Wednesday, October 31, 2012

इतिहास गाथा सुनाता मैटेनचेरी पैलेस


मैटेनचेरी में 15वीं सदी का बना राजा का किला है। कोचीन के इस किले का निर्माण 1503 में हुआ था। 1538 में इसे और मजबूत स्वरूप प्रदान किया गया। इसे मैटनचेरी पैलेस भी कहते हैं। यह किला कभी पुर्तगालियों का हुआ करता था और यह कोचीन के महाराजा और पुर्तगाली के शासक (जिसके नाम पर इस किले का नाम पड़ा) के बीच हुए सहयोगात्मक गठबंधन का प्रतीक है। वास्तव में इस किले का निर्माण पुर्तगालियों ने करवाया और कोचीन के राजा को ये किला उपहार में सौंपा।

बाहर से ये किला किसी घर की तरह ही दिखाई देता है। लेकिन यह अंदर से काफी भव्य है। लकड़ी की छतें और राज परिवार की तस्वीरों और उपयोग की जाने वाली सामग्री का शानदार संकलन है किले में। 

किले का रख-रखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग करता है। इसका प्रवेश टिकट 5 रुपये का है। मैटेनचेरी पैलेस को भारत सरकार ने 1951 में संरक्षित स्मारक घोषित किया। 
कभी नाम पड़ा डच महल - मैटेनचेरी महल को 1555 में पुर्तगालियों ने राजा वीर केरल वर्मा को दोस्ती के नाते सौंपा। बाद में यह महल डच जो पुर्तगालियों के बाद भारत आए थे उन्हें सौंपा गया। 1663 मे मेैटेनचेरी पर डच लोगों का अधिकार हो गया। बाद में यह किला हैदर अली के अधिकार में आया। उसके बाद यह ब्रिटिश भारत का हिस्सा बन गया। डच दौर में यह महल डच महल कहलाने लगा था। महल में लकड़ी के छत और फूलों की सजावट खास तौर पर आकर्षित करती है। महल में 57 शानदार भित्तिचित्र बनाए गए हैं। दीवारों पर पेंटिंग बनाने के लिए प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया गया है। महल के कमरों में यूरोपीय शिल्प कला देखी जा सकती है।


पेंटिंग में रामायण की पूरी कहानी  - किले में मौजूद इन पेंटिंग में रामायण की पूरी कहानी देखी जा सकती है। यहां पांच चित्र कृष्ण लीला के भी हैं। यहां टीपू सुल्तान का एक दुर्लभ रेखाचित्र भी देखा जा सकता है। महल में भित्तिचित्र 17वीं और 18वीं सदी में बनाए गए हैं। किले का कला शिल्प यहां के राजा वीर केरल वर्मा की कलात्मक अभिरूचि दर्शाता है जिनके नाम पर केरल राज्य का नाम पड़ा। 

किले के अंदर राजघराने का एक मंदिर भी - मैटेनचेरी पैलेस के अंदर एक मंदिर भी है। यह राजघराने का मंदिर है। इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर लिखा गया है कि भक्तजनों से निवेदन है कि वे लूंगी, बनियान, बारमूडा आदि पहन कर मंदिर में प्रवेश ना करें। साथ में यह भी लिखा है कि प्रवेश केवल हिंदू लोगों के लिए ही है। Admission strictly for Hindus only. यह आदेश देवस्थानम अधिकारी की ओर जारी किया गया है।  ऐसा क्यों किसी चर्च में या किसी मसजिद में तो दूसरे धर्म के लोगो ंको प्रवेश करने से नहीं रोका जाता है। फिर हिंदू मंदिरों में ही ऐसा क्यों किया जाते है। इससे देखा जाए तो हमारे धर्म प्रचार का मार्ग अवरुद्ध ही होता है। 
मेटेनचेरि पैलेस के अंदर आराम के पल।
किले के बगल में ही जेविस ( यहूदी) लोगों का चर्च है और आगे जेविस लोगों की मजार भी है।

खुलने का समय - मेैटेनचेरी पैलेस सुबह 9.45 से दोपहर 1.00 बजे तक खुला रहता है। दुबारा यह दोपहर 2.00 बजे से शाम 4.45 बजे तक खुला रहता है। किला हर शुक्रवार को बंद रहता है। किले के अंदर कैमरा, मोबाइल फोन आदि प्रतिबंधित है। 

--- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( KERALA, FORT COCHI, MATTANCHERRY PALACE,SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS ) 


बोट जेट्टि - कोचीन की लाइफ लाइन


फोर्ट कोच्चि की ओर बोट जेट्टि में...
कोचीन से फोर्ट कोच्चि के लिए चलती है बोट जेट्टि यानी छोटी स्टीमर।हालांकि फोर्ट कोच्चि जाने के लिए सड़क मार्ग का लंबा रास्ता भी है। पर हमने बोट जेट्टि से जाना तय किया। यह बोट मरीन ड्राईव से चलती है। इसमें कुल 75 लोगों के बैठने की व्यवस्था है।

यहां पर केरला टूरिज्म बोट जेट्टि का संचालन करती है जो कोचीन के लोगों की लाइफ लाइन है। वर्ना सड़क से फोर्ट कोच्चि पहुंचने के लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा। यह बोट जेट्टि न सिर्फ स्थानीय लोगों की बल्कि देशी विदेशी सैलानियों की भी पसंद है। 

महज ढाई रुपये किराया - पर आपको यह जानकर अचरज होगा कि सुबह छह बजे से रात नौ बजे तक कोचीन के समंदर से फोर्ट कोच्चि के लिए चलने वाली बोट जेट्टि का किराया है महज ढाई रुपये प्रति व्यक्ति। इस महंगाई में इतना कम किराया। यह शायद केरल में लंबे समय रहे कम्युनिस्ट शासन का असर हो।



