Friday, August 31, 2012

जौरा से श्योपुर ऑन स्पेशल गेज ( 3)

जौरा रेलवे स्टेशन प ट्रेन का इंतजार। 
सुबह नौ बजे हैं। धूप तीखी होने लगी है। हमारे लिए चुनौती है ठसाठस भरी रेल में दो सीटें जुगाड़ कर लेना। लेकिन किसी तरह एक डिब्बे हम अपने लिए दो सीटों का जुगाड़ कर ही लेते हैं। ट्रेन में बैठे लोग हमें बाहरी मेहमान समझ कर हमारे लिए जगह बना देते हैं। इसके बाद ट्रेन कुलांचे भरने लगती है। लोग बता रहे हैं कि हाल ही में इस स्पेशल गेज की इस ट्रेन में डीजल इंजन लग गया है इसलिए अब अपेक्षाकृत तेज गति से चलती है।

ट्रेन के डिब्बों में हमने देखा लगभग हर यात्री ने छोटी छोटी पानी की थैलियां लटका रखी हैं। कपड़े की थैली में पानी हमने पहली बार देखी। मई की गर्मी में प्यास तो खूब लगती है। यहां पानी के लिए खास तरह की मश्क देखी। चिलचिलाती गर्मी में इस इलाके में लोग पीने का पानी लेकर चलते हैं एक कपड़े की थैली में । इसमें पानी देर तक ठंडा रहता है।



वाह परसराम वाह - ट्रेन में बैठते ही हमारी मुलाकात परसराम से होती है। परसराम ने बताया कि वह अपने गांव के लोगों की तुलना में ज्यादा बुद्धिमान है। क्योंकि वह खेतीबाड़ी के साथ साथ दूसरे धंधे करके भी रुपया कमा लेता है। वह खुद का सामाजिक कार्यकर्ता भी बताता है। एक गांधी आश्रम के कार्यकर्ताओं द्वारा चलाए जा रहे साक्षरता अभियान में हिस्सा लेकर उसने पढ़ना लिखना भी सीख लिया है। बड़े ही शान से कहता है कि अब उसे कोई बेवकूफ नहीं बना पाता। वह गांव के लोगों की चिट्ठियां भी बांचता है। शहर जाकर लोगों के लिए खरीददारी भी करता है। अब गांव के लोग उसे बड़े काम का आदमी समझते हैं। 

उधर, ट्रेन अपनी गति से दौड़ती हुई कैलारस
, सबलगढ़, आदि स्टेशनों को पार करती हुई चंबल के बीहड़ के बीच से गुजर रही है। वही बीहड जहां कभी डाकू रहते थे। परसराम ने बताया कि वह पहले बिल्कुल निरक्षर था। महात्मा गांधी सेवा आश्रम के लोगों का गांव में शिविर लगा तो वहां उसने पढ़ना सीख लिया। अब मैं अखबार भी पढ़ लेता हूं। मुझे कोई ठग नहीं सकता। मौसम के मुताबिक खेती के साथ दूसरे धंधे भी कर लेता हूं।

रास्ते में कूनो नदी आई । इस पर बना है इस छोटी ट्रेन लाइन का लंबा रेल पुल। हमारे साथ बैठे चंबल नहर परियोजना के अभियंता श्री शर्मा बताते हैं कि इस नदी के उपर से साइफन द्वारा नहर भी निकाली गई है। वे बताते हैं कि साल  1953-54 के समय ये पहला प्रयोग था। इस नहर से आसपास के गांव में खेतों की सिंचाई होती है। कूनो चंबल की सहायक नदी है। इसके साथ ही है कूनो पालपुर अभ्यारण्य, जहां कई तरह के जंगली जानवर पाए जाते हैं।

तभी गाड़ी दुर्गापुरी नामक रेलवे स्टेशन पर रुकी। प्लेटफार्म के सामने ही सीसे का बना अद्भुत मंदिर दिखाई देता है। इस मंदिर को देख हरिद्वार का पावन धाम याद आ गया। इतना समय मिला कि हमने ट्रेन से उतर कर मां दुर्गा के दर्शन किए। फिर ट्रेन पर सवार हो गए। शाम को चार बजे के आसपास ट्रेन अपने आखिरी रेलवे स्टेशन श्योपुर कलां पहुंच गई। हमने यहां से महात्मा गांधी सेवा आश्रम श्योपुर का पता पूछा और अपने गंतव्य की ओर चल पड़े। 

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com



Thursday, August 30, 2012

सौ साल पुरानी स्पेशल गेज पर सफर (2)

क्या करें मजबूरी है..जाना जरूरी है...
साक्षरता कार्यक्रम के लिए हमें पहुंचना था श्योपुर। जौरा के महात्मा गांधी सेवा आश्रम से मैं और दिग्विजय भाई अपने अगले सफर के लिए चल पड़े। साल 1992 में श्योपुर तब एक तहसील हुआ करता था, मुरैना जिले का, पर अब जिला बन चुका है। ग्वालियर से 200 किलोमीटर से ज्यादा दूर। ग्वालियर से श्योपुर के बीच चलती है छोटी लाइन की ट्रेन। ये ट्रेन मीटर गेज नहीं, नैरो गेज नहीं बल्कि स्पेशल गेज की है।
पटरियों के बीच चौड़ाई 61 सेंटीमीटर (610 एमएम) यानी कालका शिमला से भी छोटे हैं इसके डिब्बे। ट्रेन ग्वालियर से चलती है लेकिन हमने इसमें सफर शुरू किया जौरा अलापुर रेलवे स्टेशन से। ग्वालियर से श्योपुर कलां तक का रेल मार्ग 198 किलोमीटर लंबा है। अपने स्पेशल गेज में ये दुनिया की सबसे लंबी और सबसे पुरानी रेल सेवा है जो चालू है। 


ग्वालियर श्योपुर मार्ग पर जौरा रेलवे स्टेशन। 
ग्वालियर के महाराजा माधव राव सिंधिया ने इस रेल परियोजना पर काम 1879 में शुरू कराया था। 1904 में इस रेल सेवा को ग्वालियर लाइट रेलवे के नाम से शुरू कराया था। ग्वालियर से जौरा तक का मार्ग 1904 में चालू हो गया था। इसका श्योपुर कलां तक पूरा मार्ग 1909 में आरंभ हो सका।

