Thursday, May 30, 2013

पोरबंदर से कृष्ण की नगरी द्वारका की ओर

कीर्ति मंदिर के पास पोरबंदर का बाजार। 
बापू के शहर पोरबंदर से कान्हा के शहर द्वारका की दूरी 100 किलोमीटर है। सड़क मार्ग से होकर द्वारका जाने का रास्ता समंदर के साथ साथ चलता है। पोरबंद से सोमनाथ की दूरी भी 110 किलोमीटर ही है। ये रास्ता भी समंदर के साथ साथ ही चलता है। वास्तव में पोरबंदर द्वारका और सोमनाथ के बीच में स्थित है।

पोरबंदर के बाद हमारा अगला पड़ाव था द्वारका। हमने जीएसआरटीसी की सुबह की बस में आनलाइन टिकट बुक करा रखा था। हमारी बस सुबह 10.30 बजे है। यह कहीं पीछे से आने वाली है। हमलोग होटल से चेकआउट के बाद पोरबंदर के बस स्टैंड में पहुंचकर बस का इंतजार कर रहे हैं। बस स्टैंड में सफाई बिल्कुल नहीं है। दोनों प्रवेश द्वार पर गंदगी का आलम है।


बस में पहुंचने पर कंडक्टर के पास पहले से ही हमारी पीएनआर की सूची मौजूद थी। गुजरात में बस बुकिंग का हमारा अनुभव काफी अच्छा रहा है। पोरबंदर से द्वारका के रास्ते में जगह जगह पवन ऊर्जा के प्रोजेक्ट दिखाई देते हैं। हवा का रुख सही रहने पर पवन ऊर्जा की पंखियां चलती रहती हैं। विंड वर्ल्ड नामक कंपनी ने ये पवन ऊर्जा वाली पंखियां लगाई हैं। पोरबंदर से पहले लालपुर जाम में इसका बड़ा प्रोजेक्ट है।

मूल द्वारका और हरसिद्ध महादेव का मंदिर - पोरबंदर से द्वारका के रास्ते में 27 किलोमीटर आगे मूल द्वारका का मंदिर आता है। इसके आगे हरसिद्ध महादेव का मंदिर है। अगर आप सारे मंदिरों को देखते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपको निजी टैक्सी करनी चाहिए फिर निजी बस सेवा से रास्ते के ठहराव के बारे में पूछकर यात्रा करनी चाहिए।




दोपहर का लंच ब्रेक -  दोपहर में रास्ते में हमारी बस एक मनोरम स्थल पर लंच के लिए भी रुकी। अब जगह का नाम नहीं याद आ रहा। हमने यहां लंच तो नहीं किया क्योंकि पोरबंदर में जमकर नास्ता कर लिया है। पर गुजराती ढाबे में खाट पर बैठकर खूब आराम फरमाया। अनादि को भी यहां बहुत मजा आया। भरी दुपहरिया में नारियल के छोटे छोटे पेड़ों की छांव में यूं लग रहा था बस यहीं रुक जाएं। पर बस चल पड़ी। मार्ग पर एक गांव पड़ा लांबा।


बस आगे बढ़ती जा रही है। मई में धूप तेज है तो गरमी लग रही है। रास्ते में कहीं कहीं सड़कों की हालत खराब भी दिखी। यानी गुजरात के विकास का दावा खोखला।

लगभग दो घंटे के बस के सफर के बाद हमें द्वारकाधीश के नगर के दर्शन हो गए। हाईवे पर शहर से कुछ किलोमीटर पहले से ही होटल और मंदिर दिखाई देने लगते हैं।

 बस स्टैंड में उतरने के बाद हम अपने पहले से बुक किए होटल उत्तम पहुंच गए। यहां पहुंचने के लिए हमें आटो रिक्शा करना पड़ा। पर ये होटल जवाहर रोड पर द्वारकाधीश के मंदिर के ही पास था। हमने इसे  क्लियर ट्रिप से बुक किया था। ( http://www.hoteluttam.com/) तीन बत्ती चौक के पास दोपहर का भोजन लेने के बाद हमने आज के ही दिन द्वारका घूमने का फैसला किया।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
 (PORBANDAR TO DWARKA BY BUS, HOTEL UTTAM ) 



Tuesday, May 28, 2013

बड़ा इम्युनिटी बूस्टर है सफेद जामुन



पोरबंदर के बाजार में हमें जामुन भी खूब देखने को मिला। पर सफेद जामुन तो हमने पहली बार देखा। हालांकि ये काले जामुन की तरह मीठा नहीं होता। इसका स्वाद इसके सफेदी के मुताबिक फीका भी है। पर गुजरात में इस सफेद जामुन को लोग खूब खरीदकर खाते हैं। काला जामुन तो काफी गुणकारी होता है।

