Tuesday, April 30, 2013

दिल्ली में आंध्र भवन की भरपेट थाली


अगर आप दिल्ली में और दक्षिण भारतीय खाने का स्वाद लेना चाहते हैं तो आंध्र भवन अच्छा और जेब के अनुकूल विकल्प हो सकता है। आंध्र भवन में रूटीन में रोज लंच और डिनर लिया जा सकता है। यहां थाली 100 रुपये की है। डिनर का समय शाम 7.30 से रात्रि 10 बजे तक है। यहां आपको डिनर की थाली में चपातीचावल, ( आमतौ पर इसमें सफेद चावल और नमकीन चावल होता है)  रसमसांभरदालसब्जीचटनीमिक्स वेजदहीसेवईपापड़अचार सब कुछ है।

अगर आप जमकर खातें हों तो पूरी पैसा वसूल थाली है। हालांकि दक्षिण भारत में चपाती खाने की परंपरा नहीं है लेकिन दिल्ली में आकर आंध्र भवन की थाली में चपाती आ गई है। चपाती के साथ घी भी मौजूद है। कई तरह अचार भी टेबल पर मौजूद है। आप थाली के साथ कोल्ड ड्रिंक या नॉन वेज आईटम अतिरिक्त तौर जोड़ सकते हैं। आंध्र भवन में सुबह नास्ते में 55 रुपये की थाली में डोसा इडली सांभर जैसे विकल्प हैं। दिल्ली में रहने वाले दक्षिण भारतीय लोगों और दक्षिण भारतीय खाना खाने वाले लोगों की खास पसंद है आंध्र भवन थाली। रविवार की सुबह यहां बिरयानी भी मिलती है।

रोज खाने के समय अच्छी खासी भीड़ होती है लेकिन दो बड़े डायनिंग हॉल में यहां का स्टाफ अपने कस्टमर को जगह दिलाने के लिए तत्पर रहता है। अगर आप पान खाने के शौकीन हैं तो खाने के बाद मीठा पान भी ले सकते हैं 10 रुपये में।

कैसे पहुंचे - आंध्र भवन दिल्ली में इंडिया गेट के पास है। इंडिया गेट की तरफ से आप अशोक रोड पर चलें। पहले गोलंबर पर ही आंध्र भवन है। इसका मुख्य प्रवेश द्वार जसवंत सिहं रोड की ओर से है। वहां पर बाहर पार्किंग भी की जा सकती है। तो आप कभी इंडिया गेट घूमने जाएं तो आंध्र भवन की कैंटीन के खाने का स्वाद ल सकते हैं। एक दिन अचानक राहुल गांधी भी आंध्र भवन के खाने का स्वाद लेने पहुंच गए थे।

रविवार शाम को बंद  - आंध्र भवन की कैंटीन हर रविवार की शाम को बंद रहती है। रविवार की दोपहर में यहां बिरयानी मिलती है। इस दिन रूटीन की थाली उपलब्ध नहीं होती। 


-  ---------विद्युत प्रकाश मौर्य 
( ANDHRA BHAWAN DELHI , THALI, SOUTH INDIAN FOOD ) 

Sunday, April 28, 2013

देश की समृद्ध विरासत देखें –नेशनल म्यूजियम में

नई दिल्ली के जनपथ पर स्थित नेशनल म्यूजियम में भारत का दमकता हुआ इतिहास देखा जा सकता है। आप पूरा देश नहीं घूम सकते तो इस संग्रहालय के नायाब संग्रह को जरूर देखने पहुंचे। देश की अनमोल विरात को देखना एक सिनेमा के टिकट से भी सस्ता  है। अगर आप पूरे संग्रहालय को विस्तार से देखना चाहते हैं तो पांच से छह घंटे लग सकते हैं।

दिल्ली के जनपथ पर स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय देश के इतिहास और संस्कृति के समझने के लिए बेहतरीन जगह है। तीन मंजिल वाले इस संग्रहालय को पूरी तरह देखने की बात करें तो दिन भर का समय लग जाता है।

दो लाख से ज्यादा संग्रह - नेशनल म्यूजियम की शुरुआत 15 अगस्त 1949 को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में हुई थी। यहां की कलाकृतियों को सबसे पहले बर्लिंगटन हाउस लंदन में प्रदर्शित किया गया था। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने वर्तमान स्थल पर विशाल संग्रहालय बनाए जाने की आधारशिला 12 मई 1955 को रखी। पांच साल बाद जनपथ पर 18 सितंबर 1960 को यह संग्रहालय जन समान्य के लिए खोला गया। आज की तारीख में इस संग्रहालय में कुल दो लाख से ज्यादा संग्रह हैं।


पांच हजार साल का इतिहास - यहां पर देश के पांच हजार साल के इतिहास को देख और समझ सकते हैं। संग्रहालय परिसर में प्रवेश करते ही आपका साक्षात्कार देश की समृद्ध विरासत से होता है। संग्रहालय भवन के मुख्य द्वार के सामने सम्राट अशोक के गिरनार अभिलेख की प्रतिकृति देखी जा सकती है। इस अभिलेख में सम्राट अशोक ने बिना किसी भेदभाव के प्रजा के कल्याण की बात कही है। 

यहां पर सम्राट अशोक की राजाज्ञाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। आइए अब टिकट लेकर अंदर की ओर चलते हैं। आप चाहें तो गाइडेड टूर का भी लाभ उठा सकते हैं। 


