Saturday, March 30, 2013

हरे हरे सहजन में इतने सारे गुण

सहजन या मुनगा ऐसी वनस्पति है जो जड़ से लेकर पत्ती और फूल तक इंसान के काम आती है। यथा बंगाल में 'सजिना', महाराष्ट्र में 'शेगटा', तेलगु में 'मुनग', और हिंदी पट्टी में 'सहजनके अलावा 'सैजन 'मुनगकहा जाता है। दक्षिण भारत के प्रायः हर भोजन में सहजन की मौजूदगी अनिवार्य मानी जाती है। दक्षिण में हर घर में इसे सांबर में जरूर डाला जाता है। 

सहजन यानी DRUMSTICK TREE  का वानस्पतिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा ( Moringa Oleifera)  है।  एक एक बहुत उपयोगी पेड़ है। इसे हिन्दी में सहजनासुजनासेंजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है। हम इसके महत्व को नहीं जानते हैं। यह फूड नहीं बल्कि सुपर फूड है।

आयुर्वेद में 300 रोगों का सहजन से उपचार बताया गया है। इसकी फली, हरी पत्तियों और सूखी पत्तियों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन-ए, सी और बी कॉम्पलैक्स प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।



इस पेड़ के विभिन्न भाग अनेकानेक पोषक तत्वों से भरपूर पाये गये हैं सहजन के पेड़ के लगभग सभी भागों में औषधीय गुण पाया जाता हैं। यह औषधीय गुण कई बीमारियों के उपचार में विशेष रूप से फायदेमंद होते हैं। सहजन के पत्तेछालफूलफल सभी उपयोगी हैं। यह जहां सर्दी में गरमी का अहसास देता हैवहीं भोजन में पाचन में भी मदद करता है।

त्वचा की कई समस्याओं का इलाज सहजन में छिपा है। इनमें कई तरह के हारमोन्स और प्राकृतिक तत्व होते हैंजो त्वचा की सेहत के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इसके फूलपत्तों की कई स्वास्थ्य संबंधी लाभ है।

यह मानव शरीर के यौन शक्ति को बढ़ाने में प्रधान रूप से काम करता है। जो पुरूष लो लिबीडो (कम सेक्स की इच्छा) और इरेक्टाइल डिसफंक्शन (स्तंभन दोष)सेक्स में अरूचि जैसे मर्ज को दूर करता है। सहजन की छाल का पावडर रोज लेने से वीर्य की स्थिरता तथा पुरुषों में शीघ्रपतन की समस्या भी दूर होती है।

बनाएं अचार - सहजन के अचार का स्वाद भी अनूठा होता है। सहजन के अचार के लिए एकदम कच्ची और बिना बीज वाली नरम-नरम सहजन की फलियों का इस्तेमाल किया जाता है। सहजन का ये आचार खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है। सहजन की फली जब एकदम नरम होती हैउनके अन्दर बीज नहीं बन पाते तब ऐसी ही एकदम कच्ची नरम मुलायम सहजन की फली से ही अचार बनता है। 
मुझे याद आता है हमारे गांव सोहवलिया में हमारी बंसवारी के पास सड़क के किनारे एक सहजन का पेड़ हुआ करता था। मां इस पेड़ से फलने वाले सहजन से कभी कभी सब्जी बनाती थी। अचार तो हर साल ही बनता था। अब गांव जाता हूं तो वह पेड़ दिखाई नहीं देता। 
-        ---  विद्युत प्रकाश मौर्य  
 DRUMSTICK TREE, SUPER FOOD ) 

Thursday, March 28, 2013

सोहवलिया - अपने गांव का सफर






कई साल हो गए थे अपने गांव सोहवलिया गए हुए। इस बार सोचा चलो गांव हो आते हैं। बनारस छोड़ रहा था, दिल्ली जाने वाला थासो सोचा पता नहीं अब कितने दिनों बाद गांव आना हो सके। मेरे गांव का नजदीकी रेलवे स्टेशन कुदरा है। कुदरा मुगलसराय जो मध्य भारत का बहुत बड़ा रेलवे जंक्शन है वहां से सिर्फ 75 किलोमीटर है। कुदरा रेलवे स्टेशन भारतीय रेलवे के ग्रैंड कोर्ड लाइन पर है। यह दिल्ली कोलकाता का मुख्य रेल मार्ग है। जब से मैंने होश संभाला है यह रेलवे लाइन विद्युतीकृत है। अब माल ढुलाई की सुविधा के लिए तीसरी लाइन भी इस मार्ग पर बिछ चुकी है। यहां तक तो सब कुछ ठीक है। पर गांव जाने के लिए कुदरा से आगे जो सफर करना पड़ता है वह हमेशा से मुश्किलों भरा रहा है।

