Sunday, February 24, 2013

शाहदरा सहारनपुर – दूधवालों की रेलवे लाइन

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बागपत, बड़ौत इलाका खेती के लिहाज से काफी उर्वर रहा है। यहां बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है। साथ ही दूध का उत्पादन भी बड़े पैमाने पर होता है। इसलिए शाहदरा सहारनपुर रेल मार्ग पर गन्ने को चीनी मिलों तक पहुंचाने का काम और इसके साथ ही कैंटर में भर कर दिल्ली दूध बेचने का काम भी इस रेल मार्ग के सहारे होता रहा है। शामली क्षेत्र हमेशा से बड़ा गन्ना उत्पादक इलाका रहा है।
शामली में स्थित अपर दोआब शुगर मिल्स लिमिटेड लिमिटेड ( अब सर शादीलाल शुगर मिल्स लिमिटेड ) के लिए गन्ने की ढुलाई के लिए शाहदरा सहारनपुर लाइट रेलवे का इस्तेमाल हुआ करता था। 1962 में रेलवे रेट्स ट्रिब्यूनल में हुए एक मुकदमे से पता चलता है कि शुगर मिल ने एसएसएलआर पर गन्ना ढुलाई का सही रेट नहीं लिए जाने पर अपनी ओर से शिकायत की। एएसएलआर द्वारा 1960 में गन्ना ढुलाई की दरें बढ़ाए जाने से कंपनी नाराज थी। हालांकि ट्रिब्यूनल चीनी मिल कंपनी के तर्कों से सहमत नहीं हुआ।

शाहदरा सहारनपुर रेल खंड पर रोजाना सहारनपुर से दिल्ली के बीच इस मार्ग पर चलने वाली पैसेंजर ट्रेनों में आपको बड़ी संख्या में दूध का कैंटर लेकर दिल्ली आने वाले लोग सफर करते हुए मिल जाएंगे। नैरोगेज के जमाने से दूध वालों के सफर का ये सिलसिला चलता आ रहा है।


बागपत रोड रेलवे स्टेशन के पास टीटरी मंडी के निवासी विजय कुमार दीक्षित जो यहां के प्रसिद्ध मिठाई दुकान भगतजी स्वीट्स से जुड़े हैं, एसएसएलआर नैरोगेज के सफर को याद करते है। वे बताते हैं कि 1970 में इस रेलवे लाइन के बंदी के समय मैं 18 साल का था। उस छोटी लाइन पर मैं 80 पैसे का टिकट खरीदकर दिल्ली आ जाता था। दिन भर दिल्ली में कामकाज निपटाकर शाम को वापस लौट आता था। बागपत रोड रेलवे स्टेशन के पास टीटरी मंडी या अग्रवाल मंडी के नाम से मशहूर बाजार ब्रिटिशकालीन बाजार है। किसी जमाने में यह इलाके की प्रसिद्ध मंडी हुआ करता था। तब मंडी के दुकानदार दिल्ली आने जाने के लिए इस लाइट रेलवे का खूब इस्तेमाल करते थे।

लेखक आर शिवरामकृष्णन अपने एक आलेख में जून 1968 में शहादरा सहारनपुर लाइट रेलवे पर अपनी यात्रा का रोचक और जीवंत विवरण प्रस्तुत करते हैं।
शाहदरा रेलवे स्टेशन पर ब्राडगेज से इतर एक नैरोगेज का एक प्लेटफार्म हुआ करता था। एक ही प्लेटफार्म बीच में था। इसके दोनों तरफ आने वाली और जाने वाली ट्रेनें खड़ी होती थीं। इसके अलावा यहां गुड्स शेड, ट्रांसफर यार्ड और लोकोशेड आदि भी निर्मित था। शिवरामकृष्णन लिखते हैं कि दिल्ली से सहारनपुर जाने वाले कम ही लोग इस मार्ग पर रेल टिकट खरीदकर सफर करते थे।
सुबह 7.05 बजे 0-6-2 श्रेणी का टैंक इंजन डिब्बों के साथ जोडा गया। पर सहारनपुर की तरफ ट्रेन चलने से पहले उधर से आने वाली डाउन ट्रेन का इंतजार था। तमाम डिब्बों में दूधवाले पहले ही सीटों पर कब्जा कर चुके थे। सीट के आसपास खाली जगहों पर उनके मिल्क कैन विराजमान हो गए थे। ऐसा लग रहा थाकि वे शाहदरा के आसपास के घरों में दूध की सप्लाई करने के बाद अपने गांव की ओर लौट रहे थे। एक बाहरी आदमी को देखकर उन लोगों ने मुझसे कई सवाल पूछने शुरू कर दिए। जब उन्होंने जाना कि मैं मद्रास से हूं तो उनका चेहरा उतर गया। क्योंकि थोड़े साल पहले ही मद्रास में हिंदी विरोधी आंदोलन हुआ था। लोगों को इस बात को लेकर अचरज हो रहा था कि एक भारतीय होकर भी मुझे राष्ट्रीय भाषा हिंदी का ज्ञान क्यों नहीं है।


खैर 7.28 बजे ट्रेन सहारनपुर की ओर चल पड़ी। कुछ सहयात्री लोकगीत गाने लगे। एक दूधवाले ने तो चलती ट्रेन के डिब्बे में किरासन तेल से चलने वाला स्टोव जला लिया। उसने बचे हुए दूध से गाढ़ी चाय बनाई. इसमें मिठास के लिए गुड़ डाला गया। मेरे न चाहते हुए भी मुझे एक लोटा चाय पीने को ऑफर किया गया। ये दूधवाले अलग अलग समूह में थे जो नोली के बाच अलग अलग स्टेशनों पर उतरते गए। बागपत रोड में काफी दूधवाले उतर चुके थे।

बागपत रोड स्टेशन पर इंजन को पानी देने का इंतजाम था। इसके बाद ट्रेन बड़ौत, शामली और ननौता में भी पानी लेने के लिए रूकी। बड़ौत में कोई उत्सव में मनाया जा रहा था। यहां बहुत बड़ी भीड़ आई जो ट्रेन  सवार हो गई। बड़ौत में ट्रेन से दो डिब्बे काटकर अलग कर दिए गए। अब मुझे दूसरे डिब्बे में जाकर जगह लेनी पड़ी। पर बाकी डिब्बे पूरी तरह भर चुके थे। अब लोग इन डिब्बों की छत पर जाकर जगह ले रहे थे। काफी संकोच करते हुए और यह आश्वत हो लेने के बाद कि आगे कोई नदी पुल या संकरा पुल नहीं आएगा, मैं भी ट्रेन की छत पर सवार हो गया।

ट्रेन 28 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति स्टेशनों के बीच चल रही थी। इसी बीच हमने साफ मौसम के बाद बादलों से घिरा हुआ मौसम देखा। बारिश की कुछ बूंदे भी पड़ी। शामली स्टेशन आने के बाद ट्रेन खाली हुई। मैं अब नीचे उतर आया और कंपार्टमेंट में जाकर ली। एक आदमी ने घर से बनाकर लाई दो रोटियां मुझे खाने को आफर किया। रास्ते में ननौता शुगर मिल आय़ा। अन्य में दोपरह 3.50 मिनट पर मैं सहारनपुर पहुंच चुका था। तो इस तरह दिल्ली से सहारनपुर का सफर नौ घंटे में पूरा हुआ।


- विद्युत प्रकाश मौर्य


 (SHAHDARA SAHARNPUR LIGHT RAILWAY, MARTIN RAIL, NARROW GAUGE, SSLR-3 )