सिंधु घाटी सभ्यता का संग्रह - संग्रहालय का भवन तीन मंजिला है। प्रवेश करने वाले दर्शक आधार तल से घूमना आरंभ करते हैं। तमाम प्राचीन मूर्तियों से होकर गुजरते हुए सबसे पहले आप हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की वीथिका में पहुंचते हैं। यहां पर हड़प्पा, मोहनजोदाड़ो के अलावा हडप्पा कालीन दूसरे नगरों की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं का संग्रह है। खासतौर पर मिट्टी के बने आभूषण और अन्य उपयोग की जाने वाली वस्तुएं। यहां लोथल, कालीबंगा, धौलावीरा जैसे हड़प्पाकालीन नगरों की भी जानकारी देखी जा सकती है। आपको पता है यहां पर सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी कुल 3800 कलाकृतियों का संग्रह है। 
दूसरी सदी में गांधार से प्राप्त बुद्ध की प्रतिमा 


बौद्ध कला वीथिका – नेशनल म्यूजिम का प्रमुख आकर्षण बौद्ध कला वीथिका है। यहां पर पिपिहरवा जिला सिद्धार्थनगर उत्तर प्रदेश से प्राप्त पांचवी और चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व के संग्रह को प्रदर्शित किया गया है। वैसे पूरे संग्रहालय में आप अनेक बुद्ध मूर्तियां देख सकते हैं तो अलग अलग स्थलों से प्राप्त की गई हैं। दुनिया के अलग अलग देशों से प्राप्त बुद्ध मूर्तियों को भी यहां पर प्रदर्शित किया गया है।

17 हजार चित्रों में विरासत - बौद्ध कला वीथिका से आगे बढ़ने के बाद आपको प्राचीन काल से लेकर मुगलकाल तक का इतिहास मूर्तियों में नजर आएगा। संग्रहालय में पेटिंग, आभूषणों का भी विशाल संग्रह है। चित्रकला की बात करें तो यहां पर 17 हजार से ज्यादा चित्रों का संग्रह है। इसमें मुगल, दकक्न, पहाड़ी, राजस्थानी शैली के चित्र हैं।




लिपियों का इतिहास, सिक्कों का संग्रह - यहां पर आप भारतीय लिपियों के इतिहास को भी देख और समझ सकते हैं। पहली और दूसरी मंजिल पर आप अलग अलग समय से वस्त्रों का संग्रह, अलग अलग राजाओं द्वारा चलाए गए सिक्कों का संग्रह देख सकते हैं। संग्रहालय में नौसेना के इतिहास की भी एक गैलरी है, यह हमारी नौ सेना के बारे में जानने के लिए बेहतरीन जगह हो सकती है। 

खुलने का समय – यह संग्रहालय सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। हर सोमवार और राष्ट्रीय छुट्टियों के दिन यह बंद रहता है। प्रवेश टिकट 20 रुपये का है।
तंजौर पेंटिंग का एक नमून देखिए..

दर्शकों को सुविधाएं -  अगर आपको आडियो गाइड की सेवा चाहिए तो वह शुल्क देकर उपलब्ध है। वैसे आप संग्रहालय की तमाम दीर्घाओं को बिना गाइड के भी देख सकते हैं। अगर आपके पास बड़ा बैग है तो क्लाक रूम की सुविधा भी यहां पर उपलब्ध है। संग्रहालय परिसर में पेयजल, शौचालय आदि का इंतजाम है। यहां एक कैंटीन भी है, जहां आपको भोजन और नास्ता मिल सकता है।
मौर्य काल में भी हुआ करती थी नौ सेना। 

कैसे पहुंचे-  नेशनल म्यूजियम दिल्ली के कनॉट प्लेस से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दिल्ली पर्यटन की हो हो बस सेवा भी यहां पर रुकती है। यहां पहुंचने के लिए निकटतम मेट्रो स्टेशन केंद्रीय सचिवालय या जनपथ हो सकता है। डीटीसी की तमाम बसे नेशनल म्यूजियम से होकर गुजरती हैं। 
 
: विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

( DELHI, NATIONAL MUSEUM, JANPATH )

Friday, April 26, 2013

दिल्ली का गुरुद्वारा शीशगंज – शहादत की याद


दिल्ली का गुरुद्वारा शीशगंज भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह गुरुद्वारा सिख धर्म के नौंवे गुरु गुरु तेग बहादुर की शहादत से जुड़ा है। यह सिख धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र स्थान है । देश भर से सिख समुदाय के लोग यहां हर रोज पहुंचते हैं। 
 दिल्ली में लालकिला से जब चांदनी चौक की सड़क पर आगे बढ़ते हैं तो बायीं तरफ गुरुद्वारा शीशगंज नजर आता है। यह फव्वारा चौक के बिल्कुल पास ही स्थित है। 1783 में हुआ निर्माण -
यह गुरुद्वारा 1783 में बघेल सिंह धालीवाल द्वारा नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर के शहादत स्थल की याद में बनाया गया था। चांदनी चौक के अति व्यस्त इलाके में इस गुरुद्वारे की शानदार इमारत दूर से दमकती हुई नजर आती है।

हिंदू धर्म के रक्षक गुरु तेगबहादुर
वह दौर था जब मुगल शासक औरंगजेब ने जबरदस्त आतंक देश भर में फैला हुआ था। बादशाह के आदेश पर सभी कश्मीरी पंडितों को जबरदस्ती इस्लाम में परिवर्तित किये जाने का हुकुम जारी किया गया था। उस समय सिखों के नौवें गुरु 'गुरु तेग बहादुर जी' अपने परिवार के साथ पंजाब के अनंदपुर साहिब में रहते थे। इसी दौरान कश्मीरी पंडित गुरु जी के दरबार में पहुंचे और उनसे हिन्दुओं को इस परेशानी से बाहर निकलने के लिए विनती करने लगे। तब गुरु जी के पुत्र गोबिंद राय (गुरु गोबिंद सिंह जी) जो कि उस समय मात्र दस वर्ष के थे, ने अपने पिता से कहा, 'यह समय किसी महान शख्स की शहादत मांग रही है। पुत्र की समझदारी भरी बात सुन गुरु जी अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने साथ पांच संगियों को लेकर दिल्ली के लिए रवाना हुए।