 यानी सौ साल से ज्यादा पुरानी हो चुकी है ये रेल। ग्वालियर से चल कर 28 स्टेशनों से होकर गुजरने वाली ये ट्रेन इलाके 250 से ज्यादा गांवों के लिए लाइफलाइन है। यानी चंबल घाटी के लोगों के लिए ये ट्रेन कोई टॉय ट्रेन नहीं है। जंगल और गांव से होकर इस ट्रेन से सफर करना लोगों की मजबूरी भी है। कई इस ट्रेन के छत पर भी लोग सफर करते दिख जाते हैं।


कभी भाप इंजन चलता था। 
ग्वालियर से सुबह छह बजे खुलने वाली पहली ट्रेन शाम चार बजे श्योपुर पहुंचाती है। अब ट्रेन में डीजल इंजन लग गया है। अधिकतम स्पीड 50 किलोमीटर घंटा है। इंजन डिब्बे सब कुछ अलग हैं। कई बार बिगड़ जाए या पटरी से उतर जाए तो रेल मार्ग बंद भी जाता है।
भले ही इसके मार्ग में 28 स्टेशन हैं लेकिन कई बार गांव के लोगों के आग्रह पर जरूरत पड़ने पर इस ट्रेन को ग्रामीण कहीं भी रोकवा लेते हैं। कई दशकों से इस लाइट रेलवे को बड़ी लाइन में बदलवाने की मांग चल रही है। सुबह-सुबह जौरा रेलवे स्टेशन पर हम टिकट लेकर श्योपुर कलां जाने वाली ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। पर ट्रेन आई तो पहले से ही खचाखच भरी हुई थी।



vidyutp@gmail.com

Wednesday, August 29, 2012

चंबल के आंचल में दो महीने (1)

मई और जून 1992 का महीना। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में ग्रीष्मावकाश की घोषणा होने के साथ हमने तय किया कि इस बार घर नहीं जाकर कहीं घूमने जाना है। इसी दौरान हमारे पास महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा मुरैना से संपूर्ण साक्षरता अभियान में बतौर शिक्षक पढ़ाने का आमंत्रण आया। हमने एक महीने से कुछ ज्यादा वक्त वहां बीताने का तय किया। वाराणसी से बुंदेलखंड एक्सप्रेस में मैं और दिग्विजय नाथ सिंह सवार हुए। हमारी ट्रेन, इलाहाबाद के बाद चित्रकूट, बांदा, कालांजर, महोबाओरछाझांसी होती हुई ग्वालियर पहुंची। ग्वालियर में हम युवा साथी आनंद पंडित से उनके घर जाकर मिले। ग्वालियर का जय विलास पैलेस किला देखा। उसके बाद हम ग्वालियर से बस से महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा पहुंचे।

ये वही आश्रम है जहां 1972  में  जय प्रकाश नारायण के सानिध्य में चंबल के डाकूओं के सरेंडर हुए। ये आश्रम अब डाकूओं के परिवारों के पुनर्वास के लिए कई तरह के प्रोजेक्ट चलाता है। जौरा आश्रम में कई तरह के खादी ग्रामोद्योग की वस्तुओं का उत्पादन होता है लेकिन आश्रम की बनी हुई दरी उत्कृष्ट गुणवत्ता वाली मानी जाती है। 

जाने माने गांधीवादी कार्यकर्ता पीवी राजगोपाल ने इस आश्रम में लंबा वक्त गुजारा है। यहां के लोग उन्हें बड़े सम्मान से राजू भाई के नाम से याद करते हैं। इस आश्रम में मैं लगातार कई बार जा चुका हूं। राजू भाई के बाद अब रणसिंह परमार इस आश्रम की व्यवस्था देखते हैं। राष्ट्रीय युवा योजना के निदेशक एस एन सुब्बराव ने 1970 में इस आश्रम की स्थापना की थी।


चंबल नदी पर मुरैना और धौलपुर के मध्य पुल। 

सालों इस इलाके में रहकर डाकुओं से संपर्क कर उन्हें सरेंडर के लिए तैयार करने में उनकी बड़ी भूमिका रही। कभी चंबल घाटी में आतंक का पर्याय रहे ये डाकू सरेंडर के बाद इस आश्रम को अपना घर मानते है।
वे बागी साल में कई बार होने वाले कार्यक्रमों में इस आश्रम में आते भी हैं। जौरा और आसपास के गांवों में लोगों में जागरूकता लाने के लिए सुब्बराव जी ने 20 से ज्यादा शिविर 70 के दशक में लगाए जिसमें देश के कोने कोने से युवाओं ने आकर श्रमदान किया। ऐसा ही एक गांव है बागचीनी जहां कई शिविर लगाए गए। तो हम भी इन गर्मियों में अपना समय चंबल के आंचल में गुजारने के लिए पहुंच गए हैं।

 - विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com

(CHAMBAL, JOURA, MORENA, MP, SHEOPUR, SUBBARAO, DIGVIJAY NATH ) 

Tuesday, August 28, 2012

दार्जिलिंग टॉय ट्रेन की पटरियों पर बर्फी ((07))


साल 2012 की बेहतरीन फिल्मों में है बर्फी। रणबीर कपूर ने बर्फी में बिना बोले शानदार अभिनय किया है। कभी वे दादा राजकपूर की याद दिलाते हैं तो कभी शम्मी कपूर की। सबसे बड़ी बात कि बर्फी के ज्यादातर हिस्सों की शूटिंग दार्जिलिंग में हुई है। एक बार फिर हिंदी फिल्मों में दार्जिलिंग।

 इससे पहले आपने अराधना ( मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू ), परीणिता ( ये हवाएं गीत ) ,  झूमरू ( किशोर कुमार) में दार्जिलिंग देखा होगा। राजकपूर ने अपनी फिल्म मेरा नाम जोकर के पहले हिस्से में दार्जिलिंग हिमालयन रेल को दिखाया था। याद करें गीत...ऋषि कपूर के स्कूल के बंद होने और खुलने का हिस्सा। लेकिन दार्जिलिंग का सबसे खूबसूरत चित्रण श्वेत श्याम फिल्म हरियाली और रास्ता और हमराज में देखने को मिलता है। हरियाली और रास्ता में मनोज कुमार माला सिन्हा के बचपन का प्यार दार्जिलिंग की हरी भरी वादियों में पनपता है। तो हमराज में नीले गगन के तले धरती का प्यार पले...और भी तमाम खूबसूरत नजारे को समेटने की कोशिश हुई है। अब बर्फी के साथ आप दार्जिलिंग के हिमालयन ट्रेन के खूबसूरत नजारे देख सकते हैं।
फिल्म बर्फी में 1972 कहानी बताने के लिए खास तौर पर डीएचआर में स्टीम इंजन लगाया गया है।

