Monday, May 26, 2014

शिवालिक डिलक्स का वह यादगार सफर ((06 ))

लाल रंग के छोटे-छोटे डिब्बे। आरामदायक सोफे जैसी सीटें। खिड़की से हरियाली को निहारते हुए लोहे की नन्ही पटरियों पर 96 किलोमीटर का सफर। शिवालिक डिलक्स से कालका से शिमला तक सफर जीवन भर नहीं भूलने वाला है। छुट्टियों में शिमला कई बार जा चुका हूं। इस बार अपने बाल गोपाल के साथ जा रहा था। जून में सारी ट्रेनों में एडवांस बुकिंग रहती है। इसलिए दिल्ली से शिमला का सफर टुकड़ों में शुरू हुआ।
दिल्ली से अंबाला शाने-पंजाब से। वहां से जिरकपुर तक बस से। जिरकपुर से पंचकूला में अपने स्कूली दोस्त के घर पहुंचा। मिथिलेश गुप्ता और मैं 1987-89 में लंगट सिंह कॉलेज मुजफ्फरपुर में साथ पढ़े थे। एक दो दशक बाद हम एक दिन मियां, बीवी और बच्चों के साथ रहे। एक यादगार दिन। बच्चों ने तो खूब मजा किया। हमारी योजना हमेशा की तरह टॉय ट्रेन से ही शिमला जाने की थी। आफ सीजन में टॉय ट्रेन में भीड़ नहीं होती। आप जनरल डिब्बे में भी मजे में जा सकते हैं।
खैर हमारे दोस्त ने पता किया कि शिवालिक डिलक्स जो सुबह 5.30 में चलती है उसकी एक डुप्लिकेट सुबह 6.30 में चलती है। इसका टिकट मैनुअल बनता है। 5.30 वाली ट्रेन में टिकट उपलब्ध नहीं था। पर उनकी कोशिश रंग लाई और हमें शिवालिक डिलक्स डुप्लिकेट के दो टिकट मिल गए। सुबह सुबह हमलोग कालका रेलवे स्टेशन पहुंचे तो आरपीएफ के इंस्पेक्टर साहब हमारे लिए दो टिकट खरीदकर हमारा इंतजार कर रहे थे। 

कालका से शिमला के बीच चलने वाली शिवालिक डिलक्स का किराया 280 रुपये है। कोच में सोफे जैसी सीटें हैं। चाय, वाटर बोटल और ब्रेकफास्ट टिकट में शामिल है। सुबह 6.30 में शुरू हुआ शिवालिक डिलक्स का सफर। कोच एटेंडेंट ने कालका में ही चाय पेश की। हमारी ट्रेन समय पर चल पड़ी। एक कोच में 18 लोगों के बैठने की जगह है। कुल छह कोच लगते हैं शिवालिक डिलक्स में। वैसे तो कालका शिमला के बीच शिवालिक का ठहराव सिर्फ बड़ोग में है लेकिन ट्रेन कई बार क्रासिंग के लिए रूकती है।


समय की बात करें ये भी पैसेंजर के बराबर छह घंटे समय ही लगा देती है शिमला पहुंचाने में, लेकिन सफर अरामदेह होता है। बड़ोग में हर ट्रेन 10 मिनट रूकती है। शिवालिक के यात्रियों का यहां नास्ता पेश किया जाता है। ट्रेन के चलते ही हमारे सुपुत्र अनादि तो सुरंगे गिनने में जुट गए। बड़ोग की सुरंग एक किलोमीटर से ज्यादा लंबी है। वहीं कोटी की सुरंग 700 मीटर लंबी है।
कालका शिमला के सफर में आपकी सहयात्रियों से तुरंत दोस्ती हो जाती है। छह घंटेके सफर में कई बार अच्छी दोस्ती हो जाती है। कालका शहर को पार करते ही ट्रेन बल खाती हुई पहाड़ों पर चढ़ने लगती है। ट्रेन एक सुरंग से निकलती है तो दूसरे सुरंग में घुस जाती है। कभी यह सड़क के किनारे आकर आते जाते वाहनों से संवाद करती जाती है तो कभी फिर से मांद में घुस जाती है। तो इस सुहाने सफर में छह घंटे तक चलता रहता लुका छिपी का खेल।

