Wednesday, July 31, 2013

लोगों की अखंड आस्था है गजनान महाराज में

ओंकारेश्वर के गजानन आश्रम में हमारे दो दिन बड़े आनंद के साथ गुजरे। हरे भरे परिसर में अनादि ने खूब मौज मस्ती की। यहां हमे पता चला कि महान संत गजानन महाराज द्वारा स्थापित गजानन सेवा संस्थान का मुख्य आश्रम महाराष्ट्र के शेगांव ( अकोला के पास ) में है। 

शेगांव विशाल आनंद सागर नगर बनाया गया है। यहां श्रद्धालुओं के लिए आवास के अलावा बच्चों के लिए शानदार पार्क और झूले बनाए गए हैं। बच्चों के लिए खिलौना ट्रेन भी है। ऐसा प्रतीत होता है मानो गजानन महाराज को बच्चों से काफी स्नेह था। इसके अलावा आश्रम ने मध्य प्रदेश में ओंकारेश्वर, महाष्ट्र में त्रयंबकेश्वर और पंढरपुर में भी आवासीय कांप्लेक्स बनाए हैं। इन सब स्थलों पर आप जाएं तो गजानन आश्रम में ठहर सकते हैं।

एडवांस बुकिंग नहीं - गजानन संस्थान के किसी भी आश्रम में रहने के लिए कोई एडवांस बुकिंग की सुविधा नहीं है। मौके पर पहुंचकर ही उपलब्धता देखी जा सकती है। आश्रम में रहने वाले श्रद्धालुओं को एक संकल्प पत्र पढ़ना पड़ता है। इसमें नशीले पदार्थों का सेवन न करने की बात के साथ ज्यादा शोर करने पर पाबंदी है। गजानन आश्रम में श्रद्धालु अधिकतम तीन दिन रह सकते हैं।

सारा इंतजाम सेवादारों के हवाले - गजानन आश्रम की पूरी व्यवस्था कोई वेतन वाले स्टाफ नहीं बल्कि सेवादार देखते हैं। सेवादार पूरी आस्था से आने वाले भक्तों की सेवा में लगे रहते हैं। आश्रम की साफ सफाई इतनी की आप अपने घर में भी इतनी स्वच्छता नहीं रख पाते होंगे। आश्रम के काउंटर पर फर्स्ट एड और मामूली बीमारियों के लिए दवाओं की सुविधा भी निःशुल्क उपलब्ध है। साथ ही काउंटर से गजनान संस्थान का साहित्य भी खरीदा जा सकता है।

आश्रम में सेवादार बनने की होड़ - संत गजनान महाराज के प्रति महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके के लोगों में बड़ी आस्था है। महाराष्ट्र के कई जिलों से गजानन आश्रम का सेवादार बनने के लिए लोग गांव-गांव से आते हैं। कुछ महीने सेवा देने के बाद वापस घर चले जाते हैं। एक सेवादार ने बताया कि आश्रम में सेवा देने के लिए लोगों में इतनी होड़ लगी रहती है कि नाम लिखवाने के कई साल बाद आश्रम की ओर से बुलावा आता है। ज्यादा जानने के लिए आश्रम की इस साइट पर जाएं-  http://www.gajananmaharaj.org/
-    
------- विद्युत प्रकाश मौर्य
 (GAJANAN ASHRAM, JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA) 


Tuesday, July 30, 2013

ओंकारेश्वर– प्रणव रूप में हैं यहां हैं शिव (04)

मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में स्थित शिव का ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में चौथे स्थान पर आता है। यहां सुरम्य वादियों के बीच नर्मदा नदी के तटपर स्थित है शिव का मंदिर ओंकारेश्रर। ओंकारेश्वर में नर्मदा और कुबेर नदियों के बीच एक विशाल टापू बन गया है। इसी टापू पर बना है ओंकारेश्वर मंदिर। यह टापू 4 किलोमीटर लंबा और 2 किलोमीटर चौड़ा है। इस टापू का मान्धाता पर्वत या शिवपुरी भी कहते हैं। यह पर्वत ओम के आकार का है, इसलिए इसे ओंकारेश्वर कहा गया है। यहां नदी के किनारे पक्के घाट बने हुए हैं।
शिवपुराण में ओंकारेश्वर के दर्शन और उसका महात्मय वर्णित है। ओंकारेश्वर का मंदिर सफेद रंग का है। मंदिर पांच मंजिला है। मंदिर में मौजूद शिवलिंग गढ़ा नहीं गया है, बल्कि ये प्राकृतिक है। यहां प्रणव लिंग के दर्शन और अभिषेक का बड़ा महत्व है। मंदिर में शिवलिंग के पास ही माता पार्वती की भी प्रतिमा है।
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन। 
ओंकारेश्वर का मुख्य मंदिर ऊंचे शिखर से युक्त उत्तर भारतीय वास्तुकला में बना हुआ है। मंदिर के निर्माण के विषय में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती है। इसे किसने बनवाया और कब यह अज्ञात ही है। मंदिर का गर्भ गृह मूलतः पुरानी निर्माण शैली में बने एक छोटे मंदिर के सामान लगता है इसका गुम्बद पत्थर की परतों को जमा कर बनाया गया है।
कहा जाता है कि पुराण काल में इच्छवाकु वंश के राजा युवनाक्ष के प्रतापी पुत्र मान्धाता ने इस स्थान पर घोर तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया था। सिक्खों के प्रथम गुरू गुरूनानक देव जी ने भी ओंकार पर्वत की परिक्रमा की थी। उनकी स्मृति में शिवपुरी में गुरूद्वारा है। जगतगुरु शंकराचार्यजी ने अपने गुरु भगवतपादाचार्य जी से यहीं शिक्षा ली थी।
नर्मदा के किनारे ओंकारेश्वर मंदिर। 

ओंकार पर्वत की परिक्रमा -
ओंकार पर्वत का परिक्रमा मार्ग लगभग 8 किलोमीटर का है। पैदल परिक्रमा में लगभग 4 घंटे लगते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं में बड़ी संख्या में लोग हैं जो परिक्रमा करते हैं। इस परिक्रमा मार्ग पर लगभग 108 मंदिर हैं। कई लोग नदी में नाव आरक्षित करके भी परिक्रमा करते हैं। आपके पास भी समय हो तो परिक्रमा अवश्य करें। प्रकृति से साहचर्य का आनंद आएगा। ओंकारेश्वर मंदिर केंद्रीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।

ममलेश्वर महादेव का मंदिर  -ओंकारेश्वर में नर्मदा नदी के इस पार ममलेश्वर महादेव का मंदिर है। दोनों मंदिरों की गणना एक ही ज्योतिर्लिंग के तौर पर की गई है। इसलिए यहां आने वाले श्रद्धालु दोनों ही मंदिरों के दर्शन करते हैं। ओंकारेश्वर में शिव प्रणव रूप में विराजते हैं तो दूसरे मंदिर में पार्थिव शिव लिंग है जो अमरेश्वर के रूप में है। ममलेश्वर मंदिर गजानन आश्रम के बगल में स्थित है। इसके भवन की वास्तुकला भी काफी सुंदर है।
ओंकारेश्वर स्थित ममलेश्वर महादेव का मंदिर। 

ममलेश्वर महादेव का यह मंदिर पांच  मंजिला है। इसके हर मंजिल पर एक शिवालय है। इस मंदिर प्रांगण में छह मंदिर और भी बने हुए हैं। पत्थर के बेहतरीन नक्काशियों वाला यह मंदिर अब पुरातत्व के अधीन है। मंदिर की दीवारों पर शिव महिमा स्तोत्र लिखा गया। इन शिलालेखों की तारीख 1063 ई बताई जाती है। इससे इस मंदिर की प्राचीनता का पता चलता है। 

