Wednesday, November 21, 2012

कन्याकुमारी की शिला और स्वामी विवेकानंद


हमलोग कन्याकुमारी के विवेकानंद रॉक मेमोरियल के पास जा पहुंचे हैं। हमारी इच्छा रॉक मेमोरियल को करीब से जाकर देखने की है। कन्याकुमारी से स्वामी विवेकानंद का बड़ा ही गहरा संबंध हैं। देश भर घूमते हुए जब संन्यासी विवेकानंद कन्याकुमारी पहुंचे। वह साल था 1892 जब महान संत के कदम यहां पड़े थे। 

अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के 1886 में निधन के बाद स्वामी विवेकानंद कुछ समय तक बंगाल में रहे। उसके बाद 1888 में परिव्राजक के तौर पर देश भर में घूमने निकल पड़े। उन्होंने उत्तर में हिमालय की यात्राएं की। इसी क्रम में वे दक्षिण भारत भी पहुंचे। बेंगलुरु, रामेश्वरम, कोडुंगलूर, त्रिशूर, एर्नाकुलम, त्रिवेंद्रम, नगरकोविल आदि शहरों को घूमते हुए 24 दिसंबर 1892 को वे कन्याकुमारी पहुंचे थे। 

कन्याकुमारी के सागर तट पर पहुंचकर विवेकानंद सागर तट पर बैठ कर देर तक ध्यान में रहे। इससे पहले कुमारी अमान मंदिर में उन्होंने पूजा भी की। स्वामी जी को कन्याकुमारी का आध्यात्मिक वातावरण काफी पसंद आया। यहां के समुद्र के मध्य 400 मीटर अंदर स्थित शिला से उनका खास संबंध है। कहा जाता है कि उस शिला तक स्वामी जी तैर कर गए। ऐसा उन्हें मजबूरी में करना पड़ा। 

यहां हुई ज्ञान की प्राप्ति -  कथा के मुताबिक उन्होंने एक नाव वाले से शिला तक पहुंचाने को कहा। पर उनसे नाव वाले ने शिला तक जाने के लिए शुल्क मांगा। पर वह राशि स्वामी विवेकानंद के पास नहीं थी। फिर क्या विवेकानंद ने सागर में छलांग लगा दी। वे बचपन से ही अच्छे तैराक थे। इसलिए आसानी से शिला तक पहुंच गए। वहां सागर में शिला पर घंटों बैठ कर देश काल पर चिंतन किया। कहा जाता है कि यहां स्वामी विवेकानंद का खास तरह का ट्रांसफारमेशन हुआ। ये बदलाव युगांतकारी था। ठीक उसी तरह जैसे गौतम बुद्ध को बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था, विवेकानंद को कन्याकुमारी में शिला पर ज्ञान की प्राप्ति हुई।
इसके कुछ महीने बाद ही 11 सितंबर 1893 को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में जाकर अपने भाषण से भारत की आध्यात्मिक परंपरा का डंका पूरी दुनिया में बजवाया। स्वामी जी पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गए। इसके बाद कन्याकुमारी का नाम विवेकानंद के साथ जुड़ गया। इससे कन्याकुमारी का महत्व और भी बढ़ गया। 



सन 1970 में बना रॉक मेमोरियल - देश आजाद होने के दो दशक बाद स्वामी विवेकानंद की याद में महान संत और समाजसेवी एकनाथ रनाडे ने यहां एक अनूठा मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। साल 1970 में ये रॉक मेमोरियल बनकर तैयार हुआ। इसका उदघाटन तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी ने किया था। उसके बाद यह कन्याकुमारी का प्रमुख दर्शनीय स्थल बन गया है। हर रोज हजारों सैलानी इस रॉक मेमोरियल तक जाते हैं।

24 दिसंबर संकल्प दिवस -  स्वामी विवेकानंद के आगमन की स्मृति में कन्याकुमारी में हर 24 दिसंबर की तारीख को संकल्प दिवस के तौर पर मनाया जाता है। यही वह दिन है जब महान संत ने सागर की लहरों के संग बैठकर संवाद किया था और दुनिया उनके ज्ञान से आलोकित हुई थी।


फेरी सेवा से पहुंचे  - कन्याकुमारी आने वाले सैलानी फेरी से रॉक मेमोरियल तक जाते हैं। रॉक मेमोरियल जाने और आने के लिए फेरी का 35 रुपये टिकट लगता है। पर कई बार मौसम खराब होने पर फेरी की सेवा बंद कर दी जाती है। और इसी खराब मौसम का हमलोग भी शिकार हुए। टिकट काउंटर पर हमें बताया गया कि समंदर में लहरें तेज होने के कारण फिलहाल फेरी सेवा बंद है। ये कब तक शुरू होगा इसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है। तो थोड़ी देर इंतजार करने के बाद हमलोग मन मसोस कर आगे की ओर चल पड़े। 

संत तिरुवल्लुर की प्रतिमा - विवेकानंद रॉक मेेमोरियल के पास ही संत तिरुवल्लुपर की विशाल प्रतिमा बनी हुई है। तिरुवल्लुर तमिलनाडु के विख्यात संत हुए। उनका सम्मान सिर्फ तमिल भाषा में ही नहीं बल्कि देश के हर राज्य में है। उन्होंने त्रिकुल नामक ग्रंथ की रचना की थी। वे जाति से जुलाहे थे और कपडे़ बुनने का ही काम करते थे। पर वे कबीर, रविदास की तरह महान संत हुए। उनके सम्मान में सागर तट पर उनकी विशाल खड़ी प्रतिमा का निर्माण कराया गया है। यह प्रतिमा काफी दूर से ही नजर आती है। यह प्रतिमा 133 फीट ऊंची है। कोरोमंडल समुद्र तट पर इस प्रतिमा का निर्माण 7 सितंबर 1990 को आरंभ हुआ। ये प्रतिमा 1999 में पूरी हुई। यह संत तिरुवल्लुर की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा में से एक है।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(  ( SWAMI VIVEKANAND, KANYAKUMARI RESOLVE 1892, ROCK MEMORIAL VIVEKANAND KENDRA, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 26 ) 
      

1 comment:

  1. धन्यबाद

    रामदेव मौर्य
    मो 09868403053

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