Monday, April 29, 2013

दिल्ली में जब पराठे और भुर्जी ने हमें लूट लिया


वह 1995 का साल था। अल्ल सुबह मैं वाराणसी से चलकर सूटकेस और बैग लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरा। ये पता लगाना कठिन था कि मेरी अपेक्षित बस पहाड़गंज इलाके से मिलेगी या फिर अजमेरी गेट साइड से। लिहाजा मैं अजमेरी गेट की तरफ ही बाहर आ गया। लंबी यात्रा करके आया था सो भूख लगी थी। 

एक फुटपाथ के होटल को सस्ता समझकर उसमें खाने बैठ गया। दो पराठे आर्डर किए। पूछा तो बताया कि एक पराठा दो रुपये का है। पराठे लेने के बाद दुकानदार ने पूछा कि पराठे के साथ भुर्जी भी दे दूं। मुझे लगा भुर्जी मतलब भुजिया है। मैंने कहा दे दो। दो पराठे और भुर्जी खाने के बाद बिल आया महज 44 रूपये। जब मैंने दुकानदार से पूछा तो उसने कहा 4 रूपये तो पराठे के और 40 रुपये भुर्जी के। दुकानदार ने पराठे के साथ जो भुर्जी डाल थी वह 40 रुपये की हो सकती है इसका मुझे अंदाजा नहीं था। तब जीवन में शिक्षा मिली बिना होटल वाले साफ साफ मीनू पूछे दिल्ली में कहीं कुछ भी खाना मत। क्या पता खाने के बाद वहीं प्लेटें साफ करने की भी नौबत आ जाए।

खैर, घंटे भर कई लोगों से पूछने के बाद अपनी सही बस से टकरा सका। चाणक्यापुरी में दूतावासों की आलीशान अट्टालिकाओं के बीच किसी तरह अपने यूथ हॉस्टल पहुंच सका। वहां अच्छा व्यवहार और रहने की सुविधा दोनो मिल गई। दो दिन के भोजन का खर्च सिर्फ सुबह के नास्ते में गवां चुकने के बाद मैंने दिन भर उपवास करने की निश्चय किया। क्या हुआ गांधी जी भी अक्सर उपवास किया करते थे।
मेरा दिल्ली विवि दक्षिण परिसर के हिंदी विभाग में पत्रकारिता पाठ्यक्रम में नामांकन के लिए इंटरव्यू है। धौलाकुआं पहुंच कर दिल्ली विश्वविद्यालय दक्षिणी परिसर का पता पूछता रहा लेकिन कोई बता नहीं पा रहा था। वहां के दुकानदारों को भी अपने पास के महत्वपूर्ण संस्थान के बारे में पता नहीं था। खैर किसी तरह विश्वविद्यालय पहुंच पाया। वहां हिंदी विभाग के लोगों ने नितांत आत्मीय व्यवहार किया।

इंटरव्यू अच्छा रहा। अब मैंने दिल्ली में अपने कुछ आत्मीय मित्रों से मिलने की सोची। दिल्ली की रेड लाइन बस का सफर तो अविस्मरणीय होता है। एक बस में चलते हुए मैं जैसे ही लालकिले के सामने उतरा, मेरी जेब से मेरा बटुआ गायब था। कुल सात सौ रुपये थे मेरे पास सफर के लिए कुल जमा पूंजी। अब मात्र एक सिक्का बच रहा था जेब में। अभी तीन दिन और रहना और वापसी का टिकट भी बनवाना था। हमारे बुझे मन और बुझे चेहरे का अंदाजा आप बखूबी लगा सकते हैं।

दिल्ली इससे पहले भी तीन बार आ चुका था लेकिन पहली बार चांदनी चौक की शाम उदास लगी। सारे मुस्कुराते चेहरे मजाक उड़ाते लगे। अतीव खूबसूरत, मांसल, कोमलांगी नव यौवनाएं धक्का देती निकल गईं। कोई और वक्त होता तो उस खुशबू को थोड़ी देर याद करते। परंतु अभी वे सब विष कन्याएं प्रतीत हो रही थीं। मैं रुआंसा हो रहा था। मां-पिताजी की याद आई। लोकप्रिय शायर का शेर याद आया
मैं रोया परदेस में,  भींगा मां का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार
चांदनी चौक के फुटपाथ पर टहलते हुए अचानक भारतीय साथी संगठन के हमारे साथी सतीश भारती की याद आई। याद आया कि वे चांदनी चौक में ही रहते हैं। संयोग से दिमाग पर जोर डाला तो संकट काल में उनका पता याद आ गया। 2590 गली पीपल, पानदरीबा, चांदनी चौक। बस मैं चलता हुआ उनके घर के पास पहुंच गया। ये महज इत्तिफाक था कि हमेशा अति व्यस्त और भ्रमणशील जीवन जीने वाले सतीश भाई घर में ही मिल गए। शायद हमारी मदद के लिए उसी दिन वे बाहर से दिल्ली लौटे थे। मेरी रामकहानी सुनकर उन्होने तसल्ली दिलाने की कोशिश की और मेरी पर्याप्त आर्थिक सहायता की। वहां से निकल कर पुरानी दिल्ली स्टेशन जाकर वाराणसी के लिए वापसी की टिकट बनवाया। लेकिन दिल्ली ये दिल्लगी तो कभी नहीं भुलाई जा सकेगी।

 - विद्युत प्रकाश मौर्य 
( DELHI, CHANDNI CHAUK, OLD DELHI RLY STN  )

नई दिल्ली के चाणक्यापुरी स्थित इंटरनेशनल यूथ हॉस्टल

2 comments:

  1. सर जी ।।मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।।
    पहली बार दिल्ली आने पर बहुत कुछ सिख्ने को मिला।।।आपने जो अपना अनुभव बताया उसका शुक्रिया।।।

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