कहां ठहरें - ओंकारेश्वर में महंगी शापिंग के लिए कुछ खास नहीं है, लेकिन यह कुछ दिन प्रकृति की गोद में ईश्वर में आस्था के साथ गुजारने के लिए बड़ी अच्छी जगह हो सकती है। ओंकारेश्वर में रहना घूमना मन को आनंदित करता है। यहां मध्य प्रदेश टूरिज्म के अच्छे होटल भी हैं। तो रहने के लिए काफी सस्ती धर्मशालाएं भीं हैं। पर यहां ठहरने के लिए सबसे बेहतरीन जगह गजानन आश्रम है। 

कैसे पहुंचे - ओंकारेश्वर रोड रेलवे स्टेशन से ओंकारेश्वर मंदिर 13 किलोमीटर है। उज्जैन,खंडवा या इंदौर से सीधे बस से भी ओंकारेश्वर पहुंचा जा सकता है। ओंकारेश्वर मंदिर जाने के लिए नर्मदा नदी पर एक झूले का पुल बना है तो दूसरा स्थायी पुल। कई श्रद्धालु नर्मदा में स्नान के बाद नाव में बैठकर मंदिर जाते हैं।
 --- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com

 (OMKARESHWAR, MAMLESHWAR, JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA) 

Monday, July 29, 2013

नासिक रोड से ओंकारेश्वर वाया खंडवा

 महाराष्ट्र के शहर नासिक के बाद हमारा अगला पड़ाव था मध्य प्रदेश का ओंकारेश्वर। यहां भी अगले ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने थे। नासिक से खंडवा का रेल का सफर छह घंटे का है। नासिक रोड से हमारी ट्रेन 13202 एलटीटी पटना राजेंद्रनगर एक्सप्रेस रात में 1.50 बजे थी। ट्रेन पकड़ने के लिए हमने नासिक रेलवे स्टेशन के सामने होटल में कमरा ले लिया था। स्टेशन के सामने एक मार्केट में दूसरी मंजिल पर होटल। कमरा मिला 350 रुपये में डबल बेड। हालांकि यहां मच्छर बहुत थे। रात को एक बजे होटल छोड़कर प्लेटफार्म पर आ गए। ट्रेन समय पर आई। यह ट्रेन हमारे शहर पटना जाती है हालांकि हम इस ट्रेन में फिलहाल छोटी यात्रा कर रहे हैं। हम सुबह आठ बजे खंडवा जंक्शन पहुंच गए थे। खंडवा गायक अभिनेता किशोर कुमार की जन्मस्थली है। वही जिंदगी एक सफर है सुहाना वाले....किशोर दा कई बार अपना परिचय किशोर कुमार खंडवा वाले कह कर देते थे। 

खंडवा जिले में ही शहर से 55 किलोमीटर की दूरी पर है ओंकारेश्वर। खंडवा से ओंकारेश्वर के बीच छोटी लाइन यानी मीटर गेज की रेल सेवा है। अकोला-इंदौर-उज्जैन मार्ग। हालांकि अब इस मीटर गेज को ब्राडगेज में बदलने की तैयारी चल रही है। खंडवा में ट्रेन से उतरते ही हमें ओंकारेश्वर वाले पैसेंजर ट्रेन के आने की जानकारी मिली जो एक घंटे लेट होने के कारण हमें मिल गई। हमलोग फटाफट टिकट खरीदकर ट्रेन में सवार हो लिए। पर पैसेंजर ट्रेन में बैठने के लिए आसानी से जगह नहीं मिली। 
अनादि पैसेंजर ट्रेन की उपरी बर्थ पर. कभी ऐसे भी सफर करना पड़ता है

अनादि और मैं पैसेंजर ट्रेन के ऊपर वाले बर्थ पर पहुंच गए। पहाड़ी रास्ते से में कई छोटे-छोटे कोटलाखेड़ी, निमाडखेडी, सनावद जैसे स्टेशनों से होते हुए ट्रेन डेढ़ घंटे बाद ओंकारेश्वर रोड स्टेशन पहुंची। यहां से ओंकारेश्वर 12 किलोमीटर है। बसें जाती हैं और आटोरिक्शा भी। हमने एक आटो बुक किया। ओंकारेश्वर रोड से ओंकारेश्वर जाने के लिए आटो  रिक्शा और बस वालों की मनमानी जलती है। बिना किसी टाइम टेबल के घंटों इंतजार के बाद वे चलते हैं। यहां पर इसी चक्कर में हमारे कई घंटे बरबाद हो गए। मध्य प्रदेश में सरकारी रोडवेज नहीं है। तो कई जगह निजी बस वालों की मनमानी चलती है। 
ओंकारेश्वर में रहने के लिए सबसे अच्छी जगह गजानन आश्रम - 
गजानन आश्रम में - पहले से कुछ ब्लॉगर साथियों ( मुकेश भालसे ) ने गजनान संस्थान के बारे में लिख रखा था। इसलिए हम सीधे गजानन संस्थान ही पहुंचे। कई एकड़ में फैला गुलाबी रंग का अति सुंदर हरित परिसर। हम स्वागत कक्ष पर पहुंचे। थोड़ी औपचरिकता के बाद भक्त निवास -2 में कमरा नंबर छह मिला हमें। तीन बेड वाला विशाल कमरा आधार तल पर।


जीरो प्वाइंट से गजानन आश्रम । 
 दो तरफ खिड़की के बाहर हरियाली। विशाल कूलर की ठंडी हवा के साथ। टायलेट अटैच, अलमारी वैगेरह सुविधाओं के साथ कमरे का किराया महज 325 रुपये। कूलर का 50 रुपये अतिरिक्त है। पूरे देश में प्रकृति के गोद में इतना सुंदर और सस्ता आवास शायद ही कहीं उपलब्ध हो।

यहां कुल चार भक्त निवास में कई सौ लोगों के रहने की व्यवस्था है। समूह में आने वालों के लिए बड़े-बड़े हॉल भी हैं। परिसर में नीम और पीपल के पेड़ की ठंडी हवा इतनी अच्छी लगती है की कहीं जाने का जी ही नहीं करता। हरी-हरी घास इतनी नरम की अनादि इस पर ही लेटे रहना चाहते थे। परिसर में गजानन महाराज का सुंदर सा मंदिर भी है जिसमें नियमित पूजा होती है। 
आश्रम में भोजनालय भी - 
गजानन आश्रम में हमारा कमरा। 
गजनान आश्रम में एक शानदार भोजनालय भी है जहां 30 रुपये में भोजन की थाली उपलब्ध है। भोजनालय में स्वच्छता का खास ख्याल रखा जाता है। नास्ते में 6 रुपये में पोहा तो 9 रुपये में उपमा मिल जाता है। आश्रम में मिनरल वाटर की ठंडी बोतल में महज 11 रुपये में मिल जाती है, जो बाहर 20 रुपये की मिलती है। यहां तक की आश्रम के रिसेप्शन पर बीमारों के लिए दवाएं भी मुफ्त में मिल जाती हैं। आसपास के गरीब लोग भी यहां पर दवाएं लेने के लिए आते दिखाई दिए। 

-    ------   विद्युत प्रकाश मौर्य
( (GAJANAN ASHRAM, OMKARESHWAR, KHANDWA, MP ) 

Sunday, July 28, 2013

त्रयंबकेश्वर में समाहित हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश (08)

भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंग में आठवें स्थान पर आता है त्रयंबकेश्वर। त्रयंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र में नासिक शहर से 36 किलोमीटर दूर है। त्रि- अंबक यानी तीन नेत्रों वाले शिव। शिव का ये मंदिर समुद्र तल से ढाई हजार फीट की ऊंचाई पर पहाड़ों की तलहटी में बना है। गौतम और गंगा जी की प्रार्थना पर शिव यहां संसार के उपकार के लिए त्रयंबक रूप में विराजते हैं।
नाना साहब पेशवा ने बनवाया मंदिर - त्रयंबकेश्वर का मंदिर नाना साहब पेशवा ने बनवाया था। ये मंदिर काले पत्थरों से बना हुआ है। मंदिर के चारों ओर काले पत्थरों पर सुंदर नक्काशी देखने को मिलती है। मंदिर का निर्माण 1755 में आरंभ हुआ था। निर्माण कार्य 1786 में जाकर पूरा हुआ। तब मंदिर के निर्माण में 16 लाख रुपये खर्च किए गए थे।  मुख्य मंदिर के चार द्वार हैं जिनमें उत्तर व पूर्व का द्वार विशाल है। यहां मंदिर के गर्भ गृह में बाकी मंदिरों की तरह शिवलिंग नहीं है। बल्कि यहां एक छोटे से गड्ढे में अंगूठे जैसे तीन लिंग दिखाई देते हैं। ये ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं।
 शिव के तीन प्रतीक यानी त्रयंबकेश्वर। इस शिवलिंग पर प्राकृतिक रूप से निरंतर गोदावरी नदी के जल से अभिषेक होता रहता है। तीन लिंग चूंकि गड्ढे मे हैं इसलिए श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मंदिर के गर्भगृह में एक विशाल शीशा लगाया गया है जिसमें आप त्रयंबकेश्वर के दर्शन कर सकते हैं। हर सोमवार को मंदिर में भगवान शिव की पालकी निकाली जाती है। त्रयंबकेश्वर मंदिर में दूर दूर से लोग कालसर्प दोष के निवारण के लिए भी आते हैं।

गोदावरी यहां से निकलती है -  त्रयंबक मंदिर के निकट ब्रह्मगिरी पर्वत से पुण्य सलीला गोदावरी नदी निकलती है। स्कंद पुराण मेंगोदावरी महात्मय की कथा आती है। कहा जाता है एक समय में सालों इस क्षेत्र में घोर अनावृष्टि के कारण गौतम ऋषि घोर तप किया। तब भगवान वरुण ने प्रसन्न होकर वर दियाकि यहां तुम्हारे नाम से अक्षय जल वाला कुंड होगा। इसके बाद से ये इलाका हरा भरा हो गया। ब्रह्मगिरी पर्वत पर जहां गौतम ऋषि ने लंबा तप किया दो जल कुंड हैं जिन्हें राम कुंड और लक्ष्मण कुंड कहते हैं।

यहां से गोदावरी के उदगम तक पहुंचने के लिए पर्वत माला पर 700 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है।



कैसे पहुंचे - त्रयंबकेश्वर मंदिर पहुंचने के लिए आपको नासिक से बसें मिल जाती हैं। या आप टैक्सी बुक करके भी पहुंच सकते हैं। आप नासिक शहर में ही रुक कर त्रंयबकेश्वर जाने का कार्यक्रम बना सकते हैं। वैसे मंदिर के आसपास भी आवासीय सुविधाएं उपलब्ध है। अगर आप त्रयंबकेश्वर में ही ठहरना चाहते हैं तो मंदिर से कुछ किलोमीटर पहले गजानन संस्थान अच्छा विकल्प हो सकता है।

महामृत्युंजय मंत्र
ओम त्र्यंबकम यजामहे ,सुगन्धिम पुष्टीवर्धनम।

ऊर्वारुकमीव बंधनात मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।

ज्यादा जानकारी के लिए यहां जाएं - http://trambakeshwar.com/

-    ---- माधवी रंजना




 (JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA, NASIK, MAHARASTRA) 


Saturday, July 27, 2013

इस मंदिर में प्रवेश के लिए अंबेदकर ने किया था आंदोलन


 नासिक में गोदावरी तट पर पंचवटी में सीता गुफा के बगल में है कालाराम का प्रसिद्ध मंदिर। मर्यादा पुरूषोत्तम रामचंद्र जी का ये मंदिर कालाराम मंदिर इसलिए कहलता है क्योंकि पूरा मंदिर काले रंग के पत्थरों से बना है। 1790 में बने इस मंदिर की वास्तुकला अद्भुत है। कालाराम मंदिर का शिल्प काफी हद तक त्रयंबकेश्वर मंदिर से मिलता जुलता है। मंदिर के मुख्य गुंबद की ऊंचाई 70 फीट है। मंदिर का निर्माण सरदार ओढेकर पेशवा ने करवाया था। तकरीबन 12 सालों में ये विशाल मंदिर बन कर तैयार हुआ। इसके निर्माण में 2000 शिल्पी लगे थे। मंदिर में कुल 96 स्तंभ हैं। मंदिर के कलश में 32 टन स्वर्ण का इस्तेमाल हुआ है। मंदिर के निर्माण के लिए काला पत्थर रामसेज की पहाड़ी से लाई गई।मंदिर का परिसर 285 फीट लंबा और 105 फीट चौड़ा है। कहा जाता है इसी स्थान पर वनवास के दौरान श्रीराम चंद्र ने पर्णकुटी बनाई थी।
आमतौर पर राम मंदिरों में राम जी की मूर्ति तीर धनुष लिए होती है। लेकिन इस मंदिर में ऐसा नहीं है। यहां राम जी का एक हाथ उनके सीने पर है। मंदिर में राम की मूर्ति भी काले पत्थरों से बनी है। कहा जाता है राम जी का हाथ सीने पर इसलिए है क्योंकि वे अपने शरणागत का दुख हरते हैं। लंबे समय से कालाराम मंदिर की महाराष्ट्र में दूर-दूर तक प्रसिद्धि है। मंदिर का प्रबंधन कालाराम संस्थान देखता है। वैसे कालाराम मंदिर के बगल में एक गोराराम मंदिर भी है। कालाराम मंदिर में रामनवमी दशहरा और गुडीपड़वा के त्योहार विशेष तौर पर मनाए जाते हैं।
काल सर्प दोष निवारण -  गोदावरी तट पर कालाराम मंदिर ( भगवान विष्णु के अवतार राम और कपालेश्वर शिव का मंदिर होने के कारण इस क्षेत्र को हरि हर क्षेत्र भी माना जाता है। कालाराम मंदिर में लोग काल सर्प दोष के निवारण के लिए आते हैं। ज्यादा जानकारी के लिए यहां जाएं- http://kalsarp.com/

डाक्टर अंबेडकर की अगुवाई में हुई थी रक्त विहीन क्रांति -- किसी जमाने में कालाराम मंदिर में शूद्र वर्ण के लोगों के प्रवेश की मनाही थी। डाक्टर अंबेडकर की अगुवाई में कालाराम मंदिर में प्रवेश के लिए 1930 में ऐतिहासिक आंदोलन किया गया। पांच साल तक चले आंदोलन के बाद मंदिर में सबके लिए प्रवेश संभव हो पाया। 2 मार्च 1930 को डाक्टर अंबेडकर की अगुवाई में दलित समाज के लोगों ने कालाराम मंदिर में प्रवेश की कोशिश की थी। तब मंदिर के पुजारियों ने ये कहकर दलितों का प्रवेश रोकने की कोशिश की थी कि ये मंदिर सार्वजनिक नहीं है। डॉक्टर अंबेडकर के इस रक्तिविहीन क्रांतिकारी आंदोलन की कथा अब इतिहास के पन्नो में दर्ज है। साल 2008 में कालाराम मंदिर के पूर्वी प्रवेश द्वार पर इस ऐतिहासिक घटना का शीलापट्ट लगाकर वर्णन किया गया है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
-    Dr. Ambedkar writes ……

I started temple entry Satyagraha only because I felt that was the best way of energizing th Depressed Classes and making them conscious of their position. As I believe I have achieved that purpose I have no more use for temple entry. I want the Depressed Classes to concentrate their energy and resource on politics and education and I hope that they will realise the importance of both. ( Volume-XVII. Dr. Babasaheb Ambedkar Writing and Speeches ) 

Thursday, July 25, 2013

नासिक का विशाल मुक्तिधाम मंदिर


नासिक रोड रेलवे स्टेशन के पास ही स्थित है विशाल मुक्तिधाम मंदिर। नासिक रोड रेलवे स्टेशन भी अब नासिक शहर अंदर आ चुका है। वैसे आम तौर पर जिन रेलवे स्टेशनों के नाम के आगे रोड लगा होता है वे शहर के बाहर होते हैं। नासिक रोड सुनकर भी ऐसा ही प्रतीत होता है। पर नासिक रोड के साथ ऐसा नहीं है। यहां सारी रात चहल पहल रहती है। स्टेशन के सामने कई होटल और रेस्टोरेंट भी हैं।

