Thursday, January 31, 2013

ऊर्जा का बड़ा स्रोत - रागी यानी फिंगर मिलेट

रागी की इडली, स्वाद भी और सेहत भी। 
हैदराबाद में रहते हुए हमने रागी इडली, रागी डोसा खूब खाया। इसे दक्षिण भारत में रागी तो उत्तर भारत में मडुवा कहते हैं। रागी अति पौष्टिक खाद्य पदार्थ है। कैल्शियमलोहा और प्रोटीन से भरपूर रागी से आटा बनता है। यह साबूत अनाज होता हैजिससे अधिक तृप्ति (फाइबर से) भी मिलती है। यह समान्य ब्रेड यानी गेहूं की रोटी का एक बेहतर विकल्प है। रागी और जौ का आटा अपने विशेष रफेज (फाइबर /खाद्य रेशों) के कारण खून में घुली चर्बी भी कम करता है। फिंगर मिलेट यानी रागी मिले आटे की रोटी खाने से डायबीटीज ( चीनी की बीमारी) भी कंट्रोल हो सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ब्लड शुगर का लेवल नियंत्रित रखने में रागी बहुत सहायक है।

रागी की इडली और डोसा  - रागी और चावल को सही मात्रा में मिलाकर पेस्ट तैयार किया जाता है जिससे इडली, डोसा जैसे दक्षिण भारतीय व्यंजन बनाए जा सकते हैं। आजकल बाजार में रागी इडली और रागी डोसा का मिक्स भी उपलब्ध है। इससे कम श्रम में रागी इडली बनाई जा सकती है। रागी इडली वजन घटाने के लिए भी मुफीद है। ( एमटीआर का रागी इडली मिक्स बाजार में उपलब्ध है) 


रागी से इडली, मोटी डबल रोटीडोसा और रोटी बनाई जाती है। इस से रागी मुद्दी ( लड्डू) भी बनती है। इसे बनाने के लिए रागी आटे को पानी में उबाला जाता है। 
आपको पता है रागी के दानों से ही बनता है कुट्टू का आटा जिसे लोग नवरात्र में खाते हैं। जानकारों की मानें तो कुट्टू का आटा बनने के एक माह बाद तक ही खाने लायक रहता है। इससे पुराना होने पर वह खाने के अनुकूल नहीं रहता। यानी वह जहरीला हो जाता है। वैसे कुट्टू,  रागी यानी फिंगर मिलेट से भी बनता है और सिंघाडा से भी बनता है।

ऐसा भी करें -  गेहूं के आटे के साथ सोयाबीनरागी या जई का आटा मिलाकर मूलीपालकमेथीगाजर आदि सब्जियां भरकर रोटियां बनाएं। परांठे खाने का मन हो तो बिल्कुल हल्का घी लगाएं लेकिन बेहतर रोटी खाना ही है। इससे देर तक एनर्जी मिलती है। 

फाइबर युक्त होता है रागी आटा
रागी का आटाजौ का आटाबाजरे का आटा ये सभी फाइबर युक्त होते हैं। इनसे आप गेहूं के नमकीन और तीखी मठरी शक्करपालीचकलीकचौरियां आदि बना सकते हैं। इनमें आप आटे के साथ बाजरा, रागी, सोयाबीन का आटा भी  मिला सकते हैं।

यहां होता है उत्पादन -  पोषक तत्वों से युक्त  रागी यानी मडुवा का उत्पादन झारखंड, तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगानामहाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में होता है। हालांकि कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश में रागी का सबसे अधिक उपभोग होता है। हैदराबाद प्रवास के दौरान रागी की इडली और रागी का डोसा हमारा प्रिय भोजन रहा।  

रागी के बिस्कुट भी-  बाजार में अब रागी के बने हुए बिस्कुट भी उपलब्ध हैं। रागी के पौष्टिक गुणों से भरपूर इन बिस्कुट का आप आनंद ले सकते हैं। कई जगह स्थानीय स्तर पर इनका उत्पादन होने लगा है। 
 प्रस्तुति विद्युत प्रकाश मौर्य 
( RAGI, FINGER MILLET, ELEUSINE CORACANA, GOOD FOOD, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 75 ) 

Tuesday, January 29, 2013

वास्तुकला का बेजोड़ नमूना- हैदराबाद की ऐतिहासिक मक्का मसजिद



चारमीनार के पास ही स्थित है हैदराबाद की ऐतिहासिक मक्का मसजिद। शहर की सबसे बड़ी इबातगाह। चार मीनार के मुंडेर से भी इस मसजिद का विहंगम दृश्य नजर आता है। मक्का मसजिद सिर्फ हैदराबाद ही नहीं बल्कि देश की सबसे पुरानी और बड़ी मसजिदों में से एक गिनी जाती है। यह पुराने हैदराबाद क्षेत्र में स्थित है। मक्का मसजिद हैदराबाद शहर के विरासत स्थलों में से एक है। 





इस मसजिद का निर्माण 1617 में शुरू हुआ। इसके मीनारों की ऊंचाई 23 मीटर तक है। इसमें 20 हजार लोगों के एक साथ बैठकर नमाज पढ़ने की क्षमता है। हैदराबाद के नवाब मोहम्मद कुली कुतुबशाह ने इस मसजिद का निर्माण सत्रहवीं सदी के अंत में शुरू कराया था। इसका निर्माण 1617 में शुरू हुआ पर यह 1684 में जाकर पूरा हुआ। यानी 77 सालों तक इसका निर्माण कार्य जारी रहा। बीच में कुतुबकुली शाह के निधन के बाद कुछ सालों तक निर्माण बाधित भी रहा।

