Friday, December 7, 2012

रामेश्वरम की शुद्ध शाकाहारी थाली

कन्याकुमारी की तरह ही रामेश्वर में शुद्ध शाकाहारी उत्तर भारतीय थाली उपलब्ध है। यहां ज्यादातर धर्मशालाओं में भोजनालाय भी है। कुछ अलग से मारवाड़ी भोजनालय भी हैं। 
यहां अग्रसेन भवन, गुजराती भोजनालय, माहेश्वरी भवन खाने पीने के अच्छे ठिकाने हैं। यहां 60 रुपये में भरपेट खाना उपलब्ध होता है। इनके मीनू में चपाती और चावल और उत्तर भारतीय तरीके से बनी सब्जियां और दाल खाने को मिल जाएंगी।

वो बिहारी अंदाज में पराठा - यानी रामेश्वरम आने वाले उत्तर भारतीय सैलानियों को खाने के लिए कोई परेशान होने की जरूर नहीं है। हमें सुबह में अग्रसेन भवन के रेस्टोरेंट में पराठे खाने को मिल गए। रेस्टोरेंट चलाने वाले मैनेजर और स्टाफ झारखंड के सिमडेगा के रहने वाले थे। वे तिकोन पराठे बना रहे थे। ठीक वैसा ही जैसा मेरी मां बनाती हैं घर में। मंदिर के चारों तरफ कार स्ट्रीट में कई भोजनालय हैं। यहां का खाना खाकर आपको घर की याद आ जाएगी। लगेगा नहीं कि आप घर से बहुत दूर दक्षिण भारत में हैं।
रामेश्वर में दक्षिण भारतीय थाली परोसने वाले भोजनालय भी हैं। आपकी पसंद आप चाहे जहां जीमने पहुंच जाएं। लेकिन जहां भी जाएं समय का ध्यान रखें। यहां भोजनालयों में नास्ता खाना का समय तय है। दोपहर का खाना 11 बजे से ढाई बजे तक मिलता है।

देर हुई तो खाना नहीं मिलेगा- हमें रामेश्वरम घूम कर लौटने पर ढाई से ज्यादा बज गए। अब खूब भूख लग चुकी थी। पर समय हो गया था, इसलिए उसके बाद पूरे रामेश्वर में कहीं भी खाना नहीं मिला। कई होटल वाले आग्रह करने पर भी खाना देने को तैयार नहीं थे। भले उनके यहां अभी कुछ लोग बैठे खा रहे थे। उनका कहना था आखिरी पांत खा रही है। इसके बाद हमें शाम की तैयारी भी करनी होती है। इसलिए आपको मौका नहीं दे सकते।


अनादि और माधवी को होटल में छोड़कर मैं कोई भोजनालय तलाशने लगा। सुबह नास्ते के बाद दिन भर घूमते हुए भूख तो लग गई थी। बहुत तलाश करने के बाद शाम को चार बजे एक दक्षिण भारतीय भोजनालय में हमें खाना नसीब हो सका। हमने कहा तीन लोग हैं। बोला जल्दी बुलाकर लाएं नहीं तो मैं भी बंद करने वाला हूं। यहां शाम का भोजन साढ़े छह बजे से मिलना शुरू होता है। इसलिए आप यहां आएं तो समय का ख्याल जरुर रखें।

ईरानी चाय का भी मजा  - रामेश्वर में भी दक्षिण के बाकी शहरों तरह चाय पीने की संस्कृति है अपने अंदाज में। यहां हमने तांबे के बड़े से मर्तबान में चाय बनते हुए देखी। इसे समवार कहते हैं। यह चाय बनाने की इरानी तकनीक है। अब अगर चाय तांबे के बरतन में बनाई जाती हो तो उसका स्वाद तो कुछ अलग होगा ही. तो हमने और अनादि ने इस चाय की चुस्की ली। 

-   ---- विद्युत प्रकाश मौर्य  
  ( RAMESHWARAM, VEG FOOD, THALI, TEA, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 40 ) 

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