कई बार ट्रेन की खिड़की से पहाड़ों की ऊंचाई दिखाई देती है तो कई बार गहराई। टकसाल स्टेशन के आसपास ट्रेन एक ही जगह पर घूमती हुई पहाड़ पर काफी ऊंचाई पर पहुंच जाती है। शिमला पहुंच कर आपको पता चलता है कि आप 600 मीटर से चल कर 2100 मीटर की ऊंचाई पर आ चुके हैं। टकसाल के बाद कोटी में ट्रेन के ऊंचाई पर पहुंचने का अद्भुत नजारा दिखाई देता है। किसी बहुमंजिले इमारत पर चढ़ने जैसा उपक्रम करती दिखाई देती है ट्रेन। आपको खिड़की से दिखाई देता है थोड़ी देर पहले उस नीचे वाली पटरी पर थी ट्रेन।
धर्मपुर ऐसा स्टेशन है जहां सड़क और बस स्टाप स्टेशन के बगल में है। यहां सनावर के प्रसिद्ध लारेंस इंटरनेशनल स्कूल में जाने का रास्ता है। सोलन कालका शिमला के बीच का स्टेशन है। सोलन हिमाचल प्रदेश का जिला और बड़ा औद्योगिक शहर भी है।

कालका शिमला मार्ग के कई स्टेशन बिल्कुल जंगलों के बीच आते हैं। हर स्टेशन पर बच्चों के लिए झूले बने हैं। कई स्टेशन पर मास्टर अनादि ट्रेन रुकने पर झूले पर झूलने का मजा लेने के जिद करते रहे। हम झूलते-झूलते ही दोपहर तक शिमला के करीब पहुंच गए। सफर में समय का एहसास ही नहीं होता। शोघी रेलवे स्टेशन के बाद शिमला शहर दिखाई देने लगता है। तारा देवी, जतोग और समर हिल शिमला शहर के स्टेशन हैं। समर हिल में हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी है। शिवालिक डिलक्स ने हमें दोपहर साढ़े 12 बजे शिमला पहुंचा दिया।

शिमला से केएसआर पैसेंजर से वापसी - दो दिन बाद हमारी वापसी भी केएसआर से ही हुई। पर इस बार शिवालिक में नहीं बल्कि पैसेंजर ट्रेन से। जून की गर्मी में केएसआर में खूब भीड़ होती है । पर हमने शाम को चलने वाली ट्रेन में सीट का जुगाड़ कर ही लिया। पैसेंजर का किराया कालका तक महज 18 रुपये ही था। रास्ते के लिए खाना हमने शिमला से ही पैक करा लिया था। इस सफर में कुछ ही घंटे बाद अंधेरा छा गया। हमें कालका शिमला रेल के पुराने सफर याद आने लगे। पहली बार 2001 के जून महीने में अकेला आया था शिमला। आया तो बस से था पर वापसी खिलौना ट्रेन से की। इस दौरान चलती ट्रेन में वाराणसी के एक फोटोग्राफर से दोस्ती हुई थी। शादी के बाद जून 2003 में मैं और माधवी एक बार फिर कालका शिमला ट्रेन पर सवार थे। इस दौरान सहयात्रियों के साथ खूब मजे करते हुए सफर कटा था। शिमला पहुंचने से पहले बारिश आ गई थी और ट्रेन के कोच में फुहारें घुसने लगी थीं। 




हमारी सुनहरी यादों की परत मन में चल रही थी और कालका शिमला पैसेंजर ट्रेन धीरे धीरे नीचे उतर रही थी। हमलोग रात साढ़े दस बजे कालका पहुंच गए थे। वहां से बस से हमलोग चंडीगढ़ के सेक्टर 43 के बस स्टैंड पहुंचे। वहां हमारे साथी सुधीर राघव हमें घर ले जाने के लिए पहुंचे हुए थे। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(  KSR, KALKA SHIMLA RAIL, NARROW GAUGE, SHIVALIK DELUXE )