तो यूं पड़ा नाम मक्का मसजिद -  कहा जाता है कि इसका मुख्य मेहराब मक्का से लाए गए पत्थरों से बना था इसलिए इसका नाम मक्का मसजिद पड़ गया। वहीं कुछ लोग कहते हैं कि इस मसजिद के निर्माण में नींव के लिए मिट्टी मक्का से लाई गई थी। कहते हैं कि हैदराबाद के निजाम ने इस मसजिद के निर्माण में खुद भी कार सेवा की थी। मतलब की खुद भी निर्माण में श्रमदान किया था। 

एक ही विशाल स्लैब का इस्तेमाल -  इस मसजिद के विशाल स्तंभ और मेहराब ग्रेनाइट के एक ही स्लैब पर बनाए गए हैं। इस विशाल आकार के पत्थर को यहां तक लाने में ही पांच साल लग गए थे। इसके निर्माण में कुल 8000 राज मिस्त्री और मजदूर लगाए गए थे। पत्थर की बनी यह मस्जिद अपने स्थापत्य और वास्तुकला में बेजोड़ है। इसके पास ही असफजाही में हैदराबाद के नवाबों की कब्र देखी जा सकती है। 

2007 का वह मनहूस दिन - 18 मई 2007 का वह मनहूस दिन था जब हैदराबाद की इस ऐतिहासिक मसजिद के पास बम धमाका हुआ। यह एक आतंकी हमला था। वजुखाने के पास हुए धमाके मे 16 लोग मारे गए थे। इसके कारण मक्का मसजिद कई साल तक खबरों की सुर्खियों में बना रहा। यह संयोग है कि साल 2007 के मई महीने में मैं हैदराबाद में इनाडु टीवी चैनल में कार्यरत था। तब इस हमले की दिन रात रिपोर्टिंग हो रही थी। 


मक्का मसजिद के आसपास के बाजारों में आप पुराने हैदराबाद शहर की रिवायतों को खूब महसूस कर सकते हैं। बुरके में जाती महिलाएं। उर्दूदां हिंदी मे बातचीत करते लोग। शाम के समय तो इन बाजारों में खूब रौनक रहती है। 

कैसे पहुंचे - मक्का मसजिद पहुंचने के लिए आप हैदराबाद में कहीं से भी चारमीनार इलाके में पहुंच सकते हैं। चार मीनार के बगल में ही मक्का मसजिद का विशाल परिसर स्थित है। सिटी बसें भी इस क्षेत्र से होकर गुजरती हैं। नगर के किसी भी इलाके से आपको चारमीनार के लिए बसें मिल जाएंगी। आप आटो रिक्शा से भी इस इलाके में पहुंच सकते हैं।

मक्का मसजिद इबादत करने वालों के लिए सुबह 4 बजे से रात्रि 9.30 बजे तक खुला रहता है। मक्का मसजिद के आसपास हैदराबाद की और भी पुराने विरासत की इमारते हैं। आसपास में आप चौमहला पैलेस, लाद बाजार आदि देख सकते हैं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MUCCA MASJID, HYDRABAD, OLD CITY, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 74 ) 

Sunday, January 27, 2013

अल्लाह को शुकराना देने के लिए बना चार मीनार


हैदराबाद आए हैं तो चार मीनार न जाएं ऐसा कैसे हो सकता है। तो शादी की गहमागमी के बीच हमने चार मीनार और मदीना बिल्डिंग जाने का समय निकाल ही लिया। 

हैदराबाद शहर की पहचान चार मीनार से है। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण स्मारक है चार मीनार। 400 साल से ज्यादा हो गए, चार मीनार शान से खड़ा है। चार मीनार  को मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने बनवाया था। सुल्तान मुहम्मद कुली कुतुब शाहकुतुब शाही राजवंश का पांचवां शासक था। इसका निर्माण 1591 ई में हुआ। 

अल्लाह तेरा शुकराना - कहा जाता है कि एक बार हैदराबाद शहर में प्लेग जैसी जानलेवा बीमारी फैल गई। इसमें काफी लोगों की मौत हुई। तब कुली कुतुब शाह प्रार्थना की थी कि हे अल्लाहइस शहर की शांति और समृद्धि के प्रदान सभी जातियों के लोगों का कल्याण करो। शाह की अल्लाह ने सुन ली। इसके बाद उन्हें धन्यवाद देने के लिए चारमीनार का निर्माण शहर के बीचोंबीच कराया गया।

इसमें कुल चार अलंकृत मीनारें इसलिए इसका नाम चार मीनार है। यह स्‍मारक ग्रेनाइट के मनमोहक चौकोर खम्‍भों से बना हैजो उत्तरदक्षिणपूर्व और पश्चिम दिशाओं में स्थित चार विशाल आर्च पर निर्मित किया गया है। यह आर्च कमरों के दो तलों और आर्चवे की गेलरी को सहारा देते हैं। चौकोर संरचना के प्रत्‍येक कोने पर एक छोटी मीनार है जो 24 मीटर ऊंची है। चार मीनार की कुल ऊंचाई 54 मीटर है। चार मीनार की मूसी नदी के पूर्वी तट पर बना है। हालांकि अब मूसी नदी अपने अस्तित्व को खोती जा रही है।

चार मीनार पर चढ़ने के लिए अंदर से सीढ़ियां बनी हुई हैं। इन घुमावदार सीढ़ियों से आप इसकी मुंडेर पर जा सकते हैं। पुरातत्व विभाग इसके लिए 5 रुपये का टिकट लेता है। चार मीनार की मुंडेर मक्का मसजिद का सुंदर नजारा दिखाई देता है, साथ ही इसके चारों ओर हैदराबाद शहर के बाजारों का नजारा दिखाई देता है। इसके मेहराब में हर शाम रोशनी की जाती है जो एक अविस्‍मरणीय दृश्‍य बन जाता है।

चार मीनार सड़क के बीचोंबीच स्थित है। इसके चारों तरफ चार रास्ते शहर के अलग अलग हिस्सों में जाते हैं। चारमीनार के आसपास के बाजार में आपको हैदराबाद शहर का परंपरागत नजारा दिखाई देता है। बुरके में खरीददारी करती महिलाएं। स्ट्रीट फूड का मजा लेते लोग। आदि आदि...




