Thursday, November 29, 2012

मदुरै का गांधी म्यूजियम - बापू की आखिरी धोती है यहां


दक्षिण भारत के कई शहरों में गांधी जी की स्मृतियां हैं। त्रिवेंद्रम को गांधी जी ने सदाबहार शहर कहा था। तो कन्याकुमारी में बापू की स्मृति में गांधी मंडप बना है। वहीं तमिलनाडु के मदुरै शहर में गांधी संग्रहालय है। मदुरै पहुंचने पर हमारी इच्छा गांधी म्यूजियम जाने की हुई। हम लोग रेलवे स्टेशन के पास न्यू रूबी लॉज में ठहरे थे। मैं और बेटे अनादि चल पड़े गांधी म्यूजिम। स्टेशन के पास वाले बस स्टैंड से लोकल बस ली। बस वैगेई नदी को पार कर तामुकम पहुंची। कंडक्टर महोदय ने बताया यहां आप उतर जाएं सामने गांधी म्यूजिम है।
 बस स्टाप के पास बीएसएनएल का बडा दफ्तर था। आधा किलोमीटर पैदल चलने के रास्ते में मदुरै की बड़ी रंगशाला मिली। यहां अक्सर नाटक होते हैं। सफेद रंग की विशाल बिल्डिंग में है गांधी म्यूजिम। ये संग्रहालय तिरुमल नायक वंश के ऐतिहासिक महल में बना है। कोई प्रवेश टिकट नहीं। दो मंजिले म्यूजिम में गांधी जी के जीवन की कहानी के साथ साथ देश की आजादी की कहानी बताई गई है। कुछ श्वेत श्याम कुछ रंगीन चित्र। पर क्या खास है संग्रहालय में।

खून के छींटे वाले धोती को देखें - संग्रहालय में बापू की खून से सनी हुई धोती जो यहां दिखाई गई है उसके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने उस दिन पहनी थी जब उनकी हत्या हुई थी।
उपरी मंजिल पर हमें देखने को मिला बापू के इस्तेमाल की गई धोती का एक टुकड़ा। यह वही धोती है जिसे बापू ने आखिरी वक्त में अपने शरीर पर डाल रखा था। बापू को 30 जनवरी 1948 को गोली लगने के बाद खून के छींटे के निशान इस धोती पर हैं। बापू के मदुरै में रहने वाले सहयोगी इस धोती को लेकर आए मदुरै के संग्रहालय में।
इस म्यूजिम के बाहर एक पुस्तक बिक्रय केंद्र भी है। पड़ोस में एक राज्य सरकार का पुरात्तव विभाग का भी संग्रहालय है। एक विशाल डायनासोर की प्रतिमा भी है। तमिलनाडु के स्कूली बच्चों का दल इस संग्रहालय को देखने खूब आता है।

संग्रहालय में गांधीजी की किताबों और पत्रों के अलावा दक्षिण भारतीय ग्रामोद्योगों एवं हस्तशिल्प के सुंदर संग्रह को देखा जा सकता है। गांधी संग्रहालय देश के उन सात संग्रहालयों में से एक है जिनका निर्माण 'गांधी मेमोरियल ट्रस्टने करवाया था। गांधी संग्रहालय को देखने के लिहाज से कुछ भागों के बांटा जा सकता है जैसे- प्रदर्शनी दीर्घाफोटो गैलरीखादीग्रामीण उद्योग विभागओपन एयर थिएटर।




प्राचीन राजमहल में है संग्रहालय - मदुरै गांधी संग्रहालय का भवन एक प्राचीन राजकीय भवन है। यह रानी मंगम्मल से संबंधित है जो नायक राजवंश का एक हिस्सा थी। रानी का महल 1670 का बना हुआ है। 13 एकड़ के इस महल को 1955 में गांधी संग्रहालय के लिए दान में दे दिया गया। गांधीजी की मृत्यु के बाद गांधी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा इस महल को संग्रहालय में बदल दिया गया। गांधी संग्रहालय का उद्घाटन 15 अप्रैल 1959 में पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा करवाया गया था।

बापू संग्रहालय के सामने अनूठा बाल उद्यान - 
मदुरै के इस बापू के संग्रहालय को देखने तमिलनाडु में आसपास से स्कूली बच्चे बड़ी संख्या में आते हैं। संग्रहालय के ठीक सामने बच्चों के लिए बहुत बड़ा एम्यूजमेंट पार्क है। इस पार्क में एक से बढ़कर एक खेलकूद के सामान और झूले आदि हैं। इन सब झूलों के रेट भी बड़े मुनासिब हैं। सबसे अच्छी बात है कि इन शानदार झूलों के लिए कोई प्रवेश टिकट नहीं है। यानी मुफ्त में जमकर मौज मस्ती करो। अनादि तो घंटे एक झूले से दूसरे झूले पर मौज मस्ती करते रहे।



-    ---- विद्युत प्रकाश मौर्य ईमेल - vidyutp@gmail.com 

 (GANDHI, MADURAI, TAMILNADU ) 

Wednesday, November 28, 2012

अनूठी शिल्पकारी, भव्य और विशाल - मदुरै का मीनाक्षी मंदिर

मीनाक्षी मंदिर का पश्चिमी गोपुरम ( वेस्ट टॉवर ) - रेलवे स्टेशन मार्ग की ओर से
मदुरै का मीनाक्षी मंदिर देश के सबसे खूबसूरत, आकर्षक और विलक्षण मंदिरों में शामिल है। स्थापत्य कला के लिहाज से यह भारत के अजूबों में शामिल किया जाता है। इसकी वजह द्रविड़ शैली में बने इस विशाल मंदिर की अत्यंत महीन शिल्पकारी। यह दक्षिण भारत के सबसे बड़े परिसर वाले मंदिरों में से एक है। मंदिर मदुरै शहर के बीचों बीच स्थित है। वर्तमान मंदिर 17वीं सदी का बना हुआ है। मंदिर में आठ खंभो पर लक्ष्मी जी की आठ मूर्तियां उत्कीर्ण की गई हैं।


मां पार्वती का नाम है मीनाक्षी-  मंदिर का पूरा नाम मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर है। मीनाक्षी यानी देवी पार्वती का रुप और सुंदरेश्वर यानी शिव। कहा जाता है एक जन्म में पार्वती मीनाक्षी के रुप में तमिल प्रदेश में एक राजा के घर में पैदा हुईं तो शिव सुंदरेश्वर के रुप में। इस जन्म में मीनाक्षी को सुंदरेश्वर को पाने के लिए तपस्या करनी पड़ी।