मैंने वाराणसी से पैसेंजर ट्रेन पकड़ी दो ढाई घंटे के सफर के बाद जैसे ही प्लेटफार्म पर कुदरा लिखा हुआ नजर आयाबड़ी खुशी हुई कि अपना इलाका आ गया।


रेलवे स्टेशन से उतर कर अपने गांव की ओर जाने वाली सड़क पर आया। किसी जमाने में कुदरा से 14 किलोमीटर का सफर यानी हमारे गांव की ओर जाने के लिए तांगे यानी टमटम या घोड़ा गाड़ी चला करते थे। अब पता चला कि तांगे नहीं चल रहे हैं। सड़क बहुत खराब हैघोड़ागाड़ी यानी एक्का चलाने वालों ने यह कारोबार छोड़ दिया है। कभी कुदरा से परसथुआ मार्ग पर बसें भी चलती थीं। दिन में भर में दो बसें थीं। उमा और राधालक्ष्मी नाम थे उनके। हम बहुत दूर से देखकर ही उन बसों को पहचान लेते थे।

पर सड़कें बहुत खराब होने के कारण बसें चलनी भी कम हो गई हैं। लोगों ने बताया कि जोंगा मिलेगी। अब इ जोंगा का होला....जोंगा आर्मी से आक्सन की गई जीपे हैं। जो उबड़ खाबड़ में चलने के लिए अच्छी हैं। मैं अब किसी जोंगा के इंतजार में था। तब फुटपाथ पर लिट्टी चोखा खाने का आनंद उठाने की सोची। लकड़ी के कोयले पर लोहे की तार की जाली लगाकर छोटी-छोटी लिट्टी बनाकर बेचना हमारे इलाके का बड़ा प्यारा भोजन है। इसके साथ थोड़ा सा आलू-बैगन का चोखा मिलता है। यह समोसेकुलचे या छोले भठुरे से तो अच्छा है। खैर..लिट्टी-चोखा खाके मन जुड़ा गोइल....

कुछ घंटा इंतजार करे के बाद एगो जोंगा आईल....हम दउर के ओमे एगो आगे वाला सीट पर कब्जा कर लेहलीं। जोंगा वाला कहलस गाड़ी पूरा भर जाई तबे चलब। खैर एक घंटा इंतजार करे के बाद जोंगा पूरा भर गोइल। गाड़ी चले के रहे तब तक एगो आदमी अइलन...अरे रूक रूक...हमरो चले के बा...ड्राइवर बोलल...आईं मलिकार...

सफेद पायजामा कुरता कान्ह पर गमछी लेले उ आदमी पान खात अउर मोंछ पर ताव दे रहे...हम त आगे हीं बइठब....अब आगे से एगो आदमी के हटा के पीछे भेजे के रहे। हमारा पहनावा-ओढ़ावा देखके हमारे के केहु पीछे जाए के ना कहल पर एगो दोसर आदमी के पीछे जाए के पड़ल...अब जोंगा के ड्राइवर सब केहू से भाड़ा वसूले लागल....तब उ पायजामा कुरता वाला बाबू कहलें ....हमरो से पइसा मंगबे जान नइखस हम भोखरी गांव के बाबू साहेब हईं...तोरा डर-ओर नइखे लागत का....जोंगा के ड्राइवर जैसे तइसे गाड़ी लेके चल पड़ल....गाड़ी चले पर बाबू साहेब कहलें आरे गाड़ी में कैसेट पर गाना लगाव मनोरंजन होखो...ड्राइवर बोला...मलिकार कैसेट मशीन खराब हो गोइल बा....फिर बाबू साहेब ने डांट पिलाई जल्दी मशीन ठीक कर...ड्राइवर गाड़ी रोककर कैसेट प्लेअर ठीक करने लगा। प्लेअर ठीक नहीं हुआ....

