Saturday, March 30, 2013

ये दिल मांगे जामुनी रंग के फल



ये दिल मांगे मोर... खूब लोकप्रिय लाइन है। पर क्या आपको पता है कि आपका दिल का मांगता है। वास्तव में दिल को चाहिए जामुनी रंग की खुराक यानी परपल कलर के फल और सब्जियां। कई शोध ये सामने आया है कि जामुनी रंग की फल और सब्जियां दिल की सेहत के लिए अच्छी हैं। ये फल और सब्जियां आपके शरीर में गुड कोलेस्ट्राल को बढ़ाने में सहायक हैं।

क्या आप जानते हैं कि आपका खाना पीना आपके मुंह के स्वाद नहीं बल्कि आपके दिल की जरूरतों के मुताबिक भी होना चाहिए। पर अक्सर हमें ये नहीं पता होता कि हमारे दिल की जरूरत क्या है।

कहा गया है कि हर रंग कुछ कहता है। तो हम जब फल और सब्जियों की ओर रुख करते हैं तो उनके रंग का भी काफी महत्व है। तो इसी सिलसिले में जामुनी रंग के फल और सब्जियों की बात करें तो ये शरीर में अच्छे कोलेस्ट्रोल को बढ़ाने में काफी सहायक होती हैं। दिल की सेहत के लिए बनाई जाने वाली कई दवाएं तो ब्लैक ग्रेप यानी काले रंग के अंगूर से बनाई जाती हैं।

काला अंगूर ( BLACK GRAPE ) - तो इन जामुनी रंग के फलों में सबसे पहले बात करते हैं ब्लैक ग्रेप की। वास्तव में ये पूरी तरह काला नहीं बल्कि हल्का जामुनी रंग का होता है। यह देश दुनिया में उगाए जाने वाले सबसे प्राचीन फलों में शामिल है। इसका इतिहास आठ हजार साल पहले भी मिलता है। यह विटामिन और एंटी ऑक्सीडेंट के गुणों से भरपूर होता है। मिशिगन यूनीवर्सिटी के एक शोध के मुताबिक यह दिल के लिए काफी अच्छा होता है। यह रक्तचाप बढ़ाने, मोटापा घटाने के साथ शरीर में गुड कोलेस्ट्रोल ( एचडीएल) को तेजी से बढ़ाता है। यह आंखों की रोशनी बढ़ाने और कैंसर से लड़ने में भी मददगार है।

जामुन – ( JAMBUL, JAVA PLUM ) बात जामुन की करें तो इसके नाम पर भी जामुनी रंग की पहचान होती है। जामुन न सिर्फ शुगर मरीजों के लिए लाभकारी है बल्कि यह दिल के लिए भी अच्छा है। हां जामुन को खाने के दो घंटे बाद खाना चाहिए। साथ ही इसके आगे पीछे दूध नहीं पीना चाहिए। इसमें विटामिन बी, कैरेटीन, मैग्नेशियम और फाइबर होता है। इसको खाने से पेट से जुड़ी कई तरह की समस्याएं दूर हो जाती हैं। यह कैंसर और पथरी से लड़ने में भी काफी कारगर है।


चुकंदर – ( BEETROOT ) चुकंदर आपको मधुमेह, खून की कमी और कोलेस्ट्रोल जैसी बीमारियों से बचाता है। यह न सिर्फ खून में वृद्धि करता है बल्कि शरीर में गुड कोलेस्ट्रोल भी बढ़ाता है। इसे ज्यादातर सलाद के रूप में ही खाना चाहिए। इसका जूस पीना ठीक नहीं है। इसे खाली पेट भी खा सकते हैं। इसकी पत्तियां भी काफी गुणकारी होती हैं। चुकंदर में विटामिन बी, विटामिन सी, फास्पोरस, कैल्शियम होता है। यह एंटी आक्सीडेंट के गुणों से भरपूर है।


बैंगन और काली गाजर – आम तौर पर लोग सब्जियों में बैगन की उपेक्षा करते हैं तो पर बैंगन भी दिल के लिए काफी अच्छा होता है। इसलिए आप बैगन की सब्जी और इसका भरता खूब खाएं। इसी तरह काले रंग वाली गाजर भी सेहत के गुणों से भरपूर होती है।

शहतूत - ( MULBERRY ) इस तरह के फलों के क्रम में आप शहतूत को भी शामिल कर सकते हैं।भोजपुरी क्षेत्र मे इसे तूत भी कहते हैं। शहतूत का फल खाने में जितना स्वादिष्ट होता है उतना सेहतमंद भी होता है। आयुर्वेद में तो शहतूत के ढेरों फायदों का बखान मिलता है। 
शहतूत में पोटैशियम, विटामिन ए और फॉस्फोरस प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह शरीर में फैले प्रदूषण को साफ करके बाहर निकालने में कारगर है। 

तो अगली बार जब आप खाने पीने के लिए फल और सब्जियां खरीदने निकलें तो उनके रंगो का भी खूब ख्याल रखें। वे फल आपकी सेहत का ख्याल रखेंगे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( PURPLE COLOR FRUITS, JAMUN, BLACK GRAPE, MULBERRY, CHUKANDAR, BEETROOT, BAINGAN )

Thursday, March 28, 2013

सोहवलिया - अपने गांव का सफर






कई साल हो गए थे अपने गांव सोहवलिया गए हुए। इस बार सोचा चलो गांव हो आते हैं। बनारस छोड़ रहा था, दिल्ली जाने वाला थासो सोचा पता नहीं अब कितने दिनों बाद गांव आना हो सके। मेरे गांव का नजदीकी रेलवे स्टेशन कुदरा है। कुदरा मुगलसराय जो मध्य भारत का बहुत बड़ा रेलवे जंक्शन है वहां से सिर्फ 75 किलोमीटर है। कुदरा रेलवे स्टेशन भारतीय रेलवे के ग्रैंड कोर्ड लाइन पर है। यह दिल्ली कोलकाता का मुख्य रेल मार्ग है। जब से मैंने होश संभाला है यह रेलवे लाइन विद्युतीकृत है। अब माल ढुलाई की सुविधा के लिए तीसरी लाइन भी इस मार्ग पर बिछ चुकी है। यहां तक तो सब कुछ ठीक है। पर गांव जाने के लिए कुदरा से आगे जो सफर करना पड़ता है वह हमेशा से मुश्किलों भरा रहा है।

