Tuesday, July 31, 2012

पिपली- हजारों साल पुराना शिल्पकारों का गांव

पुरी से भुवनेश्वर के मार्ग पर आता है पिपली गांव। पिपली ओडिशा का शिल्पकारों का गांव है। गांव से गुजरते ही कला शिल्प की खुशबू का एहसास होने लगता है। सड़क के किनारे विशाल बाजार लगा है। इस बाजार में खासतौर पर रंग बिरंगे लैंप शेड लोगो को खूब प्रभावित करते हैं। इन लैंपशेड की आप खरीददारी तो कर ही सकते हैं। इसके साथ ही आप पिपली से हैंड बैग और दूसरे तमाम तरह के हस्तशिल्प के बने उत्पाद खरीद सकते हैं। पिपली की खास बात है कि यहां शिल्पकार खुद अपना सामान बेचते हैं। बीच में कोई मिडलमैन यानी बिचौलिया नहीं होता। इसलिए आपको यहां हस्तशिल्प उत्पाद सस्ते में मिल सकते हैं।
पिपली के कलाकार रंग बिरंगी साड़ियों का भी निर्माण करते हैं। महिलाओं को ये साड़ियां खूब पसंद आती हैं। इस गांव में कुछ वक्त गुजरने के बाद ये लगता है कि पिपली जैसे गांव देश के दूसरे राज्यों में भी होना चाहिए। पिपली की प्रसिद्धी देश के बाहर दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुकी है। 


यहां के कलाकार कपड़े के एक टुकड़े पर तरह तरह की कलाकृतियों का निर्माण करते हैं। ये कलाकृतियां आपका ड्राईंग रुम सजाने के काम भी आती हैं। दूर-दूर से आने वाले सैलानी यहां से कुछ न कुछ खरीद कर ले जाना पसंद करते हैं।पिपली के कलाकार रंग बिरंगी साड़ियों का भी निर्माण करते हैं। इस गांव में कुछ वक्त गुजरने के बाद ये लगता है कि पिपली जैसे गांव देश के दूसरे राज्यों में भी होना चाहिए। 


हजारों साल पुरानी परंपरा - पिपली गांव का इतिहास बहुत पुराना है। इस गांव में दसवीं सदी से ही शिल्पकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। तब गांव के लोग सालाना जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए छाता और कैनोपी (छतरियां) का निर्माण किया करते थे। तब कलाकार जगन्नाथ मंदिर और राजा की जरूरतों के हिसाब से निर्माण कार्य में लगे रहते थे। 11वीं सदी में पिपली गांव का कलाशिल्प चरम पर था। गांव के कलाकारों को राजा का संरक्षण प्राप्त था। 

पिपली गांव के कलाकार पुरी में होने वाली रथयात्रा के दौरान भगवान कृष्ण, बलभद्र और शुभद्रा के रथों के सजावट के लिए तमाम कलाकृतियां तैयार किया करते थे। यह कलाकारों द्वारा भगवान जगन्नाथ को की जाने वाली एक सेवा हुआ करती थी। यहां आज भी आप कलाकारों को सुंदर कठपुतलियां और पपेट आदि का निर्माण करते हुए भी देख सकते हैं।
पिपली के कलाकार अपनी कलाकृतियों के लिए कोलकाता से सूता मंगाते हैं तो कई सामग्री गुजरात के सूरत से आती है। छतरियों के निर्माण में वाटरप्रूफ रंगों का इस्तेमाल इनकी खासियत है। पिपली में निर्मित कपड़े की कलाकारी में देवी देवताओं का चित्रांकन देखा जा सकता है। खास तौर पर आप इसमें सूरज, चांद और राहु आदि का चित्रण देख सकते हैं। पिपली के शिल्पी हाथ से काम के अलावा आजकल सिलाई मशीन का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर करते हैं। पर वे दर्जी न होकर कलाकार हैं। 

कैसे पहुंचे - पिपली की दूरी पुरी से 40 किलोमीटर है। वहीं राजधानी भुवनेश्वर से पिपली 26 किलोमीटर की दूरी पर है। अक्सर पुरी-कोणार्क-भुवनेश्वर जाने वाली बसें पिपली गांव में जरूर रुकती हैं। इस ठहराव के दौरान आप वहां से शापिंग कर सकते हैं। अगर आप अपने वाहन से हैं तो पुरी या फिर भुवनेश्वर कहीं से भी पिपली जा सकते हैं।
vidyutp@gmail.com 
(PIPLI VILAGE, ODISHA, HANDICRAFTS ) 


Monday, July 30, 2012

भारत के सात अजूबों में एक है – कोणार्क का सूर्य मंदिर

पुरी के आसपास के स्थलो को घूमने के लिए हमने पैकज बस सेवा की बुकिंग की। यह किफायती और अच्छा  रहा। सुबह सात बजे हम पुरी होटल से बस में सवार हुए। बस का नाम है श्री राम। हमारा पहला पड़ाव है चंद्रभागा समुद्र तट। इसके बाद हम आ पहुंचे हैं कोणार्क।
अपने देश में कुछ गिने चुने ही सूर्य मंदिर हैं। इनमें ओडिशा के कोणार्क स्थित सूर्य मंदिर सबसे भव्य और प्राचीन है। अपनी सुंदरता और वैभव के लिए यह पूरी दुनिया में अनूठी पहचान रखता है।
देश का यह अनूठा सूर्य मंदिर 1984 में ही यूनेस्को के विश्व विरासत स्थलों में सूचीबद्ध हो चुका है। अद्भुत निर्माण के कारण इस सूर्य मंदिर को भारत के सात अजूबों में गिना जाता है। ये मंदिर कलिंग वास्तुकला का अदभुत नमूना है। मंदिर का परिसर 857 फीट लंबा 540 फीट चौड़ा है।

कोणार्क मतलब कोण धन अर्क। कोण माने कोना और अर्क माने सूर्य। इसकी बनावट इस तरह है कि हर कोण पर सूर्य की रोशनी पड़ती है। सूर्य मंदिर कोणार्क चंद्रभागा नदी के तट पर बना है। हालांकि अब चंद्रभागा नदी मंदिर से दूर चली गई है।


सूर्य मंदिर कोणार्क के परिसर में 1991 में परिवार के साथ। 
कोणार्क एक अधूरी कहानी - 13वीं सदी में बने इस मंदिर को ब्लैक पैगोडा भी कहते हैं। इस मंदिर का निर्माण 1250 में गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने करवाया था। राजा ने मंदिर निर्माण के लिए बिसु महाराणा नामक वास्तुविद की सेवाएं ली। मंदिर का निर्माण 12 साल में 12 हजार शिल्पियों ने मिलकर किया। पर मंदिर पूर्ण नहीं हो सका इससे राजा नाराज थे। हालांकि कहा जाता है कि बिसू महाराणा इस मंदिर का छत्र स्थापित करने में सफल नहीं हो सके थे। यह कार्य उनके बेटे 12 साल के धर्मपाद ने कर दिखाया पर इसके बाद उसकी रहस्यमय मौत हो गई।