बाकी सब यात्रियों को घर जाने की जल्दी तो थी लेकिन सभी नाटक देख रहे थे। अब बाबू साहेब ने ड्राइवर को कहा..तुम गाड़ी भी चलाओ और साथ में गाना भी गाओ...मैं बजाता हूं....मजबूरी में ड्राइवर ने गाना शुरू किया.....नथुनिये प गोली मारे...ओ....नथुनिये प.....गाना सुन बाबू साहब मस्तियाने लगे...और ताली पीट पीट कर म्युजिक देने लगे....बाकी लोगों का मनोरंजन क्या हो रहा था...मैं ये ठीक ठीक नहीं बता सकता लेकिन धीरे-धीरे मंजिल की ओर लेकर जा रही जोंगा कई बार उलटते उलटते उलटते बची....

खैर चलते चलते हमारे गांव का निकटतम स्टाप आ गया..फुल्ली। यहां से तीन किलोमीटर पैदल का सफर...मैंने अपना पीट्ठू बैग लगा लिया पीठ पर.. और आंखों में गागल्स चढ़ा लिया। सिर पर टोपी भी लगा ली....जून की दोपहर थी..धूप तेज हो चली थी...कई साल बाद अपने ही गांव में जा रहा था। उसी गांव में जहां छुटपना गुजरा.. हजारों बातें उसी तरह याद हैं जैसे लगता है कल की ही तो बात हो...अब गांव तक जाने के लिए सड़क तो बन गई है पर अपना वाहन नहीं हो तो आखिरी तीन किलोमीटर का सफर पैदल ही करना पड़ता है। पैदल चलते चलते कुछ और लोग साथ थे उनसे बातें करने लगा।

एक बुजुर्ग को मैं पहचानने की कोशिश कर रहा था। वे केदार साव थे। बगल वाले गांव के बनिया। वे मेरे दादा जी से फसल कट जाने पर धान और गेहूं खरीदा करते थे। मैंने उन्हें पहचान लिया। बातों में मैंने उन्हें बताया...हमार घर सोहवलिया ह...परिचय देने पर उन्होंने जाना...अच्छा त तू परयाग के नाती हव...कहवां बाड़...हम बतवनी की अबगे तक तक बीएचयू में पढ़त रनी हा...अब जातानी दिल्ली...जर्नलिज्म पढ़े....जर्नलिज्म माने का भइल हो...अखबार के पढ़ाई...अच्छा तब त ठीक बा..

गांव में दादाजी का बनवाया शिव मंदिर 
खैर बातों बातों में गांव आ गया...गांव के एक दादा खेतों में काम करते दिखे...हम त चिन्ह लेनी...उ शामलाल दादा रहन...दउड़ के पांव लगनी..पर उ ना चिन्हल...खैर हम आपन परिचय देनी....जान के दादा के चेहरा पर आइल मुस्कान कबो ना भुलाए जोग रहे। मूल त मूल सूद के आगे बढ़त देख के बुजुर्ग लोग के बाड़ा खुशी होखे ला।


गांव में घर जाए से पहिले अपना दलान पहुंचनी...शंकर जी का मंदिर जो मेरे छोटे दादा विश्वनाथ सिंह ने बनावा था वहां जाकर शीश झुकाया। अब मेरे इस गांव में मेरे परिवार का कोई नहीं रहता। सन 1980 से हमलोग गांव छोड़ चुके हैं। मम्मी-पापा भाई बहन तो बाहर हैं। दादा दादी कबके गुजर गए। मेरे घर में ताला लगा है। मैं एक बार फिर जा पहुंचा मंदिर की सीढ़ियों पर और बैठकर सोचने लगा अब आगे किसके घर जाऊं। 

-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  ( जून, 1995 का सफर 

 ( SOHWALIA DAYS 1, KUDRA, KARGHAR, ROHTAS, BIAHR) 