अपने सुनहरे दिनों मेंचारमीनार के आसपास 14 हजार दुकानें थी। आज चारमीनार के आसपास शहर का प्रसिद्ध लाह की चूड़ियों का बाजार और मोतियों का बाजार पथरगट्टी मौजूद है। इन बाजारों पर्यटक आभूषण की खरीददारी करने आते हैं। वहीं स्थानीय लोगों भी खूब खरीददारी करने आते हैं।

सुरंग की कहानी - ऐसा कहा जाता है कि कभी ऐतिहासिक गोलकुंडा किला और चारमीनार के बीच 15 फुट चौड़ी और 30 फुट ऊंची एक भूमिगत सुरंग थी। इस सुरंग को सुल्तान मोहम्मद कुली कुतुब शाह ने बनवाया था। माना जाता है कि इस सुरंग में शाही परिवार ने अपना शाही खजाना छुपाया था। हैदराबाद की गलियों में ये किस्सा मशहूर की ये खजाना आज भी सुरंग में मौजूद है।1936 में निजाम मीर ओसमान अली ने एक सर्वे कराया था और साथ ही नक्शा भी बनवाया था। हालांकि उस दौरान यहां खुदाई नहीं कराई गई थी।

कैसे पहुंचे - नामपल्ली ( हैदराबाद रेलवे स्टेशन ) से चारमीनार की दूरी 7 किलोमीटर है। हैदराबाद के एमजी बस स्टैंड से इसकी दूरी पांच किलोमीटर है। भारतीय नागरिकों के लिए प्रवेश शुल्क 5 रुपये हैं। विदेशी नागरिकों के लिए यह शुल्क 100 रुपये है। यह सुबह 9.30 से शाम 5.30 तक खुला रहता है।


चार मीनार की छत पर, पीछे  दिखाई दे रही है मक्का मसजिद ( साल 2007) 



- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com  
(CHARMINAR, HYDRABAD, MUCCA MASJID, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 73

Friday, January 25, 2013

एक हैदराबादी शादी में...शुभ लग्ने सावधनाय...


सुबह तिरुमला हिल्स जाकर तिरुपति बाला जी के दर्शन करने के बाद शाम को हमलोग हैदराबाद के लिए चल पड़े। तिरुपति से ही बनकर चलने वाली एक स्पेशल ट्रेन में हमारा आरक्षण है। यह ट्रेन आज अपना आखिरी फेरा ले रही है। इसके स्लिपर क्लास में हमारा आरक्षण कनफर्म हो गया है। ट्रेन सुबह-सुबह सिकंदराबाद पहुंच जाएगी। दो दिन तिरुपति शहर में गुजराने के बाद हमने शहर को अलविदा कहा। शाम को भी हल्की बारिश हो रही है। इस बीच हमने ट्रेन में जगह ले ली है। हमारे साथ बेलगाम के एक कन्नड़ स्वर्णकार परिवार के सदस्य सफर कर रहे हैं। उनके संग बातों में सफर कट गया। 

कुल 14 दिन के दक्षिण भारत के कई शहरों के सफर के बाद हमलोग अब पहुंच रहे हैं हैदराबाद। कोच्चि, त्रिवेंद्रम, कन्याकुमारी, मदुरै, रामेश्वरम, कोयंबटूर, ऊटी, मैसूर, बेंगलुरू, तिरूपति के बाद हमारा अब आखिरी पड़ाव है हैदराबाद। तिरुपति से रात नौ बजे हैदराबाद जाने वाली ट्रेन समय से चल पड़ी है।  

हैदराबाद वह शहर है जहां पहले ही तकरीबन एक साल गुजार चुके थे। पर इस बार संयोग से हमारी यात्रा के आखिरी पड़ाव में शादी थी हमारे नवीन भाई की। शादियां तो हमेशा खास होती है चाहे किसी भी इलाके की हों। बिहार में मिथिला की शादियों के रस्मो रिवाज रोचक होते हैं तो हमारे लिए आंध्र प्रदेश की एक शादी देखना भी कम कौतूहल भरा नहीं था। मौका था हमारे हैदराबाद प्रवास के दौरान हमारे मकान मालिक रहे एन रत्नाराव के बड़े बेटे नवीन की शादी का। पूरे दक्षिण भारत के सफर के बाद हमलोग एक बार फिर हैदराबाद के वनस्थलीपुरम में उसी घर में पहुंचे जहां बेटे अनादि का बचपन गुजरा था। हम दोपहर में पहुंचे तो घर में शादी की तैयारियां चल रही थीं।

बारात जाने से पहले दोपहर में दूल्हे को आशीर्वाद देने की रस्म हुई। इसमें हमने भी हिस्सा लिया परिवार के बाकी सदस्यों की तरह। शाम को बारात निकली सिकंदराबाद के एक इलाके में। शादी बैंक्वेट हॉल में थी। लेकिन बिल्कुल परंपरागत तरीके से। तीन पंडित थे शादी मेंरत्नाराव जी ने बताया कि पंडित की फीस 10 हजार रुपये है। शादी का मुहुर्त तय था रात दस बजे। मुहुर्त निकट आ रहा था। पंडित जी समवेत स्वर में मंत्रोच्चार कर रहे थे...
शुभ लग्ने सावधनाय...     