पूरा मंदिर एक विशाल रथ के आकार का है। ये रथ सूर्य देव का है। इसमें पत्थरों से बने विशाल पहिए लगे हैं। इन पहियों पर शानदार नक्काशी देखी जा सकती है। रथ रूपि मंदिर में कुल 12 पहिए लगे हैं। इन पहियों का व्यास 3 मीटर का है। रथ के इन पहियों से सही समय का मापन किया जा सकता है। दिन हो या रात घंटा मिनट का अंदाजा लगाया जा सकता है। सूर्य के इस रथ को सात घोड़े खींच रहे हैं। इनमें चार घोड़े एक तरफ हैं तो बाकि तीन दूसरी तरफ।



साल 1837 में मंदिर का मुख्य हिस्सा जो 229 फीट ऊंचा था, ध्वस्त हो गया। इसके ध्वस्त होने को लेकर अलग अलग कथाएं हैं। हालांकि मंदिर का बड़ा हिस्सा आजकल खंडहर बन चुका है। पर दर्शक दीर्घा जिसे जगमोहन हाल कहते हैं वह 30 मीटर लंबा है, अभी भी बेहतर हालात में देखा जा सकता है। नट मंदिर ( नृत्यशाला) और भोग मंडप ( भोजन कक्ष ) भी देखा जा सकता है। सूर्य मंदिर के पास 11वीं सदी में बना मायादेवी का मंदिर स्थित है। इन्हें सूर्य की पत्नी माना जाता है। मंदिर के ध्वस्त हुए हिस्से को कोणार्क पुरातात्विक संग्रहालय में संरक्षित करके रखा गया है। 1894 में मंदिर से जुड़ी 13 कलाकृतियों को इंडियन म्यूजियम कोलकाता में रखा गया है। कोणार्क के सूर्य मंदिर के बारे में रविंद्रनाथ टैगोर लिखते हैं कि पत्थरों की भाषा इंसान की भाषा पर काफी भारी पड़ती है।

कहा जाता है कि वर्तमान सूर्य मंदिर से पहले भी यहां सूर्य मंदिर का अस्तित्व था। ओडिया लोग सूर्यको बिरंचि नारायण कहते हैं। सांब पुराण की कथा के मुताबिक कृष्ण के पुत्र सांब को कुष्ठ रोग हो गया था। उन्होंने ऋषि की सलाह पर 12 साल तक चंद्रभागा नदी के तट पर मित्रवन में सूर्य की तपस्या की और उनका कुष्ठ रोग दूर हो गया। तब सांब ने यहां सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। पुराणों के मुताबिक तब तीन सूर्य मंदिर थे। पहला कोणार्क में, दूसरा मुल्तान में और तीसरा मथुरा में।

कैसे पहुंचे - कोणार्क आप ओडिशा के जगन्नाथ पुरी से पहुंच सकते हैं या फिर राजधानी भुवनेश्वर से। कोणार्क अपेक्षाकृत ये पूरी से निकट है। पुरी से 35 किलोमीटर और भुवनेश्वर से 65 किलोमीटर की दूरी पर है कोणार्क। ये मंदिर सुबह 6 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है। भारत के और सार्क देशों के लोगो के लिए प्रवेश शुल्क 10 रुपये है जबकि विदेशी नागरिकों के लिए 250 रुपये। पुरी से चलने वाली पर्यटक बसें कोणार्क का दौरा कराती हैं।

vidyutp@gmail.com   -   यहां भी देखें – www.konark.nic.in
( WORLD HERITAGE SITE listed in  1984 ) 




Sunday, July 29, 2012

जगन्नाथ मंदिर, पुरी - बलभद्र-सुभद्रा के संग विराजते हैं कान्हा


चार धाम में से एक है पुरी का जगन्नाथ मंदिर। पुराणों में जगन्नाथ पुरी को इस धरती का बैकुंठ कहा गया है। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसारपुरी में भगवान विष्णु ने पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतार लिया था। 

ओडिशा स्थित यह धाम भी द्वारका की तरह समुद्र तट पर है। यहां जगन्नाथ मंदिर विराजते हैं भगवान कृष्ण अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ। पुरी का जगन्नाथ मंदिर अपनी सुंदरता और वास्तुकला में अद्भुत है साथ ही यहां भगवान का विग्रह भी अत्यंत मनोरम है।मंदिर अपनी विशिष्ट पूजा पद्धति के लिए भी विख्यात है। पुरी एक ओडिशा का एक छोटा सा समुद्र तटीय शहर है। पर भगवान जगन्नाथ के रथयात्रा के समय यहां देश दुनिया से लाखों श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं। 

जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा में श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा के रथ। 
आदि शंकराचार्य जी ने चार पीठों की स्थापना की थी। उत्तर में बद्रीनाथदक्षिण में श्रृंगेरीपूर्व में गोवर्धन तथा पश्चिम में द्वारका। चार धामों में तीन तो उन्हीं में से हैं केवल  श्रृंगेरी के बदले रामेश्वरम को एक धाम माना जाता है। आदि शंकराचार्य (सन 788 – 820) का पुरी में आगमन हुआ था। कहा जाता है कि अपनी विद्वत्ता से उन्होंने वहां के बौद्ध मठाधीशों के दांत खट्टे कर दिए और उन्हें सनातन धर्म की ओर आकृष्ट करने में सफल रहे और आत्मसात कर लिए गए। शंकराचार्य जी ने यहां अपना एक पीठ भी स्थापित किया जिसे गोवर्धन पीठ कहते हैं​।

मंदिर का निर्माण -  वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण बारहवीं सदी में हुआ है। गंग वंश के ताम्र पत्रों से यह ज्ञात होता है कि वर्तमान जगन्नाथ मंदिर के निर्माण कार्य को कलिंग राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने आरम्भ कराया था। मंदिर के जगमोहन और विमान भाग के शासन काल 1078 -1148 के बीच बने थे। इसके बाद 1197  में जाकर ओडिया शासक अनंग भीम देव ने इस मंदिर को वर्तमान रूप दिया था। मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां, एक रत्न मण्डित पाषाण चबूतरे पर गर्भ गृह में स्थापित हैं। कहा जाता है इन मूर्तियों की अर्चना मंदिर निर्माण से कहीं पहले से की जाती रही है। यह भी सम्भव है कि यह प्राचीन जनजातियों द्वारा भी पूजा की जाती रही हो।

 प्रसाद पकाने की अनूठी व्यवस्था - जगन्नाथ मंदिर की विशाल रसोई है। इस रसोई में प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं. यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी पर ही पकाया जाता है. इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है। 

