Tuesday, July 31, 2012

भारत के सात अजूबों में एक है – कोणार्क का सूर्य मंदिर

पुरी के आसपास के स्थलो को घूमने के लिए हमने पैकज बस सेवा की बुकिंग की। यह किफायती और अच्छा  रहा। सुबह सात बजे हम पुरी होटल से बस में सवार हुए। बस का नाम है श्री राम। हमारा पहला पड़ाव है चंद्रभागा समुद्र तट। इसके बाद हम आ पहुंचे हैं कोणार्क।
अपने देश में कुछ गिने चुने ही सूर्य मंदिर हैं। इनमें ओडिशा के कोणार्क स्थित सूर्य मंदिर सबसे भव्य और प्राचीन है। अपनी सुंदरता और वैभव के लिए यह पूरी दुनिया में अनूठी पहचान रखता है।
देश का यह अनूठा सूर्य मंदिर 1984 में ही यूनेस्को के विश्व विरासत स्थलों में सूचीबद्ध हो चुका है। अद्भुत निर्माण के कारण इस सूर्य मंदिर को भारत के सात अजूबों में गिना जाता है। ये मंदिर कलिंग वास्तुकला का अदभुत नमूना है। मंदिर का परिसर 857 फीट लंबा 540 फीट चौड़ा है।

कोणार्क मतलब कोण धन अर्क। कोण माने कोना और अर्क माने सूर्य। इसकी बनावट इस तरह है कि हर कोण पर सूर्य की रोशनी पड़ती है। सूर्य मंदिर कोणार्क चंद्रभागा नदी के तट पर बना है। हालांकि अब चंद्रभागा नदी मंदिर से दूर चली गई है।


सूर्य मंदिर कोणार्क के परिसर में 1991 में परिवार के साथ। 
कोणार्क एक अधूरी कहानी - 13वीं सदी में बने इस मंदिर को ब्लैक पैगोडा भी कहते हैं। इस मंदिर का निर्माण 1250 में गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने करवाया था। राजा ने मंदिर निर्माण के लिए बिसु महाराणा नामक वास्तुविद की सेवाएं ली। मंदिर का निर्माण 12 साल में 12 हजार शिल्पियों ने मिलकर किया। पर मंदिर पूर्ण नहीं हो सका इससे राजा नाराज थे। हालांकि कहा जाता है कि बिसू महाराणा इस मंदिर का छत्र स्थापित करने में सफल नहीं हो सके थे। यह कार्य उनके बेटे 12 साल के धर्मपाद ने कर दिखाया पर इसके बाद उसकी रहस्यमय मौत हो गई।

पूरा मंदिर एक विशाल रथ के आकार का है। ये रथ सूर्य देव का है। इसमें पत्थरों से बने विशाल पहिए लगे हैं। इन पहियों पर शानदार नक्काशी देखी जा सकती है। रथ रूपि मंदिर में कुल 12 पहिए लगे हैं। इन पहियों का व्यास 3 मीटर का है। रथ के इन पहियों से सही समय का मापन किया जा सकता है। दिन हो या रात घंटा मिनट का अंदाजा लगाया जा सकता है। सूर्य के इस रथ को सात घोड़े खींच रहे हैं। इनमें चार घोड़े एक तरफ हैं तो बाकि तीन दूसरी तरफ।



साल 1837 में मंदिर का मुख्य हिस्सा जो 229 फीट ऊंचा था, ध्वस्त हो गया। इसके ध्वस्त होने को लेकर अलग अलग कथाएं हैं। हालांकि मंदिर का बड़ा हिस्सा आजकल खंडहर बन चुका है। पर दर्शक दीर्घा जिसे जगमोहन हाल कहते हैं वह 30 मीटर लंबा है, अभी भी बेहतर हालात में देखा जा सकता है। नट मंदिर ( नृत्यशाला) और भोग मंडप ( भोजन कक्ष ) भी देखा जा सकता है। सूर्य मंदिर के पास 11वीं सदी में बना मायादेवी का मंदिर स्थित है। इन्हें सूर्य की पत्नी माना जाता है। मंदिर के ध्वस्त हुए हिस्से को कोणार्क पुरातात्विक संग्रहालय में संरक्षित करके रखा गया है। 1894 में मंदिर से जुड़ी 13 कलाकृतियों को इंडियन म्यूजियम कोलकाता में रखा गया है। कोणार्क के सूर्य मंदिर के बारे में रविंद्रनाथ टैगोर लिखते हैं कि पत्थरों की भाषा इंसान की भाषा पर काफी भारी पड़ती है।