गुरु तेगबहादुर की शहादत
दिल्ली आने पर जब गुरु जी ने मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर इस्लाम स्वीकार करने से इनकार कर दिया। जब उन्होंने औरंगजेब के आगे झुकने से इनकार कर दिया तो तो 11 नवंबर 1675 को उन्हें मौत की सजा दी गई।
एक जल्लाद जलाल-उद-दीन ने बादशाह के आदेश पर उनका सिर कलम कर दिया। जिस जगह पर गुरु जी की शहादत हुई वहां एक बरगद का पेड़ हुआ करता था। वहां दिल्ली की भारी भीड़ जमा थी। हजारों लोगों के सामने गुरु तेग बदादुर की शहादत हुई। यहां पर गुरु जी के शिष्य भाई मतिदास ने भी शहादत दी। उन्हें जिंदा आरे चिरवा दिया गया था। दूसरे शिष्य भाई दयाला जी और सतीदास जी ने भी यहीं पर शहादत दी।  

हिंद की चादर
वे हिंदुस्तान और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए शहीद हो गए थे। गुरु तेग बहादुर की इस महान शहादत के कारण उन्हें हिंद की चादर की उपाधि दी गई। गुरु जी ने शहीद होने से पहले जिस कुएं के पानी स्नान किया था, वह कुआं अब भी सुरक्षित है। गुरुद्वारा शीशगंज में जिस स्थान पर आजकल लंगर है वहां पर कभी मुगल शासकों की जेल हुआ करती थी।  

गुरुद्वारा रकाबगंज में हुआ अंतिम संस्कार
गुरुजी की शहादत के बाद भाई लखी शाह गुरुजी के धड़ को रूई के ढेर में छिपाकर दिल्ली की बस्ती रायसीना ले गए और वहां पर गुरुजी का अंतिम संस्कार किया। उस स्थल पर गुरुद्वारा रकाबगंज बना हुआ है। यह स्थल केंद्रीय सचिवालय बस स्टैंड के पास है। 

गुरुद्वारा शीशगंज में सालों भर दिन भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। यहां पर अनवरत लंगर भी चलता रहता है। श्रद्धालुओं के लिए लगातार जल सेवा चलती रहती है। हजारों की संख्या में लोग गुरुद्वारा में कार सेवा में लगे रहते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
(GURUDWARA SISGANJ, RAKABGANJ, SIKH TEMPLE, DELHI ) 


Wednesday, April 24, 2013

शहजादी रोशनआरा ने बनवाया था 55 एकड़ का खूबसूरत बाग


दिल्ली के पुल बंगश मेट्रो स्टेशन के पास पहुंच गया हूं। यहां से रोशन आरा पार्क जाने की सोच रहा हूं। बर्फखाना चौक से बैटरी रिक्शा वाले शक्तिनगर की तरफ जा रहे हैं। उसमें बैठ जाता हूं। देख रहा हूं सड़क का नाम रोशन आरा रोड ही है। थोड़ी देर बाद रोशन आरा पार्क की बाउंड्री आ गई है। मैं वहीं रिक्शा से उतर गया। सामने रोशन आरा पार्क है।

मैं विशाल पार्क में दाखिल होकर घूमने लगा। दोपहर में कई जगह बच्चे खेल रहे हैं। कहीं बुजुर्गों की महफिल जमी है। इस बीच पार्क के एक हिस्से पर नजर पड़ी। यहां लिखा है सिर्फ महिलाओं के लिए। मतलब पार्क के इस हिस्से में पुरुषों का जाना प्रतिबंधित है।


शाहजहानाबाद से दूर एक बाग
लालकिले की गहमागहमी से दूर रहने के लिए मुगल बादशाह शाहजहां और मुमताज की बेटी रोशनआरा ने सब्जीमंडी के पास रोशन आरा बाग बनवाया था। शहजादी रोशनआरा यहां वह दासियों संग समय गुजारती थी। साल 1650 के आसपास शाहजहांनाबाद की चारदीवारी से तीन किलोमीटर दूर उन्होंने अपने लिए खूबसूरत बाग बनवाया। इसकी जमीन उन्हें बादशाह पिता से तोहफे के तौर पर मिली थी।

कोई फूल मुरझाता नहीं था
कुल 55 एकड़ में फैले रोशनआरा बाग के हर चप्पे पर शहजादी की नजर होती थी। बाग का रखरखाव कुछ ऐसा था कि क्या मजाल की तब कोई फूल यहां मुरझाया हुआ मिले। बाग में प्रवेश के लिए दो दरवाजे बनाए गए हैं। इनमें से एक सामान्य जबकि दूसरा मुगलकालीन वास्तु कला का बेहतरीन मिसाल है। दरवाजे पर खूबसूरत नक्काशी हैजो यहां आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती है। बाग में हरे-भरे बगीचा और बरादरी है। आजकल रोशनआरा बाग की चारदीवारी जगह-जगह टूट गई है।