जुलाई में  रथयात्रा - हर साल जुलाई में पुरी में विशाल रथयात्रा का आयोजन होता है। इस रथयात्रा के दौरान जब भगवान अपने मंदिर से निकल कर बलभद्र और सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा चले जाते हैं। इस दौरान पुरी में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। भगवान के ऱथ को खींचने में सहभागी बनकर लोग अपना जीवन सफल मानते हैं। पुरी में बाकी के 11 महीने में ज्यादा भीड़ नहीं होती।

कैसे पहुंचे -  पुरी आप रेल मार्ग हावडा से या फिर खड़गपुर से पहुंचा जा सकते है। अगर आप चेन्नई की तरफ से आ रहे हैं तो खुर्दा रोड से उतर कर पुरी पहुंच सकते हैं।

कहां ठहरें -  पुरी में ठहरने के लिए सस्ते धर्मशाला भी हैं,या आप समुद्र तट पर किसी अच्छे होटल में ठहर सकते हैं। पुरी के समुद्र तट पर कई सौ होटल हैं। पुरी के समुद्र तट पर लोकप्रिय होटलों में से एक है -पुरी होटल। http://www.purihotel.in/ पुरी रेलवे स्टेशन पर हर ट्रेन के पहुंचन के साथ इस होटल की बस यात्रियों को निःशुल्क अपने होटल ले जाने के लिए तैयार रहती है। 
--   माधवी रंजना
(JAGANNATH MANDIR, PURI, ODISHA ) 


Saturday, July 28, 2012

नीलांचल यानी पुरी का सुरम्य समुद्र तट

पुरी में समंदर से ये हमारी पहली मुलाकात थी। कहते हैं मनुष्य को अकेलेपन का वक्त काटना हो तो समंदर से बढ़िया कोई साथी नहीं हो सकता। वह भी अगर ओडिशा के पुरी का समुद्र तट हो तो बात ही क्या। पुरी का समुद्र तट यानी नीलांचल। इस समुद्र तट की बात बाकी समुद्र तटों से काफी अलग है। पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से दो किलोमीटर आगे है पुरी का विशाल और लंबा समुद्र तट। 

हिन्दुस्तान में वैसे तो मुंबईगुजरात, कर्नाटक, केरल,  चेन्नईकन्याकुमारी जैसे तमाम जगहों समुद्र तट देखा जा सकता है। किसी को कोई भी समुद्र तट सुंदर लग सकता है लेकिन पुरी के नीलांचल की बात कुछ अलग है। नीलांचल का मतलब ही पुरी है। तभी तो दिल्ली से पुरी जाने वाली ट्रेन का नाम ही नीलांचल एक्सप्रेस रखा गया है।

यहां बैठकर जब आप समुद्र को निहारते हैं तो आसमान के फलक और समुद्र के मिलन के बीच एक खास तरह का सानिध्य का एहसास नजर आता है। नीले रंग के इस समुद्र को आप घंटों निहारते रहें लेकिन आप को अकेलापन नहीं खलेगा। समंदर का संगीत जो रहता है साथ में।
पुरी होटल के बाहर 1991 
पुरी के समुद्र तट किनारे कई किलोमीटर में फैले होटल हैं। एक श्रंखला में सौ से ज्यादा होटल। अगर आप सी बीच पर किसी होटल में ठहरते हैं तो होटल के कमरे से भी समंदर की अटखेलियों का आनंद उठा सकते हैं। साथ ही आप समंदर के तट के साथ टहलते हुए कई किलोमीटर तक आगे बढ़ते जा सकते हैं। जब थक जाएं तो अपने होटल को वापस लौट आएं।

आप समंदर में नहाने का खूब मजा ले सकते हैं। लेकिन आपको पता ही होगा कि समंदर में नहाने के बाद फिर से आकर होटल के कमरे में साफ पानी में नहाना पड़ता है।
भगवान जगन्नाथ के शहर पुरी में छुट्टियां मनाना बाकी शहरों से सस्ता है। बस रथयात्रा का एक महीना ( जून जुलाई ) यहां का पीक सीजन होता है। साल के बाकी महीनों में यहां आना बेहतर है अगर आप समंदर की लहरों के साथ खेलना का पूरा आनंद उठाना चाहते हैं तो।

अगर आप पुरी जाएं तो समुद्र तट पर पुरी होटल में ठहरने का विकल्प चुन सकते हैं। यह एक मध्यवर्गीय सुविधाजनक होटल है। पुरी रेलवे स्टेशन से पुरी होटल के लिए होटल की ओर से फ्री बस सेवा भी उपलब्ध रहती है। पुरी होटल की खिड़की से आप देर रात तक समुद्र की लहरों का नजारा कर सकते हैं।



वैसे पुरी में समुद्र तट के किनारे पंक्ति में 100 से ज्यादा होटल हैं। पुरी होटल की अपनी विरासत और आतिथ्य की परंपरा है। देश आजाद होने वाले साल में ही 1947 में ये होटल तीन कमरोें के साथ शुरू हुआ था।  

पुरी सालों भर सैलानियों से गुलजार रहता है। वैसे यहां जाने के लिए सर्दी का मौसम ज्यादा अच्छा है। तब समंदर के किनारे टहलने का आनंद बढ़ जाता है। अगर आप पुरी जाएं तो समंदर के किनारे ही किसी होटल में रुकें तो ज्यादा आनंद आएगा। पुरी में समंदर के किनारे होटलों की लंबी फेहरिस्त है। सभी होटल समंदर के सामने खुलते हैं। यहां पर आप आनंद के कुछ दिन बड़े मजे से गुजार सकते हैं। कई सैलानियों को तो पुरी इतना पसंद आता है कि वे हर साल वहां जाने का कार्यक्रम बनाते हैं।

-  -   विद्युत प्रकाश मौर्य Email -vidyutp@gmail.com
NILANCHAL, BLUE SEA, PURI, ODISHA, PURI HOTEL )

Friday, July 27, 2012

ओडिशा के नीलांचल समुद्र की ओर...