यह माना जाता है कि मीनाक्षी मंदिर का अस्तित्व मदुरै में छठी शताब्दी से था। तमिल संगम साहित्य में इस मंदिर की चर्चा आती है। 14वीं सदी में दिल्ली सल्तनत के आक्रमणकारी मलिक काफूर ने इस मंदिर में लूटपाट की। मीनाक्षी मंदिर जिस वर्तमान स्वरूप में दिखाई देता है उसका निर्माण 1623 से 1655 ई. के बीच कराया गया। इसका निर्माण नायक वंश के शासक विश्वनाथ नायकर ने करवाया। कई एकड़ में बने मीनाक्षी मंदिर में चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार हैं। हर प्रवेश द्वार पर विशाल गोपुरम बना है। इन गोपुरम में देवी देवताओं के प्रतिमाएं हैं। सबसे विशाल दक्षिण गोपुरम (टावर) है जो 51.90 मीटर ऊंचा है।


मीनाक्षी मंदिर के अंदर स्वर्ण कलश 
मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा गणेश और भगवान शिव के भी मंदिर हैं। पूरा मंदिर पत्थरों से बना है। मंदिर परिसर में यज्ञशाला और रंगमंडप भी है। मंदिर में दर्शन लिए श्रद्धालुओं की सालों भर भीड़ होती है। 

कैसे पहुंचे - मीनाक्षी मंदिर मदुरै रेलवे स्टेशन से महज आधा किलोमीटर है। अगर आप मदुरै में सिर्फ मीनाक्षी मंदिर देखना चाहते हैं तो अपना सामान क्लाक रुम में जमा करके मंदिर दर्शन के बाद अगले शहर को प्रस्थान कर सकते हैं। या फिर रेलवे स्टेशन और मंदिर के आसपास भी सस्ते आवास मिल सकते हैं। मंदिर के आसपास दुकानों में भी क्लाक रुम की सुविधा है।

खुलने का समय - मीनाक्षी मंदिर में सुबह और शाम दर्शन किए जा सकते हैं। सुबह 5 बजे मंदिर खुलता है। दोपहर में 12.30 बजे मंदिर बंद होने के बाद शाम को 4 बजे खुलता है। रात 10 बजे मंदिर बंद हो जाता है। मंदिर में मोबाइल फोन और कैमरे भी वर्जित हैं। कैमरे का इस्तेमाल शुल्क देकर किया जा सकता है।

प्रवेश के लिए ड्रेस कोड -  दक्षिण के अन्य मंदिरों की तरह यहां भी ड्रेस कोड है। पर पुरुषों के लिए बंदिश नहीं महिलाएं शार्ट्स या स्कर्ट आदि पहन कर मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकती हैं। हर साल अप्रैल महीने में मंदिर में शिव पार्वती विवाह का भव्य आयोजन होता है। इसे तमिल में मीनाक्षी थिरुकल्याणम कहा जाता है। इस दौरान करीब 10 लाख श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।


हर शाम सांस्कृतिक संध्या -  हर रोज शाम के मंदिर में देवी की स्तुति में गायन और नृत्य के कार्यक्रम भी होते हैं। मंदिर परिसर में गजराज महाराज भी भक्तों को आशीर्वाद देते नजर आते हैं। हमने भी यहां मंदिर की नृत्यशाला में कई घंटे तक सांस्कृतिक आयोजन का रसास्वादन किया। 

मंदिर में कुल चार प्रवेश द्वार हैं और सभी एक जैसे नजर आते हैं। इसलिए मीनाक्षी मंदिर में प्रवेश करने वाले श्रद्धालु ये याद रखें कि उन्होंने कौन से द्वार से प्रवेश किया था। फिर वापस भी उसी द्वार से निकलें। वर्ना गलत द्वार से बाहर होने पर आप शहर के किसी और इलाके में पहुंच सकते हैं।


कुछ ऐसा है मीनाक्षी मंदिर 
14 एकड़ ( 5.7 हेक्टेयर ) में है मंदिर का परिसर
14 गोपुरम हैं कुल मीनाक्षी मंदिर में,इनमें 4 बाहर और 10 अंदर हैं।
45 से 50 मीटर तक ऊंचाई हर गोपुरम की।
09 मंजिलों वाले हैं सभी 4 बाहरी टावर (गोपुरम )।
51.90 मीटर है सबसे बड़े दक्षिण गोपुरम की ऊंचाई
1000 स्तंभों वाला एक विशाल हॉल बना है मंदिर में
-    विद्युत प्रकाश मौर्य 


( MINAXI TEMPLE, MADURAI) 

Tuesday, November 27, 2012

तमिलनाडु की सांस्कृतिक राजधानी - मदुरै

तमिलनाडु का सबसे बड़ा शहर तो इसकी राजधानी चेन्नई है। लेकिन राज्य में कोयंबटूर, मदुरै, त्रिचनापल्ली दूसरे बड़े शहर हैं। इनमें मदुरै शहर भौगोलिक दृष्टि से तमिलनाडु के ठीक बीचों बीच स्थित है। ये तमिलनाडु का सांस्कृतिक राजधानी जैसा है। अगर आप तमिलाडु घूमने निकले हैं मदुरै को केंद्र बनाकर पूरे तमिलनाडु का भ्रमण कर सकते हैं।
मदुरै से कन्याकुमारी, रामेश्वरम और कोयंबटूर लगभग बराबर दूरी पर हैं। वैगेई नदी मदुरै शहर के बीचों बीच बहती है। हालांकि अक्सर इसमें पानी नहीं दिखाई देता। मदुरै शहर की आबादी दस लाख के पार कर चुकी है। यहां मद्रास हाई कोर्ट की बेंच भी स्थापित है। शहर तमिनाडु की राजनीति का बड़ा केंद्र है। करुणानिधि के बड़े बेटे एमके अलागिरी यहां से राजनीति करते हैं। वे यहां से सांसद और केंद्र में मंत्री रह चुके हैं।


मदुरै शहर का समृद्ध इतिहास रहा है। दो हजार साल पहले शहर के कारोबारी रिश्ते विदेश के भी कई शहरों से थे। मदुरै में दक्षिण भारत के सम्मानित आटोमोबाइल समूह टीवीएस का हेडक्वार्टर भी है। मदुरै रेलवे स्टेशन के ठीक सामने टीवीएस की बड़ी सी बिल्डिंग है। 


मदुरै का रेलवे स्टेशन 
दक्षिण भारत का मथुरा - मदुरै को दक्षिण भारत का मथुरा भी कहा जाता है। नाम सुनकर आपको ऐसा नहीं लगता कि यह मथुरा का का ही अपभ्रंश है। मदुरै शहर में सिटी बसें चलती हैं। इन बसों में हालांकि कम से कम किराया सात रुपये है।

क्या देखें - मदुरै में मीनाक्षी मंदिर, गांधी म्यूजियम के अलावा तिरुमल नायक पैलेस देखा जा सकता है। ये किला कभी मदुरै पर राज करने वाले राजाओं का है। यहां हिल स्टेशन कोडाईकनाल जाने का भी सुगम रास्ता है। मदुरै में एयरपोर्ट भी है। यहां से देश के प्रमुख शहरों के लिए विमान सेवा भी उपलब्ध है।