फिल्म बर्फी में लोहे की पटरियों पर बर्फी की अपनी पहिए वाली ठेला गाड़ी दौड़ती नजर आती है। टॉय ट्रेन की पटरियों के साथ फिल्म के नजारे बड़े शानदार हैं। यहां पर प्रियंका का अभिनय भी काफी अच्छा है। न सिर्फ रेलगाड़ी बल्कि दार्जिलिंग शहर की गलियां, होटल, घंटाघर सब कुछ है बर्फी में। कहानी दार्जिलिंग से कोलकाता जाती है फिर दार्जिलिंग लौटती है।

टॉय ट्रेन, चाय के बगानों की हरियाली के बीच एक मूक प्रेम की इतनी सुंदर कहानी को अनुराग बासु ने जिस खूबसूरती से कहने की कोशिश की है बर्फी एक सालों याद रखने लायक फिल्म बन गई है। एक ऐसी फिल्म जिसे न सिर्फ कुदरत के खूबसूरत नजारे बल्कि कहानी के लिहाज से भी आप दुबारा-तीबारा भी देख सकते हैं। साथ ही अपने बचपन के मरफी रेडियो के मुन्ना को भी याद कर सकते हैं।



-   ---- विद्युत प्रकाश मौर्य  
 ( DHR, DARJEELING HIMALAYAN RAILWAY )   
( डीएचआर 7) पहली कड़ी के लिए यहां जाएं 

Monday, August 27, 2012

फिल्मों में दार्जिलिंग हिमालयन रेल ((06))

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे ने हिंदी फिल्मकारों को हमेशा लुभाया है। श्वेत श्याम से लेकर रंगीन जमाने तक, तमाम फिल्मों में इसकी शूटिंग देखी जा सकती है। अगर आपको राजेश खन्ना शर्मिला टैगोर की फिल्म राधना का लोकप्रिय गीत याद हो- मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू....तो आपको याद आ जाएगी कि ये गीत दार्जिलिंग जाने वाली टॉय ट्रेन के साथ साथ फिल्माया गया है। गीत में राजेश खन्ना के साथ सुजीत कुमार खुली हुई जीप जा रहे हैं। वे गीत गा रहे हैं जबकि अभिनेत्री दार्जिलिंग की टाय ट्रेन से आ रही है।
यह पूरा गीत सफर में चलता है। ये गीत टाय ट्रेन के श्रेष्ठ गीतों में हैं। गीत अपने जमाने में खूब हिट भी हुआ था। गाने की शूटिंग दार्जिलिंग और सिलिगुड़ी के बीच कार्सिंयांग रेलवे स्टेशन के आसपास हुई है। गाने में पहाड़ के बल खाते रास्तों का सौंदर्य खूब उभर कर आया है। जितना फिल्म हिट हुई गाना भी उसके बराबर ही बजता रहा। आज भी रोमानी गीतों में इस गाने को काफी उपर रखा जाता है। 

फिल्म हमराज में दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन
 एक और फिल्म  है राजकुमार और सुनील  दत्त की हमराज जिसका एक बहुत प्यारा दृश्य दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन पर फिल्माया गया है। 1967 में आई इस फिल्म में जब सुनील दत्त दार्जिलिंग छोड़कर मुंबई के लिए जा रहे थे, तब अभिनेत्री विम्मी से उनकी आखिरी मुलाकात का दृश्य दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन पर फिल्माया गया है।यह फिल्म का बड़ा ही भावुक  दृश्य है। इसी फिल्म के गीत नीले गगन के तले...में भी डीएचआर के लोकोमोटिव पर अभिनेता राजकुमार के साथ अभिनेत्री को देखा जा सकता है। 

अब थोड़ा पीछे चलते हैं। 1961 में आई किशोर कुमार की फिल्म झुमूरू में टाइटिल सांग ही टाय ट्रेन पर फिल्माया गया है। श्वेत श्याम फिल्म की कास्टिंग मैं हूं झूम झूम झुमरू...गीत के साथ आरंभ होती है। किशोर कुमार की खूबसूरत फिल्मों में से एक है झुमरू।




कई सालों बाद एक बार फिर हिन्दी फिल्मों में दार्जिलिंग का सौन्दर्य देखने को मिला 2005 में आई फिल्म परिणिता में। शरतचंद्र की कहानी पर बनाई गई प्रदीप सरकार की इस खूबसूरत फिल्म का एक गाना ट्रेन पर फिल्माया गया है। सैफ अली खान की परिणिता में एक गीत ये हवाएं...टाय ट्रेन के साथ चलता है। साल 1992 में आई शाहरुख खान की एक राजू बन गया जेंटिलमैन भी में इस खिलौना ट्रेन को देखा जा सकता है। इस कामेडी फिल्म का चरित्र राजू दार्जिलिंग से मुंबई इंजीनियर बनने आता है।

अब 1970 में आई राजकपूर की कालजयी फिल्म मेरा नाम जोकर का पहला भाग याद करें। स्कूल के दृश्य के साथ थी दार्जिलंग की रेल। गर्मी की छुट्टी होने पर सारे बच्चे बोर्डिंग स्कूल से अपने अपने घर चले जाते हैं। फिर वे वापस आते हैं। राजू इन बच्चों का का और अपनी खूबसूरत मैडम का फूल लेकर ले स्वागत करता है। हाल के सालों में आई एक अंग्रेजी फिल्म दार्जिंलिंग लिमिटेड में भी इस टॉय ट्रेन को बड़ी खूबसूरती से फिल्माया गया है। इसके अलावा दर्जनों बांग्ला फिल्मों की शूटिंग दार्जिलिंग की टाय ट्रेन में हुई है।

साल 2016 के जुलाई में आई फिल्म इश्क क्लिक की शूटिंग दार्जिलिंग में हुई थी। इसमें दार्जिलिंग  हिमालयन रेल और चाय बगान के नजारे देखे जा सकते हैं। फिल्म की शुरुआत और क्लाइमेक्स दृश्य दार्जिलिंग के हैं। फिल्म में अध्ययन सुमन मुख्य भूमिका में हैं।



