Thursday, January 31, 2013

रावणेश्वर यानी वैद्यनाथ मंदिर देवघर (09)

 शिव का नौवां ज्योतिर्लिंग मंदिर का देवघर का वैद्यनाथ धाम मंदिर। झारखंड राज्य के देवघर जिले में स्थित ये मंदिर देश भर के करोड़ों श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है। दिल्ली हावड़ा रेल लाइन पर जैसीडीह स्टेशन से छह किलोमीटर आगे देवघर में ये मंदिर स्थित है।
शिव पुराण के मुताबिक इस क्षेत्र को चिताभूमि कहा गया है। शिव सती के शव को लेकर जब उन्मत होकर घूम रहे थे तब सती का ह्रतपिंड यहां गलकर गिर गया था। इसलिए ये स्थली 51 शक्तिपीठ में से भी एक है।
वैद्यनाथ शिवलिंग की स्थापना का इतिहास बहुत पुराना है। कहा जाता है रावण ने शिव की घोर तपस्या कर उनके आत्म लिंग को लंका ले जाने के लिए राजी कर लिया। शिवजी तैयार हो गए लेकिन कहा कि अगर बीच रास्ते में मुझे कहीं धरती पर रखा तो मैं वहीं रह जाउंगा। रावण शिवलिंग को लेकर लंका चल पड़ा। देवताओं में हड़कंप मच गया। देवताओं की कोशिश से चिताभूमि में पहुंचने पर रावण को लघु शंका लगी। रावण ने पास में खड़े ग्वाल बालक को शिवलिंग सौंप कर निवृत होने लगा। लेकिन शिवलिंग काफी भारी होने कारण ग्वाल बालक ने शिवलिंग को वहीं धरती पर स्थापित कर दिया। रावण ने वापस आने पर पूरी कोशिश की लेकिन वह शिवलिंग को उठा नहीं पाया। गुस्से में रावण ने शिवलिंग को अपने अंगूठे से और दबा दिया। इसलिए वैद्यनाथ को रावणेश्वर भी कहते हैं।


सावन मास में उमड़ते हैं श्रद्धालु
इस मंदिर में सावन मास में श्रद्धालुओं की अपार भीड़ होती है। लोग 120 किलोमीटर पहले सुल्तानगंज में गंगा नदी से कांवर में जल लेकर पैदल चलकर यहां आकर शिव का जलाभिषेक करते हैं। इस यात्रा को बोल बम कहते हैं। सालों भर सोमवार के दिन खास तौर पर मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। मंदिर के पास ही शिवगंगा तालाब है। श्रद्धालु शिवगंगा में डुबकी लगाने के बाद शिव को जलार्पण करते हैं। देवघर शहर की जलवायु काफी अच्छी है। इसे रोगों से मुक्त करने वाला शहर बताया गया है।

वर्तमान में जो देवघर में बाा वैद्यनाथ का मंदिर है उसकी स्थापना का काल 1596 माना जाता है। कहा जाता है कि बैजू नामक एक चरवाहे ने जंगलों में वर्तमान शिवलिंगम की खोज की थी। 

मंदिर खुलने का समय - सुबह 4.00 बजे से दोपहर 3.30 बजे तक। शाम 6.00 से रात्रि 9.00 बजे तक। सावन और शिवरात्रि जैसे मौके पर मंदिर सारी रात खुला रहता है। 

कैसे पहुंचे - दिल्ली हावड़ा मुख्य रेलवे लाइन पर जैसीडीह नामक रेलवे स्टेशनसे देवघर की दूरी 6 किलोमीटर है। जैसीडीह में सभी प्रमुख ट्रेनें रुकती हैं। वैसे जैसीडीह से देवघर के बीच रेलवे लाइन है। देवघर के स्टेशन का नाम वैद्यनाथ देवघर है। वैसे आप पटना, भागलपुर,दुमका जैसे शहरों से सड़क मार्ग से देवघर पहुंच सकते हैं। देवघर आने वाले श्रद्धालु बड़ी संख्या बाबा धाम के बाद बासुकीनाथ के दर्शन करने जाते हैं। बासुकनीथ देवघर से 42 किलोमीटर दूर जरमुंडी नामक स्थान पर है। 


बाबा धाम पर बनी है फिल्म - देवघर के वैद्यनाथ मंदिर पर एक हिंदी फीचर फिल्म बन चुकी है। 1980 में बनी इस फिल्म का नाम गंगाधाम था। इसमें अरुण गोविल हीरो थे। नामिता चंद्रा अभिनेत्री थीं। वहीं सुनील दत्त अतिथि भूमिका में थे। फिल्म आस्था की यात्रा बोलबम पर केंद्रित है।  
-     -------    माधवी रंजना 
   
( बाबा वैद्यनाथधाम की वेबसाइट - http://www.babadham.org/ )

(   ( JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA, DEOGHAR, DEVGHAR, JHARKHAND) 
   


Wednesday, January 30, 2013

अल्लाह को शुकराना देने के लिए बना चार मीनार


हैदराबाद शहर की पहचान चार मीनार से है। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण स्मारक है चार मीनार। 400 साल से ज्यादा हो गए, चार मीनार शान से खड़ा है। चार मीनार  को मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने बनवाया था। सुल्तान मुहम्मद कुली कुतुब शाहकुतुब शाही राजवंश का पांचवां शासक था। इसका निर्माण 1591 ई में हुआ। 

अल्लाह तेरा शुकराना - कहा जाता है कि एक बार हैदराबाद शहर में प्लेग जैसी जानलेवा बीमारी फैल गई। इसमें काफी लोगों की मौत हुई। तब कुली कुतुब शाह प्रार्थना की थी कि हे अल्लाहइस शहर की शांति और समृद्धि के प्रदान सभी जातियों के लोगों का कल्याण करो। शाह की अल्लाह ने सुन ली। इसके बाद उन्हें धन्यवाद देने के लिए चारमीनार का निर्माण शहर के बीचोंबीच कराया गया।

इसमें कुल चार अलंकृत मीनारें इसलिए इसका नाम चार मीनार है। यह स्‍मारक ग्रेनाइट के मनमोहक चौकोर खम्‍भों से बना हैजो उत्तरदक्षिणपूर्व और पश्चिम दिशाओं में स्थित चार विशाल आर्च पर निर्मित किया गया है। यह आर्च कमरों के दो तलों और आर्चवे की गेलरी को सहारा देते हैं। चौकोर संरचना के प्रत्‍येक कोने पर एक छोटी मीनार है जो 24 मीटर ऊंची है। चार मीनार की कुल ऊंचाई 54 मीटर है। चार मीनार की मूसी नदी के पूर्वी तट पर बना है। हालांकि अब मूसी नदी अपने अस्तित्व को खोती जा रही है।

चार मीनार पर चढ़ने के लिए अंदर से सीढ़ियां बनी हुई हैं। इन घुमावदार सीढ़ियों से आप इसकी मुंडेर पर जा सकते हैं। पुरातत्व विभाग इसके लिए 5 रुपये का टिकट लेता है। चार मीनार की मुंडेर मक्का मसजिद का सुंदर नजारा दिखाई देता है, साथ ही इसके चारों ओर हैदराबाद शहर के बाजारों का नजारा दिखाई देता है। इसके मेहराब में हर शाम रोशनी की जाती है जो एक अविस्‍मरणीय दृश्‍य बन जाता है।

चार मीनार सड़क के बीचोंबीच स्थित है। इसके चारों तरफ चार रास्ते शहर के अलग अलग हिस्सों में जाते हैं। चारमीनार के आसपास के बाजार में आपको हैदराबाद शहर का परंपरागत नजारा दिखाई देता है। बुरके में खरीददारी करती महिलाएं। स्ट्रीट फूड का मजा लेते लोग। आदि आदि...