पर सफेद जामुन खाने के भी काफी फायदे हैं। सफेद जामुन को रोज एप्पल (ROSE APPLE) नाम से भी जाना जाता है। इस फल को बड़े इम्यूनिटी बूस्टर के रूप में भी जाना जाता है। इस फल में कमाल के पोषक तत्‍व मौजूद होते हैं। ये फल गर्मियों के मौसम में होने वाले कई तरह के मौसमी इन्फेक्शन से भी आपको बचाता है।


गुजरात में पोरबंदर के आसपास सफेद जामुन के बाग हैं। यहां पर यह काफी सस्ता मिल रहा है। यह कुरकुरे स्वाद वाला रसदार फल होता है। कच्चे अवस्था में यह कसैला होता है। इससे गुलाब जैसी खुशबू आती है, इसलिए इसका नाम रोज एप्पल रखा गया होगा। पर इसको खाने में थोड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है। दरअसल इसका बीज जहरीला माना जाता है।
सिरका और शराब भी - रोज एपल यानी सफेद जामुन से लोग सिरका और शराब भी बनाते हैं। सफेद जामुन आपको सर्दी और जुकाम से भी बचाता है। यह पेट के कब्ज को भी दूर करता है। इसमें विटामिन ए प्रचूर मात्रा में पाया जाता है जो आंखों की रोशनी बढ़ाता है। यह दांतों और हड्डियों को भी मजबूत बनाता है। तो इतने फायदे हैं सफेद जामुन के। 

गुजरात का प्रसिद्ध केसर आम -  सौराष्ट्र में इन दिनों आम का मौसम है। गुजरात का प्रसिद्ध केसर आम इसी इलाके में होता है। केसर को शौकीन इसे अपने साथ मुंबई तक ले जाते हैं। गुजराती मानते हैं कि केसर से बेहतरीन आम कोई नहीं होता। 
ट्रेन में हमें लोग केसर आम की पेटी अहमदाबाद और मुंबई ले जाते हुए मिले। आम को लेकर हर इलाके लोग अपने स्थानीय स्वाद को लेकर खासे शौकीन दिखते हैं। तो गुजरात का केसर आम रत्नागिरी के हापुस को चुनौती देता है। आप भी कभी गुजरात आएं तो केसर आम का स्वाद जरूर लें। वाकई इसकी मिठास अलग है। 

इमली के फायदे - पोरबंदर के बाजार में इमली भी खूब बिकती हुई दिखाई दी। इमली खाने के अपने फायदे नुकसान होते हैं। हमने बचपन से इमली के नुकसान के बारे में सुना है, पर इसके कुछ फायदे भी होते हैं। इमली रक्तचाप को कम करता है। साथ ही यह हानिकारक कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल ) को कम करने में भी मददगार है। इमली में मौजूद पोटेशियम रक्तचाप को कम करने में मदद करता है, जबकि इसमें विटामिन सी हानिकारक तत्वों को निष्प्रभावी बनाता है। गुजराती में इमली को अम्ली कहते हैं।
---विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
 ( PORBANDAR, WHITE JAMUN, ROSE APPLE, KESAR MANGO, TAMARIND, IMLI )  

Monday, May 27, 2013

पोरबंदर की गुजराती थाली - मतलब छककर खाओ


गुजराती थाली मतलब छक कर खाओ पर पचाने के लिए जमकर साथ में पीओ छाछ। गुजरात शाकाहारी भोजन खास तौर पर गुजराती थाली के लिए जाना जाता है। हमने पोरबंदर स्टेशन पर उतरते ही स्टेशन गेट के बाहर दाहिनी तरफ एक वातानुकूलित रेस्टोरेंट में दिन में गुजराती थाली का आनंद लिया था। यहां 60 रुपये की फिक्स थाली थी। घी लगी चपाती, सब्जियां और छाछ आदि।

नीलेश भोजनालय - शाम खाना हमने काफी जांच पड़ताल करने के बाद एसटी रोड पर नीलेश भोजनालय में अपना डिनर करने को तय किया। इससे पहले कुछ और रेस्टोरेंट का जाकर मीनू देखा था। पर पता चला कि नीलेश भोजनालय यहां का लोकप्रिय रेस्टोरेंट है। यहां पर 70 रुपये की अनलिमिटेड थाली है। हमारे खाने की शुरुआत गेहूं की एक घी चुपड़ी मोटी रोटी के साथ हुई। उसके बाद चाहे जितनी मर्जी चपाती और चावल खाएं आप।