रोशन आरा का मकबरा
सितंबर 1671 में 54 साल की उम्र में रोशनआरा का निधन हो गया। उसने विवाह नहीं किया था। मुगलिया रीति रिवाज के साथ उसका जनाजा निकला और बाग में बरादरी के बीचो-बीच रोशनआरा बेगम को दफन किया गया। तो रोशन आरा का मकबरा भी यहीं बनवाया गया है।

एक सुंदर झील भी थी
रोशन आरा बाग के बीच में एक सुंदर झील भी बनवाई गई थी। ग्राउंड वॉटर के अत्यधिक दोहन की वजह से दिल्ली के शक्ति नगर इलाके में स्थित रोशन आरा बाग की झील सूख गई है। मुगलकालीन रोशन आरा बाग की झील को रीस्टोर करने का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में भी पहुंचा था।

 विद्वान और कूटनीतिक महिला
रोशनारा बेगम (सितंबर 1617 - 11 सितंबर 1671)  मुगल बादशाह शाहजहां मुमताज महल की दूसरी बेटी थी। वह प्रतिभाशाली शायर भी थीं। वह अपने समय की अत्यंत विद्वान और कूटनीतिक महिलाओं में शुमार थी। जिस समय शाहजहां के पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध चल रहा थारोशन आरा ने औरंगजेब का पक्ष लिया था। वह राजधानी में होने वाली समस्त गतिविधियों की सूचना गुप्त रूप से औरंगजेब को भेजती रहती थी। 

रोशनआरा क्लब और बीसीसीआई
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की स्थापना बीसीसीआई की पहली बैठक राजधानी के रोशनआरा क्लब में 1927 ही हुई थी। उसकी मेजबानी पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह ने की थी। ये रोशनआरा क्लब मुगल राजकुमारी रोशन आरा बेगम के बाग का ही हिस्सा है lइस बाग मे पहले तो अंग्रेज गपशप मारने के लिए ही आते थे।उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अंग्रेजों द्वारा क्रिकेट रोशनआरा क्लब की स्थापना की गई बाद मे यहां भारतीय लोग भी आने लगे। यहीं भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की स्थापना हुई। रोशनआरा क्लब करीब 30 एकड़ में फैला है। यहां पर क्रिकेट मैदान भी है।

कैसे पहुंचे - रोशनआरा बाग शक्ति नगर इलाके से सटा हुआ है। यह पुल बंगश मेट्रो स्टेशन के करीब है। मेट्रो से उतर कर बैटरी रिक्शा से यहां पहुंचा जा सकता है। इसके पास से गुजरती हुई सड़क का नाम रोशनआरा रोड है। आप दिल्ली यूनिवर्सिटी के नार्थ कैंपस की तरफ से भी यहां आसानी से पहुंच सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-        (ROSHANARA BAG, ROSHAN ARA CLUB, CRICKET, BCCI )




Wednesday, April 10, 2013

तीन ऐतिहासिक लड़ाइयों का साक्षी - पानीपत

हरियाणा का शहर पानीपत। दिल्ली से 90 किलोमीटर उत्तर की ओर। पानीपत को इतिहास में तीन बड़ी लड़ाइयों के लिए जाना जाता है। पर पानीपत के साथ इतिहास के कई और रोचक पन्ने जुड़े हुए हैं।

पानीपत की इन ऐतिहासिक लड़ाइयों पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं। इसका पता मुझे पानीपत जाने के बाद चला। वह
 2005 का साल था।  तब मैं दैनिक जागरण के लुधियाना संस्करण में कार्यरत था जब मुझे पानीपत में काम करने का मौका मिला।

दिल्ली के पास और एक ऐतिहासिक स्थल इसलिए मैंने हां कर दी। यहां मेरे एक पुराने वकील दोस्त हैं जसबीर राठी। हमने एक साथ एमएमसी का पत्रचार पाठ्यक्रम किया था गुरू जांभेश्वर यूनिवर्सिटी
हिसार से। सो पानीपत आने पर मैं दस दिन जसबीर राठी के घर में ही रहा। पानीपत के ऐतिहासिक सलारजंग गेट पास है उनका घर।


पानीपत का ऐतिहासिक सलारजंग गेट 


हालांकि पानीपत शहर कहीं से खूबसूरत नहीं नजर आता। पर कई यादें पानीपत के साथ जुड़ी हैं। तीन ऐतिहासिक लड़ाईयों के अलावा भी पानीपत में कई ऐसी चीजें हैं जो शहर की पहचान है। इब्राहिम लोदी की मजारकाबुली बाग मस्जिदमराठों का बनवाया हुआ देवी मंदिर,  तीसरी लड़ाई की स्मृतियां संजोए काला अंब के अलावा यहां महान सूफी संत बू अली शाह कलंदर की दरगाह है।

मलाईमच्छर और मुसलमान - आजादी से पहले पानीपत मूल रूप से मुसलमानों का शहर था। यहां घर घर में करघे चलते थे। बेडशीटचादर आदि बुनाई का काम तेजी से होता था। हमारे एक दोस्त एडवोकेट राम मोहन सैनी बताते हैं कि पानीपत शहर तीन म के लिए जाना जाता था। मलाईमच्छर और मुसलमान। अब न मुसलमान हैं न मलाई पर मच्छर जरूर हैं। 1947 में बंटवारे के बाद ज्यादातर मुसलमान पाकिस्तान चले गए। बाद में पाकिस्तान से आए हिंदू बुनकर परिवारों को यहां बसाया गया।
पचरंगा अचार का शहर - अब पानीपत हैंडलूम और पचरंगा अचार के शहर के रूप में जाना जाता है। बेडशीटचादरतौलियासस्ती दरियां और कंबल के निर्माण का बहुत बड़ा केंद्र है।


