Thursday, August 16, 2012

महापंडित राहुल सांकृत्यायन और दार्जिलिंग

दार्जिलिंग में राजभवन की सड़क पर पैदल पैदल चलते हुए अचानक हमलोग रुक जाते हैं। सड़क के किनारे महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी एक प्रतिमा लगी हुई है। दरअसल राहुल जी ने यहीं पर आखिरी सांस ली थी। हम रुक कर इस प्रतिमा को निहारने लग जाते हैं।

देश के खूबसूरत हिल स्टेशनों में से एक दार्जिंलिंग से दो महान लोगों का एक जैसा संबंध है। महान लेखक, सैलानी और विद्वान राहुल सांकृत्यायन ने अपनी आखिरी सांस दार्जिंलिंग में ली। वहीं बंगाल के स्वतंत्रता आंदोलन के एक और बड़े नेता देश बंधु चितरंजन दास ने भी अंतिम सांसे दार्जिलिंग में ही लीं। सिस्टर निवेदिता का भी 11 अक्तूबर 1911 को दार्जिलिंग में 44 साल की आयु में निधन हुआ।

सीआर दास की याद में दार्जिलिंग शहर में चौरस्ता पास एक सड़क का नाम रखा गया है सीआर दास रोड। इसी रोड पर आगे चलने पर सीआर दास के याद में एक म्यूजिम बना है। उसी घर में इस म्यूजिम को बनाया गया है जहां सीआर दास ने आखिरी वक्त गुजारा। 16 जून 1925 को सीआर दास ने यहां आखिरी सांस ली। अगर आपकी आजादी के आंदोलन का इतिहास और उससे जुडे मील के पत्थरों को देखने में रूचि है तो सीआर दास रोड और म्यूजियम की जरूर जाएं। ये म्यूजिम रोज दस से चार बजे तक खुला रहता है।



दार्जिलिंग के राजभवन रोड पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन की याद में उनकी प्रतिमा लगाई गई है। इस प्रतिमा के साथ लगे संगरमरमर पट पर राहुल सांकृत्यायन के दार्जिंलिंग के आखिरी दिनों के बारे में लिखा गया है। ये महज संयोग ही था कि हिमालय के बारे में सबसे ज्यादा शोध करने वाले राहुल सांकृत्यायन ने हिमालय की गोद में ही आखिरी सांसे लीं। राहुल जी ने अपने जीवन में दुनिया के कई देशों की यात्राएं कीं। काफी साहित्य लिखा। लंबे यात्रा वृतांत लिखे। पर अपने आखिरी समय गुजारने के लिए उन्होंने दार्जिलिंग को खास तौर पर चुना था। यहां की आबोहवा उन्हे काफी पसंद थी। 

राहुल जी 1960 के आसपास दार्जिंलिंग रहने आए थे। यूं तो वे पहले भी यहां आ चुके थे। इससे पहले वे कई साल उत्तराखंड के मसूरी में भी रहे। जब उनकी मधुमेह की बीमारी काबू नहीं हो सकी तो वे उपचार के लिए रुस भी गए। पर वे रुस से फिर दार्जिंलिग लौट आए। लौटने के सात महीने बाद उनका निधन हो गया। 

सत्तर साल की अवस्था में 14 अप्रैल 1963 को उच्च रक्त चाप से पीड़ित होने के बाद उन्होंने प्रकृति की गोद में अंतिम सांसें ली। आखिरी वक्त में उन्हें मधुमेह की भी बीमारी थी। राहुल जी का जन्म उत्तर प्रदेश आजमगढ़ जिले में 9 अप्रैल 1893 को हुआ था। उनका पहला नाम केदारनाथ पांडे था। 
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उनकी समाधि के नीचे राहुल जी का प्रिय विचार लिखा है - बेड़े की तरह पार उतरने के लिए मैंने विचारों को स्वीकार किया। न की सिर पर उठाए उठाए फिरने के लिए। 
राहुल  सांकृत्यायन महान घुमक्कड़ थे। अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक  मेरी जीवन यात्रा में वे एक शायर को  पंक्तियां लिखते हैं - सैर कर दुनिया की  गाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगी अगर रही भी तो नौजवानी फिर कहां।  तो उस महान सफर के अंतिम सफर को विराम यहां आकर मिला। 

राहुल सांकृत्यायन भबन - राहुल जी की स्मृतियों को सम्मान देने के लिए दार्जिलिंग के नॉर्थ बंगाल यूनिवर्सिटी में एक भवन का नाम राहुल सांकृत्यायन भबन रखा गया है। इस भवन में वेस्ट बंगाल काउंसिल ऑफ हायर सेकेंडरी एजुकेशन का दफ्तर चलता है। इस दफ्तर के कार्य क्षेत्र में उत्तर बंगाल के जिले आते हैं। यहां पर भी राहुल सांकृत्यायन की एक प्रतिमा लगाई गई है। 
दार्जिलिंग परिचय पुस्तक लिखी -  राहुल जी की पुस्तक दार्जिलिंग परिचय सन 1950 में आधुनिक पुस्तक भवन से प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक में 13 अध्याय हैं। इसमें वे लिखते हैं - नागाधिराज हिमालय विश्व में सुंदरतम गिरिमाला है। पुस्तक में उन्होंने दार्जिलिंग का इतिहास, भूगोल और इसके सिक्किम और भूटान से रिश्तों के बारे में भी लिखा है। सन 1835 में सिक्किम के राजा ने ब्रिटिश सरकार को दार्जिलिंग की भूमि भेंट में प्रदान की थी। इससे पहले दार्जिलिंग सिक्किम का हिस्सा हुआ करता था। ऐसी तमाम जानकारियां इस पुस्तक में है। 

बौद्ध धर्म स्वीकार लिया था - वैसे तो उनका जन्म के बाद नाम केदारनाथ पाडे रखा गया था। पर वे गौतम बुद्ध के विचारों से इतने प्रभावित हुए बौद्ध बन गए। राहुल नाम तभी उन्होंने धारण किया। सांकत्य गोत्रीय होने के कारण अपना नाम रखा राहुल सांकृत्यायन। उनका पूरा जीवन घुम्मकड़ी में बीता। उनकी साहित्यिक यात्रा 1927 में आरंभ हुई। उन्होंने कुल 150 के आसपास किताबें लिखी थीं। उनकी घुम्मकड़ी और लेखनी साथ-साथ चलती रही। 


कई महान लोगों का इस नगर से रिश्ता -  वैसे दार्जिलिंग से कई और महान लोगों को संबंध रहा है। गांधी जी एक बार 1925 में दार्जिलिंग पहुंचे थे, लेकिन उन्होंने सिलिगुड़ी से दार्जिलिंग की लगभग 84 किलोमीटर की पैदल यात्रा की थी। 

कवि गुरु रविंद्रनाथ टैगोर को तो दार्जिंलिंग काफी पसंद था। वे अपने जीवन में तीन बार दार्जिलिंग पहुंचे थे। आखिरी बार वे अपने बेटे के साथ दार्जिलिंग आए। वहीं अंगरेजी के महान लेखक मार्क ट्वेन को भी दार्जिलिंग शहर बहुत पसंद था। सत्यजीत राय तो अपनी फिल्मों में दार्जिलिंग को जगह देना नहीं भूलते थे।

- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
 ( RAHUL SANKRITYAN, DARJEELING, BENGAL , GANDHI, TAGORE )

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