बोट में हमारे बगल मे एक बेंगलुरु की महिला बैठी हैं बोट में। वे भी कोच्चि घूमने आई हैं। वह हिंदी शानदार बोल रही हैं। उनकी कोचीन के बारे में जानकारी काफी अच्छी है लिहाजा वे हमारी कुछ जिज्ञासाएं शांत करती हैं। समंदर में कुलांचे भरती बोट से नजर आते हैं कोचीन बंदरगाह को आने वाले बड़े बड़े जहाज। हालांकि यहां समंदर का पानी बहुत साफ नहीं है। कोई 50 मिनट के सफर में बोट हमें फोर्ट कोच्चि में उतार देती है।

एरनाकुलम, कोच्चि, कोची और कोचीन कोच्चि केरल का सबसे बड़ा शहर है आबादी के लिहाज से। अब यहां मेट्रो रेल चलाने की तैयारी चल रही है।
हालांकि आजकल शहर का नाम कोच्चि लिखा जाता है। पर पुराने दस्तावेजों में इसका नाम कोची लिखा हुआ मिलता है। बीच में सालों तक इस शहर को लोग कोचीन नाम से बुलाते रहे।


पर कोचीन के रेलवे स्टेशन का नाम एर्नाकुलम है। शहर में एर्नाकुलम नाम के दो रेलवे स्टेशन है। एर्नाकुलम टाउन ( ईआरएन) और एर्नाकुलम साउथ ( ईआरएस)। मुख्य स्टेशन एर्नाकुलम साउथ ही है। एर्नाकुलम टाउन को एर्नाकुलम नार्थ के नाम से भी जाना जाता है। दोनों स्टेशनों के बीच दूरी महज 2.6 किलोमीटर है। केरल टूरिज्म की वेबसाइट पर जाएंhttps://www.keralatourism.org/

- vidyutp@gmail.com 

( COCHIN, KERLA, BOAT, FORT COCHI, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS ) 


Monday, October 29, 2012

केरल यानी ईश्वर का अपना देश


मंगला लक्षद्वीप एक्सप्रेस (12618) में हमारी दूसरी सुबह हुई तो हमारी ट्रेन गोवा और कर्नाटक के तटीय इलाकोंं को पार करके केरल में प्रवेश कर चुकी थी। सुबह में कोझिकोड (कालीकट) पहला बड़ा स्टेशन आया। ट्रेन हल्की सी लेट चल रही है। यहां राजेश चौधरी और उनके साथी एनआईटी कालीकट जाने के लिए उतर गए। ट्रेन तकरीबन दस मिनट रुकी तो हमने यहां हल्का नास्ता लिया रेलवे स्टेशन के कैंटीन से। हमारे डिब्बे के ठीक सामने कैंटीन थी, इसलिए ज्यादा दौड़भाग नहीं करनी पड़ी। इसके बाद रास्ते में मंगला एक्स. फेरोक, पारापनगड्डी, तिरुर, कुट्टीपुरम, पाट्टम्बी जैसे स्टेशनों पर रुकी। इसके बाद आया शोरानूर जंक्शन। यह केरल का बड़ा रेलवे स्टेशन है। इसके बाद ट्रेन त्रिशूर में रुकी। अगला स्टेशन अलुवा है। अलुवा कोचीन शहर का बाहरी इलाका है।

52 घंटे का सफर हुआ खत्म - दिन के 11 बज चुके हैं और हमलोग पहुंच चुके हैं एर्नाकुलम साउथ रेलवे स्टेशन। यानी कोच्चि या फिर कोचीन। कोचीन में कई रेलवे स्टेशन हैं पर उनमें एर्नाकुलम साउथ सबसे बड़ा स्टेशन है। मंगला लक्षदीप के साथ 52 घंटे का सफर याद रहेगा। इसमें ट्रेन बीच के 46 रेलवे स्टेशनों पर रुकती है। ऐसा लग रहा है जैसे रेलगाड़ी ही घर बन गई है। मंजिल पर पहुंचकर एकबारगी तो ट्रेन से उतरने की इच्छा ही नहीं हो रही है। पर हम कोचीन में पहुंच चुके हैं जहां कभी वास्कोडिगामा का कारवां पहुंचा था। 

केरल टूरिज्म की टैगलाइन है - केरल- गॉड्स ओन कंट्री...सचमुच ईश्वर केरल पर बहुत मेहरबान है। केरल में ट्रेन के प्रवेश करते ही आपको दोनों तरफ हरियाली और ऊंचे-ऊंचे नारियल के पेड़ नजर आते हैं। नारियल ऐसा फल जिसके कई इस्तेमाल हैं। नारियल का तेल, नारियल का पानी, नारियल की मिठाई, पूजा में चढ़ाए जाने के लिए नारियल का खोपरा।


Kochi - Lunch in Arya Bhawan. 
कोचीन यानी एरनाकुलम। केरल का सबसे बड़ा शहर। अब यहां मेट्रो रेल दौडा़ने की तैयारी हो रही है। एर्नाकुलम देश का पहला जिले जिसे सबसे पहले सौ फीसदी साक्षर घोषित किया गया। एर्नाकुलम रेलवे स्टेशन है तो कोचीन बंदरगाह। हिन्दुस्तान में अंग्रेजों से पहले पहुंचने वाले जेविस और पुर्तगालियों की स्मृति चिन्ह है कोचीन शहर में। 