पानपीत में सस्ती दरियां और कंबल रैग्स से बनाई जाती हैं। रैग्स यानी पुराने कपड़े को मशीन से कुतर कर उनसे धागा बनाया जाता है फिर उनसे कंबल और दरियां। पूरे देश और विदेशों में भी बड़ी संख्या में इन उत्पादों की पानीपत से सप्लाई है। वैसे अगर सडक से पानीपत जाएं तो आपको यहां के पंचरंगा अचार के बारे में भी काफी कुछ देखने के मिल जाएगा। मेन जीटी रोड पर सबसे ज्यादा पंचरंगा अचार की ही दुकाने हैं। हालांकि शहर में जीटी रोड के ऊपर लंबा फ्लाईओवर बन जाऩे से इन दुकानों की रौनक खत्म हो गी है। पानीपत में इंडियन आयल की बड़ी रिफायनरी भी है। इसका रास्ता शहर से दक्षिणी छोर से पूरब की ओर जाता है।


-विद्युत प्रकाश मौर्य -  vidyutp@gmail.com 

( PANIPAT, HARYANA, PICKLE, RAM MOHAN SAINI, RICE, DARI ) 

Monday, April 8, 2013

खरीदारी के साथ बरतें कुछ सावधानी

आप जमकर शापिंग करें पर उसके साथ कुछ सावधानी भी जरूरी  है। ये थोड़ी सी सावधानी आपको कई तरह के खतरों से बचा सकती है। आपका रुपया है और आप खर्च कर रहे हैं तो थोड़ी सी समझदारी जरुरी है भाई। इसलिए खरीददारी के समय कुछ बातों पर ध्यान देना अच्छा है जिससे बाद में पछताना नहीं पड़े। तो इन बातों पर जरूर ध्यान दें....

- दुकान से मिठाई या खाने पीने का सामान खरीदने के साथ बिल जरूर लें। बिल को सामान इस्तेमाल करने के बाद तक संभाल कर रखें।

- बिना बिल के खरीदे सामान में खराबी निकल आने पर दुकानदार मुकर सकता है। 

- वैसी दुकानों से खाने पीने की चीजें न खरीदें जिसकी बिक्री कम होती हो। 

- अगर कोई दुकानदार सस्ती मिठाइयां बेचता है तो उस पर एकबारगी शक जरूर करें। क्योंकि सस्ते में अच्छी चीजें कैसे आ सकती हैं भला।

- स्थानीय दोस्तों से शहर की अच्छी खाने पीने की दुकानों के बारे में जानकारी प्राप्त कर लें सुविधा रहेगी। 

- डिब्बा बंद सामान में निर्माण की तारीख और बेस्ट बिफोर तारीख भी जरूर देख लें। 

- यह भी देखें की डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ है तो क्या वह एफएसएसआई से प्रमाणित है। अप्रमाणित वस्तुएं न खरीदें।


- जिस शहर में भी जाएं स्थानीय खान पान का आनंद जरूर लें पर अपनी सेहत और पेट का ख्याल रखें। 


उपभोक्ता मामलों की शिकायत नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन पर की जा सकती है – इसका टोल फ्री नंबर 1800 11 4000 http://www.nationalconsumerhelpline.in/ComplaintFile.aspx
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दुकानदार को हो साख की चिंता..
मैं अपने मुहल्ले की एक खास राशन दुकान से हमेशा राशन खरीदता हूं. कभी राशन में दाल में कीड़े निकल आते हैं तो कभी बेस में गंदगी. एक दो बार जब दुकानदार को शिकायत की गई तो दुकानदार साफ मुकर गया कि ये मेरे दुकान का माल नहीं हो सकता। जाहिर है दुकान के इस व्यवहार से कोफ्त होती है। क्योंकि समान खराब निकलने पर बदलने की जिम्मेवारी हर कंपनी को लेनी चाहिए साथ दुकानदार को भी अपने नियमित ग्राहक पर हमेशा भरोसा रखना चाहिए। लेकिन ऐसे दुकानदारों को अपनी साख की चिंता नहीं है। जबकि रिलायंस और इजी डे जैसे शापिंग चेन अपने सामान गुणवत्ता और खराब निकलने पर उसके बदलने को लेकर साफ सुथरी पालिसी के तहत चल रहे हैं।


अब एक उदाहरण जो अमर उजाला के वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय जी ने सुनाई। ज्योतिर्मय जी के परिवार के लोग मथुरा वृंदावन के मंदिरों का दर्शन करने गए थे। लौटते वक्त उन लोगों ने मथुरा के प्रसिद्ध  बृजवासी मिष्टान भंडार से मिठाइयां खरीदीं। लेकिन दिल्ली में घर पहुंचने पर पता चला कि आठ किलो मिठाइयां खराब हो चुकी थीं. इन लोगों ने तुरंत बृजवासी मिष्टान भंडार मथुरा को फोन किया। अब क्या हुआ होगा इसका अंदाजा तनिक आप लगाइए। बृजवासी को अपनी साख की पूरी चिंता है। उन्होने शिकायत पर तुरंत कार्रवाई की।
 बृजवासी की मिठाइयों की एक दुकान दिल्ली में भी है। उन्होंने तुरंत ग्राहक के घर का पता नोट किया। अपनी दिल्ली वाली दुकान से आठ किलो ताजी मिठाइयां भिजवा दीं और खराब मिठाई वापस ले गए. जाहिर है ऐसे अच्छे व्यवहार की चर्चा आप अपने 50 दोस्तों से करेंगे। ऐसा करने से दुकानदार का प्रचार भी होता है। ये माउथ टू माउथ पब्लिस्टी है जो संतुष्ट ग्राहक करता है। लेकिन घटिया व्यवहार करने पर नाराज ग्राहक पचास जगह अपने बुरे अनुभव भी सुनाता है।
- vidyutp@gmail.com

http://www.brijwasi.co.in/

( BRIJWASI, MATHURA, CREDIT, SHOP, PACKED FOOD ) 