 ( DHR, DARJEELING HIMALAYAN RAILWAY )

- विद्युत प्रकाश मौर्य
( डीएचआर 5)  पहली कड़ी के लिए यहां जाएं 

Sunday, August 26, 2012

दार्जिलिंग हिमालयन रेल की जंगल सफारी ट्रेन ((05 ))


दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे लोगों की मांग पर जंगल सफारी का संचालन करता है। यह राइड सिलिगुड़ी से शुरू होकर तीनधारा रेलवे स्टेशन तक जाती और फिर वापस सिलिगुड़ी लौट आती है। ये राइड सैलानियों को महानदी वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की सैर कराती है। हालांकि ये राइड तभी चलाई जाती है जब सैलानियों की प्रयाप्त संख्या हो। 52551 जंगल सफारी स्पेशल 10 बजे सिलिगुड़ी से खुलती है और 12.30 बजे तीन धारा पहुंचती है। इसकी वापसी शाम को 3.30 बजे सिलिगुड़ी के लिए होती है। इस यात्रा के दौरान आप सुकना और तीनधारा के बीच जंगलों के नयनाभिराम दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। ट्रेन तीनधारा में सैलानियों को दोपहर के भोजन के लिए प्रयाप्त समय देती है।

डीएचआर रेलवे जंगल सफारी को तीन सेंकेड क्लास के कोच के साथ डीजल इंजन (लोको) से संचालित करती है। बी क्लास का एनडीएम 6 लोको तीन सवारी डिब्बों को खींचता है। एक तरफ का कुल सफर 30 किलोमीटर का है। जो लोग दार्जिलिंग नहीं जाना चाहते वे सिलिगुड़ी से ही खिलौना ट्रेन पर सफर का आनंद ले सकते हैं जंगल सफारी में जाकर। इसके साथ ही आप सफारी के दौरान तीनधारा में पिक्चर गैलरी और एगोनी प्वाइंट आदि इस यात्रा के दौरान देख सकते हैं। 2009 में जंगल सफारी को सैलानियों की संख्या कम होने के कारण बंद कर दिया गया था। पर 2011 में एक बार फिर जंगल सफारी को शुरू किया गया।


जंगल सफारी सैलानियों के बीच काफी लोकप्रिय है। आमतौर पर जंगल सफारी का संचालन शनिवाररविवार और छुट्टी के दिनों में किया जाता है। ज्यादा जानकारी के लिए यहां जाएं-http://dhr.indianrailways.gov.in/  जंगल सफारी के लिए टिकट सिलिगुड़ी जंक्शन रेलवे स्टेशन से प्राप्त किया जा सकता है।

स्टीम चार्टर ट्रेन  दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे सैलानियों के लिए स्टीम चार्टर ट्रेन का भी इंतजाम करता है। अगर आप एक बार फिर धुआं उड़ाती छोटी रेल गाड़ी का आनंद लेना चाहते हैं तो पूरी स्टीम चार्टर ट्रेन बुक कर सकते हैं। इस सफर में आप कई दशक पुराने दौर को याद कर सकते हैं, जब कोयला से चलने वाली धुआं उड़ाती ट्रेन शान से चलती थी। स्टीम चार्टर के सिंगल ट्रिप या राउंड ट्रिप के लिए ट्रैवल एजेंट या लोगों का समूह संपर्क कर सकता है।
डीएचआर से जुड़ी ट्रेनों की पूछताछ के लिए इन नंबरों पर (+91 354 2005734) और (+91 354 2345 253) सुबह नौ बजे से 5 बजे तक पूछताछ की जा सकती है।  

एक्टिवा के विज्ञापन में डीएचआर। 

( DHR, DARJEELING HIMALAYAN RAILWAY )

-    विद्युत प्रकाश मौर्य
(डीएचआर 5 ) पहली कड़ी के लिए यहां जाएं 

Saturday, August 25, 2012

डीएचआर - लाखों लोगों को करा रही थी सफर ((04))

दिल्ली के राष्ट्रीय रेल संग्रहालय में डीेएचआर के संरक्षित कोच। 
दार्जिलिंग हिमालयन रेल से सफर करने वाले यात्रियों की बात करें तो 1909-1910 में डीएचआर हर साल 1 लाख 74 हजार यात्रियों को ढो रहा था जबकि 47 हजार टन माल की भी ढुलाई हो रही थी। खास तौर पर दार्जिलिंग से चाय ट्रेन से तराई में पहुंचाई जाती थी। जब हिल कार्टरोड पर सिलिगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच बस और टैक्सी सेवा चलने लगी तब इस खिलौना ट्रेन में सवारियों की कमी आने लगी क्योंकि टैक्सी तीन घंटे में दार्जिलिंग पहुंचाती है तो ट्रेन छह घंटे में।

भूकंप के खतरे भी झेले - साल 1897 में डीएचआर को एक बड़े भूकंप का भी सामाना करना पड़ा। वहीं 1899 में एक तूफान को भी इस रेल मार्ग ने झेला। 1934 में बिहार बंगाल में आए भूकंप का दार्जिलिंग पर बहुत बुरा असर पड़ा। तब इस रेल मार्ग को भी बंद करना पड़ा था। बाद में ररखाव के बाद इसे फिर से चालू किया गया।


दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान मददगार - दूसरे विश्व युद्ध के दौरान घूम और दार्जिलिंग इलाके में सेना के शिविरों  में रसद आदि पहुंचाने में इस डीएचआर रेल मार्ग की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही। देश आजाद होने के बाद डीएचआर का भारत सरकार ने अधिग्रहण कर लिया। ये पहले आसाम रेलवे संगठन का हिस्सा बना। 1952 में यह नार्थ इस्टर्न रेलवे जोन का हिस्सा बन गया। 1958 में ये नार्थ इस्ट फ्रंटियर रेलवे जोन का हिस्सा बना।

