Saturday, October 13, 2012

पिंक सिटी जयपुर की मेरी पहली यात्रा


मेरी जयपुर की पहली यात्रा साल 1998 के फरवरी महीने में हुई। तब मैं दिल्ली के कुबेर टाइम्स में कार्यरत था। एक दिन अचानक कहीं घूमने का दिल हुआ तो जयपुर जाने की सोची। तब मैं  दिल्ली के झिलमिल में रहता था। एक दिन पहले कश्मीरी गेट बस अड्डे गया जयपुर की बसों के बार में पता करने। कश्मीरी गेट बस अड्डे में दिल्ली के अलावा हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जैसे सभी पड़ोसी राज्यों के सरकारी रोडवेज के दफ्तर हुआ करते थे। मैंने अगले दिन रात्रि सेवा का जयपुर जाने वाली बस में आरक्षण करा लिया। वब बस गोल्डलाइन थी। मतलब थोड़ी लग्जरी। साल 1998 में राजस्थान रोडवेज में कंप्यूटरीकृत आरक्षण आरंभ हो चुका था। 

आगार मतलब डिपो - राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम की बसों पर मैं जयपुर आगार, जोधपुर आगार, अजमेर आगार लिखा हुआ देख रहा हूं। मुझे लगा आगार कोई जगह होगी। पर बाद में पता चला कि आगार मतलब डिपो। जिस डिपो की बस है उसके बारे में लिखा है। जोधपुर आगार मतलब ये बस जोधपुर डिपो की है। यह विशुद्ध हिंदी का प्रयोग है। पर बाद में राजस्थान की बसों आगार की जगह डिपो की लिखा जाने लगा है। 
जयपुर शहर का चांदपोल इलाका। 

चांदपोल इलाके के होटल में - अगले दिन जब बस में रात्रि दस बजे बैठा तो पता चला कि पूर्व में आरक्षण कराना कोई जरूरी नहीं था। मौके पर ही सीट मिल जाती। यह भी पता चला कि जयपुर के लिए हर 15 मिनट या आधे घंटे बाद एक बस जाती है। रात एक  बजे तक। राजस्थान रोडवेज की बस ने सुबह सुबह मुझे जयपुर के सिंधी कैंप बस अड्डे में पहुंचा दिया।
होटल की खिड़की से दिखाई देती पहाड़ी। 

अब मुझे रहने के लिए किसी होटल की तलाश थी। मेरे किसी मित्र ने बताया था कि बन्नी पार्क इलाके में होटल और धर्मशालाएं हैं। मैं सिंधी कैंप से चांदपोल पहुंचा। वहां से बन्नी पार्क की तरफ गया पर मुझे कोई होटल या धर्मशाला दिखाई नहीं दिया। फिर वापस आ गया चांदपोल। अब दूसरी तरफ यानी पिंक सिटी की तरफ चला। यहां दो गेस्ट हाउस दिखाई दिए। मैंने नेशनल गेस्ट हाउस हाउस में 70 रुपये प्रतिदिन पर सिंगल कमरा बुक करा लिया। इस कमरे से नाहरगढ़ की पहाड़ियों का नजारा दिखाई दे रहा था।  

सुबह-सुबह गुलाबी शहर की सड़कों का नजारा करता हुआ पुराने जयपुर को पैदल पैदल घूमा। मेरे लिए यह देखना बड़ा आश्चर्यजनक था कि पुराना जयपुर इतना व्यवस्थित शहर है। दरअसल चांदपोल से पुराने जयपुर शहर की शुरुआत होती है। एक तरफ चांदपोल है तो दूसरी तरफ सूरज पोल। इसके अलावा भी जयपुर शहर के कई और दरवाजे हैं। कुल सात दरवाजे हैं जयपुर शहर के। एक दरवाजा बाद में बना है उसे न्यू गेट कहते हैं। तो थोड़ी सी बात दुनिया के सुंदरतम शहरों में शुमार इस पिंक सिटी के बारे में। 

पिंक सिटी की नींव 1727 में पड़ी - इस पुराने जयपुर शहर का निर्माण 1727 में शुरू हुआ था। इसको बनने में चार साल लगे थे। इससे पहले राजधानी आमेर में हुआ करती थी। शहर की योजना इस तरह बनाई गई कि कई सौ सालों तक ट्रैफिक बढ़ने पर भी यहां ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं हो। मुख्य बाजार त्रिपोलिया के आसपास सड़क की चौड़ाई 104 से 107 फीट रखी गई है। शहर की सभी सड़के एक दूसरे को समकोण पर काटती हैं। हर दुकान के आगे छत वाली फुटपाथ है। अगर बारिश हो जाए तो आप अपना बचाव बड़े आराम से कर सकते हैं। 



इस चांदपोल इलाके में एनवाईपी के एक पुराने साथी नवीन माथुर का घर है। मैं सुबह सुबह उनकी तलाश में निकल पड़ा हूं। नवीन का पता है - देवदास की गली, खजानों वालों का रास्ता, चांदपोल बाजार। नवीन मुझे 1992 में बेंगलुरू शिविर में मिले थे। मैं उनके घर भी गया पर पता चला कि नवीन माथुर जयपुर छोड़कर चंडीगढ़ में रहने लगे हैं। 
बाल हंस के संपादक अनंत कुशवाहा जी के साथ। 
अनंत कुशवाहा जी से मुलाकात - सुबह दस मैं राजस्थान पत्रिका समूह द्वारा प्रकाशित बच्चों की मैगजीन बालहंस के दफ्तर पहुंचा। इसके संपादक थे अनंत कुशवाहा। मैं बालहंस में कई बार लिख चुका था इसलिए मुझे उम्मीद थी कि वे मुझे नाम से जानते होंगे। ऐसा ही हुआ भी। अनंत जी से 11 अस्पताल रोड के बालहंस के दफ्तर में बड़ी सौहार्दपूर्ण मुलाकात रही। इसके बाद में मैं बालहंस में लिखता रहा। कई बार तो उन्होंने मुझसे विषय देकर भी लिखवाया। अब अनंत जी इस दुनिया में नहीं रहे।

लाल सिंह कुशवाहा की तलाश - इसके बाद मैं अपने एक पुराने दोस्त लाल सिंह कुशवाहा की तलाश में जयपुर के होटल जयपुर पैलेस गया। मेरे वह मित्र टोंक रोड पर स्थित होटल जयपुर पैलेस में किचेन सुपरवाइजर के पद पर कार्यरत थे। उनसे मिलने के लिए इस पांच सितारा होटल के स्टाफ गेट से प्रवेश किया। मित्र के साथियों ने  बताया कि वह आज काम पर नहीं आए। पर उन्होंने होटल के स्टाफ कैंटीन में मुझे खाना खिलाया। इसके बाद मैं मित्र को ढूंढता हुआ जयपुर की सबसे बड़ी आवासीय कालोनी मानसरोवर में गया। ढूंढता हुआ मैं उसके किराये के कमरे तक पहुंच गया। पर मकान-मालिक ने बताया कि वे घर चले गए हैं। 
-- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( RAJSTHAN, JAIPUR, PINK CITY, CHANDPOLE, BALHANS, ANANT KUSHWAHA ) 

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