Friday, April 5, 2013

पुरानी दिल्ली की ऐतिहासिक जामा मसजिद


देश के कई राज्यों की यात्रा करते हुए हमने कई जगह कलात्मक मस्जिदें भी देखी हैं। खासकर गुजरात के चंपानेर,अहमदाबाद और कर्नाटक के बीजापुर में। पर लंबे समय से दिल्ली में रहते हुए कभी दिल्ली की जामा मसजिद को करीब से नहीं देखा। तो आइए आज मुगलकाल की इस शानदार जामा मसजिद को देखने चलते हैं।



छह साल में बनकर तैयार
पुरानी दिल्ली में लालकिला के सामने स्थित यह मस्जिद लाल पत्थर और संगमरमर के पत्थरों से बनी हुई है। इस मुगलकालीन मस्जिद को बनाने में तकरीन छह साल का समय और करीब 10 लाख रुपये लगे थे।  इस मस्जिद का निर्माण 1650 में 6 अक्तूबर को मुगल बादशाह शाहजहां ने शुरू करवाया था। यह बनते बनते तकरीबन 1656 में अपने इस रूप में आ सका था। न सिर्फ यह दिल्ली  की बल्कि की देश की सबसे बड़ी मसजिद में शामिल है। इसे बादशाह शाहजहां ने एक प्रधान मस्जिद के रूप में बनवाया था। 


मसजिद में लगे लाल पत्थर इसकी कलात्मकता में इजाफा करते हैं। इसका डिजाइन लाहौर की बादशाही मसजिद से मिलता जुलता है। जामा मस्जिद में प्रवेश करने के लिए उत्तर और दक्षिण द्वारों का इस्तेमाल किया जा सकता हैजबकि पूर्वी द्वार सिर्फ शुक्रवार को यानी जुमे की नमाज के ही दिन खोला जाता था। इस द्वार के बारे में प्रचलित है कि सुल्तान इसी द्वार के जरिए जामा मस्जिद में प्रवेश करते थे। आजकल ये पूर्वी द्वार भी खुला रहता है। 


मसजिद-ए- जहांनुमा 
जामा मस्जिद में कुल 11 मेहराबों का निर्माण कराया गया है। ये मेहराब ही इसकी खूबसूरती में इजाफा करते हैं। जामा मस्जिद के मेहराबों में बीच वाला मेहराब सबसे बड़ा हैजिसके ऊपर सफेद और काले संगमरमर से सजे गुंबद बने हैं। मसजिद में दो विशाल मीनारे हैं जिनकी ऊंचाई 41 मीटर है। जामा मस्जिद का माप 65 मीटर लंबा  और 35 मीटर चौड़ा है। इसके आंगन में 100 वर्ग मीटर जगह है। इसे मस्जिद - ए - जहांनुमा भी कहते हैं, जिसका अर्थ है विश्व पर विजय दृष्टिकोण वाली मस्जिद। 

छह हजार शिल्पी और मजदूर निर्माण में लगे
लाल किला की तरह ही इसके निर्माण में भी बड़े पैमाने पर लाल बलुआ पत्थर का निर्माण हुआ है। ये पत्थर राजस्थान के धौलपुर जिले से ढोकर लाए गए थे। इसके निर्माण में 6000 शिल्पी लगे थे। तब इस मसजिद के निर्माण में लगे मिस्त्री को दो पैसे रोज और मजदूर को एक पैसा रोज मजदूरी दी जाती थी। तो इससे अंदाजा लगा सकते हैं आप की तब एक पैसे की कीमत कितनी रही होगी।


निजाम ने की मरम्मत में मदद
ये 1948 की बात है। तब जामा मसजिद में मरम्मत की जरूरत थी। इसके लिए हैदराबाद के निजाम से बात की गई। तत्कालीन निजाम मीर उस्मान अली खान को मस्जिद के मंजिल की मरम्मत के लिए 75 हजार रुपये का दान देने के लिए अनुरोध किया गया था। हालांकि निजाम को कंजूस माना जाता था। पर निजाम ने 75 हजार के बजाय इससे चार गुनी रकम यानी तीन लाख रुपये स्वीकृत किया। साथ में यह भी कहा कि मस्जिद के बाकी हिस्सा भी पुराना नहीं नजर आना चाहिए।