एर्नाकुलम रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही कोचीन में कई मध्यम स्तर के होटलों को ठिकाना बना सकते हैं। वैसे कोचीन में महंगे होटलों की भरमार है। हमारा ठिकाना बना चित्तूर रोड पर होटल संगीता। यह होटल गनम का सहयोगी होटल है। वैसे हमने यहां ऑनलाइन बुकिंग नहीं कराई थी। पर ऑनलाइन सर्च करके इस होटल का चयन किया था। फिर होटल प्रबंधन को फोन करके अपने आने की तारीख की सूचना दी थी। उन्होंने हमारा नाम रजिस्टर में लिखा हुआ था और हमारे लिए कमरा आरक्षित रखा था। हमें पहली मंजिल पर बड़ा कमरा उपलब्ध कराया। कमरे से लगी बालकोनी है। बालकोनी से होटल के ठीक सामने स्थित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा का दफ्तर दिखाई देता है। होटल का साफ सुथरा अच्छा व्यवहार है। हमारे इस सफर में किसी होटल में ये पहला ठहराव है 

KOCHI- IN A AUTO RICKSHAW
होटल में पहुंचकर जमकर नहाए और 52 घंटे के रेल के सफर की थकान दूर करने की कोशिश की। इसके खाने के लिए होटल की तलाश में निकले। हमने दोपहर का खाना पास के ही आर्य भवन में खाया। चावल की थाली यानी दोपहर का मिल्स । कुल 50 रुपये में अनलिमिटेड खाना। आप सब कुछ दोबारा ले सकते हैं। 


पीने के लिए यहां केरला आर्युवेदिक वाटर यहां के होटलों में दिखाई दिया। यह एक किस्म का रंगीन पानी होता है जो गर्म करके पेश किया जाता है। इस होटल में खाना परोसने वाला वेटर बिहार का रहने वाला  है। पूछने पर उसने बताया कि यहां पर बिहार से ज्यादा वेतन मिलता है इसलिए चला आया। अब खाने के बाद होटल में पहुंचकर थोड़ी देर आराम। उसके बाद शाम होने से पहले हमलोग चल पड़े फोर्ट कोच्चि की ओर। आटोरिक्शा बुक किया मरीन ड्राईव के लिए। यहां सारे आटोरिक्शा वाले मीटर चलते हैं। कोई मोलभाव नहीं। यह बड़ा सुखकर है। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com

( Hotel Sangeetha,   Near Junction Railway Station, Chittoor Rd, KOCHI - 682016 Tel. 04842376123  दूसरे होटल - होटल गनम, चित्तूर रोड, निकट होटल पॉलसन पार्क, रेलवे स्टेशन के सामने ) 
( KERALA, KOCHI , SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS) 




Sunday, October 28, 2012

गोवा के थिविम रेलवे स्टेशन पर रोटियां

साल 2012 के अक्तूबर माह में दक्षिण भारत का सफर। 12618 मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस वैसे थो थिविम स्टेशन पर 7.12 बजे शाम पहुंचती है पर वह दो घंटे लेट थी। लिहाजा खानेका समय हो गया था। पेट में चूहे खूब कूद रहे थे। थिविम गोवा का एक रेलवे स्टेशन है। अनादि इस बात पर खुश थे कि हम गोवा में हैं। पर मुझे कुछ खाने का इतंजाम करना था। ट्रेन का ठहराव महज दो मिनट का है। 21 मीटर समुद्र तल से ऊंचाई पर थिविम छोटा सा स्टेशन है दो प्लेटफार्म हैं यहां पर।

 प्लेटफार्म पर एक छोटी सी कैन्टीन थी। ट्रेन दो मिनट से ज्यादा रुक गई तो हमने थोड़ा सा रिस्क लिया और कैंटीन से खाने के लिए कुछ मांगा। सुखद आश्चर्य हुआ यहां पर चपाती मिल रही थी। भाव भी ठीक थे। 10 रुपये में एक चपाती सब्जी के साथ। हमने अपनी जरूरत के हिसाब से चपाती ले ली। इस तरह हमारी रात की पेट पूजा हो सकी।

गोवा में मंगला एक्सप्रेस थिविम और मडगांव स्टेशनों पर रुकती है। मडगांव में मंगला का स्टाप 10 मिनट का है। मडगांव वास्कोडिगामा के बाद गोवा का प्रमुख स्टेशन है। इसके बाद यह रेलगाड़ी कर्नाटक में प्रवेश कर जाती है। मडगांव से वास्कोडिगामा की दूरी 23 किलोमीटर है। पर कोंकण रेल की ट्रेने वास्को नहीं जाती हैं। अगर कोंकण रेल से गोवा जा रहे हैं तो थिविम, करमाली या फिर मडगांव में ही उतरना होगा।
मडगांव बड़ा स्टेशन है। यहां पर कोच के रखरखाव के भी इंतजाम है। स्टेशन का प्लेटफार्म साफ सुथरा चमचमाता हुआ है। नारियल के पेड़ों की हरियाली मन मोह लेती है।

थिविम रेलवे स्टेशन नार्थ गोवा में पड़ता है। यहां से कैंडोलियम बीच की तरफ जाना सुगम है। थिविम रेलवे स्टेशन पर एक बोर्ड लगा है जिस पर यहां गोवा के प्रमुख पर्यटक स्थलों की दूरी लिखी गई है। यहां से मापुसा 11 किलोमीटर, बीचोलियम 9 किलोमीटर अरपोरा 19 किलोमीटर. कालांगुट 23 किलोमीटर, वागाटोर 24 किलोमीटर, अंजना 20 किलोमीटर। पर हमे तो इस बार गोवा जाना नहीं था। सो हम ट्रेन की खिड़की से ही गोवा का नजारा करते रहे और गोवा को बाय-बाय कहा।
गोवा के रेलवे स्टेशनों पर बने स्टाल में गोवा के बने उत्पाद खरीदे जा सकते हैं।