कहां ठहरें - मदुरै रेलवे स्टेशन के सामने ही रहने के लिए कई अच्छे मिड्ल बजट वाले होटल हैं। शहर पारंपरिक खाने पीने के लिए आपको कई विकल्प उपलब्ध कराता है। शापिंग के लिए भी मदुरै आदर्श जगह है। यहां से आप दक्षिण भारत के तमाम शहरों में बनने वाले काटन होजरी के उत्पाद रियायती कीमतों पर खरीद सकते हैं। खासतौर पर त्रिपूर के बने उत्पाद मदुरै में खरीदे जा सकते हैं। रेलवे स्टेशन और मीनाक्षी मंदिर के आसपास मदुरै शहर का बाजार है।

-    --विद्युत प्रकाश मौर्य ( MADURAI, MINAXI TEMPLE ) 
मदुरै के मीनाक्षी मंदिर में संगीत नृत्य की संध्या। 

(

Monday, November 26, 2012

कन्याकुमारी से मदुरै की ओर

कन्याकुमारी से हमारी चलने की वेला थी। हमारी ट्रेन नगर कोविल जंक्शन से थी। हमारा होटल केप रेसीडेंसी नगर कोविल रोड पर ही था। सो हमें वहीं पास के बस स्टाप से नगर कोविल की बस मिल गई। आधे घंटे में हम पहुंच गए नगर कोविल जंक्शन। बस ने रेलवे स्टेशन के बाहर सड़क पर उतार दिया। हमें थोड़ा पैदल चल कर रेलवे स्टेशन पहुंचना पड़ा। रास्ते में अंधेरा था। ट्रेन आने में अभी समय था हमें तकरीबन दो घंटे स्टेशन पर इंतजार करना पड़ा। इस दौरान हमने स्टेशन के कैंटीन में खाना खाया। खाना बहुत ही रियायती दरों पर था।

नगर कोविल का स्टेशन कोड है NCJ रात सवा 11 बजे हमारी ट्रेन थी मदुरै पैसेंजर। 56701 पैसेंजर पुनालुर से त्रिवेंद्रम होते हुए आती है। नगर कोविल में इसका समय रात 10.30 में आने का 10.40 में खुलने का है। लेकिन इसके स्लीपर क्लास में हमारा आरक्षण था। ट्रेन के पास पहुंचे तो टीटीई महोदय गेट पर खड़े थे। टिकट मांगा हमने एसएमएस दिखाया। अंदर जाने की अनुमति दी। यानी कोई फालतू आदमी कोच के अंदर नहीं।


पहली बार भारतीय रेल में इतनी अच्छी ड्यूटी देखी किसी टीटीई की। वर्ना दिल्ली से बिहार जाने वाली ट्रेनों में तो घंटों टीटीई आते ही नहीं। टीटी बाबू ने पूछने पर बताया कि ट्रेन सुबह साढ़े पांच बजे मदुरै पहुंच जाएगी। हमलोग अपनी अपनी बर्थ पर सो गए। पेट पूजा नगर कोविल जंक्शन की कैंटीन में कर ली थी। रास्ते में कौन से स्टेशन आए याद नहीं।

ट्रेन ने पहुंचाया एक घंटा पहले -  नींद खुली तो सुबह के 4.20 हो रहे थे। ट्रेन खड़ी थी बाहर झांक कर देखा तो मदुरै जंक्शन। भरोसा नहीं हुआ। तय समय से एक घंटे पहले मदुरै। आस पास के यात्रियों को जगाकर पूछा। लोगों ने कहा कभी कभी ऐसा भी होता है। एक बार फिर सुखद अचरज हुआ। भारतीय रेल ने मंजिल पर पहुंचाया एक घंटा पहले। अब इतनी सुबह स्टेशन के बाहर कहां जाएं।
मदुरै में रेलवे स्टेशन के सामने बांगड़ धर्मशाला 


प्लेटफार्म नंबर एक पर मिला वातानुकूलित प्रतीक्षालय। सबके लिए 10 रुपये प्रति घंटे देकर इस्तेमाल करने वाला। शानदार सोफे लगे हुए। पसर कर सो जाइए। अंदर शौचालय और स्नानागार की भी सुविधा इसी राशि में। भला इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। दक्षिण भारत के कई और रेलवे स्टेशनों पर इस तरह के पेड प्रतीक्षालय बनाए गए हैं जो यात्रियों के लिए काफी सुविधा जनक हैं। सूरज उगने के बाद हमलोग स्टेशन से बाहर निकले मदुरै के सड़कों पर।
-  ---   विद्युत प्रकाश मौर्य    
((RAIL, TAMILNADU, MADURAI )

Sunday, November 25, 2012

हर मौसम का आम का मौसम

कन्याकुमार सागर तट पर आम - कच्चे आम का स्वाद 

पके आम तो सब खाते हैं लेकिन कच्चे आम खाने का मजा ही कुछ और है। उत्तर भारत में अक्टूबर महीने में भले ही आम नहीं मिलता हो लेकिन कन्याकुमारी में जब कच्चा आम बिकते हुए देखा तो बड़ा अचरज हुआ।

 कच्चे आम को बड़े ही डिजाइनर अंदाज में काटकर फुटपाथ पर सजे दुकानों में बेचा जाता है। ये आम स्वाद में हल्के से खट्टे होते हैं। लेकिन आम के साथ नमक और लाल मिर्च का मसाला लगाकर पेश किया जाता है। दस रुपये में एक आम। मैंने खरीदा और खाना शुरू किया तो बेटे अनादि का भी मन मचलने लगा। तब हमने स्वाद साझा किया।

थोड़ा आगे बढ़ने पर मुझे आम का पेड़ भी दिखाई दे गया जहां कच्चे आम लटक रहे थे। कच्चे आम मदुराई और रामेश्वरम की सड़कों पर भी बिकते हुए दिखाई दिए। जब तिरुपति से बाला जी के दर्शन के लिए तिरुमला हिल्स पहुंचे तो वहां एक बार फिर आम बिकते देखा।
तिरुपति बालाजी के दरबार में भी कच्चे आम का स्वाद 
कुछ इसी तरह डिजाइनर अंदाज में। एक बार फिर आम खाने की इच्छा हुई। 

हमने अनादि से पूछा कुछ खट्टा हो जाए...तो ये है हर मौसम आम का मौसम। जब जी करे तब खाओ। दक्षिण भारत में सर्दी हो या फिर गर्मी आम का मौसम कभी नहीं जाता।
तभी तो हमारे उत्तर भारत में भी सबसे पहले पके हुए आम दक्षिण भारत से ही आते हैं। लेकिन डिजाइनर अंदाज में काट कर कच्चे आमों को खाने का रिवाज यहीं दिखा। कभी बचपन में हम आम के बगीचे में घुमौवा बनाकर खाते थे। कच्ची अमिया की। कसम से उसकी याद आ गई एक बार फिर। तो हो जाए एक बार फिर कच्चा आम।