विवाह का खास मंत्र जो लग्न के इंतजार में पंडित जी द्वारा लगातार उच्चारित किया जा रहा था। सारे बाराती शुभ मुहुर्त का इंतजार कर रहे थे। जैसे मुहुर्त आए आसमान में हजारों फूलों की बरसात होने लगी। ये नजारा था तेलंगाना प्रांत में होने वाले एक विवाह का। हमें इस शादी में शामिल होने का खास तौर पर मौका मिला था।

मंगल धुन बजाने वाले अपने वाद्ययंत्रों के साथ पहुंच गए थे। उत्तर भारत की तरह बैंड बाजा नहीं खास तरह की मंगलधुन बजती है शादी की सारी रस्मों के दौरान। 



...शुभ लग्ने सावधनाय..श्री लक्ष्मीनारायण ध्यान सावधनाय... और शुभ लग्न आया दूल्हे दुल्हन ने एक दूसरे पर फूल बरसाना शुरू किया। इसके बाद दूसरी रस्म शुरू हुई चावल के बंटवारे की। इसके बाद तीसरी रस्म माला डालने और बदलने की। वर वधू पक्ष के लोगों ने दुल्हा दुल्हन को आशीर्वाद दिया। पूरी शादी मंच पर हुई। दुल्हन का फूलों से श्रंगार खास होता है।

दुल्हन घूंघट नहीं करती-  शादी में कोई परदा नहीं। लेकिन अभी सारी रस्में खत्म नहीं हुईं। एक और रस्म आई घड़े से अंगूठी ढूंढ कर निकालने की।  दुल्हा दुल्हन दोनों मिलकर कोशिश करते हैं। और शादी की आखिरी रस्म। पंडित दुल्हा दुल्हन को अपने साथ खुले आसमान के नीचे ले जाते हैं। पति अपनी पत्नी को सप्तर्षि तारे को दिखाता है और उनसे आशीर्वाद लेता है। सारी रात की बात नहीं बस कुछ घंटे में शादी संपन्न हो गई।



शादी के बाद अगले ही दिन वर वधू स्वागत समारोह था। वनस्थलीपुरम के पास  पनामा गार्डेन में। यहां खाने पीने के मीनू शाकाहारी था। हालांकि दक्षिण भारत में अक्सर रिसेप्शन में मांसाहारी भोजन होता है पर रत्नाराव जी ने शाकाहारी मीनू रखा है। और इसमें खास तौर पर उत्तर भारतीय व्यंजन थे।

तो इन सबके बीच में बेटे अनादि को रबड़ी और जलेबी खूब पसंद आई। तो बार बार खाते रहे। हमने कभी उत्तर भारतीय तो कभी दक्षिण भारतीय स्वाद का घंटो मजा लिया। ये बहुत ही हंसी और यादगार शाम थी। इसी बीच हमारे ईटीवी के कुछ साथी भी मुझसे मिलने आए। हैदराबाद का वनस्थलीपुरम तो ऐसा लगता है जैसे हमारा दूसरा घर ही हो।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( 30 अक्तूबर 2012,  SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 72 ) 

---- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( HAYDRABAD, VANASTHALIPURM, SHADI, SHUBH LAGAN ) 

Wednesday, January 23, 2013

एक और स्वर्ण मंदिर- महालक्ष्मी मंदिर वेल्लोर

अभी तक हम देश में स्वर्ण मंदिर के तौर पर श्री दरबार साहिब अमृतसर को ही जानते हैं लेकिन इसके मुकाबले दक्षिण भारत में भी एक स्वर्ण मंदिर बन चुका है। तमिलनाडु के वेल्लोर के पास श्रीपुरम में बने महालक्ष्मी मंदिर के निर्माण में तकरीबन 15000 किलोग्राम विशुद्ध सोने के इस्तेमाल हुआ है। जबकि हरमंदिर साहिब अमृतसर के गुंबद में 400 किलोग्राम सोने के इस्तेमाल हुआ है। स्वर्ण मंदिर श्रीपुरम के निर्माण में 300 करोड़ से ज्यादा राशि की लागात आई है। मंदिर के आंतरिक और बाह्य सजावट में सोने का बड़ी मात्रा में इस्तेमाल हुआ है। विश्व में किसी भी मंदिर के निर्माण में इतना सोना नहीं लगा है। रात में जब इस मंदिर में प्रकाश किया जाता है तब सोने की चमक देखने लायक होती है। 

अपनी भव्यता के कारण महालक्ष्मी मंदिर कुछ ही सालों में दक्षिण के स्वर्ण मंदिर के तौर पर प्रसिद्ध हो गया है। तमिलनाडु जाने वाले श्रद्धालु अब महालक्ष्मी मंदिर वेल्लोर जरूर जाते हैं। कई दिन तो यहां एक दिन में एक लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचते हैं। दक्षिण भारत के व्यस्त रेलवे स्टेशन काटपाडी से महालक्ष्मी मंदिर सात किलोमीटर की दूरी पर ही स्थित है। काटपाडी रेलवे स्टेशन वेल्लोर शहर का हिस्सा है।


इस मंदिर का निर्माण युवा संन्यासी शक्ति अम्मा ने कराया है। मंदिर का उदघाटन 24 अगस्त 2007 को हुआ। ये मंदिर सात साल में बनकर तैयार हुआ है। जब आप श्रीपुरम पहुंचते हैं तो आपको एक अलग नैसर्गिक वातावरण का एहसास होता है। इस मंदिर के निर्माण के साथ ही पर्यावरण संरक्षण का भी पूरा ख्याल रखा गया है। 100 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैले इस मंदिर में सर्वत्र हरियाली नजर आती है। मंदिर की संरचना वृताकार है। इसके निर्माण में वास्तु का खास ख्याल रखा गया है जिससे प्रकृति के ज्यादा करीब नजर आता है। मंदिर परिसर में देश के सभी प्रमुख नदियों से पानी लाकर सर्व तीर्थम सरोवर का निर्माण कराया गया है।