मुक्तिधाम मंदिर नासिक शहर को लोकप्रिय मंदिर कांप्लेक्स है। यह नासिक शहर का बेहतर ढंग से प्रबंधित होने वाला मंदिर नजर आता है। यह वास्तव में एक मंदिर कांप्लेक्स हैं। यहां परिसर में कई देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित है। मंदिर में दर्शन के लिए एक से दो घंटे का समय अवश्य निकाल कर रखें। 
बारह ज्योतिर्लिंग की झांकी - उद्योगपति जयराम भाई वाइक्टो द्वारा बनवाए गए इस मंदिर में देश भर के सभी प्रमुख मंदिरों की प्रतिरूप बने हैं। यहां पर आप देश के 12 ज्योतिर्लिंग की झांकी और चार धाम की झांकी देख सकते हैं। मुख्य मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है। मंदिर की दीवारों में कृष्ण लीला और महाभारत के दृश्य को पेंटिंग में उकेरा गया है। यही नहीं मंदिर की दीवारों पर श्रीमदभागत गीता के 18 अध्याय भी उकेरे गए हैं।

मंदिर का निर्माण राजस्थान से लाए गए मकराना के संगमरमर पत्थरों से कराया गया है। यहां आप द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन के अलावा सभी प्रमुख देवी देवताओं के दर्शन कर सकते हैं। मंदिर परिसर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए रियायती दरों पर भोजनालय की सुविधा उपलब्ध है। इसके अलावा मंदिर परिसर में रियायती दर पर अच्छी आवासीय सुविधा भी उपलब्ध है। मंदिर के आसपास छोटा सा बाजार भी है। यहां आप जरूरत की चीजें खरीद सकते हैं। हमें शिरडी लेकर आए टैक्सी वाले नासिक में सबसे पहले मुक्तिधाम मंदिर ही लेकर आए। यहां से गोदावरी तट की दूरी कोई सात किलोमीटर है।

कहां ठहरें - अगर आप सीधे नासिक पहुंचे हैं तो मुक्तिधाम मंदिर परिसर में स्थित अतिथि गृह में भी ठहर सकते हैं। इसके लिए आप इन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं - 0253 – 2465494 मंदिर के इंतजाम के लिए मुक्तिधाम ट्रस्ट बना हुआ है। मंदिर की स्थापना 1971 में हुई थी। उसके बाद से मंदिर का लगातार विस्तार हो रहा है। मंदिर सुबह 6 बजे लेकर रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है। वैसे आप नासिक में पंचवटी के पास सीता भवन में भी ठहर सकते हैं। SITA BHAWAN, NASIK, +91 253-2629926/29 www.sitabhavan.co.in

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   

 (NASIK, MUKTIDHAM TEMPLE, MAHARASTRA ) 

Wednesday, July 24, 2013

नासिक में गोदावरी तीरे लगता है कुंभ

नासिक शहर के बीचों बीच बहती है गोदावरी नदी। गोदावरी को गौतम गंगा भी कहते हैं। महाराष्ट्र में इस नदी का सम्मान गंगा के सदृश ही है। गोदावरी नदी के तट पर ही हर 12 साल बाद विशाल कुंभ का मेला लगता है।

नासिक के अलावा कुंभ उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर, प्रयाग में संगम पर और हरिद्वार में गंगा तट पर लगता है। नासिक में गोदावरी के तट पर खूबसूरत पक्के घाट बने हुए हैं काफी कुछ हरिद्वार के हर की पौड़ी की तरह। इनमें रामकुंड घाट प्रमुख है। 

हर शाम को मां गोदावरी की आरती - रामघाट पर ही सिंहस्थ के शाही स्नान का मुख्य घाट है। इस घाट पर रोज शाम को 7.30 बजे गोदावरी मां की महाआरती होती है। घाट पर कई मंदिर बने हैं। इन मंदिरों में प्रचीन गोदावरी मंदिर और महाकुंभ के मुख्य मंदिर आदि प्रमुख हैं। गोदावरी के मनोरम तट पर सालों पर भर लोग आस्था की डुबकी लगाते हैं। वहीं कुंभ के समय तो गोदावरी तट पर श्रद्धालुओं का महासमुद्र नजर आता है। 

कपालेश्वर मंदिर - गोदावरी के तट के ठीक ऊपर शिव कपालेश्वर मंदिर है। यह देश का शायद एकमात्र शिव का ऐसा मंदिर है जहां पर मंदिर के बाहर शिव के वाहन नंदी बैल की कोई प्रतिमा नहीं है। यहां शिव अपने वाहन के बिना ही विराजते हैं।

पंचवटी जहां से हुआ सीता का हरण  - कभी नासिक का पूरा इलाका घने जंगल का हुआ करता था। तभी यहां अयोध्या के राजा राम, लक्ष्मण और सीता वनवास के काल में रहे। नासिक का यह इलाका पंचवटी कहलाता है। पर अब पंचवटी शहर के बिल्कुल मध्य में आ चुका है। पंचवटी में सीता मैया का मंदिर भी है।

इस मंदिर को सीता गुफा कहते हैं। हालांकि गुफा बहुत पुरानी नहीं है। इस गुफा के अंदर मां सीता का मंदिर है। सीता गुफा के बाहर एक बड़ा वट वृक्ष है। कहा जाता है यहीं से रावण ने सीता का हरण किया था। यहां सीता मां की पर्णकुटी भी बनी है। हर रोज बड़ी संख्या में श्रद्धालु पर्णकुटी और पंचवटी मंदिर को देखने के लिए आते हैं। यहां दिन भर मेले जैसा माहल बना रहता है। 
-vidyutp@gmail.com

( NASIK, GODAVARI, RIVER, MAHAKHUMBHA, MAHARASTRA  ) 

Tuesday, July 23, 2013

मीठे अंगूरों का शहर है नासिक

हमने साईं बाबा के दर्शन के बाद नासिक जाने का कार्यक्रम पहले से तय कर रखा था। शिरडी से नासिक की दूरी 90 किलोमीटर है। थोड़ी पूछताछ के बाद पता चला कि यहां से टैक्सी वाले दिन भर में नासिक व त्रयंबकेश्वर घूमाने के बाद शिरडी वापस लाने का पैकेज देते हैं। हमने भी ऐसी टैक्सी बुक की 220 रुपये प्रति सवारी।हालांकि हमें वापस शिरडी लौटना नहीं था, पर ये पैकेज सही था। शिरडी नगर पंचायत भवन के टैक्सी स्टैंड के पास से शेयरिंग टैक्सी बुक की। हमारे साथ कुछ कालेज के छात्र हैं। ड्राईवर महोदय काफी तेज तर्रार हैं। दोपहर की तेज गर्मी है। पर शिरडी से नासिक का रास्ता काफी अच्छा है। लिहाजा गाड़ी सड़क पर सरपट भाग रही है। हम डेढ़ घंटे में नासिक शहर की सीमा में थे। 