उन्होंने छाछ तो उन्होंने एक जग में लाकर रख दिया। आपकी मर्जी चाहे जितने ग्लास गटक जाओ। आनंद आ गया। नीलेश भोजनालय का डायनिंग हॉल साफ सुथरा है। इसके स्वामी जोशी जी हैं। उनसे काफी देर बातचीत भी हुई। यहां रोटी, पराठा, थेपला आदि भी खाने में मिलता है। गुजराती थाली तो इनकी विशेषता है ही।
वैसे पोरबंदर में मून पैलेस समेत कई और जगह गुजराती थाली खाई जा सकती है। सुबह हमने बापू के शहर में जलेबियों का भी स्वाद लिया। हालांकि यहां जलेबियां बनाकर जालीदार बर्तन में रख दी जाती हैं। कई दिनों तक ये बासी जलेबियां यूं ही बिकती रहती हैं। चलने से पहले नीलेश भोजनालय के पास एक अन्य रेस्टोरेंट में हमने पराठे खाए। 
पोरबंदर में अमूल आइसक्रीम नहीं मिलता -  मई महीने में ठीक ठाक गर्मी है। भोजन के बाद रात को अनादि ने आईसक्रीम खाने की जिद की। हमने पोरबंदर में अमूल का आइसक्रीम ढूंढना शुरू कियापर पता चला कि यहां कहीं भी अमूल का आइसक्रीम नहीं मिलता। आश्चर्य अमूल गुजरात का ही उत्पाद है पर यह गुजरात के पोरबंदर शहर में नहीं बिक रहा है। मजूबरन हमें दूसरा ब्रांड लेना पड़ा।  



---विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
 ( NEELESH BHOJNALAYA, THALI, CHHACH,  PAPAD, THEPLA, ICE CREAM, PORBANDAR, GUJRAT)  

Sunday, May 26, 2013

गुजरात की शाही सवारी - जामनगर का छकड़ा

पोरबंदर में एक छकड़े पर अनादि। 
भले ही गुजरात ने तमाम क्षेत्रों में उपलब्धियों के झंडे गाड़े हों लेकिन यहां की शाही सवारी तो छकड़ा ही है। छकड़ा एक तरह की जुगाड़ गाड़ी है। कई राज्यों में इस तरह की गाड़ियां प्रतिबंधत हैं।  लेकिन इसका गुजरात में आरटीओ दफ्तरों में छकड़ा का पंजीकरण होता है। गुजरात में जामनगर की एक कंपनी अतुल दो लाख रुपये में छकड़ा तैयार करके बेचती है।

तो छकड़ा राज्य का बहु उपयोगी वाहन है। यहां गांव व शहरों में माल ढुलाई के लिए आदर्श तो है ही इससे सवारियां भी ढोई जाती हैं। छकड़ा में डीजल इंजन लगा होता है। पोरबंदर में एक छकड़ा के चालक ने बताया कि यह 30 किलोमीटर तक का औसत दे देता है। भले ही आवाज बहुत करता है लेकिन ररखाव में तो सस्ता है। यह एक टन तक वजन उठाने में सक्षम है। सवारी ढोने की बात हो तो इसमें 20 आदमी बैठ जाते हैं। कुछ लोग खड़े रहते हैं तो कुछ लटक भी जाते हैं। गुजरात के गांवों को शहर से जोड़ने में छकड़ा अहम कड़ी है।


तमाम कंपनियों के आटो रिक्शा, टेंपो, टाटा मैजिक, नैनो कार, महिंद्रा के जीओ और मैक्सिमो जैसे माडल के अच्छे पब्लिक ट्रांसपोर्ट बाजार में आ गए हैं लेकिन वे देशी जुगाड़ से बने छकड़े का रिप्लेसमेंट नहीं बन पा रहे हैं। सीट के नाम पर छकड़े में लकड़ी का पटरा रखा होता है। जब आप इसमें चलते हैं तो पर पूरा शरीर हिल उठता है लेकिन गुजरातियों को इस छकड़े से मानो प्यार है। वे इससे दूर नहीं जाना चाहते। बैठने के साथ हवा धूप और आसपास के नजारे देखने का भी आनंद मिलता है।

कभी दिल्ली में चलती थी फटफट गाड़ी-  किसी जमाने में दिल्ली की सड़कों पर छकड़े से मिलती जुलती फटफट गाड़ी चला करती थी। इसमें बुलेट का इंजन लगा होता था। पर प्रदूषण फैलाने के नाम पर दिल्ली के फटफट को शहीद कर दिया गया। हमने सोमनाथ से लेकर दीव तक ऐसा ही छकड़ा चलते हुए देखा। माल, ढुलाई, मेला से लेकर टूरिज्म तक छकड़ा हर जगह मौजूद है। हमने भी दीव में थोड़ी देर तक छकड़े की सवारी का खूब मजा लिया।

