Thursday, May 30, 2013

पोरबंदर से कृष्ण की नगरी द्वारका की ओर

कीर्ति मंदिर के पास पोरबंदर का बाजार। 
बापू के शहर पोरबंदर से कान्हा के शहर द्वारका की दूरी 100 किलोमीटर है। सड़क मार्ग से होकर द्वारका जाने का रास्ता समंदर के साथ साथ चलता है। पोरबंद से सोमनाथ की दूरी भी 110 किलोमीटर ही है। ये रास्ता भी समंदर के साथ साथ ही चलता है। वास्तव में पोरबंदर द्वारका और सोमनाथ के बीच में स्थित है।

पोरबंदर के बाद हमारा अगला पड़ाव था द्वारका। हमने जीएसआरटीसी की सुबह की बस में आनलाइन टिकट बुक करा रखा था। हमारी बस सुबह 10.30 बजे है। यह कहीं पीछे से आने वाली है। हमलोग होटल से चेकआउट के बाद पोरबंदर के बस स्टैंड में पहुंचकर बस का इंतजार कर रहे हैं। बस स्टैंड में सफाई बिल्कुल नहीं है। दोनों प्रवेश द्वार पर गंदगी का आलम है।

बस में पहुंचने पर कंडक्टर के पास पहले से ही हमारी पीएनआर की सूची मौजूद थी। गुजरात में बस बुकिंग का हमारा अनुभव काफी अच्छा रहा है।

पोरबंदर से द्वारका के रास्ते में जगह जगह पवन ऊर्जा के प्रोजेक्ट दिखाई देते हैं। हवा का रुख सही रहने पर पवन ऊर्जा की पंखियां चलती रहती हैं। विंड वर्ल्ड नामक कंपनी ने ये पवन ऊर्जा वाली पंखियां लगाई हैं। पोरबंदर से पहले लालपुर जाम में इसका बड़ा प्रोजेक्ट है।

पोरबंदर से द्वारका के रास्ते में 27 किलोमीटर आगे मूल द्वारका का मंदिर आता है। इसके आगे हरसिद्ध महादेव का मंदिर है। अगर आप सारे मंदिरों को देखते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपको निजी टैक्सी करनी चाहिए फिर निजी बस सेवा से रास्ते के ठहराव के बारे में पूछकर यात्रा करनी चाहिए।

दोपहर का लंच ब्रेक -  दोपहर में रास्ते में हमारी बस एक मनोरम स्थल पर लंच के लिए भी रुकी। अब जगह का नाम नहीं याद आ रहा। हमने यहां लंच तो नहीं किया क्योंकि पोरबंदर में जमकर नास्ता कर लिया है। पर गुजराती ढाबे में खाट पर बैठकर खूब आराम फरमाया। अनादि को भी यहां बहुत मजा आया। भरी दुपहरिया में नारियल के छोटे छोटे पेड़ों की छांव में यूं लग रहा था बस यहीं रुक जाएं। पर बस चल पड़ी। मार्ग पर एक गांव पड़ा लांबा।

बस आगे बढ़ती जा रही है। मई में धूप तेज है तो गरमी लग रही है। रास्ते में कहीं कहीं सड़कों की हालत खराब भी दिखी। यानी गुजरात के विकास का दावा खोखला।

लगभग दो घंटे के बस के सफर के बाद हमें द्वारकाधीश की नगर के दर्शन हो गए। हाईवे पर शहर से कुछ किलोमीटर पहले से ही होटल और मंदिर दिखाई देने लगते हैं।

 बस स्टैंड में उतरने के बाद हम अपने पहले से बुक किए होटल उत्तम पहुंच गए। यहां पहुंचने के लिए हमें आटो रिक्शा करना पड़ा। पर ये होटल जवाहर रोड पर द्वारकाधीश के मंदिर के ही पास था। हमने इसे  क्लियर ट्रिप से बुक किया था। ( http://www.hoteluttam.com/) तीन बत्ती चौक के पास दोपहर का भोजन लेने के बाद हमने आज के ही दिन द्वारका घूमने का फैसला किया।

-   -  विद्युत प्रकाश मौर्य.  (DWARKA, HOTEL UTTAM ) 



Tuesday, May 28, 2013

गुजरात की शाही सवारी - जामनगर का छकड़ा

पोरबंदर में एक छकड़े पर अनादि। 
भले ही गुजरात ने तमाम क्षेत्रों में उपलब्धियों के झंडे गाड़े हों लेकिन यहां की शाही सवारी तो छकड़ा ही है। छकड़ा एक तरह की जुगाड़ गाड़ी है। कई राज्यों में इस तरह की गाड़ियां प्रतिबंधत हैं।  लेकिन इसका गुजरात में आरटीओ दफ्तरों में छकड़ा का पंजीकरण होता है।

गुजरात में जामनगर की एक कंपनी अतुल दो लाख रुपये में छकड़ा तैयार करके बेचती है। छकड़ा राज्य का बहु उपयोगी वाहन है। यहां गांव व शहरों में माल ढुलाई के लिए आदर्श तो है ही इससे सवारियां भी ढोई जाती हैं। छकड़ा में डीजल इंजन लगा होता है। पोरबंदर में एक छकड़ा के चालक ने बताया कि यह 30 किलोमीटर तक का औसत दे देता है। भले ही आवाज बहुत करता है लेकिन ररखाव में तो सस्ता है। यह एक टन तक वजन उठाने में सक्षम है। सवारी ढोने की बात हो तो इसमें 20 आदमी बैठ जाते हैं। कुछ लोग खड़े रहते हैं तो कुछ लटक भी जाते हैं। गुजरात के गांवों को शहर से जोड़ने में छकड़ा अहम कड़ी है।

तमाम कंपनियों के आटो रिक्शा, टेंपो, टाटा मैजिक, नैनो कार, महिंद्रा के जीओ और मैक्सिमो जैसे माडल के अच्छे पब्लिक ट्रांसपोर्ट बाजार में आ गए हैं लेकिन वे देशी जुगाड़ से बने छकड़े का रिप्लेसमेंट नहीं बन पा रहे हैं। सीट के नाम पर छकड़े में लकड़ी का पटरा रखा होता है। जब आप इसमें चलते हैं तो पर पूरा शरीर हिल उठता है लेकिन गुजरातियों को इस छकड़े से मानो प्यार है। वे इससे दूर नहीं जाना चाहते। बैठने के साथ हवा धूप और आसपास के नजारे देखने का भी आनंद मिलता है।

कभी दिल्ली में चलती थी फटफट गाड़ी-  किसी जमाने में दिल्ली की सड़कों पर छकड़े से मिलती जुलती फटफट गाड़ी चला करती थी। इसमें बुलेट का इंजन लगा होता था। पर प्रदूषण फैलाने के नाम पर दिल्ली के फटफट को शहीद कर दिया गया। हमने सोमनाथ से लेकर दीव तक ऐसा ही छकड़ा चलते हुए देखा। माल, ढुलाई, मेला से लेकर टूरिज्म तक छकड़ा हर जगह मौजूद है। हमने भी दीव में थोड़ी देर तक छकड़े की सवारी का खूब मजा लिया।

