Saturday, July 14, 2012

काशी से उत्तर काशी - भूकंप राहत शिविर में (1)

ऋषिकेश में गंगा जी का विस्तार ( साल 2019 ) 

साल 1991 में सर्दियों के ठीक पहले उत्तराखंड के उत्तर काशी क्षेत्र में बड़ा भूकंप आया जिसमें जान माल का बड़ा नुकसान हुआ। देश भर मदद के हाथ उठने लगे। तब उत्तराखंड राज्य नहीं बना था ये क्षेत्र उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा था। राष्ट्रीय युवा योजना के निदेशक एसएन सुब्बराव जी का खत आया कि हम उत्तरकाशी टेहरी क्षेत्र में एक राहत शिविर लगाएंगे। मैं तब बीएचयू में स्नातक का द्वितीय वर्ष का छात्र था। तो हमने भी तय किया कि इस राहत शिविर में हाथ बंटाने हम भी जाएंगे। बस हमने बोरिया बिस्तर बांधा अपने कुछ दोस्तों के साथ रवाना हो गए दस दिन के इस शिविर में हिस्सा लेने के लिए। शिविर में जाने से पहले हमने घर घर घूम कर थोड़ी राहत सामग्री भी जुटाई। हमारे साथ थे विपिनचंद्र चतुर्वेदी, राजीव कुमार सिंह, मनोज कुमार बोस, मुगलसराय के चंद्रभूषण मिश्र कौशिक और संजय पाठक।
उत्तर काशी क्षेत्र में 19 अक्टूबर 1991 में जो भूकंप आया था उसमें कुल 768 लोगों की मुत्यु हो गई थी। ये भूकंप 6.8 तीव्रता का था।) 


वाराणसी से हरिद्वार का सफर रेल से 

टिहरी के बालगंगा घाटी शिविर के हमारे उत्साही साथी। 
हमलोग वाराणसी देहरादून एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे में 30 नवंबर की सुबह सवार हुए। रेल का 50 फीसदी का रियायती टिकट हमें मिल गया था। वाराणसी से अलीगढ़ के बाद ये मेरा दूसरा लंबा रेल सफर था। एक दिसंबर 1991 की सर्द सुबह में हम हरिद्वार स्टेशन पर उतरे। यहां से दूसरी पैसेंजर ट्रेन से ऋषिकेश पहुंचे। हरिद्वार से चली पैसेंजर ट्रेन तुरंत ही एक सुरंग में घुस गई। बाहर आई तो थोड़ी देर बाद रेल राजाजी नेशनल पार्क के से गुजर रही थी। हम मोतीचूर के जंगलों से गुजर कर अपनी मंजिल पर पहुंचे। हरिद्वार से ऋषिकेश की दूरी 23 किलोमीटर है। मोतीचूर के बाद राईवाला जंक्शन आता है। यहां से देहरादून के लिए रेलवे लाइन अलग हो जाती है। ऋषिकेश इस मार्ग पर आखिरी रेलवे स्टेशन है। हमारा बेस कैंप था ऋषिकेश में। ऋषिकेश के शिवानंद आश्रम में देश भर से आए स्वयंसेवक जुटने लगे थे। इस दौरान हमें ऋषिकेश को देखने और महसूस करने का पूरा मौका मिला।
सुहानी यादें - ऋषिकेश में सुबह सुबह मां गंगा की गोद में । ( संजय, बिपिन, मनोज बोस, विद्युत, राजीव, चंद्रभूषण मिश्र ) 

घुमावदार पहाड़ी रास्ते और लौंग
यहां एक रात रुकने के बाद अगले दिन दोपहर में आगे का सफर शुरू हुआ अलग अलग बसों से। बस से छह घंटे का घुमावदार पहाड़ी सफर करते हुए हमारी बस नरेंद्र नगर, अगरखाल,  मोहनचट्टी, चंबा, होते हुए टिहरी शहर पहुंची। टिहरी पहुंचते शाम गहरा गई थी। पहाड़ों की यात्रा शुरू करने से पहले शिवानंद आश्रम में एक गुरूजी ने सलाह दी थी कि आप लोग लौंग अपने साथ रखें जब बस की यात्रा में घाटी में चक्कर आने लगे तो लौंग चबाएं इससे राहत मिलेगी। हमने उनकी सलाह पर ऋषिकेश के बाजार से लौंग खरीद लिया था यह रास्ते में बहुत काम आया।
विमला बहुगुणा के साथ टिहरी में। अब वो शहर नहीं रहा।