 - vidyutp@gmail.com
(CHAKDA, JAMNAGAR, PORBANDAR ) 

Saturday, May 25, 2013

पोरबंदर की चौपाटी पर मौज मस्ती एक शाम


सुदामा मंदिर से निकलकर हमलोग पोरबंदर के चौपाटी की तरफ चल पड़े हैं। चौपाटी मतलब समंदर का किनारा। शाम गुजारने के लिए भला समंदर के किनारे से अच्छी जगह क्या हो सकती है। बापू के शहर पोरबंदर में भी चौपाटी है। यह भले ही काफी भव्य नहीं पर सुंदर है।

बस स्टैंड के बगल में पारसी समाज का अंतिम स्थल और चौपाटी स्थित है। इसका मतलब है कि पोरबंदर में कभी पारसी लोगों की अच्छी संख्या भी हुआ करती थी। आप एमजी रोड से टहलते हुए चौपाटी तक पहुंच सकते हैं। चौपाटी पर पहुंचकर काफी देर तक हमलोग समंदर की लहरों का संगीत सुनते रहे। इसके साथ थोड़ी सी पेट पूजा। मतलब भेलपुरी। 

यहां अरब सागर गर्जना करता हुआ सुनाई देता है। समुद्र का किनारा बहुत साफ नहीं है। लिहाजा यहां स्नान करने योग्य स्थान नहीं है। पर चौपाटी के किनारे शाम को रौनक रहती है। एक जगह पक्का घाट भी बनाया गया है। स्थानीय लोग यहां पर शाम को घूमने आते हैं। दरअसल पोरबंदर समुद्र तटीय शहर है। द्वारका, पोरबंदर, सोमनाथ तीनों ही शहर समुद्र तट के किनारे हैं। पर पोरंबदर के समुद्र तट का व्यापारीकरण नहीं हुआ है। 

पार्क में ऊंट की सवारी का आनंद -  तो आइए अब पार्क की तरफ चलते हैं। यहीं पर समंदर के किनारे एक मनोरंजन पार्क भी बना है।  पोरबंदर के समुद्र तट पर सबसे यादगार रहा ऊंट की सवारी। वैसे तो ऊंट की सवारी कई जगह की जा सकती है। लेकिन यहां मजह 10 रुपये में ऊंट की सवारी। बच्चों के लिए 10 तो बड़ों के लिए 20 रुपये। सो मैंने भी ऊंट की सवारी का आनंद लिया। हर चक्कर के बाद नए लोगों को उतारने और बिठाने के लिए ऊंच महाराज को बैठना और फिर उठना पड़ता है। लेकिन ऊंट की सवारी का रोमांच अद्भुत है।

इस पार्क में बच्चों के लिए ढेर सारे झूले खिलौने आदि हैं। निजी वाहन से आने वालों के लिए पार्किंग का भी इंतजाम है। थक गए हैं तो थोड़ी सी पेट पूजा भी कर सकते हैं। बड़े से हाथी पर चढ़कर फिसलने में अनादि को खूब आनंद आया। यह हाथी वास्तव में एक सीमेंट कंपनी का विज्ञापन है जो मजबूती का प्रतीक है। 


ऊंट पर बैठते ही आप एक मंजिले मकान के बराबर ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं। वहीं ऊंट जब चलता है तो उसकी चाल में अजब सी मस्ती होती है। ऊंट की सवारी दूसरे पर्यटक स्थलों पर भी की जा सकती है लेकिन द्वारका और पोरबंदर में जितने सस्ते में आप ऊंट की सवारी का आनंद ले सकते हैं और कहीं भी मुश्किल है।     
 ---विद्युत प्रकाश मौर्य -- vidyutp@gmail.com   
( ( PORBANDAR, CHAUPATI, SEA, CAMEL RIDE, GUJRAT ) 

Friday, May 24, 2013

कान्हा के बाल सखा सुदामा का मंदिर


पोरबंदर शहर में एमजी रोड पर है सुदामा जी का सुंदर मंदिर। जी हां वही कृष्ण के बाल सखा सुदामा जी का मंदिर है। द्वारका में कृष्ण विराजते हैं तो उनके मित्र सुदामा विराजते हैं पोरबंदर में। इसलिए पोरबंदर को सुदामापुरी भी कहा जाता है। किसी जमाने में यहां जंगल हुआ करता था। यहीं पर संदीपनी ऋषि का आश्रम भी था। कहा जाता है कि इसी आश्रम में कृष्ण और सुदामा एक साथ अध्ययन किया करते थे। सुदामा मंदिर बापू के घर कीर्ति मंदिर से कुछ दूरी पर ही है।