 - vidyutp@gmail.com
(CHAKDA, JAMNAGAR, PORBANDAR ) 

Sunday, May 26, 2013

गुजराती थाली - मतलब छककर खाओ

गुजराती थाली मतलब छक कर खाओ पर पचाने के लिए जमकर पीओ छाछ। गुजरात शाकाहारी भोजन खास तौर पर गुजराती थाली के लिए जाना जाता है। हमने पोरबंदर स्टेशन पर उतरते ही स्टेशन गेट के बाहर दाहिनी तरफ एक एसी रेस्टोरेंट में गुजराती थाली का आनंद लिया था। यहां 60 रुपये की फिक्स थाली थी। घी लगी चपाती, सब्जियां और छाछ आदि।

नीलेश भोजनालय - शाम खाना हमने काफी जांच पड़ताल करने के बाद एसटी रोड पर नीलेश भोजनालय में करने को तय किया। नीलेश भोजनालय यहां का लोकप्रिय रेस्टोरेंट है। यहां 70 रुपये की अनलिमिटेड थाली थी। शुरुआत गेहूं की एक घी चुपड़ी मोटी रोटी के साथ हुई।

उसके बाद चाहे जितनी मर्जी चपाती और चावल खाएं आप। छाछ तो उन्होंने एक जग में लाकर रख दिया। आपकी मर्जी चाहे जितने ग्लास गटक जाओ। आनंद आ गया। वैसे पोरबंदर में मून पैलेस समेत कई और जगह गुजराती थाली खाई जा सकती है। सुबह हमने बापू के शहर में जलेबियों का भी स्वाद लिया।

गुजरात का प्रसिद्ध केसर आम - 

सौराष्ट्र में इन दिनों आम का मौसम है। गुजरात का प्रसिद्ध केसर आम इसी इलाके में होता है। केसर को शौकीन इसे अपने साथ मुंबई तक ले जाते हैं।
ट्रेन में हमें लोग केसर आम की पेटी अहमदाबाद और मुंबई ले जाते हुए मिले। आम को लेकर हर इलाके लोग अपने स्थानीय स्वाद को लेकर खासे शौकीन दिखते हैं। गुजरात का केसर रत्नागिरी के हापुस को चुनौती देता है।

और ये रहा सफेद जामुन - पोरबंदर के बाजार में हमें जामुन भी खूब देखने को मिला। पर सफेद जामुन तो हमने पहली बार देखा। हालांकि ये काले जामुन की तरह मीठा नहीं होता। इसका स्वाद इसके सफेदी के मुताबिक फीका भी है। पर गुजरात में इस सफेद जामुन को लोग खूब खरीदकर खाते हैं। 
मई में ठीक ठाक गर्मी है। अनादि ने आईसक्रीम खाने की जिद की। हमने पोरबंदर में अमूल का आइसक्रीम ढूंढना शुरू किया, पर पता चला कि यहां कहीं भी अमूल का आइसक्रीम नहीं मिलता। आश्चर्य अमूल गुजरात का ही उत्पाद है पर यह गुजरात के पोरबंदर शहर में नहीं बिक रहा है। मजूबरन हमें दूसरा ब्रांड लेना पड़ा।  


-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
( NEELESH BHOJNALAYA, THALI, KESAR MANGO, WHITE JAMUN )  

Friday, May 24, 2013

कान्हा के बाल सखा सुदामा का मंदिर

पोरबंदर शहर में एमजी रोड पर सुदामा मंदिर। यहां वही कृष्ण के बाल सखा सुदामा जी का मंदिर है। द्वारका में कृष्ण विराजते हैं तो उनके मित्र सुदामा विराजते हैं पोरबंदर में। इसलिए पोरबंदर को सुदामापुरी भी कहा जाता है। किसी जमाने में यहां जंगल हुआ करता था। यहीं पर संदीपनी ऋषि का आश्रम भी था। सुदामा मंदिर बापू के घर कीर्ति मंदिर से कुछ दूरी पर ही है।

सुदामा यानी महाभारत काल के एक प्रेरक व्यक्तित्व जो अपनी गरीबी में जीते हैं लेकिन अपने बाल सखा राजा कृष्ण से कोई मदद नहीं लेना चाहते। बाद में पत्नी की सलाह पर वे कृष्ण की मदद लेने जाते हैं। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की कहानी पूरे देश में सुनाई जाती है। पर कृष्ण के मंदिर देश भर में बने हैं लेकिन सुदामा जी का एक मात्र मंदिर पोरबंदर में ही है।

सुदामा मंदिर में सुदामा जी की प्रतिमा के अलावा उनकी पत्नी सुशीला की प्रतिमा लगी है। मंदिर काफी भव्य नहीं है लेकिन इसका अपना महत्व है। सुदामा में खास तौर पर निम्न मध्यमवर्गीय और गरीब लोगों की काफी आस्था है। सुदामा समाज के अंतिम लोगों के बीच प्रिय हैं जैसे की बापू। मंदिर परिसर में एक सुदामा कुंड भी है जो किसी पुरानी बावड़ी जैसा है।

और ये 84 चक्कर -----  
मंदिर के बगल में 84 का चक्कर है। यह 84 लाख योनियों के बीच आत्मा के भटकाव का प्रतीक है। इसमें घुसने के बाद आप निकलने की कोशिश करेंगे लेकिन निकल नहीं पाएंगे। कोई कोई निकल भी जाता है। सुदामा मंदिर परिसर में बच्चों के लिए झूले पार्क आदि बनाए गए हैं।

महिलाओं की भजन मंडलियां - 
सुदामा मंदिर में महिलाओं की मंडलियां रोज कीर्तन करने आती हैं। कीर्तन करने वाली अलग-अलग कई मंडलियां हैं। ये महिलाएं मंदिर में आने के बाद देवी देवताओं की तस्वीरें सजाती हैं। उसके बाद बैठक लगाकर पूरी आस्था से देर तक ईश्वर की वंदना में लीन हो जाती हैं।

-     ----- माधवी रंजना  ( SUDAMA TEMPLE, PORBANDAR, GUJRAT ) 

Wednesday, May 22, 2013

पोरबंदर की चौपाटी पर मौज मस्ती

चौपाटी मतलब समंदर का किनारा। शाम गुजारने के लिए भला समंदर के किनारे से अच्छी जगह क्या हो सकती है। बापू के शहर पोरबंदर में भी चौपाटी है। काफी भव्य नहीं पर सुंदर है। बस स्टैंड के बगल में पारसी समाज का अंतिम स्थल और चौपाटी है। आप एमजी रोड से टहलते हुए चौपाटी तक पहुंच सकते हैं। 

