Monday, April 29, 2013

दिल्ली में जब पराठे और भुर्जी ने हमें लूट लिया


वह 1995 का साल था। अल्ल सुबह मैं वाराणसी से चलकर सूटकेस और बैग लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरा। ये पता लगाना कठिन था कि मेरी अपेक्षित बस पहाड़गंज इलाके से मिलेगी या फिर अजमेरी गेट साइड से। लिहाजा मैं अजमेरी गेट की तरफ ही बाहर आ गया। लंबी यात्रा करके आया था सो भूख लगी थी। 

एक फुटपाथ के होटल को सस्ता समझकर उसमें खाने बैठ गया। दो पराठे आर्डर किए। पूछा तो बताया कि एक पराठा दो रुपये का है। पराठे लेने के बाद दुकानदार ने पूछा कि पराठे के साथ भुर्जी भी दे दूं। मुझे लगा भुर्जी मतलब भुजिया है। मैंने कहा दे दो। दो पराठे और भुर्जी खाने के बाद बिल आया महज 44 रूपये। जब मैंने दुकानदार से पूछा तो उसने कहा 4 रूपये तो पराठे के और 40 रुपये भुर्जी के। दुकानदार ने पराठे के साथ जो भुर्जी डाल थी वह 40 रुपये की हो सकती है इसका मुझे अंदाजा नहीं था। तब जीवन में शिक्षा मिली बिना होटल वाले साफ साफ मीनू पूछे दिल्ली में कहीं कुछ भी खाना मत। क्या पता खाने के बाद वहीं प्लेटें साफ करने की भी नौबत आ जाए।

खैर, घंटे भर कई लोगों से पूछने के बाद अपनी सही बस से टकरा सका। चाणक्यापुरी में दूतावासों की आलीशान अट्टालिकाओं के बीच किसी तरह अपने यूथ हॉस्टल पहुंच सका। वहां अच्छा व्यवहार और रहने की सुविधा दोनो मिल गई। दो दिन के भोजन का खर्च सिर्फ सुबह के नास्ते में गवां चुकने के बाद मैंने दिन भर उपवास करने की निश्चय किया। क्या हुआ गांधी जी भी अक्सर उपवास किया करते थे।
मेरा दिल्ली विवि दक्षिण परिसर के हिंदी विभाग में पत्रकारिता पाठ्यक्रम में नामांकन के लिए इंटरव्यू है। धौलाकुआं पहुंच कर दिल्ली विश्वविद्यालय दक्षिणी परिसर का पता पूछता रहा लेकिन कोई बता नहीं पा रहा था। वहां के दुकानदारों को भी अपने पास के महत्वपूर्ण संस्थान के बारे में पता नहीं था। खैर किसी तरह विश्वविद्यालय पहुंच पाया। वहां हिंदी विभाग के लोगों ने नितांत आत्मीय व्यवहार किया।

इंटरव्यू अच्छा रहा। अब मैंने दिल्ली में अपने कुछ आत्मीय मित्रों से मिलने की सोची। दिल्ली की रेड लाइन बस का सफर तो अविस्मरणीय होता है। एक बस में चलते हुए मैं जैसे ही लालकिले के सामने उतरा, मेरी जेब से मेरा बटुआ गायब था। कुल सात सौ रुपये थे मेरे पास सफर के लिए कुल जमा पूंजी। अब मात्र एक सिक्का बच रहा था जेब में। अभी तीन दिन और रहना और वापसी का टिकट भी बनवाना था। हमारे बुझे मन और बुझे चेहरे का अंदाजा आप बखूबी लगा सकते हैं।

दिल्ली इससे पहले भी तीन बार आ चुका था लेकिन पहली बार चांदनी चौक की शाम उदास लगी। सारे मुस्कुराते चेहरे मजाक उड़ाते लगे। अतीव खूबसूरत, मांसल, कोमलांगी नव यौवनाएं धक्का देती निकल गईं। कोई और वक्त होता तो उस खुशबू को थोड़ी देर याद करते। परंतु अभी वे सब विष कन्याएं प्रतीत हो रही थीं। मैं रुआंसा हो रहा था। मां-पिताजी की याद आई। लोकप्रिय शायर का शेर याद आया
मैं रोया परदेस में,  भींगा मां का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार
चांदनी चौक के फुटपाथ पर टहलते हुए अचानक भारतीय साथी संगठन के हमारे साथी सतीश भारती की याद आई। याद आया कि वे चांदनी चौक में ही रहते हैं। संयोग से दिमाग पर जोर डाला तो संकट काल में उनका पता याद आ गया। 2590 गली पीपल, पानदरीबा, चांदनी चौक। बस मैं चलता हुआ उनके घर के पास पहुंच गया। ये महज इत्तिफाक था कि हमेशा अति व्यस्त और भ्रमणशील जीवन जीने वाले सतीश भाई घर में ही मिल गए। शायद हमारी मदद के लिए उसी दिन वे बाहर से दिल्ली लौटे थे। मेरी रामकहानी सुनकर उन्होने तसल्ली दिलाने की कोशिश की और मेरी पर्याप्त आर्थिक सहायता की। वहां से निकल कर पुरानी दिल्ली स्टेशन जाकर वाराणसी के लिए वापसी की टिकट बनवाया। लेकिन दिल्ली ये दिल्लगी तो कभी नहीं भुलाई जा सकेगी।

 - विद्युत प्रकाश मौर्य 
( DELHI, CHANDNI CHAUK, OLD DELHI RLY STN  )