अपने सुनहरे दिनों मेंचारमीनार के आसपास 14 हजार दुकानें थी। आज चारमीनार के आसपास शहर का प्रसिद्ध लाह की चूड़ियों का बाजार और मोतियों का बाजार पथरगट्टी मौजूद है। इन बाजारों पर्यटक आभूषण की खरीददारी करने आते हैं। वहीं स्थानीय लोगों भी खूब खरीददारी करने आते हैं।

सुरंग की कहानी - ऐसा कहा जाता है कि कभी ऐतिहासिक गोलकुंडा किला और चारमीनार के बीच 15 फुट चौड़ी और 30 फुट ऊंची एक भूमिगत सुरंग थी। इस सुरंग को सुल्तान मोहम्मद कुली कुतुब शाह ने बनवाया था। माना जाता है कि इस सुरंग में शाही परिवार ने अपना शाही खजाना छुपाया था। हैदराबाद की गलियों में ये किस्सा मशहूर की ये खजाना आज भी सुरंग में मौजूद है।1936 में निजाम मीर ओसमान अली ने एक सर्वे कराया था और साथ ही नक्शा भी बनवाया था। हालांकि उस दौरान यहां खुदाई नहीं कराई गई थी।

कैसे पहुंचे - नामपल्ली ( हैदराबाद रेलवे स्टेशन ) से चारमीनार की दूरी 7 किलोमीटर है। हैदराबाद के एमजी बस स्टैंड से इसकी दूरी पांच किलोमीटर है। भारतीय नागरिकों के लिए प्रवेश शुल्क 5 रुपये हैं। विदेशी नागरिकों के लिए यह शुल्क 100 रुपये है। यह सुबह 9.30 से शाम 5.30 तक खुला रहता है।


- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com  
(CHARMINAR, HYDRABAD, MUCCA MASJID ) 

Monday, January 28, 2013

सम्राट अशोक ने बनवाया था सांची का स्तूप



दिसंबर 1994 की सरदियों का समय था जब किसी काम से भोपाल जाना हुआ। पहले दिन को साउथ तांत्या टोपे नगर ( टीटी नगर) में यूथ होस्टल में ठहरा। अगले दिन एनवाईपी के भाई प्रिय अभिषेक अज्ञानी आकर अपने घर ले गए। उनके घर हफ्ते भर रहा। 

इस दौरान वे रोज मुझे मार्ग समझा देते और मैं अपनी मर्जी से अकेले भोपाल और आसपास घूमता रहता। एक दिन सांची जाने को तय किया। सो सुबह सुबह ट्रेन पकड़ी पहुंच गया सांची। सांची में विशाल बौद्ध स्तूप तो है ही। सांची मध्य प्रदेश के दूध का ब्रांड भी है। ठीक वैसे ही जैसे बिहार का सुधा, यूपी का पराग, हरियाणा का वीटा, पंजाब का वेरका, कर्नाटक का नंदिनी। तो चलते हैं 
सांची का स्तूप




वास्तव में स्तूप पाली भाषा का शब्द है। स्तूप का मतलब कोई टीला या ढेर होता है। यहां माना जाता है कि बौद्ध अवशेष रखे जाते हैं। यहां बौद्ध प्रार्थना स्थल भी होता है। सन 1818 में जॉन टायलर के पता लगाने से पहले सांची का स्तूप अनजाना ही था। सन 1912 में पुरातत्‍व विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल की अगुवाई में इस स्‍थल पर खुदाई का कार्य हुआ।

सांची का ये स्तूप 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। कहा जाता है कि बड़े स्तूप में स्वंय भगवान बुद्ध और छोटे स्तूपों में बुद्ध के शिष्यों की उपयोग की हुई वस्तुएं रखी हैं। सबसे बड़े स्तूप को महास्तूप कहते हैं। इसे तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व में सम्राट अशोक ने बनवाया था। 

बाद में शुंग वंश के शासकों ने इसे विस्तारित किया था। इस स्तूप का व्यास लगभग 40 मीटर और ऊंचाई 16.5 मीटर है। इसके निर्माण में पक्की ईंटों का इस्तेमाल हुआ है जो शुंग कालीन है। आकार में यह सारनाथ में अशोक द्वारा बनवाए गए धमेक स्तूप से बड़ा है। कहा जाता है कि सांची में पहले कई बौद्ध विहार भी थे। यहां एक सरोवर भी है जिसकी सीढ़ियां बौद्ध कालीन मानी जाती हैं। सांची के पास सोनारी और भोजपुर में भी कई बौद्ध स्तूप हैं। सांची के सभी तीन स्तूप विश्व विरासत स्थल (वर्ल्ड हेरिटेज साईट) के तहत यूनेस्को द्वारा संरक्षित स्मारकों की सूची में आते हैं। सांची को अतीत में काकानाया
काकानावाकाकानाडा बोटा तथा बोटा श्री पर्वत के नाम से भी जाना जाता था।




चार सुंदर तोरण द्वार - सांची के स्‍तूप अपने चार नक्काशीदार प्रवेश द्वार के लिए जाना जाता है। प्रत्येक द्वार में बुद्ध के जीवन से ली गई घटनाओं और उनके पिछले जन्‍म की बातों का चित्रण है। इन द्वारों पर पत्थर बौद्ध कथाएं सुनाते हैं। 
माना जाता है कि ये प्रवेश द्वार 11वीं सदी के बने हैं। इस स्तूप के पूर्वी तथा पश्चिमी द्वारों पर युवा गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक यात्रा की कई कहानियां देखी जा सकती हैं।

 अब लाइट एंड साउंड शो - मध्य प्रदेश टूरिज्म ने एक मार्च 2019 से यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल सांची में लाइट एंड साउंड शो की शुरुआत की। यह शो सैलानियों को सांची और बौद्ध धर्म के इतिहास से रूबरू कराता है। इस शो को प्रभावी बनाने के लिए थ्री डी प्रोजेक्टरों का इस्तेमाल किया गया है। 

 कैसे पहुंचे - भोपाल से सांची की दूरी 45 किलोमीटर है ट्रेन से। अमूमन ट्रेन से 45 मिनट में पहुंचा जा सकता है। सांची भोपाल से विदिशा बीना रेल मार्ग पर है। विदिशा से सांची की दूरी 9 किलोमीटर है। वैसे सांची रायसेन जिले में पड़ता है। सांची का स्तूप रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर की दूरी पर है। यहां स्टेशन से पैदल चलकर पहुंचा जा सकता है। भोपाल से सांची के बीच दिन भर में सात ट्रेनें उपलब्ध हैं। 