मैंने वाराणसी से पैसेंजर ट्रेन पकड़ी दो ढाई घंटे के सफर के बाद जैसे ही प्लेटफार्म पर कुदरा लिखा हुआ नजर आयाबड़ी खुशी हुई कि अपना इलाका आ गया।


रेलवे स्टेशन से उतर कर अपने गांव की ओर जाने वाली सड़क पर आया। किसी जमाने में कुदरा से 14 किलोमीटर का सफर यानी हमारे गांव की ओर जाने के लिए तांगे यानी टमटम या घोड़ा गाड़ी चला करते थे। अब पता चला कि तांगे नहीं चल रहे हैं। सड़क बहुत खराब हैघोड़ागाड़ी यानी एक्का चलाने वालों ने यह कारोबार छोड़ दिया है। कभी कुदरा से परसथुआ मार्ग पर बसें भी चलती थीं। दिन में भर में दो बसें थीं। उमा और राधालक्ष्मी नाम थे उनके। हम बहुत दूर से देखकर ही उन बसों को पहचान लेते थे।

पर सड़कें बहुत खराब होने के कारण बसें चलनी भी कम हो गई हैं। लोगों ने बताया कि जोंगा मिलेगी। अब इ जोंगा का होला....जोंगा आर्मी से आक्सन की गई जीपे हैं। जो उबड़ खाबड़ में चलने के लिए अच्छी हैं। मैं अब किसी जोंगा के इंतजार में था। तब फुटपाथ पर लिट्टी चोखा खाने का आनंद उठाने की सोची। लकड़ी के कोयले पर लोहे की तार की जाली लगाकर छोटी-छोटी लिट्टी बनाकर बेचना हमारे इलाके का बड़ा प्यारा भोजन है। इसके साथ थोड़ा सा आलू-बैगन का चोखा मिलता है। यह समोसेकुलचे या छोले भठुरे से तो अच्छा है। खैर..लिट्टी-चोखा खाके मन जुड़ा गोइल....

कुछ घंटा इंतजार करे के बाद एगो जोंगा आईल....हम दउर के ओमे एगो आगे वाला सीट पर कब्जा कर लेहलीं। जोंगा वाला कहलस गाड़ी पूरा भर जाई तबे चलब। खैर एक घंटा इंतजार करे के बाद जोंगा पूरा भर गोइल। गाड़ी चले के रहे तब तक एगो आदमी अइलन...अरे रूक रूक...हमरो चले के बा...ड्राइवर बोलल...आईं मलिकार...

सफेद पायजामा कुरता कान्ह पर गमछी लेले उ आदमी पान खात अउर मोंछ पर ताव दे रहे...हम त आगे हीं बइठब....अब आगे से एगो आदमी के हटा के पीछे भेजे के रहे। हमारा पहनावा-ओढ़ावा देखके हमारे के केहु पीछे जाए के ना कहल पर एगो दोसर आदमी के पीछे जाए के पड़ल...अब जोंगा के ड्राइवर सब केहू से भाड़ा वसूले लागल....तब उ पायजामा कुरता वाला बाबू कहलें ....हमरो से पइसा मंगबे जान नइखस हम भोखरी गांव के बाबू साहेब हईं...तोरा डर-ओर नइखे लागत का....जोंगा के ड्राइवर जैसे तइसे गाड़ी लेके चल पड़ल....गाड़ी चले पर बाबू साहेब कहलें आरे गाड़ी में कैसेट पर गाना लगाव मनोरंजन होखो...ड्राइवर बोला...मलिकार कैसेट मशीन खराब हो गोइल बा....फिर बाबू साहेब ने डांट पिलाई जल्दी मशीन ठीक कर...ड्राइवर गाड़ी रोककर कैसेट प्लेअर ठीक करने लगा। प्लेअर ठीक नहीं हुआ....

बाकी सब यात्रियों को घर जाने की जल्दी तो थी लेकिन सभी नाटक देख रहे थे। अब बाबू साहेब ने ड्राइवर को कहा..तुम गाड़ी भी चलाओ और साथ में गाना भी गाओ...मैं बजाता हूं....मजबूरी में ड्राइवर ने गाना शुरू किया.....नथुनिये प गोली मारे...ओ....नथुनिये प.....गाना सुन बाबू साहब मस्तियाने लगे...और ताली पीट पीट कर म्युजिक देने लगे....बाकी लोगों का मनोरंजन क्या हो रहा था...मैं ये ठीक ठीक नहीं बता सकता लेकिन धीरे-धीरे मंजिल की ओर लेकर जा रही जोंगा कई बार उलटते उलटते उलटते बची....

खैर चलते चलते हमारे गांव का निकटतम स्टाप आ गया..फुल्ली। यहां से तीन किलोमीटर पैदल का सफर...मैंने अपना पीट्ठू बैग लगा लिया पीठ पर.. और आंखों में गागल्स चढ़ा लिया। सिर पर टोपी भी लगा ली....जून की दोपहर थी..धूप तेज हो चली थी...कई साल बाद अपने ही गांव में जा रहा था। उसी गांव में जहां छुटपना गुजरा.. हजारों बातें उसी तरह याद हैं जैसे लगता है कल की ही तो बात हो...अब गांव तक जाने के लिए सड़क तो बन गई है पर अपना वाहन नहीं हो तो आखिरी तीन किलोमीटर का सफर पैदल ही करना पड़ता है। पैदल चलते चलते कुछ और लोग साथ थे उनसे बातें करने लगा।

एक बुजुर्ग को मैं पहचानने की कोशिश कर रहा था। वे केदार साव थे। बगल वाले गांव के बनिया। वे मेरे दादा जी से फसल कट जाने पर धान और गेहूं खरीदा करते थे। मैंने उन्हें पहचान लिया। बातों में मैंने उन्हें बताया...हमार घर सोहवलिया ह...परिचय देने पर उन्होंने जाना...अच्छा त तू परयाग के नाती हव...कहवां बाड़...हम बतवनी की अबगे तक तक बीएचयू में पढ़त रनी हा...अब जातानी दिल्ली...जर्नलिज्म पढ़े....जर्नलिज्म माने का भइल हो...अखबार के पढ़ाई...अच्छा तब त ठीक बा..