जामा मसजिद के शाही इमाम 
जामा मसजिद न सिर्फ दिल्ली का ऐतिहासिक इबादत स्थल है बल्कि दिल्ली का प्रमुख पुरातात्विक स्थल भी है। जामा मसजिद का इंतजाम यहां के शाही इमाम देखते हैं। इसके पहले इमाम हजरत सैय्यद अब्दुल गफूर शाह बुखारी थे। वे तब के इल्म के मरकज माने जाने वाले उजबेकिस्तान के शहर बुखारा से आए थे। वे 63 साल की उम्र में जामा मसजिद के पहले शाही इमाम मुकर्रर किए गए। इसके बाद से शाही इमाम की परंपरा चल पड़ी। हर शाही इमाम का बेटा अगला शाही इमाम पद का उत्तराधिकारी होता है। 14 अक्तूबर 2000 को मौलाना सैय्यद अहमद बुखारी जामा मसजिद के 13वें शाही इमाम बनाए गए।  

मुगल बादशाहों की ताजपोशी 
शाहजहां के बादहर मुगल बादशाह की ताजपोशी की रस्म जामा मसजिद में अदा की जाती रही है। जामा मसजिद के शाही इमाम ही ताजपोशी की रस्म अदा किया करते थे। सबसे पहले औरंगजेब आलमगीर की ताजपोशी पहले शाही इमाम गफूर शाह बुखारी के हाथों की गई थी।  वहीं 30 सितंबर 1837 को आखिरी मुगल बहादुर शाह जफर की ताजपोशी आठवें शाही इमाम हजरत सैय्यद मीर अली शाह बुखारी के हाथों संपन्न हुआ। 


खुलने का समय  जामा मसजिद में सुबह 7 बजे से लेकर दोपहर 12 बजे और फिर दोपहर 1:30 बजे से लेकर शाम 6:30 बजे तक प्रवेश किया जा सकता है। जो भी पर्यटक मस्जिद के अंदर कैमरा लेकर जाना चाहते हैं उन्हें कैमरे किए 300 रुपये बतौर फीस देने पड़ते हैं। ऐसा मसजिद के द्वारा पर लगे साइनबोर्ड में लिखा है। पर अंदर लोग मोबाइल कैमरे का इस्तेमाल बिना फीस दिए भी करते हुए देखे जाते हैं। 

मीनार पर चढ़ाई 
जामा मसजिद के दोनों मीनारों पर चढ़ने के लिए अंदर से सीढ़ियां बनी हुई ैहं। आप जामा मसजिद की मीनारों पर चढ़ाई करके दिल्ली शहर का नजारा कर सकते हैं। इन मीनारों पर चढ़ाई के लिए अलग से टिकट खरीदना पड़ता है। ये  टिकट मसजिद के अंदर के काउंटर पर उपलब्ध हैं। 



कैसे पहुंचे – दिल्ली मेट्रो के हेरिटेज लाइन पर जामा मसजिद नामक मेट्रो का स्टेशन बन गया है। यहां से बाहर निकल कर जामा मसजिद पहुंचा जा सकता है। लाल किला और चांदनी चौक रेलवे स्टेशन से भी टहलते हुए यहां तक पहुंचा जा सकता है।

रात में बाजार होता है गुलजार - 
ईद से पहले रमजान के महीने में जामा मसजिद के आसपास बाजार सजता है। तब यहां सारी रात चहल पहल रहती है। मसजिद के दक्षिण द्वार के पास दिल्ली का पुराना बाजार और खाने पीने की कई लोकप्रिय दुकाने हैं। खास तौर पर मांसाहारी व्यंजन के शौकीन लोग यहां पहुंचते हैं।



जामा मसजिद - एक नजर में
निर्माण वर्ष  आरंभ- 1650 ई.
निर्माण वर्ष  संपन्न - 1656 ईं. 
मिस्त्री और मजदूर - 6000
मीनार की ऊंचाई - 41 मीटर
निर्माण लाागत - 10 लाख रुपये 
लोगों की क्षमता - 25 हजार लोग नमाज पढ़ सकते हैं। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( JAMA MASJID, OLD DELHI ) 

बच्चा बोला देखकर मसजिद आलीशान
अल्लाह तेरे एक के लिए इतना बड़ा मकां।

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