यहां अरब सागर गर्जना करता हुआ सुनाई देता है। समुद्र का किनारा बहुत साफ नहीं है। लिहाजा यहां स्नान करने योग्य स्थान नहीं है। पर चौपाटी के किनारे रौनक है। एक जगह पक्का घाट बनाया गया है। समंदर के किनारे एक मनोरंजन पार्क भी बना है। यहां बच्चों के लिए ढेर सारे झूले खिलौने आदि हैं। निजी वाहन से आने वालों के लिए पार्किंग का भी इंतजाम है। थक गए हैं तो पेट पूजा भी कर सकते हैं।

बड़े से हाथी पर चढ़कर फिसलने में अनादि को खूब आनंद आया। हाथी एक सीमेंट कंपनी का विज्ञापन है जो मजबूती का प्रतीक है। पोरबंदर के समुद्र तट पर सबसे यादगार रहा ऊंट की सवारी। वैसे तो ऊंट की सवारी कई जगह की जा सकती है। लेकिन यहां मजह 10 रुपये में ऊंट की सवारी। बच्चों के लिए 10 तो बड़ों के लिए 20 रुपये। सो मैंने भी ऊंट की सवारी का आनंद लिया। हर चक्कर के बाद नए लोगों को उतारने और बिठाने के लिए ऊंच महाराज को बैठना और फिर उठना पड़ता है। लेकिन ऊंट की सवारी का रोमांच अद्भुत है।

ऊंट पर बैठते ही आप एक मंजिले मकान के बराबर ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं। वहीं ऊंट जब चलता है तो उसकी चाल में अजब सी मस्ती होती है। ऊंट की सवारी दूसरे पर्यटक स्थलों पर भी की जा सकती है लेकिन द्वारका और पोरबंदर में जितने सस्ते में आप ऊंट की सवारी का आनंद ले सकते हैं और कहीं भी मुश्किल है।

-    
विद्युत प्रकाश मौर्य  

( (PORBANDAR, CHAUPATI, SEA, CAMEL RIDE ) 

Monday, May 20, 2013

पोरबंदर : बा के घर में वर्षा जल संचय का अनूठा इंतजाम

पोरबंदर में बा के घर के बाहर । 
पोरबंदर में बापू का घर देख लिया तो अब चलिए बा यानी बापू की पत्नी कस्तूरबा गांधी का घर देखने चलें। जब आप पोरबंदर में बापू का घर देखने जाते हैं तो बापू की पत्नी कस्तूरबा गांधी का घर देखना नहीं भूलें। बा का घर कीर्ति मंदिर के ठीक पीछे है। कीर्ति मंदिर देख लेने के बाद इसके पिछवाड़े से ही बा के घर जाने का रास्ता है। रास्ते में घर जाने के लिए मार्ग प्रदर्शक भी लगा हुआ है। कीर्ति मंदिर से लोग वहां जाने का रास्ता भी बता देते हैं।


तो हम पहुंच गए हैं बा के घर के बाहर। बा का घर तीन मंजिला है। पक्का घर है। इस घर को देखकर लगता है कि बा के परिवार वाले अपने समय में काफी संपन्न रहे होंगे। बा के घर में तीन रसोई घर बने हुए हैं। यह एक संयुक्त परिवार का घर लगता है। कमरे में गुसलखाना बना है और खाने के लिए डायनिंग हॉल भी बने हुए हैं।


बा का पूरा घर अभी भी अच्छी हालत में है। इसे पूरी तरह घूम कर देखा जा सकता है। सबसे ऊपर की मंजिल पर भी जा सकते हैं। घर को देखकर लगता है कि उनका संयुक्त परिवार था। घर में मेहमानों के लिए भी कमरे बने हुए हैं।

बा का जन्म अप्रैल 1869 को हुआ था। हालांकि सही सही तारीख नहीं मिलती। उनका शादी के पहले नाम कस्तूरबा कपाडिया था। वे पोरबंदर के अमीर व्यापारी गोकुलदास माखरजी की बेटी थीं। 14 साल की उम्र में उनकी बापू से शादी हुई। शादी के समय वह बापू से छह माह बड़ी थीं। जीवन भर हर सुख दुख में बापू का साये की तरह साथ निभाती रहीं बा। बा का जीवन उन्हें बापू के समांतर महान बनाता है। कई बार वे चर्चा में काफी उच्च बुद्धिमता का परिचय देती हैं। वे अत्यंत ममतामयी भी थीं। पर 22 फरवरी 1944 को वे पुणे में बापू का साथ छोड़ गईं। 

बा के घर में वर्षा जल संचय का अनूठा इंतजाम  

कस्तूरबा गांधी का घर 
दो सौ साल पुराने इस कस्तूरबा के घर में वर्षा जल संचय का अद्भुत इंतजाम है। छत से बारिश का पानी नीचे आने के लिए कई छोटे-छोटे छेद बनाए गए हैं। इससे छत का पानी पाइप के सहारे आधार तल पर आ जाता है। 

आधार तल पर जमीन के नीचे पानी की टंकी बनाई गई है जिसमें बारिश का पानी जमा हो जाता है। इस पानी का इस्तेमाल बारिश के बाद दिनों में अलग अलग तरह के कार्यों के लिए किया जाता है। बताया जाता है पोरबंदर के तमाम संपन्न लोगों ने अपने घरों में बारिश के पानी के संचय के लिए इंतजाम कर रखे थे। बारिश के पानी के संचय का यह इंतजाम प्रेरक है। दो सौ साल पहले भी पानी बचाने को लेकर लोगों में जिस तरह की चेतना थी यह आज भी सीखने योग्य है। आज सार्वजनिक भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने की बात की जा रही है, पर ऐसा इंतजाम तो घर घर में होना चाहिए।


सात साल में सगाई और 13 साल में हुई शादी
बा और बापू की शादी कब हुई ये सही सही पता नहीं चलता। किसी भी पुस्तक में उनकी शादी की तारीख नहीं मिलती। इतना लिखा हुआ मिलता है कि मई 1883 में मोहनदास और कस्तूरबा का विवाह धूमधाम से हुआ। पर तारीख नहीं पता चलता। वैसे उन दोनों का विवाह होना 7 साल की उम्र में ही तय हो गया था। तय होने पर सगाई कर दी गई। पर शादी आगे जाकर 1883 में हुई। तब बापू साढ़े 13 साल के थे और बा 14 साल की।
जन्म और शादी की तारीखें स्पष्ट नहीं  वनमाला पारिख अपनी पुस्तक में बा का जन्म अप्रैल 1869 लिखती हैं। जन्म तारीख स्पष्ट नहीं है। ठीक इसी तरह शादी की तारीख भी स्पष्ट नहीं है। बा के पिता का नाम गोकुल दास मकन जी था। मां का नाम ब्रज कुअंर। उनका वैष्णव परिवार था। यानी शाकाहारी। बा के तीन भाई और दो बहनें थीं। पर लंबे समय तक जीवित बा और उनके भाई माधवदास ही रहे। बाकी बहनों का कम उम्र में निधन हो गया। 