क्या खरीदें - गोवा के रेलवे स्टेशनों पर आप काजू, चिकी, शहद और अन्य खाद्य उत्पाद खरीद सकते हैं जिनका निर्माण कुटीर उद्योगों में गोवा के अंदर हुआ है। जो लोग बार बार दक्षिण भारत की यात्रा रेल से करते हैं उनके लिए ये सफर कई बार बोरियत भरा हो जाता है। पर हमारे लिए सब कुछ नया था। खास तौर पर कोंकण रेल के नजारे। मेरे बहुत सारे दोस्त पूछते हैं कि गोवा घूमने गए या नहीं. मैं कहता हूं गोवा से गुजरा हूं जरूर पर गोवा समुद्र तट देखने नहीं गया। हम मंगला एक्सप्रेस से गोवा की शीतल बयार का स्पर्श लेकर आगे की ओर बढ़ जो गए थे। पर गोवा तो बुलाता रहता है सैलानियों को। हमने भी मना नहीं किया है। हम आएंगे गोवा..कभी जरूर आएंगे।
- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 


Saturday, October 27, 2012

मंगला के संग - कोंकण रेल का हरा भरा सफर

मंगला एक्सप्रेस का चयन ही हमने इसलिए किया था कि कोंकण रेल से सफर कर सकें। कोंकण रेल का सफर मनमोह लेता है। अदभुत नजारे हमेशा के लिए आपके जेहन में कैद हो जाते हैं। कोंकण भारतीय रेलवे का एक अलग जोन है। ये आजाद भारत में भारतीय रेलवे में इंजीनियरिंग की उत्कृष्टता का बेहतरीन नमूना है। मुंबई के पास पनवेल से आगे रोहा रेलवे स्टेशन से शुरू हो जाती है कोंकण रेल की सीमा। रास्ते में आते हैं चिपलूण, रत्नागिरी जैसे स्टेशन।

महाराष्ट्र में कणकावली कोंकण रेल का प्रमुख रेलवे स्टेशन है। यहां स्टेशनों पर कोई भीड़भाड़ नहीं दिखाई देती। महाराष्ट्र का रत्नागिरी जिला हालांकि विकास के मामले में पिछड़ा है लेकिन खूबसूरती में गोवा का मुकाबला करता है। रत्नागिरी में हमारी ट्रेन 10 मिनट रुकी। लेकिन खाने पीने को स्टेशनों पर खाने पीने को कुछ खास नहीं मिला।

रत्नागिरी के बाद ट्रेन महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले से गुजरती है। हालांकि मंगला एक्सप्रेस का ठहराव इस जिले के स्टेशनों में नहीं है। सिंधुदुर्ग, कुदल और सावंतवाडी रोड जैसे स्टेशनों से ट्रेन बिना रुके गुजर जाती है। शाम गहराने के साथ ट्रेन गोवा में प्रवेश कर जााती है। कोंकण रेल मार्ग पर गोवा के दो बड़े स्टेशन आए थिविम जंक्शन और मडगांव जंक्शन।

कोंकण रेल के सफर के दौरान रेल की खिड़की से नदियां, पहाड़ और हरियाली देखते देखते आपकी आंखे थक जाएंगी लेकिन नजारे खत्म होने का नाम नहीं लेंगे। रेल एक सुरंग में घुसती है, निकलने के बाद दूसरे सुरंग में घुस जाती है। पहाड़ों को काटकर कोंकण रेल के लिए रास्ते बनाए गए हैं। एक तरफ ऊंचे पहाड़ तो दूसरी तरफ गहरी खाई। कोंकण रेल गोवा का बड़ा इलाका तय करते हुए आगे बढ़ती है। रास्ते में काफी दूर तक एक तरफ गोवा का समंदर दिखाई देता है। देश के पश्चिमी तट पर 760 किलोमीटर का सफर कराती है कोंकण रेल। गोवा में कोंकण रेल 105 किलोमीटर का सफर करती है जिसमें जुआरी नदी पर बना पुल अद्भुत है। आप अगर कोंकण रेल के सौंदर्य का पूरा नजारा लेना चाहते हैं तो मुंबई से सुबह खुलने वाली किसी ट्रेन में सफर स्लीपर क्लास से करें। इसके लिए जनशताब्दी या मंडोवी एक्सप्रेस का चयन कर सकते हैं।

मडगांव स्टेशन पर रात्रि की एक और तस्वीर। 
कुल 91 सुरंगों से निकलती है रेल
कोंकण के रेल मार्ग पर 2000 पुल और 91 सुरंगे हैं। कोंकण रेल मार्ग पर कारबुडे सुरंग सबसे लंबी है। ये 6.5 किलोमीटर लंबाई की है। ट्रेन को 30 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से इस सुरंग को पार करने में 12 मिनट से ज्यादा वक्त लग जाता है।


पर पहाड़ों का काटकर बनाई गई इन सुरंगों के कारण एक शहर से दूसरे शहर की दूरी को काफी कम किया जा सका है। इसलिए इसे आजाद भारत की सबसे बड़ी और सफल रेल परियोजना माना जाता है। कर्नाटक में कारवार, भटकल, उडुपी जैसे शहरों से गुजरती हुई कोंकण रेल मार्ग पर ट्रेन सुहाने सफर को तय करती हुई ट्रेन पहुंच जाती है कर्नाटक के मंगलोर। मंगलोर यानी ऐश्वर्या राय बच्चन के बचपन का शहर।


कोंकण रेल का पहला रेलवे स्टेशन  - रोहा (महाराष्ट्र)
आखिरी रेलवे स्टेशन – ठोकुर (कर्नाटक) 