सुनामी का दर्द और मछुआरे -  कन्याकुमारी में विवेकानंद रॉक मेमोरियल के पास मछुआरे दिखाई दिए जो अपनी जाल के मरम्मत में व्यस्त थे। समुंदर से मछलियां पकड़ना यहां मुख्य व्यवसाय है। पर सुनामी के दौरान इन मछुआरों के विनाशकारी आपदा का सामना करना पड़ा था। कन्याकुमारी में हमें फिश आक्शन सेंटर का भवन दिखाई देता है। हाल में बना यह भवन सीआईआई और हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के सौजन्य से बनाया गया है। इसके उदघाटन शिलापट्ट पर 15 मार्च 2009 की तारीख अंकित है। शिलापट्ट पर हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की संपादकीय निदेशक शोभना भरतीया का नाम लिखा गया है। सुदूर दक्षिण में अपने समाचार पत्र द्वारा करवाए गए इस पुनीत कार्य को देखकर खुशी होती है। 

-    ------विद्युत प्रकाश
( ( MANGO, TAMILNADU, TSUNAMI, HT MEDIA ) 

Friday, November 23, 2012

कन्याकुमारी का लेडी ऑफ रैनसम चर्च


देश का आखिरी छोर तमिलनाडु का शहर कन्याकुमारी। जहां तीन समंदर भारत भूमि को चूमते हैं। वहां कन्याकुमारी का कुमारी अम्मान मंदिर और विवेकानंद रॉक मेमोरियल तो है हीं। एक और धार्मिक स्थली है यहां। जी हां, कन्याकुमारी में समंदर के किनारे एक और आकर्षण है लेडी ऑफ रैनसम चर्च। इस सुंदर चर्च का निर्माण 1914 में हुआ था।

समंदर के किनारे पीले रंग का ये चर्च दूर से ही दिखाई देता है। इस चर्च का गुंबद 153 फीट ऊंचा है। चर्च के मुख्य भवन की लंबाई 153 फीट और चौड़ाई 53 फीट है। यदि आप कन्याकुमारी में हैं तो लेडी ऑफ़ रैनसम चर्च ज़रूर जाएं। ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि महान संत सेंट थामस भी यहां पर आए थे। वहीं 1542 में कन्याकुमारी की धरती पर सेंट फ्रांसिस जेवियर भी आए। 

इस चर्च को ऑवर लेडी ऑफ रैनसम के नाम से भी जाना जाता है। तो यहां के लोगों द्वारा प्यार से ईसा की मां का चर्च कहा जाता है। जब आप समुन्दर के किनारे खड़े होकर तीन विशाल ऑफ वाइट गोथिक टावर को देखेंगे तो आपको अपने आप ही पुर्तगाली सभ्यता का अनुभव होगा। इस चर्च की इमारत बहुत ही ऐतिहासिक और पुरानी है। सौ साल से ज्यादा पुरानी यह इमारत मदर मैरी को समर्पित है।


इस चर्च में सबसे पहले जो चीज़ आपका ध्यान आकर्षित करेगी वो है बीच में खड़ा ऊंचा टावर जिसके क्राउन में लगे क्रॉस की सोने के चमक आपका दिल लुभाने को मजबूर कर देगी।

इस चर्च की सुन्दरता सच में आने वाले लोगों को मंत्र मुग्ध कर देती है। समंदर के किनारे खड़ी चर्च की इमारत सागर की लहरों के साथ मिलकर सुंदर नजारा पेश करती है। यहां आकर घंटों बैठकर अद्भुत शांति मिलती है। चर्च का प्रार्थना हॉल काफी बड़ा है। चर्च के अंदर मदर मेरी और इसा मसीह के जीवन से जुड़ी कहानियों को दर्शाती कुछ तस्वीरें भी लगी हैं।

-         -------  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

आगे भी पढ़ते रहिेए हमारी तमिलनाडु की यात्राएं.... (OUR LADY RANSOM CHURCH, KANYAKUMARI, TAMILNADU) 

ज्ञान की ज्योति जगाता कन्याकुमारी का विवेकानंद केंद्र


कन्याकुमारी का प्रमुख आकर्षण विवेकानंद केंद्र भी है। यह कन्याकुमारी रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रेलवे स्टेशन से निकलने के बाद मुख्य सड़क पर जाकर आपको बायीं तरफ मुड़ना होगा तो आप विवेकानंद केंद्र पहुंच जाएंगे। 
राष्ट्रवादी संत एकनाथ रनाडे ने कन्याकुमारी में 100 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में विवेकानंद केंद्र का भी निर्माण कराया था। यह केंद्र 1972 से ही संचालित है। विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी के रॉक मेमोरियल से एक किलोमीटर तो स्टेशन से एक किलोमीटर दूर तिरुनवेली रोड पर स्थित है। विवेकानंद केंद्र सालों भर युवाओं को सामाजिक कार्यों की ओर प्रवृत करने के लिए कई शिविर लगाता है।



आवास का भी इंतजाम - केंद्र में सैलानियों के रहने की भी रियायती दरों पर शानदार इंतजाम हैं। यहां 200 से लेकर 1000 रुपये के बीच आवासीय कमरे उपलब्ध हैं। इनकी एडवांस बुकिंग भी होती है। आप 3 से 60 दिन पहले तक अग्रिम बुकिंग कर सकते हैं। इस साइट पर जाएं-  http://yatra.vivekanandakendra.org/
Phone: +91 - (0)4652 - 246250 email: rooms@vkendra.org
विवेकानंद केंद्र के परिसर में एक बेहरीन पुस्तकालय, विवेकानंद पर प्रदर्शनी, पुस्तक बिक्री केंद्र है। साथ ही केंद्र में आप एकनाथ रनाडे का आवास देख सकते हैं, जो उनके नहीं रहने पर अब संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ स्वंयसेवक रहे रनाडे संघ के दूसरे सर संघ चालक गोलवलकर जी (गुरुजी) के भी काफी करीबी थे।


केंद्र में अच्छी कैंटीन भी -  विवेकानंद केंद्र के हरे भरे परिसर में मंदिर और एक अच्छी कैंटीन भी है। यहां 40 रुपये में खाने की थाली (सीमित) मिलती है। हमलोग खाना खाने के बाद केंद्र में पहुंचे थे। इसलिए सिर्फ चाय की चुस्की का आनंद लिया। अनादि को भी यहां की चाय खूब पसंद आई। कैंटीन का हॉल देखकर अपने बीएचयू के हॉस्टल के मेस की याद आ गई। 


कई तरह की सामाजिक गतिविधियों का संचालन - विवेकानंद केंद्र न सिर्फ कन्याकुमारी बल्कि देश के कोने कोने में अपनी गतिविधियां संचालित करता है। केंद्र द्वारा अरुणाचल प्रदेश में कई तरह की गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। 1974 से ही केंद्र असम और अरुणाचल में मोबाइल मेडिकल यूनिट संचालित कर रहा है। 

देश भर में 200 से ज्यादा शाखाएं -  विवेकानंद केंद्र की देश भर में 225 से ज्यादा शाखाएं कार्यरत हैं। इन शाखाओं के द्वारा समाजसेवा के कई कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। केंद्र का पूर्वोत्तर राज्यों खासतौर पर अरुणाचल प्रदेश में कई कार्यक्रमों का संचालन किया जा रहा है।


