Tuesday, December 31, 2013

इंफाल से जिरीबाम का मुश्किलों भरा सफर ((01))

मणिपुर की राजधानी इंफाल में तो मैं पहुंचा तो था डिमापुर से कोहिमा होते हुए, पर मुझे आगे इंफाल से असम के सिलचर पहुंचना था। इंफाल से सिलचर नेशनल हाइवे नंबर 53 से जुड़ा हुआ है। यानी इंफाल पहुंचने के दो रास्ते हैं एक डिमापुर से इंफाल तो दूसरा सिलचर से इंफाल। इंफाल से सिलचर की दूरी 275 किलोमीटर है।

इंफाल से सिलचर जाने के लिए जिरीबाम पार्किंग ( जिरी पार्किंग) से सुबह में टैक्सियां खुलती हैं। मैंने अपनी सीट एक दिन पहले की बुक करा ली थी। फोर्स की बड़ी टैक्सी थी जो सुबह 8.20 बजे जिरी पार्किंग से खुली। आगे की सीट पर ड्राइवर के बगल में मेरे अलावा एक यात्री और थे। पीछे की दो पंक्तियों में 4 और 4 आठ सवारियां। दो लड़कियां और दो महिलाएं भी थीं सफर की साथी। शुक्र है लंबे सफर में पीछे की सीट पर कोई नहीं बैठा था। वहां बुकिंग का सामान भरा गया था। यानी ये टैक्सी पार्सल ढोने का भी काम करती है। हम सब यात्रियों का लगेज ड्राइवर ने टैक्सी की छत पर सजा कर बांध दिया। यह अच्छा रहा वर्ना आगे देखने में आया कि हर चेक पोस्ट पर साथ में लिए लगेज की चेकिंग भी करानी पड़ती है।


राजधानी इंफाल से जिरीबाम 220 किलोमीटर है। सड़क खराब होने के कारण पूरे दिन का सफर। वहां से सिलचर 55 किलोमीटर और आगे।

रिश्वत देते हुए बढ़ती है टैक्सी - इंफाल शहर के बाहरी इलाके में मणिपुर पुलिस और वन विभाग का पहला जांच पोस्ट पड़ा। हमारे टैक्सी के ड्राइवर इन दोनों पोस्ट पर रूके और कुछ चढ़ावा देकर आए। बाद में आगे के सफर में दस से ज्यादा ऐसे पोस्ट आए जहां चढ़ावा यानी रिश्वत देते हुए गाड़ी आगे बढ़ती रही। मणिपुर पुलिस का रिश्वतखोर चेहरा।
सभी गाड़ियां सरकार के परिवहन विभाग को रोड टैक्स तो देती हैं। लेकिन इसके ऊपर लिए जाने वाले इस तरह के पुलिसिया चढ़ावे का भार भी यात्रियों पर ही पड़ता होगा। असम के रहने वाले ड्राइवर के तो रूटीन में शामिल हो गया है हर तय पोस्ट पर तय रिश्वत की राशि देना और आगे बढ़ना। हालांकि हर रिश्वत की रकम देने के बाद वह झुंझला कर पुलिस सिस्टम को कोसता नजर आता है। मजे की बात की इस हाइवे की असली सुरक्षा तो असम राइफल्स, बीआरटीएफ और सीआरपीएफ के जवान करते नजर आए लेकिन उनके पोस्ट पर कहीं रिश्वत का कारोबार नहीं दिखाई दिया।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य ( IMPHAL to SILCHAR- 1, JIRIBAM, TUPUL )
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Monday, December 30, 2013

मणिपुर में बसता है बड़ा भोजपुरी समाज

मणिपुर की राजधानी इंफाल में गांधी जी की प्रतिमा। 
इंफाल के एमजी एवेन्यू की सुहानी सुबह। सड़क पर टहलते हुए कान में गूंजती है खालिस भोजपुरी आवाज। फुटपाथ पर बैठा एक मजदूर अपने मोबाइल फोन से खांटी भोजपुरी में गांव में बैठी अपनी लुगाई से खेतीबाडी का हिसाब ले रहा था। वह अपनी पत्नी को खेतों में डाले जाने वाले खाद बीज के बारे में निर्देश जारी कर रहा था। यानी नौकरी मणिपुर में और रोज खबर लेना घर की।

बड़ी संख्या में मणिपुर कोने कोने में रहने वाले मजदूर मोबाइल फोन के कारण अब 24 घंटे अपने परिवार के संपर्क में रहते हैं। लेकिन दो तीन दशक पहले ये बहुत मुश्किल था। चाहे सेनापति हो, इंफाल हो या फिर चूड़ा चांदपुर हर जगह भोजपुरी भाई फैले हुए हैं। 


