Wednesday, July 18, 2012

बूढ़ा केदार से वापसी - धरने पर सुंदरलाल बहुगुणा जी (06)

बाल गंगा नदी के किनारे दस दिन रहने बाद इस घाटी से ऐसी आत्मीयता हो गई है कि अब जाने का दिल नहीं कर रहा है। पर चला चली की वेला आ गई है। यहां राहत शिविर खत्म होने के बाद हमलोग अब वापस चलने के लिए तैयार हैं। बहुत से नए दोस्त बने हैं। पते का आदान प्रदान जारी है। हमारी अलग अलग बसों से हुई। हमलोग वापसी में तकरीबन छह घंटे के सफर के बाद एक बार फिर टिहरी में रात को रूके। यहां पर इस बार हमारी मुलाकात महान पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा से हो गई। वे टिहरी में गंगा नदी पर बनाए जा रहे विशाल बांध के खिलाफ धरने पर बैठे हैं। बाद में उन्होंने 46दिनों का उपवास भी किया। 

बहुगुणा जी से हमारी मुलाकात इससे पहले वाराणसी में हो चुकी थीजब वे गंगा सागर से गंगोत्री तक साइकिल यात्रा का नेतृत्व करते हुए काशी पहुंचे थे।

तब बर्मी बौद्ध मंदिर में उनका स्वागत करने वाले स्वयंसेवकों में मैं शामिल था। तब उन्होंने मेरे आटोग्राफ बुक में लिखा था- वन हैं हमारे जीवन प्राण...इन्हें बचाना हम सबका पुनीत दायित्व होना चाहिए...उन्होंने हमलोगों से इस मुद्दे पर साथ देने को कहा। उनका मानना है बांध बनें मगर छोटे छोटे। हिमालय पहाड़ की चट्टानें कोमल हैं अगर बड़ा भूकंप आया तो बड़े बांध के कारण बड़ी तबाही आएगी। अब वहां  विशाल जलाशय बन चुका है। सैलानी वाटर स्पोर्ट्स की गतिविधियों में शामिल होते हैं। पर जब हम गए थे नजारा कुछ और था।


नदी की धारा को मोड़ा : हमने टिहरी में गंगा नदी की धारा का तीव्र बहाव देखा जिसे बांध बनाने के लिए एक सुरंग के माध्यम से तात्कालिक तौर पर मोड़ दिया गया था। इसी स्थल पर बहुगुणा जी धरना दे रहे हैं। उनके साथ उनकी पत्नी विमला बहुगुणा भी मौजूद हैं। विमला जी से हमें गुफ्तगू करने का मौका मिला। सुना है वह रामकथा भी काफी अच्छा सुनाती हैं।


पहली बार शांतिकुंज में - टिहरी से चलने के बाद देश के कोने कोने से आए हम 200 लोग एक बार फिर मिले हरिद्वार में भारत माता मंदिर के सामने साधुवेला स्थित बिनोबा सेवा आश्रम में। यहं सबने अपने अपने अनुभव साझा किए। रात को विशाल बोनफायर के सामने युवा गीतों का दौर।इन दस दिनों में जो दोस्त बन गए थे उनसे बिछड़ने का दुख। हरिद्वार में अगले दिन भी रुकना हुआ। इस दौरान हमलोग गायत्री तीर्थ शांति कुंज गए। 

शांतिकुंज भारत माता मंदिर से ज्यादा दूर नहीं है। सुबह और शाम का भोजन वहां के भोजनालय में लिया और शांतिकुंज के अलग अलग हिस्सों को देखा समझा। मैं बचपन से युग निर्माण योजना की गतिविधियों से जुड़ा रहा हूं पर शाांति कुंज आना पहली बार हुआ है। यहां बिपिन चतुर्वेदी के एक रिश्तेदार कालीचरण शर्मा जी से मिलने भी हमलोग गए। वे शांतिकुंज से सक्रिय कार्यकर्ता हैं।
वापसी में हरकी पौड़ी पर- विद्युत, राजीव, संजय, चंद्रभूषण।

शांतिकुंज के भोजनालय में एक साथ कई सौ लोग बैठकर भोजन करते हैं। यहां दिन के भोजन का समय 8 से 11 बजे है तो शाम का समय 4.30 से 7.30 तक का है।

वापसी के क्रम में इस हरिद्वार प्रवास में हमलोग हर की पौड़ी भी देखने गए। यहां पर गंगा जी में स्नान तो नहीं किया पर गंगा के भव्य रूप के दर्शन का सौभाग्य जरूर प्राप्त किया। लौटते हुए पावन धाम समेत कई मंदिरों के दर्शन करते हुए विनोबा सेवा आश्रम पहुंचे। इसके बाद हरिद्वार से रात की ट्रेन से वाराणसी के लिए हमारी वापसी है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com

(( HARIDWAR, RISHIKESH, NYP, , SHANTIKUNJ,  UTTRAKHAND)

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