केंद्र में समय समय पर आध्यात्मिक और योग शिक्षा शिविरों का आयोजन किया जाता है। केंद्र स्वाध्याय वर्ग और संस्कार वर्ग भी चलाता है। आप देश के किसी भी हिस्से में केंद्र की गतिविधियों में हिस्सा ले सकते हैं। जिस समय हमलोग केंद्र में पहुंचे यहां एक ऐसा ही स्वाध्याय वर्ग चल रहा था। केंद्र में कई अवकाश प्राप्त बुजुर्ग भी मिले जो समय दान देकर यहां सेवा कार्य में लगे थे।

समय दान देने की परंपरा - समाज सेवा के इच्छुक लोग इससे जुड़ सकते हैं। साथ ही आप विवेकानंद केंद्र में समय दान देकर वहां अपनी सेवाएं भी दे सकते हैं। यहां कम से कम एक महीने या इससे अधिक का समय कार्यकर्ता के तौर पर दिया जा सकता है। आप भी चाहें तो केंद्र को समाज सेवा के लिए अपना समय दान कर सकते हैं। यह समय एक महीने, तीन महीने, छह महीने या एक साल का हो सकता है। ऐसे समय दानियों के लिए आवास और भोजन का इंतजाम केंद्र की ओर से किया जाता है। 
http://www.vivekanandakendra.org/

  -- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 
(  ( SWAMI VIVEKANAND, KANYAKUMARI, ROCK MEMORIAL,  VIVEKANAND KENDRA ) 


Wednesday, November 21, 2012

कन्याकुमारी की शिला और स्वामी विवेकानंद


हमलोग कन्याकुमारी के विवेकानंद रॉक मेमोरियल के पास जा पहुंचे हैं। हमारी इच्छा रॉक मेमोरियल को करीब से जाकर देखने की है। कन्याकुमारी से स्वामी विवेकानंद का बड़ा ही गहरा संबंध हैं। देश भर घूमते हुए जब संन्यासी विवेकानंद कन्याकुमारी पहुंचे। वह साल था 1892 जब महान संत के कदम यहां पड़े थे। 
अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के 1886 में निधन के बाद स्वामी विवेकानंद कुछ समय तक बंगाल में रहे। उसके बाद 1888 में परिव्राजक के तौर पर देश भर में घूमने निकल पड़े। उन्होंने उत्तर में हिमालय की यात्राएं की। इसी क्रम में वे दक्षिण भारत भी पहुंचे। बेंगलुरु, रामेश्वरम, कोडुंगलूर, त्रिशूर, एर्नाकुलम, त्रिवेंद्रम, नगरकोविल आदि शहरों को घूमते हुए 24 दिसंबर 1892 को वे कन्याकुमारी पहुंचे थे। 

कन्याकुमारी के सागर तट पर पहुंचकर विवेकानंद सागर तट पर बैठ कर देर तक ध्यान में रहे। इससे पहले कुमारी अमान मंदिर में उन्होंने पूजा भी की। स्वामी जी को कन्याकुमारी का आध्यात्मिक वातावरण काफी पसंद आया। यहां के समुद्र के मध्य 400 मीटर अंदर स्थित शिला से उनका खास संबंध है। कहा जाता है कि उस शिला तक स्वामी जी तैर कर गए। ऐसा उन्हें मजबूरी में करना पड़ा। 

यहां हुई ज्ञान की प्राप्ति -  कथा के मुताबिक उन्होंने एक नाव वाले से शिला तक पहुंचाने को कहा। पर उनसे नाव वाले ने शिला तक जाने के लिए शुल्क मांगा। पर वह राशि स्वामी विवेकानंद के पास नहीं थी। फिर क्या विवेकानंद ने सागर में छलांग लगा दी। वे बचपन से ही अच्छे तैराक थे। इसलिए आसानी से शिला तक पहुंच गए। वहां सागर में शिला पर घंटों बैठ कर देश काल पर चिंतन किया। कहा जाता है कि यहां स्वामी विवेकानंद का खास तरह का ट्रांसफारमेशन हुआ। ये बदलाव युगांतकारी था। ठीक उसी तरह जैसे गौतम बुद्ध को बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था, विवेकानंद को कन्याकुमारी में शिला पर ज्ञान की प्राप्ति हुई।
इसके कुछ महीने बाद ही 11 सितंबर 1893 को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में जाकर अपने भाषण से भारत की आध्यात्मिक परंपरा का डंका पूरी दुनिया में बजवाया। स्वामी जी पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गए। इसके बाद कन्याकुमारी का नाम विवेकानंद के साथ जुड़ गया। इससे कन्याकुमारी का महत्व और भी बढ़ गया। 



सन 1970 में बना रॉक मेमोरियल - देश आजाद होने के दो दशक बाद स्वामी विवेकानंद की याद में महान संत और समाजसेवी एकनाथ रनाडे ने यहां एक अनूठा मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। साल 1970 में ये रॉक मेमोरियल बनकर तैयार हुआ। इसका उदघाटन तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी ने किया था। उसके बाद यह कन्याकुमारी का प्रमुख दर्शनीय स्थल बन गया है। हर रोज हजारों सैलानी इस रॉक मेमोरियल तक जाते हैं।

स्वामी विवेकानंद के आगमन की स्मृति में कन्याकुमारी में हर 24 दिसंबर की तारीख को संकल्प दिवस के तौर पर मनाया जाता है। यही वह दिन है जब महान संत ने सागर की लहरों के संग बैठकर संवाद किया था और दुनिया उनके ज्ञान से आलोकित हुई थी।


फेरी सेवा से पहुंचे  - कन्याकुमारी आने वाले सैलानी फेरी से रॉक मेमोरियल तक जाते हैं। रॉक मेमोरियल जाने और आने के लिए फेरी का 35 रुपये टिकट लगता है। पर कई बार मौसम खराब होने पर फेरी की सेवा बंद कर दी जाती है। और इसी खराब मौसम का हमलोग भी शिकार हुए। टिकट काउंटर पर हमें बताया गया कि समंदर में लहरें तेज होने के कारण फिलहाल फेरी सेवा बंद है। ये कब तक शुरू होगा इसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है। तो थोड़ी देर इंतजार करने के बाद हमलोग मन मसोस कर आगे की ओर चल पड़े। 