Tuesday, March 26, 2013

कटनी से अमलोरी कोलफील्ड्स वाया सतना रीवा सीधी

साल 1995 में कटनी जाना हुआ था। एमए में पढ़ते हुए पीसीएस की परीक्षा देने की सूझी थी। हालांकि मैं कभी सिविल सेवाओं में नहीं जाना चाहता था। पर एक बार यूं ही साथियों की संगति में आकर परीक्षा दे दी थी। एमपी  पीसीएस का केंद्र आया कटनी। तो वाराणसी से कटनी जाने के लिए ट्रेन में सवार हुआ। बनारस कैंट में ही एक सहयात्री मिल गए, डीएलडब्लू की पंडित जी, जो कई बार से पीसीएस की परीक्षा दे रहे थे। रेल यात्रा के दौरान कई संभावित सवालों के जवाब उन्होंने मुझे बता दिए। आश्चर्य ये कि उसमें से कई सवाल अगले दिन परीक्षा में आ भी गए। हालांकि इस परीक्षा में चयन न मेरा हुआ न उनका। पर रेलयात्रा में हमने तय किया कटनी में होटल एक साथ ले लेंगे जिससे कुछ रुपयों की बचत हो जाएगी। कटनी जंक्शन उतरने पर हमलोग होटल की तलाश में निकले। काफी परीक्षार्थी आ गए थे इसलिए होटलों में मारामारी थी। खैर हमें एक होटल में कमरा मिल गया। अगले दिन हमारा परीक्षा केंद्र किसी स्कूल में था।
परीक्षा से निवृत होने के बाद तय किया कि कटनी के आसपास घूम कर वाराणसी वापस जाया जाए। तब जनसत्ता में अक्सर मिश्रीलाल जायसवाल, कटनी के छोटे-छोटे पत्र छपते थे। वास्तव में उनकी ख्याति लघु कविता लेखक के तौर पर थी। मैंने उन्हें बीएचयू से ही एक पोस्टकार्ड लिख डाला था कि कटनी आ रहा हूं आपसे मुलाकात करूंगा। सुबह-सुबह मैं मिश्रीलाल जी के घर जा पहुंचा। उनका घर हमारे होटल के पास ही था। बुजुर्ग मिश्रीलाल जी किसी सरकारी नौकरी से रिटायर थे। रोज कई अखबारों के पत्र लिखना उनका प्रिय शगल था। उनके साथ सुबह की चाय पी, कुछ विचार साझा किए। फिर रुखसत हुआ। बाद में पता चला सितंबर 2007 में उनका निधन हो गया। उनकी कविताओं के चार संग्रह भी आ चुके थे। खैर कटनी प्रवास के दौरान मैंने और पंडित जी मैहर देवी के दर्शन के लिए तय किया था। इसलिए हमलोग दोपहर में मैहर के लिए निकल पड़े। कटनी से मैहर की छोटी सी ट्रेन यात्रा की जनरल डिब्बे में।

मैहर में मां शारदा के दर्शन करने के बाद हमारे और पंडित जी के रास्ते अलग हो गए। मैं मैहर सीमेंट प्लांट, सरला नगर के लिए निकल गया। वहां मेरे बड़े मामा जी ज्ञानचंद सिंह के दामाद कर्मचारी थे। उनका नाम था मुनिलाल सिंह। सीमेंट प्लांट की स्टाफ कॉलोनी में उन्हें फ्लैट मिला हुआ था। एक दिन दीदी और जीजा जी के साथ गुजारा। ये दीदी मेरी माताजी के उम्र की थीं। मैं उनसे पहली बार मिला था। मामा जी का नाम लेकर रिश्तेदारी की याद दिलाई। उन्होंने खूब खातिर की। अगले दिन बस स्टाप तक विदा करने आए। मैहर सीमेंट का एक और ब्रांड नाम था सेंचुरी सीमेंट। अब यह बिरला गोल्ड सीमेंट के नाम से आता है। यह बीके बिरला समूह की कंपनी है।