भोपाल से सांची के लिए नियमित बस सेवा भी है।  सुबह आठ बजे से लेकर शाम पांच बजे तक सांची का स्तूप खुला रहता है। प्रवेश के लिए टिकट लेना पड़ता है। टिकट घर के पास एक संग्रहालय भी है। जिसमें नायाब संग्रह देखे जा सकते हैं।  
सांची के बारे और यहां पढ़ें 
रेलगाड़ी की खिड़की से दिखाई दे रहा सांची का स्तूप। 

- vidyutp@gmail.com 

( WORLD HERITAGE SITE, SANCHI, RAISEN DISTRCT, BHOPAL )  

Saturday, January 26, 2013

खाइए अंडा रहित शाकाहारी बिस्कुट


बिस्कुट हर कोई खाता है। यह चाय के साथ हल्के नास्ते के तौर पर है तो आपके सफर का साथी। यानी रेडीमेड फूड की तरह है। कई बार थोड़ी भूख लगने पर लोग बिस्कुट खाते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि तमाम कंपनियां बिस्कुट के निर्माण में अंडा मिलाती हैं। अगर आप शाकाहारी हैं तो आपको कोई भी बिस्कुट खाने से पहले इसकी जांच करनी चाहिए कि कहीं इसमें अंडा तो नहीं। खासकर नमकीन बिस्कुट में अंडा होने की संभावना ज्यादा रहती है।

हाथ के बने बिस्कुट - दिल्ली में आज भी हैंडमेड बिस्कुट का चलन है। आपको चलते फिरते ठेले पर आटे के बिस्कुट बनाकर उसे कोयले के चूल्हे पर सेंक कर बेचने वाले मिल जाएंगे। ये बिस्कुट अंडा रहित होते हैं साथ इनका स्वाद भी बेहतर होता है। आप अपना आटा देकर भी इनसे बिस्कुट बनवा सकते हैं। इसके अलावा कुछ ऐसा कंपनियां भी हैं तो हैंडमेड शाकाहारी बिस्कुट के निर्माण में सालों से लगी हैं।
दिल्ली की एक बहुत पुरानी कंपनी फ्रंटियर बिस्कुट बिना अंडो के बिस्किट का निर्माण करती है। आठ दशक से ज्यादा पुरानी ये कंपनी होम मेड बिस्कुट बनाने में ख्यात है। आजकल फ्रंटियर के पूरी दिल्ली में 40 से ज्यादा शो रूम है। यहां आप कई दर्जन वेराइटी के शाकाहारी बिस्कुट खरीद सकते है। फ्रंटियर बिस्कुट न सिर्फ 50 से ज्यादा वेराइटी के बिस्कुट का निर्माण करती है बल्कि यहां बिस्कुट लूज और पैकिंग में दोनों ही तरीके से खरीदा जा सकता है। फ्रंटियर पैकिंग बिस्कुट में अलग अलग तरह के गिफ्ट पैक भी उपलब्ध कराती है। इन्हें मिठाइयों के बदले गिफ्ट में दिया जा सकता है। फ्रंटियर की जीरा और आजवान टेस्ट वाली बिस्कुट के स्वाद का तो कहना ही क्या। अब फ्रंटियर ने दिल्ली के कई शापिंग माल्स में भी अपने शो रुम खोल दिए हैं। ज्यादा जानकारी के लिए आप उनकी वेबसाइट भी देख सकते हैं। http://www.frontierbiscuit.com/
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विद्युत प्रकाश मौर्य 

( ( EGGLESS BISCUIT, CAKE, FRONTIER, DELHI )

Thursday, January 24, 2013

एक हैदराबादी शादी में...शुभ लग्ने सावधनाय...


कुल14 दिन के दक्षिण भारत के कई शहरों के सफर के बाद हमलोग अब पहुंच गए थे हैदराबाद। कोच्चि,त्रिवेंद्रम, कन्याकुमारी, मदुरै, रामेश्वरम, कोयंबटूर, ऊटी, मैसूर, बेंगलुरू, तिरूपति के बाद हमारा अब आखिरी पड़ाव था हैदराबाद। तिरुपति से रात नौ बजे हैदराबाद जाने वाली ट्रेन में हमारा आरक्षण था। यह एक स्पेशल ट्रेन थी जो आज आखिरी फेरा ले रही थी। संयोग से हमें इसमें आरक्षण मिल गया था।
 हैदराबाद वह शहर है जहां पहले ही तकरीबन एक साल गुजार चुके थे। पर इस बार संयोग से हमारी यात्रा के आखिरी पड़ाव में शादी थी हमारे नवीन भाई की।
 शादियां तो हमेशा खास होती है चाहे किसी भी इलाके की हों। बिहार में मिथिला की शादियों के रस्मो रिवाज रोचक होते हैं तो हमारे लिए आंध्र प्रदेश की एक शादी देखना भी कम कौतूहल भरा नहीं था। मौका था हमारे हैदराबाद प्रवास के दौरान हमारे मकान मालिक रहे एन रत्नाराव के बड़े बेटे नवीन की शादी का। पूरे दक्षिण भारत के सफर के बाद हमलोग एक बार फिर हैदराबाद के वनस्थलीपुरम में उसी घर में पहुंचे जहां बेटे अनादि का बचपन गुजरा था। हम दोपहर में पहुंचे तो घर में शादी की तैयारियां चल रही थीं।

बारात जाने से पहले दोपहर में दूल्हे को आशीर्वाद देने की रस्म हुई। इसमें हमने भी हिस्सा लिया परिवार के बाकी सदस्यों की तरह। शाम को बारात निकली सिकंदराबाद के एक इलाके में। शादी बैंक्वेट हॉल में थी। लेकिन बिल्कुल परंपरागत तरीके से। तीन पंडित थे शादी मेंरत्नाराव जी ने बताया कि पंडित की फीस 10 हजार रुपये है। शादी का मुहुर्त तय था रात दस बजे। मुहुर्त निकट आ रहा था। पंडित जी समवेत स्वर में मंत्रोच्चार कर रहे थे...
शुभ लग्ने सावधनाय...     

विवाह का खास मंत्र जो लग्न के इंतजार में पंडित जी द्वारा लगातार उच्चारित किया जा रहा था। सारे बाराती शुभ मुहुर्त का इंतजार कर रहे थे। जैसे मुहुर्त आए आसमान में हजारों फूलों की बरसात होने लगी। ये नजारा था तेलंगाना प्रांत में होने वाले एक विवाह का। हमें इस शादी में शामिल होने का खास तौर पर मौका मिला था।

मंगल धुन बजाने वाले अपने वाद्ययंत्रों के साथ पहुंच गए थे। उत्तर भारत की तरह बैंड बाजा नहीं खास तरह की मंगलधुन बजती है शादी की सारी रस्मों के दौरान। 


 ...शुभ लग्ने सावधनाय..श्री लक्ष्मीनारायण ध्यान सावधनाय... और शुभ लग्न आया दूल्हे दुल्हन ने एक दूसरे पर फूल बरसाना शुरू किया। इसके बाद दूसरी रस्म शुरू हुई चावल के बंटवारे की। इसके बाद तीसरी रस्म माला डालने और बदलने की। वर वधू पक्ष के लोगों ने दुल्हा दुल्हन को आशीर्वाद दिया। पूरी शादी मंच पर हुई। दुल्हन का फूलों से श्रंगार खास होता है।