सुदामा गरीब ब्राह्मण थे। सुदामा यानी महाभारत काल के एक प्रेरक व्यक्तित्व जो अपनी गरीबी में जीते हैं लेकिन अपने बाल सखा राजा कृष्ण से कोई मदद नहीं लेना चाहते। बाद में पत्नी की सलाह पर वे कृष्ण की मदद लेने जाते हैं। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की कहानी पूरे देश में सुनाई जाती है। पर कृष्ण के मंदिर देश भर में बने हैं लेकिन सुदामा जी का एक मात्र मंदिर पोरबंदर में ही है।


बताया जाता है कि बारहवीं तेरहवीं सदी में यहां पर सुदामा जी का छोटा सा मंदिर हुआ करता था। पर 1900 में पोरबंदर के महाराजा भाव सिंह जी ने सुदामा के इस विशाल मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर के निर्माण में बड़ा योगदान सौराष्ट्र की नाट्य कंपनियों ने भी दिया। सन 1904 में ये मंदिर बनकर तैयार हो गया। मंदिर परिसर में चामुंडा माता जी का भी मंदिर स्थित है। 

सुदामा मंदिर में सुदामा जी की प्रतिमा के अलावा उनकी पत्नी सुशीला की प्रतिमा लगी है। मंदिर काफी भव्य नहीं है लेकिन इसका अपना महत्व है। सुदामा में खास तौर पर निम्न मध्यमवर्गीय और गरीब लोगों की काफी आस्था है। सुदामा समाज के अंतिम लोगों के बीच प्रिय हैं जैसे की बापू। मंदिर परिसर में एक सुदामा कुंड भी है जो किसी पुरानी बावड़ी जैसा है।


और ये रहा 84 चक्कर -----  सुदामा मंदिर के बगल में 84 का चक्कर है। यह 84 लाख योनियों के बीच आत्मा के भटकाव का प्रतीक है। इसमें घुसने के बाद आप निकलने की कोशिश करेंगे लेकिन निकल नहीं पाएंगे। कोई कोई निकल भी जाता है। काफी लोग इस 84 के चक्कर में प्रवेश कर निकलने की कोशिश करते हुए देखे गए। सुदामा मंदिर परिसर में बच्चों के लिए झूले पार्क आदि बनाए गए हैं।

महिलाओं की भजन मंडलियां -  पोरबंदर के सुदामा मंदिर में महिलाओं की मंडलियां रोज कीर्तन करने आती हैं। कीर्तन करने वाली अलग-अलग कई मंडलियां हैं। ये महिलाएं मंदिर में आने के बाद देवी देवताओं की तस्वीरें सजाती हैं। उसके बाद बैठक लगाकर पूरी आस्था से देर तक ईश्वर की वंदना में लीन हो जाती हैं। हम मंदिर परिसर में देर तक बैठकर उनका भजन सुनते रहे। भजन गुजराती में थे, पर उनके भाव बडे प्यारे थे। 
मंदिर परिसर में उद्यान-  सुदामा मंदिर परिसर में छोटा सा पार्क भी बना हुआ है। यहां बच्चों के लिए झूले भी लगे हैं। अनादि का भी मन मचल गया और वे झूले पर जाकर झूलने लगे।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
  ( SUDAMA TEMPLE, KRISHNA, MAHABHARAT, PORBANDAR, GUJRAT ) 

Thursday, May 23, 2013

पोरबंदर का मानेक चौक और पुराने बाजार की खुशबू



कीर्ति मंदिर और कस्तूरबा गांधी ( बा ) का घर देखने के बाद हमलोग पोरबंदर की सड़क पर आ गए और थोड़ी देर बाजार का मुआयना किया। कीर्ति मंदिर के पास मानेक चौक है। यह पोरबंदर का परंपरागत बाजार है। शाम को मानेक चौक पर चहल पहल है। चौक पर कुछ इमारतें काफी प्राचीन नजर आ रही हैं। एक विशाल भवन है। उसके नीचे होकर सड़क गुजर रही है जो कीर्ति मंदिर की तरफ जाती है। 


इस गेट के नीचे दुकानें भी बनी हुई हैं। इस विशाल गेट के मेहराबों में लकड़ी का काम दिखाई देता है। थोड़ी सी बात पोरंबदर शहर के बारे में। पोरबंदर अब गुजरात राज्य का एक जिला है। यह जिला मुख्यालय शहर है। इसे सुदामापुरी नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि महाभारत काल में कृष्ण के मित्र सुदामा का यहीं घर हुआ करता था। यह भी कहा जाता है कि संदीपनी ऋषि का आश्रम भी यहीं पर था जहां कृष्ण और सुदामा साथ पढ़ाई करते थे। यह एक अति प्राचीन समुद्र तटीय शहर है। यह ब्रिटिश भारत में पोरबंदर एक प्रिंसले एस्टेट हुआ करता था।    
 