अक्षर ज्ञान से दूर बा थीं विदूषी महिला – 
काठिवाड़ में उस जमाने में लड़कियों को कोई पढ़ता ही नहीं था इसलिए बा भी पढ़ी लिखी बिल्कुल नहीं थीं। पर शादी के बाद बापू ने अलग अलग समय में बा को पढ़ाने की कोशिश की। तब बा गुजरात में लिखना पढ़ना सीख गई थीं। पर बापू बा के विद्वता और मानसिक स्तर की बहुत तारीफ करते हैं। वे लिखते हैं कि अगर मौका मिला होता तो बा पढ़ने के बाद उच्च कोटि की विदूषी महिलाओं में गिनी जातीं।

शादी के बाद बा और बापू के बीच अक्सर  विवाद होते थे। बापू के एक अपनी बात मनवाने वाले पति के तौर पर व्यवहार करते पर धीरे धीरे बा समझ गईं कि बापू किस मिट्टी के बने हैं। बा ने खुद को सामंजित किया और बापू के सामाजिक जीवन में उनकी बहुत बड़ी सहयोगी बनकर उभरीं। अपने आखिरी दिनों तक वे बापू के सुख दुख का ख्याल रखने में लगी रहीं। इससे बापू को अपने सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने में काफी सुविधा हुई।

बा पर कुछ पुस्तकें
हिंदी और गुजराती में कुछ किताबें कस्तूरबा गांधी पर केंद्रित लिखी गई हैं। इनमें सबसे प्रमुख है वनमाला पारिख और सुशीला नय्यर की हमारी बा। यह गुजराती के अलावा हिंदी में भी उपलब्ध है। दोनो ने बा के साथ लंबा वक्त गुजारा था, इसलिए ये पुस्तकें संस्मरणात्मक शैली में हैं। 



नवजीवन प्रकाशन मंदिर की इस पुस्तक में बा के बारे में प्रमाणिक जानकारियां हैं। पहली बार 1945 में प्रकाशित इस पुस्तक को खुद बापू ने भी देखा था और उसकी प्रस्तावना भी लिखी है। मूल रूप से यह पुस्तक वनमाला पारिख का प्रयास है। इस पुस्तक में गांधी जी सचिव रहे प्यारे लाल की बहन सुशीला नय्यर ने भी सहयोग किया है। पुस्तक में बा का लिखा एक दुर्लभ पत्र भी है जिसमें बा ने खुद को गांधी जी की सहधर्मिणी होने पर गर्व किया है। बा लिखती हैं – मुझे जैसा पति मिला है वैसा तो दुनिया में किसी स्त्री को नहीं मिला होगा। मेरे पति के कारण ही मैं सारे जगत में पूजी जाती हूं।

दूसरी पुस्तक बा और बापू को मुकुल भाई कलार्थी ने लिखा है। यह पुस्तक बा और बापू के बारे में संस्मरण के तौर पर है। यह भी नवजीवन प्रकाशन मंदिर से प्रकाशित है। पहली बार प्रकाशन 1962 में हुआ। इसकी प्रस्तावना मगन भाई देसाई ने लिखी है। कुल 175 पृष्ठों की पुस्तक में बा और बापू पर 120 संस्मरण हैं। पुस्तक पढ़ने पर बा और बापू के जीवन के बड़े ही सरल तरीके से चित्रात्मक स्वरूप में दृष्टिपात किया जा सकता है।



गिरिराज किशोर की बा - 
कस्तूरबा गांधी पर तीसरी पुस्तक का नाम है- बा। पहला गिरिमिटिया लिखकर चर्चित हुए गिरिराज किशोर की यह नई पुस्तक आई है बा। यह पुस्तक भी उपन्यास शैली में लिखी गई है। मतलब इसमें कल्पनाशीलता का भी सहारा लिया गया है। 

गिरिराज किशोर ने पुस्तक लिखने से पहले बा के जीवन पर गहन शोध किया है। ठीक उसी तरह जैसे पहल गिरमिटिया लिखने से पहले किया था। पुस्तक 600 रुपये की है। हार्ड बांड में संस्करण में प्रकाशित है।  गिरिराज किशोर राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
 'बाउपन्यास में कस्तूरबा गांधी को लेकर आए हैं। इसमें गांधी जैसे व्यक्तित्व की पत्नी के रूप में एक स्त्री का स्वयं अपने और साथ ही देश की आजादी के आंदोलन से जुदा दोहरा संघर्ष देखने को मिलता है।  मुझे एक अंग्रेजी लेखिका की पुस्तक भी बा पर मुझे देखने को मिली पर उसकी जानकारियां ज्यादा भरोसेमंद नहीं हैं।



-    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( KASTURBA GANDHI, KAPADIA, BA HOUSE, PORBANDAR )

Saturday, May 18, 2013

पोरबंदर का कीर्ति मंदिर - जहां मोहन का जन्म हुआ


गुजरात का पोरबंदर यानी बापू का शहर। दो अक्टूबर 1869 को यहीं मोहन दास करमचंदर गांधी का जन्म हुआ जिसे दुनिया महात्मा गांधी के नाम से जानती है। बापू की जन्मस्थली को कीर्ति मंदिर के नाम से जाना जाता है। कीर्ति मंदिर का महत्व देश के तमाम देवी देवताओं के मंदिरों की ही तरह है। अब यहां हर रोज देश के कोने कोने से लोग पहुंचते हैं। 

बापू का सम्मान करने वालों के लिए यह स्थल तो सचमुच मंदिर ही है। वह कमरा जहां बापू का जन्म हुआ उसे देखने दूर दूर से लोग आते हैं। कीर्ति मंदिर तीन मंजिला है। इस घर को बापू के पुरखों ने खरीदा था बाद में उसे अपनी सुविधा के अनुसार और बड़ा बनवाया। कीर्ति मंदिर में आप उस कमरे को देख सकते हैं जहां पुतली बाई ने मोहन दास को जन्म दिया था। कीर्ति मंदिर देखने आने वाले लोग यहां कई घंटे गुजारते हैं। कीर्ति मंदिर में बापू के जीवन से जुड़ी दीर्घा का निर्माण भी किया गया है। यहां पर बापू का पूरा जीवन चित्रों में देखा जा सकता है।  