नासिक महाराष्ट्र का औद्योगिक और व्यापारिक शहर है। नासिक नाम इसलिए क्योंकि यहीं पर वनवास के दौरान लक्ष्मण ने सूर्पनखा की नाक का विच्छेद किया था। रावण की बहन सूर्पनखा ने राम लक्ष्मण से प्रणय निवेदन किया था। जो राम और लक्ष्मण को पसंद नहीं आया। कटी नाक लेकर शूर्पनखा ने रावण से जाकर गुहार लगाई। इसके बाद नासिक के ही पंचवटी से रावण ने सीता का हरण किया। यूं समझे तो शूर्पनखा के कारण ही सारी रामायण हुई। 
आगरा मुंबई हाईवे पर अवस्थित नासिक शहर नोट छापने वाले टकसाल के लिए जाना जाता है। तो यहां पर हिंदुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड, सीएट टायर, महिंद्रा एंड महिंद्रा के वाहन, कई शराब फैक्ट्रियां और भी कई बड़े उद्योग लगे हैं। बड़ी संख्या में श्रमिकों को रोजगार देने वाला शहर है नासिक। वहीं नासिक जाना जाता है मीठे अंगूर के लिए। यहां के अंगूर को जीआई प्रमाण पत्र ( ग्लोबल इंडेक्स) मिल चुका है, महाबलेश्वर और पंचगनी के स्ट्राबरी की तरह। वहीं नासिक में देश की प्याज की सबसे बड़ी मंडी है। देश विदेश में प्याज का नासिक सबसे बड़ा प्रेषक है। नासिक शहर के पास ही लासलगांव में प्याज की बड़ी मंडी है। 

नासिक रेलवे स्टेशन का नाम नासिक रोड है। पर यह नासिक शहर के अंदर आ चुका है। गोदावरी नदी के तट पर बसे नासिक शहर की आबादी 2011 की जनगणना के मुताबिक 18 लाख 62 हजार को पार कर चुकी है।

मैं अपने ससुर जी स्वर्गीय बृजनंदन मेहता को याद करना चाहूंगा जो प्याज के बड़े व्यापारी थे। वे साल के कुछ महीने नासिक शहर में गुजारते थे। फिल्म स्टार डैनी से उनकी दोस्ती थी। डैनी का भी नासिक में व्यापार था। माधवी नासिक पहुंच कर भावुक हो गई। पिताजी की यादें जो जुड़ी हैं इस शहर के नाम के साथ। पिता बचपन में छोड़कर इस दुनिया से चले गए थे।

-    -  - ---- विद्युत प्रकाश मौर्य 
( ( NASIK, ONION, GRAPE, PANCHWATI, MAHARASTRA ) 

Monday, July 22, 2013

साईं बाबा ने कहा था एक दिन हजारों लोग आएंगे


शिरडी के बारे में साईं बाबा ने कहा था कि एक दिन यहां हजारों लोग आएंगे। जब ऐसा कहा था तब शिरडी एक वीराना गांव था। वाकई साईं बाबा का प्रताप है कि आज यहां पर न सिर्फ महाराष्ट्र से बल्कि पूरी दुनिया से हजारों लोग हर रोज आते हैं। साईं बाबा को लेकर कई तरह के विवाद उठते हैं कि वे कौन थे,कहां से आए थे किस धर्म को मानते थे। पर इन सबके बीच उनके भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। न सिर्फ शिरडी में बल्कि देश के तमाम शहरों में साईं बाबा के मंदिर बनते जा रहे हैं।  
साईं बाबा का समाधि मंदिर
शिरडी में साईं बाबा का समाधि मंदिर है। कई श्रद्धालु यहां बाबा की समाधि पर चादर चढ़ाते हैं। यह चादर सवा दो मीटर लंबी और एक मीटर चौड़ी होती है। समान्य दिनों में भी यहां श्रद्धालुओं की इतनी भीड़ होती है कि दर्शन में एक घंटे तो लग ही जाते हैं। गुरुवार को आपको कई घंटे लग सकते हैं। क्योंकि गुरुवार सांई भक्तों के लिए पवित्र दिन माना जाता है।
 
साईं भक्त अब्दुल्ला की झोपड़ी
समाधि मंदिर के अलावा यहां द्वारका माई का मंदिर चावडी और ताजिमखान बाबा चौक पर साईं भक्त अब्दुल्ला की झोपड़ी है। साई बाबा ने शिरडी में 1918 में समाधि ली।  
हिंदू पंचांग के अनुसार माना जाता है कि 22 अक्टूबर को शिरडी के साईं बाबा का निर्वाण दिवस था। 1918 में दशहरा के दिन उन्होंने आखिरी सांस ली थी। इससे पहले वे कई दशक शिरडी में रहे और इस दौरान कई चमत्कार किए। लोग कहते हैं कि साई बाबा ने कहा था कि एक समय आएगा जब शिरडी में दूर दूर से लोग आएंगे। आजकल साईं मंदिर में चार समय आरती होती है। ये है काकड़ आरती ( प्रातःकालीन), मध्याह्न आरती, धूप आरती और सेज आरती।

साईं मंदिर से ही खरीदें प्रसाद - शिरडी के साईं मंदिर में ट्रस्ट का अपना प्रसाद काउंटर है। आप पेड़े आदि वहीं से खरीदें। मंदिर के अंदर कैमरा मोबाइल आदि प्रतिबंधित है। इन्हें जमा करने के लिए बाहर काउंटर बने हैं। मंदिर में प्रवेश के लिए तीन द्वार हैं। आप कहीं से भी प्रवेश कर सकते हैं। साईं बाबा महान संत थे। लोग उन्हें कबीर की श्रेणी में मानते हैं।



अपने सरल संदेशों के कारण साईं बाबा अमीर गरीब, हिंदू मुसलमान सबके बीच लोकप्रिय हैं। उन्होंने सभी जीवों के प्रति श्रद्धा रखने और सब्र करने का संदेश दिया। इसलिए उनके मूर्ति के आगे लिखा होता है – श्रद्धा सबूरी। अगर हम उनके संदेश को माने तो आपस में होने वाली लड़ाइयां बिल्कुल बंद हो सकती हैं। आज देश के हर शहर में साईं बाबा के मंदिर बन चुके हैं। और देश भर से सालों पर साईं भक्तों का शिरडी आने का सिलसिला चलता रहता है।

देश भर में साईं बाबा का गुणगान करने वाले गीतकारों की लंबी संख्या है। कई फिल्मी सितारों ने साईं बाबा में आस्था जताई है, इनमें फिल्म स्टार मनोज कुमार प्रमुख हैं। हर भाषा में साईं बाबा के भजन गाए जाते हैं। अब तो साईं जागरण और साईं चौकी की शुरुआत हो चुकी है।

साईं के भक्त मानते हैं कि साईं सभी कामों को निर्विघ्न संपन्न कराने वाले गणपति के ही स्वरूप हैं। साईं बाबा के भीतर भगवती सरस्वती का भी अंश माना गया है। साईं संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार के अधिष्ठाता देवों यानि ब्रह्मा, विष्णु और महेश का भी अभिन्न अंग हैं। साईं ही स्वयं गुरु बनकर भवसागर से पार उतारते हैं। भारत की तरह अमेरिका, ब्रिटेन, पाकिस्तान और हांगकांग में भी साईं बाबा के मंदिर है।
 --- -माधवी रंजना

( SHIRDI, SAI BABA, MAHARASTRA, SAI BHAKTA ABDULLA ) 



Sunday, July 21, 2013

शिरडी - साई बाबा के शहर में

शिरडी - साईं बाबा के दरबार में 
उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक शिरडी वाले साईं बाबा की बड़ी महिमा है। शिरडी आज देश विदेश के साईं बाबा के करोड़ो भक्तों के लिए पवित्र स्थान बन चुका है। साल का कोई ऐसा दिन नहीं होता है जब हजारों लोग शिरडी नहीं पहुंचते हों। दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद आदि शहरों से शिरडी के लिए सीधी रेलगाड़ियां चलने लगी हैं। कभी वीरान गांव शिरडी आज बहुत बड़ा आस्था का स्थल बन चुका है। वैसे शिरडी महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में राहटा तहसील के अंतर्गत आता है। शिरडी कभी छोटा सा गांव हुआ करता था। ये अहमदनगर मनमाड स्टेट हाईवे पर स्थित है।

सतारा से चलकर हमारी ट्रेन सुबह के 4 बजे कोपरगांव रेलवे स्टेशन पहुंची। बाहर अभी अंधेरा था। पर शिरडी जाने वाली टाटा मैजिक जैसी गाड़ियां आवाज लगा रही थीं। हम भी एक गाड़ी में बैठ गए। उजाला होने तक हम साईं बाबा के शहर में  पहुंच चुके थे। हमने पहले से तय कर रखा था कि हमें शिरडी में  साईं बाबा के दर्शन करने के बाद नासिक जाना है। इसलिए हमें यहां होटल लेने का कोई मतलब नहीं था।