    महाभारत काल में पोरबंदर का नाम अस्मावतीपुरम हुआ करता था। दसवीं सदी में इसका नाम पौरावेलाकुल भी मिलता है। सोलहवीं सदी में पोरबंदर पर जेठवा राजपूतों का शासन था। पोरबंदर में आपके पास समय हो तो हुजुर महल और दरबारगढ़ महल देख सकते हैं। यह जेठवा शासकों द्वारा निर्मित है।  


  पोरबंदर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र भी है। साल 1991 के बाद से यहां लगातार भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीत रहे हैं। आजकल यहां से विट्टठल भाई रदाडिया सांसद हैं। पोरबंदर लोकसभा के अंतर्गत कुल छह विधान सभा क्षेत्र आते हैं। मानेक चौक दूर से देखने में किसी चौपाल सरीखा नजर आ रहा है। बाजार में ग्रामीण उपयोग में आने वाले सामान ज्यादा बिक रहे हैं। जैसे दूध ढोने वाले बर्तन। एक तरफ फूलों का बाजार भी सजा हुआ है। 
   
   आबादी की बात करें तो पोरबंदर शहर में हिंदू मुस्लिम मिश्रित आबादी है। शहर में कई पुरानी मसजिदें भी हैं। पोरबंदर की आबादी छह लाख के आसपास है। उद्योग धंधे के नाम पर यहां कुछ खास नहीं है। पर पोरबंदर में दर्शनीय स्थल कई हैं। बापू और बा की जन्मस्थली के अलावा यहां पर आप सुदामा जी का मंदिर, पोरबंदर का सुंदर समुद्र तट के अलावा और भी कई चीजें देख सकते हैं। पोरबंदर शहर में एक नेहरू तारामंडल भी बनवाया गया है। यहां पर गुजराती और हिंदी में शो चलते रहते हैं। पोरबंदर के पास वन्य जीव अभ्यारण्य भी है। यहां पर भेड़िये और चीते पाए जाते हैं। 

   सबसे अच्छी बात पोरबंदर पहुंच कर मुझे यह लगी कि यहां के बाजार में प्राचीनता की खुशबू बची हुई है। मुख्य सड़क पर भले ही आधुनिक होटल और बाजार बन गए हैं पर पुराने शहर के स्वरूप में कोई बदलाव नहीं हुआ है। तो पोरबंदर की सड़कों पर विचरण करना बड़ा भला लगता है। तो अब हमलोग आगे पोरबंदर का समुद्र तट देखने और चलेंगे पर इससे पहले चलेंगे सुदामा जी के मंदिर में। 
- - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( (PORBANDAR, SUDAMAPURI, JETHWA RAJPUT, ESTATE ) 


Wednesday, May 22, 2013

अक्षर ज्ञान से दूर पर बा विदूषी महिला थीं


बापू की पत्नी बा भले ही अक्षर ज्ञान के लिहाज से ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थीं। पर वे बौद्धिक स्तर पर महान विदूषी महिला थीं। बापू के जीवन में उनका बहुत बड़ा प्रभाव था। बापू को महान बनने में उनका बहुत बड़ा त्याग भी था। उन्होंने न सिर्फ कदम कदम पर बापू का साथ दिया। बल्कि कई बार बापू के तानाशाही आदेशों को स्वीकार भी किया। 

काठिवाड़ में उस जमाने में लड़कियों को कोई पढ़ता ही नहीं था इसलिए बा भी पढ़ी लिखी बिल्कुल नहीं थीं। पर शादी के बाद बापू ने अलग अलग समय में बा को पढ़ाने की कोशिश की। तब बा गुजरात में लिखना पढ़ना सीख गई थीं। पर बापू बा के विद्वता और मानसिक स्तर की बहुत तारीफ करते हैं। वे लिखते हैं कि अगर मौका मिला होता तो बा पढ़ने के बाद उच्च कोटि की विदूषी महिलाओं में गिनी जातीं।

शादी के बाद बा और बापू के बीच अक्सर  विवाद होते थे। बापू के एक अपनी बात मनवाने वाले पति के तौर पर व्यवहार करते पर धीरे-धीरे बा समझ गईं कि बापू किस मिट्टी के बने हैं। इसके बाद बा ने खुद को सामंजित किया और बापू के सामाजिक जीवन में उनकी बहुत बड़ी सहयोगी बनकर उभरीं। अपने आखिरी दिनों तक वे बापू के सुख दुख का ख्याल रखने में लगी रहीं। इससे बापू को अपने सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने में काफी सुविधा हुई।