Saturday, April 6, 2013

बड़े काम के हैं आपके रसोई घर के ये मसाले


दिल्ली के साप्ताहिक बाजारों में खड़े मसाले की दुकानें दिखाई दे जाती हैं। हमें कोशिश करनी चाहिए कि साबूत मसाले ही लेकर घर आएं और उन्हें पीसकर सब्जियों में इस्तेमाल करें। इससे मसालों की शुद्धता बनी रहेगी। 

हमारी रसोई में रोजाना इस्तेमाल किए जाने वाले मसाले आपको अलग तरह के रोगों से बचाते हैं। वहीं ये कई तरह की बीमारियों के उपचार भी हैं। कई बार आप बीमारी से परेशान होते हैं पर इसका उपचार आपके रसोई घर में ही मौजूद रहता है।  

तो आइए थोड़ा जानते हैं रसोई के इन मसालों के फायदों के बारे में-

हींग – तेज खांसी में अच्छा निदान प्रदान करता है। पेट दर्द में भी काफी अच्छा काम करती है।हींग कब्ज, बदहजमी आदि में अच्छा काम करती है।यह सौंफ की प्रजाति का ईरानी मूल का पौधा है। हींग को कामेच्छा बढ़ाने वाला भी माना जाता है।

तेज पत्ता – सब्जी में शुरुआत में डाला जाने वाला तेज पत्ता (बे लीफ) अच्छा एंटी बैक्टरिया होता है। इसके साथ ही चर्म रोगों में भी राहत देता है। इसका इस्तेमाल दमपुख्त बनाने में भी होता है।


दालचीनी – दालचीनी पेड़ की छाल है। जिस पेड़ से तेजपत्ता निकलता है उसी की छाल दालचीनी होती है। यह शरीर में इंसुलीन की मात्रा को प्राकृतिक तरीके से बढ़ाता है। रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा कम करता है।

इलायची इलायची (छोटी) बुरी सांस को रोकता है। यह पाचन संबंधी बीमारियों में भी काफी लाभकारी है। लगातार इलायची चबाना डायबिटिज को भी नियंत्रित करता है।

लौंग -  लौंग ( क्लोव) दांत दर्द में लाभकारी होता है। इसके अलावा यह छाती के दर्द, बुखार, खांसी, सर्दी में भी लाभकारी है। लौंग सूखे हुए फूल की कली है।


हल्दी – हल्दी हमारे सब्जी मसाले का सबसे जरूरी हिस्सा है। पर हल्दी त्वचा के रोगों में काफी लाभकारी है। हल्दी का पाउडर कटे हुए घाव में राहत देता है। यह मधुमेह में भी लाभकारी है। साथ ही इसमेंकैंसररोधी गुण भी पाए जाते हैं। 

धनिया –  सब्जी मसाला का दूसरा प्रमुख अवयव है धनिया। धनिया जोड़ों  के दर्द में काफी लाभकारी है। इसके अलावा धनिया, एलर्जी और बुखार में भी लाभकारी है।

जीरा जीरा को लोहा का अच्छा स्रोत माना जाता है। जीरा शरीर की पाचन क्रिया को ठीक रखता है। जीरा के साथ उबला हुआ पानी दस्त में लाभकारी होता है।


लाल मिर्चकई लोग कहते हैं मिर्च का सेवन कम करनाा चाहिए। पर लाल मिर्च हमारे शरीर में कोलेस्ट्राल बढ़ने से रोकता है। शरीर में कैलोरी बर्न करने में भी मददगार होता है।


काली मिर्च  अब बात काली मिर्च की करें तो यह सर्दी और खांसी के अलावा कई तरह दर्द में काफी लाभकारी होता है। यह हमारे पाचन तंत्र को भी रखता है दुरुस्त।

करी पत्ता करी पत्ता ब्लड शूगर घटाने में लाभकारी है। वहीं इसके सूखे पत्तों से कई तरह की दवाएं भी तैयार की जाती हैं। करी पत्ता दक्षिण भारत में खूब इस्तेमाल होता है। अब उत्तर के लोग भी इसका महत्व समझने लगे हैं।


मेथी – मेथी मां का दूध बढ़ाने में लाभकारी है। डायबिटिज और कोलेस्ट्रोल घटाने में भी लाभकारी। कई लोगों को आलू मेथी की सब्जी खूब पसंद आती है। 


जायफल  जायफल दमा जैसे रोग में लाभकारी होता है, इसका दिल के रोग में काफी बेहतर उपयोग है। जायफल एक सदाबहार वृक्ष होता है।इंडोनेशिया मूल के इस वृक्ष से जायफल और जावित्री प्राप्त होता है।

जाफरान, केसर जाफरान की खुशबू के बारे में तो सुना होगा। पर जाफरान और केसर यह त्वचा संबंधी  रोगों में लाभकारी होता है। इनसे दमा, सर्दी, खांसी का अच्छा उपचार होता है।

चक्र फूल चक्र फूल देखने में सितारे के आकार का होता है। इसे पकने से पहले सूखाकर मसाले के रूप में बेचा जाता है। इसका इस्तेमाल सब्जी और पुलाव को सुगंधित बनाने में किया जाता है। यह हमारे पाचन तंत्र को यह ठीक रखता है। जोड़ों के दर्द में काफी लाभकारी है।