अब शुरू होता है इस यात्रा में नए मोड़ का अचानक आ जाना। मैहर के बाजार में हमारी मुलाकात गांधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा संचालित एक यात्रा के लोगों से हुई। मैं गांधीवादी संस्थाओं से जुड़ाव रखता हूं इसलिए इस यात्र को देखकर रुक गया। जीप पर आठ लोगों के साथ चल रही यह यात्रा अहिंसक समाज की रचना के लिए निकाली गई थी। इसमें हमारे राष्ट्रीय युवा योजना (एनवाईपी) के दो पुराने साथी मिल गए, जिन्होंने मुझे पहचान लिया और यात्रा में कुछ दिन मुझे साथ रहने के लिए आमंत्रित किया। यहीं पर पता चला कि इस यात्रा में शाम को महान गांधीवादी एसएन सुब्बराव जी भी आ रहे हैं। तो सुब्बराव जी से मुलाकात का लोभ देखकर मैं यात्रा का सहभागी बन गया। शाम को सुब्बराव जी आए। उनसे 1991 से ही परिचय गहरा हो गया था। उन्होंने मुझे रात को अपना एक लेख हिंदी में अनुवाद करने का काम सौंप दिया। देर रात मैं ये कार्य करता रहा। अगले दिन यात्रा के साथ हमलोग सतना शहर में थे। सतना में भी कुछ पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई।
इसके बाद अगले दिन मध्य प्रदेश के एक और शहर रीवा में पहुंचे। रीवा में यात्रा का कार्यक्रम अवदेश प्रताप विश्वविद्यालय में था। रीवा में मैंने दोपहर में यात्रा का साथ छोड़ दिया। यहां से मैं वाया सीधी- शक्तिनगर होते हुए वाराणसी सड़क मार्ग से जाने का मन बना चुका था।


मैं रीवा से सीधी बस से पहुंचा। सीधी मध्य प्रदेश का वह जिला है जो भोजपुरी बोलता है। सीधी के बस स्टैंड से मैंने अगली बस ली बैढ़न के लिए। बैढ़न के पास नार्दन कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के अमलोरी प्रोजेक्ट में मेरे मामाजी के बेटे कार्यरत हैं। तब यह सीधी जिले में आता था अब सिंगरौली जिले में आता है। उनके घर एक बार पहले भी जा चुका था, पर तब शक्तिनगर की ओर से आया था। बैढ़न बाजार में पहुंचते हुए बस ने रात के नौ बजा दिए थे। मेरी चिंता थी कि अगर अमलोरी कॉलोनी में जाने वाली आखिरी बस छूट गई तो छोटे से बैढ़न कस्बे में रात कहां गुजारूंगा।

पर इसे संयोग कहिए अमलोरी कॉलोनी की ओर जाने वाली आखिरी बस मिल गई। बस चल पड़ी थी मैंने उसे भागकर पकड़ा। मुझे जान में जान आई। रात 10 बजे के बाद भैया के फ्लैट में मैंने दस्तक दी। कई साल बाद गया था, पर भाभी ने आवाज से पहचान लिया। अगला दिन अमलोरी में गुजरे। भैया ने अमलोरी में कोयले की खुली खदानें दिखाईं। एनसीएल भारत सरकार की मिनी रत्न कंपनी है। इस इलाके में अमलोरी, जयंत और निगाही में एनसीएल की तीन प्रमुख खदानें हैं। इन सबके साथ बड़ी स्टाफ कालोनी है। बाद में अमलोरी से शक्तिनगर, चौपन, चुनार होते हुए वाराणसी वापस आ गया। 


-    - विद्युत प्रकाश मौर्य 
   (KATNI, MAIHAR, SATNA, RIWA, SIDHI, SINGRAULI, BAIDHAN, AMLORI, NCL, COALFIELDS) 
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Sunday, March 24, 2013

हरी चाय पीएं रोगों को दूर भगाएं

सब्ज चाय, हरी चाय  या ग्रीन टी समान्य चाय से अलग चाय होती है। हरी चाय का फ्लेवर ताज़गी से भरपूर और हल्का होता है स्वाद सामान्य चाय से अलग होता है। यह कैमेलिया साइनेन्सिस  नामक पौधे की पत्तियों से बनायी जाती है। इसके बनाने की प्रक्रिया में ऑक्सीकरण न्यूनतम होता है। इसकी खोज चीन में हुई थी और आगे चलकर एशिया में जापान से मध्य पूर्व में लोकप्रिय हुई। इसके सेवन के काफी लाभ होते हैं।

हरी चाय से दिल के रोग होने की संभावनाएं कम हो जाती है। साथ ही कोलेस्ट्राल को कम करने के साथ ही शरीर के वजन को भी नियंत्रित करने में सहायक सिद्ध होती है। आम तौर पर लोग ग्रीन टी के बारे में जानते हैं लेकिन इसकी उचित मात्र न ले पाने की वजह से उन्हें उनका पूरा लाभ नहीं मिल पाता है।
ग्रीन टी पर हुए वैज्ञानिक शोधों में यह बात सामने आई है कि यह सिरदर्द, तनाव, अल्जाइमर्स तथा एसिडिटी के लिए एक शानदार औषधि है।