कीर्ति मंदिर - यहीं हुआ था बापू का जन्म। 

कीर्ति मंदिर के तीन मंजिल में 20 से ज्यादा कमरे हैं। घर की संरचना आंगन वाली है। आंगन के चारों तरफ कमरे बने हैं। ऊपर की मंजिलहै। जाने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। इनमें कुछ सीढियां लकड़ी की हैं। तीसरी मंजिल पर नन्हे मोहन का अध्ययन कक्ष है। घर के हर कमरे को लोगों के दर्शन के लिए खुला रखा गया है। सभी कमरे में ठंडी ठंडी हवा आती है। दुनिया भर के गांधी प्रेमियों के लिए कीर्ति मंदिर किसी तीर्थ की तरह है। यह प्रेरणा का स्थल है।

बापू के जन्म स्थल को भव्य रूप देने की शुरुआत उनके जीवन काल में ही शुरू हो गई थी। बापू के पुश्तैनी घर को उनके परदादा हरजीवन रैदास गांधी ने खरीदा था। इस हवेली नुमा घर में बापू के पिता करमचंद गांधी, उनके चाचा तुलसीदास और दादा उत्तम चंद की हिस्सेदारी थी। 1947 में प्रसिद्ध उद्योगपति नानजीभाई कालीदास मेहता ने बापू की जन्मस्थली को कीर्ति मंदिर के तौर पर स्मृति स्थल बनाना तय किया। बापू की इसमें सहमति थी। आसपास के घरों को क्रय कर लिया गया। 1950 में यह स्मृति स्थल बनकर तैयार हो गया। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसका उदघाटन 27 मई 1950 को किया। मुख्य गुबंद की ऊंचाई 79 फीट है। बापू 79 साल जीवित रहे इसलिए इस भवन की ऊंचाई इतनी रखी गई थी। इसके वास्तु में छह प्रमुख धर्मों के प्रतीक चिन्हों को समाहित किया गया है, जिससे से सर्वधर्म समभाव का प्रतीक नजर आता है। हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और इस्लाम के प्रतीक इसमे समाहित हैं। 

अब कीर्ति मंदिर के पास के हिस्से को भव्य रूप देकर यहां एक बड़ी फोटो गैलरी बना दी गई है जहां बापू का पूरा जीवन परिचय तस्वीरों में देखा जा सकता है। कीर्ति मंदिर पोरबंदर में एमजी रोड पर शहर के बीचों बीच है।


पोरबंदर राज घराने के दीवान थे बापू के पिता - बापू के पिता का नाम वैसे तो करमचंद गांधी था पर लोग उन्हें प्यारा से काबा गांधी कहते थे। उनके पिता का नाम उत्तम चंद गांधी था। काबा गांधी पहले पोरबंदर राजघराने के दीवान थे। बाद में राजकोट के दीवान बने। दीवान मतलब प्रधानमंत्री। जाहिर है बापू खाते पीते घर से आते थे। करमचंद गांधी ने चार शादियां की। दो पत्नियां जल्दी मर गईं. उनकी चौथी शादी पुतली बाई से हुई। पुतली बाई ने चार संतानों को जन्म दिया। सबसे बड़े लक्ष्मी दास, दूसरे करसन दास और तीसरे मोहन दास। एक बेटी भी हुई रायलता बेन। मोहन दास इनमें सबसे छोटे थे।


अपने स्कूली दिनों मोहनदास। 
बचपन में हुई शादी से खुश थे बापू - 1869 में जन्में बापू का मई 1883 में 13 साल 6 माह की उम्र में शादी कर दी गई। कस्तूरबा उनसे कुछ महीने  बड़ी थीं। बालपन में तो बापू शादी से काफी खुश थे। नए कपड़े पहनने को मिलेंगे और खाना पीना होगा। पर बाद में बापू बाल विवाह के बड़े विरोधी हो गए। 1885 में जब मोहनदास 16 साल के थे तब पिता करमचंद गांधी स्वर्ग सिधार गए। कीर्ति मंदिर वह जगह है जहां बापू का जन्म हुआ और उनका बालपन यहां गुजरा। 


कहां ठहरें - पोरबंदर रेलवे स्टेशन से कीर्ति मंदिर दो किलोमीटर दूर है। अगर पोरबंदर जा रहे हैं तो वहां एमजी रोड पर होटल नटराज में ठहर सकते हैं। इसके बगल में मून पैलेस भी किफायती होटल है।

कैसे पहुंचे - पोरबंदर गुजरात का एक छोटा सा समुद्र तटीय शहर है। पोरबंदर आने के लिए दिल्ली और अहमदाबाद से सीधी रेलगाड़ियां उपलब्ध हैं। कई शहरों से विमान सेवा भी है। पोरबंदर रेलवे स्टेशन से कीर्ति मंदिर की दूरी दो किलोमीटर के आसपास है। बापू का घर शहर के मुख्य बाजार में ही स्थित है। अगर आप रेलवे स्टेशन की तरफ से आ रहे हैं। तो मुख्य बाजार के चौक पर दाहिनी तरफ मुड़े, कीर्ति मंदिर नजर आ जाएगा।
बापू के घर कीर्ति मंदिर में पहली मंजिल पर अनादि। ( मई 2013)


क्या देखें - पोरबंदर में बापू के घर कीर्ति मंदिर के अलावा कस्तूरबा का घर, सुदामा जी का मंदिर, चौपाटी, समुद्र तट, कथावाचक रमेश भाई ओझा का आश्रम ( संदीपनी आश्रम ) देखा जा सकता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( ( BAPU, KIRTI MANDIR, PORBANDAR, BIRTH PLACE ) 

Friday, May 17, 2013

सराय रोहिला रेलवे स्टेशन से गुजरात की ओर

बापू की धरती पर ( 17 मई 2013) 

हम चल पड़े हैं गुजरात के सफर पर। नई दिल्ली का सराय रोहिला रेलवे स्टेशन। गुजरात और राजस्थान जाने वाली ज्यादातर रेलगाडियां यहीं से खुलती हैं। लेकिन सराय रोहिला दिल्ली के बाकी चार रेलवे स्टेशनों की तुलना में यात्री सुविधाओं के नाम पर काफी पिछड़ा हुआ है। यहां पहुंचकर लगता ही नहीं है कि आप देश राजधानी दिल्ली के किसी स्टेशन पर हैं। दिल्ली के शास्त्री नगर मेट्रो स्टेशन से एक किलोमीटर दूर स्टेशन का सड़क से पहुंच मार्ग अत्यंत संकरा है। करोलबाग की तरफ से रोहतक रोड से स्टेशन पहुंचने का रास्ता गलियों से होकर है। इस गली में गाड़ियां अक्सर जाम में फंस जाती हैं।
सराय रोहिला स्टेशन भवन काफी पुराना है। प्लेटफार्म और फुटओवर ब्रिज टूटे फूटे हैं। प्लेटफार्म पर शेड्स की काफी कमी है। यहां कैंटीन, वेटिंग हॉल के नाम पर भी खानापूर्ति है।