गांव में दादाजी का बनवाया शिव मंदिर 
खैर बातों बातों में गांव आ गया...गांव के एक दादा खेतों में काम करते दिखे...हम त चिन्ह लेनी...उ शामलाल दादा रहन...दउड़ के पांव लगनी..पर उ ना चिन्हल...खैर हम आपन परिचय देनी....जान के दादा के चेहरा पर आइल मुस्कान कबो ना भुलाए जोग रहे। मूल त मूल सूद के आगे बढ़त देख के बुजुर्ग लोग के बाड़ा खुशी होखे ला।


गांव में घर जाए से पहिले अपना दलान पहुंचनी...शंकर जी का मंदिर जो मेरे छोटे दादा विश्वनाथ सिंह ने बनावा था वहां जाकर शीश झुकाया। अब मेरे इस गांव में मेरे परिवार का कोई नहीं रहता। सन 1980 से हमलोग गांव छोड़ चुके हैं। मम्मी-पापा भाई बहन तो बाहर हैं। दादा दादी कबके गुजर गए। मेरे घर में ताला लगा है। मैं एक बार फिर जा पहुंचा मंदिर की सीढ़ियों पर और बैठकर सोचने लगा अब आगे किसके घर जाऊं। 

-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  ( जून, 1995 का सफर 

 ( SOHWALIA DAYS 1, KUDRA, KARGHAR, ROHTAS, BIAHR) 

Tuesday, March 26, 2013

कटनी से अमलोरी कोलफील्ड्स वाया सतना रीवा सीधी

साल 1995 में कटनी जाना हुआ था। एमए में पढ़ते हुए पीसीएस की परीक्षा देने की सूझी थी। हालांकि मैं कभी सिविल सेवाओं में नहीं जाना चाहता था। पर एक बार यूं ही साथियों की संगति में आकर परीक्षा दे दी थी। एमपी  पीसीएस का केंद्र आया कटनी। तो वाराणसी से कटनी जाने के लिए ट्रेन में सवार हुआ। बनारस कैंट में ही एक सहयात्री मिल गए, डीएलडब्लू की पंडित जी, जो कई बार से पीसीएस की परीक्षा दे रहे थे। रेल यात्रा के दौरान कई संभावित सवालों के जवाब उन्होंने मुझे बता दिए। आश्चर्य ये कि उसमें से कई सवाल अगले दिन परीक्षा में आ भी गए। हालांकि इस परीक्षा में चयन न मेरा हुआ न उनका। पर रेलयात्रा में हमने तय किया कटनी में होटल एक साथ ले लेंगे जिससे कुछ रुपयों की बचत हो जाएगी। कटनी जंक्शन उतरने पर हमलोग होटल की तलाश में निकले। काफी परीक्षार्थी आ गए थे इसलिए होटलों में मारामारी थी। खैर हमें एक होटल में कमरा मिल गया। अगले दिन हमारा परीक्षा केंद्र किसी स्कूल में था।
परीक्षा से निवृत होने के बाद तय किया कि कटनी के आसपास घूम कर वाराणसी वापस जाया जाए। तब जनसत्ता में अक्सर मिश्रीलाल जायसवाल, कटनी के छोटे-छोटे पत्र छपते थे। वास्तव में उनकी ख्याति लघु कविता लेखक के तौर पर थी। मैंने उन्हें बीएचयू से ही एक पोस्टकार्ड लिख डाला था कि कटनी आ रहा हूं आपसे मुलाकात करूंगा। सुबह-सुबह मैं मिश्रीलाल जी के घर जा पहुंचा। उनका घर हमारे होटल के पास ही था। बुजुर्ग मिश्रीलाल जी किसी सरकारी नौकरी से रिटायर थे। रोज कई अखबारों के पत्र लिखना उनका प्रिय शगल था। उनके साथ सुबह की चाय पी, कुछ विचार साझा किए। फिर रुखसत हुआ। बाद में पता चला सितंबर 2007 में उनका निधन हो गया। उनकी कविताओं के चार संग्रह भी आ चुके थे। खैर कटनी प्रवास के दौरान मैंने और पंडित जी मैहर देवी के दर्शन के लिए तय किया था। इसलिए हमलोग दोपहर में मैहर के लिए निकल पड़े। कटनी से मैहर की छोटी सी ट्रेन यात्रा की जनरल डिब्बे में।

मैहर में मां शारदा के दर्शन करने के बाद हमारे और पंडित जी के रास्ते अलग हो गए। मैं मैहर सीमेंट प्लांट, सरला नगर के लिए निकल गया। वहां मेरे बड़े मामा जी ज्ञानचंद सिंह के दामाद कर्मचारी थे। उनका नाम था मुनिलाल सिंह। सीमेंट प्लांट की स्टाफ कॉलोनी में उन्हें फ्लैट मिला हुआ था। एक दिन दीदी और जीजा जी के साथ गुजारा। ये दीदी मेरी माताजी के उम्र की थीं। मैं उनसे पहली बार मिला था। मामा जी का नाम लेकर रिश्तेदारी की याद दिलाई। उन्होंने खूब खातिर की। अगले दिन बस स्टाप तक विदा करने आए। मैहर सीमेंट का एक और ब्रांड नाम था सेंचुरी सीमेंट। अब यह बिरला गोल्ड सीमेंट के नाम से आता है। यह बीके बिरला समूह की कंपनी है।

