Friday, May 24, 2013

कान्हा के बाल सखा सुदामा का मंदिर


पोरबंदर शहर में एमजी रोड पर है सुदामा जी का सुंदर मंदिर। जी हां वही कृष्ण के बाल सखा सुदामा जी का मंदिर है। द्वारका में कृष्ण विराजते हैं तो उनके मित्र सुदामा विराजते हैं पोरबंदर में। इसलिए पोरबंदर को सुदामापुरी भी कहा जाता है। किसी जमाने में यहां जंगल हुआ करता था। यहीं पर संदीपनी ऋषि का आश्रम भी था। कहा जाता है कि इसी आश्रम में कृष्ण और सुदामा एक साथ अध्ययन किया करते थे। सुदामा मंदिर बापू के घर कीर्ति मंदिर से कुछ दूरी पर ही है।


सुदामा गरीब ब्राह्मण थे। सुदामा यानी महाभारत काल के एक प्रेरक व्यक्तित्व जो अपनी गरीबी में जीते हैं लेकिन अपने बाल सखा राजा कृष्ण से कोई मदद नहीं लेना चाहते। बाद में पत्नी की सलाह पर वे कृष्ण की मदद लेने जाते हैं। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की कहानी पूरे देश में सुनाई जाती है। पर कृष्ण के मंदिर देश भर में बने हैं लेकिन सुदामा जी का एक मात्र मंदिर पोरबंदर में ही है।


बताया जाता है कि बारहवीं तेरहवीं सदी में यहां पर सुदामा जी का छोटा सा मंदिर हुआ करता था। पर 1900 में पोरबंदर के महाराजा भाव सिंह जी ने सुदामा के इस विशाल मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर के निर्माण में बड़ा योगदान सौराष्ट्र की नाट्य कंपनियों ने भी दिया। सन 1904 में ये मंदिर बनकर तैयार हो गया। मंदिर परिसर में चामुंडा माता जी का भी मंदिर स्थित है। 

सुदामा मंदिर में सुदामा जी की प्रतिमा के अलावा उनकी पत्नी सुशीला की प्रतिमा लगी है। मंदिर काफी भव्य नहीं है लेकिन इसका अपना महत्व है। सुदामा में खास तौर पर निम्न मध्यमवर्गीय और गरीब लोगों की काफी आस्था है। सुदामा समाज के अंतिम लोगों के बीच प्रिय हैं जैसे की बापू। मंदिर परिसर में एक सुदामा कुंड भी है जो किसी पुरानी बावड़ी जैसा है।


और ये रहा 84 चक्कर -----  सुदामा मंदिर के बगल में 84 का चक्कर है। यह 84 लाख योनियों के बीच आत्मा के भटकाव का प्रतीक है। इसमें घुसने के बाद आप निकलने की कोशिश करेंगे लेकिन निकल नहीं पाएंगे। कोई कोई निकल भी जाता है। काफी लोग इस 84 के चक्कर में प्रवेश कर निकलने की कोशिश करते हुए देखे गए। सुदामा मंदिर परिसर में बच्चों के लिए झूले पार्क आदि बनाए गए हैं।

महिलाओं की भजन मंडलियां -  पोरबंदर के सुदामा मंदिर में महिलाओं की मंडलियां रोज कीर्तन करने आती हैं। कीर्तन करने वाली अलग-अलग कई मंडलियां हैं। ये महिलाएं मंदिर में आने के बाद देवी देवताओं की तस्वीरें सजाती हैं। उसके बाद बैठक लगाकर पूरी आस्था से देर तक ईश्वर की वंदना में लीन हो जाती हैं। हम मंदिर परिसर में देर तक बैठकर उनका भजन सुनते रहे। भजन गुजराती में थे, पर उनके भाव बडे प्यारे थे। 
मंदिर परिसर में उद्यान-  सुदामा मंदिर परिसर में छोटा सा पार्क भी बना हुआ है। यहां बच्चों के लिए झूले भी लगे हैं। अनादि का भी मन मचल गया और वे झूले पर जाकर झूलने लगे।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
  ( SUDAMA TEMPLE, KRISHNA, MAHABHARAT, PORBANDAR, GUJRAT ) 

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