अचरज होता है कि दिल्ली के बाकी स्टेशनों को वर्ल्ड क्लास बनाने की कवायद चल रही है। पर सराय रोहिला स्टेशन पर रेलवे की नजरें इनायत क्यों नहीं हैं। जबकि यहां से रेलवे को बड़ा राजस्व मिलता है। यहां से गुजरात की कई ट्रेनें, मुंबई गरीब रथ, जयपुर के लिए डबल डेकर जैसी रेलगाड़ियां रोज खुलती हैं। पर स्टेशन पर इंतजाम के नाम पर कुछ भी नहीं। सराय रोहिला किसी जमाने में मीटर गेज का स्टेशन हुआ करता था। पर राजस्थान और गुजरात की ज्यादातर लाइनें ब्राडगेज हो जाने के बाद अब इस स्टेशन से मीटर गेज खत्म हो चुका है। 


रेलवे केटरिंग का घटिया खाना

जामनगर के बाद एक स्टेशन पर खड़ी पोरबंदर एक्सप्रेस 
अब बात दिल्ली पोरबंदर एक्सप्रेस की। 19264 पोरबंदर एक्सप्रेस सोमवार और गुरुवार को यहां से चलती है। हमारी यात्रा 16 मई गुरुवार के दिन आरंभ हुई। ट्रेन दिल्ली से समय पर यानी सुबह 8.20 बजे खुल गई। शाम होने तक हमलोग आबू रोड स्टेशन पहुंच गए हैं। आबू रोड रेलवे स्टेशन प्लेटफार्म पर मिलने वाली रबड़ी की खूब तारीफ सुनी थी। पर खाया तो उसका स्वाद औसत ही निकला। सहयात्रियों ने बताया कि अब क्वालिटी पहले जैसी नहीं रही।
हमने इस सफर में पाया कि गुजरात जाने वाली इस महत्वपूर्ण ट्रेन की रखरखाव के नाम पर खानापूर्ति की जाती है। सबसे बुरा हाल ट्रेन की केटरिंग व्यवस्था का है। हमने रात का खाना आर्डर किया। 85 रुपये की थाली। इस थाली में मटर बिल्कुल कच्चे थे। दाल अधपकी थी। पराठे भी पके हुए नहीं थे। चावल घटिया क्वालिटी का था। ये समझ में नहीं आया कि 85 रुपये किस बात के लिए जा रहे हैं। वहीं जब हमने महाराष्ट्र में सतारा कोपरगांव के बीच महाराष्ट्र एक्सप्रेस में खाना आर्डर किया था तो महज 50 रुपये में इससे काफी बेहतर खाना मिला। कई ट्रेनों में आईआरसीटीसी के ठेकेदार खाने के नाम पर रेल यात्रियों को लूट रहे हैं। खासतौर पर दिल्ली पोरबंदर एक्सप्रेस की केटरिंग ठीक किए जाने की जरूरत है। इससे तो अच्छा हो कि गुजरात के लोकप्रिय रेस्टोरेंट्स को ट्रेन में गुजराती थाली परोसने की व्यवस्था की जाए। इससे गुजरात जाने वाली ट्रेन में खूशबू गुजरात की महसूस की जा सकेगी।

17 मई की सुबह हुई तो हम गुजरात में थे। अहमदाबाद शहर पीछे छूट गया था। हमने सुबह का नास्ता राजकोट जंक्शन में लिया। यहां ट्रेन का ठहराव 15 मिनट का था। नास्ते में अगर गुजरात में हैं तो भला ढोकला के अलावा और क्या हो सकता है। हमारा आरक्षण जामनगर तक का ही था। पहले हम जामनगर से द्वारका जाने वाले थे। पर अब हमने योजना में थोड़ा बदलाव किया है। अब हम पहले पोरबंदर जाएंगे। चलती ट्रेन में टीटीई को तलाश कर अपने टिकट का विस्तार कराया।



ट्रेन जामनगर से आगे भाग रही थी। हरियाली कम होती जा रही है। आसपास में पवन ऊर्जा से बिजली बनाने वाली इकाइयां दिखाई दे रही हैं। ट्रेन दोपहर एक बजे पोरबंदर पहुंच गई। ट्रेन से उतरते ही हमने बापू की जन्मभूमि की मिट्टी को नमन किया। स्टेशन पर भीड़ बिल्कुल नहीं है।
हमने होटल नटराज में ऑनलाइन बुकिंग करा रखी थी। पर रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही भूख लग रही थी, सो होटल पहुंचे से पहले जो शाकाहारी भोजनालय दिखा वहां खाने के लिए बैठ गए। खाने के बाद होटल नटराज पहुंचकर यात्रा की सारी थकान जाती रही। होटल का कमरा और साफ सफाई और बाकी इंतजाम काफी बेहतर था। कमरे का किराया महज 500 रुपये। होटल एमजी रोड पर मुख्य बाजार में स्थित है। रेलवे स्टेशन से महज एक किलोमीटर की दूरी पर है।  
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- -  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
 ( यात्रा का मार्ग - दिल्ली- आबू रोड- अहमदाबाद - पोरबंदर - द्वारका - ओखा-भेट द्वारका - सोमनाथ- वेरावल- दीव- वेरावल- अहमदाबाद - गांधीनगर - वडोदरा -मुंबई - पूणे - पंचगनी- महाबलेश्वर- वाई- सतारा- कोपरगांव- शिरडी - नासिक - खंडवा- ओंकारेश्वर -उज्जैन - दिल्ली ) 


(  ( PORBANDAR, RAIL , GANDHI, SARAI ROHILLA, PANTRY CAR FOOD  )
पोरबंदर में खुशियों के फूल खिले हैं....खुशबू गुजरात की...

Wednesday, May 8, 2013

शानदार 150 साल - दिल्ली का पुराना लोहे का पुल

आपकी रेलगाड़ी कई बार दिल्ली के पुराने लोहे के पुल से गुजरी होगी। आपको पता है कि यमुना नदी पर बना ये पुल सिर्फ दिल्ली का ही नहीं बल्कि देश के सबसे पुराने रेल पुल में से एक है। रेलवे के नंबरिंग के हिसाब से ब्रिज नंबर 249 इस पुल के पर यातायात चालू होने के बाद ही दिल्ली हावड़ा से जुड़ सका। यह एक रेल कम रोड ब्रिज है। यानी नीचे नीचे सड़क मार्ग और ऊपर ऊपर रेल।

इस पुल का निर्माण 1863 में आरंभ हुआ यानी 1857 की क्रांतिके छह साल बाद। पुल तीन साल में बनकर तैयार हो गया। 1866 में इस पर यातायात आरंभ हो गया। पहले यह सिंगल ट्रैक वाला पुल था पर 1913 में इसे डबल ट्रैक वाले रेल में पुल में बदला गया। इस पुल के निर्माण में 16 लाख 16 हजार 335 रुपये की कुल लागत आई थी। 1913 में डाउन लाइन बिछाने के लिए इसमें 12 स्पैन और दो एन्ड स्पैन जोड़े गए।

