Friday, July 20, 2012

आध्यात्मिक युवा शिविर बेंगलुरु में दस दिन

वह दस जनवरी 1992 की शाम थी। चेन्नई से दोपहर में चलने वाली बेंगलुरु एक्सप्रेस कर्नाटक की राजधानी के करीब पहुंची तो पहले बेंगलुरु कैंट रेलवे स्टेशन आया। बेंगलुरु कैंट में भी हमारे शिविर का स्वागत काउंटर बने होने की सूचना थी। सो हमलोग यहीं पर उतर गए। कोई रात आठ बज चुके थे।
यहां पर हमारा स्वागत राष्ट्रीय युवा योजना के स्थानीय स्वयंसेवकों ने किया। उसमे एक लड़की तो कर्नाटक के विक्टोरिया अस्पताल में नर्स थी, वो मेरी बाद में दोस्त बन गई। हमलोग स्टेशन से मेटाडोर से रात नौ बजे कैंप साइट पर पहुंचे। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया के दौरान कुछ पुराने साथियों से मुलाकात हुई तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बिहार से मीनाक्षी के साथ उनकी बहन कामाक्षी, स्निग्धा ठाकुर, प्रियंका, राकेश सुमन, शशिभूषण, मनोज झा आदि लोग आए थे। शिविर का विधिवत आरंभ 11 जनवरी से होना था।


देश के 22 राज्यों से 1000 से ज्यादा युवा। आध्यात्मिक युवा शिविर में पहुंच चुके हैं। वाराणसी से दिग्विजय नाथ सिंह, जॉन राजेश्वर कुजुर, राजीव कुमार सिंह, संदीप कुमार, अमिताभ सिंह, आदित्य कुमार जैसे साथी तो पटना से पुराने सामाजिक कार्यकर्ता सुनील कुमार सेवक के साथ संगीतकार अनिल कुमार रश्मि और उनके साथी। हमारे हाजीपुर इकाई से भाई पंकज कुमार, नवीन झा, मनीष चंद्र गांधी, राकेश पाठक पहुंच चुके हैं। दस दिन दोस्तो के साथ खूब जमी शिविर में। 
बिहार की टीम कव्वाली पेश करती हुई- तराना देश का...

सभी लोगों के लिए शिविर में रहने के लिए तंबूओं में इंतजाम था। इन तंबूओं को अलग नाम दिए गए थे। मैं एक 60 लोगों के तंबू का प्रभारी बनाया गया। ग्राउंड में ही अस्थायी शौचालय बनवाए गए थे। पानी का इंतजाम टैंकरों से होता था। यानी पूरी तरह से कैंप जीवन था।

आ रही हैं झूमती नौजवान टोलियां
सुबह सुबह साढ़े चार बजे ही आनंद भाई और उनके साथी माइक पर  आ रही हैं झूमती नौजवान टोलियां, उठो तुम्हें जगा रही हैं प्रभात फेरियां... गाना शुरू कर देते थे। इससे हमारी नींद खुल जाती थी। पांच बजे जगने की सिटी बजती। हम सब लोग दौड़ कर पोस्ट पर पहुंचते। एक लाइन में 20 लोग चारों तरफ 50 लंबी लाइनें लग जाती थीं तुरंत पूरे अनुशासन में। नौजवान आओ रे नौजवान गाओ रे गीत खत्म होने के बाद सुब्बराव जी दिन भर के आयोजन के बारे में बताते। पर विसर्जन से पहले आनंद भाई मंच पर अवतरित होते और हम सब मिलकर एक और गीत गाते – आ गया... आ गया... जागने का वक्त आ गया। गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि लोग जहां भी आनंद भाई को देखते – आ गया आ गया.. चिल्लाना शुरू कर देते।
श्रीरंग पट्टनम में , शिविर के दौरान जाने का मौका मिला था। 

जैसा कि शिविर का नाम आध्यात्मिक युवा शिविर था। इसलिए इसमें आध्यात्म की बातें ज्यादा होनी थी। हर रोज दोपहर में कोई स्पिरिचुअल धर्म गुरू आते। अपनी बात रखते। सुब्बराव जी कहते हैं – भारत को सिर्फ हिंदू राष्ट्र कहना उचित नहीं है। यहां दुनिया के चार धर्मो का उदय हुआ। जैन धर्म, बौद्ध धर्म सिक्ख धर्म यहां से पूरी दुनिया में फैले। हमें सभी धर्मो की अच्छी बातों का सम्मान करना चाहिए। सर्व धर्म समभाव के साथ ही आज हमें सर्व धर्म मम भाव जैसे विचार की जरूरत है। 

अगले दस दिनों में हमलोग बंगलुरू के मल्लेश्वरम, मैजेस्टिक, कब्बन पार्क, विधानसभा, लाल बाग जैसे तमाम इलाकों में गए। दस दिन के शिविर के दौरान शहर के कई इलाकों से रूबरू होने का मौका मिला। हर रोज नए इलाके में रैलियां और कार्यक्रम होते थे।




इस दौरान शिविर में हर रोज किसी आध्यात्मिक गुरु का भी आगमन होता था। एक दिन हम सबको बस से मैसूर और श्रीरंगपट्टनम घुमाने ले जाया गया। शिविर के आखिरी दिन हमें प्रमाण पत्र मिला उसमें सुब्बराव जी के साथ तत्कालीन रेल मंत्री सीके जाफरशरीफ के भी हस्ताक्षर थे।  

- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com

( BANGALURU, SPIRITUAL YOUTH CAMP , 1992, PALACE GROUNDS) 

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