कुल रेलवे स्टेशन – 59 
कुल दूरी 760 किलोमीटर
बड़े पुल 179 छोटे पुल 1819
कुल तीखे मोड 320 
कुल सुरंगे -91

कोंकण रेल के प्रमुख स्टेशन – वीर, खेड, चिपलूण, संगमेश्वर, रतनागिरी, राजापुर, वैभववाडी रोड, कनकावली, सिंधुदुर्ग, कुदल, सावंतवाडी रोड। 

गोवा में आने वाले प्रमुख स्टेशन - पेरनेम (गोवा) थिविम (गोवा) वेरना, करमाली, मडगांव (गोवा), कोणाकोण, 

कर्नाटक में आने वाले प्रमुख स्टेशन - कारवार, अंकोला, कुमटा, होनावार, भटकल, कुंदापुरा, उडुपी, ठोकुर।

कोंकण रेल की कारवार सुरंग। 
कोंकण रेल के ज्यादातर क्षेत्र सिंगल ट्रैक का है। पर इस पर सीमित रेलगाड़ियां होने के कारण रेलें काफी समय पर चलती हैं। आमतौर पर स्टेशन भी काफी दूर दूर पर आते हैं। 

अनूठी है रोरो सेवा -  रोरो मतलब रोल ऑन रोल ऑफ। इसमें माल से लदे ट्रक सीधे रेलवे वैगन पर लोड कर दिए जाते हैं। उनका पड़ाव आने पर उन्हें फिर रेलवे से सीधे सड़क पर उतार दिया जाता है।यह अनूठी सुविधा कोंकण रेलवे में उपलब्ध है। 26 जनवरी 2014 को कोंकण रेल सेवा ने सफल 16 साल पूरे कर लिए हैं।

कोंकण रेलवे की अधिकृत वेबसाइट पर जाएं - http://konkanrailway.com/english/

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

( KONKAN RAIL, GOA, RATNAGIRI, CHIPLUN, KARWAR, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS) 
  

Friday, October 26, 2012

पनवेल से चिपलूण - संतरे के संग-संग सफर के रंग

मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस इगतपुरी से घाट सेक्शन पार करने के बाद अब मुंबई के बाहरी इलाके का रेलवे स्टेशन पनवेल में रुकी है। पनवेल मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से 40 किलोमीटर से ज्यादा दूर है। पर अब मुंबई शहर का विस्तार पनवेल तक हो गया है। 

पनवेल रेलवे स्टेशन विशाल और काफी साफ सुथरा नजर आ रहा है। यहां से ट्रेन कोंकण रेलवे के मार्ग पर चलने वाली है। हम सबके अंदर इसको लेकर रोमांच है। 
पनवेल रेलवे स्टेशन पर संतरे का बड़ा सा गट्ठर लेकर रेल में चढ़े कुशीनगर के अनुराग। कोच में आते ही आवाज लगाकर संतरे बेचना शुरू कर दिया। हमने भी उनसे संतरे खरीदे। उनसे थोड़ी बातचीत हुई। वे रोज कोंकण रेल मार्ग पर संतरा बेचते हुए रत्नागिरी तक जाते हैं। वे बताते हैं कि तकरीबन छह घंटे के सफर में रास्ते में सारे संतरे बिक जाते हैं।

वे बताते हैं कि जो नहीं बिके वे सारे संतरे वापसी में बिक जाते हैं। युवा अनुराग संतरा बेचने के साथ साथ बीए की पढ़ाई भी कर रहे हैं। हर साल परीक्षा देने यूपी में अपने शहर कुशीनगर जाते हैं। अनुराग ने बताया कि रोज संतरा बेच कर महीने में 30 से 40 हजार रुपये तक आराम से कमा लेते हैं। उनका कहना है कि कोई सीमा नहीं है कमाई की। और मेहनत करें तो कमाई बढ़ भी सकती है।


जितनी मेहनत करो उतनी कमाई - अनुराग कहते हैं जितनी मेहनत करो उतनी कमाई है। उनकी जिंदगी का फलसफा सुनकर प्रेरणा मिलती है। पढ़े लिखे लोगों में कई बार निराशा दिखती है। लेकिन अनुराग गजब के आशावादी हैं। सरकारी नौकरी पाने की कोशिश की। पर नहीं मिली। लेकिन कोई मलाल नहीं। जिंदगी से कोई शिकायत नहीं। 
कोंकण रेल पर चिपलूण रेलवे स्टेशन। 

वे खूब मेहनत कर रोज नागपुरी संतरे बेचते हैं। तौल का कोई संकट नहीं। दस रुपये का पैकेट तैयार करते हैं। रेल में जो मांगे उसे थमाते जाते हैं। अच्छी खासी कमाई हो जाती है। उनकी जिंदगी रेल के साथ चलती रहती है। किसी से कोई शिकवा शिकायत नहीं। 

अनुराग आगे बताते हैं कि मुंबई में काम इतना बढ़ा लिया है कि छह आठ स्टाफ भी रखा है। यूपी से चलकर आने के बाद महाराष्ट्र भा गया है। परिवार के दूसरे लोग भी यहां रहते हैं। वे सब लोग अलग अलग कारोबार में जुटे हुए हैं। अब अपनी कमाई से महाराष्ट्र के पनवेल में जमीन खरीदने की भी तैयारी कर रहे हैं। तो कहो हिंदी मराठी भाई भाई।