नई दिल्ली के चाणक्यापुरी स्थित इंटरनेशनल यूथ हॉस्टल

Saturday, April 27, 2013

देश की समृद्ध विरासत देखें –नेशनल म्यूजियम में

नई दिल्ली के जनपथ पर स्थित नेशनल म्यूजियम में भारत का दमकता हुआ इतिहास देखा जा सकता है। आप पूरा देश नहीं घूम सकते तो इस संग्रहालय के नायाब संग्रह को जरूर देखने पहुंचे। देश की अनमोल विरात को देखना एक सिनेमा के टिकट से भी सस्ता  है। अगर आप पूरे संग्रहालय को विस्तार से देखना चाहते हैं तो पांच से छह घंटे लग सकते हैं।

दिल्ली के जनपथ पर स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय देश के इतिहास और संस्कृति के समझने के लिए बेहतरीन जगह है। तीन मंजिल वाले इस संग्रहालय को पूरी तरह देखने की बात करें तो दिन भर का समय लग जाता है।

दो लाख से ज्यादा संग्रह - नेशनल म्यूजियम की शुरुआत 15 अगस्त 1949 को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में हुई थी। यहां की कलाकृतियों को सबसे पहले बर्लिंगटन हाउस लंदन में प्रदर्शित किया गया था। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने वर्तमान स्थल पर विशाल संग्रहालय बनाए जाने की आधारशिला 12 मई 1955 को रखी। पांच साल बाद जनपथ पर 18 सितंबर 1960 को यह संग्रहालय जन समान्य के लिए खोला गया। आज की तारीख में इस संग्रहालय में कुल दो लाख से ज्यादा संग्रह हैं।


पांच हजार साल का इतिहास - यहां पर देश के पांच हजार साल के इतिहास को देख और समझ सकते हैं। संग्रहालय परिसर में प्रवेश करते ही आपका साक्षात्कार देश की समृद्ध विरासत से होता है। संग्रहालय भवन के मुख्य द्वार के सामने सम्राट अशोक के गिरनार अभिलेख की प्रतिकृति देखी जा सकती है। इस अभिलेख में सम्राट अशोक ने बिना किसी भेदभाव के प्रजा के कल्याण की बात कही है। 

यहां पर सम्राट अशोक की राजाज्ञाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। आइए अब टिकट लेकर अंदर की ओर चलते हैं। आप चाहें तो गाइडेड टूर का भी लाभ उठा सकते हैं। 


सिंधु घाटी सभ्यता का संग्रह - संग्रहालय का भवन तीन मंजिला है। प्रवेश करने वाले दर्शक आधार तल से घूमना आरंभ करते हैं। तमाम प्राचीन मूर्तियों से होकर गुजरते हुए सबसे पहले आप हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की वीथिका में पहुंचते हैं। यहां पर हड़प्पा, मोहनजोदाड़ो के अलावा हडप्पा कालीन दूसरे नगरों की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं का संग्रह है। खासतौर पर मिट्टी के बने आभूषण और अन्य उपयोग की जाने वाली वस्तुएं। यहां लोथल, कालीबंगा, धौलावीरा जैसे हड़प्पाकालीन नगरों की भी जानकारी देखी जा सकती है। आपको पता है यहां पर सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी कुल 3800 कलाकृतियों का संग्रह है। 
दूसरी सदी में गांधार से प्राप्त बुद्ध की प्रतिमा 


बौद्ध कला वीथिका – नेशनल म्यूजिम का प्रमुख आकर्षण बौद्ध कला वीथिका है। यहां पर पिपिहरवा जिला सिद्धार्थनगर उत्तर प्रदेश से प्राप्त पांचवी और चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व के संग्रह को प्रदर्शित किया गया है। वैसे पूरे संग्रहालय में आप अनेक बुद्ध मूर्तियां देख सकते हैं तो अलग अलग स्थलों से प्राप्त की गई हैं। दुनिया के अलग अलग देशों से प्राप्त बुद्ध मूर्तियों को भी यहां पर प्रदर्शित किया गया है।

17 हजार चित्रों में विरासत - बौद्ध कला वीथिका से आगे बढ़ने के बाद आपको प्राचीन काल से लेकर मुगलकाल तक का इतिहास मूर्तियों में नजर आएगा। संग्रहालय में पेटिंग, आभूषणों का भी विशाल संग्रह है। चित्रकला की बात करें तो यहां पर 17 हजार से ज्यादा चित्रों का संग्रह है। इसमें मुगल, दकक्न, पहाड़ी, राजस्थानी शैली के चित्र हैं।




लिपियों का इतिहास, सिक्कों का संग्रह - यहां पर आप भारतीय लिपियों के इतिहास को भी देख और समझ सकते हैं। पहली और दूसरी मंजिल पर आप अलग अलग समय से वस्त्रों का संग्रह, अलग अलग राजाओं द्वारा चलाए गए सिक्कों का संग्रह देख सकते हैं। संग्रहालय में नौसेना के इतिहास की भी एक गैलरी है, यह हमारी नौ सेना के बारे में जानने के लिए बेहतरीन जगह हो सकती है। 

खुलने का समय – यह संग्रहालय सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। हर सोमवार और राष्ट्रीय छुट्टियों के दिन यह बंद रहता है। प्रवेश टिकट 20 रुपये का है।
तंजौर पेंटिंग का एक नमून देखिए..

