Saturday, October 6, 2012

सिंधु घाटी सभ्यता के दौर में आबाद था संघोल


बाइक से लुधियाना से चंडीगढ़ वाया संघोल - साल 2003 में एक बार हमलोग चंडीगढ़ की यात्रा पर गए। इस बार हमने लुधियाना से चंडीगढ़ शहर का सफर बाइक से तय किया। तकरीबन सौ किलोमीटर की इस बाइक यात्रा के दौरान हमलोग लुधियाना चंडीगढ़ के बीच आते-जाते संघोल में एक ढाबा में रुके थे। वहां के पराठों का स्वाद लाजवाब रहा। इन पराठों के साथ घर का बना हुआ बटर पेश किया गया था। इस होम मेड बटर के साथ पराठों का स्वाद बढ़ जाता है। घर के बने इस बटर का स्वाद डिब्बा बंद बटर से काफी अलग होता है। 

जहां तक मुझे याद आता है कि इस ढाबे का नाम जिमिदारा ढाबा था। इसमें डाइनिंग हॉल के साथ गार्डन एरिया में बैठकर खाने की सुविधा उपलब्ध थी। ये ढाबा इतना पसंद आया कि चंडीगढ़ से वापसी में माधवी ने कहा फिर हम वहीं रुक कर पराठे खाएंगे। वैसे इस मार्ग पर संघोल के आसपास कई अच्छे ढाबे हैं। जिनमें मितरा दां ढाबा, न्यू जिमिदारा ढाबा आदि प्रमुख है। इस ढाबे के पराठों का स्वाद इतना अच्छा था कि चंडीगढ़ से वापसी की यात्रा में भी हमलोग संघोल के इसी ढाबे पर खाने के लिए रुके। ढाबे के पीछे गेहूं के लहलहाते खेतों के बीच बनी फूलवारी भी थी और इसमें कई झूले भी लगे हुए थे। 

तो अब बात करें संघोल की। लुधियाना से पंजाब के रास्ते में ठीक बीचों बीच आता है संघोल नामक एक स्थान। पर ये संघोल पंजाब का ऐतिहासिक स्थल है। आजकल इसे उचा पिंड के नाम से भी जाना जाता है। संघोल से खुदाई में सिंधु घाटी सभ्यता के समय के अवशेष मिले हैं। अब संघोल में एक छोटा सा संग्रहालय बनाकर खुदाई में मिली कुछ वस्तुओं को संग्रहित किया गया है।

हड़प्पा से लेकर मौर्यकाल तक समृद्ध शहर - संघोल में आप सरकारी संग्रहालय के पास खुदाई के अवशेष भी देख सकते हैं। इससे प्राचीन नगर के होने का एहसास होता है। संघोल से खुदाई के दौरान उत्तर हड़प्पा काल से लेकर मौर्योत्तर युग तक के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य मिले हैं। इस लिहाज से संघोल को एक उत्तर हड़प्पा काल का नगर माना जाता है। इस नगर का दूर दूर तक देशों के साथ कारोबारी रिश्ता हुआ करता था। 


टकसाल हुआ करती थी संघोल में - संघोल से हिंद-पल्लव, गोन्दोफैरस, विम कडफाइसिस सहित कुषाण काल की और अर्द्धजनजातीय लोगों के इस्तेमाल में लाई जानेवाली कई मुद्राएं मिली हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि, संघोल में एक टकसाल हुआ करती थी, जहां पर मुद्राओं की ढलाई की जाती थी। मध्य एशिया के शासक तोरोमाना और मिहिरकुल से जुड़े सिक्के भी संघोल में मिले हैं।

बौद्ध धर्म का भी बड़ा केंद्र था – ऐसा प्रतीत होता है कि संघोल बौद्ध धर्म का भी बड़ा केंद्र था। संघोल में वर्ष 1968 में एक बौद्ध स्तूप भी तलाश में मिला था। वहीं वर्ष 1985 में, मथुरा कला विद्यालय (मथुरा स्कूल ऑफ आर्ट) से संबंधित पहली और दूसरी शताब्दी की लगभग 117 पत्थर की संरचनाएं खुदाई के दौरान मिली थीं। यहां पहली और दूसरी शताब्दी में बने बौद्ध स्तूप देखे जा सकते हैं।

संघोल में थे पांच बौद्ध स्तूप - भगवान बुद्ध की मृत्यु के लगभग सौ साल बाद मौर्य वंश के महान सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए उनकी चिता भस्म पर देश भर में 8400 स्तूपों का निर्माण कराया था। ये स्तूप सारनाथ, सांची, नालंदा, तक्षशिला सहित देश के विभिन्न भागों सहित अफगान और ईरान में भी बनाए गए थे। कहा जाता है कि इनमें पांच स्तूप पंजाब के संघोल नगर में बनाए गए थे। इन पांच स्तूपों में से तीन स्तूपों को ग्रामीणों ने अनजाने में नष्ट कर दिया।
संघोल के ऐतिहासिक महत्व को पुरातत्व विभाग के तत्कालीन निदेशक आर के बिष्ट ने पहचाना। उन्होंने इस गांव में 1964 से 1969 तक कई चरणों में खुदाई करवाई। इसके बाद संघोल से हड़प्पा युग से मौर्येत्तर काल तक के कई महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आए।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि हड़प्पाकालीन संस्कृति से जुड़े इस गांव का पुराना नाम संगल था, जो कालांतर में संघोल हो गया। पर इतना पुराना ऐतिहासिक स्थल पंजाब के पर्यटन के मानचित्र पर नहीं आ सका है।


कैसे पहुंचे - संघोल पंजाब के फतेहगढ़ साहिब जिले में आता है। फतेहगढ़ साहिब से यह 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां आप चंडीगढ़ से आते समय रोपड़ (रुपनगर) से और लुधियाना की तरफ से भी पहुंच सकते हैं। आप जीटी रोड पर सरहिंद या मंडी गोबिंद गढ़ शहर से भी संघोल आसानी से पहुंच सकते हैं। लुधियाना चंडीगढ़ हाईवे पर संघोल के आसपास बड़े अच्छे ढाबे हैं। वहां आप देसी पंजाबी खाने का आनंद जरूर लें। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SANGHOL, PUNJAB, FATEHGARH SAHIB, BUDDHA ) 
  

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