दर्शन  मंदिर सुबह 4 बजे से आठ बजे अभिषेक के लिए और सुबह आठ बजे से रात्रि आठ बजे तक समान्य दर्शन के लिए खुला रहता है।


ड्रेस कोड  मंदिर में दर्शन के लिए ड्रेस कोड है। आप लूंगी, शार्ट, नाइटी, मिडी, बारमुडा पहन कर नहीं जा सकते। परिसर में किसी भी तरह के नशे के सेवन पर प्रतिबंध है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के आवास की व्यवस्था है। मंदिर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए लंगर भी चलाता है। मंदिर के ट्रस्ट की ओर से आसपास के गांवों के लोगों के लिए कई पर्यावरण अनुकूल योजनाएं भी चलाई जा रही हैं।

-    ------  माधवी रंजना (MAHALAKSHMI TEMPLE, VELLORE, KATPADI JN, TAMILNADU, SHAKTI AMMA, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 71 ) 

  मंदिर की साइट पर जाएं  www.sripuram.org

Monday, January 21, 2013

नहीं भूलता स्वाद तिरुपति की थाली का


यूं तो तिरुपति में खाने के लिए आपको आसानी से उत्तर भारतीय खाना नहीं मिलता लेकिन यहां की दक्षिण भारतीय आंध्रा स्टाइल की थाली खाकर आप उस याद रखेंगे। तिरुपति रेलवे स्टेशन के सामने देवस्थानम ट्रस्ट के कांप्लेक्स विष्णु निवासम के अंदर आईआरसीटीसी की ओर से संचालित गोविंदम फूड कांप्लेक्स है। यहां का भी खाना अच्छा है। 48 रुपये की थाली के अलावा खाने के कई और विकल्प मौजूद हैं। दक्षिण के लेमन राइस का स्वाद यहां लिया सकता है। इस रेस्टोरेंट की साफ सफाई का तो कहना ही क्या।
तिरुपति शहर में रेलवे स्टेशन के आसपास खाने पीने के कई विकल्प हैं। हालांकि स्टेशन के सामने कई होटल हैं तो मराठी और उत्तर भारतीय थाली परोसने का दावा करते हैं लेकिन इनके खाने में वैसा स्वाद नहीं है। तिरुपति में हमने खाने की सबसे अच्छी जगह ढूंढी विष्णु निवासम के ठीक सामने मुतुमारन सरवना भवन।

 सरवना भवन की थाली 50 रुपये की है। इसमें 15 वेराइटी के डिश हैं। थाली में एक अच्छी चपाती भी देते हैं। साथ ही थाली में आप अपनी मर्जी से घी भी उड़ेल सकते हैं। वैसे केले के पत्ते से सजी थाली। हर सब्जी और दाल का स्वाद शानदार। थाली में ह्वाइट राइस के अलावा पुलाव राइस भी मौजूद था। स्वीट डिश और पापड़ के साथ अचार भी। और 50 रुपये में अनलिमिटेड खाइए। वर्दी वाले वेटर आपका आर्डर लेने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं। एक बार यहां का खाना अच्छा लगने के बाद हमने कई जगह बदलकर खाने में प्रयोग करने का इरादा त्याग दिया।
रात को भोजन के बाद हमलोग टहलने निकले। पास में एक सरोवर के किनारे मंच सजा था। एक धार्मिक आयोजन में गायन चल रहा था। गीत तेलुगू में हो रहा था पर सुर हो तो भाषा गौण हो जाती है। हमने थोड़ी देर संगीत का आनंद लिया फिर होटल में वापस लौट आए। 

हनी केक का स्वाद -  बाद में तिरुपति के बाजारों में घूमते हुए इडली और डोसा के भी कई अच्छे स्टाल नजर आए। गांधी पथ पर हमें एक बेकरी शाप मिली। कई तरह के पेस्ट्री तो हमारे वंश महाराज ट्राई करते रहते हैं लेकिन हमें यहां मिली हनी केक। यानी पेस्ट्री पर शहद की एक परत लगी थी। बेटे को इसका स्वाद भा गया। बस मजा आ गया। वाह तिरुपति।
- -------   विद्युत प्रकाश मौर्य 

(TIRUPATI, TIRUMALA, BALAJEE, ANDHRA PRADESH, TEMPLE , SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 70)

Saturday, January 19, 2013

विष्णु की पत्नी पद्मावती का मंदिर


पद्मावती यानी भगवान विष्णु की पत्नी। देश के तमाम शहरों में आपको लक्ष्मीनारायण के मंदिर साथ साथ मिलते हैं। लेकिन तिरुपति में बालाजी का मंदिर तिरुमाला पर्वत पर है तो उनकी पत्नी पद्मावती यानी महालक्ष्मी का मंदिर तिरुचानू में है।

तिरुपति से छह किलोमीटर की दूरी पर है तिरूचानू स्थित पद्मावती मंदिर। कहा जाता है कि तिरुपति बालाजी के दर्शन से पहले पद्मावती देवी के दर्शन करने चाहिए तभी बालाजी का दर्शन अच्छी तरह फलीभूत होता है। पद्मावती देवी के बारे में कहा जाता है कि वे भक्तों पर क्षमाशील हैं। वे आपके पापों को तुरंत क्षमा कर देती हैं और जल्दी प्रसन्न होकर आशीष भी देती हैं।

