Saturday, September 1, 2012

जौरा से श्योपुर ऑन स्पेशल गेज ( 3)

जौरा रेलवे स्टेशन प ट्रेन का इंतजार। 
सुबह नौ बजे हैं। धूप तीखी होने लगी है। हमारे लिए चुनौती है ठसाठस भरी रेल में दो सीटें जुगाड़ कर लेना। लेकिन किसी तरह एक डिब्बे हम अपने लिए दो सीटों का जुगाड़ कर ही लेते हैं। ट्रेन में बैठे लोग हमें बाहरी मेहमान समझ कर हमारे लिए जगह बना देते हैं। इसके बाद ट्रेन कुलांचे भरने लगती है। लोग बता रहे हैं कि हाल ही में इस स्पेशल गेज की इस ट्रेन में डीजल इंजन लग गया है इसलिए अब अपेक्षाकृत तेज गति से चलती है।

ट्रेन के डिब्बों में हमने देखा लगभग हर यात्री ने छोटी छोटी पानी की थैलियां लटका रखी हैं। कपड़े की थैली में पानी हमने पहली बार देखी। मई की गर्मी में प्यास तो खूब लगती है। यहां पानी के लिए खास तरह की मश्क देखी। चिलचिलाती गर्मी में इस इलाके में लोग पीने का पानी लेकर चलते हैं एक कपड़े की थैली में । इसमें पानी देर तक ठंडा रहता है।



वाह परसराम वाह - ट्रेन में बैठते ही हमारी मुलाकात परसराम से होती है। परसराम ने बताया कि वह अपने गांव के लोगों की तुलना में ज्यादा बुद्धिमान है। क्योंकि वह खेतीबाड़ी के साथ साथ दूसरे धंधे करके भी रुपया कमा लेता है। वह खुद का सामाजिक कार्यकर्ता भी बताता है। एक गांधी आश्रम के कार्यकर्ताओं द्वारा चलाए जा रहे साक्षरता अभियान में हिस्सा लेकर उसने पढ़ना लिखना भी सीख लिया है। बड़े ही शान से कहता है कि अब उसे कोई बेवकूफ नहीं बना पाता। वह गांव के लोगों की चिट्ठियां भी बांचता है। शहर जाकर लोगों के लिए खरीददारी भी करता है। अब गांव के लोग उसे बड़े काम का आदमी समझते हैं। 

उधर, ट्रेन अपनी गति से दौड़ती हुई कैलारस
, सबलगढ़, आदि स्टेशनों को पार करती हुई चंबल के बीहड़ के बीच से गुजर रही है। वही बीहड जहां कभी डाकू रहते थे। परसराम ने बताया कि वह पहले बिल्कुल निरक्षर था। महात्मा गांधी सेवा आश्रम के लोगों का गांव में शिविर लगा तो वहां उसने पढ़ना सीख लिया। अब मैं अखबार भी पढ़ लेता हूं। मुझे कोई ठग नहीं सकता। मौसम के मुताबिक खेती के साथ दूसरे धंधे भी कर लेता हूं।

रास्ते में कूनो नदी आई । इस पर बना है इस छोटी ट्रेन लाइन का लंबा रेल पुल। हमारे साथ बैठे चंबल नहर परियोजना के अभियंता श्री शर्मा बताते हैं कि इस नदी के उपर से साइफन द्वारा नहर भी निकाली गई है। वे बताते हैं कि साल  1953-54 के समय ये पहला प्रयोग था। इस नहर से आसपास के गांव में खेतों की सिंचाई होती है। कूनो चंबल की सहायक नदी है। इसके साथ ही है कूनो पालपुर अभ्यारण्य, जहां कई तरह के जंगली जानवर पाए जाते हैं।

तभी गाड़ी दुर्गापुरी नामक रेलवे स्टेशन पर रुकी। प्लेटफार्म के सामने ही सीसे का बना अद्भुत मंदिर दिखाई देता है। इस मंदिर को देख हरिद्वार का पावन धाम याद आ गया। इतना समय मिला कि हमने ट्रेन से उतर कर मां दुर्गा के दर्शन किए। फिर ट्रेन पर सवार हो गए। शाम को चार बजे के आसपास ट्रेन अपने आखिरी रेलवे स्टेशन श्योपुर कलां पहुंच गई। हमने यहां से महात्मा गांधी सेवा आश्रम श्योपुर का पता पूछा और अपने गंतव्य की ओर चल पड़े। 

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com