साल 1991 का जुलाई का महीना। हमलोग पिताजी को बैंक से मिलने वाली पहली एलटीसी में कहीं घूमने जाने वाले थे। काफी सोच विचार के बाद तय हुआ की पहली बार की इस यात्रा में कोलकाता और जगन्नाथ पुरी भ्रमण का आनंद उठाया जाए। इसमें कुछ शैक्षिक और कुछ धार्मिक यात्रा दोनों हो जाएगी। पर बिहार की राजधानी पटना से पुरी के लिए तब सीधी ट्रेन नहीं थी। तो हमें पटना हावड़ा फिर वहां से ट्रेन बदलकर पुरी जाना था। कुछ दिन पहले पिता जी पटना जाकर ट्रेन में आरक्षण करा चुके थे।
शुरू हो गया सफर, दानापुर एक्सप्रेस के एसी-2 कोच में हम तीनो भाई। 

दानापुर एक्सप्रेस के एसी 2 क्लास से हमलोग सपरिवार हावड़ा के लिए सवार हुए। तब ट्रेन में एसी-3 डिब्बा आया ही नहीं था। शाम को पटना से ट्रेन समय पर खुली। माताजी-पिताजी और हम छह भाई बहन। इनमें से कुछ तो पहली बार ही ट्रेन में बैठे हैं। उनको कौतूहल हो रहा है कि एसी डिब्बा होने के कारण बाहर का नजारा ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है। हमलोग रेल में बैठने के बाद लंबी रेल यात्रा की उम्मीद में आराम फरमा रहे थे। 

सुबह नींद खुली तो ट्रेन डानकुनी जंक्शन क्रॉस कर रही थी। थोड़ी देर बाद खिड़की से स्टेशन दिखाई दिया लिलुआ। और इसके तुरंत बाद हावड़ा आ गया। ये क्या ट्रेन में सफर का पूरा मजा भी नहीं आया।

विशाल हावड़ा रेलवे स्टेशन पर:
हम पहली बार विशाल हावड़ा रेलवे स्टेशन को देख रहे थे। यहां आदमी से आदमी टकरा रहा था। इस हावड़ा स्टेशन का तो नजारा कुछ अलग ही था। हमने देखा कि यहां प्लेटफार्म तक कारें चली आती हैं सरपट। हमारी अगली ट्रेन शाम को थी। तो हमारे पास दिन भर समय था कोलकाता घूमने का। तो हमलोगों ने इस समय का सदुपयोग किया। पिताजी के परिचित का हावड़ा में एक होटल था। वहां सामान रखकर हमलोग दिनभर कोलकाता में घूमे। शाम को खाने पीने के बाद अगली ट्रेन के लिए हावड़ा स्टेशन पर मुस्तैद हो गए।

तब कंप्यूटरीकृत रेल आरक्षण तो शुरू हो गया था पर पूरा देश एक लिंक से जुड़ा नहीं था। पिताजी ने अपने हावड़ा से जगन्नाथ पुरी तक के टिकट को पहले ही किसी मित्र की मदद से हावड़ा से पुरी जाने वाली ट्रेन में भी आरक्षण करा लिया था। इसलिए अगली ट्रेन को लेकर हमलोग आश्वास्त थे। आगे का सफर शाम को श्री जगन्नाथ एक्सप्रेस से आरंभ हुआ। यह सफर भी रात भर का ही था। ट्रेन बालासोर, भद्रक होती हुई कटक पहुंची। कटक के बाद भुवनेश्वर। उसके बाद खुर्दा रोड फिर साक्षी गोपाल और फिर पुरी। सुबह हुई तो हमारी ट्रेन ओडिशा के स्टेशनों को पार कर रही थी। पुरी से पहले खुर्दा रोड नामक रेलवे स्टेशन से ही ट्रेन में पुरी मंदिर के पंडे आने लगे। उन्होंने हमारे खानदान के बारे में पूछताछ करना शुरू कर दिया। पर हमने पुरी में कहां जाकर रूकना है पहले से ही तय कर रखा था। लिहाजा रेल में मिलने वाले पंडों के चक्कर में नहीं पड़े। 


पुरी आखिरी रेलवे स्टेशन है। हमारी ट्रेन यहीं पर खत्म हो रही थी। पुरी से देश के हर कोने के लिए ट्रेनें खुलती हैं। रेलवे स्टेशन साफ सुथरा है। यहां क्लाक रुम समेत कई तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं। पुरी रेलवे स्टेशन से बाहर निकल कर हमलोग पुरी होटल जाने वाली बस में बैठ गए। यह होटल की ओर से प्रदान की जाने वाली निःशुल्क सेवा है। हालांकि हमलोग जगन्नाथ मंदिर के पास ही उतर गए। पुरी में हमारा पहले दिन का ठिकाना बना, गोयनका धर्मशाला। इस धर्मशाला में तब रहने का कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। पर चलते समय में सफाई व्यवस्था के नाम पर अत्यल्प राशि दान करने का अनुरोध धर्मशाला वाले करते हैं। यह धर्मशाला पुरी जगन्नाथ मंदिर के काफी करीब स्थित है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य   - vidyutp@gmail.com 

(PATNA- HOWRAH, PURI, JAGANNATH EXPRESS ) 



Thursday, July 26, 2012

बोल बम - पदयात्रा में होते हैं भोले बाबा के दर्शन


आनंदित करती है तीन दिन की पदयात्रा 
आस्था की यात्रा बोलबम में बाबा के मंदिर में जलाभिषेक करने का जो आनंद है, उतना ही या फिर उससे कहीं ज्यादा आनंद की अनुभूति सुल्तानगंज से देवघर पहुंचने की तीन दिन की पदयात्रा में है। ये सफर इतना विविधापूर्ण है कि आपको आनंदित करता है। वास्तव में शिव से साक्षात्कार तो इस यात्रा के क्रम मेंं ही हो जाता है। यह आपके अनुभूति की बात है कि शिव आपको किस रूप में मिलते हैं।  


दर्शनिया में होते हैं बाबा मंदिर के दर्शन - देवघर में बाबा वैद्यनाथ धाम मंदिर से एक किलोमीटर पहले आता है दर्शनिया। यह वैद्यनाथ देवघर शहर का बाहरी इलाका है। यहां से बाबा मंदिर के त्रिशूल के दर्शन हो जाते हैं इसलिए इसका नाम है दर्शनिया। अगर आप सीधे देवघर पहुंचना चाहते हैं दिल्ली हावड़ा लाइन पर जैसीडीह नामक रेलवे स्टेशन से वैद्यनाथ देवघर की दूरी 6 किलोमीटर है। हालांकि देवघर तक भी सीधी रेलवे सेवा है।

पंडो का शहर है देवघर - देवघर शहर में बाबा मंदिर पहुंचने से पहले दर्शनिया में ही हम अपने पंडा रत्नेश्वर मठपति झा के घर में रुके। उनका घर हिंदी विद्यापीठ गेट के पास है। शायद अब वे इस दुनिया में नहीं होंगे, क्योंकि वे काफी बुजुर्ग हो चुके थे। उनके बेटे अपने पुरोहितों का ख्याल रखते होंगे। वैसे पूरा देवघर शहर पंडों से पटा पड़ा है। जो लोग नियमित जाते हैं उनका कोई न कोई तय पंडा पहले से ही होता है। ये सारे पंडा लोगों ने अपने आवास में धर्मशाला बना रखी है। उनके ठहरने का कोई शुल्क तय नहीं है। जैसा भक्त वैसी सेवा। कुछ पंडों ने वातानुकूलित कमरे भी बनवा रखे हैं अपने भक्तों के लिए। 
इन पंडा परिवारों की साल एक महीने यानी सावन में ही इतनी कमाई हो जाती है कि साल के 11 महीने कुछ खास काम करने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। 