17वीं सदी का मंदिर - पद्मावती देवी का मंदिर भी दक्षिण के मंदिरों की तरह द्रविड शैली में बना है। मंदिर 17वीं सदी का बना हुआ है। मंदिर में माता की चांदी की विशाल मूर्ति है। माता पद्मासन में बैठी हैं। उनके दो हाथों में कमल का पुष्प है। एक पुष्प अभय का प्रतीक है तो दूसरा पुष्प वरदान का। मंदिर में देवी का श्रंगार 24 कैरेट के सोने से किया गया है। 

बालाजी की पत्नी पद्मावती के बारे में कहा जाता है कि वे 12 सालों तक पाताल लोक में वास कर रही थीं। 13वें साल में माता पद्मावती धरती पर अवतरित हुईं। कार्तिक शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि को देवी का अवतरण हुआ।


कैसे पहुंचे - तिरूचानू के पद्मावती देवी के मंदिर तक जाने के लिए तिरुपति रेलवे स्टेशन से हर 15 मिनट पर बस मिलती है। ये महज 20 मिनट का रास्ता है। लेकिन कई बार मंदिर में दर्शन के लिए आपको छह से आठ घंटे लग सकते हैं। कई बार यहां समान्य दर्शन में छह से 12 घंटेकी लाइन लगी रहती है। वैसे मंदिर दर्शन के लिए सुबह साढे छह बजे से खुल जाता है। यहां भी अतिरिक्त शुल्क देकर स्पेशल दर्शन और कल्याणोत्सव पूजा का विधान है।
-   माधवी रंजना
( TIRUPATI, TIRUMALA, BALAJEE, ANDHRA PRADESH, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 69 )

Thursday, January 17, 2013

तिरुमाला में रोज 50 हजार लोग ग्रहण करते हैं अन्न प्रसादम


तिरुपति बालाजी का दर्शन करने के बाद मंदिर से बाहर निकलने वाले सभी भक्तों को चावल का प्रसाद निःशुल्क दिया जाता है। इस प्रसाद को श्रद्धालु वहीं पर ग्रहण कर सकते हैं। इसके अलावा प्रसाद में तिरुपति बाला जी के लड्डु दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। देशी घी के बने ये बड़े आकार के लड्डु लंबे समय तक खराब नहीं होते। 

मंदिर में दर्शन के दौरान जो लोग 300 रुपये का शीघ्र दर्शन वाला टिकट खरीदते हैं उन्हें दो लड्डू निशुल्क दिए जाते हैं। जो लोग सर्व दर्शन की लाइन में लगे हैं वे अपनी इच्छा से लड्डु खरीद सकते हैं। मुख्य मंदिर के पास लड्डु के कई काउंटर एक भवन में बने हैं। तिरुपति के लड्डु के निर्माण में पवित्रता और सफाई का खास ख्याल रखा जाता है।
तिरुमाला पर है विशाल अन्न प्रसादम भवन  तिरुमाला पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशाल अन्न प्रसादम गृह बनाया गया है। यहां श्रद्धालु निशुल्क भोजन कर सकते हैं। अन्न प्रसादम गृह में आठ विशालकाय डायनिंग हॉल बनाए गए हैं। हर डायनिंग हॉल में 400 से ज्यादा लोग एक साथ बैठकर जीम सकते हैं। बैठने के लिए स्टील के टेबल और बेंच लगे हैं। यहां पर लोगों को केले के पत्ते पर चावल, सब्जी, दाल, भुजिया, चटनी, सांबर, छाछ जैसी चीजें बड़ी पवित्रता से परोसी जाती हैं।


तिरुमाला के इस अन्न प्रसादम के विशाल डायनिंग हॉल का उदघाटन 2011 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने किया। ये अन्न प्रसादम हॉल देश के किसी भी मंदिर के डायनिंग हॉल से काफी बड़ा है। तिरुमाला का ये अन्न प्रसादम भक्तों के दान से बना है और भक्तों के दान से ही चलता है। यहां औसतन रह रोज 50 हजार लोग अन्न प्रसादम ग्रहण करते हैं। एक बार तो एक दिन में एक लाख से ज्यादा लोगों को भोजन देने का रिकार्ड बन चुका है।


मंदिर के लिए आसपास के भक्त अन्न प्रसादम के लिए हरी सब्जियां और दाल आदि भी दान में देते हैं। अन्न प्रसादम का भोजन तैयार करने के लिए सफाई और पवित्रता का खास ख्याल रखा जाता है। अब अन्न प्रसादम के रसोई से बना भोजन तिरुपति तिरुमाला देवस्थानम ट्रस्ट की ओर संचालित अस्पताल के मरीजों के लिए भी उपलब्ध कराया जा रहा है। वैसे दक्षिण भारत के कई मंदिरों में इस प्रकार का अन्न प्रसादम वितरित किया जाता है। आप ऐसा इंतजाम विजयवाड़ा के कनक दुर्गा मंदिर में और श्रीशैलम के मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर में भी देख सकते हैं। 
------  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(    ( TIRUPATI, TIRUMALA, BALAJEE, ANDHRA PRADESH , SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 68)
तिरुमला हिल्स पर भी इंडियन कॉफी हाउस। 

Tuesday, January 15, 2013

तिरुमाला के पर्वत पर विराजते हैं तिरुपति बालाजी


तिरुपति से 17 किलोमीटर दूर तिरुमाला पहाड़ी पर विराजते हैं भगवान वेंकटेश्वर। तिरुपति से तिरुमाला जाने के लिए रेलवे स्टेशन के सामने विष्णु निवासम से आंध्र प्रदेश रोडवेज की बसें जाती हैं। जाने का किराया 40 रुपये बच्चों के लिए 20 रुपये है। आप जीप से भी जा सकते हैं जहां किराया 50 रुपये हो जाता है। अपने लिए मोलभाव करके टैक्सी आरक्षित भी कर सकते हैं।