विश्व धरोहर का दर्जा मिला -  1881 में चालू हुई दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे को यूनेस्को ने 1999 में विश्व धरोहर का दर्जा दिया। ऐसा दर्जा पाने वाली तब ये दुनिया की दूसरी रेलवे लाइन थी। राष्ट्रीय रेल संग्रहालय ने 29 जून 1998 को डीएचआर को विश्व धरोहर का दर्जा पाने के लिए दावा पेश किया। 2 दिसंबर 1999 को यूनेस्को ने इस लाइन को विश्व धरोहर का दर्जा प्रदान कर दिया।
इससे पहले 1998 में आस्ट्रिया के सेमरिंग रेलवे को विश्व धरोहर का दर्जा मिला था। डीएचआर को विश्व धरोहर का दर्जा मिल जाने के बाद दुनिया भर के सैलानियों की ओर खिलौना ट्रेन से प्रेम रखने वालों की नजर इस नेटवर्क पर पडी। बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी भी हर साल इस नेटवर्क पर सफर करने की तमन्ना रखते हैं। इसके साथ ही अपने देश के अलग अलग हिस्से से पहाड़ पर जाने वाले सैलानियों की हमेशा चाहत होती है कि वे ट्रेन से ही दार्जिलिंग तक पहुंचे। इसके साथ ही 125 साल से ज्यादा पुरानी इस रेल का सफर अनवरत जारी है।

दार्जिलिंग हिमालयन रेल - एक नजर
कुल दूरी – 85 किलोमीटर – गेज – 2 फीट (610 एमएम)  
शुरुआत वर्ष – 1881 कुल स्टेशन – 17
132 मानव रहित लेवेल क्रॉसिंग हैं रास्ते में।
23 अगस्त 1880 – सिलिगुड़ी से कर्सियांग तक।
04 जुलाई 1881 – दार्जिलिंग तक पहुंची ट्रेन।
संचालन मार्ग  – न्यू जलपाईगुडी से दार्जिलिंग
20 अक्तूबर 1948 – डीएचआर का भारत सरकार ने अधिग्रहण किया।

संदर्भ –
1 डीएचआर सोसाइटी की वेबसाइट- www.dhrs.org/ .
2. भारतीय रेल -  http://dhr.indianrailways.gov.in/ 

3. Book - Darjeeling Revisited: A Journey on the Darjeeling Himalayan Railway by – Bob cable- Middleton Press (2011 )

4.  Book -The Iron Sherpa: The Story of the Darjeeling Himalayan Railway, 1879-2006 ... The Iron Sherpa by T. Martin, 2006 

5. वेबसाइट- http://darjeeling.gov.in/dhr.html
6 वेबसाइट - http://www.darjnet.com/darjeeling/darjeeling/history/train/train.htm
8. BOOK- Fallen Cicada: Unwritten History of Darjeeling Hills, By Barun Roy

 Feedback - vidyutp@gmail.com
( DARJEELING HIMALYAN RAIALWAY, REMEMBER IT IS A WORLD HERTAGE SITE ) 

Friday, August 24, 2012

दार्जिलिंग- ऐसे हुई खिलौना ट्रेन की शुरूआत ((03))

दार्जिलिंग के घूम जॉय राइड पर । 
भारत की गर्मी नहीं बर्दाश्त कर पाने वाले अंग्रेजों ने देश में कई हिल स्टेशन की तलाश की और उन्हें विकसित किया। उनमें दार्जिलिंग भी एक था। पर सिलिगुड़ी से दार्जिलिंग जाने के लिए घोड़ागाड़ी से जाना ही तब विकल्प था। इसलिए इस सड़क का नाम दिया गया था हिल कार्ट रोड। अंग्रेजों ने दार्जिलिंग में स्वास्थ्य लाभ के लिए एक सेनिटोरियम और एक सैन्य डिपो का निर्माण कराया था।

दार्जिंलिग से लगातार बढ़ते चाय के व्यापार के कारण यहां घोड़ा गाड़ी के अलावा परिवहन के दूसरे विकल्प की जरूरत महसूस की गई। इस्टर्न बंगाल रेलवे के फ्रैंकलिन प्रेस्टिज ने सिलिगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच स्टीम ट्रामवे चलाने का प्रस्ताव रखा। बंगाल के तत्कालीन गवर्नर सर एस्ली इडेन ने रेलवे नेटवर्क के लिए समिति का निर्माण कराया।
1879 में दार्जिलिंग तक रेल लिंक के लिए प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया और इसी साल रेलवे लाइन का निर्माण शुरू हो गया। इससे पहले 1878 में सिलिगुड़ी कोलकाता से ब्राडगेज नेटवर्क से जुड़ गया था। डीएचआर नेटवर्क के निर्माण का ठेका ग्लिंडर्स आरबुथनॉट एंड कंपनी को मिला। 

मार्च 1880 तक सिलिगुड़ी  से तीनधारा तक का मार्ग तैयार हो गया। जब वायसराय लार्ड लिटन दार्जिलिंग के दौरे पर आए तो वे टाय ट्रेन में बैठकर तीनधारा तक गए। सिलिगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच मार्ग का उदघाटन 4 जुलाई 1881 को हुआ। तब इस कंपनी का नाम दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे कंपनी रखा गया। 

पहले रेल लाइन का मार्ग भी हिल कार्ट रोड के समांतर रखा गया था। पर बाद में पता चला कि कुछ इलाके में दूसरे मार्ग से लोकोमोटिव का सफर आसान हो सकेगा। तब 1882 में सुकना और गयाबाड़ी के बीच चार लूप मार्ग और चार रिवर्स मार्ग का निर्माण किया गया।


1891 में बना दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन के भवन - दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन के भवन का पुनर्निर्माण 1891 में हुआ जो अभी वर्तमान स्थिति में दिखाई देता है जबकि कर्सियांग रेलवे स्टेशन के भवन को 1896 में नया रंग रूप दिया गया। साल 1919 में बतासिया लूप का निर्माण हुआ जहां से दार्जिलिंग शहर का सुंदर नजारा दिखाई देता है।
साल 1962 में डीएचआर रेल मार्ग का विस्तार सिलिगुड़ी से न्यू जलपाईगुडी तक किया गया। एनजेपी इस मार्ग का मुख्य और बड़ा स्टेशन है।
इस छह किलोमीटर के विस्तार से खिलौना ट्रेन एनजेपी जैसे ब्राडगेज के बड़े रेलवे स्टेशन से जुड़ गई। इसके बाद लोको शेड और कैरिज डिपो को सिलिगुड़ी से न्यू जलपाईगुड़ी में शिफ्ट किया गया।