देवघर से बाबा बासुकी नाथ की ओर - बोलबम की यात्रा में कांवर मे ंदो जल पात्र होते हैं। एक बाबा धाम के लिए दूसरा दुमका जिले में स्थित बासुकीनाथ मंदिर के लिए। ऐसी मान्यता है कि बासुकीनाथ में पूजा किए बिना सिर्फ देवघर मंदिर का पूजा अधूरी है। बासुकीनाथ देवघर-दुमका मुख्य पर 40 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां पहुंचने में एक घंटे में लगते है। बासुकीनाथ झारखंड के दुमका जिले में जरमुंडी कस्बे के पास स्थित है। दुमका से बासुकीनाथ की दूरी 25 किलोमीटर है। बासुकी नाथ को नागेश या फौजदारी बाबा के नाम से जाना जाता है। 


कहा जाता है कि ये बाबा लोगों की जल्द सुन लेेते हैं और तुरंत न्याय भी करते हैं। किसी समय में बासुकीनाथ मंदिर के आसपास का इलाका सघन वन वाला हुआ करता था। कहा जाता है कि प्राचीन समय में बासुकी नाम का एक किसान जमीन पर हल चला रहा था तभी उसके हल का फाल किसी पत्थर के टुकड़े से टकरा गया। इसके बाद वहां दूध की धारा बहने लगी। इसे देखकर बासुकी भागने लगा तब आकाशवाणी हुई, तुम भागो नहीं मैं शिव हूं।  इसके बाद यहां पूजा होने लगी। उसी बासुकी के नाम पर इस मंदिर का नाम बासुकीनाथ धाम पड़ा। 

बाबा धाम में जलाभिषेक के बाद अगले दिन सुबह हमलोग बासुकीनाथ धाम के लिए चल पड़े। देवघर से हमने बस से बासुकीनाथ धाम तक की यात्रा की। सावन में देवघर से बासुकीनाथ के लिए 24 घंटे बसें चलती रहती हैं। दुमका जिले में जरमुंडी से थोड़ा आगे बाबा बासुकीनाथ का मंदिर है। ज्यादातार बोलबम के यात्री देवघर से बासुकीनाथ बस से ही जाते हैं। पर कुछ लोग ये यात्रा भी पैदल ही करते हैं।



देवघर की तुलना में बासुकीनाथ मंदिर में  जलाभिषेक करने में ज्यादा समय नहीं लगा। पर दर्शन की लाइन में मैं और पिताजी अलग हो गए। मंदिर में जल चढ़ाने के बाद निकलते वक्त किसी ने जेबकतरे ने मेरे निक्कर की जेब से सारे पैसे निकाल लिए। हालांकि रुपये कुछ ज्यादा नहीं थे। बासुकीनाथ से लौटकर हमलोग जैसीडीह रेलवे स्टेशन पहुंचे। यहां से हमने पटना के लिए ट्रेन ली। शाम तक हमलोग हाजीपुर अपने घर पहुंच चुके थे।

- विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com

(DEVGHAR, DEOGHAR, SULTANGANJ, BABADHAM, BOLBAM, SAWAN, SHIVA, BASUKINATH, DUMKA, JHARKHAND) 

Wednesday, July 25, 2012

आस्था की पदयात्रा- बोलबम, सुलतानगंज से देवघर 118 किलोमीटर

सुलतानगंज में गंगा नदी का विस्तार 
हर साल सावन में उमड़ता है शिवभक्ति सैलाब। देश भर में शिव की पूजा के अलग अलग रंग देखने को मिलते हैं।जम्मू में अमरनाथ यात्रा तो हरिद्वार में कावड़ यात्रा। पश्चिम बंगाल में शिवभक्त तारकेश्वर नाथ जलाभिषेक करने जाते हैं। लेकिन बिहार और झारखंड में सुल्तानगंज से देवघर की 119 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा अनूठी है। बिहार में सुल्तानगंज में गंगा से जल लेकर श्रद्धालु बोलबम के नारे लगाते चल पड़ते हैं देवघर की ओर। बोलबम का नारा है बाबा एक सहारा है। लाखों श्रद्धालु तो हर साल जाते हैं बोलबम।
आस्था की इस अनूठी यात्रा का सहभागी बनने का मौका मिला था मुझे  साल 1990 में। इंटर पास करने के बाद बीएचयू में एडमिशन लेने की प्रक्रिया में था। इसी दौरान पिता जी के बैंक के कुछ पारिवारिक मित्रों की मंडली बनी और हम निकल पड़े। पिताजी पहले भी बोलबम जा चुके थे मेरे लिए यह पहला मौका था। बोलबम के परिधान के लिए केसरिया निक्कर बनियान सब हाजीपुर से ही ले लिया था। हमलोग पटना से ट्रेन से सुल्तानगंज पहुंचे।सुल्तानगंज में गंगा उत्तरायण बहती है वाराणसी की तरह। यहां पर भी एक शिव का मंदिर है जिसे अजगैबीनाथ के नाम से जानते हैं।

पहला दिन - सुबह सुबह सुलतानगंज के बाजार से सबके लिए कांवर खरीदा गया। भागलपुर जिले के सुल्तानगंज से शुक्रवार की सुबह हम सबने एक साथ जल उठाया। जल उठाने से पहले गंगा में स्नान और कांवर की पूजा की। इसके बाद के लंबे पैदल सफर की शुरुआत। नंगे पांव।सारा रास्ता संगीतमय होता है। हर साल बाबा की महिमा गान करने वाले सैकड़ो कैसेट निकलते हैं। रास्ते में गई गायक भी मंडली में गाते मिल जाएंगे। हाथी ना घोड़ा ना कौनो सवारी...पैदल ही पैदल अइनी हम भोला तोहरे दुआरी... 118  किलोमीटर के सफर में पहले सड़क भी कच्ची रास्ता, फिर नदी, पहाड़, जंगल सब कुछ आता है।

सुलतानगंज से तारापुर तक का रास्ता पक्की सड़क के साथ-साथ चलता है। इस दौरान कांवरिया लोगों की सलाह दी जाती है कि पक्की सड़क पर नंगे पांव चलने के बजाय फुटपाथ पर ही चलें। इससे पांव में छाले नहीं पड़ेंगे। तारापुर के बाद हमलोग बायीं तरफ नहर पकड़ कर कच्ची सड़क पर कुछ किलोमीटर का रास्ता तय करने लगे। रामपुर के बाद एक छोटी सी नदी आई। शाम होने पर पहुंच चुके हैं 36 किलोमीटर चलकर कुमरसार धर्मशाला में। यहां हमारा पहला पडाव था। दिन की यात्रा में हमारी पूरी मंडली साथ रही। रात को हमलोग एक साथ ही रूके। पहला दिन अच्छा रहा। पिताजी के दोस्त आईडीएन सिंह और राम बरन राय के बेटे साथ थे। वे मेरी उम्र के थे। उनके साथ हंसी-खुशी में सफर कट गया।