शिरडी में हमें मैजिक स्टैंड के पास कुछ एजेंट मिले। उनका प्रस्ताव था कि आप 300 रुपये में हमसे प्रसाद खरीदें तो हम आपको एक होटल में कुछ घंटे के लिए कमरा दिलाएंगे जहां आप स्नान आदि करके तैयार होकर मंदिर में दर्शन के लिए जा सकते हैं। प्रस्ताव सही था। वे हमें मंदिर के पीछे अब्दुल्ला की झोपड़ी के पास ले गए, वहां एक होटल में हम तैयार हुए। उसके बाद सामान कमरा खाली कर रिसेप्शन पर रखवा दिया। हालांकि 300 रुपये  में कमरा देने के बाद उन्होंने जो प्रसाद दिलवाया वह वैसे 100 रुपये में मिल जाता। सुबह-सुबह हमें भूख लगी थी इसलिए दर्शन से पेट पूजा करने की सोची। तो साईं मंदिर के पीछे वाली गली में एक दुकान में मसाला डोसा खाया। इस डोसा का स्वाद बेहतरीन था। 


कैसे पहुंचे - मनमाड पुणे लाइन पर कोपरगांव नामक छोटे से रेलवे स्टेशन से शिरडी की दूरी 15 किलोमीटर है। यहां से हर ट्रेन के पहुंचने बाद छोटी गाड़ियां शिरडी के लिए चलती रहती हैं। वैसे आप मनमाड उतर कर भी शिरडी जा सकते हैं। मनमाड बड़ा रेलवे स्टेशन है। यहां से शिरडी 80 किलोमीटर है। वैसे अब शिरडी भी रेल लिंक से जुड़ चुका है। मुंबई से रोज रात को 10.55 बजे शिरडी पैसेंजर खुलती है तो दादर से हफ्ते में तीन दिन शिरडी के लिए एक्सप्रेस ट्रेन भी है। अगर आप नासिक में हैं तो नासिक से भी बस और टैक्सी से शिरडी जा सकते हैं। नासिक से शिरडी कोई 90 किलोमीटर है। गरमियों में शिरडी का मौसम काफी गर्म रहता है। पानी की भी कमी रहती है। बेहतर होगा कि आप यहां सरदी के दिनों में जाएं। वैसे साईं भक्त तो यहां सालों भर आते रहते हैं।


कहां ठहरें - शिरडी में साईं भक्तों के लिए शिरडी ट्रस्ट की ओर बड़ी संख्या में आवासीय सुविधा का प्रावधान है। सामान रखने के लिए लॉकर भी बनाए गए हैं। आप साई ट्रस्ट में अपने आवास की एडवांस बुकिंग भी करा सकते हैं। वैसे शिरडी में बड़ी संख्या में प्राइवेट होटल भी हैं। हालांकि बड़ी संख्या में शिरडी पहुंचने वाले साईं भक्त यहां कुछ घंटे रूकने के बाद आसपास के तीर्थ स्थलों की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। शिरडी पहुंचने वाले श्रद्धालु अक्सर शिंगणापुर स्थित शनि मंदिर और नासिक , त्रयंबकेश्वर आदि जाते हैं।
-         माधवी रंजना

Hotel SAI GEETA, Tazimkhan baba chauk, Dwarka mai Street,
SHIRDI.  Ashok 9850054337, Iswar – 9921773130
Hotel Sai DWAR, Tazimkhan Baba chawk, KD NAWAL - 9657123677, 9881678103

Saturday, July 20, 2013

महात्मा फूले की धरती सतारा

वाई से हमारा अगला पड़ाव था सतारा। वैसे तो महाबलेश्वर, पंचगनी और वाई सभी सतारा जिले में ही आते हैं। पर हमारी आगे की ट्रेन सतारा रेलवे स्टेशन से थी। हमने वाई से सतारा के लिए बस ली। बस स्टैंड में महिलाएं टिकट काउंटर पर थीं। बस का समय होने पर बस के अंदर आकर टिकट चेक कर गईं। बस का दरवाजा बंद किया और ड्राईवर को चलने का आदेश दिया। इतना बेहतरीन अनुशासन कहीं नहीं देखा। 

महाराष्ट्र का जिला सतारा। महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिराव फूले की जन्म स्थली है तो डाक्टर भीमराव अंबेडकर की स्कूली शिक्षा सतारा में हुई।सतारा पुणे से तकरीबन 90 किलोमीटर आगे महाराष्ट्र का बड़ा जिला है। 
संसद में महात्मा फूले की प्रतिमा 
इसी जिले में 11 अप्रैल 1827 को महात्मा फूले जन्म हुआ। फूले का परिवार सतारा जिले के खाटव तालुका के काटगुन गांव का रहने वाला था। बाद में उनका परिवार पुणे जाकर फूलों की माला गजरे आदि बनाने का काम करने लगा था। महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फूले की गिनती 19वीं सदी के महान समाज सुधारकों में होती है।
महात्मा फूले का स्त्री शिक्षा में बड़ा योगदान है। उनकी पुस्तक गुलामगिरी आंखे खोल देती है। कई लोग तो उन्हें सच्चे मायने में राष्ट्रपिता मानते हैं। सतारा की धरती पर बैठे हुए मैं इस महान व्यक्तित्व को नमन करता हूं। महात्मा फूले का निधन 28 नबंबर 1890 को पुणे मे हुआ। पर 63 साल के जीवन में फूले दंपत्ति दलित, पिछड़े और अछूतों के उद्धार के लिए महान काम करके गए जिसके लिए उन्हें पीढ़ियां याद करती हैं। महाबलेश्वर, पंचगनी, वाई जैसे पर्यटक स्थल सतारा जिले में ही आते हैं। हमलोग वाई से दोपहर में सतारा बस स्टैंड पहुंचे। महाराष्ट्र का लोकप्रिय खाना झुणका भाकरी यहां आपको खाने को मिल सकता है। इसमें ज्वार की रोटी और दाल होती है। 20 रुपये में रोटी और दाल।

बस स्टैंड विशाल पर रेलवे स्टेशन बिल्कुल छोटा 

सतारा का बस स्टैंड काफी बड़ा हैं। यहां से महाराष्ट्र के तमाम शहरों के लिए बसें मिलती हैं। बस स्टैंड में वेटिंग हॉल और बड़ी संख्या में बसों के लिए प्लेटफार्म भी बने हैं। अलग अलग दिशाओं की बसों के लिए अलग अलग खंड बने हैं। अंदर खाने पीने के रेस्टोरेंट्स भी हैं। प्रचार के लिए टीवी स्क्रीन भी लगी हैं। 
सतारा शहर की आबादी चार से पांच लाख के बीच है। कभी यहां बजाज के स्कूटर का कारखाना हुआ करता था जो अब बंद हो गया है। पहाड़ की तलहटी में बसा सतारा शहर रात की रोशनी में खूबसूरत दिखाई देता है।

सतारा रेलवे स्टेशन यहां के बस स्टैंड से सात किलोमीटर आगे शहर के बाहर है। स्टेशन से बस स्टैंड के बीच सिटी बस सेवा चलती है। या फिर आरक्षित आटो रिक्शा से स्टेशन जाया जा सकता है। रेलवे स्टेशन के आसपास एक भी दुकान नहीं है। हालांकि सतारा रेलवे स्टेशन से होकर कई महत्वपूर्ण रेलगाड़ियां गुजरती हैं। लेकिन यह स्टेशन किसी गांव के छोटे से स्टेशन सा लगता है। कई बार हो सकता है यहां रात को आप ट्रेन से उतरें तो आपके अलावा कोई भी यात्री स्टेशन पर न हो। लेकिन आपको स्टेशन से शहर जाने के लिए आटो रिक्शा मिल जाएंगे। 