टिहरी बांध के खिलाफ आंदोलन 

हमारी बस के प्रभारी मुजफ्फरपुर के डाक्टर एके अरुण थे। बस टिहरी शहर पहुंची तो हमारी मुलाकात दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता सत्य प्रकाश भारत जी से हुई। उन्होंने बताया कि रात को आगे के सफर पर नहीं जा सकते। हमारा रात्रि विश्राम यहीं होगा। जब हम टिहरी पहुंचे तो देखा कि वहां पर टिहरी बांध के खिलाफ अनवरत आंदोलन चल रहा था। सुंदरलाल बहुगुणा की अगुवाई में भवानी भाई शाम को भी धरने पर बैठे थे। शाम को हमलोगों को टिहरी शहर में एक छोटी सी सद्भावना रैली निकाली। हालांकि टिहरी बांध बन जाने  बाद अब वह शहर नहीं रहा। टिहरी में देश भर से आए 200 स्वंयसेवक दो हिस्सों में बांट दिए गए। टिहरी में रात्रि विश्राम के बाद सौ लोगों का जत्था उत्तरकाशी गया और 100 लोगों टिहरी जिले में बूढ़ा केदार। हमलोग 50 लोगों को जत्थे में टिहरी जिले में बूढ़ा केदार शिविर को ले जाए गए। जबकि 50 लोगों का जत्था सिलियारा गांव के लिए प्रस्थान कर गया।



टिहरी शहर से कुछ घंटे बस में सफर कर घनसाली, चमियाला होते हुए हम बूढ़ा केदार में बालगंगा घाटी पहुंचे। बूढा केदार में ऊंचे पहाड़ों के बीच घाटी में एक छोटे से स्कूल में बना हमारा बेस कैंप। यह लोक जीवन विकास भारती द्वारा संचालित एक स्कूल है। इसमें हमारे रहने का इंतजाम किया गया है। इस बाल गंगा घाटी में सूरज के दर्शन कम ही होते थे। धूप महज दो घंटे के लिए दोपहर में आती थी क्योंकि चारों तरफ से पहाड़ियां थीं। स्कूल के ठीक बगल में बहती थी बाल गंगा नदी। हालांकि एक से 10 दिसंबर के बीच ठंड इतनी ज्यादा थी कि मैं सिर्फ दस दिन में एक दिन ही नहाने का साहस कर पाया। हालांकि पंजाब से आए जसबीर जस्सी रोज नहा लेते थे। दस दिनों के शिविर में हमें खाना भी खुद ही बनाना पड़ता था। इसके लिए अलग अलग समूहों की अलग अलग दिन रसोई में ड्यूटी लगती थी।

बालगंगा की घाटी में सूरज

बालगंगा घाटी की यादें. मीनाक्षी, राजीव और संजय पाठक।

पांच स्वेटर में भी नींद नहीं... 

बाल गंगा  बेस कैंप में हमारे लीडर थे मुजफ्फरपुर से आए डाक्टर एके अरुण, पंजाब के सुखदेव सिंह और गुजरात के राजेश भाटेलिया। हमारे साथ बिहार के सुनील कुमार सेवक, मीनाक्षी ओझा जैसे उत्साही साथी भी थे। इतनी ठंड थी की मैं तो पांच स्वेटर पहने हुए भी सो जाता था। दस दिनों तक हम लोग आस पास के गांवों में जाकर लोगों से मिलकर उनकी जरूरतों का मुआयना करते थे। भूकंप के कारण ज्यादातर लोगों की घरों में दरारें पड़ गई थीं। आशियाना बिखर गया था। पहाड़ के साहसी लोग टूट गए थे। नायकवाड़ा गांव के हमारे स्थानीय साथी विक्रम सिंह हमें पहाड़ के संघर्षमय जीवन से वाकिफ कराते थे। उसके बाद उन्हें कंबल चादर और दूसरी राहत सामग्री बांटते थे जो हम अपने साथ लेकर आए थे। हम राहत शिविर से रोज जिन गांवों की ओर जाते थे वह 6 से 10 किलोमीटर तक दूर होते थे। इन गांवों में पैदल चलकर जाने के अलावा कोई तरीका नहीं था। गांव में जरूरत की सामानों की ढुलाई के लिए खच्चर एकमात्र सहारा हैं।

टिहरी के एक गांव के लोग ( दिसंबर 1991) 
मानिक दादा का कुत्ता

दस दिनों का शिविर खत्म होने के बाद हमलोग वापस चले। कई लोगों को पहाड़ पर छोटे छोटे कुत्ते मिल गए जिन्हें वे अपने साथ लेग गए। गुवाहाटी के हमारे एनवाई के सीनियर साथी मानिक हजारिका भी एक कुत्ते का पिल्ला अपने साथ ले जाना चाहते थे पर उन्हें कुत्ता नहीं मिला। उन्होंने अपना दुख मुझसे साझा किया। खैर चलते चलते उन्हें भी एक कुत्ता मिल गया। कुछ महीने बाद पता चला कि टिहरी का वो पिल्ला गुवाहाटी के मौसम में खुद को सामंजित नहीं कर पाया और असमय इस दुनिया से कूच कर गया। (www.nypindia.org  )
-    विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

( HARIDWAR, RISHIKESH, TEHRI, UTTRAKHAND, NYP, EARTHQUAKE RELIEF CAMP 1991 ) 

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