एक चीनी कहावत है कि चाय के बगैर एक दिन रहने से अच्छा है तीन दिन तक भोजन के बगैर रहना। ग्रीन टी की कुछ किस्में हल्की मिठास लिए होती है, जिसे पसंद के अनुसार दूध और शक्कर के साथ बनाया जा सकता है। ग्रीन टी बनाने के लिए एक प्याले में 2 से 4 ग्राम चाय पत्ती डाली जाती है। पानी को पूरी तरह उबलने के बाद दो से तीन मिनट के लिए छोड़ देते हैं। प्याले में रखी चाय पर गर्म पानी डालकर फिर तीन मिनट छोड़ दें। इसे कुछ देर और ठंडा होने पर सेवन करते हैं।

कितनी पीएं चाय - कहा जाता है कि हर रोज कम से कम आठ कप ग्रीन टी पीना चाहिए। विभिन्न ब्रांड के अनुसार एक दिन में दो से तीन कप ग्रीन टी लाभदायक होती है। इसका अर्थ है कि एक दिन में 300 से 400 मिलीग्राम ग्रीन टी पर्याप्त होती है।

ग्रीन टी के 10 बड़े फायदे 

1 हृदय रोग :  ग्रीन टी कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करके हृदय रोग और स्ट्रोक को रोकने में मदद करता हैयहां तक कि दिल का दौरा पड़ने के बाद यह कोशिका की मृत्यु को रोकता है और हृदय कोशिकाओं के दुबारा बनने की गति को बढ़ाता है।

2 एंटी एजिंग : ग्रीन टी  में polyphenols के रूप में एक एंटी ऑक्सीडेंट होता है जो free radicals के खिलाफ लड़ता है। मतलब यह आपको दीर्घायु बनाता है।

3 कैंसर : यह कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद करता है। ग्रीन टी में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट विटामिन सी से 100 गुना और विटामिन ई से 24 गुना अधिक प्रभावी होता है। यह कैंसर से शरीर की कोशिकाओं की रक्षा करने में मदद करता है।

 4 वजन घटाना  : ग्रीन टी वसा को जलाता है  और स्वाभाविक रूप से Metabolism (उपापचय ) दर को बढ़ा देता है। यह सिर्फ एक दिन में 70 कैलोरी को जला देता है। एक वर्ष में लगभग 3-4 किलोग्राम के करीब वजन घटने के बराबर हो जाता है।

5 त्वचा: ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट free radicals से skin की रक्षा करता है। ये free radicals त्वचा में wrinkling और skin aging जैसे समस्या को जन्म देते हैं. ग्रीन टी त्वचा कैंसर के खिलाफ लड़ाई में भी मदद करता है।

6 गठिया ग्रीन टी संधिशोथ ( arthritis) के जोखिम को रोकने और कम करने में मदद करता है। यह उपास्थि को नष्ट कर देनेवाले एंजाइम को अवरुद्ध करके उपास्थि की रक्षा करता है।

7 यकृत रोग: ग्रीन टी जिगर की विफलता  के साथ लोगों में प्रत्यारोपण की विफलता को रोकने में मदद करता है। हरी चाय fatty livers में हानिकारक मुक्त कण (free radicals ) को नष्ट कर देता है। 

8 उच्च रक्तचाप ग्रीन टी उच्च रक्तचाप को रोकने में मदद करता हैहरी चाय पीने से एंजियोटेनसिन को repress ( दमनकर रक्तचाप को कम रखने में मदद मिलता है।

9 प्रतिरोधक क्षमता :  ग्रीन टी में पाया जाने वाला Polyphenols और flavonoids संक्रमण के खिलाफ लड़ाई में हमारी मदद करते हैं और स्वास्थ्य प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाते हैं।

10 तनाव ग्रीन टी में पाया जानेवाला एक अमीनो एसिड ( Theanine) तनाव और चिंता दूर करने में मदद कर सकते हैं।


- प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश मौर्य 

Friday, March 22, 2013

कई नामों से जाने जाते हैं ये शहर

एक शहर के नए पुराने दो नाम को लेकर काफी लोग भ्रम में रहते हैं। कई बार एक शहर में कई प्रमुख रेलवे स्टेशन के कारण भी भ्रम की स्थिति बनती है। तो आइए बात करते हैं कुछ ऐसे ही शहरों की।