संत तिरुवल्लुर की प्रतिमा - विवेकानंद रॉक मेेमोरियल के पास ही संत तिरुवल्लुपर की विशाल प्रतिमा बनी हुई है। तिरुवल्लुर तमिलनाडु के विख्यात संत हुए। उनका सम्मान सिर्फ तमिल भाषा में ही नहीं बल्कि देश के हर राज्य में है। उन्होंने त्रिकुल नामक ग्रंथ की रचना की थी। वे जाति से जुलाहे थे और कपडे़ बुनने का ही काम करते थे। पर वे कबीर, रविदास की तरह महान संत हुए। उनके सम्मान में सागर तट पर उनकी विशाल खड़ी प्रतिमा का निर्माण कराया गया है। यह प्रतिमा काफी दूर से ही नजर आती है। यह प्रतिमा 133 फीट ऊंची है। कोरोमंडल समुद्र तट पर इस प्रतिमा का निर्माण 7 सितंबर 1990 को आरंभ हुआ। ये प्रतिमा 1999 में पूरी हुई। यह संत तिरुवल्लुर की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा में से एक है।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(  ( SWAMI VIVEKANAND, KANYAKUMARI RESOLVE 1892, ROCK MEMORIAL VIVEKANAND KENDRA ) 
      

Monday, November 19, 2012

मां पार्वती का रूप हैं कुमारी अम्मन

जहां हिंद महासागर और अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की धाराएं भारत की धरती को चूमती हैं ठीक वहीं पर स्थित है कुमार अमान मंदिर। ये देवी पार्वती का मंदिर है। मंदिर के पास समंदर की लहरों की आवाज ऐसी सुनाई देती है मानों स्वर्ग का संगीत हो।
समंदर में डुबकी फिर पूजा - यहां आने वाले भक्तगण मंदिर में प्रवेश करने से पहले त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाते हैं। मंदिर का पूर्वी प्रवेश द्वार को हमेशा बंद करके रखा जाता है। कहा जाता है कि किसी जमाने में मंदिर में स्थापित देवी के आभूषण की आभा से समुद्री जहाज इसे लाइट हाउस समझने की भूल कर बैठते थे। इस क्रम में जहाज को किनारे करने के कोशिश में दुर्घटनाग्रस्‍त हो जाते थे। 
क़रीब दस फुट ऊंचे परकोटे से घिरे वर्तमान मंदिर का निर्माण पांड्य राजाओं के काल में हुआ था। देवी कुमारी पांड्य राजाओं की अधिष्ठात्री देवी थीं। मंदिर को कुमारी अम्मन यानी कुमारी देवी का मंदिर कहा जाता है।

मंदिर की कथा - कहा जाता है कि भगवान शिव ने असुर वाणासुर को वरदान दिया था कि कुंवारी कन्या के अलावा किसी के हाथों उसका वध नहीं होगा। राजा भरत को आठ पुत्री और एक पुत्र था। भरत ने अपना साम्राज्य को नौ बराबर हिस्सों में बांटकर अपनी संतानों को दे दिया। दक्षिण का हिस्सा उसकी पुत्री कुमारी को मिला। कुमारी शक्ति देवी का अवतार थीं। कुमारी की इच्‍छा थी कि वह शिव से विवाह करे। इसके लिए वह उनकी पूजा करती थी। शिव विवाह के लिए राजी भी हो गए थे और विवाह की तैयारियां होने लगीं थी। लेकिन नारद मुनि चाहते थे कि वाणासुर का कुमारी के हाथों वध हो जाए। इस कारण शिव और देवी कुमारी का विवाह नहीं हो पाया। इस बीच वाणासुर को जब कुमारी की सुंदरता के बारे में पता चला तो उसने कुमारी से शादी का प्रस्ताव रखा। कुमारी ने कहा कि यदि वह उसे युद्ध में हरा देगा तो वह उससे विवाह कर लेगी। दोनों के बीच युद्ध हुआ और वाणासुर को मृत्यु हुई। 
रंग-बिरंगी रेत और कन्याकुमारी -  कुमारी की याद में ही दक्षिण भारत के इस स्थान को कन्याकुमारी कहा जाता है। माना जाता है कि शिव और कुमारी के विवाह की तैयारी का सामान आगे चलकर रंग बिरंगी रेत में बदल गया। इसलिए कन्याकुमारी समुद्र तट पर रंग बिरंगी रेत नजर आती है।

मंदिर में प्रवेश - मंदिर में प्रवेश के लिए सख्त ड्रेस कोड है। यहां पुरूषों को प्रवेश के लिए कमर से ऊपर नग्न हालत में जाना पड़ता है। महिलाओं के लिए भी शालीन ड्रेस कोड है। उनका भारतीय परिधान होना आवश्यक है।
मंदिर खुलने का समय - कुमारी अम्मन मंदिर सुबह साढ़े चार बजे से रात पौने नौ बजे तक खुला रहता है। यहां समान्य दर्शन के अलावा स्पेशल दर्शन के लिए भी कूपन उपलब्ध हैं। भीड़भाड़ से बचने के लिेए आप कूपन दर्शन का सहारा ले सकते हैं। मंदिर के अंदर फोटोग्राफी निषेध है।
- माधवी रंजना  
( KUMARI AMMAN TEMPLE, KANYAKUMARI ) 

Sunday, November 18, 2012

कन्याकुमारी की थाली- फुल टाइट भोजन – जमकर खाओ

घूमते घूमते भूख लग जाए तो खाने का स्वाद और बढ़ जाता है। अगर आपको भर पेट खाने को मिले तो कहना ही क्या। दक्षिण भारत के अधिकतर शहरों में थाली में भरपेट खाने का चलन है। जब भी यहां आप थाली मिल्स की बात करते हैं तो इसका मतलब भरपेट होता है। हालांकि भरपेट का मतलब भरपेट चावल से है। कन्याकुमारी और रामेश्वर इसके अपवाद हैं। कन्याकुमारी में जब हमने दोपहर के खाने के लिए जगह ढूंढनी शुरू की तो जा पहुंचे राजस्थान भोजनालय। 

राजस्थान भोजनालय ने बताया 70 रुपये की थाली। हमने पूछा की थाली में क्या होगा। चपाती फुलका, चावल, दाल, रसम, सांभर, दो सब्जियां, दही, पापड़, अचार सलाद। सब कुछ। और क्या चाहिए। दही और अचार तो दक्षिण भारत की थाली में अनिवार्य तौर पर नजर आते ही हैं। इन सब कुछ के बाद वेटर ने बताया कि ये सब कुछ फुल टाइट है। ( हो सकता उसका आशय फुल डाइट से हो)  मतलब चाहे जितना खाओ। हमने आर्डर दे दिया। जब खाना आया तो चपाती देखकर दिल खुश हो गया। खालिश गेहूं की चपाती, घी चुपड़ी हुई। चाहे जितनी भी चपाती खाओ। दक्षिण भारत के शहरों में अक्सर चपाती नहीं मिलती। मिलती भी है तो कई बार चावल के आटे की बनी हुई। लेकिन कन्याकुमारी और रामेश्वर में उत्तर भारतीय, मारवाड़ी भोजनालय हैं जहां आप छक कर अपने यहां के खाने का मजा ले सकते हैं।
कन्याकुमारी में राजस्थान भोजनालय के अलावा लक्ष्मी भोजनालय में एक जैसा मीनू है।
वहीं रामेश्वरम में अग्रसेन भवन, गुजराती भोजनालय के अलावा कई उत्तर भारतीय भोजनालय हैं जहां आपको उत्तर भारतीय चपाती और पराठे मिल जाएंगे। रामेश्वरम के अग्रसेन भवन में हमें सुबह के नास्ते में तिकाने पराठे मिले। आलू की सब्जी के साथ। रसोइए भी थे अपने झारखंड प्रांत के सिमडेगा के रहने वाले। ठीक वैसे ही पराठे जैसी मेरी मां बचपन में हमें बना कर परोसती थीं। बचपन की याद आई। मजा आ गया।
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-----विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( KANYAKUMARI, TAMAILNADU, VEG FOOD, RAJSTHANI THALI  )

