Tuesday, July 31, 2012

पटना से दार्जिलिंग वाया सिलिगुड़ी, सुकना के जंगल

साल 2010 का जुलाई महीना। हम दिल्ली से दार्जिलिंग के सफर पर थे। बीच में एक दिन पटना में रुकना हुआ अनादि के मामा जी के घर। पटना से दानापुर गुवाहाटी एक्सप्रेस (कैपिटल एक्सप्रेस) में हमलोग सवार हुए दार्जिलिंग के लिए। यह ट्रेन पटना से रात को खुलती है। ट्रेन में हमारे साथ एक नवविवाहित युगल मिले जो शादी के बाद पहली बार दार्जिलिंग जा रहे थे। वे रेल कर्मचारी हैं। उनके साथ बातों में सफर कट गया।

अगली सुबह कटिहार रेलवे स्टेशन पर 20 मिनट का ठहराव था। सुबह 7.20 के बजाए ट्रेन एक घंटे देरी से कटिहार पहुंची। हमारे एक पत्रकार साथी राजीव कुमार स्टेशन पर मिलने आए। वे हमारे लिए नास्ता लेकर आए। मिलकर दिल खुश हो गया। कटिहार के बाद ट्रेन बारसोई जंक्शन पर रुकी। इसके बाद आया किशनगंज। बिहार का आखिरी रेलवे स्टेशन। किशनगंज जिला बंगाल के दुआर्स इलाके से लगा हुआ इसलिए यहां भी चाय के बगान हैं। 

रेल ने दोपहर में हमें न्यूजलपाईगुड़ी (एनजेपी) पहुंचा दिया। न्यू जलपाईगुडी उतरने के बाद रजनीश कुमार और हमलोग साथ-साथ आगे चले। क्योंकि हमारी मंजिल एक है। रजनीश रेलवे में लोको पायलट हैं। बाद में वे हमारे दोस्त बन गए। एनजेपी से हमलोग आटोरिक्शा से सिलिगुडी पहुंचे। वहां सिलिगुडी़ रेलवे स्टेशन के सामने से दार्जिलिंग के लिए शेयरिंग टैक्सी बुक की। हालांकि टैक्सी वाले हमें दार्जिलिंग के बजाए गंगटोक जाने की सलाह दे रहे थे। उन्होंने हमें यहीं से होटल बुक करने की भी सलाह दी। वास्तव में टैक्सी बुकिंग एजेंट होटल के एजेंट की तरह भी काम करते हैं। पर हमने यूथ हास्टल से होटल ब्राडवे पहले से ही बुक कर रखा था। इसलिए हम एजेंट के चक्कर में नहीं आए। हमारे साथ रजनीश जी ने अपना होटल एजेंट के माध्यम से जरुर बुक कराया। 


वैसे दार्जिलिंग बचपन से मेरी स्मृतियों में था। फिल्म हरियाली और रास्ता के कारण। शादी के तुरंत बाद मैं दार्जिलिंग जाना चाहता था। पर हमारी नई बनी जीवन संगिनी की एक सहेली ने दार्जिलिंग की थोड़ी खराब छवि पेश की हमारे सामने। वे वहां के एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई कर चुकी थीं। लिहाजा हमने अपना इरादा बदल दिया और शिमला चले गए साल 2003 में। पर अब 2010 में पांच साल के बेटे अनादि के साथ दार्जिलिंग की यात्रा पर थे।

रास्ता में सुकना के हरे भरे जंगल आए इसके साथ ही पहाड़ी रास्ता शुरू हो गया। सिलिगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच में कर्सियांग आया। यहां पर हमलोग चाय पीने के लिए रुके। तो हमलोग तीन घंटे की टैक्सी के सफर के बाद शाम ढलने से पहले दार्जिलिंग पहुंच चुके थे। घंटा घर के पास होटल ब्राडवे पहुंचे। पर होटल के रिसेप्शन पर मौजूद अमित खत्री ने अपने एक स्टाफ के साथ हमें ब्राडवे एनेक्सी में भेजा। यह होटल ज्याद ऊंचाई पर है। यहां से दार्जिलिंग शहर का नजारा और भी सुंदर दिखाई देता है। अगले पांच दिन हमने इसी कमरे में गुजारे। 

कैसे पहुंचे- दार्जिलिंग का निकटतम रेलवे स्टेशन न्यूजलपाईगुड़ी या सिलिगुड़ी है। यहां से दार्जिलिंग महज 90 किलोमीटर है। यहां से शेयरिंग टैक्सी या फिर आरक्षित टैक्सी से आप दार्जिलिंग जा सकते हैं। निकटतम एयरपोर्ट बागडोगरा है। यह न्यूजलपाईगुड़ी से 12 किलोमीटर की दूरी पर है। मौसम की बात करें तो दार्जिलिंग सालों भर जाया जा सकता है। सिर्फ बारिश के दिनों में थोड़ी परेशानी हो सकती है। 
दार्जिलिंग में क्या देखें - शहर में चौरस्ता, हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट, चाय बगान, बोटानिकल गार्डन आदि देखा जा सकता है। दार्जिलिंग के आसपास घूम बौद्ध मठ, खिलौना ट्रेन पर जाय राइड, सन राइज प्वाइंट और मिरिक आदि जा सकते हैं। 

अगर आपके पास और ज्यादा समय है तो दार्जिलिंग के साथ ही सिक्किम जाने का भी कार्यक्रम बना सकते हैं। कितने दिन की बात करें तो सिर्फ दार्जिलिंग और आसपास घूमने के लिए आपको चार से पांच दिन का समय देना चाहिए। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(DARJEELING, BENGAL, NJP, SILIGURI ) 


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