-    -  -- विद्युत प्रकाश मौर्य ( MASALA, SPICE, KITCHEN )   

Thursday, April 4, 2013

अब दिल्ली में लें लिट्टी चोखा का मजा

बिहार के प्रसिद्ध व्यंजन लिट्टी चोखा का लुत्फ अब सालों भर दिल्ली में उठाया जा सकता है। वैसे तो हर साल प्रगति मैदान में लगने वाले व्यापार मेले में लिट्टी चोखा के स्टाल नजर आते हैं लेकिन अब अब पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर में सालों भर हर रोज लिट्टी चोखा का बिहारी स्वाद ले सकते हैं। 

बस लक्ष्मी नगर की साइड में मेट्रो स्टेशन से उतरते ही लिट्टी चोखा के कई स्टॉल आपका स्वागत करती नजर आएंगे। इस दुकान में लिट्टी बिल्कुल बिहारी अंदाज में ही बनाई जा रही है। 

एक कारीगर लिट्टी में सत्तू मिला मसाला भरता है तो दूसरा उसे लकड़ी के कोयले पर बिल्कुल देसी अंदाज में पकाता है। इसके बाद लिट्टी को देसी घी में चुपड़ा जाता है। दुकान में आने वाले ग्राहकों को लिट्टी बैगन के भरता और खास तरह की चटनी के साथ परोसी जाती है। खाकर अगर मन भर जाए तो आप इसे पैक कराकर घर भी ले जा सकते हैं। 

यहां पैकिंग की भी अच्छी व्यवस्था है। वैसे लक्ष्मी नगर में चल रही लिट्टी की इस दुकान की खास बात है मिट्टी की हांडी में बनी दाल। महज दस रूपये में मिलने वाली दाल का अपना अलग स्वाद है। पंद्रह रूपये में एक प्लेट लिट्टी दिल्ली के हिसाब से महंगी नहीं है। 

आप चाहें तो दाल के साथ भी इसका मजा ले सकते हैं। हालांकि दिल्ली में लिट्टी की ये दुकान खोलने वाले लोग यूपी के सुल्तानपुर के रहने वाले हैं लेकिन अंदाज और स्वाद खास बिहारी है। दोपहर एक बजे से रात दस बजे तक यहां लिट्टी का स्वाद लिया जा सकता है। यहां लिट्टी खाकर आपको पटना का गांधी मैदान या मौर्या लोक कांप्लेक्स का स्वाद याद आ सकता है। वैसे इस लिट्टी की दुकान की मार्केटिंग के लिए इन लोगों ने कोईकसर नहीं छोडी है। जरा साइन बोर्ड के संदेश पर नजर डालिए। गैस, पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों के बीच लिट्टी के सस्ता होने का जिक्र खास अंदाज में किया गया है।
दिल्ली के दिलशाद गार्डन में लिट्टी चोखा की दुकान । ( पम्मी चौक से पार्क वाली रोड पर ) 


बढ़ती जा रही हैं दुकानें -   पिछले कुछ सालों में दिल्ली में लिट्टी चोखा की दुकानों में इजाफा हुआ है। अब लक्ष्मीनगर, शकरपुर, कनाट प्लेस में हनुमान मंदिर के आसपास, दिलशाद गार्डन, नोएडा के सेक्टर 18, सेक्टर 15,  सेक्टर 62, सेक्टर 63,  इंदिरापुरम, फरीदाबाद, गुड़गांव में भी कुछ स्थानों पर लिट्टी चोखा का मजा ले सकते हैं। वह भी सालों भर। तो कभी स्टाल नजर आए तो वहां रुककर स्वाद लें। दिल्ली में लिट्टी चोखा को लोकप्रिय बनाने का श्रेय मिस्टर लिट्टी वाला के देवेंद्र कुमार खासतौर पर जाता है। उन्होंने लिट्टी चोखा को ब्रांड बना डाला है। 

 ( LITTI CHOKHA, DELHI, BIHARI FOOD, CHANA SATTU ) 
-    विद्युत प्रकाश मौर्य  ( नई दुनिया में प्रकाशित ) 

Tuesday, April 2, 2013

वैशाली - यहां बजते थे कभी आम्रपाली के घुंघरू


बिहार में वैशाली यानी लोकतंत्र की जन्मभूमि, भगवान बुद्ध की कर्मभूमि और नृत्यांगना आम्रपाली की रंगभूमि। वैशाली नाम कहते हैं राजा विशाल की नगरी के नाम पर पड़ा। वाल्मिकी रामायण में भी वैशाली का जिक्र आता है। अब वैशाली जैसा कोई बड़ा नगर नहीं है यहां। बैसोढ़ नाम का गांव है।

एक सैलानी या इतिहास में रूचि रखने वाले व्यक्ति के रुप में भी आप वैशाली घूमने जाना चाहें तो काफी कुछ देखने लायक है यहां। संयोग से मेरी 10 साल की स्कूली पढ़ाई का ज्यादातर हिस्सा वैशाली जिले के ही अलग अलग स्कूलों में गुजरा। इस दौरान कई बार वैशाली जाना हुआ। हर बार कुछ नया सा नजर आता है वैशाली। 

हर साल वैशाली महोत्सव- वैशाली के ऐतिहासिक स्मृति चिन्हों के बीच हर साल अप्रैल महीने में वैशाली महोत्सव का आयोजन होता है। ऐसे ही एक वैशाली महोत्सव में जाना हुआ। वैशाली के पुराने गौरव को याद करने के लिए आईसीएस और लेखक जगदीशचंद्र माथुर ने वैशाली महोत्सव की शुरूआत  कराई थी।