दुल्हन घूंघट नहीं करती-  शादी में कोई परदा नहीं। लेकिन अभी सारी रस्में खत्म नहीं हुईं। एक और रस्म आई घड़े से अंगूठी ढूंढ कर निकालने की।  दुल्हा दुल्हन दोनों मिलकर कोशिश करते हैं। और शादी की आखिरी रस्म। पंडित दुल्हा दुल्हन को अपने साथ खुले आसमान के नीचे ले जाते हैं। पति अपनी पत्नी को सप्तर्षि तारे को दिखाता है और उनसे आशीर्वाद लेता है। सारी रात की बात नहीं बस कुछ घंटे में शादी संपन्न हो गई।

शादी के बाद अगले ही दिन वर वधू स्वागत समारोह था। पनामा गार्डेन में। यहां खाने पीने के मीनू में खास तौर पर उत्तर भारतीय व्यंजन थे। अनादि को रबड़ी और जलेबी खूब पसंद आई। तो बार बार खाते रहे। ये बहुत ही हंसी और यादगार शाम थी। हैदराबाद का वनस्थलीपुरम तो जैसे हमारा दूसरा घर हो। पर अगले दिन सुबह हमारा दिल्ली जाने वाली ट्रेन में आरक्षण था। मुन्ना (वेंकट सुधीर) हमें रेलवे स्टेशन पर छोड़ने आए। सिकंदराबाद स्टेशन पर सुबह साढे़ सात बजे हम लोग ट्रेन में सवार हुए। ट्रेन है एपी एक्सप्रेस बाद में उसका नाम बदलकर हो गया तेलंगाना एक्सप्रेस। हैदराबाद से दिल्ली का तकरीबन 25 घंटे का सफर। अब तो रास्ते के सारे स्टेशन जाने पहचाने से हो गए हैं। 
( 30 अक्तूबर 2012 ) 

---- विद्युत प्रकाश मौर्य ( HAYDRABAD, VANASTHALIPURM, SHADI, SHUBH LAGAN ) 

Tuesday, January 22, 2013

एक और स्वर्ण मंदिर- महालक्ष्मी मंदिर वेल्लोर

अभी तक हम देश में स्वर्ण मंदिर के तौर पर श्री दरबार साहिब अमृतसर को ही जानते हैं लेकिन इसके मुकाबले दक्षिण भारत में भी एक स्वर्ण मंदिर बन चुका है। तमिलनाडु के वेल्लोर के पास श्रीपुरम में बने महालक्ष्मी मंदिर के निर्माण में तकरीबन 15000 किलोग्राम विशुद्ध सोने के इस्तेमाल हुआ है। जबकि हरमंदिर साहिब अमृतसर के गुंबद में 400 किलोग्राम सोने के इस्तेमाल हुआ है। स्वर्ण मंदिर श्रीपुरम के निर्माण में 300 करोड़ से ज्यादा राशि की लागात आई है। मंदिर के आंतरिक और बाह्य सजावट में सोने का बड़ी मात्रा में इस्तेमाल हुआ है। विश्व में किसी भी मंदिर के निर्माण में इतना सोना नहीं लगा है। रात में जब इस मंदिर में प्रकाश किया जाता है तब सोने की चमक देखने लायक होती है। 

अपनी भव्यता के कारण महालक्ष्मी मंदिर कुछ ही सालों में दक्षिण के स्वर्ण मंदिर के तौर पर प्रसिद्ध हो गया है। तमिलनाडु जाने वाले श्रद्धालु अब महालक्ष्मी मंदिर वेल्लोर जरूर जाते हैं। कई दिन तो यहां एक दिन में एक लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचते हैं। दक्षिण भारत के व्यस्त रेलवे स्टेशन काटपाडी से महालक्ष्मी मंदिर सात किलोमीटर की दूरी पर ही स्थित है। काटपाडी रेलवे स्टेशन वेल्लोर शहर का हिस्सा है।


इस मंदिर का निर्माण युवा संन्यासी शक्ति अम्मा ने कराया है। मंदिर का उदघाटन 24 अगस्त 2007 को हुआ। ये मंदिर सात साल में बनकर तैयार हुआ है। जब आप श्रीपुरम पहुंचते हैं तो आपको एक अलग नैसर्गिक वातावरण का एहसास होता है। इस मंदिर के निर्माण के साथ ही पर्यावरण संरक्षण का भी पूरा ख्याल रखा गया है। 100 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैले इस मंदिर में सर्वत्र हरियाली नजर आती है। मंदिर की संरचना वृताकार है। इसके निर्माण में वास्तु का खास ख्याल रखा गया है जिससे प्रकृति के ज्यादा करीब नजर आता है। मंदिर परिसर में देश के सभी प्रमुख नदियों से पानी लाकर सर्व तीर्थम सरोवर का निर्माण कराया गया है।


दर्शन  मंदिर सुबह 4 बजे से आठ बजे अभिषेक के लिए और सुबह आठ बजे से रात्रि आठ बजे तक समान्य दर्शन के लिए खुला रहता है।


ड्रेस कोड  मंदिर में दर्शन के लिए ड्रेस कोड है। आप लूंगी, शार्ट, नाइटी, मिडी, बारमुडा पहन कर नहीं जा सकते। परिसर में किसी भी तरह के नशे के सेवन पर प्रतिबंध है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के आवास की व्यवस्था है। मंदिर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए लंगर भी चलाता है। मंदिर के ट्रस्ट की ओर से आसपास के गांवों के लोगों के लिए कई पर्यावरण अनुकूल योजनाएं भी चलाई जा रही हैं।

-    ------  माधवी रंजना (MAHALAKSHMI TEMPLE, VELLORE, KATPADI JN, TAMILNADU, SHAKTI AMMA ) 

  मंदिर की साइट पर जाएं  www.sripuram.org

Sunday, January 20, 2013

नहीं भूलता स्वाद तिरुपति की थाली का


यूं तो तिरुपति में खाने के लिए आपको आसानी से उत्तर भारतीय खाना नहीं मिलता लेकिन यहां की दक्षिण भारतीय आंध्रा स्टाइल की थाली खाकर आप उस याद रखेंगे। तिरुपति रेलवे स्टेशन के सामने देवस्थानम ट्रस्ट के कांप्लेक्स विष्णु निवासम के अंदर आईआरसीटीसी की ओर से संचालित गोविंदम फूड कांप्लेक्स है। यहां का भी खाना अच्छा है। 48 रुपये की थाली के अलावा खाने के कई और विकल्प मौजूद हैं। दक्षिण के लेमन राइस का स्वाद यहां लिया सकता है। इस रेस्टोरेंट की साफ सफाई का तो कहना ही क्या।
तिरुपति शहर में रेलवे स्टेशन के आसपास खाने पीने के कई विकल्प हैं। हालांकि स्टेशन के सामने कई होटल हैं तो मराठी और उत्तर भारतीय थाली परोसने का दावा करते हैं लेकिन इनके खाने में वैसा स्वाद नहीं है। तिरुपति में हमने खाने की सबसे अच्छी जगह ढूंढी विष्णु निवासम के ठीक सामने मुतुमारन सरवना भवन।