साल 2016 में दिल्ली के इस लोहा पुल ने अपनी सेवा के स्वर्णिम 150 साल पूरे किए। पर पुल का सड़क मार्ग और रेल मार्ग दुरुस्त है। इसपुल की खास बात है कि यह ऐतिहासिक लालकिला के बिल्कुल बगल में है। पुल पार करने के बाद ट्रेन तुरंत दिल्ली जंक्शन रेलवे स्टेशन में प्रवेश कर जाती है। पुल के तरफ दिल्ली के जमुना बाजार का इलाका है। इसी तरह के लोहे के पुल दिल्ली हावड़ा मार्ग पर इलाहाबाद के नैनी में और पटना के पास कोईलवर में सोन नदी पर बनाए गए हैं।
अब दिल्ली में यमुना नदी पर कई नए सड़क पुल बन गए हैं पर अभी भी बड़ी संख्या में ट्रैफिक हर रोज पुराने लोहे के पुल से होकर गुजरता है। इसके सड़क मार्ग पर रिक्शे ठेले चलते नजर आते हैं जो होल सेल बाजार गांधीनगर और चांदनी चौक के बीच आवाजाही करते हैं। कभी कभी तो पुल पर जाम लगने के हालात बन आते हैं। पुराने लोहे के पुल ने दिल्ली के बसते हुए  देखा और आबादी का बोझ बढ़ते हुए देखा है।
बारिश के दिनों बंद करना पड़ता है - दिल्ली में हर साल बढ़ने वाले यमुना के जलस्तर का यह पुल साक्षी रहा है। 1978 में यमुना में सबसे बड़ी बाढ़ को देखा है, जब पानी खतरे के निसान से काफी ऊपर आ गया था। तब दिल्ली के कई इलाके डूब गए थे। हर साल यमुना का जल स्तर बढ़ने पर पुराने लोहे के पुल पर रेल यातायात एहतियात के तौर पर कुछ दिनों के लिए रोक दिया जाता है। पर बाढ़ से पुल को कोई नुकसान नहीं हुआ है। 150 साल में इस पुल की कई बार मरम्मत की गई है। पर इसका सुपर स्ट्रक्टचर आज भी बेहतर है।
आसपास कई नए पुल बने- भारतीय रेलवे ने 1997-98 में इस पुल के बगल में ही एक नया रेलवे पुल बनाने की योजना बनी। 2003 में काम शुरू हुआ। पिलर डाल दिए गए पर पर्यावरण और ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के मुद्दे पर 2008 में काम रुक गया। नए पुल के राह में ऐतिहासिक सलीमगढ़ का किला आ रहा था। अब यह विवाद दूर हो गया है। पर जब तक नया पुल नहीं तैयार हो जाता यह पुराना लोहे का पुल अपनी सेवाएं बदस्तूर जारी रखेगा।
- vidyutp@gmail.com

( OLD YAMUNA BRIDGE, DELHI, RAIL ) 

Monday, May 6, 2013

पुराना किला – कई अफसाने हैं दफन

दिल्ली को जानना है तो पुराना किला गए बिना बात अधूरी रह जानी है। पुराना किला के साथ कई पुरानी यादें जुड़ी हैं। लोग तो कहते हैं कि यह पांडव कालीन है। पर किले के साथ मुगलकाल की कई स्मृतियां जुडी है। कहते हैं कि ठीक इसी जगह पर पांडवों ने इंद्रप्रस्थ शहर बसाया था। पर वर्तमान पुराना किला की इमारत को अफगान शासक शेरशाह ने बनवाया था। वास्तव में इसका निर्माण कार्य हुमायूं ने शुरू कराया था।पर  बाद में शेरशाह ने इसका विस्तार कराया। उसने महज 5 साल दिल्ली पर शासन किया। पर शेरशाह को इतिहास में कई बड़े योगदान के लिए याद किया जाता है। पुराना किला तकरीबन एक मील के परिधि में फैला हुआ है। मजे की बात 1914 से पहले तक यहां एक गांव का अस्तित्व हुआ करता था।
पुराना किला में कुल तीन प्रवेश द्वार हैं। एक का नाम हुमायूं दरवाजा  दूसरे का नाम तलाकी दरवाजा है तो तीसरे का नाम बड़ा दरवाजा है। किले के चारों तरफ काफी मोटी सुरक्षा दीवार है। इस दीवार के चारों तरफ गहरी खाई थी। इस मोटी दीवार के अवशेष को आज भी देखा जा सकता है।

हुमायूं ने अपने 1531 से 1540 के शासन काल के दौरान पुराना किला का निर्माण शुरू कराया। उसने नाम दिया था दीनपनाह नगर। साल 1533 में किले का निर्माण शुरू हुआ। पांच साल में किला लगभग बनकर तैयार हो गया। 1540 में दिल्ली पर अधिकार के बाद यह किला शेरशाह के अधिकार में आ गया। पांच साल शेरशाह ने इस किले से पूरे हिंदुस्तान पर हुकुमत चलाई। पर 13 मई 1545 को कालिंजर के युद्ध में शेरशाह की मृत्यु हो गई। अब किला शेरशाह के बेटे सलीम शाह के अधिकार में आ गया। पर 1555 में एक बार फिर हुमायूं ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और किला एक बार फिर हुमायूं के अधीन हो गया।

शेरमंडल के सामने। यहीं हुमायूं की मौत हुई। 
हुमायूं सीढ़ियों से फिसल गया आखिरी हुमायूं की मृत्यु कैसे हुई थी। सीढियों से फिसलकर न। वह अपने पुस्तकालय की सीढ़ियों से फिसल गया था। पढ़ने का बड़ा शौक था उसे। एक दिन पढ़ते हुए शेर मंडल ( पुस्तकालय) की सीढ़ियों से फिसल गया। फिर नहीं उठ सका। शेर मंडल शेरशाह द्वारा निर्मित दो मंजिला अष्टकोणीय भवन है। इसे हुमायूं ने अपना पुस्तकालय बनवा दिया था। हुमायूं को पढ़ने का काफी शौक था। इन्ही किताबों के बीच 27 जनवरी 1556 की एक सुबह वह सीढ़ियों से फिसल गया फिर बच नहीं सका। किले के अंदर कौन्हा मसजिद भी है जो इंडो इस्लामिक वास्तु कला का सुंदर उदाहरण है।    
पुराने किले की मोटी दीवार पर। चाहे हाथी दौड़ा लो। 
लाइट एंड साउंड शो  - पुराना किला में रोज शाम को होने वाला लाइट एंड साउंड शो न सिर्फ पुराना किला बल्कि दिल्ली की कहानी सुनाता है। अतीत के हर मोड की दास्तां रोचक अंदाज में। शो हिंदी और अंग्रेजी में प्रस्तुत किया जाता है। अगर समय है तो इस शो को जरूर देखें। 