दर्शकों को सुविधाएं -  अगर आपको आडियो गाइड की सेवा चाहिए तो वह शुल्क देकर उपलब्ध है। वैसे आप संग्रहालय की तमाम दीर्घाओं को बिना गाइड के भी देख सकते हैं। अगर आपके पास बड़ा बैग है तो क्लाक रूम की सुविधा भी यहां पर उपलब्ध है। संग्रहालय परिसर में पेयजल, शौचालय आदि का इंतजाम है। यहां एक कैंटीन भी है, जहां आपको भोजन और नास्ता मिल सकता है।
मौर्य काल में भी हुआ करती थी नौ सेना। 

कैसे पहुंचे-  नेशनल म्यूजियम दिल्ली के कनॉट प्लेस से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दिल्ली पर्यटन की हो हो बस सेवा भी यहां पर रुकती है। यहां पहुंचने के लिए निकटतम मेट्रो स्टेशन केंद्रीय सचिवालय या जनपथ हो सकता है। डीटीसी की तमाम बसे नेशनल म्यूजियम से होकर गुजरती हैं। 
 
: विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

( DELHI, NATIONAL MUSEUM, JANPATH )

Thursday, April 25, 2013

दिल्ली का गुरुद्वारा शीशगंज – शहादत की याद


दिल्ली का गुरुद्वारा शीशगंज भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह गुरुद्वारा सिख धर्म के नौंवे गुरु गुरु तेग बहादुर की शहादत से जुड़ा है। यह सिख धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र स्थान है । देश भर से सिख समुदाय के लोग यहां हर रोज पहुंचते हैं। 
 दिल्ली में लालकिला से जब चांदनी चौक की सड़क पर आगे बढ़ते हैं तो बायीं तरफ गुरुद्वारा शीशगंज नजर आता है। यह फव्वारा चौक के बिल्कुल पास ही स्थित है। 1783 में हुआ निर्माण -
यह गुरुद्वारा 1783 में बघेल सिंह धालीवाल द्वारा नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर के शहादत स्थल की याद में बनाया गया था। चांदनी चौक के अति व्यस्त इलाके में इस गुरुद्वारे की शानदार इमारत दूर से दमकती हुई नजर आती है।

हिंदू धर्म के रक्षक गुरु तेगबहादुर
वह दौर था जब मुगल शासक औरंगजेब ने जबरदस्त आतंक देश भर में फैला हुआ था। बादशाह के आदेश पर सभी कश्मीरी पंडितों को जबरदस्ती इस्लाम में परिवर्तित किये जाने का हुकुम जारी किया गया था। उस समय सिखों के नौवें गुरु 'गुरु तेग बहादुर जी' अपने परिवार के साथ पंजाब के अनंदपुर साहिब में रहते थे। इसी दौरान कश्मीरी पंडित गुरु जी के दरबार में पहुंचे और उनसे हिन्दुओं को इस परेशानी से बाहर निकलने के लिए विनती करने लगे। तब गुरु जी के पुत्र गोबिंद राय (गुरु गोबिंद सिंह जी) जो कि उस समय मात्र दस वर्ष के थे, ने अपने पिता से कहा, 'यह समय किसी महान शख्स की शहादत मांग रही है। पुत्र की समझदारी भरी बात सुन गुरु जी अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने साथ पांच संगियों को लेकर दिल्ली के लिए रवाना हुए।

गुरु तेगबहादुर की शहादत
दिल्ली आने पर जब गुरु जी ने मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर इस्लाम स्वीकार करने से इनकार कर दिया। जब उन्होंने औरंगजेब के आगे झुकने से इनकार कर दिया तो तो 11 नवंबर 1675 को उन्हें मौत की सजा दी गई।
एक जल्लाद जलाल-उद-दीन ने बादशाह के आदेश पर उनका सिर कलम कर दिया। जिस जगह पर गुरु जी की शहादत हुई वहां एक बरगद का पेड़ हुआ करता था। वहां दिल्ली की भारी भीड़ जमा थी। हजारों लोगों के सामने गुरु तेग बदादुर की शहादत हुई। यहां पर गुरु जी के शिष्य भाई मतिदास ने भी शहादत दी। उन्हें जिंदा आरे चिरवा दिया गया था। दूसरे शिष्य भाई दयाला जी और सतीदास जी ने भी यहीं पर शहादत दी।  

हिंद की चादर
वे हिंदुस्तान और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए शहीद हो गए थे। गुरु तेग बहादुर की इस महान शहादत के कारण उन्हें हिंद की चादर की उपाधि दी गई। गुरु जी ने शहीद होने से पहले जिस कुएं के पानी स्नान किया था, वह कुआं अब भी सुरक्षित है। गुरुद्वारा शीशगंज में जिस स्थान पर आजकल लंगर है वहां पर कभी मुगल शासकों की जेल हुआ करती थी।  

गुरुद्वारा रकाबगंज में हुआ अंतिम संस्कार
गुरुजी की शहादत के बाद भाई लखी शाह गुरुजी के धड़ को रूई के ढेर में छिपाकर दिल्ली की बस्ती रायसीना ले गए और वहां पर गुरुजी का अंतिम संस्कार किया। उस स्थल पर गुरुद्वारा रकाबगंज बना हुआ है। यह स्थल केंद्रीय सचिवालय बस स्टैंड के पास है। 

गुरुद्वारा शीशगंज में सालों भर दिन भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। यहां पर अनवरत लंगर भी चलता रहता है। श्रद्धालुओं के लिए लगातार जल सेवा चलती रहती है। हजारों की संख्या में लोग गुरुद्वारा में कार सेवा में लगे रहते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
(GURUDWARA SISGANJ, RAKABGANJ, SIKH TEMPLE, DELHI ) 