माउली में संगम है कृष्णा और वेणा का -  वास्तव में सतारा रेलवे स्टेशन माउली में है। माउली में कृष्णा और वेणा नदियों का संगम भी है। संगम पर एक मंदिर और घाटों का निर्माण कराया गया है। सतारा रेलवे स्टेशन का कोड है STR रेलवे स्टेशन पर एक छोटी सी कैंटीन है, जहां से हमने समोसे खरीद कर खाए। स्टेशन पर कुल दो ही प्लेटफार्म हैं। एक अप ट्रेनों के लिए दूसरी डाउन के लिए। 


सतारा रेलवे स्टेशन से हमारी ट्रेन रात में थी पर अंधेरा होने से पहले ही हमलोग सतारा रेलवे स्टेशन पहुंच जाते हैं। फिर अगले कुछ घंटे ट्रेन का इंतजार....हमलोग महाराष्ट्र एक्सप्रेस से कोपरगांव जाने वाले हैं। ट्रेन 7.27 बजे आती है। दो मिनट का ठहराव है। महाराष्ट्र एक्सप्रेस (11039) कोल्हापुर से चलती है। यह मिराज, सांगली होती हुई सतारा के आगे पुणे, दौंद होकर जाती है। अहमदनगर के बाद हमलोग कोपरगांव में उतर गए। पर यह ट्रेन शेगांव, अकोला, भंडारा होते हुए गोंदिया तक जाती है। हालांकि इस ट्रेन में केटरिंग नहीं है। पर रास्ते एक सहयात्री की सलाह पर नीरा नामक एक छोटे से स्टेशन पर हमने खाना खरीदा। आईआरसीटीसी के वेंडर सौजन्य से ही महज 35 रुपये में शानदार खाना था।
इस ट्रेन का नाम यूं ही महाराष्ट्र एक्सप्रेस नहीं है। यह महाराष्ट्र का 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा घूमते हुए जाती है। 1346 किलोमीटर के सफर में इसके कुल 62 ठहराव हैं। सुबह के साढ़े चार बजे अभी अंधेरा पर हमलोग कोपरगांव रेलवे स्टेशन पर उतर चुके हैं। बाहर टाटा मैजिक शिरडी के लिए आवाज लगा रहे हैं। 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य- 
((WAI, SATARA, MAHARASTRA, KRISHNA RIVER ) 

Friday, July 19, 2013

दक्षिण की काशी वाई का गणेश मंदिर

वाई को दक्षिण की काशी कहते हैं। पंचगनी से नौ किलोमीटर पहले है शहर वाई। वाई से सतारा की दूरी 32 किलोमीटर है। यहां कृष्णा नदी के तट पर बना है वाई का गणेश मंदिर। वैसे वाई में कृष्णा नदी पर कुल सात घाट बनाए गए हैं। लेकिन इनमें गणपति आली घाट पर गणेश मंदिर। गणेश मंदिर के अंदर गणेश जी की विशाल प्रतिमा है। मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की खासी भीड़ जुटती है। यहां विराज रहे गणेश जी 10 फीट ऊंचे और आठ फीट चौड़े हैं। ये गणेश प्रतिमा एकल पत्थर से बनाई गई है। ढोल्या गणपति के प्रति महाराष्ट्र के लोगों में अपार श्रद्धा है। मंदिर तकरीबन साढ़े तीन सौ साल पुराना है। वैसे पूरा मंदिर परिसर पत्थरों का बना है। लेकिन गणेश मंदिर के गुंबद को पेंट करके रंगीन बना दिया गया है।

वाई के गणेश मंदिर का निर्माण श्रीमंत गणपत राव भीखाजी रास्ते ने 1762 में करवाया था। वाई को यहां पश्चिम की काशी भी कहते हैं। गणेश मंदिर के बगल में काशी विश्वनाथ मंदिर का भी निर्माण कराया गया है। इसलिए महाराष्ट्र के लोग इसे दक्षिण की काशी कहते हैं। नदी किनारे मंदिरों का समूह। इसके साथ लगते घाट और आसपास के नजारे मिलकर यहां अद्भुत वातावरण का सृजन करते हैं। 
गणेश मंदिर के आसपास कृष्णा नदी पर बड़े सुंदर स्नान घाट और पुल बनाए गए हैं। जब नदी में पानी कम होता है तब इन घाटों पर दिन भर लोग चहल कदमी करते नजर आते हैं। घाट और पुल काले पत्थरों से बने हैं। जब बारिश के दिनों में नदी में पानी बढ़ जाता है जब घाट और छोटे पुल डूब जाते हैं। तब सिर्फ ऊंचे पुल से नदी पार की जा सकती है। गणेश मंदिर में सालों पर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। खास तौर पर गणेश चतुर्थी के दिन मंदिर में भीड़ बढ़ जाती है।

गणेश मंदिर के आसपास का नजारा फिल्मकारों को हमेशा से आकर्षित करता आया है। इस गणेश मंदिर परिसर में प्रकाश झा की फिल्म गंगाजल और मृत्युदंड जैसी शूटिंग हुई थी।

वाई के आसपास समतल पहाड़ और घाटी का नजारा है। इसलिए ये इलाका फिल्मों की शूटिंग के लिए मुफीद है। इस इलाके में फिल्म ओमकारा, इश्कियां, स्वदेश की शूटिंग हुई है। हाल में फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस की शूटिंग इसी इलाके  हुई है। मुंबई से निकट होने के कारण गांव और प्राकृतिक लोकेशन के लिए वाई फिल्मकारों की पसंद है। वैसे छोटा सा शहर वाई जूतों के लिए भी जाना जाता है। यहां लेदर के महंगे जूते बनते हैं। इन जूतों की रेंज दो हजार से छह हजार तक हो सकती है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य

( (WAI, FILMS, PRAKASH JHA, KASHI, MAHARASTRA, SATARA) 


Thursday, July 18, 2013

घाटों की देवी -- घटजई देवी का मंदिर

देश के हर हिस्से के अपने लोक देवता होते हैं। आप देश के जिस कोने में भी जाएंगे आपको कुछ ऐसे मंदिर मिल जाएंगे जो स्थानीय मान्यताओं और पंरपरा से आबद्ध होते हैं। पहाड़ों की खूबसूरत वादियों के बीच पंचगनी में भी एक ऐसा ही मंदिर है। पंचगनी घूमाने वाले ड्राईवर महोदय हमें घटजई देवी के मंदिर ले गए। पंचगनी में घटजई देवी का मंदिर को लोग पहाड़ों की देवी कहते हैं। छोटा सा ये मंदिर आसपास के लोगों के बीच आस्था का बड़ा केंद्र है। जैसे उत्तराखंड में धारी देवी का मंदिर है जिनके बारे में कहा जाता है कि वह पहाड़ों की रक्षा करती हैं, उसी तरह घाटों की रक्षा करने वाली हैं घटजई देवी।

देश के अलग अलग हिस्सों में शक्ति की देवी के मंदिर जरूर हैं पर वे स्थानीय नामों से जाने जाते हैं। घटजई देवी का मंदिर कितना पुराना है इसके बारे में सही सही नहीं पता चलता है। पर कहा जाता है इस मंदिर की स्थापना शिवाजी ने की थी। इस आधार पर मंदिर लगभग 450 साल पुराना है। पर जनश्रुतियों के मुताबिक मां के ये मंदिर और भी पुराना है। स्थानीय लोग इसे हजारों साल पुराना मानते हैं। वास्तव में घटजई मां भवानी का ही एक रूप हैं।

मंदिर के गर्भ गृह में दो मूर्तियां हैं। एक मूर्ति मां घटजई देवी की है तो दूसरी पंचगनी गांव की कुलदेवी की कालेश्वरी की प्रतिमा है। दोनों को मंदिर में एक साथ स्थापित किया गया है। दोनों ही मूर्तियां सुनहले रंग की हैं। दर्शन से प्रतीत होता है मानो देवी ममता से भरी भक्तों को आशीर्वाद देती प्रतीत हो रही हों।मंदिर के परिसर मे दीप स्तंभ स्थापित किया गया है जिस पर आने वाले श्रद्धालु आस्था का दीप जलाते हैं।