अब शुरू होता है इस यात्रा में नए मोड़ का अचानक आ जाना। मैहर के बाजार में हमारी मुलाकात गांधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा संचालित एक यात्रा के लोगों से हुई। मैं गांधीवादी संस्थाओं से जुड़ाव रखता हूं इसलिए इस यात्र को देखकर रुक गया। जीप पर आठ लोगों के साथ चल रही यह यात्रा अहिंसक समाज की रचना के लिए निकाली गई थी। इसमें हमारे राष्ट्रीय युवा योजना (एनवाईपी) के दो पुराने साथी मिल गए, जिन्होंने मुझे पहचान लिया और यात्रा में कुछ दिन मुझे साथ रहने के लिए आमंत्रित किया। यहीं पर पता चला कि इस यात्रा में शाम को महान गांधीवादी एसएन सुब्बराव जी भी आ रहे हैं। तो सुब्बराव जी से मुलाकात का लोभ देखकर मैं यात्रा का सहभागी बन गया। शाम को सुब्बराव जी आए। उनसे 1991 से ही परिचय गहरा हो गया था। उन्होंने मुझे रात को अपना एक लेख हिंदी में अनुवाद करने का काम सौंप दिया। देर रात मैं ये कार्य करता रहा। अगले दिन यात्रा के साथ हमलोग सतना शहर में थे। सतना में भी कुछ पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई।
इसके बाद अगले दिन मध्य प्रदेश के एक और शहर रीवा में पहुंचे। रीवा में यात्रा का कार्यक्रम अवदेश प्रताप विश्वविद्यालय में था। रीवा में मैंने दोपहर में यात्रा का साथ छोड़ दिया। यहां से मैं वाया सीधी- शक्तिनगर होते हुए वाराणसी सड़क मार्ग से जाने का मन बना चुका था।


मैं रीवा से सीधी बस से पहुंचा। सीधी मध्य प्रदेश का वह जिला है जो भोजपुरी बोलता है। सीधी के बस स्टैंड से मैंने अगली बस ली बैढ़न के लिए। बैढ़न के पास नार्दन कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के अमलोरी प्रोजेक्ट में मेरे मामाजी के बेटे कार्यरत हैं। तब यह सीधी जिले में आता था अब सिंगरौली जिले में आता है। उनके घर एक बार पहले भी जा चुका था, पर तब शक्तिनगर की ओर से आया था। बैढ़न बाजार में पहुंचते हुए बस ने रात के नौ बजा दिए थे। मेरी चिंता थी कि अगर अमलोरी कॉलोनी में जाने वाली आखिरी बस छूट गई तो छोटे से बैढ़न कस्बे में रात कहां गुजारूंगा।

पर इसे संयोग कहिए अमलोरी कॉलोनी की ओर जाने वाली आखिरी बस मिल गई। बस चल पड़ी थी मैंने उसे भागकर पकड़ा। मुझे जान में जान आई। रात 10 बजे के बाद भैया के फ्लैट में मैंने दस्तक दी। कई साल बाद गया था, पर भाभी ने आवाज से पहचान लिया। अगला दिन अमलोरी में गुजरे। भैया ने अमलोरी में कोयले की खुली खदानें दिखाईं। एनसीएल भारत सरकार की मिनी रत्न कंपनी है। इस इलाके में अमलोरी, जयंत और निगाही में एनसीएल की तीन प्रमुख खदानें हैं। इन सबके साथ बड़ी स्टाफ कालोनी है। बाद में अमलोरी से शक्तिनगर, चौपन, चुनार होते हुए वाराणसी वापस आ गया। 


-    - विद्युत प्रकाश मौर्य 
   (KATNI, MAIHAR, SATNA, RIWA, SIDHI, SINGRAULI, BAIDHAN, AMLORI, NCL, COALFIELDS) 
(

Sunday, March 24, 2013

हरी चाय पीएं रोगों को दूर भगाएं

सब्ज चाय, हरी चाय  या ग्रीन टी समान्य चाय से अलग चाय होती है। हरी चाय का फ्लेवर ताज़गी से भरपूर और हल्का होता है स्वाद सामान्य चाय से अलग होता है। यह कैमेलिया साइनेन्सिस  नामक पौधे की पत्तियों से बनायी जाती है। इसके बनाने की प्रक्रिया में ऑक्सीकरण न्यूनतम होता है। इसकी खोज चीन में हुई थी और आगे चलकर एशिया में जापान से मध्य पूर्व में लोकप्रिय हुई। इसके सेवन के काफी लाभ होते हैं।

हरी चाय से दिल के रोग होने की संभावनाएं कम हो जाती है। साथ ही कोलेस्ट्राल को कम करने के साथ ही शरीर के वजन को भी नियंत्रित करने में सहायक सिद्ध होती है। आम तौर पर लोग ग्रीन टी के बारे में जानते हैं लेकिन इसकी उचित मात्र न ले पाने की वजह से उन्हें उनका पूरा लाभ नहीं मिल पाता है।
ग्रीन टी पर हुए वैज्ञानिक शोधों में यह बात सामने आई है कि यह सिरदर्द, तनाव, अल्जाइमर्स तथा एसिडिटी के लिए एक शानदार औषधि है।


एक चीनी कहावत है कि चाय के बगैर एक दिन रहने से अच्छा है तीन दिन तक भोजन के बगैर रहना। ग्रीन टी की कुछ किस्में हल्की मिठास लिए होती है, जिसे पसंद के अनुसार दूध और शक्कर के साथ बनाया जा सकता है। ग्रीन टी बनाने के लिए एक प्याले में 2 से 4 ग्राम चाय पत्ती डाली जाती है। पानी को पूरी तरह उबलने के बाद दो से तीन मिनट के लिए छोड़ देते हैं। प्याले में रखी चाय पर गर्म पानी डालकर फिर तीन मिनट छोड़ दें। इसे कुछ देर और ठंडा होने पर सेवन करते हैं।