कई बार बना पनाहगार – दूसरे विश्व युद्ध के समय पुराना किला को जापान की फौज ने अपनी शरण स्थली बनाया। यहां 3000 फौज ने लंबे समय तक शरण ली। 1947 में देश आजाद होने पर पाकिस्तान से आए हिंदु परिवारों ने पुराने किले में शरण ली। हजारों परिवार यहां लंबे समय तक रहे।

भारतीय पुरात्तव विभाग द्वारा संरक्षित पुराना किला अब दिल्ली का प्रमुख पर्यटक स्थल है। किले में प्रवेश के लिए 15 रुपये का टिकट है। लाइट एंड साउंड शो का टिकट अलग से है। किले के बाहर सुंदर तालाब है जिसमें पैडल बोटिंग का आनंद उठाया जा सकता है। किले के अंदर कई जगह सुंदर फूलों की क्यारियां हैं। दिन भर पुराना किला दिल्ली के प्रेमी युगलों से भी गुलजार रहता है। अगर आप पूरा किला घूमना चाहते हैं तो तीन चार घंटे का वक्त जरूर निकालिए। निकटतम मेट्रो या रेलवे स्टेशन प्रगति मैदान है।
-vidyutp@gmail.com

Saturday, May 4, 2013

दिल्ली में जब पराठे और भुर्जी ने हमें लूट लिया


वह 1995 का साल था। अल्ल सुबह मैं वाराणसी से चलकर सूटकेस और बैग लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरा। ये पता लगाना कठिन था कि मेरी अपेक्षित बस पहाड़गंज इलाके से मिलेगी या फिर अजमेरी गेट साइड से। लिहाजा मैं अजमेरी गेट की तरफ ही बाहर आ गया। लंबी यात्रा करके आया था सो भूख लगी थी। 

एक फुटपाथ के होटल को सस्ता समझकर उसमें खाने बैठ गया। दो पराठे आर्डर किए। पूछा तो बताया कि एक पराठा दो रुपये का है। पराठे लेने के बाद दुकानदार ने पूछा कि पराठे के साथ भुर्जी भी दे दूं। मुझे लगा भुर्जी मतलब भुजिया है। मैंने कहा दे दो। दो पराठे और भुर्जी खाने के बाद बिल आया महज 44 रूपये। जब मैंने दुकानदार से पूछा तो उसने कहा 4 रूपये तो पराठे के और 40 रुपये भुर्जी के। दुकानदार ने पराठे के साथ जो भुर्जी डाल थी वह 40 रुपये की हो सकती है इसका मुझे अंदाजा नहीं था। तब जीवन में शिक्षा मिली बिना होटल वाले साफ साफ मीनू पूछे दिल्ली में कहीं कुछ भी खाना मत। क्या पता खाने के बाद वहीं प्लेटें साफ करने की भी नौबत आ जाए।

खैर, घंटे भर कई लोगों से पूछने के बाद अपनी सही बस से टकरा सका। चाणक्यापुरी में दूतावासों की आलीशान अट्टालिकाओं के बीच किसी तरह अपने यूथ हॉस्टल पहुंच सका। वहां अच्छा व्यवहार और रहने की सुविधा दोनो मिल गई। दो दिन के भोजन का खर्च सिर्फ सुबह के नास्ते में गवां चुकने के बाद मैंने दिन भर उपवास करने की निश्चय किया। क्या हुआ गांधी जी भी अक्सर उपवास किया करते थे।
मेरा दिल्ली विवि दक्षिण परिसर के हिंदी विभाग में पत्रकारिता पाठ्यक्रम में नामांकन के लिए इंटरव्यू है। धौलाकुआं पहुंच कर दिल्ली विश्वविद्यालय दक्षिणी परिसर का पता पूछता रहा लेकिन कोई बता नहीं पा रहा था। वहां के दुकानदारों को भी अपने पास के महत्वपूर्ण संस्थान के बारे में पता नहीं था। खैर किसी तरह विश्वविद्यालय पहुंच पाया। वहां हिंदी विभाग के लोगों ने नितांत आत्मीय व्यवहार किया।

इंटरव्यू अच्छा रहा। अब मैंने दिल्ली में अपने कुछ आत्मीय मित्रों से मिलने की सोची। दिल्ली की रेड लाइन बस का सफर तो अविस्मरणीय होता है। एक बस में चलते हुए मैं जैसे ही लालकिले के सामने उतरा, मेरी जेब से मेरा बटुआ गायब था। कुल सात सौ रुपये थे मेरे पास सफर के लिए कुल जमा पूंजी। अब मात्र एक सिक्का बच रहा था जेब में। अभी तीन दिन और रहना और वापसी का टिकट भी बनवाना था। हमारे बुझे मन और बुझे चेहरे का अंदाजा आप बखूबी लगा सकते हैं।

दिल्ली इससे पहले भी तीन बार आ चुका था लेकिन पहली बार चांदनी चौक की शाम उदास लगी। सारे मुस्कुराते चेहरे मजाक उड़ाते लगे। अतीव खूबसूरत, मांसल, कोमलांगी नव यौवनाएं धक्का देती निकल गईं। कोई और वक्त होता तो उस खुशबू को थोड़ी देर याद करते। परंतु अभी वे सब विष कन्याएं प्रतीत हो रही थीं। मैं रुआंसा हो रहा था। मां-पिताजी की याद आई। लोकप्रिय शायर का शेर याद आया
मैं रोया परदेस में,  भींगा मां का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार
चांदनी चौक के फुटपाथ पर टहलते हुए अचानक भारतीय साथी संगठन के हमारे साथी सतीश भारती की याद आई। याद आया कि वे चांदनी चौक में ही रहते हैं। संयोग से दिमाग पर जोर डाला तो संकट काल में उनका पता याद आ गया। 2590 गली पीपल, पानदरीबा, चांदनी चौक। बस मैं चलता हुआ उनके घर के पास पहुंच गया। ये महज इत्तिफाक था कि हमेशा अति व्यस्त और भ्रमणशील जीवन जीने वाले सतीश भाई घर में ही मिल गए। शायद हमारी मदद के लिए उसी दिन वे बाहर से दिल्ली लौटे थे। मेरी रामकहानी सुनकर उन्होने तसल्ली दिलाने की कोशिश की और मेरी पर्याप्त आर्थिक सहायता की। वहां से निकल कर पुरानी दिल्ली स्टेशन जाकर वाराणसी के लिए वापसी की टिकट बनवाया। लेकिन दिल्ली ये दिल्लगी तो कभी नहीं भुलाई जा सकेगी।

 - विद्युत प्रकाश मौर्य 
( DELHI, CHANDNI CHAUK, OLD DELHI RLY STN  )

नई दिल्ली के चाणक्यापुरी स्थित इंटरनेशनल यूथ हॉस्टल