पनवेल के बाद साढ़े तीन घंटे तक लगातार रफ्तार के साथ चलने के बाद हमारी ट्रेन चिपलूण नामक रेलवे स्टेशन पर आकर रुकी। चिपलूण रत्नागिरी जिले का रेलवे स्टेशन है। इसकी ख्याति महाराष्ट्र के एक पिकनिक स्पाट के तौर पर है। किसी जमाने में जब सैलानी मुंबई से गोवा सड़क मार्ग से जाते थे तब चिपलूण इसका प्रमुख ठहराव हुआ करता था। चिपलूण में परशुराम मंदिर है। इसके अलावा यहां वितस्ता नदी है जिसमें बोटिंग की जा सकती है।

इसके बाद अगला ठहराव आया रत्नागिरी। वही रत्नागिरी जो हापुस आम के लिए प्रसिद्ध है। कोंकण क्षेत्र शुरू हो चुका है। हरीतिमा मन मोह रही है। सफऱ का आनंद बढ़ता जा रहा है। अगला स्टेशन कणकावली है। मंगला का महाराष्ट्र में आखिरी ठहराव। 

-    -विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com ( ORANGE, RAIL, KONKAN, MAHARASTRA, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS ) 

चलो अब चलते हैं कोंकण रेल के सफर पर....





Thursday, October 25, 2012

इगतपुरी में महाराष्ट्र का बड़ा पाव


दक्षिण की ओर हमारी यात्रा का दूसरा दिन है। मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस में सुबह हुई तो मनमाड और नासिक जैसे रेलवे स्टेशन पीछे छूट चुके थे। मनमाड शिरडी के साईं बाबा जाने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन है। रात में ट्रेन के स्लीपर क्लास में भी काफी भीड़ हो गई थी। वे सारे शिरडी जाने वाले लोग थे जो मनमाड जंक्शन में रात को उतर गए। इसके बाद इगतपुरी नामक रेलवे स्टेशन आता है जहां मंगला का लंबा ठहराव है। इगतपुरी में ट्रेन 20 मिनट रूकी। यहां सुबह नास्ते में मिला महाराष्ट्र का प्रसिद्ध बड़ा पाव। 15 रुपये में दो बड़ा पाव। 

गोली बड़ा पाव बन चुका है बड़ा ब्रांड। 
कहीं 20 रुपये का तीन तो कहीं सात रुपये का एक भी। अनादि और माधवी को बड़ा पाव खूब पसंद आया। कई साल पहले मैं मुंबई पहुंचा था तब बड़ा पाव पांच रुपये में दो मिलता था। बड़ा पाव पर भी महंगाई का असर पड़ा है लेकिन अभी भी ये देश कई राज्यों की तुलना में सस्ता नास्ता है। नास्ते बाद ट्रेन चल पड़ी। थोड़ी देर बाद ट्रेन ने मुंबई की सीमा को छू लिया। मुंबई में कल्याण और ठाकुर्ली के बाद आता है पनवेल।

पनवेल में भी ट्रेन 10 मिनट से ज्यादा रूकी। पनवेल के बाद शुरू हो जाती है कोंकण रेल की सीमा। राजेश चौधरी बताते हैं कि वे अपनी कालीकट में चार साल की पढ़ाई के दौरान कई बार कालीकट आना जाना कर चुके हैं। ट्रेन के तीन दिन के सफर में अगर अच्छे सहयात्री मिल जाएं तो सफर और यादगार हो जाता है। राजेश लंबी यात्रा के लिए अपनी मां से गुझिया और नींबू का अचार बनवा कर लाए हैं। हम सबको उनकी गुझिया और अचार का स्वाद खूब पसंद आया।




थोड़ी सी चर्चा बड़ा पाव की। अब महाराष्ट्र का बड़ा पाव राज्य की सीमा से बाहर निकल कर बड़ा ब्रांड बन चुका है। गोली बड़ा पाव समेत कई ब्रांड के स्टोर राज्य से बाहर खुल चुके हैं। साल 2004 में गोली बड़ा पाव ने अपना पहला ब्रांडेड स्टोर मुंबई के कल्याण इलाके में खोला। अब इसके 350 से ज्यादा स्टोर 19 राज्यों के 88 शहरों में खुल चुके हैं। इस स्टोर की कल्पना शिवदास मेनन ने की थी। गोली के कई स्टोर दिल्ली एनसीआर में खुल चुके हैं। 

गोली वडा पाव में एक क्लासिक बड़ा पाव की कीमत 25 रुपये है। कीमत की लिहाज से ये फुटपाथ के स्टाल पर बिकने वाला बड़ा पाव से तीन गुना महंगा है। इसके अलावा आप कई वेराइटी का स्वाद ले सकते हैं यहां। अब गोली बड़ा पाव ने होम डिलेवरी भी शुरू कर दी है। 

पुणे और औरंगाबाद में छोटू कोल्हापुरी की है धूम। 
बड़ा पाव में दूसरा बड़ा ब्रांड जंबो किंग है। ये ब्रांड 2001 में आरंभ हुआ था। जंबो किंग बड़ा पाव के आठ के आसपास ब्रांड बेचता है।  बड़ा पाव का तीसरा ब्रांड है छोटू कोल्हापुरी। औरंगाबाद और पुणे में छोटू कोल्हापुरी के स्टोर देखने को मिले। इसकी दरें भी वाजिब है। हालांकि छोटू कोल्हापुरी की स्वाद थोड़ा तीखा है।
बडा पाव मुंबई का सबसे लोकप्रिय फ़ास्ट फूड या यूं कहें की स्ट्रीट फूड है, जो युवाओं के बीच में भारतीय बर्गर के रूप में भी जाना जाता है। इसे बनाना बहुत ही आसान है। पाव को बीच में से काटकर हरी चटनी और सूखे लहसुन की चटनी लगा जाती है और फिर बटाटा (आलू) वडा बीच में रखा जाता है। अपनी सादगी और स्वाद के कारण ही आज वड़ा पाव मुंबई से बाहर भी अपनी पहचान बना चुका है
- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com

( RAIL, KERLA, PANWEL, MAHARASTRA, BADA PAV, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS ) 

Wednesday, October 24, 2012

मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस से केरल की ओर...