तीस्ता वैली रेलवे -  दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के अलावा इस क्षेत्र में सिलिगुड़ी से सेवक पहाड़ियों के बीच होते हुए कालिंपोंग तक भी नैरोगेज रेल बिछाई गई थी। इसका नाम तीस्ता वैली रेलवे दिया गया था। 1915 से 1915 के मध्य इस लाइन पर सफर संभव था। पर 1950 में आई बाढ़ और प्राकृतिक आपदा के बीच यह लाइन बर्बाद हो गई। फिर इसका निर्माण नहीं किया जा सका। जब 2009 में ममता बनर्जी रेल मंत्री बनीं तो उन्होंने तीस्ता घाटी रेलवे को एक बार फिर जीवंत करने के बारे में विचार किया, पर इस विचार को आगे नहीं बढ़ाया जा सका।


तीस्ता घाटी रेलवे का जो मार्ग था उस पर सिलिगुड़ी से सेवक तक रेलमार्ग आज भी दिखाई देता है। पर सेवक से कालिंपोंग के बीच रेलमार्ग का अस्तित्व अब नहीं है। सेवक के बाद इस नैरोगेज लाइन पर कालीझोरा, रामभी और रियांग स्टेशन हुआ करते थे। बताया जाता है कि इस रेल मार्ग से कविगुरु रविंद्रनाथ टैगोर रियांग तक सफर किया करते थे। उनका एक आवास मोंगपू में मैत्रेयीदेवी में हुआ करता था। वहां जाने के लिए वे टॉय ट्रेन का इस्तेमाल करते थे।

डीएचआर के घूम  रेलवे स्टेशन पर ( जुलाई 2012 ) 
घूम में डीएचआर का संग्रहालय - घूम (GHUM) दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे में सबसे ऊंचाई पर स्थित स्टेशन हैजो कि भारत का भी सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन  है।  समुद्र तल से 2,258 मीटर ( 7,407 फुट) की ऊंचाई पर बना ये स्‍टेशन दार्जिलिंग से 8 किलोमीटर दूर है। घूम में नैरोगेज रेलवे का रेल संग्रहालय भी है।  घूम रेल संग्रहालय दार्जिलिंग हिमालय रेलवे के तीन संग्रहालयों में से एक है। यह घूम रेलवे स्टेशन परिसर में स्थित है। संग्रहालय कक्ष घूम रेलवे स्टेशन से ऊपर है।  1999 में जब दार्जिलिंग हिमालयी रेलवे के प्रसिद्ध नैरो गेज टॉय ट्रेन यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल किया गया था, उसके एक साल बाद वर्ष 2000 मेंघूम संग्रहालय की स्थापना की गई। इसके साथ ही रेलवे विरासत को दिखाने के लिए आगंतुकों/पर्यटकों के लिए खोल दिया गया।

घूम प्लेटफार्म के ठीक उल्टी तरफ संग्रहालय का प्रवेश द्वार है। जैसे ही आप गेट में प्रवेश करते हैंवहां एक छोटे से बगीचे के साथ एक सुन्दर खुली जगह है। डीएचआर घूम संग्रहालय सुबह 10:00 बजे से शाम 4 बजे तक खुला रहता है। इसमें प्रवेश के लिए टिकट 20 रुपये प्रति व्यक्ति है।  इस संग्रहालय में रेलवे से जुड़ी हुई वस्तुओं का अच्छा संग्रह है। इस संग्रहालय में भाप से चलने वाले इंजनपुराने सिग्नल शामिल है। 

- vidyutp@gmail.com 
 ( डीएचआर 3)  पहली कड़ी यहां पढ़ें 
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Thursday, August 23, 2012

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे- 17 स्टेशनों से होकर सफर ((02 ))

तीनधारा रोगंटांग के बीच गुजरती डीएचआर। 
दार्जिलिंग हिमालयन रेल का सफर शुरू होता है न्यू जलपाईगुडी शहर से। जो 17 स्टेशनों से होता हुआ दार्जिलिंग पहुंचता है। तो चलें आगे के सफर पर...
1. न्यू जलपाइगुड़ी बड़ी लाइन का बड़ा रेलवे स्टेशन है। पहले खिलौना ट्रेन का सफऱ सिलीगुड़ी टाउन तक ही था लेकिन टॉय ट्रेन को बड़ी लाइन से जोडने के लिए 1964 में छह किलोमीटर लाइन का विस्तार एनजेपी स्टेशन तक किया गया। इससे नई दिल्ली और असम से आने वाली ट्रेनों का टॉय ट्रेन से संपर्क जुड़ गया।  न्यू जलपाईगुड़ी वह स्टेशन है जहां ब्राडगेज और नैरोगेज ( 2 फीट) की लाइनों को एक साथ देखा जा सकता है।

2. सिलुगुडी टाउन – अब खिलौना ट्रेन का दूसरा स्टेशन है।  एनजेपी तक विस्तार से पहले तक ये पहला रेलवे स्टेशन हुआ करता था।
3. सिलिगुडी़ जंक्शन – तीसरा रेलवे स्टेशन है। मैदानी इलाके में ही यहां तक रहती है खिलौना ट्रेन।
4. सुकना – 161 मीटर की ऊंचाई पर दार्जिंलिंग जिले की सीमा आरंभ होने के साथ ही यहां से पहाड़ी सफर की शुरूआत हो जाती है। रेलवे ट्रैक के दोनों तरफ हरे भरे चाय के बगानों के साथ मौसम बदलने लगता है।

5. रोंगटांग – 440 मीटर की ऊंचाई पर सुकना के बाद स्टेशन जहां आपको ट्रेन पहाड़ों के साथ अटखेलियां करती नजर आती है।
6. तीनधारा  –  1880 में तीन धारा तक डीएचआर का नेटवर्क पहुंच चुका था। मार्च 1880 में गवर्नर जनरल लार्ड लिटन ने तीनधारा तक रेलवे संचालन का उदघाटन किया था। यहां पर डीएचआर का वर्कशाप है। यहां डीएचआर के लोको ( इंजनों) की मरम्मत की जाती है। यहां एक बड़ा लोको शेड बनाया गया है। साथ ही इंजन बदले की भी सुविधा है। डीएचआर के खराब हुए इंजनों की तीनधारा वर्कशाप में मरम्मत भी की जाती है। साथ ही रेलवे इंजीनियरिंग विभाग का दफ्तर है।
7. गया बाड़ी – 38वें किलोमीटर पर 1040 मीटर की ऊंचाई पर है ये रेलवे स्टेशन। गयाबाड़ी दार्जिलिंग जिले के अंतर्गत आता है। यहां कई चाय के बगान हैं।
8. महानदी – 44.5 किलोमीटर का सफर हुआ पूरा। 1252 मीटर की ऊंचाई पर है रेलवे स्टेशन। यहां महानदी वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी स्थित है। काफी सैलानी यहां जंगल सफारी के लिए आते हैं।  1989 में इस रेलवे स्टेशन के भवन को दुबारा बनाया गया। पहले भू स्खल में ये स्टेशन भवन तबाह हो गया था। 

