Saturday, May 18, 2013

पहुंच गए हम बापू की धरती पर पोरबंदर

गुजरात के लाखाबावल एक रेलवे स्टेशन पर खड़ी पोरबंदर एक्सप्रेस ( यहां ठहराव नहीं था पर रुक गई ) 
पहले पोरबंदर एक्सप्रेस में हमारा आरक्षण जामनगर तक का ही था। दरअसल पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार पहले हम जामनगर से द्वारका जाने वाले थे। पर अब हमने योजना में थोड़ा बदलाव किया है। अब हम पहले पोरबंदर यानी बापू की धरती पर जाएंगे। तो हमने अपने टिकट का विस्तार करवाने के लिए चलती ट्रेन में टीटीई की तलाश शुरू की। 
पोरबंदर से पहले विंड टरबाईन। 
कई कोच में तलाश करने के बाद एक जगह हमारी ट्रेन के दो टीटीई एक साथ बैठे हुए मिल गए। हमने उन्हें अपने टिकट का विस्तार पोरबंदर तक करने को कहा। हालांकि टीटीई महोदय कहने लगे कि विस्तार की क्या जरूरत है, यूं ही चल पड़ो। हम आपको पोरबंदर में बाहर निकाल देंगे। पर मैंने कहा नहीं आप विस्तार कर दें हमें थोड़े से रुपये बचाने के लिए रेलवे के साथ कोई धोखाधड़ी नहीं करनी। 

हमें जामनगर के रेल से सफर करते हुए आसपास के खेतों में पवन ऊर्जा से बिजली बनाने वाली इकाइयां दिखाई दे रही हैं। इधर विंड मिल के लिए अनुकूल मौसम होता है। इसलिए यहां हवा का सदुपयोग किया जा रहा है। अब ट्रेन में यात्रियों की संख्या ट्रेन में काफी कम हो गई है। हमारे पूरे कोच में दस यात्री भी नहीं हैं। 

जामनगर से पोरबंदर रेल गाड़ी से तकरीबन पौने तीन घंटे का रास्ता है। इस बीच कोई बड़ा रेलवे स्टेशन नहीं आता है। ट्रेन जामनगर से आगे भाग रही है। पर अब हरियाली कम होती जा रही है। गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में पानी की कमी है। इसलिए इधर हरियाली कम नजर आती है। ट्रेन दोपहर एक बजे पोरबंदर पहुंच गई। अपने समय से मामूली सी लेट है। पर यह आखिरी रेलवे स्टेशन है। यहां उतरने वाले काफी कम लोग हैं।

दरअसल ट्रेन रास्ते में ही खाली हो चुकी है। पोरबंदर आबादी में कोई बहुत बड़ा शहर नहीं है। इसलिए रेलवे स्टेशन भी कम भीड़ भाड़ वाला है। गिनती की कुछ रेलगाड़ियां ही यहां पर हर रोज आती हैं। वास्तव में यह टर्मिनस है। मतलब यहां से रेलगाड़ियां आगे नहीं जातीं। जो गिनती रेलगाड़ियां यहां आती हैं, उनमें से दिल्ली पोरबंदर एक्सप्रेस भी एक है। पोरबंदर रेलवे स्टेशन पर बापू के जीवन से जुड़ी पिक्चर गैलरी बनाई गई है। स्टेशन के बाहर बापू की तस्वीर और उनका विशाल चरखा लगा हुआ है।

तो चलिए अब रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते हैं। पोरबंदर रेलवे स्टेशन की इमारत ज्यादा बड़ी नहीं है। यह मीटर गेज के जमाने की ही इमारत है। इसके निर्माण में पत्थरों का इस्तेमाल ज्यादा हुआ है। इसलिए इमारत काफी मजबूत है। अब धीरे धीरे इसकी आंतरिक सज्जा में बदलाव किया जा रहा है। बाहर निकलते ही हमने बापू की जन्मभूमि की मिट्टी को नमन किया। उस मिट्टी को जहां मोहन का जन्म हुआ। उस मिट्टी को जिसने दुनिया को सत्य और अहिंसा का संदेश दिया। 

पहले पेट पूजा - पोरबंदर में हमने होटल नटराज में ऑनलाइन बुकिंग करा रखी थी। पर रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही भूख लग रही थीसो होटल पहुंचने से पहले रेलवे स्टेशन के बाहर निकलते ही दाहिनी तरफ एक  अच्छा शाकाहारी भोजनालय दिखा तो वहां हमलोग खाने के लिए बैठ गए। खाने के बाद लोगों से रास्ता पूछकर पैदल ही होटल नटराज पहुंच गए।
होटल में पहुंचकर यात्रा की सारी थकान जाती रही। होटल का कमरा और साफ सफाई और बाकी इंतजाम काफी बेहतर था। ऑनलाइन बुकिंग में कमरे का किराया महज 500 रुपये। होटल एमजी रोड पर मुख्य बाजार में स्थित है। नीचे मार्केटिंग कांप्लेक्स है और ऊपर होटल। रेलवे स्टेशन से महज एक किलोमीटर की दूरी पर है।
-  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
 ( यात्रा का मार्ग - दिल्ली- आबू रोड- अहमदाबाद - पोरबंदर - द्वारका - ओखा-भेट द्वारका - सोमनाथ- वेरावल- दीव- वेरावल- अहमदाबाद - गांधीनगर - वडोदरा -मुंबई - पूणे - पंचगनी- महाबलेश्वर- वाई- सतारा- कोपरगांव- शिरडी - नासिक - खंडवा- ओंकारेश्वर -उज्जैन - दिल्ली ) 


(  ( PORBANDAR, RAIL , GANDHI, SARAI ROHILLA, PANTRY CAR FOOD  )
पोरबंदर में खुशियों के फूल खिले हैं....खुशबू गुजरात की...

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