बोल कांवरिया बोल बम - दूसरा दिन -  अगले दिन से कमरसार से हमलोग सुबह-सुबह चल पड़े। पापा के मित्र आरबी राय के बोलबम कहने और उत्साह बढ़ाने का अंदाज निराला था। पर कुछ घंटे चलने के बाद सबकी गति अलग अलग हो गई। कोई  तेज चल रहा था तो कोई धीरे-धीरे। यानी सब आगे पीछे चलने लगे। थोड़ी देर बाद मैं और पिता जी ही साथ चल रहे थे। बाकी सब लोग अलग हो चुके थे।

और जब मैं पड़ गया अकेला - विश्वकर्मा टोला, महादेव नगर, चंदननगर पार करने के बाद इस दौरान एक वक्त ऐसा भी आया जब मैं अपनी मंडली से अकेला पड़ गया।  कई किलोमीटर तो मैं पिता जी से भी बिछुड़ गया। मेरे जेब में ज्यादा रुपये भी नहीं थे। अगर देवघर पहुंच भी जाउं तो पिता जी और उनकी बाकी मंडली से आस्था के महाकुंभ में मुलाकात कहां-कैसे होगी, यह सोच कर मैं चिंता में पड़ गया। मेरी पहली यात्रा थी। कहां रुकना है ये भी मालूम नहीं था। मैं अपना कांवर एक जगह स्टैंड पर रखकर एक यात्रा द्वार के पास बैठ गया। कुछ घंटे बाद पीछे से आ रहे पिता जी ने अचानक मुझे देख लिया। इस तरह हमारी मुलाकात हो गई। हमने तय किया कि आगे एक दूसरे का ध्यान रखेंगे। 

सूइया पहाड़ को किया पार - हमलोग जिलेबिया मोड, सूईया पहाड़, अबरखिया पहाड़ आदि को पार कर चुके हैं। सूईया पहाड़ की खासियत है कि यहां पांव में सूई के मानिंद पत्थर चुभते हैं। थोड़ा दर्द होता है पर वह एक्यूप्रेशर का काम करता है पांव के तलवों के लिए। पर बाबा के मतवाले भक्त इसे हंसते खेलते पार कर जाते हैं। कहते हैं इस पहाड़ से गुजरना कुछ कुछ एक्यूप्रेशर चिकित्सा की तरह है।

बोलबम के सारे रास्ते में मेले सा माहौल रहता है। लेकिन रात्रि विश्राम के लिए जहां रुकते हैं वहां जगह को लेकर मारा मारी रहती है। दूसरे दिन दोपहर के बाद मैं पिता जी के साथ काफी उत्साह से चलता रहा। रात को तय हुआ था कि हमलोग कटोरिया में धर्मशाला में रुकेंगे। कटोरिया बांका जिले में आता है। यह बोलबम यात्रा मार्ग में 78वें किलोमीटर पर है। कई ठहरने के लिए कई पक्के धर्मशाला बने हुए हैं।

पर मेरे अंदर चलने का उत्साह कायम था। हम कटोरिया में नहीं रुके। हम सफर तेजी से तय करते रहे। पर जब चलते चलते अंधेरा बढ़ने लगा और रात को भूख लगी तो आसपास तलाशने पर कोई भोजनालय नहीं मिल रहा था। हम कुछ किलोमीटर और चले। तब जाकर एक छोटी सी चाय की दुकान में खाना नसीब हुआ। लेकिन क्या मिला उस छोटी सी दुकान में सिर्फ भात दाल और चोखा। खैर भूख लगी थी तो उसमें भी बहुत स्वाद लगा। दूसरी रात सोने की उपयुक्त जगह भी नहीं मिली। दुकान की बेंच पर ही सोना पड़ा। बारिश भी हो रही थी। भींगते हुए किसी तरह नींद ली और सुबह का इंतजार किया। 

बाबा नगरिया दूर है जाना जरूर है - तीसरा दिन - तीसरे दिन हमारे पांव थकने लगे थे। लेकिन धीरे धीरे देवघर नजदीक आता जा रहा था। अब रास्ते में जगह जगह प्रशासन के बोर्ड लगे थे- कांवरियों से आग्रह है कि धैर्य बनाए रखें। जगह जगह बाबा मंदिर की दूरी लिखी हुई मिल रही थी। 

करीब 94 किलोमीटर की पदयात्रा करके हम इनरावरण पहुंच चुके हैं। यहां से बाबा मंदिर 24 किलोमीटर रह गया है। ऐसा लग रहा था मानो को चुंबकीय शक्ति हमें खींच रही थी अब। इनरावरण के बाद भुल भुलैया, गोरियारी, पटनिया, कलकतिया में छोटी-छोटी नदियां आती हैं, इन्हें नंगे पांव पार करने में आनंद आता है। गोरियारी नदी में तो मैं कांवर रखकर देर तक नहा कर थकान मिटाता रहा।  कई बार तेज बारिश होने पर इन नदियों में पानी बढ़ जाता है। 

बाबाधाम नजदीक आने पर कई राहत और सेवा शिविर भी रास्ते में आते हैं। यहां थके पांव में बाम और आयोडेक्स लगाने का इंतजाम रहता है। एक जगह हमने भी गर्म पानी में पांव डाल कर राहत महसूस करने की कोशिश की।
बिहार और झारखंड दो राज्यों के पांच जिलों में यात्रा -  बाबा धाम की यात्रा मार्ग का 100 किलोमीटर से ज्यादा हिस्सा बिहार राज्य की सीमा में है। गोरियारी के बाद पदयात्रा का मार्ग झारखंड राज्य में प्रवेश करता है। दुम्मा बिहार झारखंड की सीमा है। हालांकि जिस साल मैंने यात्रा की थी तब झारखंड राज्य का गठन नहीं हुआ था। तब देवघर भी बिहार में ही आता था। दर्शनिया वह जगह है जहां से बाबा मंदिर के दर्शन हो जाते हैं। भूत बंगला के आसपास जंगल जैसा क्षेत्र भी आता है। शाम होने से पहले हमलोग देवघर शहर के करीब पहुंच चुके हैं।


रविवार शाम को किया जलाभिषेक - वह रविवार की शाम थी। हमने सोमवार का इंतजार नहीं किया श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए हमने रविवार की शाम को ही जलाभिषेक करने का फैसला किया। कहते हैं आप बाबाधाम तभी पहुंचते हैं जब आपको बाबा बुलाते हैं। तभी तो भक्त कहते हैं.. चलो बुलावा आया है... बाबा ने बुलाया है। तो ...चल रे कांवरिया शिव के नगरिया...


