Tuesday, December 4, 2012

यहां से हनुमानजी ने लगाई लंका के लिए छलांग

रामझरोखा से रामेश्वरम का नजारा। फोटो - विद्युत 
रामेश्वरम में रामनाथ स्वामी मंदिर और कलाम हाउस के अलावा कई और दर्शनीय स्थल हैं जहां श्रद्धालु और सैलानी जाते हैं। इन स्थलों को घुमाने का काम यहां के आटो रिक्शा वाले करते हैं। वे ही यहां के टूरिस्ट गाइड हैं। आटो वालों की जेब में सभी टूरिस्ट प्लेस का मैप होता है। सभी जगह घुमाने का वे 300 रुपये मांगते हैं। ये टूर तकरीबन तीन घंटे का होता है। आटो वाले कोई मोल भाव नहीं करते। आम तौर पर फिक्स रेट है। मंदिर के आसपास से शुरू आपका सफर वहीं आकर खत्म हो जाता है। 

राम झरोखा मंदिर गंधमदान पर्वत - सबसे पहले हम पहुंचते हैं राम झरोखा मंदिर। मुख्य मंदिर से ढाई किलोमीटर आगे गंधमदान पर्वत पर ऊंचाई पर बने राम झरोखा मंदिर में राम जी की चरण पादुका है। कहते हैं हनुमान जी ने यहीं से श्रीलंका जाने के लिए सीधी छलांग लगाई थी। गंधमदान पर्वत रामेश्वरम टापू की सबसे ऊंची चोटी भी है। यहां से समंदर लांघ कर वे सीधे पहुंच गए सीता मैय्या की खोज खबर लेने रावण की लंका में। वैसे यहां से रामेश्वरम शहर और समंदर का बड़ा ही सुंदर नजारा दिखाई देता है। शायद इसलिए मंदिर को राम झरोखा कहा जाता है।


भगवान राम की चरण पादुका और हनुमान जी

राम झरोखा मंदिर में राम जी के चरण चिन्ह अंकित हैं। श्री राम के चरण चिह्नों के करीब हनुमान की लाल रंग की दिव्य प्रतिमा है। सीता की खोज में लंका रवाना होने के लिए श्री हनुमान ने यहीं से ऊंची उड़ान भरी थी। आपको ये पता ही होगा कि हनुमान जी अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के ज्ञाता थे। इसलिए वे बड़ी सहजता से समंदर लांघ गए।
राम झरोखा मंदिर एक ऊंचे टीले पर है जिसे गंधमदान पर्वत कहते हैं। यहां पहुंचने के लिए आपको सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। रामेश्वरम के इस मंदिर का बड़ा महत्व है। रामनाथ स्वामी के मंदिर के बाद सबसे ज्यादा श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु यहां के मनोरम नजारे के बीच कुछ वक्त गुजारना भी पसंद करते हैं। मंदिर के आसपास सीढियों के रास्ते में कुछ दुकानें भी हैं। 
राम झरोखा मंदिर से रामेश्वरम का नजारा । 

जब मेरा चप्पल हुआ चोरी – राम झरोखा मंदिर में जाने से पहले हमने अपना चप्पल मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे एक साधु बाबा के सामने उतार दिया। लौट कर आने पर माधवी और अनादि की जोड़ियां सलामत थी मेरी चप्पलें गायब। काफी ढूंढने पर भी चप्पलें नहीं मिलीं। यानी चरण पादुका में मेरी पादुका गायब। शायद ईश्वर यही चाहते थे कि आगे के मंदिरों के दर्शन मैं नंगे पांव ही करूं। तो आगे का सारा सफर नंगे पांव करना पड़ा। रामेश्वरम दर्शन खत्म करने के बाद जब मैं मंदिर लौटा तब मंदिर के सामने एक दुकान से नई चप्पलें खरीदी।
होटल संध्या लॉज- रामेश्वरम में हमारा ठिकाना. यहीं से लिया था आटो।

पर चप्पल की दुकान पर जो अम्मा थी उनकी दार्शनिक बातों ने मेरे चप्पल चोरी होने के दुख को थोड़ा कम कर दिया। उन्होंने कहा-  ओ माई सन..योर प्राब्लम साल्व्ड न... सो नो टेंसन... 

इसलिए टूरिस्ट कैब या बसों में सफर करने वालों को मेरी सलाह है कि वे अपने चप्पल जूतों को अपनी आरक्षित की हुई गाड़ी में उतार कर ही मंदिरों में प्रवेश करें। इससे चप्पल जूता शुल्क के रुप में दी जाने वाली आपकी राशि की भी बचत होगी। 
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---विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
 ( RAMESHWARAM, HANUMAN, LANKA, CHAPPAL )