बा पर कुछ पुस्तकें – हिंदी और गुजराती में कुछ किताबें कस्तूरबा गांधी पर केंद्रित लिखी गई हैं। इनमें सबसे प्रमुख है वनमाला पारिख और सुशीला नय्यर की हमारी बा। यह गुजराती के अलावा हिंदी में भी उपलब्ध है। दोनों ने बा के साथ लंबा वक्त गुजारा थाइसलिए ये पुस्तकें संस्मरणात्मक शैली में हैं और काफी विश्वसनीय भी हैं। 

नवजीवन प्रकाशन मंदिर की इस पुस्तक में बा के बारे में प्रमाणिक जानकारियां हैं। पहली बार 1945 में प्रकाशित इस पुस्तक को खुद बापू ने भी देखा था और उसकी प्रस्तावना भी लिखी है। मूल रूप से यह पुस्तक वनमाला पारिख का प्रयास है। इस पुस्तक में गांधी जी सचिव रहे प्यारे लाल की बहन सुशीला नय्यर ने भी सहयोग किया है। पुस्तक में बा का लिखा एक दुर्लभ पत्र भी है जिसमें बा ने खुद को गांधी जी की सहधर्मिणी होने पर गर्व किया है। बा लिखती हैं – मुझे जैसा पति मिला है वैसा तो दुनिया में किसी स्त्री को नहीं मिला होगा। मेरे पति के कारण ही मैं सारे जगत में पूजी जाती हूं।

दूसरी पुस्तक बा और बापू को मुकुल भाई कलार्थी ने लिखा है। यह पुस्तक बा और बापू के बारे में संस्मरण के तौर पर है। यह भी नवजीवन प्रकाशन मंदिर से प्रकाशित है। पहली बार प्रकाशन 1962 में हुआ। इसकी प्रस्तावना मगन भाई देसाई ने लिखी है। कुल 175 पृष्ठों की पुस्तक में बा और बापू पर 120 संस्मरण हैं। पुस्तक पढ़ने पर बा और बापू के जीवन के बड़े ही सरल तरीके से चित्रात्मक स्वरूप में दृष्टिपात किया जा सकता है।

गिरिराज किशोर पुस्तक की बा -  कस्तूरबा गांधी पर तीसरी पुस्तक का नाम है- बा। पहला गिरिमिटिया लिखकर चर्चित हुए गिरिराज किशोर की यह नई पुस्तक आई है – बा। यह पुस्तक भी उपन्यास शैली में लिखी गई है। मतलब इसमें कल्पनाशीलता का भी सहारा लिया गया है। 

गिरिराज किशोर ने पुस्तक लिखने से पहले बा के जीवन पर गहन शोध किया है। ठीक उसी तरह जैसे पहल गिरमिटिया लिखने से पहले किया था।  दरअसल गिरिराज किशोर राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'बाउपन्यास के रूप में कस्तूरबा गांधी को लेकर आए हैं। इसमें गांधी जैसे व्यक्तित्व की पत्नी के रूप में एक स्त्री का स्वयं अपने और साथ ही देश की आजादी के आंदोलन से जुदा दोहरा संघर्ष देखने को मिलता है।  पुस्तक 600 रुपये की है। हार्ड बांड में संस्करण में प्रकाशित है। इसका अंग्रेजी संस्करण भी आ चुका है। इसका हिंदी से अंगरेजी अनुवाद मनीषा चौधरी ने किया है। मुझे एक अंग्रेजी लेखिका की पुस्तक भी बा पर मुझे देखने को मिली पर उसकी जानकारियां ज्यादा भरोसेमंद नहीं हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 
( KASTURBA GANDHI, KAPADIA, BA HOUSE, PORBANDAR )
पोरबंदर में बा के घर की दीवारें। 


Tuesday, May 21, 2013

पोरबंदर : बा के घर में वर्षा जल संचय का अनूठा इंतजाम

पोरबंदर में बा के घर के बाहर । 
पोरबंदर में बापू का घर देख लिया तो अब चलिए बा यानी बापू की पत्नी कस्तूरबा गांधी का घर देखने चलें। जब आप पोरबंदर में बापू का घर देखने जाते हैं तो बापू की पत्नी कस्तूरबा गांधी का घर देखना नहीं भूलें। बा का घर कीर्ति मंदिर के ठीक पीछे है। कीर्ति मंदिर देख लेने के बाद इसके पिछवाड़े से ही बा के घर जाने का रास्ता है। रास्ते में घर जाने के लिए मार्ग प्रदर्शक भी लगा हुआ है। कीर्ति मंदिर से लोग वहां जाने का रास्ता भी बता देते हैं।