ऐसा है बोलबम का यात्रा मार्ग   

बाबा अजगैबी नाथ मंदिर (सुल्तानगंज, जिला भागलपुर, बिहार) से कामराय 6 किमी
कामराय से मासूमगंज 2 किमी  - 08
मासूमगंज से असरगंज 5 किमी - 13
असरगंज से रणगांव 5 किमी 18
रणगांव से तारापुर ( जिला - मुंगेर, बिहार ) 3 किमी 21
तारापुर से माधोडीह 2 किमी 23
माधोडीह से रामपुर 5 किमी 28
रामपुर से कुमरसार (मुंगेर ) 8 किमी 36 ( पहला रात्रि विश्राम ) 

कुमरसार से विश्वकर्मा टोला 4 किमी- 40 
विश्वकर्मा टोला से महादेव नगर 3 किमी - 43
महादेव नगर से चंदन नगर 3 किमी - 46 
चंदननगर से जिलेबिया मोड 8 किमी - 54
जिलेबिया मोड से तागेश्वरनाथ 5 किमी - 59 
तागेश्वरनात से सूईया पहाड़ 3 किमी- 62
सुईया से शिवलोक 2 किमी - 64
शिवलोक से अबरखिया 6 किमी- 70
अबरखिया से कटोरिया (जिला - बांका, बिहार)  8 किमी - 78 
( दूसरा रात्रि विश्राम ) 

कटोरिया से लक्ष्मण झूला - 8 किमी - 86
लक्ष्मण झूला से इनरावरण (बांका) 8 किमी - 94
इनरावरण से भूलभुलैया नदी -3 किमी - 97 
भूलभुलैया नदी से गोरियारी (बांका) - 5 किमी - 102 किमी 


गोरियारी से पटनिया - 5 किमी - 107 
पटनिया से कलकतिया नवाडीह (झारखंड) - 3 किमी - 110
कलकतिया से भूत बंगला -5 किमी - 115
भूत बंगला से दर्शनिया - 1 किमी - 116
- दर्शनिया से बाबा वैद्यनाथ मंदिर 1 किमी - 117 किलोमीटर।

( आगे पढ़िए - देवघर शहर और बासुकीनाथ के दर्शन )


- विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com
( DEVGHAR, DEOGHAR, SULTANGANJ, BABADHAM, BOLBAM, SAWAN, SHIVA) 

Tuesday, July 24, 2012

मैया बाबू लाइन होटल- मलयपुर

हमलोग पटना से देवघर की यात्रा पर हैं। वैसे तो देश भर में अनगिनत लाइन होटल और ढाबे हैं। लेकिन पटना से देवघर जाते हुए जमुई जिले के मलयपुर में है अनूठा लाइन होटल। जी हां, नाम है - मैया बाबू लाइन होटल। जैसे ही आप इस होटल में रूकते हैं..होटल की दीवारों पर ढेर सारे नीति वचन और प्रेरक वाक्य लिखे हुए दिखाई देते हैं। आप चाय नास्ता लेते हुए काफी कुछ यहां से प्रेरणा भी ले सकते हैं। अगर अंग्रेजी में अनुवाद करें तो नाम होता है मम्मी पापा लाइन होटल। ये होटल सन 1935 से चल रहा है। जब जमुई से बाबा धाम यानी देवघर जाने के लिए कच्ची सड़क हुआ करती थी। तब से चल रहा ये होटल। बाबा धाम जाने वाले कांवरियों को ये होटल दशकों से राह दिखाता आ रहा है। होटल खोलने वाले महेंद्र सिंह पास के ही गांव मलयपुर के रहने वाले हैं।

महेंद्र सिंह जीवन के 90 वसंत देख चुके हैं,लेकिन आंखे और दांत सलामत हैं। सेहत बहुत अच्छी है। बाबा भोले के भक्तों से उन्हें खास लगाव है। मलयपुर बिहार के बड़े गांवों में शुमार है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह इसी गांव से हुए। करीब 500 राजपूत परिवारों के इस गांव के रहने वाले महेंद्र सिंह ने अपना पारिवारिक व्यवसाय छोड़कर कांवर लेकर जाने वाले बाबा भोले के भक्तों की सेवा में ये लाइन होटल खोला।

मैया बाबू लाइन होटल नाम क्यों...महेंद्र सिंह कहते हैं, जब जब आप मेरे होटल का नाम लेंगे अनायास ही आप अपने मां और पिताजी को याद कर लेंगे। तो भला इससे बढ़िया कोई नाम हो सकता है क्या.. मलयपुर से देवघर की दूरी 101 किलोमीटर है। होटल दीवारें कांवरियों को रास्ता बताती हैं साथ ही आगे के मार्ग की सावधानियों के बारे में भी आगाह करती हैं। आगे सोनो और चकाई के जंगल हैं। रास्ता टेढ़ा-मेढा और खतरनाक है। जहां से जो बातें अच्छी लगीं महेंद्र सिंह जी ने उसे अपने होटल के दीवारों पर चस्पा कर दिया है। कहते हैं, इन दीवारों पर लिखे नीति वचन से एक पर भी अगर आपने अमल कर लिया तो मेरी कोशिश सफल होगी। साथ ही आपके जीवन में भी बदलाव आएगा।

 महेंद्र सिंह की बूढ़ी आखों को 1934 का भूकंप याद है। आजादी  संघर्ष याद है। देश के आजाद होने का जश्न भी याद है। इतिहास के स्मृति चिन्हों में रूचि है। जमुई के खादी आश्रम में लंबे समय तक रहे आचार्य राममूर्ति का भी उन्हें साहचर्य मिला। जमुई और आसपास के चप्पे चप्पे का इतिहास उनके जुबान पर है। वे जमुई जिले के भीम बांध की चर्चा करते हैं। कहते हैं पांडवों ने अज्ञातवास के समय भीम बांध बनाया था। इन सारे इलाकों को बहुत अच्छे पर्यटक स्थल में विकसित किया जा सकता है लेकिन भीमबांध इलाके में नक्सलियों का कब्जा है।

प्रेरक किताब बोल अनमोल - मलयपुर गांव का जैन धर्म के इतिहास में भी महत्व है। मैया बाबू लाइन होटल के ठीक सामने जैन मंदिर भी है। यहां जल्द ही एक करोड़ की लागत से बनी महावीर स्वामी की मूर्ति लगाई जाने वाली है। अपने होटल में आने वाले लोगों को लिए महेंद्र सिंह ने एक किताब भी प्रकाशित कराई है. बोल अनमोल..अच्छी अच्छी बातों और प्रेरक गीतों का संग्रह। महेंद्र सिंह समाज में कई तरह की विकृतियों और मूल्यों का ह्रास देख रहे हैं लेकिन फिर भी वे जीवन में निराश नहीं हैं। कहते हैं बहुत तपस्या के बाद मानव जीवन मिलता है। इसलिए हमें सत्कर्म ही करना चाहिए। अगर दुबारा जन्म लेने का मौका मिला तो भी मनुष्य ही बनना चाहूंगा। नहीं, मोक्ष की कामना बिल्कुल नहीं है। बार-बार धरती पर आकर लोगों की सेवा करना चाहता हूं। 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   Email- vidyutp@gmail.com
(MAIYA BABU LINE HOTEL, MAHENDRA SINGH, MALAYAPUR, BABA DHAM ROAD ) 

