Monday, August 6, 2012

सैंया गइले कलकतवा ए सजनी...


सैंया गइले कलकतवा ए सजनी... भोजपुरी का ये लोकप्रिय गीत है। मतलब बिहार के भोजपुरी क्षेत्र से कोलकाता जाने की पुरानी परंपरा रही है। हमलोग चार दिनों बाद एक बार फिर कोलकाता प्रवेश द्वार यानी हावड़ा रेलवे स्टेशन पर पहुंच रहे हैं। एक दिन पहले रात को आठ बजे हम पुरी से जगन्नाथ एक्सप्रेस में सवार हुए थे। हमारा आरक्षण एसी टू में था। ट्रेन नियत समय पर हावड़ा रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई है। रेल से उतरते ही हम विशाल भीड़ का हिस्सा बन गए हैं। उसी भीड़ का जिसका हिस्सा भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के विदेसिया का नायक था। उसी भीड़ का हिस्सा कभी दो बीघा जमीन का नायक था। कोलकाता एक तिलिस्मी शहर है। इसका एहसास हमें अगले कुछ दिनों में हुआ था।

आशियाना की तलाश में : हमें कोलकाता में अगले कुछ दिन रहना, है तो हमें एक आशियाना की तलाश है। दरअसल पुरी की तरह हमने यहां कोई होटल या धर्म शाला की बुकिंग नहीं की है। हमारे पास एक पता है राजकुमार जायसवाल का। वे कोलकाता के बेहाला इलाके में रहते हैं। वे टिंबर ट्रेडर हैं। उनका पता हमारे कन्हौली के पारिवारिक मित्र जय प्रकाश जायसवाल ने दे रखा है। हमलोग हावड़ा स्टेशन के बाहर टैक्सी बुक करके बेहाला पहुंच गए हैं। पर यहां पहुंचने पर एक समस्या आ गई।

बिन बुलाए मेहमान की तरह - दरअसल जय प्रकाश जायसवाल ने उन्हें हमारे आने की कोई सूचना नहीं दे रखी है। जय प्रकाश इन दिनों नागालैंड के डिमापुर में हैं। वहां से वे कोलकाता लकड़ियां भेजवाते हैं। कोई सूचना न होने के कारण हम राजकुमार जी के लिए बिन बुलाए मेहमान की तरह हैं। वह भी एक साथ आठ लोग। तो उन्होंने हमारे रहने का कोई इंतजाम नही कर रखा है। सारी बात जानने के बाद अपने दो मंजिला घर के उपर वाले कमरे में अस्थायी तौर पर ट्का दिया है। इसके बाद उन्होंने अपने एक स्टाफ को मेरे पिताजी के साथ लगाया दो हमारे कोलकाता में कुछ दिन ठहरमे लायक पारिवारिक माहौल वाला होटल या धर्मशाला तलाश सकें। दिन भर की तलाश के बाद शाम को पिताजी लौट आए। उन्होंने कई होटल देखे जो पसंद नहीं आए। 

बकौल पिताजी वहां पारिवारिक माहौल नहीं था। तो कुछ हमारे बजट में नहीं थे। पर काफी खोजबीन के बाद हमारे रहने का इंतजाम हो गया है।
हमलोग फिर एक टैक्सी बुक कर नई जगह की ओर चले। ये जगह कोलकाता का बड़ा बाजार का इलाका है। बहुत भीड़भाड़ के बीच एक भवन है। पहली से तीसरी मंजिल के बीच फूलचंद मुकीम जैन धर्मशाला है। इसमें एक फेमिली रूम हमें मिला है। इसमे हमारा पूरा परिवार एक साथ रह सकता है।

कोलकाता के बड़ा बाजार में : यहां देर रात तक मोटर की चिलपों सुनाई देती है। पर आसपास में खाने-पीने के भी ढेर सारे विकल्प हैं। धर्मशाला के मैनेजर यूपी के बरेली के रहने वाले तिवारी जी हैं। यहां पहुंचने पर हमने चैन की सांस ली पर रहने की जगह तलाश करने में पूरा एक दिन बर्बाद हो गया। इसका इस्तेमाल हमलोग घूमने में कर सकते थे। पर यह आज की तरह आनलाइन बुकिंग का दौर नहीं था। इसलिए कोलकाता जैसे तिलस्मी शहर में रहने की जगह तालश करने में हमें इतना समय लग गया। पर अच्छी बात ये रही की ये जगह कोलकाता के केंद्र में है। यहां से कहीं भी जाने के लिए हमेशा बसें मिल जाती हैं। पास के एमजी रोड से ट्राम भी मिल जाती है। सबसे बड़ी बात की ये हिंदी भाषी इलाका है। तो बड़ा बाजार की बतें आगे भी जारी रहेंगी।

: विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
(KOLKATA,  BARA BAZAR, BEHALA, DHARAMSHALA)

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