Tuesday, April 23, 2013

शहजादी रोशनआरा ने बनवाया था 55 एकड़ का खूबसूरत बाग


दिल्ली के पुल बंगश मेट्रो स्टेशन के पास पहुंच गया हूं। यहां से रोशन आरा पार्क जाने की सोच रहा हूं। बर्फखाना चौक से बैटरी रिक्शा वाले शक्तिनगर की तरफ जा रहे हैं। उसमें बैठ जाता हूं। देख रहा हूं सड़क का नाम रोशन आरा रोड ही है। थोड़ी देर बाद रोशन आरा पार्क की बाउंड्री आ गई है। मैं वहीं रिक्शा से उतर गया। सामने रोशन आरा पार्क है।

मैं विशाल पार्क में दाखिल होकर घूमने लगा। दोपहर में कई जगह बच्चे खेल रहे हैं। कहीं बुजुर्गों की महफिल जमी है। इस बीच पार्क के एक हिस्से पर नजर पड़ी। यहां लिखा है सिर्फ महिलाओं के लिए। मतलब पार्क के इस हिस्से में पुरुषों का जाना प्रतिबंधित है।


शाहजहानाबाद से दूर एक बाग
लालकिले की गहमागहमी से दूर रहने के लिए मुगल बादशाह शाहजहां और मुमताज की बेटी रोशनआरा ने सब्जीमंडी के पास रोशन आरा बाग बनवाया था। शहजादी रोशनआरा यहां वह दासियों संग समय गुजारती थी। साल 1650 के आसपास शाहजहांनाबाद की चारदीवारी से तीन किलोमीटर दूर उन्होंने अपने लिए खूबसूरत बाग बनवाया। इसकी जमीन उन्हें बादशाह पिता से तोहफे के तौर पर मिली थी।

कोई फूल मुरझाता नहीं था
कुल 55 एकड़ में फैले रोशनआरा बाग के हर चप्पे पर शहजादी की नजर होती थी। बाग का रखरखाव कुछ ऐसा था कि क्या मजाल की तब कोई फूल यहां मुरझाया हुआ मिले। बाग में प्रवेश के लिए दो दरवाजे बनाए गए हैं। इनमें से एक सामान्य जबकि दूसरा मुगलकालीन वास्तु कला का बेहतरीन मिसाल है। दरवाजे पर खूबसूरत नक्काशी हैजो यहां आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती है। बाग में हरे-भरे बगीचा और बरादरी है। आजकल रोशनआरा बाग की चारदीवारी जगह-जगह टूट गई है।

रोशन आरा का मकबरा
सितंबर 1671 में 54 साल की उम्र में रोशनआरा का निधन हो गया। उसने विवाह नहीं किया था। मुगलिया रीति रिवाज के साथ उसका जनाजा निकला और बाग में बरादरी के बीचो-बीच रोशनआरा बेगम को दफन किया गया। तो रोशन आरा का मकबरा भी यहीं बनवाया गया है।

एक सुंदर झील भी थी
रोशन आरा बाग के बीच में एक सुंदर झील भी बनवाई गई थी। ग्राउंड वॉटर के अत्यधिक दोहन की वजह से दिल्ली के शक्ति नगर इलाके में स्थित रोशन आरा बाग की झील सूख गई है। मुगलकालीन रोशन आरा बाग की झील को रीस्टोर करने का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में भी पहुंचा था।

 विद्वान और कूटनीतिक महिला
रोशनारा बेगम (सितंबर 1617 - 11 सितंबर 1671)  मुगल बादशाह शाहजहां मुमताज महल की दूसरी बेटी थी। वह प्रतिभाशाली शायर भी थीं। वह अपने समय की अत्यंत विद्वान और कूटनीतिक महिलाओं में शुमार थी। जिस समय शाहजहां के पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध चल रहा थारोशन आरा ने औरंगजेब का पक्ष लिया था। वह राजधानी में होने वाली समस्त गतिविधियों की सूचना गुप्त रूप से औरंगजेब को भेजती रहती थी। 

रोशनआरा क्लब और बीसीसीआई
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की स्थापना बीसीसीआई की पहली बैठक राजधानी के रोशनआरा क्लब में 1927 ही हुई थी। उसकी मेजबानी पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह ने की थी। ये रोशनआरा क्लब मुगल राजकुमारी रोशन आरा बेगम के बाग का ही हिस्सा है lइस बाग मे पहले तो अंग्रेज गपशप मारने के लिए ही आते थे।उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अंग्रेजों द्वारा क्रिकेट रोशनआरा क्लब की स्थापना की गई बाद मे यहां भारतीय लोग भी आने लगे। यहीं भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की स्थापना हुई। रोशनआरा क्लब करीब 30 एकड़ में फैला है। यहां पर क्रिकेट मैदान भी है।

कैसे पहुंचे - रोशनआरा बाग शक्ति नगर इलाके से सटा हुआ है। यह पुल बंगश मेट्रो स्टेशन के करीब है। मेट्रो से उतर कर बैटरी रिक्शा से यहां पहुंचा जा सकता है। इसके पास से गुजरती हुई सड़क का नाम रोशनआरा रोड है। आप दिल्ली यूनिवर्सिटी के नार्थ कैंपस की तरफ से भी यहां आसानी से पहुंच सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-        (ROSHANARA BAG, ROSHAN ARA CLUB, CRICKET, BCCI )




Sunday, April 21, 2013

मुगल सल्तनत की कहानी सुनाता लालकिला


लालकिला यानी सदियों से इतिहास के पन्नों में कई तरह के उतार चढाव का साक्षी। यमुना नदी के किनारे बना ये किला तभी दिखाई देता है जब आपकी ट्रेन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन में प्रवेश करने वाली होती है। अगर कोई दिल्ली घूमने आता है तो वह लाल किला जरूर जाता है। दिल्ली का मतलब ही लाल किला है। हमारी आजादी का प्रतीक। तभी तो देश आजाद होने पर लाल किले पर तिरंगा फहराया गया था। आज भी हर 15 अगस्त को लालकिले के प्राचीर से प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं। साल 2003 तक लालकिला भारतीय थल सेना के अधीन था पर अब यह संस्कृति मंत्रालय के अधीन है। लालकिला अब यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर दर्जा प्राप्त साइट है।  


