Sunday, July 15, 2012

बूढ़ा केदार: बाल गंगा घाटी में सूरज (03 )

पुराना टिहरी शहर ( UK TOURISM ) 

टिहरी शहर से हमारा आगे का सफर आरंभ हो चुका है। हमलोग दो बसों में सवार होकर बूढ़ा केदार की ओर जा रहे हैं। आखिर इस जगह का नाम बूढ़ा केदार क्यों हैं। इस पर हम आगे चर्चा करेंगे। कुछ घंटे बस में सफर कर घनसालीचमियाला होते हुए हम बूढ़ा केदार पहुंच गए। यह बाल गंगा नदी की घाटी में स्थित है। बूढा केदार में ऊंचे पहाड़ों के बीच घाटी में एक छोटे से स्कूल में बना हमारा बेस कैंप। यह लोक जीवन विकास भारती द्वारा संचालित एक स्कूल है। इसमें हमारे रहने का इंतजाम किया गया है।


महज दो घंटे की धूप : इस बाल गंगा घाटी में सूरज के दर्शन कम ही होते थे। धूप महज दो घंटे के लिए दोपहर में आती थी क्योंकि चारों तरफ से पहाड़ियां थीं। मानो सिर्फ हाजिरी बना कर चली जाती है। स्कूल के ठीक बगल में बहती थी बाल गंगा नदी। हालांकि एक से 10 दिसंबर के बीच ठंड इतनी ज्यादा थी कि मैं सिर्फ दस दिन में एक दिन ही नहाने का साहस कर पाया। हालांकि पंजाब से आए जसबीर जस्सी रोज नहा लेते थे। 

खुद भोजन बनाने का काम भी - दस दिनों के शिविर में हमें खाना भी खुद ही बनाना पड़ता था। इसके लिए अलग अलग समूहों की अलग अलग दिन रसोई बनाने में ड्यूटी लगती थी। पीने का पानी बाल गंगा नदी से लाते थे हमलोग । पर पानी इतना ठंडा होता था कि उले गर्म करके पीना पड़ता था। 


पांच स्वेटर में भी नींद नहीं...

बाल गंगा  बेस कैंप में हमारे लीडर थे मुजफ्फरपुर से आए डाक्टर एके अरुणपंजाब के सुखदेव सिंह और गुजरात के राजेश भाटेलिया। हमारे साथ बिहार के सुनील कुमार सेवकमीनाक्षी ओझा जैसे उत्साही साथी भी थे। बूढ़ा केदार में इतनी ठंड थी की मैं तो पांच स्वेटर पहने हुए भी सो जाता था। 
 
बाल गंगा घाटी के शिविर में  एक सुबह 

दस दिनों तक हम लोग आस पास के गांवों में जाकर लोगों से मिलकर उनकी जरूरतों का मुआयना करते थे। भूकंप के कारण ज्यादातर लोगों की घरों में दरारें पड़ गई थीं। आशियाना बिखर गया था। पहाड़ के साहसी लोग टूट गए थे। नायकवाड़ा गांव के हमारे स्थानीय साथी विक्रम सिंह हमें पहाड़ के संघर्षमय जीवन से वाकिफ कराते थे। उसके बाद उन्हें कंबल चादर और दूसरी राहत सामग्री बांटते थे जो हम अपने साथ लेकर आए थे। हम राहत शिविर से रोज जिन गांवों की ओर जाते थे वह 6 से 10 किलोमीटर तक दूर होते थे। गांव में आने और वापसी को मिलाकर हमारी रोज 20 किलोमीटर की ट्रैकिंग हो जाती थी। इन गांवों में पैदल चलकर जाने के अलावा कोई तरीका नहीं था। यहां गांव में जरूरत की सामानों की ढुलाई के लिए खच्चर एकमात्र सहारा हैं।
बाल गंगा घाटी में गांव के लोग 

मानिक दादा का कुत्ता  - दस दिनों का शिविर खत्म होने के बाद हमलोग वापस चलने को हुए। कई लोगों को पहाड़ पर छोटे छोटे कुत्ते मिल गए जिन्हें वे अपने साथ लेग गए। गुवाहाटी के हमारे एनवाई के सीनियर साथी मानिक हजारिका भी एक कुत्ते का पिल्ला अपने साथ ले जाना चाहते थे पर उन्हें कुत्ता नहीं मिला। उन्होंने अपना दुख मुझसे साझा किया। खैर चलते चलते उन्हें भी एक कुत्ता मिल गया। कुछ महीने बाद पता चला कि टिहरी का वो पिल्ला गुवाहाटी के मौसम में खुद को सामंजित नहीं कर पाया और असमय इस दुनिया से कूच कर गया। (www.nypindia.org  )
-    विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

HARIDWAR, RISHIKESH, TEHRI, UTTRAKHAND, NYP, EARTHQUAKE RELIEF CAMP 1991 )

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