कहा जाता है कि वर्तमान सूर्य मंदिर से पहले भी यहां सूर्य मंदिर का अस्तित्व था। ओडिया लोग सूर्यको बिरंचि नारायण कहते हैं। सांब पुराण की कथा के मुताबिक कृष्ण के पुत्र सांब को कुष्ठ रोग हो गया था। उन्होंने ऋषि की सलाह पर 12 साल तक चंद्रभागा नदी के तट पर मित्रवन में सूर्य की तपस्या की और उनका कुष्ठ रोग दूर हो गया। तब सांब ने यहां सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। पुराणों के मुताबिक तब तीन सूर्य मंदिर थे। पहला कोणार्क में, दूसरा मुल्तान में और तीसरा मथुरा में।

कैसे पहुंचे - कोणार्क आप ओडिशा के जगन्नाथ पुरी से पहुंच सकते हैं या फिर राजधानी भुवनेश्वर से। कोणार्क अपेक्षाकृत ये पूरी से निकट है। पुरी से 35 किलोमीटर और भुवनेश्वर से 65 किलोमीटर की दूरी पर है कोणार्क। ये मंदिर सुबह 6 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है। भारत के और सार्क देशों के लोगो के लिए प्रवेश शुल्क 10 रुपये है जबकि विदेशी नागरिकों के लिए 250 रुपये। पुरी से चलने वाली पर्यटक बसें कोणार्क का दौरा कराती हैं।

vidyutp@gmail.com   -   यहां भी देखें – www.konark.nic.in
( WORLD HERITAGE SITE listed in  1984 ) 




Monday, July 30, 2012

जगन्नाथ मंदिर, पुरी - बलभद्र-सुभद्रा के संग विराजते हैं कान्हा


चार धाम में से एक है पुरी का जगन्नाथ मंदिर। पुराणों में जगन्नाथ पुरी को इस धरती का बैकुंठ कहा गया है। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसारपुरी में भगवान विष्णु ने पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतार लिया था। 

ओडिशा स्थित यह धाम भी द्वारका की तरह समुद्र तट पर है। यहां जगन्नाथ मंदिर विराजते हैं भगवान कृष्ण अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ। पुरी का जगन्नाथ मंदिर अपनी सुंदरता और वास्तुकला में अद्भुत है साथ ही यहां भगवान का विग्रह भी अत्यंत मनोरम है।मंदिर अपनी विशिष्ट पूजा पद्धति के लिए भी विख्यात है। पुरी एक ओडिशा का एक छोटा सा समुद्र तटीय शहर है। पर भगवान जगन्नाथ के रथयात्रा के समय यहां देश दुनिया से लाखों श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं। 

जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा में श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा के रथ। 
आदि शंकराचार्य जी ने चार पीठों की स्थापना की थी। उत्तर में बद्रीनाथदक्षिण में श्रृंगेरीपूर्व में गोवर्धन तथा पश्चिम में द्वारका। चार धामों में तीन तो उन्हीं में से हैं केवल  श्रृंगेरी के बदले रामेश्वरम को एक धाम माना जाता है। आदि शंकराचार्य (सन 788 – 820) का पुरी में आगमन हुआ था। कहा जाता है कि अपनी विद्वत्ता से उन्होंने वहां के बौद्ध मठाधीशों के दांत खट्टे कर दिए और उन्हें सनातन धर्म की ओर आकृष्ट करने में सफल रहे और आत्मसात कर लिए गए। शंकराचार्य जी ने यहां अपना एक पीठ भी स्थापित किया जिसे गोवर्धन पीठ कहते हैं​।

मंदिर का निर्माण -  वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण बारहवीं सदी में हुआ है। गंग वंश के ताम्र पत्रों से यह ज्ञात होता है कि वर्तमान जगन्नाथ मंदिर के निर्माण कार्य को कलिंग राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने आरम्भ कराया था। मंदिर के जगमोहन और विमान भाग के शासन काल 1078 -1148 के बीच बने थे। इसके बाद 1197  में जाकर ओडिया शासक अनंग भीम देव ने इस मंदिर को वर्तमान रूप दिया था। मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां, एक रत्न मण्डित पाषाण चबूतरे पर गर्भ गृह में स्थापित हैं। कहा जाता है इन मूर्तियों की अर्चना मंदिर निर्माण से कहीं पहले से की जाती रही है। यह भी सम्भव है कि यह प्राचीन जनजातियों द्वारा भी पूजा की जाती रही हो।

 प्रसाद पकाने की अनूठी व्यवस्था - जगन्नाथ मंदिर की विशाल रसोई है। इस रसोई में प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं. यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी पर ही पकाया जाता है. इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है। 

जुलाई में  रथयात्रा - हर साल जुलाई में पुरी में विशाल रथयात्रा का आयोजन होता है। इस रथयात्रा के दौरान जब भगवान अपने मंदिर से निकल कर बलभद्र और सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा चले जाते हैं। इस दौरान पुरी में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। भगवान के ऱथ को खींचने में सहभागी बनकर लोग अपना जीवन सफल मानते हैं। पुरी में बाकी के 11 महीने में ज्यादा भीड़ नहीं होती।