तिरुमाला की ओर जैसे ही आपकी गाड़ी चढ़ने लगती है वातावरण मनोरम होने लगता है। पहाड़ी पर चढने से पहले चेकपोस्ट आता है जहां आपके सामानों की पहली चेकिंग होती है। तिरुमाला पहाड़ी पर पूरी तरह बालाजी का सम्राज्य है। यहां का अपना अनुशासन है जिसका पालन श्रद्धालुओं को करना पड़ता है। बालाजी के दर्शन करने वालों को चाहिए कि वे तिरुपति में ठहरें और तिरुमाला तैयार होकर दर्शन करने पहुंचे। वैसे तिरुमाला में भी आवासीय सुविधा है लेकिन वहां कई बार कमरे खाली नहीं मिलते। मंदिर में दर्शन की प्रक्रिया सुबह से देर रात तक चलती रहती है।

तीन तरह के दर्शन - बाला जी के मुख्य रुप से दो तरह के दर्शन हैं। सर्व दर्शन सबके लिए निःशुल्क है। समान्य दिनों में इसमें चार से छह घंटे, भीड़ होने से 20 से 40 घंटे भी लग सकते हैं। इसमें लाइन में लगे लोगों को बड़े बड़े हॉल में एक हॉल से दूसरे हॉल में शिफ्ट किया जाता है। इस दौरान खाने पीने, शौचालय आदि के इंतजाम रहते हैं। जल्दी दर्शन करना चाहते हैं तो 300 रुपये का शीघ्र दर्शन वाली लाइन में लग सकते हैं। तिरुमला प्रेस क्लब से शुरु होने वाले लाइन तकरीबन एक किलोमीटर घुमाते हुए आपको बालाजी के मुख्य मंदिर तक पहुंचाती है। दर्शन की लाइन में जाने से पहले बैग, मोबाइल फोन, कैमरा जैसी चीजें लॉकर में जमा कर देनी पड़ती हैं। शीघ्र दर्शन के लाइन में भी दूध और काफी मिलती रहती है। रास्ते में टायलेट्स भी बने हैं। लाइन में आगे बैठने के लिए हॉल बनाए गए हैं। बालाजी के मुख्य मंदिर के द्वार पर पहुंचने के बाद सर्व दर्शन और शीघ्र दर्शन की लाइन एक ही हो जाती है।
बाला जी का एक 50 रुपये का टोकन दर्शन भी है तो आपके लाइन में लगने की अवधि को कम कर देता है। इसमें आपको लाइन में लगने तय समय दिया जाता है। मंदिर दर्शन के वक्त भक्तों को भगवान के पास ज्यादा देर रुकने नहीं दिया जाता। आपके पीछे भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के इंतजार में होते हैं। 

माना जाता है कि इस मंदिर का इतिहास नौवीं शताब्दी से प्रारंभ होता है, जब कांचीपुरम के शासक वंश पल्लवों ने इस स्थान पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था।  15 सदी के पश्चात इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैलनी शुरू हो गई। 1843 से 1933 तक ब्रिटिश राज में इस मंदिर का प्रबंधन हातीरामजी मठ के महंत ने संभाला।

सन 1933 में इस मंदिर का प्रबंधन मद्रास सरकार ने अपने हाथ में ले लिया। तब एक स्वतंत्र प्रबंधन समिति 'तिरुमाला-तिरुपति के हाथ में इस मंदिर का प्रबंधन सौंप दिया। आंध्र प्रदेश के राज्य बनने के पश्चात इस समिति का पुनर्गठन हुआ और एक प्रशासनिक अधिकारी को राज्य सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर नियुक्त किया। 

यहां विष्णु ने किया था निवास - प्रभु वेंकटेश्वर या बालाजी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि प्रभु विष्णु ने कुछ समय के लिए स्वामी पुष्करणी नामक तालाब के किनारे निवास किया था। यह तालाब तिरुमाला के पास स्थित है। तिरुमाला के चारों ओर स्थित पहाड़ियांशेषनाग के सात फनों के आधार पर बनीं 'सप्तगिरी कहलाती हैं। श्री वेंकटेश्वरैया का यह मंदिर सप्तगिरि की सातवीं पहाड़ी पर स्थित हैजो वेंकटाद्रि नाम से जाना जाता है। यह भी कहा जाता है कि 11वीं शताब्दी में संत रामानुज ने तिरुपति की इस सातवीं पहाड़ी पर चढ़ाई की थी। प्रभु श्रीनिवास (वेंकटेश्वर का दूसरा नाम) उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। ऐसा माना जाता है कि प्रभु का आशीर्वाद प्राने के बाद वे 120 साल तक जीवित रहे और जगह-जगह घूमकर भगवान वेंकटेश्वर की ख्याति फैलाई।
-- vidyutp@gmail.com

(TIRUPATI, TIRUMALA, BALAJEE, ANDHRA PRADESH, TEMPLE, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 67 )

Sunday, January 13, 2013

चल पड़े हम तिरुपति बालाजी के दरबार में


हमलोग बेंगलुरु में तीन दिन गुजारने के बाद अब तिरुपति के लिए चल पड़े हैं। हमने यशवंतपुर स्टेशन से तिरुपति की ट्रेन ली है। यह यशवंतपुर टाटानगर एक्सप्रेस ट्रेन है। रास्ते में कोलार जिले के बंगारापेट के बाद जोलारपेट जंक्शन स्टेशन आया। जोलारपेट तमिलनाडु में तिरुपत्तूर जिले में पड़ता है। यह रेलवे का प्रमुख स्टेशन है। इसके बाद काटपाडी जंक्शन फिर तिरुपति। हमारी ट्रेन के ठहराव कम हैं। ट्रेन में हमारे सामने वाली सीट पर पूर्णिया, बिहार के एक प्रोफेसर साहब सफर कर रहे हैं। वे काटपाडी जंक्शन में उतर गए। वे सीएमसी वेल्लोर में अपना उपचार कराने जा रहे हैं। काटपाडी रेलवे स्टेशन तमिलनाडु के वेल्लोर जिले में आता है, जबकि तिरूपति आंध्र प्रदेश में पड़ता है। काटपाडी के बाद आंध्र प्रदेश का चित्तूर जिला शुरू हो जाता है। पर हमारी ट्रेन चित्तूर में नहीं रूकी। जब हमलोग तिरुपति रेलवे स्टेशन पर उतरे तो बारिश हो रही थी।