शाहजहां की अनुपम कृति - 1638 में शाहजहां ने आगरा से दिल्ली राजधानी स्थानांतरित की थी, उससे पहले लालकिला का निर्माण कराया गया था। 1639 में लालकिला का निर्माण शुरू हुआ और अगले नौ साल में बनकर तैयार हुआ। निर्माण में धौलपुर के पास बारी से लाए लाल पत्थरों का इस्तेमाल किया गया। महलों के अंदर संगमरमर का बहुत प्रयोग किया गया है। लालकिला 2.4 किलोमीटर की चारदीवारी में बना हुआ है। किले का निर्माण 254.67 एकड़ क्षेत्रफल में हुआ है।
  
लालकिला परिसर में स्थित खास महल 
लालकिला के दो प्रवेश द्वार हैं एक दिल्ली गेट और दूसरा लाहौर गेट पर आप प्रवेश लाहौर गेट से करते हैं। अंदर जाने पर आपको मुगल बादशाहों की शाही जीवन शैली के बारे में पता चलता है। लालकिला घूमने के लिए आपको किसी गाइड की जरूरत नहीं है। यहां पर आडियो में नैरोकास्टिंग गाइड किराये पर मिलती है। यह हिंदी, अंग्रेजी और कोरियन भाषा में उपलब्ध है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां कोरियाई सैलानी बड़ी संख्या में आते हैं।  

लालकिले के अंदर प्रवेश करने पर मेहराबदार तोरणपथजिसे छाता चौक कहते हैं,  से होकर गुजरने के बाद पश्‍चिमी द्वार से नौबत-या नक्कार खाना पहुंच जाते है। यहां दिन में पांच बार संगीत बजता था और जो दीवाने-ए-आम में प्रवेश के लिए प्रवेश द्वार था। इसकी ऊपरी मंजिल में आजकल इंडियन वार मेमोरियल म्यूजियम है।  सामने विशाल दीवने-ए-आम (आम जनता के लिए हाल) एक आयताकार हॉल है जिसके तीन लंबे गलियारे हैं।


लालकिला के हयातबख्श बाग में स्थित जफर महल। 


लालकिला के अंदर आप दीवाने-ए-खास (खास लोगों के लिए), तस्‍बीह खाना, (व्यक्तिगत प्रार्थनाओं के लिए कक्ष) ,  हमाम (स्नानघर)  देख सकते हैं। हमाम के पश्चिम में मोती मस्जिद है जिसे बाद में औरंगजेब (1658-1707 ) द्वारा बनवाया गया था। मस्जिद के उत्तर में स्थित है हयात बख्श बाग (जीवन देने वाला बाग) हयात-बख्श-बाग के मध्य में स्थित तालाब के मध्य भाग में लाल पत्थर का मंडप है जिसे जफर महल कहते हैं और इसे 1842 में बहादुरशाह -2 ने बनवाया गया था। 

मीना बाजार - आप पूरा देश घूम कर लौटे हैं तो भी लालकिले को देखना पूरे देश को देखने जैसा है। लाल किला के अंदर एक छोटा सा मीनाबाजार है। यहां देश के कोने कोने की बनी चीजें मिलती हैं। कीमतें वाजिब हैं, यहां से आप यादगारी के तौर पर खरीददारी कर सकते हैं।   

लालकिले के बगल में सलीमगढ़ का किला भी है जिसे शेरशाह के बेटे शहजादा सलीम ने बनवाया था। लालकिला और किला सलीमगढ़ कभी आजादी के दीवानों के लिए जेल खाना भी बने थे। पर अब ये हमारी आजादी के प्रतीक चिन्ह हैं।  

लालकिला में ब्रिटिशकालीन  टी हाउस – पूरा लालकिला घूमते हुए जब आप मोती मसजिद हयातबख्श बाग को पार करके अंत में पहुंचते हैं तो आता है टी हाउस। इसका निर्माण लालकिला के बहुत बाद में हुआ है। वास्तव में ये टी हाउस ब्रिटिश कालीन है। ब्रिटिश सरकार के उच्चाधिकारी यहां बैठकर चाय की चुस्की लिया करते थे।


लालकिला परिसर स्थित टी हाउस 
 मौलवी जफर हुसैन अपनी पुस्तक मोनुमेंट्स ऑफ दिल्ली में इस टी हाउस की चर्चा करते हैं। टी हाउस से पहले यहां राजपरिवार के खास लोगों का निवास हुआ करता था। हालांकि आजकल यहां आपको चाय नहीं मिलेगी। पर यहां पहुंचकर आप लालकिले के हयातबक्श बाग की हरियाली का नजारा कर सकते हैं।

लाइट एंड साउंड शो - हर शाम को सात बजे के बाद से लालकिला में लाइट एंड साउंड शो होता है जिसमें इतिहास को ध्वनि एवं प्रकाश के माध्यम से सुनाया जाता है। इसमें शामिल होना एक अलग किस्म की अनुभूति है। यह शो हिंदी और अंगरेजी में होता है। यहां अंगरेजी और हिंदी में अलग अलग शो होते हैं जिनका समय अलग अलग है। 

अंगरेजी शो का समय रात 9 से 10 बजे का है। जबकि हिंदी शो शाम को 730 बजे आरंभ होता है। ये शो भारत सरकार के पर्यटन विकास निगम की ओर से संचालित किया जाता है। शो का टिकट 80 रुपये का है। 