तो हम पहुंच गए हैं बा के घर के बाहर। बा का घर तीन मंजिला है। पक्का घर है। इस घर को देखकर लगता है कि बा के परिवार वाले अपने समय में काफी संपन्न रहे होंगे। बा के घर में तीन रसोई घर बने हुए हैं। यह एक संयुक्त परिवार का घर लगता है। कमरे में गुसलखाना बना है और खाने के लिए डायनिंग हॉल भी बने हुए हैं। बा का पूरा घर अभी भी अच्छी हालत में है। इसे पूरी तरह घूम कर देखा जा सकता है। सबसे ऊपर की मंजिल पर भी जा सकते हैं। घर को देखकर लगता है कि उनका संयुक्त परिवार था। घर में मेहमानों के लिए भी कमरे बने हुए हैं।




बा का जन्म अप्रैल 1869 को हुआ था। हालांकि सही सही तारीख नहीं मिलती। उनका शादी के पहले नाम कस्तूरबा कपाडिया था। वे पोरबंदर के अमीर व्यापारी गोकुलदास माखरजी की बेटी थीं। 14 साल की उम्र में उनकी बापू से शादी हुई। शादी के समय वह बापू से छह माह बड़ी थीं। जीवन भर हर सुख दुख में बापू का साये की तरह साथ निभाती रहीं बा। बा का जीवन उन्हें बापू के समांतर महान बनाता है। कई बार वे चर्चा में काफी उच्च बुद्धिमता का परिचय देती हैं। वे अत्यंत ममतामयी भी थीं। पर 22 फरवरी 1944 को वे पुणे में बापू का साथ छोड़ गईं। 

बा के घर में वर्षा जल संचय का अनूठा इंतजाम  

कस्तूरबा गांधी का घर 
दो सौ साल पुराने इस कस्तूरबा गांधी के घर में हमें वर्षा जल संचय का अद्भुत इंतजाम दिखाई दिया। छत से बारिश का पानी नीचे आने के लिए कई छोटे-छोटे छेद बनाए गए हैं। इससे छत का पानी पाइप के सहारे आधार तल पर आ जाता है। 

आधार तल पर जमीन के नीचे पानी की टंकी बनाई गई है जिसमें बारिश का पानी जमा हो जाता है। इस पानी का इस्तेमाल बारिश के बाद दिनों में अलग अलग तरह के कार्यों के लिए किया जाता है। बताया जाता है पोरबंदर के तमाम संपन्न लोगों ने अपने घरों में बारिश के पानी के संचय के लिए इंतजाम कर रखे थे। बारिश के पानी के संचय का यह इंतजाम प्रेरक है। दो सौ साल पहले भी पानी बचाने को लेकर लोगों में जिस तरह की चेतना थी यह आज भी सीखने योग्य है। आज सार्वजनिक भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने की बात की जा रही है, पर ऐसा इंतजाम तो घर घर में होना चाहिए।


सात साल में सगाई और 13 साल में हुई शादी
बा और बापू की शादी कब हुई ये सही सही पता नहीं चलता। किसी भी पुस्तक में उनकी शादी की तारीख नहीं मिलती। इतना लिखा हुआ मिलता है कि मई 1883 में मोहनदास और कस्तूरबा का विवाह धूमधाम से हुआ। पर तारीख नहीं पता चलता। वैसे उन दोनों का विवाह होना 7 साल की उम्र में ही तय हो गया था। तय होने पर सगाई कर दी गई। पर शादी आगे जाकर 1883 में हुई। तब बापू साढ़े 13 साल के थे और बा 14 साल की।

जन्म और शादी की तारीखें स्पष्ट नहीं  वनमाला पारिख अपनी पुस्तक में बा का जन्म अप्रैल 1869 लिखती हैं। जन्म तारीख स्पष्ट नहीं है। ठीक इसी तरह बा और बापू की शादी की तारीख भी स्पष्ट नहीं है। बा के पिता का नाम गोकुल दास मकन जी था। मां का नाम ब्रज कुअंर। उनका परिवार पूरी तरह से वैष्णव था। यानी शुद्ध शाकाहारी। बा के तीन भाई और दो बहनें थीं। पर लंबे समय तक जीवित बा और उनके भाई माधवदास ही रहे। बाकी बहनों का कम उम्र में निधन हो गया। बा का बापू के साथ साथ पुणे तक रहा। पुणे का आगा खां पैलेस में नजरबंदी के दौरान बा ने आखिरी सांस ली। वहीं पर उनकी समाधि बनी हुई है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 
( KASTURBA GANDHI, KAPADIA, BA HOUSE, PORBANDAR )