दक्षिण भारत की सैर 17 दिनों में  - सारा देश घूम लेने की तमन्ना बहुत से लोगों की होती है। पर इस पूरे हिंदुस्तान में बड़ा हिस्सा दक्षिण भारत का है जो उत्तर भारत से काफी अलग है। दक्षिण में घूमना एक खुशनुमा एहसास की तरह है। खान-पान, लोग, धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल सब कुछ मन मोहते हैं। मुझे दक्षिण बार बार बुलाता है। मेरी पहली दक्षिण की यात्रा 1992 में हुई थी। उसके बाद 2005 में तकरीबन एक साल हैदराबाद में नौकरी करने का मौका मिला। पर साल 2012 में सपरिवार दक्षिण भारत के कई स्थलों को घूमने का कार्यक्रम बनाया। 
सोलह दिन में पांच राज्यों के 12 प्रमुख शहर। बिना किसी ट्रेवल टूर आपरेटर के पूरी यात्रा की योजना खुद तैयार की। पुराने यात्रा वृतांत और इंटरनेट पर रिसर्च करके रेल टिकट और होटल आदि अग्रिम बुक कर लिए और हम निकल पड़े एक लंबी यात्रा पर।
बने दोस्त -  राजेश चौधरी के साथ अनादि कोंकण रेल के एक स्टेशन पर। 


दिल्ली से दक्षिण भारत की ओर जाना हो तो एक रास्ता नागपुर होकर जाता है तो दूसरा कोंकण रेल से गोवा होकर। हमने दक्षिण के सफर के लिए गोवा होकर जाने वाला रास्ता चुना। क्योंकि तमन्ना थी कोंकण रेल की हरी भरी वादियां देखते हुए दक्षिण पहुंचने की। इसके लिए ट्रेन चुनी 
12617 -मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस। दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से हर सुबह 9.20 बजे खुलने वाली ये ट्रेन कई राज्यों को जोड़ती है। दिल्ली से शिरडी,नासिक, गोवा जाने वालों के लिए भी ये ट्रेन मुफीद रहती है। तो केरल जाने वालों के लिए बहुत पुरानी ट्रेन है मंगला एक्सप्रेस। पचास घंटे से ज्यादा सफर कर सात राज्यों से होते हुए ऐतिहासिक शहर कोचीन पहुंचती है। हालांकि ये ट्रेन लक्षद्वीप नहीं जाती पर, यह कोचीन जाती है, जहां से लक्षद्वीप के लिए पानी के जहाज चलते हैं इसलिए इस ट्रेन के नाम के साथ लक्षद्वीप जुड़ा हुआ है। हालांकि कोचीन से भी लक्षद्वीप 25 घंटे रास्ता है पानी के जहाज से। 


मंगला लक्षद्वीप एक्सप्रेस का रास्ते में कुल 47 रेलवे स्टेशनों पर ठहराव है। सुबह नौ बजे दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन पर हमलोग ट्रेन के स्लीपर कोच में जगह ले चुके थे। ट्रेन का सफर यादगार रहा। मंगला देश की सबसे लंबी सुपरफास्ट श्रेणी की ट्रेन है। इस ट्रेन पर हमें 52 घंटे गुजरना है यह सुनकर सात साल के अनादि रोमांचित हैं। वैसे दक्षिण भारत की ओर जाने वाली ज्यादातर रेलगाड़ियां निजामुद्दीन स्टेशन से ही खुलती हैं।

जब हमारी ट्रेन मथुरा पहुंची तो रेल में हमारे सहयात्री बने अलवर से आए पिता-पुत्र। राजेश चौधरी एनआईटी, कालीकट से एमटेक करने के बाद अब दीक्षांत समारोह में डिग्री लेने जा रहे हैं। साथ में पिता भी जा रहे हैं। 24 साल के प्रोफेसर राजेश हमारे नन्हे अनादि के तुरंत दोस्त बन गए। दोनों एक दूसरे का ज्ञान बढ़ाने में जुटे हैं। राजेश बताते हैं कि चार साल कालीकट ( अब कोझिकोड) में पढ़ाई करने के दौरान अनगिनत बार इस रेल मार्ग से सफर करना पड़ा है। ग्वालियर स्टेशन आया तो उनके कुछ और दोस्त ट्रेन के सहयात्री बने जो अपने पिता के साथ कालीकट डिग्री लेने जा रहे हैं। उन लोगों के साथ वार्ता करते हुए सफर कटता रहा।



रेल आगरा से आगे धौलपुर में चंबल नदी पार करके मुरैना जिले में प्रवेश कर चुकी है। मैं अनादि को रेल की खिड़की से चंबल के बीहड़ दिखाता हूं। मध्य प्रदेश में बीना रेलवे स्टेशन पर सांची का छाछ पीते सहयात्रियों से गप्पे लड़ाते हुए सफर कट रहा है। जब भी रेल मध्य प्रदेश से गुजरती है मैं एमपी के सांची ब्रांड का छाछ स्टेशनों पर जरूर ढूंढता हूं। छाछ सफर में बहुत राहत देता है। हम रात को भोपाल पहुंचे। यहां ट्रेन का 10 मिनट का ठहराव है। वहां हमारे पुराने साथी प्रकाश नारायण सिंह रेलवे स्टेशन पर मिले। प्रकाश हमारे साथ महुआ चैनल में काम कर चुके हैं। अब दैनिक भास्कर के इंटरनेट संस्करण में कार्यरत हैं। वे स्टेशन पर कुछ खाने पीने का सामान लेकर आए थे। मिल कर मन भावुक हो गया। 