 प्रवेश टिकट -  सालों भर हर रोज लाल किले में सैलानियों की भीड़ देखने को मिलती है। लाल किले में प्रवेश के लिए आजकल 15 रुपये का टिकट है। प्रवेश टिकट के पास लगेज जमा करने के लिए क्लाक रूम की सुविधा भी है जिसके लिए 2 रुपये का टिकट है। प्रवेश टिकट में किले के अंदर स्थित दो संग्रहालयों का भी टिकट शामिल है।  



कैसे पहुंचे - लाल किला के ठीक सामने चांदनी चौक के एक कोने पर है अति प्राचीन गौरी शंकर मंदिर। तो लाल किले के बाहर से आपके दिल्ली से दूर कहीं भी जाने के लिए टूरिस्ट बसें मिल जाएंगी। निकटम मेट्रो स्टेशन चांदनी चौक है। पूरी दिल्ली भले ही बदल रही हो लेकिन लाल किले के आसपास अभी पुरानी दिल्ली खूशबू आती है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( RED FORT, IT IS WORLD HERITAGE SITE, listed in 2007 ) 

Friday, April 19, 2013

ये दिल्ली की पराठे वाली गली है...


चांदनी चौक की ये पराठा गली है। बाबू राम देवी दयाल पराठे वाले की छठी पीढ़ी अब यहां पराठे की दुकानें चलाती है। चांदनी चौक से गुरुद्वारा शीशगंज की ओर आगे बढ़ने पर कटरा शहंशाही के ठीक आगे है पराठे वाली गली। पंजाबी अंदाज में इसे गली पराठा कहते हैं। किसी जमाने में एक पराठे वाली दुकान हुआ करती थी अब तीन दुकाने हैं।

मीनू सभी दुकानों का एक जैसा ही है। आलू पराठा 30 रुपये पनीर पराठा 40 रुपये। मेथी पराठा, गोभी पराठा, मिक्स पराठा। और न जाने कितने तरह के पराठे। यहां का खास है खुरचन पराठा। दिल्ली के कोने कोने से शापिंग करने चांदनी चौक आने वाले लोग पराठे गली में पराठे का स्वाद लेने जरूर आते हैं। तंग गली में पराठे की दुकानों पर बैठने की जगह पाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।

दुकान के बाहर देसी घी की कड़ाही में तला जाता है पराठा। पराठे की थाली में पेठा की सब्जी, आलू की सूखी सब्जी, रसे वाली सब्जी, मूली का अचार और मीठी चटनी ये सब कुछ मिलता है पराठे की थाली में। हालांकि थाली में कम से कम दो पराठे लेना जरूरी है। हालांकि कहते हैं इसे पराठा हैं लेकिन ये परंपरागत पराठे की तरह तवे पर सेंका नहीं जाता है। बल्कि ये पराठा घी में तला जाता है। यानी ये है तला हुआ पराठा। ( या फिर पूड़ी )
बाबू राम पराठे वाले की दुकान में कभी पंडित जवाहर लाल नेहरु, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री जैसे लोग पराठे खाने आ चुके हैं।

उनकी ब्लैक एंड ह्वाइट तस्वीरें इन पराठे की दुकानों में लगी हैं। बदलते वक्त के साथ पराठों का स्वाद नहीं बदला है। 

हालांकि आपको इन पराठे वाली दुकानों का क्राकरी को देखकर थोड़ी नाराजगी हो सकती है।यहां लगता है स्वच्छता का पूरा ख्याल नहीं रखा जाता। पर इन सबके बीच अब ये पराठे की दुकानों वाली नई पीढ़ी अपना विस्तार करते हुए दिल्ली के मॉल्स के इटिंग ज्वाएंट्स तक पहुंच गई है लेकिन गलियों का स्वाद अब भी कायम है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
( ( CHANDNI CHAWK, PARATHA WALI GALI, FOOD ) 

Wednesday, April 17, 2013

दिल्ली में आंध्र भवन की भरपेट थाली


अगर आप दिल्ली में और दक्षिण भारतीय खाने का स्वाद लेना चाहते हैं तो आंध्र भवन अच्छा और जेब के अनुकूल विकल्प हो सकता है। आंध्र भवन में रूटीन में रोज लंच और डिनर लिया जा सकता है। यहां थाली 100 रुपये की है। डिनर का समय शाम 7.30 से रात्रि 10 बजे तक है। यहां आपको डिनर की थाली में चपातीचावल, ( आमतौ पर इसमें सफेद चावल और नमकीन चावल होता है)  रसमसांभरदालसब्जीचटनीमिक्स वेजदहीसेवईपापड़अचार सब कुछ है।

अगर आप जमकर खातें हों तो पूरी पैसा वसूल थाली है। हालांकि दक्षिण भारत में चपाती खाने की परंपरा नहीं है लेकिन दिल्ली में आकर आंध्र भवन की थाली में चपाती आ गई है। चपाती के साथ घी भी मौजूद है। कई तरह अचार भी टेबल पर मौजूद है। आप थाली के साथ कोल्ड ड्रिंक या नॉन वेज आईटम अतिरिक्त तौर जोड़ सकते हैं। आंध्र भवन में सुबह नास्ते में 55 रुपये की थाली में डोसा इडली सांभर जैसे विकल्प हैं। दिल्ली में रहने वाले दक्षिण भारतीय लोगों और दक्षिण भारतीय खाना खाने वाले लोगों की खास पसंद है आंध्र भवन थाली। रविवार की सुबह यहां बिरयानी भी मिलती है।