 मंदिर का परिसर अत्यंत साफ सुथरा है। हरियाली विराजती है। बैठने के लिए बेंच और डस्टबिन करीने से स्थापित की गई है। वैसे तो मंदिर में लोग सालों भर पूजा करने पहुंचते हैं, पर होली के बाद चैत्र महीने में यहां बहुत बड़ा मेला लगता है। यह मेला पंचगनी का बड़ा मेला होता है। इस मेले में स्थानीय लोग बड़ी संख्या में शिरकत करते हैं।

कैसे पहुंचें - घटजई देवी का मंदिर पंचगनी शहर में टेबल लैंड के पास ही है। पंचगनी के मुख्य बस स्टैंड से पैदल चलकर भी आप मंदिर तक पहुंच सकते हैं। वैसे अच्छा होगा कि पंचगनी घूमने के लिए एक टैक्सी बुक करें वह आपको घटजई देवी के मंदिर भी लेकर जाएगा।

 -- vidyutp@gmail.com

( PANCHGANI, GHATJAI DEVI TEMPLE, SATARA, MAHARASTRA)

Wednesday, July 17, 2013

चप्पे चप्पे में फैली है खूबसूरती - पंचगनी

महाबलेश्वर से 17 किलोमीटर पहले सतारा मार्ग पर है पंचगनी। ये जगह अपनी सदाबहार जलवायु के लिए प्रसिद्ध है। अंग्रेजों का पंसदीदा शहर रहा। वे यहां स्वास्थ्य लाभ के लिए लंबा वक्त गुजारते थे। पंचगनी मतलब है पांच पहाड़। पंचगनी 1300 मीटर की ऊंचाई पर है। महाबलेश्वर से थोड़ी कम ऊंचाई पर जरूर है पर मौसम सालों भर मनोरम रहता है।
महाबलेश्वर में हमारे होटल प्रीति संगम के मालिक आनंद भांगड़िया ने होटल छोड़ते समय यह सलाह दी थी कि आप पंचगनी और वाई का गणेश मंदिर घूमते हुए वापस जाएं। हम महाबलेश्वर से बस से पंचगनी पहुंचे। यहां हमने मोलभाव करके एक टैक्सी बुक की। टैक्सी ड्राइवर चंद्रकांत मोबाइल – 98606-16488 ) ने हमे अपने अंदाज में बड़ी शालीनता से पंचगनी शहर के बारे में बताना शुरू किया।
पंचगनी का बस स्टैंड 


पंचगनी के स्कूल - मनभावन मौसम के कारण अंग्रेजों ने पंचगनी में कई स्कूल बनवाए। यहां आजकल कुल 38 आवासीय विद्यालय हैं। इनमें आठ स्कूल ब्रिटिश काल के हैं। इन स्कूलों में सालाना फीस ढाई लाख से आरंभ होती है। ज्यादातर मुंबई के सेठों के बच्चे यहां पढ़ने आते हैं। ज्यादातर बोर्डिंग स्कूलों में बच्चे छुट्टी में घर आते हैं पर पंचगनी में उल्टा होता है। यहां छुट्टियों में अभिभावक ही बच्चों से मिलने आते हैं। इन स्कूलों में से कई में अभिभावकों के रहने के लिए गेस्ट हाउस भी बनाए गए हैं। यानी आप अपने बच्चों से मिलने भी आएं और साथ में पहाड़ों की सैर भी जाए। 

पारसी प्वाइंट - पंचगनी में हमने सबसे पहले देखने पहुंचे पारसी प्वाइंट। कुछ पारसी समुदाय के लोगों के नाम पर इसका नाम पारसी प्वाइंट पड़ा है। यहां से कृष्णा नदी का नजारा दिखाई देता है। इस प्वाइंट निर्माण मुंबई के पारसी समाज के अमीरों ने कराया। पारसी समाज के लोग यहां छुट्टियां बीताने आते हैं।

सबसे बड़ा टेबल लैंड - पंचगनी का टेबल लैंड देश का सबसे बड़ा और दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा टेबल लैंड है। पहाड़ आम तौर पर उबड़ खाबड़ होते हैं। लेकिन यहां बहुत बड़ी समतल सतह है जिसे टेबल लैंड कहते हैं। ऐसा लगता है भगवान जी का डायनिंग टेबल हो। पंचगनी का ये टेबल लैंड 99 एकड़ में फैला है। यह पंचगनी का बड़ा टूरिस्ट स्पॉट है। यहां पर टेबल लैंड घूमाने के लिए यहां बग्घियां चलती हैं। वैसे आप की मर्जी आप पैदल भी घूम सकते हैं। पर घूमते घूमते थक जाएंगे।
पंचगनी - टेबल लैंड के पास पांडव गुफा में 

टेबल लैंड के पास एक गुफा और इसके अंदर एक मंदिर है। इसे पांडव गुफा भी कहते हैं। कहा जाता है पांडवों ने अज्ञात वास के दौरान इस गुफा में भी कुछ समय तक अपना वक्त बीताया था। दोपहर की गरमी पर गुफा के अंदर शीतलता है। 

सिडनी प्वाइंट में हुई थी सरगम की शूटिंग - सिडनी प्वाइंट पंचगनी का प्रसिद्ध प्वाइंट है। यह पंचगनी शहर से थोड़ा बाहर है। यहां ऋषि कपूर जया प्रदा की प्रसिद्ध फिल्म सरगम की शूटिंग हुई थी। फिल्म के प्रसिद्ध गीत डफली वाले डफली बजा... यहीं फिल्माया गया था। फिल्म का क्लाइमेक्स भी यहीं पर फिल्माया गया था। हालांकि तब यहां सीढ़ियां चढ़ने पर एक मंदिर हुआ करता था जो अब यहां नहीं है। सिडनी प्वाइंट पर दोपहर में भी ठंडी ठंडी हवा आती रहती है। इतनी तेज हवा की गोरी का दुपट्टा लहराने लगता है। और ये गीत बरबस याद आता है... हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल.... सिडनी प्वाइंट से कृष्णा नदी पर बने धूम बांध का सुंदर नजारा दिखाई देता है। 
यहां हुई थी डफली वाले की शूटिंग। 

पंचगनी मुंबई के फिल्मी सितारों की पसंदीदा जगह रही है। यहां आमिर खान और आशा भोंसले ने तो अपना बंग्ला बनवा रखा है। वे लोग अक्सर छुट्टियां बीताने के लिए चुपके से यहां पहुंचते हैं। आमिर खान की फिल्म तारे जमीं पर की शूटिंग पंचगनी के स्कूल में ही हुई थी।

पचंगनी को और सुंदर बनाने का श्रेय 1860 में पदस्थापित ब्रिटिश अधिकारी जॉन चेसन को जाता है। उसे बागवानी का बहुत शौक था। उसने यहां पर कई तरह के नए नए पौधे लगवाए। इससे वातावरण और हरा भरा हो गया। ब्रिटिश अधिकारियों के लिए यह रिटायरमेंट स्थल की तरह था। पर कालांतर में पंचगनी देश का लोकप्रिय टूरिस्ट स्पॉट बनता चला गया। 

कैसे पहुंचे - पंचगनी पुणे या सतारा से बस से पहुंचा जा सकता है। आप सीधे मुंबई से टैक्सी से भी आ सकते हैं। नजदीकी सुविधा जनक रेलवे स्टेशन पुणे या सतारा हैं। पुणे से पंचगनी कुल 100 किलोमीटर है। मुंबई से सीधी दूरी 285 किलोमीटर है।  

-    --- विद्युत प्रकाश मौर्य  
( (PANCHGANI, SATARA, MAHARASTRA, SARGAM, FILM, TABLE LAND, PANDAV GUFA ) 
पंचगनी - सिडनी प्वाइंट - अब यहां से जाने का दिल नहीं करता.....