हैदराबाद और सिकंदराबाद यानी टिवन सिटी। दोनों रेलवे स्टेशन के बीच की दूरी 10 किलोमीटर है। वैसे हैदराबाद के लोग हैदराबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन के नामपल्ली नाम से बुलाते हैं तो सिकंदराबाद का कोई और नाम नहीं है। वैसे हैदराबाद में एक और रेलवे स्टेशन है काचीगुडा जहां कई लंबी दूरी की ट्रेनें रुकती हैं।

केरल में पुराने ऐतिहासिक कालीकट शहर का नया नाम है कोझिकोड। पर तमाम लोग अभी भी कालीकट बोलते हैं। इसी तरह कोचीन का नया नाम है कोच्चि। लेकिन एरनाकुलम और कोच्चि करीब करीब एक ही शहर हैं। यहां रेलवे स्टेशन का नाम एरनाकुलम साउथ और एरनाकुलम नार्थ है। कोचीन नाम का कोई रेलवे स्टेशन नहीं है। इसी तरह त्रिवेंद्रम का नया नाम थिरुवनंतपुरम है। साथ कोचिवेली रेलवे स्टेशन भी इसी शहर का हिस्सा है। इसी तरह कन्याकुमारी और नगरकोइल आसपास के शहर हैं।

तमिलनाडु के लोकप्रिय पर्यटन स्थल उटी का एक और नाम उदघमंडलम भी है। मद्रास का नया नाम चेन्नई हो गया है। पर तमाम लोग अभी भी मद्रास ही बोलते हैं। कई रेलगाड़ियां चेन्नई के इगमोर स्टेशन से खुलती हैं।

गुजरात में अहमदाबाद और गांधीनगर आसपास के शहर हैं। दोनों शहरों के बीच में 40 किलोमीटर की दूरी है जो लगातार बन रही कालोनियों के कारण खत्म हो चुकी है। इसी तरह गुजरात के लोकप्रिय शहर बड़ौदा का नया नाम वडोदरा है।

बंबई का नाम मुंबई हो गया। जैसे दिल्ली में कनॉट प्लेस का नया नाम राजीव चौक है लेकिन काफी लोग उसे संक्षेप में अभी भी सीपी बोलते हैं। चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली बिल्कुल मिले हुए शहर हैं। पंजाब में वाघा बार्डर और अटारी पाक सीमा के गांव हैं। पर अटारी भारत में है और वाघा पाकिस्तान में। 

गोवा में मडगांव ओर मरगाओ एक ही शहर के नाम हैं। राजधानी दिल्ली से आपको ट्रेन पकड़ी हो तो नई दिल्ली, दिल्ली, सराय रोहिल्ला, हजरत निजामुद्दीन, आनंद विहार जैसे चार टर्मिनल हैं जहां से अलग अलग दिशाओं की ट्रेन खुलती है। यूपी की राजधानी लखनऊ। यहां का रेलवे स्टेशन है लखनऊ जंक्शन पर यहां लोक इसे चार बाग कहते हैं। किसी जमाने में लखनऊ जंक्शन के पास खूबसूरत चारबाग हुआ करता था। अब उसकी स्मृति मात्र है। 

बिहार की राजधानी पटना में पटना जंक्शन, राजेंद्रनगर, दानापुर, पटना साहिब जैसे स्टेशन हैं तो अब आने वाले दिनों में पाटलिपुत्र नामक नया रेलवे स्टेशन बन गया है जो उत्तर बिहार के लिए बनने वाले रेल पुल से जुड़ेगा। उत्तर बिहार के प्रसिद्ध सोनपुर रेलवे स्टेशन और हाजीपुर के बीच महज छह किलोमीटर का ही अंतर है। अंत में वरुणा और असी नदियों के बीच बसे शहर वाराणसी का नाम तो लेना ही चाहिए जिसे काशी नाम से भी जाना जाता है। यहां पर काशी नाम का एक छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है जो वाराणसी मुगलसराय के बीच गंगा पुल से ठीक पहले आता है। 
आंध्र प्रदेश के शहर विशाखापत्तनम को अंग्रेजी में वाइजेग बोलते हैं। वहीं यहां वाल्टेयर नामक रेलवे स्टेशन और इसी नाम से रेलवे का एक डिविजन भी है।