रोज खाने के समय अच्छी खासी भीड़ होती है लेकिन दो बड़े डायनिंग हॉल में यहां का स्टाफ अपने कस्टमर को जगह दिलाने के लिए तत्पर रहता है। अगर आप पान खाने के शौकीन हैं तो खाने के बाद मीठा पान भी ले सकते हैं 10 रुपये में।

कैसे पहुंचे - आंध्र भवन दिल्ली में इंडिया गेट के पास है। इंडिया गेट की तरफ से आप अशोक रोड पर चलें। पहले गोलंबर पर ही आंध्र भवन है। इसका मुख्य प्रवेश द्वार जसवंत सिहं रोड की ओर से है। वहां पर बाहर पार्किंग भी की जा सकती है। तो आप कभी इंडिया गेट घूमने जाएं तो आंध्र भवन की कैंटीन के खाने का स्वाद ल सकते हैं। एक दिन अचानक राहुल गांधी भी आंध्र भवन के खाने का स्वाद लेने पहुंच गए थे।

रविवार शाम को बंद  - आंध्र भवन की कैंटीन हर रविवार की शाम को बंद रहती है। रविवार की दोपहर में यहां बिरयानी मिलती है। इस दिन रूटीन की थाली उपलब्ध नहीं होती। 


-  ---------विद्युत प्रकाश मौर्य 
( ANDHRA BHAWAN DELHI , THALI, SOUTH INDIAN FOOD ) 

Monday, April 15, 2013

अत्यंत गुणकारी है बेल का शरबत- सफरजले हिंद

बंगाल के गंगा सागर के रास्ते में काकदीप में बेल। 
गरमी की तपिश से बचने के लिए आपने बेल का शर्बत तो जरूर पिया होगा। इसकी तासीर ठंडी होती है। बेल के पत्तों की तासीर भी ठंडी होती है इसलिए भगवान शिव को बेल और बेल के पत्ते अर्पित किए जाते हैं। दिल्ली में रहते हुए सारी गरमी मेरी कोशिश होती है कि रोज बेल का जूस पीने को मिल जाए।

पूरे देश में मिलता है बेल - सारे भारत में खासकर हिमालय की तराई मेंसूखे पहाड़ी क्षेत्रों में 4 हजार फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है । मध्य और दक्षिण भारत में बेल जंगल में फैला पाया जाता है । आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। उष्ण कटिबंधीय फल बेल के वृक्ष हिमालय की तराईमध्य एवं दक्षिण भारत बिहारतथा बंगाल में घने जंगलों में अधिकता से पाए जाते हैं। चूर्ण आदि औषधीय प्रयोग में बेल का कच्चा फलमुरब्बे के लिए अधपक्का फल और शर्बत के लिए पका फल काम में लाया जाता है।


रोगों को नष्ट करने की क्षमता - बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली बेल और बड़े उगाए हुए बेल । दोनों के गुण समान हैं। इसका संस्कृत नाम है बिल्व तो वनस्पति विज्ञान में इसका नाम इगल मार्मेलोज है। अंग्रेजी में इसे वूड एपल कहा जाता है। पर हमारे यहां भोजपुरी में इसे श्रीफल कहते हैं। बिल्व (बेल) के बारे में कहा गया है- 'रोगान बिलत्ति-भिनत्ति इति बिल्व।अर्थात रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल को बिल्व कहा गया है। बेल के पत्तों से भगवान शिव की पूजा होती है।

कई तरह की बीमारियों में लाभकारी - बेल की पत्तियों को पीसकर उसके रस का दिन में दो बार सेवन करने से डायबिटीज की बीमारी में काफी राहत मिलती है। रक्ताल्पता में पके हुए सूखे बेल की गिरी का चूर्ण बनाकर गर्म दूध में मिश्री के साथ एक चम्मच पावडर प्रतिदिन देने से शरीर में नया रक्त बनता है

गैस्ट्रोएंटेटाइटिस एवं हैजे के ऐपीडेमिक प्रकोप में बेल को अत्यंत उपयोगी अचूक औषधि माना है। विषाणु को परास्त करने की इसमें गजब की क्षमता है। कच्चा या अधपका फल गुण में कषाय (एस्ट्रोन्जेंट) होता है। यह टैनिन एवं श्लेष्म (म्यूसीलेज) के कारण दस्त में लाभ करता है। पुरानी पेचिसअल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे जीर्ण असाध्य रोग में भी यह लाभ करता है। बेल में म्यूसिलेज की मात्रा अधिक होती है। यह डायरिया के तुरंत बाद वह घावों को भरकर आंतों को स्वस्थ बनाने में समर्थ है। शरीर में मल संचित नहीं हो पाता और आंतें कमजोर होने से बच जाती हैं।

होम्योपैथी में बेल के फल व पत्र दोनों को समान गुण का मानते हैं। खूनी बवासीर व पुरानी पेचिश में इसका प्रयोग बहुत लाभदायक होता है । अलग-अलग पोटेन्सी में बिल्व टिंक्चर का प्रयोग कर आशातीत लाभ देखे गए हैं। यूनानी मतानुसार इसका नाम है- सफरजले हिन्द। यह दूसरे दर्जे में सर्द और तीसरे में खुश्क है।
आपको गरमी के दिनों में कहीं बेल का शरबत नहीं प्राप्त हो तो आप पतंजलि के स्टोर से भी बेल का शरबत खरीद सकते हैं। 