कितनी पीएं चाय - कहा जाता है कि हर रोज कम से कम आठ कप ग्रीन टी पीना चाहिए। विभिन्न ब्रांड के अनुसार एक दिन में दो से तीन कप ग्रीन टी लाभदायक होती है। इसका अर्थ है कि एक दिन में 300 से 400 मिलीग्राम ग्रीन टी पर्याप्त होती है।

ग्रीन टी के 10 बड़े फायदे 

1 हृदय रोग :  ग्रीन टी कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करके हृदय रोग और स्ट्रोक को रोकने में मदद करता हैयहां तक कि दिल का दौरा पड़ने के बाद यह कोशिका की मृत्यु को रोकता है और हृदय कोशिकाओं के दुबारा बनने की गति को बढ़ाता है।

2 एंटी एजिंग : ग्रीन टी  में polyphenols के रूप में एक एंटी ऑक्सीडेंट होता है जो free radicals के खिलाफ लड़ता है। मतलब यह आपको दीर्घायु बनाता है।

3 कैंसर : यह कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद करता है। ग्रीन टी में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट विटामिन सी से 100 गुना और विटामिन ई से 24 गुना अधिक प्रभावी होता है। यह कैंसर से शरीर की कोशिकाओं की रक्षा करने में मदद करता है।

 4 वजन घटाना  : ग्रीन टी वसा को जलाता है  और स्वाभाविक रूप से Metabolism (उपापचय ) दर को बढ़ा देता है। यह सिर्फ एक दिन में 70 कैलोरी को जला देता है। एक वर्ष में लगभग 3-4 किलोग्राम के करीब वजन घटने के बराबर हो जाता है।

5 त्वचा: ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट free radicals से skin की रक्षा करता है। ये free radicals त्वचा में wrinkling और skin aging जैसे समस्या को जन्म देते हैं. ग्रीन टी त्वचा कैंसर के खिलाफ लड़ाई में भी मदद करता है।

6 गठिया ग्रीन टी संधिशोथ ( arthritis) के जोखिम को रोकने और कम करने में मदद करता है। यह उपास्थि को नष्ट कर देनेवाले एंजाइम को अवरुद्ध करके उपास्थि की रक्षा करता है।

7 यकृत रोग: ग्रीन टी जिगर की विफलता  के साथ लोगों में प्रत्यारोपण की विफलता को रोकने में मदद करता है। हरी चाय fatty livers में हानिकारक मुक्त कण (free radicals ) को नष्ट कर देता है। 

8 उच्च रक्तचाप ग्रीन टी उच्च रक्तचाप को रोकने में मदद करता हैहरी चाय पीने से एंजियोटेनसिन को repress ( दमनकर रक्तचाप को कम रखने में मदद मिलता है।

9 प्रतिरोधक क्षमता :  ग्रीन टी में पाया जाने वाला Polyphenols और flavonoids संक्रमण के खिलाफ लड़ाई में हमारी मदद करते हैं और स्वास्थ्य प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाते हैं।

10 तनाव ग्रीन टी में पाया जानेवाला एक अमीनो एसिड ( Theanine) तनाव और चिंता दूर करने में मदद कर सकते हैं।


- प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश मौर्य 

Friday, March 22, 2013

खाइए अंडा रहित शाकाहारी बिस्कुट


बिस्कुट हर कोई खाता है। यह चाय के साथ हल्के नास्ते के तौर पर है तो आपके सफर का साथी। यानी रेडीमेड फूड की तरह है। कई बार थोड़ी भूख लगने पर लोग बिस्कुट खाते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि तमाम कंपनियां बिस्कुट के निर्माण में अंडा मिलाती हैं। अगर आप शाकाहारी हैं तो आपको कोई भी बिस्कुट खाने से पहले इसकी जांच करनी चाहिए कि कहीं इसमें अंडा तो नहीं। खासकर नमकीन बिस्कुट में अंडा होने की संभावना ज्यादा रहती है।

हाथ के बने बिस्कुट - दिल्ली में आज भी हैंडमेड बिस्कुट का चलन है। आपको चलते फिरते ठेले पर आटे के बिस्कुट बनाकर उसे कोयले के चूल्हे पर सेंक कर बेचने वाले मिल जाएंगे। ये बिस्कुट अंडा रहित होते हैं साथ इनका स्वाद भी बेहतर होता है। आप अपना आटा देकर भी इनसे बिस्कुट बनवा सकते हैं। इसके अलावा कुछ ऐसा कंपनियां भी हैं तो हैंडमेड शाकाहारी बिस्कुट के निर्माण में सालों से लगी हैं।
दिल्ली की एक बहुत पुरानी कंपनी फ्रंटियर बिस्कुट बिना अंडो के बिस्किट का निर्माण करती है। आठ दशक से ज्यादा पुरानी ये कंपनी होम मेड बिस्कुट बनाने में ख्यात है। आजकल फ्रंटियर के पूरी दिल्ली में 40 से ज्यादा शो रूम है। यहां आप कई दर्जन वेराइटी के शाकाहारी बिस्कुट खरीद सकते है। फ्रंटियर बिस्कुट न सिर्फ 50 से ज्यादा वेराइटी के बिस्कुट का निर्माण करती है बल्कि यहां बिस्कुट लूज और पैकिंग में दोनों ही तरीके से खरीदा जा सकता है। फ्रंटियर पैकिंग बिस्कुट में अलग अलग तरह के गिफ्ट पैक भी उपलब्ध कराती है। इन्हें मिठाइयों के बदले गिफ्ट में दिया जा सकता है। फ्रंटियर की जीरा और आजवान टेस्ट वाली बिस्कुट के स्वाद का तो कहना ही क्या। अब फ्रंटियर ने दिल्ली के कई शापिंग माल्स में भी अपने शो रुम खोल दिए हैं। ज्यादा जानकारी के लिए आप उनकी वेबसाइट भी देख सकते हैं। http://www.frontierbiscuit.com/
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विद्युत प्रकाश मौर्य 