वैशाली में विशाल गजेंद्र पुष्करिणी ( सरोवर ) के साथ बना है विश्वशांति स्तूप। ये विशाल शांति स्तूप को जापान सरकार ने सहयोग देकर बनवाया है। भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के 12 साल वैशाली में गुजारे। यहीं पर आम्रपाली उनकी शिष्या बनी। कहते हैं बौद्ध भिक्षुणी बनने से पहले वह वैशाली की सबसे महंगी गणिका थी। आचार्य चतुरसेन का उपन्यास वैशाली की नगर वधु तो रामवृक्ष बेनीपुरी ने भी लिखा अंबपाली। आम्रपाली एक फिल्म भी बनी थी। इसमें सुनील दत्त बने अजातशत्रु तो वैजंतीमाला बनीं थीं आम्रपाली।


यूं पहुंची आम्रपाली बुद्ध के शरण में
कोल्हुआ में अशोक स्तंभ। 
राजनर्तकी आम्रपाली ने राह में एक युवा संन्यासी को देखा। वह उसके आकर्षण में बंधकर उसके पीछे चलने लगी। थोड़ी देर बाद संन्यासी एक वृक्ष की छाया में बैठ गया। आम्रपाली भी बैठ गई। उसने संन्यासी से प्रश्न किया, 'आपने युवावस्था में ही संन्यास क्यों ग्रहण किया?' संन्यासी ने उत्तर दिया, 'सत्य की खोज में।' आम्रपाली ने कहा, 'उस सत्य का क्या लाभ, जिसे पाने में आपका यौवन ही खत्म हो जाए।' संन्यासी ने कहा, 'पूर्ण आनंद तो साधु जीवन में ही है। और तुम जिसे सुख समझ रही हो वह तो क्षणिक है।' इस पर आम्रपाली बोली, 'आपका यह विश्वास असत्य सिद्ध होगा। आप कृपया मेरा आतिथ्य स्वीकार करें, जिसके लिए राजकुमार भी लालायित रहते हैं।' संन्यासी ने कुछ सोचकर कहा, 'यदि मेरे गुरु ने इसकी अनुमति दे दी तो मैं आऊंगा।' यह कहकर संन्यासी ने अपने झोले से एक आम निकालकर आम्रपाली को दिया और कहा, 'इसे संभालकर रखना। जब तक मैं आऊं यह खराब न हो।'

संन्यासी ने सारी घटना बुद्ध को बताई। बुद्ध ने संन्यासी को आम्रपाली का अतिथि बनने की अनुमति दे दी। इस पर कुछ अन्य शिष्यों ने आपत्ति व्यक्त की। बुद्ध ने उनकी शंका का निवारण करते हुए कहा, 'इसकी आंखों में थोड़ी भी तृष्णा या वासना नहीं है। यदि मैं मना कर देता तो भी यह मेरी बात अवश्य मानता।' इस बीच आम्रपाली आम को ताजा रखने का प्रयत्न करती रही लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। कुछ दिनों बाद संन्यासी उसके पास पहुंचा और उसने वह आम मांगा। लेकिन वह सड़ गया था, उसमें कीड़े पड़ गए थे।

संन्यासी ने उसकी गुठली निकाल ली और बाकी का हिस्सा फेंक दिया। उसने आम्रपाली से कहा, 'इस गुठली का कुछ नहीं बिगड़ा। इसमें अब भी पुन: उगने की शक्ति है। उसी तरह शरीर गल या सड़ जाएगा लेकिन आत्मा बची रहेगी। आत्मा का ध्यान करो।' यह सुनकर आम्रपाली ने भी बुद्ध की शरण में जाने का फैसला किया। 
( श्याम विलास के सौजन्य से )

कोल्हुआ गांव में अशोक की लाट- वैशाली के पास कोल्हुआ गांव में अशोक की लाट। इसी तरह का एक अशोक स्तंभ पश्चिम चंपारण जिले के लौरिया में भी है। खेतों के बीच स्थित इस अशोक की लाट की तस्वीर हमारे स्कूल के दिन में हर कॉपी पर होती थी। किसी जमाने में बिहार में बहुत लोकप्रिय थी वैशाली कॉपी। अब पता नहीं आती है या नहीं।

शांति स्तूप के पास संग्रहालय -  वैशाली में शांति स्तूप के बगल में एक बड़ा म्यूजिम भी है। म्यूजिम में ऐतिहासिक सामग्री देखी जा सकती है। हालांकि आजादी के सात दशक बाद भी वैशाली गांव जैसा ही है। यहां एक प्राकृत जैन संस्थान नामक शैक्षणिक केंद्र भी है। हरियाणा के नीलोखेड़ी गांव के रहने वाले महान समाजसेवी केडी दीवान ने वैशाली को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। उनके पुनीत कार्यों के लिए उन्हें पद्मश्री भी मिला। भले ही हरियाणा में लोग दीवान साहब को नहीं जानते लेकिन वैशाली जिले में वे पूजे जाते हैं।

कैसे पहुंचे - बिहार की राजधानी पटना से हाजीपुर 20 किलोमीटर। हाजीपुर से लालगंज। और लालगंज से वैशाली। जिला मुख्यालय हाजीपुर से वैशाली तकरीबन 40 किलोमीटर है। आप हाजीपुर में रुकें और वहां से टैक्सी से वैशाली जाएं। दिन भर घूमकर शाम को वापस आ सकते हैं।

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com

( VASHALI, BUDDHA, AMRAPALI, HAJIPUR )