-    ---विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( ( CITY NAME, NEW AND OLD  ) 

Wednesday, March 20, 2013

ताजगी का प्रतीक है पुदीना

छोटे-छोटे हरे हरे पत्ते में गुण बहुत हैं। लोग पुदीना की चटनी बना कर खाते हैं। पुदीना के गुणों के कारण इसके स्वाद वाली कैंडी और च्यूंगम कंपनियां बनाने लगी हैं। पिपरमिंट जैसा शीतलन प्रभाव के कारण इसे कैंडी और सांसों ताजगी के लिए बड़ा अच्छा माना जाता है। कई लोग ताजी पुदीने की पत्ती को चबाते हैं तो कई लोग पुदीने की स्वाद वाली चाय पीना पसंद करते हैं। पुदीना पाचन को आसान बनाते है साथ ही जाड़े की ठंड के कारण होने वाली रक्त की संकुलता से भी निजात दिलाता है। अधिकांश टूथपेस्ट कंपनियां पुदीने के इस गुण का इस्तेमाल करती हैं वहीं इसके अपने विज्ञापनों में भी प्रमुखता से बताती हैं।

पुदीना का बायोलाजिकल नाम मेन्था पिपेरिटा है। पर इसकी लगभग 25 प्रजातियां पाई जाती हैं। इसकी प्रजातियां यूरोप और एशिया में स्वदेशी हैं। पुदीने का इतिहास बड़ा पुराना है। सदियों से लोग इसका सेवन करते रहे हैं।
लोकश्रुति - एक यूनानी कथा के अनुसार मेंथे नामक एक परी इतनी सुंदर थी कि पाताल लोक का मालिक हैदस उसपर आकर्षित हो गया। हैदस ने मेंथे के साथ अवैध संबंध बना लिए। जब हैदस की पत्नी को इस रिश्ते के बारे में पता चला तो इसने शाप देकर मेंथे को एक छोटे से पौधे के रुप में परिवर्तित कर दिया ताकि लोग उसे पैरों से कुचल सकें। जब हैदस को इसके बारे में पता चला तो उसके जादू को तो वह खत्म नहीं कर सका पर उसने मेंथे को अनूठी खूशबु प्रदान कर दी। अब जब मेंथे को पैरों से कुचला जाता है तो उसकी खूशबु हवा में फैल जाती है।
पुदीने के इस्तेमाल सदियों से सब्जी को स्वादिष्ट बनाने पर और रसोई घर में मसाले के प्रमुख घटक के रुप में किया जा रहा है। जापान के लोग इसके तेल का इस्तेमाल मेंथेनाल बनाने में करते रहे हैं। हीपोक्रेटिस ने इसके बारे में लिखा है कि लोग इसका इस्तेमाल दांतो की सफाई के लिए करते हैं।
पुदीने के कई इस्तेमाल
प्रचीन काल से ही पुदीने के इस्तेमाल मसाले और दवा दोनों के रुप में होता रहा है। दुनिया भर में इससे चाय, शीतल पेय, जेली, सीरप, आइसक्रीम, मुरब्बा और मेमने के व्यंजनों में किया जाता है। रसोई घर में चाट मसाला, हरे पुदीने की चटनी और थाई करी में इसका इस्तेमाल होता रहा है।
पुदीना बहुत सी सब्जियों जैसे नए आलू, टमाटर, गाजर और मटर के साथ आसानी से मिल जाता है। इसकी कटी पत्तियां सलादों को ताजगी प्रदान करती हैं। भारत में ताजे पुदीने की चटनी बिरयानी के साथ परोसी जाती है तो अरब वासी पुदीने की चाय का आनंद लेते हैं।
पुदीना के औषधीय गुण
पुदीना पीड़ानाशक, उद्दीपक और भूख बढ़ाने वाला माना जाता है। पिपरमिंट के निर्माण में मेंथाल का सर्वाधिक प्रयोग होता है। पुदीने का नियमित इस्तेमाल जुकाम, फ्लू और बुखार में फायदेमंद है। यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि शिशुएं के लिए हानिकारक हो सकता है। पुदीने के पिपरमिंट का इस्तेमाल च्यूंगम बनाने में होता है जो ताजगी प्रदान करता है।
--- माधवी रंजना
(MENTHA, PUDINA, MINT )