( ( EGGLESS BISCUIT, CAKE, FRONTIER, DELHI )

Thursday, March 21, 2013

हरिद्वार ऋषिकेश- आखिर कौन है असली चोटीवाला



चोटीवाला। नाम कुछ अजीब लगता है न। पर ये है खाने पीने का रेस्टोरेंट। कई दशकों से जो लोग हरिद्वार या ऋषिकेश घूमने जा रहे हैं वे अक्सर चोटीवाला के रेस्टोरेंट में खाने जरूर जाते हैं। लेकिन हरिद्वार जाने के बाद यह समझ पाना मुश्किल है कि असली चोटीवाला कौन है। हरिद्वार में चोटीवाला नाम के तीन रेस्टोरेंट हैं और ऋषिकेश में दो। पर ये माना जाता है कि ऋषिकेश वाला चोटीवाला ही असली है। हर की पैड़ी वाला चोटीवाला के नाम से पहले डिलक्स चोटीवाला लगा हुआ है। पर आम लोग तो नाम को लेकर थोड़ा भ्रमित जरूर होते हैं। हरिद्वार हर की पैड़ी वाले चोटीवाला के दो प्रवेश द्वार हैं। एक गंगा तट की तरफ से और दूसरा गली की तरफ से। गंगा तट पर होने के कारण यहां ग्राहक खूब आते हैं। 

असली चोटीवाला ऋषिकेश में - ऋषिकेश से आगे बढ़ने पर मुनि की रेती में रामझूला या शिवानंद झूला को पार करके जैसे ही आप स्वर्गाश्रम की ओर बढ़ते हैं तो वहां चोटीवाला का शानदार रेस्टोरेंट दिखाई देता है। किसी जमाने में ढाबेनुमा रेस्टोरेंट अब हाई फाई रेस्टोरेंट की शक्ल ले चुका है। इसकी अपनी वेबसाइट भी है। पर यहां पर भी बिल्कुल अगल बगल में दो चोटीवाला रेस्टोरेंट खुल चुके हैं। दोनों असली होने का दावा करते हैं। चोटीवाला रेस्टोरेंट की खास बात है रेस्टोरेंट के बाहर एक लंबी चोटीवाला आदमी ग्राहकों का मुस्कुराकर स्वागत करता रहता है। चेहरे पर खास किस्म का पेंट लगाकर यह आदमी दिन भर बैठा रहता है। रेस्टोरेंट के साइनबोर्ड पोस्टर बैनर पर भी चोटीवाले को खास जगह दी गई है। हरिद्वार ऋषिकेश आने वाले लोग चोटीवाला जाकर जरूर जीमना चाहते हैं। पर मुश्किल है कि अब स्वर्गाश्रम में ही दो चोटीवाला हो गए हैं। बिल्कुल अगल बगल में। दोनों असली होने के दावा करते हैं।

कई दशक ये रेस्टोरेंट देश भर में जाना जाता है अपने नाम से। नाम ही कुछ ऐसा है जो नहीं भूलता है। खाने की बात करें तो इसकी अलग पहचान है। जब बंगाल का कोई आदमी पहली बार हरिद्वार तीर्थ के लिए चलता है तो पिता पुत्र को कहता है कि चोटीवाला में जरूर खाकर आना। समय के अनुसार चोटीवाला ने अपना रंग ढंग भी बदला है। चोटीवाला के मेनू कार्ड में अब उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, बंगाली, गुजराती और चायनीज डिश भी हैं। इसके अलावा चोटीवाला का अपना स्पेशल मेनू भी है।

मैं पहली बार 1991 में ऋषिकेश गया था तब चोटीवाला में और अब डेकोर में काफी बदलाव आ चुका है। कहते हैं कि चोटीवाला की अगली पीढी़ आ गई है इसलिए यहां एक साथ दो चोटीवाला हो गए हैं। मजे की बात दोनों के आगे एक चोटीवाला आदमी ग्राहकों का स्वागत मुस्कान के साथ करता है। लोग उसके साथ फोटो खिंचवाते नजर आते हैं।


स्वर्गाश्रम के चोटीवाला के आगे लिखा है कि हमारी हरिद्वार में कोई ब्रांच नहीं है। इस रेस्टोरेंट की स्थापना 1958 में हुई थी। इसके संस्थापक हर स्वरूप अग्रवाल जी थी। अब उनकी अगली पीढ़ी ने दो रेस्टोरेंट बना लिए हैं। सर्दियों में यहां मक्की की रोटी और सरसों का साग भी मिलता है। अब चोटीवाला का नाम बिकने लगा है। यहां खाना पीना थोड़ा महंगा हो गया है...इसलिए रौनक कुछ कम हो गई है। 
हर की पौड़ी के पास चोटीवाला 

खैर जब आप हरिद्वार हर की पौड़ी में जाएंगे तो वहां भी दो चोटीवाला के रेस्टोरेंट मिलते हैं। एक गंगा जी के घाट की तरफ है तो दूसरा बड़ा बाजार की गली में। दोनों ही असली चोटीवाला होने का दावा करते हैं। हालांकि इनके यहां कोई आदमी लंबी चुटिया लगाकर नहीं बैठा होता है लेकिन खाने पीने वालों की खूब भीड़ रहती है। यहां का मसाला डोसा या फिर पंजाबी खाना मस्त है। हरिद्वार मे रेलवे रोड पर एक और चोटीवाला नाम का रेस्टोरेंट है। हालांकि अगर आप चोटीवाला से अलग हटकर कुछ खाना चाहते हैं तो अपर रोड पर होशियारपुरी होटल में भी खाने जा सकते हैं।