गर्मी दिनों में कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित जब अपने हिन्दुस्तान हिंदी दैनिक के दफ्तर पहुंचता हूं तो बाराखंबा मेट्रो से बाहर निकलने पर स्टेट्समैन वाली गली में एक बूढ़े बाबा रोज बेल का शरबत बेचते नजर आते हैं। उनके यहां से एक ग्लास बेल का शरबत पीना हमारा रूटीन सा बन गया। साल 2014 में हमारा दफ्तर नोएडा सेक्टर 63 में शिफ्ट हो गया तो हम उस बेल वाले बाबा का काफी याद करते थे। हालांकि नोएडा में भी कई बार बेल के शरबत वाले दिखाई दे जाते हैं।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com  

( बेल, श्रीफल, AEGLE MARMELOS, JUICE, WOOD APPLE  ) 

Saturday, April 13, 2013

पेट का सच्चा दोस्त - पपीता खाएं

जब कुछ समझ में नहीं आए तो पपीता खाएं। यह अत्यंत गुणकारी फल है। सस्ता और सर्व सुलभ। पपीता एक ऐसा फल है जो आपको कहीं भी आसानी से मिल जाएगा।  पपीता को गुणों की खान कहा गया है। यह आपके पेट का भी खयाल रखता है तो त्वचा की खूबसूरती का भी।  इसमें विटामिन सी का भंडार होता है। इसे कच्चा और पके हुए दोनों रूपों में खाया जा सकता है। कोलेस्ट्रॉल कम करनेवजन घटाने मेंइम्यूनिटी और आंखों की रोशनी बढ़ाने में भी पपीता काफी फायदेमंद है।

कई तरह की औषधियां बनती हैं -  कच्ची अवस्था में यह हरे रंग का होता है और पकने पर पीले रंग का हो जाता है। इसके कच्चे और पके फल दोनों ही उपयोग में आते हैं। कच्चे फलों की सब्जी बनती है। इन कारणों से घर के पास लगाने के लिये यह बहुत उत्तम फल है। इसके कच्चे फलों से दूध भी निकाला जाता हैजिससे पपेइन तैयार किया जाता है। पपेइन से पाचन संबंधी औषधियां बनाई जाती हैं। पपीता पाचन शक्ति को बढ़ाता है। इसलिए इसके पके हुए फल का सेवन उदर विकार में लाभदायक होता है।

लाइलाज बीमारियों का इलाज - आयुर्वेद शास्त्र में पपीते को लाइलाज बीमारियों को दूर करने वाला माना गया है। पपीते में विटामिन सीविटामिन ई और बीटा कैरोटीन जैसे एंटी-ऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। जिससे व्यक्ति का यौवन लंबे समय तक बना रहता है। पपीता के बीज जिगर को डेटोक्सीफाय करने में मदद करते हैं और जीवाणुरोधी प्रभाव दिखाते हैं।
आप इसके बीज को निकालकर धोकर खा सकते हैं या फिर सलादसैंडविच और अन्य व्यंजनों में शामिल कर सकते हैं। साथ ही साथ इसका उपयोग जूसजेलीजैम बनाने के लिए भी किया जाता है। कई लोग पपीते को फ़ेस पेक के रूप मे भी उपयोग करते है।


खाने में कुछ सावधानी भी - याद रहेंपपीते के बीज में वसा भी अधिक होता हैं और इसलिए इनका सेवन सीमित मात्रा में ही किया जाना चाहिए। यूं तो पपीते के सेवन से कैंसरहाइपरटेंशनब्‍लड वेसेल डिस्‍ऑर्डर से सुरक्षा मिलती है लेकिन एक अध्‍ययन में यह बात भी सामने आई है कि पपीते के अत्‍यधिक सेवन से किडनी में पथरी की समस्‍या पैदा हो सकती है। कच्चे पपीते की वजह से गर्भपात के बारे सब जानते हैं। कच्‍चे पपीते में मौजूद लैटेक्‍स नाम के तत्व की वजह से गर्भाशय के सिकुड़ने की संभावना बनी रहती हैजिसके कारण गर्भपात या फिर समय से पहले प्रसव की संभावना बढ़ जाती है।

बहुत आसान है पपीता की खेती 


अगर आपके घर के सामने थोड़ी सी भी जमीन है तो आप पपीता का पेड़ भी लगा सकते हैं। ये एक ऐसा फल है जिसे कच्चा भी इस्तेमाल में लाया जा सकता है। पपीते का पेड़ एक साल में फल देने लायक हो जाता है। इसके पेड़ लंबेपतले और कोमल होते हैं। पपीते के पेड़ में डालियां नहीं होती हैं।
नर और मादा पेड़- पपीते का नर और मादा पेड़ अलग होता है। नर पेड़ में लंबी डंडी वाले फूल लगते है , इसमें फल कभी नहीं लगते। सिर्फ मादा पेड़ पर ही फल लगते है। मादा पेड़ का फूल तने से जुड़ा होता है। कुछ पेड़ ऐसे होते है जिन पर नर और मादा दोनों प्रकार के फूल और फल लगते है।

मुझे अपना बचपन याद आता है, पिता जी की हर पोस्टिंग में मिलने वाले किराये के घर में हमलोग आंगन में या बाहर पपीता का पेड़ लगा देेते थे। पपीता, खुद भी खाते थे, ज्यादा हो जाने पर पड़ोसियों को भी बांटते थे। कई साल अपने गांव पहुंचा तो देखा कि मेरे गांव सोहवलिया में भी अब खूब पपीता लगाया जा रहा है। लोगों को इसके लाभ का पता चल गया है। यह आसानी से तैयार होने वाला फल है। जब हम गांव से चलने लगे तो चाचा ने ढेर से ताजे पपीते तोड़े और झोले में भर दिया। 
-विद्युत प्रकाश मौर्य ( Email - vidyutp@gmail.com ) 
( PAPAYA, PAPITA, GOOD FOOD, SOHWALIA DAYS - 2  )