 सरवना भवन की थाली 50 रुपये की है। इसमें 15 वेराइटी के डिश हैं। थाली में एक अच्छी चपाती भी देते हैं। साथ ही थाली में आप अपनी मर्जी से घी भी उड़ेल सकते हैं। वैसे केले के पत्ते से सजी थाली। हर सब्जी और दाल का स्वाद शानदार। थाली में ह्वाइट राइस के अलावा पुलाव राइस भी मौजूद था। स्वीट डिश और पापड़ के साथ अचार भी। और 50 रुपये में अनलिमिटेड खाइए। वर्दी वाले वेटर आपका आर्डर लेने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं। एक बार यहां का खाना अच्छा लगने के बाद हमने कई जगह बदलकर खाने में प्रयोग करने का इरादा त्याग दिया।
 हनी केक का स्वाद -  बाद में तिरुपति के बाजारों में घूमते हुए इडली और डोसा के भी कई अच्छे स्टाल नजर आए। गांधी पथ पर हमें एक बेकरी शाप मिली। कई तरह के पेस्ट्री तो हमारे वंश महाराज ट्राई करते रहते हैं लेकिन हमें यहां मिली हनी केक। यानी पेस्ट्री पर शहद की एक परत लगी थी। बेटे को इसका स्वाद भा गया। बस मजा आ गया। वाह तिरुपति।
- -------   विद्युत प्रकाश मौर्य 

(TIRUPATI, TIRUMALA, BALAJEE, ANDHRA PRADESH, TEMPLE )

Friday, January 18, 2013

विष्णु की पत्नी पद्मावती का मंदिर


पद्मावती यानी भगवान विष्णु की पत्नी। देश के तमाम शहरों में आपको लक्ष्मीनारायण के मंदिर साथ साथ मिलते हैं। लेकिन तिरुपति में बालाजी का मंदिर तिरुमाला पर्वत पर है तो उनकी पत्नी पद्मावती यानी महालक्ष्मी का मंदिर तिरुचानू में है।

तिरुपति से छह किलोमीटर की दूरी पर है तिरूचानू स्थित पद्मावती मंदिर। कहा जाता है कि तिरुपति बालाजी के दर्शन से पहले पद्मावती देवी के दर्शन करने चाहिए तभी बालाजी का दर्शन अच्छी तरह फलीभूत होता है। पद्मावती देवी के बारे में कहा जाता है कि वे भक्तों पर क्षमाशील हैं। वे आपके पापों को तुरंत क्षमा कर देती हैं और जल्दी प्रसन्न होकर आशीष भी देती हैं।

पद्मावती देवी का मंदिर भी दक्षिण के मंदिरों की तरह द्रविड शैली में बना है। मंदिर 17वीं सदी का बना हुआ है। मंदिर में माता की चांदी की विशाल मूर्ति है। माता पद्मासन में बैठी हैं। उनके दो हाथों में कमल का पुष्प है। एक पुष्प अभय का प्रतीक है तो दूसरा पुष्प वरदान का। मंदिर में देवी का श्रंगार 24 कैरेट के सोने से किया गया है। बालाजी की पत्नी पद्मावती के बारे में कहा जाता है कि वे 12 सालों तक पाताल लोक में वास कर रही थीं। 13वें साल में माता पद्मावती धरती पर अवतरित हुईं। कार्तिक शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि को देवी का अवतरण हुआ।

कैसे पहुंचे - तिरूचानू के पद्मावती देवी के मंदिर तक जाने के लिए तिरुपति रेलवे स्टेशन से हर 15 मिनट पर बस मिलती है। ये महज 20 मिनट का रास्ता है। लेकिन कई बार मंदिर में दर्शन के लिए आपको छह से आठ घंटे लग सकते हैं। कई बार यहां समान्य दर्शन में छह से 12 घंटेकी लाइन लगी रहती है। वैसे मंदिर दर्शन के लिए सुबह साढे छह बजे से खुल जाता है। यहां भी अतिरिक्त शुल्क देकर स्पेशल दर्शन और कल्याणोत्सव पूजा का विधान है।
-   माधवी रंजना

( TIRUPATI, TIRUMALA, BALAJEE, ANDHRA PRADESH )

Wednesday, January 16, 2013

तिरुमाला में रोज 50 हजार लोग ग्रहण करते हैं अन्न प्रसादम


तिरुपति बालाजी का दर्शन करने के बाद मंदिर से बाहर निकलने वाले सभी भक्तों को चावल का प्रसाद निःशुल्क दिया जाता है। इस प्रसाद को श्रद्धालु वहीं पर ग्रहण कर सकते हैं। इसके अलावा प्रसाद में तिरुपति बाला जी के लड्डु दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। देशी घी के बने ये बड़े आकार के लड्डु लंबे समय तक खराब नहीं होते। 

मंदिर में दर्शन के दौरान जो लोग 300 रुपये का शीघ्र दर्शन वाला टिकट खरीदते हैं उन्हें दो लड्डू निशुल्क दिए जाते हैं। जो लोग सर्व दर्शन की लाइन में लगे हैं वे अपनी इच्छा से लड्डु खरीद सकते हैं। मुख्य मंदिर के पास लड्डु के कई काउंटर एक भवन में बने हैं। तिरुपति के लड्डु के निर्माण में पवित्रता और सफाई का खास ख्याल रखा जाता है।
तिरुमाला पर है विशाल अन्न प्रसादम भवन  तिरुमाला पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशाल अन्न प्रसादम गृह बनाया गया है। यहां श्रद्धालु निशुल्क भोजन कर सकते हैं। अन्न प्रसादम गृह में आठ विशालकाय डायनिंग हॉल बनाए गए हैं। हर डायनिंग हॉल में 400 से ज्यादा लोग एक साथ बैठकर जीम सकते हैं। बैठने के लिए स्टील के टेबल और बेंच लगे हैं। यहां पर लोगों को केले के पत्ते पर चावल, सब्जी, दाल, भुजिया, चटनी, सांबर, छाछ जैसी चीजें बड़ी पवित्रता से परोसी जाती हैं।


तिरुमाला के इस अन्न प्रसादम के विशाल डायनिंग हॉल का उदघाटन 2011 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने किया। ये अन्न प्रसादम हॉल देश के किसी भी मंदिर के डायनिंग हॉल से काफी बड़ा है। तिरुमाला का ये अन्न प्रसादम भक्तों के दान से बना है और भक्तों के दान से ही चलता है। यहां औसतन रह रोज 50 हजार लोग अन्न प्रसादम ग्रहण करते हैं। एक बार तो एक दिन में एक लाख से ज्यादा लोगों को भोजन देने का रिकार्ड बन चुका है।


मंदिर के लिए आसपास के भक्त अन्न प्रसादम के लिए हरी सब्जियां और दाल आदि भी दान में देते हैं। अन्न प्रसादम का भोजन तैयार करने के लिए सफाई और पवित्रता का खास ख्याल रखा जाता है। अब अन्न प्रसादम के रसोई से बना भोजन तिरुपति तिरुमाला देवस्थानम ट्रस्ट की ओर संचालित अस्पताल के मरीजों के लिए भी उपलब्ध कराया जा रहा है। वैसे दक्षिण भारत के कई मंदिरों में इस प्रकार का अन्न प्रसादम वितरित किया जाता है। आप ऐसा इंतजाम विजयवाड़ा के कनक दुर्गा मंदिर में और श्रीशैलम के मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर में भी देख सकते हैं। 