खेतों में मजदूरी करने वाले, शहर के होटलों में काम करने वाले, रूई धुनने वाले तो राज मिस्त्री का काम करने वाले हर क्षेत्र में बिहार के लोग यहां दिखाई देते हैं। तो बड़े उद्योग धंधों में भी यूपी बिहार के लोगों का अच्छा खासा हस्तक्षेप है।

गोरखपुर के गुप्ता जी मणिपुर में गल्ले की दुकान चलाते हैं। तो शाहपुर पटोरी के यादव जी की मिठाई की दुकान इंफाल में लोकप्रिय है।

एमजी एवेन्यू के टूर एंड ट्रेवल एजेंट के दफ्तर के बाहर बड़ी भीड़ लगी है। लोग अपने घर जाने के लिए डिमापुर तक के लिए टैक्सी और बस के टिकट बुक कराने में लगे हैं। इंफाल से कोहिमा का किराया 450 रुपये प्रति व्यक्ति हो गया। आगे का सफर तो ट्रेन से करना ही है। लेकिन क्या करें साल में एक या दो बार घर जाना भी तो जरूरी है।

गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पर एक भाई आकर पूछते हैं – डिमापुर जाए खातिर ट्रेन कब मिली। मैंने तपाक पूछा – आगे कहंवा जाए के बा। जवाब मिला- चूड़ा चांदपुर। सालों से चूड़ा चांदपुर में रहकर मेहनत मजदूरी कर रहे हैं। चूड़ा चांदपुर मणिपुर का एक जिला है। वे कहते हैं कि मणिपुर में रहने में कई तरह की चुनौतियां लेकिन यहां दिल लग गया तो अब और कहां जाएं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

(IMPHAL, BHOJPURI, DIMAPUR)
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Sunday, December 29, 2013

इंफाल - गोविंद देव का मंदिर

 मणिपुर के रहने वाले हिंदुओं की आस्था का केंद्र है गोविंद देव जी का मंदिर। बाहर से इंफाल आने वाले श्रद्धालु भी इस मंदिर में जरूर पहुंचते हैं। इस मंदिर में कृष्ण के गोविंदा रूप में प्रतिमा स्थापित है।

मणिपुर बहुत ही पुराना हिंदू संस्कृति वाला राज्य रहा है। राहुल सांकृत्यान अपनी पुस्तक मानव समाज में लिखते हैं कि मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा से अर्जुन का विवाह हुआ था। हालांकि ये विवाह तीन वर्ष के लिए था ( पृष्ठ -51) इसलिए नटवर नागर कान्हा से मणिपुर वालों का रिश्ता महाभारत कालीन है।
शहर के बिल्कुल मध्य में कांगला किले के परिसर में स्थित गोविंद देव के मंदिर का भवन पीले रंग का बना हुआ है। इस मंदिर के दो गुंबद है। मंदिर के अंदर कृष्ण, राधा, बलराम की मूर्तियां स्थापित हैं। कृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं तो मंदिर में  विष्णु के और अवतार भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

राजा नर सिंह ने बनवाया मंदिर - गोविंद देव मंदिर का पहली बार निर्माण मणिपुर के राजा नर सिंह द्वारा 1846 में कराया गया था। लाल ईंट से बना ये मंदिर मध्यकालीन वास्तुकला का सुंदर नमूना है। मंदिर 16.95 मीटर ऊंचा और 18.63 मीटर चौड़ा है। मंदिर के प्रवेश द्वार के साथ एक लंबा गलियारा है जो श्रद्धालुओं को सीधा गर्भ गृह तक ले जाता है।

भूकंप का असर और पुनर्निमाण -   मणिपुर में सन 1868 में आए भूकंप में मंदिर को काफी हानि पहुंची। तब पूरा मंदिर तबाह हो गया था। मंदिर की दीवारों और मूर्तियों को क्षति पहुंची। बाद में मणिपुर के महाराजा चंद्रकीर्ति ने मंदिर को पुराने स्वरूप में ही निर्मित कराया। गोविंद देव मंदिर में सुबह शाम नियमित पूजा अर्चना होती है। भगवान कृष्ण की आरती में पारंपरिक मणिपुरी वाद्य यंत्रों का संगीत सुनने को मिलता है। मणिपुर में ज्यादातर वैष्णव संप्रदाय के हिंदू हैं। उनकी भगवान विष्णु में अगाध आस्था है। हालांकि यहां के वैष्णव हिंदू शाकाहारी नहीं होते।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( IMPHAL, GOVINDDEV TEMPLE, VISHNU, ARJUNA)

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