Monday, July 23, 2012

चेन्नई- मरीना बीच पर मछली का स्वाद

आध्यात्मिक युवा शिविर बेंगलुरु  से लौटकर हमलोग सुबह सुबह चेन्नई पहुंचे। हमलोगों ने एक दिन चेन्नई में रूकना तय किया। हमारी ट्रेन अगले दिन थी इसलिए हमारे पास चेन्नई घूमने का अच्छा मौका था। रात को हमलोग बेंगलुरु सिटी रेलवे स्टेशन से कावेरी एक्सप्रेस से चले थे। सुबह 7 बजे चेन्नई सेंट्रल में थे। हमारी योजना थी चेन्नई शहर घूमने की। पर जनवरी में भी वहां गरमी लग रही थी। तब इस शहर का नाम मद्रास हुआ करता था। हमारे साथ बीएचयू के साथी और पटना के सुनील सेवक की पूरी टीम थी। हमलोगों ने चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन के सामने एक गली में एक दिन के लिए एक होटल में आसरा लिया। अब होटल का नाम याद नहीं आ रहा। अब हमें करनी थी पेट पूजा। छात्र जीवन में होटलों का मीनू में खाने पीने की दरें पहले देखा करते थे। अगर जेब के अनुकूल लगे तभी खाने की टेबल की ओर जाते थे। काफी खोजबीन कर एक होटल में खाने पहुंचे। नाम था मुरादी होटल भागीरथी। महज 7 रुपये में भरपेट खाना। केले के पत्ते पर। मजा आ गया।



चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन के बगल में वाल टैक्स रोड पर स्थित है मुरुदी होटल भागीरथी। ये शुद्ध शाकाहारी भोजनालय केरला लॉज के बगल में है। होटल में खाते समय एक सीतामढ़ी के सज्जन हमारे बगल वाले टेबल पर खाते हुए मिल गए। बताया स्टेशन के पास खाने की सबसे अच्छी जगह है। मैं तो रोज यहां आता हूं। यहां दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय भोजन दोनों ही मिलते हैं। यहां से आप खाना पैक भी करा सकते हैं। होटल के बाहर हिंदी में लिखा है खाना तैयार है। होटल के अंदर दो तरह के डाइनिंग हाल हैं। एक समान्य दूसरा वातानुकूलित। वातानुकित में खाने की दरें थोड़ी ज्यादा हैं। ( Murudi Hotel Bhagirathi, 339, Wall Tax Rd Edapalaiyam, George Town, Chennai, Tamil Nadu 600003  TEL.  044- 25353437,  25330812,  42358577)
इसके बाद चेन्नई में सबसे पहले हम मरीना बीच पर पहुंचे। रेलवे स्टेशन से कुछ किलोमीटर दूरी पर ही है ये समुद्र तट। वहां दिनभर काफी चहल पहल रहती है।  हालांकि यहां साफ सफाई ज्यादा नहीं रहती। मरीना बीच पर समुद्र की भुनी हुई मछली का स्वाद लिया। इसके बाद हम आगे बढ़े  चेन्नई में हमलोग सी अन्ना दुर्रै की समाधि देखने भी गए। वे तमिलनाडु के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री और द्रविड मुनेत्र कडगम के संस्थाापक भी थे। इसके बाद हमारा पड़ाव था बस से चलकर गोल्डन बीच। बीच क्या यह एक विशाल रिजार्ट है। गोल्डन बीच पर रेस्टोरेंट थोड़े महंगे लगे, लेकिन यहां भी हम मसाला डोसा का जायका लेना नहीं भूले।


चेन्नई से महाबलीपुरम की ओर

चेन्नई के गोल्डेन बीच से हम बाहर निकले तो चल पड़े महाबलीपुरम की ओर। एक घंटे का बस सफर करके हमलोग पहुंच गए मामल्लापुरम। यहां सबसे पहले हमने देखा समुद्रतटीय मंदिर। वह मंदिर जिसके बारे में अब तक इतिहास की सिर्फ किताबों में पढ़ा था।  महाबलीपुरम का समुद्र तट काफी खूबसूरत है। भीड़ भाड़ और कोलाहल से दूर। शांत। यहां घंटो गुजारो तो भी कम है। हम लहरों की अटखेलियां का मजा ले रहे थे तभी आ गई घनघोर बारिश। अब हम लोगों में से किसी के पास कोई छाता नहीं था। हाल में चेन्नई सफर के दौरान धूप से बचने के लिए खरीदी गई स्ट्रा हैट भी तेज बारिश में काम नहीं आई। 

महाबलीपुरम में संजय कुमार  (पटना), राजीव सिंह और मैं । (जनवरी 1992)
इस बारिश में हमलोग जमकर भींगे। वह भींगना कभी नहीं भूलेगा। एक बार फिर घूमते घूमते भूख भी खूब लगी थी। दौड़कर भागे और जो भी नजदीक दिखाई दे गया, एक रेस्टोरेंट में शरण ली। और टूट पड़े मसाला डोसा पर। मामल्ला होटल में महज साढ़े तीन रुपये का था एक मसाला डोसा। लेकिन स्वाद था...भाई वैसा स्वादिष्ट मसाला डोसा दुबारा कभी नहीं खाया। बारिश के कारण महाबलीपुरम के दूसरे ऐतिहासिक स्मारक हमलोग नहीं देख सके।
डोसा का स्वाद लेने के बाद हमलोग वापस चल पड़े हैं चेन्नई की ओर। रात को हमारी ट्रेन थी पटना मद्रास एक्सप्रेस। आना गंगा कावेरी से हुआ था वापसी पटना मद्रास एक्सप्रेस से हो रही है। मार्ग लगभग वही है। रेल मंत्रालय की कृपा से हमारा आरक्षण कन्फर्म था। मजे की बात यह रही है कि टीटीई ने हमसे आरक्षण शुल्क भी नहीं मांगा। कई राज्यों से गुजरते हुए लंबे सफर के बाद हमलोग मुगलसराय पहुंचे। हमें हमारा विश्वविद्यालय बुला रहा था। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com ( जनवरी 1992) 
(CHENNAI, GOLDEN BEACH, MAHABALIPURAM, SHORE TEMPLE AND RAIN )