Thursday, November 15, 2012

कन्याकुमारी का गांधी मंडप - बापू अस्थियां प्रवाहित हैं यहां

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यानी बापू के निधन के बाद उनकी अस्थियों को देश भर में प्रवाहित किया गया था। अलग अलग जगहों पर उनमें से कन्याकुमारी भी एक है।

यहां कुमारी अम्मान मंदिर के बगल में बना है गांधी मंडप। यह आधुनिक युग का मंदिर है। यहां आना एक और तीर्थ में आने जैसा है। यहां आप बापू का अस्थि कलश करीब से देख सकते हैं। मंदिर तीन मंजिला है।
मंदिर के गर्भ गृह में बापू के अस्थिकलश को संरक्षित करके रखा गया है। यहां पर तैनात कर्मचारी खास तौर पर उत्तर भारत से आने वाले सैलानियों को सम्मान से अंदर तक जाने का मौका देते हैं। 
मंदिर के सबसे उपर वाले तल पर जाने के बाद समंदर और कन्याकुमारी शहर दोनों का नजारा अद्भुत दिखाई देता है। गुलाबी रंग का गांधी मंडप दूर से ही किसी मंदिर की तरह नजर आता है। यहां आप बापू को नमन के बाद मंदिर के चौबारे पर देर तक बैठ सकते हैं और अपने पूरे देश को याद कर सकते हैं कश्मीर से कन्याकुमारी तक।

गांधी मंडप की एक और खास बात है। यहां से कन्याकुमारी की सुबह और कन्याकुमारी की शाम देखी जा सकती है। आपने कन्याकुमारी के सूर्योदय और सूर्यास्त के बारे में सुन रखा होगा। सुबह और शाम को बहुत बड़ी भीड़ जुटती है, इस नजारे को अपने यादों के झरोखे में और कैमरे में कैद करने के लिए। हमारी यात्रा के समय बारिश हो रही थी इसलिए हम इस नजारे को नहीं देख सके।

और ये रहे बापू के तीन बंदर। 
गांधी मंडप से लगा हुआ बच्चों का खूबसूरत पार्क भी है। इस पार्क में अलग अलग स्टाइल के बच्चों के लिए बैठने के लिए कुर्सियां लगी हैं। अनादि इस पार्क में देर तक खेलते रहे। उनकी तो यहां से जाने की ही इच्छा नहीं हो रही थी। हमने उन्हे यहां बापू के तीन बंदरों और उनके संदेश के बारे में बताया तो वे उन तीन बंदरों जैसा अभिनय करके दिखाने लगे।कन्याकुमारी के गांधी मंडप की छत से समंदर और कन्याकुमारी शहर का सुंदर नजारा दिखाई देता है। यहां से थोड़ी दूरी पर एक लाइट हाउस भी है जहां से समंदर को निहारा जा सकता है।

कन्याकुमारी में समंदर के तट के किनारे कई अच्छे होटल भी हैं जहां से आप सुबह और शाम उगते और डूबते हुए सूर्य को देख सकते हैं। साथ ही सागर के लहरों की अठखेलियों का भी आनंद उठा सकते हैं। पर अगर आप खास मौकों पर कन्याकुमारी आ रहे हैं तो यहां रहने के लिए होटल पहले से ही बुक करा लें तो अच्छा रहेगा। 

- vidyutp@gmail.com
( GANDHI IN KANYAKUMARI, TAMILNADU, TEMPLE ) 

Tuesday, November 13, 2012

कन्याकुमारी- चरणों को धोता सागर का सम्राट


 कन्याकुमारी शहर का नाम पड़ा है कन्याकुमारी के मंदिर के नाम पर। कन्याकुमारी देवी पार्वती का दूसरा स्वरूप है। देवी कन्याकुमारी की कहानी है। उन्होंने दुष्टों का संहार किया था। मंदिर के आसपास आपको कन्याकुमारी का रुप धरे बालिकाएं मिल जाएंगी जो दुकानदारों से मंदिर के लिए दान मांगती हैं। कन्याकुमारी मंदिर में भी दर्शन के लिए ड्रेस कोड है। कमर से उपर नग्न होकर ही पुरुष मंदिर में जा सकते हैं। यहां निःशुल्क सर्व दर्शन के अलावा आप 20 रुपये का दर्शन टोकन ले सकते हैं। पूरा मंदिर पत्थरों का बना है। मंदिर में कैमरा, मोबाइल का प्रयोग वर्जित है। मंदिर के आसपास मोतियों, शंख, कौड़ियों मशालों, ड्राई फ्रूट्स की दुकानें हैं। मंदिर का एक द्वार समंदर की तरफ है।

समंदर का अदभुत नजारा 

कन्याकुमारी के समंदर को देखते हुए कवि प्रदीप की पंक्तियां याद आती हैं- दक्षिण में चरणों को धोता सागर का सम्राट है....गीत आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं की ये पंक्तियां यहां बार बार याद आती हैं। कन्याकुमारी मंदिर के बाहर तीन तरफ आप समंदर का नजारा देख सकते हैं।

बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और हिंद महासागर की धाराएं कन्याकुमारी में एक साथ मिलती हैं। कन्याकुमारी में सागर तट पर बैठकर घंटों अपलक समंदर को निहारना बड़ा ही मनोहारी अनुभव है। यहां के समंदर का पानी अपेक्षाकृत साफ भी नजर आता है। बिल्कुल सफेद लहरें उठती और गिरती हैं।

 कई बार समंदर से आने वाली लहरें आपको भिगो देती हैं। हालांकि यहां समंदर में नहाने के लिए कोवलम जैसा खूबसूरत तटीय किनारा नहीं है। लेकिन कन्याकुमारी के समंदर में भी स्नान करना एक न भूलने वाली अनुभूति है। काफी लोग यहां धार्मिक भावना से भी नहाते हैं। और नहाने के बाद पूजा पाठ।
कुमारी अमान मंदिर के समुद्र तट के सामने नजर आता है विवेकानंद रॉक मेमोरियल और संत तिरुवल्लुर की बड़ी सी प्रतिमा। मंदिर के बगल में ही कांची शंकरचार्य का मठ और उसके बगल में गांधी मंडप है। वहीं दूसरी तरफ एक पुराना चर्च भी है। ये सब कुछ घूमने के लिए आधा दिन का वक्त काफी है। लेकिन आपकी मर्जी है आपका जी नहीं भरे तो देर तक नजारा कर सकते हैं।
-   -  विद्युत प्रकाश मौर्य