------  विद्युत प्रकाश 
( TIRUPATI, TIRUMALA, BALAJEE, ANDHRA PRADESH )

Monday, January 14, 2013

तिरुमाला के पर्वत पर विराजते हैं तिरुपति बालाजी


तिरुपति से 17 किलोमीटर दूर तिरुमाला पहाड़ी पर विराजते हैं भगवान वेंकटेश्वर। तिरुपति से तिरुमाला जाने के लिए रेलवे स्टेशन के सामने विष्णु निवासम से आंध्र प्रदेश रोडवेज की बसें जाती हैं। जाने का किराया 40 रुपये बच्चों के लिए 20 रुपये है। आप जीप से भी जा सकते हैं जहां किराया 50 रुपये हो जाता है। अपने लिए मोलभाव करके टैक्सी आरक्षित भी कर सकते हैं।

तिरुमाला की ओर जैसे ही आपकी गाड़ी चढ़ने लगती है वातावरण मनोरम होने लगता है। पहाड़ी पर चढने से पहले चेकपोस्ट आता है जहां आपके सामानों की पहली चेकिंग होती है। तिरुमाला पहाड़ी पर पूरी तरह बालाजी का सम्राज्य है। यहां का अपना अनुशासन है जिसका पालन श्रद्धालुओं को करना पड़ता है। बालाजी के दर्शन करने वालों को चाहिए कि वे तिरुपति में ठहरें और तिरुमाला तैयार होकर दर्शन करने पहुंचे। वैसे तिरुमाला में भी आवासीय सुविधा है लेकिन वहां कई बार कमरे खाली नहीं मिलते। मंदिर में दर्शन की प्रक्रिया सुबह से देर रात तक चलती रहती है।

तीन तरह के दर्शन - बाला जी के मुख्य रुप से दो तरह के दर्शन हैं। सर्व दर्शन सबके लिए निःशुल्क है। समान्य दिनों में इसमें चार से छह घंटे, भीड़ होने से 20 से 40 घंटे भी लग सकते हैं। इसमें लाइन में लगे लोगों को बड़े बड़े हॉल में एक हॉल से दूसरे हॉल में शिफ्ट किया जाता है। इस दौरान खाने पीने, शौचालय आदि के इंतजाम रहते हैं। जल्दी दर्शन करना चाहते हैं तो 300 रुपये का शीघ्र दर्शन वाली लाइन में लग सकते हैं। तिरुमला प्रेस क्लब से शुरु होने वाले लाइन तकरीबन एक किलोमीटर घुमाते हुए आपको बालाजी के मुख्य मंदिर तक पहुंचाती है। दर्शन की लाइन में जाने से पहले बैग, मोबाइल फोन, कैमरा जैसी चीजें लॉकर में जमा कर देनी पड़ती हैं। शीघ्र दर्शन के लाइन में भी दूध और काफी मिलती रहती है। रास्ते में टायलेट्स भी बने हैं। लाइन में आगे बैठने के लिए हॉल बनाए गए हैं। बालाजी के मुख्य मंदिर के द्वार पर पहुंचने के बाद सर्व दर्शन और शीघ्र दर्शन की लाइन एक ही हो जाती है।

बाला जी का एक 50 रुपये का टोकन दर्शन भी है तो आपके लाइन में लगने की अवधि को कम कर देता है। इसमें आपको लाइन में लगने तय समय दिया जाता है। मंदिर दर्शन के वक्त भक्तों को भगवान के पास ज्यादा देर रुकने नहीं दिया जाता। आपके पीछे भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के इंतजार में होते हैं। 

माना जाता है कि इस मंदिर का इतिहास नौवीं शताब्दी से प्रारंभ होता है, जब कांचीपुरम के शासक वंश पल्लवों ने इस स्थान पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था।  15 सदी के पश्चात इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैलनी शुरू हो गई। 1843 से 1933 तक ब्रिटिश राज में इस मंदिर का प्रबंधन हातीरामजी मठ के महंत ने संभाला। 1933 में इस मंदिर का प्रबंधन मद्रास सरकार ने अपने हाथ में ले लिया। तब एक स्वतंत्र प्रबंधन समिति 'तिरुमाला-तिरुपति के हाथ में इस मंदिर का प्रबंधन सौंप दिया। आंध्र प्रदेश के राज्य बनने के पश्चात इस समिति का पुनर्गठन हुआ और एक प्रशासनिक अधिकारी को राज्य सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर नियुक्त किया। 

यहां विष्णु ने किया था निवास - प्रभु वेंकटेश्वर या बालाजी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि प्रभु विष्णु ने कुछ समय के लिए स्वामी पुष्करणी नामक तालाब के किनारे निवास किया था। यह तालाब तिरुमाला के पास स्थित है। तिरुमाला के चारों ओर स्थित पहाड़ियांशेषनाग के सात फनों के आधार पर बनीं 'सप्तगिरी कहलाती हैं। श्री वेंकटेश्वरैया का यह मंदिर सप्तगिरि की सातवीं पहाड़ी पर स्थित हैजो वेंकटाद्रि नाम से जाना जाता है। यह भी कहा जाता है कि 11वीं शताब्दी में संत रामानुज ने तिरुपति की इस सातवीं पहाड़ी पर चढ़ाई की थी। प्रभु श्रीनिवास (वेंकटेश्वर का दूसरा नाम) उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। ऐसा माना जाता है कि प्रभु का आशीर्वाद प्राने के बाद वे 120 साल तक जीवित रहे और जगह-जगह घूमकर भगवान वेंकटेश्वर की ख्याति फैलाई।
-- vidyutp@gmail.com

(TIRUPATI, TIRUMALA, BALAJEE, ANDHRA PRADESH, TEMPLE )

Saturday, January 12, 2013

चलो चलें तिरुपति बालाजी के दरबार में

तिरुपति के विष्णु निवास में ... तिरुमला जाने के लिए इंतजार 
दक्षिण भारत ही नहीं दुनिया का सबसे लोकप्रिय मंदिर है तिरुपति बालाजी। बाला जी यानी भगवान वेंकटेश्वर। अब तक सबसे अमीर भगवान थे। लेकिन अब उन्ही के दूसरे रूप तिरुवनंतपुरम के पद्मनाभ स्वामी ने उन्हें टक्कर दे डाली है। लेकिन अभी रोज श्रद्धालुओं की आमद के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर है तिरुपति। तिरुपति बाला जी कुल संपत्ति 50 हजार करोड़ से भी ज्यादा है।
तिरुपति पहुंचना बहुत आसान है। तिरुपति बहुत व्यस्त रेलवे स्टेशन है। तिरुपति आंध्र प्रदेश में है लेकिन तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से चार घंटे का रास्ता है। चेन्नई से तिरुपति 140 किलोमीटर तो बेंगलुरू से 300 किलोमीटर है वहीं हैदराबाद से 600 किलोमीटर के आसपास है। यानी सबसे आसान चेन्नई से पहुंचना है। तिरुपति के अलावा रेनुगुंटा नामक रेलवे स्टेशन भी पास में है। आप तिरुपति जाने के लिए तिरुपति या रेनुगुंटा किसी भी रेलवे स्टेशन पर उतर सकते हैं। हैदराबाद, चेन्नई और बेंगलुरू से तिरुपति जाने और लौटने के लिए पैकेज टूर भी बुक कराया जा सकता है। लेकिन ट्रेन से तिरुपति पहुंचना ज्यादा बेहतर है। बेंगलुरु से तिरुपति जाने के रास्ते में जोलारपेट और काटपाडी जंक्शन स्टेशन आते हैं। काटपाडी के पास प्रसिद्ध वेल्लोर शहर है जहां सीएमसी नामक प्रसिद्ध अस्पताल है। यहां पास में अब गोल्डेन टेंपल नामक लक्ष्मी जी का विशाल मंदिर भी बन चुका है।