असली चोटीवाला की वेबसाइट- 
http://www.chotiwalarestaurant.com

( HARIDWAR, RISHIKESH, CHOTIWALA) 

Wednesday, March 20, 2013

नीलकंठ : यहां शिव ने हलाहल पीने के बाद किया था विश्राम

लक्ष्मण झूला से चल कर पदयात्रा करते हुए हमलोग  स्वर्गाश्रम पहुंच गए हैं। इसी दौरान एक परिवार आया उसने एक टैक्सी वाले से  नीलकंठ जाने की बात की।   यह सुनकर हमारी भी उत्सुकता बढ़ी। हमारे पास समय था तो हमलोग भी चल पड़े नीलकंठ महादेव के दर्शन के लिए। टैक्सी से जाने और आने के  लिए शेयरिंग किराया तय हो गया है। 

 वैसे तो शिव के मंदिरों में द्वादश ज्योतिर्लिंग की चर्चा की जाती है लेकिन शिव भक्तों के लिए नीलकंठ महादेव का महत्व भी बहुत खास है। हालांकि नीलंकठ महादेव द्वादश ज्योतिर्लिंगों से अलग है लेकिन इसकी खास महत्ता है क्योंकि नीलकंठ महादेव वह स्थल है जहां शिव समुद्र मंथन का हलाहल पीने के बाद वर्षों तक आराम करते रहे। 

बाद में देवताओं के आग्रह पर वे कैलाश पर्वत पर वापस गए। वास्तव में समुद्र मंथन का गरल पीने के बाद शिव का कंठ विष से नीला हो गया था। इसलिए उन्हें नीलकंठ भी कहा गया है। कई सालों तक ऋषिकेश की एक चोटी पर आराम करने के बाद शिव अपने गले से विष को दूर कर पाए। विष से शिव का माथा गरम हो चुका था। देवताओं ने शीतलता प्रदान करने के लिए शिव के माथे पर जल अर्पित किया तभी से शिव को जल अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है।

यह तो संक्षेप में नीलकंठ महादेव का वृतांत है। लेकिन आप जानना चाहेंगे कि ये नीलकंठ महादेव का मंदिर है कहां..तो ये मंदिर है उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में ऋषिकेश के स्वर्गाश्रम ( राम झूला या शिवानंद झूला ) से   करीब   23    किलोमीटर सड़क मार्ग  की  दूरी पर।    यह मंदिर कुल   1675   मीटर की ऊंचाई पर, पहाड़ों की हसीन वादियों में है। 

नीलकंठ में बड़ा ही मनोरम शिव का मंदिर बना है मंदिर के बाहर नक्कासियों में समुद्र मंथन की कथा उकेरी गई है। मंदिर के मुख्य द्वार पर द्वारपालों की प्रतिमा बनी है।  मंदिर परिसर में कपिल मुनि और गणेश जी की प्रतिमा स्थापित है।

 खास तौर पर शिवरात्रि और सावन में यहां श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है लेकिन बाकी के साल यहां नीलकंठ महादेव के दर्शन अपेक्षाकृत आसानी से किए जा सकते हैं। बाकी जगह के शिव मंदिर की तुलना में यहां आप चांदी के बने शिव लिंग का काफी निकटता से दर्शन कर सकते हैं। 

अखंड धूनी - मंदिर परिसर में अखंड धूनी जलती रहती है।  यहां आने वाले श्रद्धालु धुनी की भभूत को प्रसाद के तौर पर अपने साथ लेकर जाते हैं।  यह धूनी लोगों को आत्मिक शांति प्रदान करती है।

जो लोग समय की कमी के कारण बद्रीनाथ और केदारनाथ नहीं जा पाते उन्हें नीलकंठ महादेव जरूर जाना चाहिए। यह  कुछ-कुछ बद्रीनाथ और केदार नाथ जाने के मार्ग की झांकी की तरह है। 
नीलकंठ की हसीन वादियां। 

कैसे पहुंचे - अगर आप नीलकंठ महादेव जाना चाहते हैं तो ऋषिकेश से यहां जा सकते हैं। राम झूला के उस पार ( पौड़ी गढ़वाल) और स्वर्गाश्रम के टैक्सी स्टैंड से नीलकंठ के लिए जीप और एंबेस्डर गाड़ियां मिलती हैं।  कुल 23   किलोमीटर का सफर    45   मिनट का है।  नीलकंठ के लिए टैक्सियां लक्ष्मण झूला के उस पार से भी मिलती हैं। 


नीलंकठ के लिए जिस टैक्सी से आप जाएंगे वही आपको लक्ष्मण झूला तक वापस भी छोड़ देगी। अगर भीड़ नहीं हो तो नीलकंठ महादेव में पूजा में ज्यादा वक्त नहीं लगता।   नीलंकठ का    23   किलोमीटर का रास्ता पहाड़ों को चीरता हुआ बड़ा ही मनोरम है। साथ-साथ दिखाई देती हैं अठखेलियां करती हुई गंगा की धारा। 



नीलकंठ तक पदयात्रा -  वैसे नीलकंठ जाने का रास्ता स्वर्गाश्रम से पैदल जाने का भी है। यह मार्ग 11   किलोमीटर का है लेकिन सीधा चढ़ाई वाला है। जो लोग पहाड़ों पर ट्रैकिंग के शौकीन है वे इस मार्ग से भी ट्रैकिंग करते हुए नीलकंठ जा सकते हैं। यह मार्ग राम झूला से आरंभ होता है। 

परमार्थ निकेतन, गीता भवन नंबर 3 वानप्रस्थ आश्रम होते हुए पदयात्रा का मार्ग है। यह मार्ग सड़क मार्ग की तुलना में छोटा है। इस ट्रैकिंग मार्ग के रास्ते में प्राचीन भूतनाथ का मंदिर भी पड़ता है। आप चाहें तो ऋषिकेश से बाइक किराये पर लेकर भी नीलकंठ मंदिर तक जा सकते हैं।
माधवी रंजना 
( HARIDWAR, RISHIKESH, NILKANTH MAHADEV, SHIVA TEMPLE )

