Tuesday, August 21, 2012

हैदराबाद में वनस्थलीपुरम के वे दिन


जनवरी 2007 के आखिरी दिन थे। पानीपत छोड़कर मैं हैदराबाद जा रहा था, ईटीवी की नौकरी ज्वाएन करने। एक माह पहले इंटरव्यू देकर आया था। राजीव गुप्ता अमर उजाला छोड़कर आ रहे थे और मैं दैनिक भास्कर। तय हुआ था कि हमलोग सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन पर मिलेंगे। हम दोनों की ट्रेन सुबह सुबह पहुंचने वाली थी। तो यहीं मुलाकात हुई। सिकंदराबाद स्टेशन से रामोजी फिल्म सिटी के लिए हमने एक आटो मिलकर बुक किया। इंटरव्यू देने आए थे तब तो गाड़ी लेने आई थी। हमलोगों ने रामोजी फिल्म सिटी के गेट पर रिपोर्ट किया। हमारी चिट्ठी देखने के बाद हमें ईटीवी के प्रशासनिक भवन में एचआर डिपार्टमेंट तक जाने का इंतजाम किया गया। बतादूं कि विजयवाड़ा हाईवे से ईटीवी का मुख्यद्वार कोई आठ किलोमीटर अंदर है। मुख्यद्वार से टीवी चैनल के दफ्तर दो किलोमीटर और अंदर। सभी गेटों पर कड़ी सुरक्षा रहती है। एक घंटे की औपचारिकता के बाद हम ईटीवी के सदस्य बन चुके थे। हमें मध्य प्रदेश चैनल में भेजा गया। एक दो घंटे डेस्क पर गुजारने के बाद हम अपने सामान के साथ वहां चले जहां हमारे ठहरने का इंतजाम था। यूके गुडा गेस्टहाउस। यह ईटीवी के प्रवेश द्वार से पांच किलोमीटर पहले एक गांव है। यहां ईटीवी ने अपने स्टाफ के लिए कुछ फ्लैट और अतिथिगृह बनवा रखा है। यहां हमें एक हफ्ते रहने की मोहलत थी।
वनस्थलीपुरम का साईं मंदिर 
खैर हफ्ते भर बाद हमने वनस्थली पुरम में अपने लिए घर तलाश लिया था। पर इस यूके गुडा की भी कुछ यादें हैं। यहीं पर ईटीवी के वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा परिवार के साथ रहते थे। यूकेगुडा गांव में कुछ गिनी चुनी दुकानें थीं। रामोजी फिल्म सिटी की तब हैदराबाद के बाहरी इलाके हयात नगर से भी दूरी 10 किलोमीटर थी। यूकेगुडा के फ्लैट ईटीवी के वरिष्ठ पत्रकारों के लिए उपलब्ध थे। पर गांव होने के कारण वहां कोई रहना नहीं चाहता था।
हमलोगों ने दौड़भाग कर वनस्थलीपुरम में अपने लिए एक घर ढूंढ लिया।अच्छी बात थी कि यहां किराये मकान तलाशने के लिए दिल्ली या लुधियाना की तरह किसी प्रापर्टी डीलर के शरण में नहीं जाना पड़ा। जन संपर्क से मकान मिल गया। वनस्थलीपुरम इलाके में रहने वाले सभी ईटीवी के साथी नए लोगों को मकान तलाशने में एक दूसरे की मदद करते थे। इन्ही संपर्क सूत्र से हम साईं मंदिर के पास प्रशांतनगर में एक मकान में पहुंचे।

मकान मालकिन हिंदी नहीं समझ पा रही थीं और हम तेलगु। पर उनके पास मौजूद एक बिहारी मजदूर ने काम आसान किया। पता चला फ्लैट खाली जरूर है पर आप शाम को आएं तो गृह स्वामी आपसे मिलकर अंतिम निर्णय करेंगे। शाम को हमलोग पहुंच गए, बातचीत हुई। मकानमालिक रत्नाराव जी ने हमारे आईकार्ड देखे। उन्होंने पड़ोस के रहने वाले अपने एक रामोजी फिल्म सिटी में काम करने वाले मित्र को बुलाया। उसने तस्दीक की कि हम ठीक ठाक लोग हैं। मकान मिल गया। इसके बाद रत्नाराव जी के घर में आठ माह रहना हुआ। पर उनसे ऐसे रिश्ते बन गए कि हैदराबाद हमारा दूसरा घर बन गया, हमेशा के लिए।
वनस्थलीपुरम से ईटीवी दफ्तर जाने के लिए बसें मिलती थीं। हर शिफ्ट के समय के हिसाब से बसें मिलती थीं। रामोजी फिल्म सिटी का ट्रांसपोर्ट सिस्टम कुछ ऐसा था जो हैदराबाद के हर इलाके से स्टाफ को लेकर फिल्म सिटी आता था। क्या मजाल की कोई बस कभी 2 मिनट भी लेट चलती हो। हर बस में एक बस लीडर होता था। वह हमारे स्टाफ के बीच का व्यक्ति होता था। वह बस के अनुशासन का ख्याल रखता था। एक दो बार ऐसा हुआ कि बस में लड़ाई भी हो गई। अनुशासन समिति तक शिकायत गई। लड़ने वालों को मीठी चेतावनी दी गई। उसे बस लीडर के नेता कुछ मासिक मानदेय अलग से मिलता था। खास तौर पर रात को बस से दफ्तर का काम खत्म कर आते समय बस के अंदर गीत संगीत का माहौल बनता था। वो भी क्या दिन थे।
वनस्थलीपुरम में एक लघु भारत बसता था। ईटीवी गुजराती, मराठी, कन्नड़, तेलुगु, ओडिया के स्टाफ यहां रहते थे तो हिंदी पट्टी से राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, यूपी, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छ्त्तीसगढ के लोग भी रहते थे। शाम को वनस्थलीपुरम के बाजार में टहलते हुए जाने पहचाने ईटीवीयन चेहरे दिखाई दे जाते थे।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(RAMOJI FILM CITY, HYDRABAD, UKGUDA, VANASTHALIPURAM )