तिरुपति रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने पर आप सीधे
 विष्णु निवासम का रुख करें। ये स्टेशन के बिल्कुल सामने तिरुपति तिरुमला देवस्थानम ट्रस्ट द्वारा बनवाया गया कांप्लेक्स है। इस विशाल कांप्लेक्स में आवासीय सुविधा ( एसी नान एसी कमरे) निशुल्क टायलेट, स्नानागार, क्लाक रुम, रेस्टोरेंट, फ्री डिस्पेंसरी, कलात्मक शापिंग के लिए दुकानें सब कुछ हैं।


अगर आप किसी और होटल में भी रहने जाना चाहते हैं, लेकिन अभी चेक इन का समय नहीं हुआ है, या जाने वाली ट्रेन का इंतजार करना है तो भी विष्णु निवास  में काफी वक्त गुजार सकते हैं। यहां अपने वाहन से आने वालों के लिए पार्किंग का भी इंतजाम है। इसी तरह का कांप्लेक्स श्रीनिवासम कांप्लेक्स नाम से तिरुपति बस स्टैंड के सामने भी है। जब हम विष्णुनिवासम पहुंचे तो वहां कमरा खाली नहीं मिला। लेकिन वहां अपना सामान जमा कर पत्नी बेटे को वहीं छोड़कर मैं आसपास के होटलों में कमरा ढूंढने निकल पड़ा।

विष्णु निवासम के पास ही
 मौर्य होटल में अच्छा हवादार कमरा मिल गया। तिरुपति के होटल ज्यादा महंगे नहीं है। वैसे आप तिरुमला हिल्स पर रहने के लिए बुकिंग करा सकते हैं। लेकिन इसके लिए आपको अपने तिरुमला जाने की नीयत तारीख पहले से ही तय करनी होगी। आप ट्रस्ट वेबसाइट पर आनलाइन बुकिंग करा सकते हैं।   ( http://www.ttdsevaonline.com/ )

(TIRUPATI, TIRUMALA, BALAJEE, ANDHRA PRADESH, TEMPLE )
     

Thursday, January 10, 2013

शानदार प्लानिंग का नमूना जयनगर

बेंगलुरु में जय नगर का लोकल बस स्टेशन। 
बेंगलुरू शहर हमेशा से देश के उन शहरों में शुमार है जो बेहतर टाउन प्लानिंग के लिए जाने जाते हैं। बेंगलुरू शहर की सड़कें आमतौर पर चौराहों पर एक दूसरे को न सिर्फ समकोण पर काटती हैं बल्कि इस बात का ध्यान रखा गया है कि रेड लाइटों की जरूरत नहीं पड़े। चौराहों पर फ्लाई ओवर और अंडरपास बनाने की शुरूआत वहां काफी पहले से ही कर दी गई थी। लेकिन बेंगलुरू शहर के कई मुहल्लों की टाउन प्लानिंग इस तरह से की गईं हैं कि वहां के निवासियों की सारी जरूरतें पूरी हो सकें। इसका सबसे अच्छा उदाहरण जय नगर है।



जय लालबाग से आगे जेपी नगर से पहले की एक टाउनशिप है। जयनगर अब शहर का मुख्य हिस्सा बन चुका है। 1960 के आसपास जयनगर की बसावट शुरू हुई। हर सेक्टर में जरूरत के हिसाब से बाजार, चौड़ी सड़कें, फुटपाथ, बस स्टाप, स्कूल कम्युनिटी हॉल जैसी सभी जरूरत की चीजों के अलावा जय नगर का खास आकर्षण है। यहां का बाजार। स्ट्रीट मार्केट से लेकर शापिंग मॉल तक सब कुछ है मुख्य बाजार में। जय नगर शापिंग करने वालों का मुख्य आकर्षण है। जय नगर का लोकल बस स्टाप। यहां बसें रेलवे स्टेशन की तरह अंदर प्लेटफार्म पर पहुंचती हैं। लोगों के बैठने का शानदार इंतजाम। आप बारिश में भींगेंगे नहीं। एक ही बस स्टैंड में इंटर स्टेटबस का भी स्टैंड। टाइम टेबल लगा है। 



बस स्टैंड में रेस्टोरेंट और बाजार भी है। बस स्टैंड की बिल्डिंग में मोर का बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर है। इतना ही नहीं बस स्टैंड की सबसे बड़ी खास बात इसमें बनी पार्किंग है। बस स्टैंड की सबसे ऊपरी मंजिल पर पार्किंग है। ऑन रुफ पार्किंग का शानदार नमूना है जय नगर का बस स्टैंड। बेंगलुरु में कई और ऐसे लोकल बस स्टैंड बनाए गए हैं जहां ऐसी सुविधाएं है। राजधानी दिल्ली को इन बस स्टैंड से भी कुछ सीखना चाहिए। मैंने देश भर के कुछ बस स्टाप देखे हैं उनमें चंडीगढ़ का बस स्टैंड काफी सुविधाजनक है।
-    - विद्युत प्रकाश मौर्य

( (JAI NAGAR, JP NAGAR, BANGLURU, TOWNSHIP ) 

Tuesday, January 8, 2013

हरे भरे लालबाग की सैर


फूलों की घड़ी, बिल्कुल सही समय बताती है। 
बेंगलुरू को बागों का शहर कहा जाता है। इन बागों में सबसे मशहूर है लालबाग। लालबाग बेंगलुरू के ह्दयस्थली है। शहर के बीचों बीच स्थित ये बाग ऐतिहासिक है। शहर में आने वालों और शहर में रहने वालों की खास पसंद। लालबाग फिलहाल 240 एकड़ के दायरे में फैला है। बगीचे में प्रवेश के लिए तीन द्वार हैं। इन्हें इस्ट गेट, साउथ गेट और वेस्ट गेट के नाम से जानते हैं। बाग में प्रवेश का टिकट 20 रुपये प्रति व्यक्ति है। लालबाग सालों भर सुबह छह बजे से शाम सात बजे तक खुला रहता है। न सिर्फ टाइम पास करने और ज्ञान बढ़ाने बल्कि पर्यटन के लिहाज से भी लालबाग खास जगह है।