चलो चलें केरल की ओर। 
भोपाल के बाद रात के नौ बज चुके हैं। भोपाल से ट्रेन आगे बढ़ी तो हमलोग सो गए। कब इटारसी और खंडवा जैसे स्टेशन गुजर गए पता भी नहीं चला। ट्रेन जब महाराष्ट्र के मनमाड में रूकी तो हल्की सी मेरी नींद खुली। शिरडी साईं बाबा के दरबार में जाने वाले कुछ लोग उतर चढ़ में लगे थे। ( जारी है सफर ) 

यात्रा मार्ग और पड़ाव - दिल्ली से कोच्चि, तिरुवनंतपुरम, कन्याकुमारी, मदुरै, रामेश्वरम, कोयंबटूर, मेट्टुपालयम, ऊटी, मैसूर, बेंगलुरु, तिरुपति, हैदराबाद, दिल्ली )
- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com

( RAIL, MANGALA LAKSHDEEP EXPRESS, KERLA, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS ) 

Tuesday, October 23, 2012

फूल की पंखुडी से बनी पुष्कर झील


राजस्थान में अरावली पहाड़ियों की गोद में बसा छोटा सा शहर पुष्कर  देश के प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है। सैलानियों के लिए स्वर्ग पुष्कर को 'तीर्थराज' भी कहा जाता है। पुष्कर अजमेर शहर से उत्तर - पश्चिम में 12 किलोमीटर की दूरी पर है। अजमेर और पुष्कर को नाग - पहाड़ एक दूसरे से अलग करते हैं। 

अजमेर से पुष्कर बस से जाया जा सकता है। आप अजमेर रहकर भी पुष्कर घूमने जा सकते हैं। हिन्दुओं के इस प्रसिद्ध धार्मिक स्थान में 100 से अधिक मंदिर हैं। पुष्कर झील के तट पर जगह-जगह पक्के घाट बने हैं जो राजपूताना के देशी राज्यों के अमीर जमींदारों की ओर से बनाए गए हैं।

पुष्कर का उल्लेख वाल्मिकी रामायण में भी आता है। सर्ग 62 श्लोक 28 में विश्वामित्र  के यहां तप करने की बात कही गई है। सर्ग 62 श्लोक 15 के मुताबिक यहां मेनका पावन जल में स्नान के लिए आई थीं। यहां आने वाले श्रद्धालु अपने को पवित्र करने के लिए पुष्कर झील में स्नान करते हैं।
  
पुष्‍कर झील एक अर्द्ध गोलाकार पवित्र जल से भरी झील है जिसे तीर्थराज के नाम से भी जाना जाता है। हिंदु पौराणिक कथाओं के अनुसारजब भगवाना ब्रहमा ने दानव वज्र नाभ का कमल के फूल से वध किया तो उस फूल की एक पंखुडी टूटकर यहां गिर गई और झील की उत्‍पत्ति हुई। इस झील की अधिकतम गहराई 10 मीटर है। झीलचारों तरफ से लगभग 300  मंदिरों और 52 घाटों ( जो झील के किनारों पर एक श्रृंखला में स्थित हैं ) से घिरा हुआ है।

इस झील में श्रद्धालु स्‍नान करते हैं। कहा जाता है कि अगर कोई व्‍यक्ति कार्तिक पूर्णिमा के दिन इस झील में पवित्र डुबकी लगाता है तो उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इसके अलावायहां मान्‍यता है कि पुष्‍कर झील में स्‍नान करने से उस मनुष्‍य के सारे पाप धुल जाते हैं और कई प्रकार की त्‍वचा संबंधी रोग भी दूर हो जाते हैं।
पुष्कर सरोवर में माधवी, अनादि और मैं ( मार्च 2008) 
 स्नान के बाद झील के तट पर आप परिवार में शांति समृद्धि के लिए पूजा भी करवा सकते हैं। इसके लिए वहां पंडित जी आपको हमेशा मौजूद मिलेंगे। साल 2008 में पुष्कर झील के पास भ्रमण करने के दौरान एक पुजारी जी मिल गए। उन्होंने शांति समृद्धि के लिए पूजा करवाने का प्रस्ताव रखा। मैंने पूछा, आप दक्षिणा कितनी लेंगे। उन्होंने कहा, जो श्रद्धा हो दे देना। उन्होंने पूरे विधि विधान से पूजन कराया। अंत में मैंने अपनी श्रद्धा से एक राशि उन्हें प्रदान की। वे बिना कुछ बोले दक्षिणा लेकर चले गए। 

कार्तिक में लगता है विशाल मेला -
  पुष्कर कार्तिक पूर्णिमा के समय विशाल मेला लगता है। इस मेले मे बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक भी आते हैं। देश भर से हजारों हिन्दु लोग इस मेले में आते हैं। मेले में ऊंट और राजस्थानी संस्कृति खास आकर्षण होती है।



पुष्कर शहर में प्रवेश करते ही शांति कुंज हरिद्वार की ओर से निर्मित गायत्री शक्ति पीठ बना हुआ है। इसके अलावा पुष्कर में  नृसिंह मन्दिरझूलेलाल मन्दिरप्राचीन रंगनाथ मन्दिर प्रमुख हैं। सरोवर के पास पहाड़ी पर सावित्री मंदिर भी है। पुष्कर में ऊंट की सवारी का आनंद सालों भर लिया जा सकता है। विदेशियों को पुष्कर इतना भाता है कि सालों भर सैकड़ो विदेशी यहां डेरा जमाए हुए मिलते हैं।
-  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( PUSHKAR, BARHMA TEMPLE, AJMER, RAJSTHAN )