Tuesday, March 19, 2013

ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला और 13 मंजिला मंदिर

अगले दिन सुबह हमलोग शेयरिंग आटो रिक्शा से ऋषिकेश के लिए चल पड़े। उत्तराखंड का ऋषिकेश शहर। हरिद्वार से जब आप ऋषिकेश पहुंचते हैं तो काफी बदलाव महसूस करते हैं। थोड़ा उंचाई पर होने के कारण हिल स्टेशन जैसा एहसास होता है साथ ही मठ, आश्रम और मंदिरों के कारण आस्था का वातावरण बन जाता है। ऋषिकेश की सबसे खास बनाता है यहां का लक्ष्मण झूला।



बचपन से तस्वीरों से इस लक्ष्मण झूला को देखता आया था।   पर 1991 में पहली बार इस पर चढने का मौका मिला। इसके बाद कई बार ऋषिकेश जाने के मौका मिला। हर बार ऋषिकेश कुछ नया सा लगता है। बात लक्ष्मण झूला की करें तो यह गंगा नदी पर बना हुआ एक झूला पुल है। मतलब इसमें कोई पीलर नदी के बीच में नहीं है। इस झूला पुल से पैदल चलने वाले और साइकिल से चलने वाले पार कर जाते हैं।

पुरातन कथा के अनुसार भगवान श्रीराम के अनुज लक्ष्मण ने इसी स्थान पर जूट की रस्सियों के सहारे पुल बनाकर गंगा नदी को पार किया था। उसी की याद में बने इस पुल का नाम लक्ष्मण झूला रखा गया है। वर्तमान पुल 1929 का बना हुआ है। तकनीकी रूप से यह पुल मुनि की रेती, टेहरी गढ़वाल जिले में पड़ता है। पर इस पुल को पार कर उस पार आप पौड़ी गढ़वाल जिले में पहुंच जाते हैं। यह एक सस्पेंसन ब्रिज है। इस पुल की लंबाई 450 फीट है। हालांकि इस पुल से जीप जैसी गाड़ियां भी पार हो सकती हैं, पर इन दिनों चार पहिया वाहनों के संचालन पर रोक है।

लक्ष्मण झूला पुल का निर्माण उत्तर प्रदेश ( तब यूनाइटेड प्रोविंस) पीडब्लूडी विभाग ने कराया था। यह पुल 1927 से 1929 के बीच बना।  इसे 11 अप्रैल 1930 को आम जनता के लिए खोला गया। हालांकि इससे पहले भी यहां एक पुराना पुल हुआ करता था जो इससे थोड़ा नीचे था। वह पुल 1924 में गंगा में आए बाढ़ में तबाह हो गया। पुराना पुल 284 फीट लंबा था।

यूपी का पहला सस्पेंसन ब्रिज था जो जीप चलाने योग्य बनाया गया था। पर बाद में इस पर चार पहिया वाहनों का परिचालन रोक दिया गया।  जब आप लक्ष्मण झूला पुल को पार करते हैं तो यह झूलता हुआ प्रतीत होता है। पुल से ऋषिकेश शहर, मंदिर और आश्रमों का सुंदर नजारा दिखाई देता है। वहीं पुल से नीचे देखें तो गंगा का नीले रंग का निर्मल पानी नजर आता है। पानी में तैरती हुई मछलियां बिल्कुल साफ नजर आती हैं। काफी लोग पुल पर खड़े होकर मछलियों को दाना फेंकते हैं। इसे कार्य को शुभ और फलदायी माना जाता है।


लक्ष्मण झूला के उस पार दो विशाल मंदिर हैं। एक मंदिर 11 मंजिला है तो दूसरा 13 मंजिला। इन मंदिरों के सभी तल पर देवी देवता स्थापित हैं। दोनों मंदिरों के सबसे ऊपर वाली मंजिल तक चढ़ाई करना और दर्शन कर लेना बहुत बड़ा शारीरिक श्रम है। कई लोग बीच से ही लौट आते हैं। पर मैं 1991 में आखिरी मंजिल तक गया था। साल 2009 में एक बार फिर अपने चार साल से नन्हे बेटे के साथ आखिरी मंजिल तक चढ़ाई की। नन्हें अनादि बिल्कुल नहीं थके।

अब लक्ष्मण झूला से दो किलोमीटर पहले एक और सस्पेंस ब्रिज गंगा में बनाया गया है, इसे रामझूला कहा जाता है। यह शिवानंद आश्रम के पास है इसलिए इसे शिवानंद झूला भी कहते हैं। शिवानंद झूला को पैदल पार कर आप स्वर्गाश्रम में पहुंच जाते हैं।  

लक्ष्मण झूला पुल
450 फीट है पुल की कुल लंबाई,यह बिना किसी सस्पेंसन तकनीक ब्रिज है जिसमें कोई पाया नहीं है।  
06 फीट है पुल की चौड़ाई। यूपी का पहला जीप चलाने योग्य सस्पेंसन ब्रिज था।  
1930 में 11 अप्रैल को आम जनता के लिए खोला गया था। 
1927 से 1929 के बीच लक्ष्मण झूला पुल का निर्माण उत्तर प्रदेश ( तब यूनाइटेड प्रोविंस) पीडब्लूडी विभाग ने कराया था।

1924 में पुराना लक्ष्मण झूला पुल बाढ़ में तबाह हो गया था। पुराना पुल 284 फीट लंबा था, जो वर्तमान पुल से थोड़ा नीचे था। 

2019 में 12 जुलाई को इस ऐतिहासिक पुल को कमजोर हो जाने के कारण बंद करने का आदेश दिया गया. इस तरह 89 साल का पुल इतिहास का हिस्सा बन गया. 
(LAXMAN JHULA, RISHIKESH, MUNI KI RETI, TEHRI GARHWAL, PAURI GARHWAL )