9. कर्सिंयांग 51.5 किलोमीटर पर स्थित कर्सियांग स्टेशन में ट्रेन मार्ग सड़क मार्ग को क्रास करती है। यहां ठहराव ज्यादा देर का होता है यात्रीगण यहां हल्का नास्ता ले सकते हैं। यह डीएचआर का मध्यवर्ती स्टेशन है। साथ ही यह एनजेपी से दार्जिलिंग के बीच का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन भी है। कर्सियांग व्यस्त बाजार है। इस छोटे से ऐतिहासिक शहर में कभी नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आगमन हुआ था। आजकल कर्सियांग के आसपास कई नामी-गिरामी पब्लिक स्कूल और चाय के बगान हैं।   
10. तुंग 1728 मीटर की ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं आप। 58 किलोमीटर का सफर हो चुका है पूरा। और धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगती है। स्वेटर जैकेट निकाल लिजिए।
घूम स्टेशन, यहां डीएचआर का म्यूजियम भी है। 
11. सोनादा सोनादा एक छोटा सा बाजार है जहां एक बार फिर एनएच- 55 के साथ रेलगाड़ीकी पटरियां मिलती हैं।          
12. जोरबंग्ला – किसी जमाने में जोरबांग्ला चाय के लिए स्टोर करने वाला स्थल हुआ करता था। यहां दार्जिलिंग शहर की सीमा की शुरूआत भी मानी जाती है।
15. घूम 2258 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह डीएचआर रेल मार्ग का सबसे ऊंचाई पर स्थित रेलवे स्टेशन है। यह दुनिया का दूसरा सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन है। यहां पर टॉय ट्रेन का संग्रहालय भी है। यहां प्रसिद्ध बौद्ध मठ भी है।      
16. बतासिया लूप – दार्जिलिंग से 5 किलोमीटर पहले आता है बतासिया लूप। यहां कोई स्टेशन नहीं है पर ट्रेन बलखाती हुई घुमाव लेती है जिसका नजारा देखने लायक होता है। यहां पर देश की आजादी के लिए जान गंवाने वाले गोरखा फौजियों का मेमोरियल भी बनाया गया है। इस मेमोरियल को ट्रेन के यात्री देख सकें इसलिए यहां ट्रेन धीमी हो जाती है। यहां दार्जिलिंग शहर का विहंगम नजारा के साथ ही कंचनजंगा पर्वत की चोटी भी देखी जा सकती है।
17. दार्जिलिंग – (DJ) और चलते चलते ट्रेन पहुंच जाती है अपनी मंजिल पर यानी आखिरी रेलवे स्टेशन। दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन का छोटा सा सुंदर सा भवन 1891 का बना हुआ है।

दार्जिलिंग बाजार - 1886 डीएचआर को तकरीबन आधा किलोमीटर का विस्तार दिया गया और दार्जिलिंग बाजार तक पटरियां बिछाई गईं। ये पटरियां खास तौर पर सामान पहुंचाने के लिए बिछाई गई थीं। पर अब आप सिर्फ पटरियां देख सकते हैं। इन पर अब ट्रेन नहीं चलती। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य  
( डीएचआर 2)  पहली कड़ी यहां पढ़ें.


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Wednesday, August 22, 2012

छुक छुक दार्जिलिंग हिमालयन रेल की- चलता रहे ये सफर ((01))

दिल्ली के राष्ट्रीय रेल संग्रहालय में संरक्षित डीएचआर का लोकोमोटिव 777बी । 
यह एक स्वप्नलोक के सफर जैसा है। जो इस सफर पर जाता है उसके लिए ये यादगार बन जाता है। दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (डीएचआर) यानी यादगार सफर पर ले जाने वाली एक खिलौना ट्रेन। ये दुनिया की सबसे पुरानी खिलौना ट्रेनों में से एक है। इसका सफर 4 जुलाई 1881 को आरंभ हुआ। 

ये भारत की दूसरी सबसे पुरानी नैरो गेज रेलवे लाइन है। इससे पहले देश की पहली नैरो गेज रेल गुजरात के बड़ौदा में बिछाई जा चुकी थी।

छोटी रेल का सफर पश्चिम बंगाल के न्यू जलपाईगुड़ी (एनजेपी) से शुरू होता है। हिल स्टेशन दार्जिलिंग तक का सफर आठ घंटे का है लेकिन इसे अंग्रेजी के एक लोकप्रिय लेखक ने इतना आनंददायक औऱ सुखकर बताया था कि इस सफर को एक हफ्ते का रहने की उन्होंने इच्छा जताई थी। डीएचआर का सफर वाकई इतना रूमानी है।

इस 85 किलोमीटर के सफर की शुरुआत न्यू जलपाईगुडी से होती है। सिलिगुडी़ टाउन और सिलिगुडी जंक्शन जैसे स्टेशन मैदानी इलाके में हैं लेकिन जैसे ही ट्रेन सुकना स्टेशन पहुंचती है चाय के बगान शुरू हो जाते है। इसके साथ ही शुरू हो जाती है हरियाली और साथ में अत्यंत खूबसूरत रास्ते।

बतासिया लूप का नजारा। 
बलखाती हुई ट्रेन ऊपर यानी पहाड़ों की ओर सफर करने लगती है। धीरे धीरे तापमान कम होने लगता है और सफर का मजा भी बढने लगता है। तीन धारा के बाद एक बड़ा शहर आता है कर्सिंयांग। कर्सिंयांग दार्जिलिंग और सिलिगुड़ी के मध्य स्थित शहर है। डीएचआर में घूम रेलवे स्टेशन पर सबसे ऊंचाई पर है। घूम में इस इलाके का सबसे पुराना बौद्ध मान्स्ट्री भी है तो घूम में दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का संग्रहालय भी है। साथ ही घूम इस मार्ग का सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन भी है।