दक्षिण भारत ही नहीं दुनिया का सबसे लोकप्रिय मंदिर है तिरुमला पहाड़ी पर स्थित तिरुपति बालाजी वेंकटेश्वर का मंदिर। बाला जी यानी भगवान वेंकटेश्वर। अब तक सबसे अमीर भगवान थे। लेकिन अब उन्ही के दूसरे रूप तिरुवनंतपुरम के पद्मनाभ स्वामी ने उन्हें टक्कर दे डाली है। लेकिन अभी रोज श्रद्धालुओं की आमद के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर है तिरुपति। तिरुपति बाला जी कुल संपत्ति 50 हजार करोड़ से भी ज्यादा है। तो पद्मनाभ स्वामी की करीब दो लाख करोड़।
तिरुपति के विष्णु निवास में ... तिरुमला जाने के लिए इंतजार 
तिरुपति पहुंचना बहुत आसान है। तिरुपति बहुत व्यस्त रेलवे स्टेशन है। तिरुपति आंध्र प्रदेश में है लेकिन तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से चार घंटे का रास्ता है। चेन्नई से तिरुपति 140 किलोमीटर तो बेंगलुरू से 300 किलोमीटर है वहीं हैदराबाद से 600 किलोमीटर के आसपास है। यानी सबसे आसान चेन्नई से पहुंचना है। तिरुपति के अलावा रेनुगुंटा नामक रेलवे स्टेशन भी पास में है। आप तिरुपति जाने के लिए तिरुपति या रेनुगुंटा किसी भी रेलवे स्टेशन पर उतर सकते हैं। हैदराबाद, चेन्नई और बेंगलुरू से तिरुपति जाने और लौटने के लिए पैकेज टूर भी बुक कराया जा सकता है। लेकिन ट्रेन से तिरुपति पहुंचना ज्यादा बेहतर है। बेंगलुरु से तिरुपति जाने के रास्ते में जोलारपेट और काटपाडी जंक्शन स्टेशन आते हैं। काटपाडी के पास प्रसिद्ध वेल्लोर शहर है जहां सीएमसी नामक प्रसिद्ध अस्पताल है। यहां पास में अब गोल्डेन टेंपल नामक लक्ष्मी जी का विशाल मंदिर भी बन चुका है।


तिरुपति रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने पर आप सीधे
 विष्णु निवासम का रुख करें। ये स्टेशन के बिल्कुल सामने तिरुपति तिरुमला देवस्थानम ट्रस्ट द्वारा बनवाया गया कांप्लेक्स है। इस विशाल कांप्लेक्स में आवासीय सुविधा ( एसी नान एसी कमरे) निशुल्क टायलेट, स्नानागार, क्लॉक रुम, रेस्टोरेंट, फ्री डिस्पेंसरी, कलात्मक शापिंग के लिए दुकानें सब कुछ हैं।



अगर आप किसी और होटल में भी रहने जाना चाहते हैं, लेकिन अभी चेक इन का समय नहीं हुआ है, या जाने वाली ट्रेन का इंतजार करना है तो भी विष्णु निवास  में काफी वक्त गुजार सकते हैं। यहां अपने वाहन से आने वालों के लिए पार्किंग का भी इंतजाम है। इसी तरह का कांप्लेक्स श्रीनिवासम कांप्लेक्स नाम से तिरुपति बस स्टैंड के सामने भी है।


होटल मौर्य में मिली जगह -  जब हम तिरुपति रेलवे स्टेशन से निकलकर विष्णु निवासम पहुंचे तो वहां कोई कमरा खाली नहीं मिला। लेकिन वहां अपना सामान लॉकर में जमा कर पत्नी बेटे को वहीं छोड़कर मैं आसपास के होटलों में कमरा ढूंढने निकल पड़ा। विष्णु निवासम में आपको कमरा न भी मिले तो सामान लॉकर में जमा कर सकते हैं। टॉयलेट बाथरूम का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके गोविंदा कैंटीन में भोजन नास्ता कर सकते हैं। बरामदे में कहीं भी आराम फरमा सकते हैं। मेडिकल स्टोर से मर्ज बताकर मुफ्त में दवाएं भी ले सकते हैं।

खैर तलाश करते हुए हमें विष्णु निवासम के पास ही
 मौर्य होटल में अच्छा हवादार कमरा मिल गया। यह होटल राजमाता के बगल में और भूमा कांप्लेक्स के सामने स्थित है। तिरुपति के होटल ज्यादा महंगे नहीं है। वैसे आप तिरुमला हिल्स पर रहने के लिए बुकिंग करा सकते हैं। लेकिन इसके लिए आपको अपने तिरुमला जाने की नीयत तारीख पहले से ही तय करनी होगी। आप ट्रस्ट वेबसाइट पर ऑनलाइन बुकिंग करा सकते हैं।   http://www.ttdsevaonline.com/ )

(TIRUPATI, TIRUMALA, BALAJEE, ANDHRA PRADESH, TEMPLE , SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 66)