ही बता दिया था कि सतारा रेलवे स्टेशन के आसपास एक भी दुकान नहीं है। वहां छोटे से स्टेशन भवन के अलावा कुछ भी नहीं। चारों तरफ हरे भरे खेतों के बीच महाराष्ट्र के एक जिला मुख्यालय का रेलवे स्टेशन। किसी सपनों के रेलवे स्टेशन सा लगता है। 


हालांकि सतारा रेलवे स्टेशन से होकर कई महत्वपूर्ण रेलगाड़ियां गुजरती हैं। कई बार यह स्टेशन किसी गांव के छोटे से स्टेशन सा लगता है। हो सकता है यहां रात को आप ट्रेन से उतरें तो आपके अलावा प्लेटफार्म पर कोई भी दूसरा यात्री न हो। लेकिन राहत की बात है कि आपको बाहर निकलने पर स्टेशन से शहर जाने के लिए ऑटो रिक्शा मिल जाएंगे। 

कृष्णा और वेणा नदियों का संगम है माउली में -  वास्तव में सतारा रेलवे स्टेशन शहर से सात किलोमीटर आगे माउली में पड़ता है। माउली में कृष्णा और वेणा नदियों का संगम भी है। महाबलेश्वर ने निकलने वाली पांच नदियो में से दो का यहीं पर संगम हो जाता है। इस संगम पर एक मंदिर और घाटों का निर्माण कराया गया है। यह संगम की सतारा का मुख्य दर्शनीय स्थल है।


सतारा रेलवे स्टेशन का कोड है- STR . रेलवे स्टेशन पर एक छोटी सी कैंटीन हैजहां से हमने समोसे खरीद कर खाए। रेलवे स्टेशन पर कुल दो ही प्लेटफार्म हैं। एक अप ट्रेनों के लिए दूसरी डाउन के लिए। सतारा रेलवे स्टेशन से हमारी ट्रेन शाम में थी। पर अंधेरा होने से पहले ही हमलोग सतारा रेलवे स्टेशन पहुंच गए हैं। फिर अगले कुछ घंटे रेलवे स्टेशन पर बैठकर हमें ट्रेन का इंतजार करना है। 

हमलोग महाराष्ट्र एक्सप्रेस से कोपरगांव जाने वाले हैं, जो शिरडी का निकटतम रेलवे स्टेशन है। यह ट्रेन 7.27 बजे आती है। सतारा में दो मिनट का ठहराव है।
 महाराष्ट्र एक्सप्रेस (11039) छत्रपति शाहू जी महाराज टर्मिनल कोल्हापुर से बनकर चलती है। यह मिरजसांगली, करड होती हुई सतारा पहुंचती है। इसके आगे पुणेदौंद होकर गोंदिया जंक्शन जाती है। अहमदनगर के बाद हमलोग कोपरगांव में उतर गए। पर आगे यह ट्रेन मनमाड जंक्शन. चालीसगांव, भुसावल, शेगांवअकोला, मुर्तुजापुर, बडनेरा, पुलगांव, वर्धा, सेवाग्राम, आर्वी, नागपुर, भंडारा होते हुए गोंदिया तक जाती है। हालांकि इस ट्रेन में केटरिंग सेवा नहीं है।

नीरा स्टेशन पर रात का डिनर - हमलोग रात में आठ बजे महाराष्ट्र एक्सप्रेस में सवार हो गए थे। पर अब समस्या थी रात के डिनर की। ट्रेन में तो केटरिंग सेवा थी नहीं। तो रास्ते एक सहयात्री की सलाह पर नीरा नामक एक छोटे से स्टेशन पर हमने खाना खरीदा। आईआरसीटीसी के वेंडर सौजन्य से ही महज 35 रुपये में खाना मिला। जैसा की सहयात्री महोदय ने बताया थाखाना शानदार था। कई बार एक मार्ग पर लगातार सफर करने वाले सहयात्रियों की सलाह काफी काम की होती है। हालांकि महाराष्ट्र एक्सप्रेस का पुणे में 15 मिनट का और दौंद जंक्शन में भी 15 मिनट का ठहराव है। पर पुणे आने से पहले हमलोग खा-पीकर सो गए थे।  

महाराष्ट्र के 50 फीसदी हिस्से में घूम जाती है ये ट्रेन -  इस ट्रेन का नाम यूं ही महाराष्ट्र एक्सप्रेस नहीं है। यह कोल्हापुर से गोंदिया के बीच चलते हुए महाराष्ट्र का 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा घूमते हुए जाती है। इसके रास्ते में कुल 1346 किलोमीटर के सफर में 62 ठहराव आते हैं। मतलब कुल 30 घंटे के सफर में यह ट्रेन एक तरह से महाराष्ट्र दर्शन है। किसी एक ही राज्य में सबसे लंबा सफर करने का श्रेय जाता है इस ट्रेन को। दूसरी बात इसके नाम को लेकर। जैसे केरल एक्सप्रेस, तेलंगाना एक्सप्रेस, आंध्रा एक्सप्रेस, कर्नाटक एक्सप्रेस देश की राजधानी दिल्ली से राज्य को जोड़ती हैं। पर महाराष्ट्र एक्सप्रेस तो महाराष्ट्र के अंदर ही चलती है। रेल रात में सरपट समय पर चल रही है। दौंड के बाद अहमदनगर और पुणातांबा जंक्शन जैसे ठहराव आए पर तब हमलोग सो रहे थे। 

शिरडी 16 किलोमीटर - सुबह के साढ़े चार बजे हैं और बाहर अभी अंधेरा छाया है। पर हमलोग कोपरगांव रेलवे स्टेशन पर उतर चुके हैं। यहां से शिरडी की दूरी 16 किलोमीटर है। बाहर अंधेरा है इसलिए थोड़ी देर प्लेटफार्म पर बैठने के बाद हमलोग स्टेशन से बाहर निकले तो देखा टाटा मैजिक वाले शिरडी के लिए आवाज लगा रहे हैं। अच्छी बात है कि यहां सभी मैजिक वाले नंबर से चलते हैं। दिल्ली की तरह सवारियों को जबरदस्ती अपनी तरफ नहीं खींचते। तो जिस मैजिक का नंबर है उसमें हमने जगह ले ली है। और चल पड़े हैं साईं दरबार की ओर। 

-         विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
((SATARA, MAHARASTRA EXPRESS, 11039, RAIL, NIRA, IRCTC, KOPARGAON, SHIRDI SAI NAGAR ) 
शिरडी - और पहुंच गए हमलोग साईं बाबा के दरबार में।