Monday, July 16, 2012

बूढ़ा केदार शिविर - जमते पानी के बीच दस दिन (04)

बूढ़ा केदार शिविर में सुब्बराव जी के साथ। मनोज बोस, चंद्रभूषण,संजय,राजीव, मानिक और विपिन। 
 उफ इतनी ठंड….
हमारी एक से 10 दिसंबर 1991 की रातें बूढ़ा केदार शिविर में गुजरीं। हमारा शिविर बाल गंगा नदी के किनारे एक स्कूल में है। बूढ़ा केदार के भूकंप राहत शिविर के बेस कैंप में दो दिनों के लिए सुब्बराव जी भी आए। तापमान शून्य के आसपास रहता था, लेकिन इस ठंड में भी भाई जी निक्कर और खादी के पूरी बाजू के शर्ट में ही रहे। ये उनका आत्मबल है कि वे ठंड को इस तरह बर्दास्त करते हैं। हालांकि इतनी ठंड में मैं तो पांच कपड़े लपेटे रहता था। बूढ़ा केदार में पानी पीना हो तो सीधे बाल गंगा नदी से निकाल लो। पानी इतना पवित्र की मिनरल वाटर की इसके सामने क्या बिसात। लेकिन पानी इतना ठंडा होता था कि प्यास लगी हो एक गिलास की थो दो घूंट में काम चलाना पड़ता था। कैंप में हमलोग खाने के समय पानी को गर्म कर पीते थे।

गांव में लगा मेला
जिन दिनों हम बूढ़ा केदार में थेयहां एक मेला भी लगा। मेले में थी जलेबी की दुकानें और गीत संगीत की महफिल। पहाड़ों में मेले का बड़ा महत्व है। आसपास के दस बीस किलोमीटर के गांवों के तमाम लोग ऐसे मेले में न सिर्फ खरीददारी करते हैं बल्कि अपने रिश्तेदारों से मिलते भी हैं। पहाड़ में हर गांव में बाजार नहीं हो सकते। इसलिए समय समय पर लगने वाले मेले लोगों की जरूरत की चीजों की खरीददारी के लिए आदर्श साधन है। मेले तो मैदानी इलाके में भी लगते थे पर वे अब अपना महत्व खोते जा रहे हैं। हमारे पहाड़ों के साथी भूपेंद्र किरोला बताते हैं कि मेले में शादी विवाह यानी रिश्ते भी तय होते हैं वहीं आसपास के गांवों के प्रेमी प्रेमिका भी चुपके चुपके मिलते हैं।

एक गांव की ओर डॉक्टरों की टीम के साथ। 
बूढ़ा केदार तक दिन भर में दो या तीन बसें ही आती हैं। ज्यादातर गांव से बस स्टाप तक पहुंचने के लिए आठ से 12 किलोमीटर तक पहाड़ी पगडंडियों पर पैदल चलना पड़ता है। गांव में काफी ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने कभी शहर भी नहीं देखा। गांव के लोगों का सबसे प्रिय साथी है खच्चर जो शहर से जरूरत के सामान को ढोकर गांव में लेकर आता है। यहां पहली बार हमने पन चक्की देखी जिससे आटा पिसने वाली मशीन चलाई जाती है। पहाड़ों की ऊंचाई से तेज रफ्तार से पानी गिराए जाने पर चक्की चल पड़ती है। न डीजल पेट्रोल का खर्च न ही प्रदूषण का कोई चक्कर।


 ऐसा लगा कि आखिरी रात है...

दस दिन के शिविर में मैं एक दिन बीमार भी पड़ा। हल्के बुखार के बाद दवा का रिएक्सन इतना बुरा हुआ कि सारी रात काटना मुश्किल हो गया। ऐसा लगा कि अब ये आखिरी रात है। सुबह होते ही शिविर में भूकंप पीड़ितों की सेवा में लगे श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम  ( http://www.sbmahimalaya.org/ ) के डाक्टर दल से मिला। उनकी दवा से तुरंत आराम मिला। एक एमबीबीएस डाक्टरएक नर्स और एक कंपाउंडर की टीम गांव गांव में जाकर भूकंप पीड़ितों का मुफ्त इलाज कर रही थीं। बड़ा ही स्तुत्य कार्य था उनका। भले वे आश्रम से वेतन पाते थेलेकिन एमबीबीएस की पढ़ाई के बाद भला कितने लोग ऐसे समाजसेवक जैसी नौकरी करना चाहते हैं। ये आश्रम 1977 से उत्तराखंड के लोगों का जीवन बदलने में लगा है। इस आश्रम का मुख्य परिसर टिहरी गढ़वाल जिले के अंजनी सेण गांव में हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com

(( TEHRI GARHWAL,  NYP, , SHANTIKUNJ,  UTTRAKHAND)

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