((KANYAKUMARI, CAPE, TAMILNADU, SEA )  



Monday, November 12, 2012

कन्याकुमारी - देश के आखिरी छोर पर पहुंच गए हम


कन्याकुमारी पहुंचने का मतलब देश के आखिरी छोर को छू लेना है। यह एक आनंददायक अनुभूति है। कन्याकुमारी तमिलनाडु प्रान्त के सुदूर दक्षिण तट पर बसा एक शहर है। हालांकि कन्याकुमारी केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम से महज 90 किलोमीटर आगे है। इसलिए चेन्नई की तुलना में त्रिवेंद्रम से यहां पहुंचना आसान है। आमतौर पर त्रिवेंद्रम से रेलगाड़ियां दो घंटे में कन्याकुमारी पहुंच जाती हैं। कन्याकुमारी से 15 किलोमीटर पहले नगर कोविल जंक्शन है। यह कन्याकुमारी की तुलना में बड़ा रेलवे स्टेशन है। कई रेलगाडियां नगर कोविल तक ही जाती हैं। वैसे आप त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी बस से भी जा सकते हैं। काफी सैलानी बस का पैकेज लेकर त्रिवेंद्रम से ही जाकर दिन भर में कन्याकुमारी से घूमकर लौट आते हैं।


हमलोग दोपहर एक बजे के बाद त्रिवेंद्रम सेंट्रल रेलवे स्टेशन ( TVC) से कन्याकुमारी एक्सप्रेस के स्लीपर क्लास डिब्बे में सवार हुए। इसमें जगह आसानी से मिल गई। हमारे साथ कुछ सैलानी हैं जो मुंबई से कन्याकुमारी जा रहे हैं। हल्की-हल्की बारिश के बीच ट्रेन सरपट दौड़ रही है। थोड़ी देर मे हम केरल छोड़कर तमिलनाडु में प्रवेश कर गए हैं। त्रिवेंद्रम से तकरीबन 35 किलोमीटर आगे कुजीथुराई में ट्रेन तमिलनाडु में प्रवेश कर जाती है। इसके बाद के 35 किलोमीटर के सफर के बाद नगरकोविल जंक्शन (NCJ ) आ जाता है। हमें सुखद अचरज हुआ कि ट्रेन ने हमें अपने समय से कुछ पहले ही कन्याकुमारी रेलवे स्टेशन पर पहुंचा दिया।  

देश का आखिरी रेलवे स्टेशन - कन्याकुमारी भारतीय रेलवे का दक्षिणी छोर पर आखिरी रेलवे स्टेशन है।  यहां से आगे रेल की पटरियां नहीं जाती हैं। इसलिए स्टेशन की पटरियों के अंत में हावड़ा की तरह स्टॉपर लगा हुआ है।इसका स्टेशन कोड CAPE है। कन्याकुमारी को यह विदेशियों द्वारा दिया गया नाम था। रेलवे स्टेशन पर छोटी सी कैंटीन है,जहां खाने पीने की सीमित चीजें मिल रही हैंं। दिन भर में गिनती की रेलगाड़ियां ही कन्याकुमारी पहुंचती हैं। इसलिए स्टेशन पर भीड़-भाड़ बहुत कम नजर आती है। रेलवे स्टेशन किसी गांव या कस्बे के स्टेशन सा नजर आता है। स्टेशन के आसपास कोई बाजार नहीं है। रेलवे द्वारा स्टेशन का रखरखाव भी उम्दा नहीं है। रेलवे स्टेशन से कुछ फर्लांग पैदल चलकर जाने के बाद बाजार में पहुंचा जा सकता है।


रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर आने के बाद दाहिनी तरफ आगे बढ़ने पर तकरीबन एक किलोमीटर चलने पर कन्याकुमारी का मुख्य मंदिर, कुमारी अमान मंदिर और रॉक मेमोरियल आदि आते हैं। वहीं स्टेशन से बायीं तरफ जाने पर आधे किलोमीटर आगे विवेकानंद केंद्र है। कन्याकुमारी तीन किलोमीटर के दायरे में बसा छोटा सा शहर है। बेहतर होगा आप कुमारी अम्मान टेंपल के आसपास किसी होटल में ठहरें।

कन्याकुमारी हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर का संगम स्थल है, जहां अलग-अलग सागर अपने विभिन्न रंगों से मनोरम छटा बिखेरते हैं।

भारत के सबसे दक्षिण छोर पर बसा कन्याकुमारी हजारों सालों से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्व है। दूर-दूर फैले समुद्र के विशाल लहरों के बीच यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा बेहद आकर्षक लगता हैं। समुद्र तट पर फैले रंग बिरंगे रेत इसकी सुंदरता और बढ़ा देते हैं।
ट्रेन से उतरने के बाद हमने एक आटो  रिक्शा वाले से बात की। उन्हें होटल केप रेसिडेंसी छोड़ने को कहा। हालांकि होटल दो किलोमीटर से ज्यादा दूर नहीं है पर उन्होंने 40 रुपये मांगे। मोल भाव पर भी कम करने को तैयार नहीं हुए। मुझे प्रतीत हुआ कि केरल से तमिलनाडु में आटो रिक्शा का किराया थोड़ा ज्यादा है।



कहां ठहरें - कन्याकुमारी में हमने ठहरने के लिए नगर कोविल रोड पर केप रेसीडेंसी होटल में अग्रिम आरक्षण कराया था। ये होटल किसी रिजार्ट की तरह है। बड़े हवादार कमरे, हरा-भरा कैंपस, रहने का आनंददायक अनुभव। हालांकि आप विवेकानंद केंद्र में भी ठहर सकते हैं। पर जब हम गए उस समय फोन करने पर केंद्र के स्वागत कक्ष से जवाब आया कि उन तारीखों में केंद्र में जगह नहीं है। कई बार कन्याकुमारी में होटल भरे हुए मिलते हैं इसलिए अग्रिम आरक्षण करा लेना अच्छा रहता है।
विवेकानंद केंद्र से मुख्य दर्शनीय स्थलों तक जाने के लिए आटो रिक्शा लेना पड़ता है। कन्याकुमारी में आटो रिक्शा केरल की तुलना में महंगे हैं। वैसे आप पूरा कन्याकुमारी चाहें तो पैदल ही घूम सकते हैं। यहां आटोरिक्शा वाले केरल की तरह सीधे नहीं है। वे दिल्ली वालों की तरह किराये का मोलभाव करते हैं। 

-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( KANYAKUMARI, VIVEKANAND KENDRA) 

- होटल न्यू केप ( रेलवे स्टेशन के बिल्कुल सामने है )
- केप रेसीडेंसी, नगर कोविल रोड, ( विवेकानंद केंद्र से थोड़ा आगे
- गंगा लॉज ( मंदिर से पहले रियायती लॉज है )
होटल केप रेसीडेंसी के परिसर में अनादि अनत ।