दार्जिलिंग के न्यूजलपाई गुड़ी के बीच रोज एक ही ट्रेन चलती है। सुबह नौ बजे न्यूजलपाई गुडी से जाने वाली ट्रेन शाम को दार्जिलिंग पहुंचाती है। लेकिन सचमुच ये सफर यादगार होता है। डीएचआर का सबसे खूबसूरत नजारा बतासिया लूप में देखा जा सकता है जो घूम स्टेशन के पास है। इस खिलौना ट्रेन में चाहे आप सेकेंड क्लास में भी सफर करें या फिर फर्स्ट क्लास में सफर का आनंद उतना ही रहता है।

अगर इस खिलौना ट्रेन का पूरा सफर का मजा नहीं उठा सके हैं तो कम से कम दार्जिलिंग से घूम तक के सफऱ का आनंद जरूर उठाएं। इन दोनों स्टेशनों के बीच जॉय राइड नाम से ट्रेनें चलती हैं। इस मार्ग पर आता है बतासिला लूप जहां ट्रेन चकरघिन्नी काटती हुई अदभुत घुमाव लेती है। यहां पर एक सुंदर पार्क भी बना हुआ है।

 कैसे करें डीएचआर का सफर - इस ट्रेन के सफर के लिए देश के किसी भी कोने से आरक्षण कराया जा सकता है। इसके लिए आप इंडियन रेलवे की साइट पर जा सकते हैं। दुनिया भर में डीएचआर के प्रेमियों ने अलग से इसकी वेबसाइट बना रखी है। इस साइट पर वे सफर के बारे में जानकारी अपडेट करते रहते हैं। यहां जाएं-  www.dhrs.org/ इस मार्ग को यूनेस्को ने 1999 विश्व धरोहर का दर्जा दे दिया है।

हमारी 2010 जुलाई की यात्रा के दौरान डीएचआर का सफर सिर्फ दार्जिलिंग के कर्सियांग के बीच जारी था। लिहाजा हमने इसके पूरे सफर का आनंद नहीं लिया। हमने दार्जिलिंग के घूम तक जॉय राइड का मजा लिया। आप भी अगर पूरे सफर का आनंद न ले पाएं तो जॉय राइड तो जरूर करें। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
( DHR, डीएचआर- 1) 
( DHR, DARJEELING HIMALAYAN RAILWAY )
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Tuesday, August 21, 2012

दार्जिलिंग का चौरस्ता पर मौज मस्ती और वापसी

जैसे शिमला का मॉल वैसे दार्जिलिंग का चौरस्ता। सुबह से लेकर शाम गुजारने के लिए सबसे अच्छी जगह। चौरस्ता के एक तरफ घंटा घर है तो दूसरी तरफ जाता है राजभवन के लिए रास्ता। कुछ और रास्ते निकलते हैं एक मंदिर की ओर तो एक बाजार की ओर। हमने दार्जिलिंग में कुछ दिन गुजारे तो हमारा पड़ाव बना होटल ब्राडवे। दार्जिलिंग का एक प्यारा होटल। इस होटल की मु्ख्य शाखा घंटाघर के पास है तो ब्राडवे एनेक्सी है जाकिर हुसैन रोड पर। एनेक्सी के सुंदर कमरे से पूरे दार्जिलिंग का खूबसूरत नजारा दिखाई देता है। होटल का अपना रेस्टोरेंट भी है जिसका खाना काफी अच्छा और वाजिब कीमत पर उपलब्ध है। होटल के मालिक अमित खत्री खुद सारी व्यवस्था देखते हैं। वे अपने होटल में रहने वाले लोगों के साथ मित्रवत हैं और उनकी सुविधाओं का खासा ख्याल रखते हैं।
तो फिर वापस चलते हैं चौरस्ते पर। चौरस्ता पर आप चाय की चु्स्की ले सकते हैं। घुड़सवारी का आनंद ले सकते हैं। और भूख लगे तो चना जोर गरम समेत कई तरह के स्ट्रीट फूड का भी मजा ले सकते हैं। शाम होने पर चौरस्ता पर रौनक बढ़ जाती है। सैलानियों से पट जाता है चौरस्ता। बिल्कुल शिमला के माल की तरह। सैलानियों को लुभाने वाले कई तरह के आईटम। बच्चों की किलकारियां। हनीमून युगल की मस्तियां। कुछ शर्मीली तो कुछ बांकी अदाएं। हुश्न का मेला। चेहरे रोज बदल जाते हैं लेकिन चौरस्ता सालों भर गुलजार रहता है।
यह संयोग था कि हम 5 जुलाई को दार्जिलिंग में थे। उस दिन दार्जिलिंग बंद का आह्वान कर रखा था गोरखालैंड की मांग करने वाले संगठनों ने। तो अनादि ने अपना पांचवा जन्मदिन मनाया इसी चौरस्ते पर। पूरा दार्जिलिंग बंद था। घूमने के विकल्प सीमित थे। करते भी क्या। लेकिन चौरस्ते पर मिल गया एक बड़ा गुब्बारा। केक का इंतजाम नहीं हो सका। पर खेलकूद कर खुश हो गए अनादि। इस तरह उनका जन्मदिन यादगार बन गया। 
यहां पर हमारी एक सिलिगुड़ी की संभ्रात परिवार की महिला से मुलाकात हुई। वे बताती हैं जब जब सिलिगुड़ी की गर्मी सताती है ड्राईवर को बोलती हूं और गाड़ी लेकर पहुंच जाती हूं दार्जिलिंग चौरस्ता पर। यहां दिन भर हंसते खेलते सैलानी चेहरों को देखकर मन खुश हो जाता है। भाई वाह, क्या जिंदादिली है। जीएं तो ऐसे.. चौरस्ते पर दार्जिलिंग की प्रसिद्ध चाय की दुकानों के शोरुम हैं। नाथमल और गुडरिक चाय तो कई और ब्रांड। एक तरफ दार्जिलिंग के आइकोनिक बेल व्यू होटल की इमारत है। तो अब आखिरी दिन वापसी की तैयारी... हमें सिलिगुड़ी की टैक्सी के लिए ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा। घंटाघर से ही टैक्सी मिल गई। पर जैसे जैसे टैक्सी नीचे उतरती गई सुहाना मौसम पीछे छूटता गया। सिलिगुड़ी पहुंचने पर गर्मी से हाल बेहाल था। तो फिर आएंगे दार्जिलिंग...  
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