फूलों की घड़ी - लालबाग की सबसे बड़ी खासियत यहां चलने वाली फ्लोरल क्लॉक यानी फूलों की घड़ी है। घड़ियां बनाने वाली प्रसिद्ध कंपनी एचएमटी की ओर से लगाई गई ये फूलों की घड़ी बिल्कुल सही समय बताती है। बड़ी सी इस घड़ी की सेकेंड की सूई तो तेजी से घूमते हुए देखा जा सकता है। घड़ी के परिधि में किस्म किस्म के फूल लगाए गए हैं। कदाचित इस घड़ी की मशीन अब बड़ी बैटरी से चलती है। पहले ये घड़ी मेकेनिकल थी।



लाल बाग का हैदर अली ने सजाया - लाल बाग का निर्माण 1760 में हैदर अली ने कराया था। तब इसका दायरा 240 एकड़ था। इसे मुगल स्टाइल में विकसित किया गया है। लाल बाग के एक कोने में ऐतिहासिक अशोक स्तंभ भी है। बाद में लालबाग के संरक्षण और विकास में कई अंग्रेज शासकों ने खासी रुचि ली।


इस ऐतिहासिक लालबाग में आप देख सकते हैं सबसे लंबा पेड़, सबसे पुराना पेड़। ये दोनों पेड़ ग्लास हाउस के सामने हैं। बाग में घूमते हुए आप अलग अलग तरह के पेड़ पौधों से अपना परिचय बढ़ा सकते हैं। घूमते घूमते थक जाएं तो बाग से निकाले गए फलों के जूस का आनंद ले सकते हैं। बाग में ग्लास हाउस है जिसमें अब समय समय पर प्रदर्शनियां लगती हैं। कभी ये ग्लास हाउस खास तरह के पौधे लगाने के लिए बना था।बाग के बीच में 30 एकड़ में एक झील है जिसमें जलीय पक्षी कलरव करते दिखाई दे जाते हैं।
आप घंटों इन पक्षियों के कलरव का आनंद ले सकते हैं। लालबाग की देखभाल अब कर्नाटक सरकार हार्टिकल्चर विभाग करता है। यहां समय समय पर बागवानी प्रशिक्षण की कार्यशालाएं भी लगाई जाती हैं।  
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
लाल बाग बोटानिकल गार्डन में फूल खिले हैं गुलशन गुलशन। 


लालबाग में सुंदर फव्वारा। 

(BANGLURU, LALBAG, HAIDER ALI )      


Sunday, January 6, 2013

बाग बगीचों का शहर बेंगलुरू


कई बागों के शहर के रुप में पहचान रखने वाले बेंगलुरू की अब पहचान एक आईटी सिटी के रुप में है। 1992 के बाद दूसरी बार बेंगलुरू जाना हुआ 2012 में। बेटे अनादि और माधवी के साथ हम पहुंचे सुबह सुबह बेंगलुरू सिटी स्टेशन। ये शहर का सबसे बड़ा और व्यस्त रेलवे स्टेशन है। इसके अलावा बेंगलुरू कैंट और यशवंतपुर नामक दो और स्टेशन हैं जहां से लंबी दूरी की रेलगाड़ियां खुलती हैं।

बेंगलुरु सिटी स्टेशन के ठीक सामने शहर का मैजेस्टिक बस स्टैंड है। यहां लोकल और इंटर स्टेट दोनों टर्मिनल आजू बाजू में हैं। दिल्ली जैसे शहर में भी इतना बड़ा लोकल बस टर्मिनल नहीं है। रेलवे स्टेशन से बस स्टैंड जाने के लिए सड़क पार करने की जरूरत नहीं है। इसके लिए सबवे बना हुआ है। आपको शहर के किसी भी कोने की बस रेलवे स्टेशन के सामने के टर्मिनल से मिल सकती है। इंटर स्टेट और लोकल बस स्टैंड को जोड़ने के लिए उपरगामी सेतु भी बनाए गए हैं। दिल्ली में सिर्फ आनंद विहार टर्मिनल ऐसी जगह है जहां रेलवे स्टेशन, लोकल, लंबी दूरी वाले बस स्टैंड और मेट्रो स्टेशन एक ही परिसर में हैं।
बेंगलुरू रेलवे स्टेशन के बाहर ब्रांडेड कंपनियों की टैक्सी सेवाएं भी उपलब्ध हैं। यहां आप वाजिब दरों पर टैक्सी सेवा ले सकते हैं।

हांलाकि बेंगलुरू के आटो वाले भी दिल्ली वालों की तरह मोलभाव करते हैं। हाल ही में बेंगलुरू में भी मेट्रो रेल सेवा आरंभ हो गई है। हालांकि अभी यह 10 किलोमीटर से कम के दायरे में अपनी सेवाएं दे रही है। लेकिन बेंगलुरू मेट्रो जिसे नाम दिया गया है नमदा जल्द ही पूरे बेंगलुरू शहर को अपनी सेवाएं देगी।

ऐतिहासिक लाल बाग बोटानिकल गार्डन के बाहर। 
बेंगलुरू शहर को कभी साफ सफाई के ले जाना जाता था। लेकिन हालिया रिपोर्ट बताते हैं कि शहर का कचरा प्रबंधन कमजोर हुआ है। शहर में प्रदूषण और गंदगी बढ़ी है। आबादी के बढ़ते बोझ के हिसाब से साफ सफाई शहर में नहीं दिखाई देता था। फिर भी बेंगलुरु शहर दिल्ली से खूबसूरत दिखाई देता है।
हमलोग मैसूर से ट्रेन से बेंगलुरू पहुंचे थे। हमारे भाई साहब जेपी नगर में रहते थे। हमने ट्रेन से उतरने के बाद जेपी नगर पहुंचने का रास्ता पूछा। उन्होंने एक लोकल बस का नंबर बताया। हमलोग उस बस में सवार हो गए। सुबह सुबह भीड़ नहीं थी। जेपी नगर बस स्टाप पर भाई साहब हमें लेने पहुंच गए थे। लगातार लंबी यात्रा के बाद हमने बेंगलुरू में दो दिन का कार्यक्रम खाली रखा था ताकि थोड़ा आराम किया जा सके। 

क्या क्या देखें बेंगलुरू में-  बेंगलुरु शहर में प्रवास के दौरान आप यहां का विधानसभा भवन जिसे विधानसौदा कहते हैं देख सकते हैं। यह देश के सबसे खूबसूरत विधानसभा भवन में से एक है। हालांकि जिस दौरान हम बेंगलुरु पहुंचे हैं विधानसभा भवन के आसपास मेट्रो का काम चल रहा है इसलिए यहां सैलानियों के देखने लायक इंतजाम नहीं है। वैसे ये विधानसभा भवन रात में देखने में काफी सुंदर लगता है। इस भवन पर रात में चारों तरफ से रोशनी फेंकी जाती है तब इसका सौंदर्य और बढ़ जाता है। अपने 1992 के बेंगलुरु यात्रा के दौरान हमने रात्रि में विधानसभा का सौंदर्य देखा था। 
बेंगलुरु में आप कब्बन पार्क, टीपू सुल्तान का समर पैलेस, इस्कॉन मंदिर और बानेरघटा नेशनल पार्क, विश्वैशरैया इंडस्ट्रियल एंड टेक्नोलाजिकल म्यूजियम, बुल टेंपल आदि देख सकते हैं। 

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य
( (BENGLURU, KARNATKA, IT CITY, JP NAGAR)