कैसे पहुंचे -  पुरी आप रेल मार्ग हावडा से या फिर खड़गपुर से पहुंचा जा सकते है। अगर आप चेन्नई की तरफ से आ रहे हैं तो खुर्दा रोड से उतर कर पुरी पहुंच सकते हैं।

कहां ठहरें -  पुरी में ठहरने के लिए सस्ते धर्मशाला भी हैं,या आप समुद्र तट पर किसी अच्छे होटल में ठहर सकते हैं। पुरी के समुद्र तट पर कई सौ होटल हैं। पुरी के समुद्र तट पर लोकप्रिय होटलों में से एक है -पुरी होटल। http://www.purihotel.in/ पुरी रेलवे स्टेशन पर हर ट्रेन के पहुंचन के साथ इस होटल की बस यात्रियों को निःशुल्क अपने होटल ले जाने के लिए तैयार रहती है। 
--   माधवी रंजना
(JAGANNATH MANDIR, PURI, ODISHA ) 


Sunday, July 29, 2012

नीलांचल यानी पुरी का सुरम्य समुद्र तट

पुरी में समंदर से ये हमारी पहली मुलाकात थी। कहते हैं मनुष्य को अकेलेपन का वक्त काटना हो तो समंदर से बढ़िया कोई साथी नहीं हो सकता। वह भी अगर ओडिशा के पुरी का समुद्र तट हो तो बात ही क्या। पुरी का समुद्र तट यानी नीलांचल। इस समुद्र तट की बात बाकी समुद्र तटों से काफी अलग है। पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से दो किलोमीटर आगे है पुरी का विशाल और लंबा समुद्र तट। 

हिन्दुस्तान में वैसे तो मुंबईगुजरात, कर्नाटक, केरल,  चेन्नईकन्याकुमारी जैसे तमाम जगहों समुद्र तट देखा जा सकता है। किसी को कोई भी समुद्र तट सुंदर लग सकता है लेकिन पुरी के नीलांचल की बात कुछ अलग है। नीलांचल का मतलब ही पुरी है। तभी तो दिल्ली से पुरी जाने वाली ट्रेन का नाम ही नीलांचल एक्सप्रेस रखा गया है।

यहां बैठकर जब आप समुद्र को निहारते हैं तो आसमान के फलक और समुद्र के मिलन के बीच एक खास तरह का सानिध्य का एहसास नजर आता है। नीले रंग के इस समुद्र को आप घंटों निहारते रहें लेकिन आप को अकेलापन नहीं खलेगा। समंदर का संगीत जो रहता है साथ में।
पुरी होटल के बाहर 1991 
पुरी के समुद्र तट किनारे कई किलोमीटर में फैले होटल हैं। एक श्रंखला में सौ से ज्यादा होटल। अगर आप सी बीच पर किसी होटल में ठहरते हैं तो होटल के कमरे से भी समंदर की अटखेलियों का आनंद उठा सकते हैं। साथ ही आप समंदर के तट के साथ टहलते हुए कई किलोमीटर तक आगे बढ़ते जा सकते हैं। जब थक जाएं तो अपने होटल को वापस लौट आएं।

आप समंदर में नहाने का खूब मजा ले सकते हैं। लेकिन आपको पता ही होगा कि समंदर में नहाने के बाद फिर से आकर होटल के कमरे में साफ पानी में नहाना पड़ता है।
भगवान जगन्नाथ के शहर पुरी में छुट्टियां मनाना बाकी शहरों से सस्ता है। बस रथयात्रा का एक महीना ( जून जुलाई ) यहां का पीक सीजन होता है। साल के बाकी महीनों में यहां आना बेहतर है अगर आप समंदर की लहरों के साथ खेलना का पूरा आनंद उठाना चाहते हैं तो।

अगर आप पुरी जाएं तो समुद्र तट पर पुरी होटल में ठहरने का विकल्प चुन सकते हैं। यह एक मध्यवर्गीय सुविधाजनक होटल है। पुरी रेलवे स्टेशन से पुरी होटल के लिए होटल की ओर से फ्री बस सेवा भी उपलब्ध रहती है। पुरी होटल की खिड़की से आप देर रात तक समुद्र की लहरों का नजारा कर सकते हैं।



वैसे पुरी में समुद्र तट के किनारे पंक्ति में 100 से ज्यादा होटल हैं। पुरी होटल की अपनी विरासत और आतिथ्य की परंपरा है। देश आजाद होने वाले साल में ही 1947 में ये होटल तीन कमरोें के साथ शुरू हुआ था।  

पुरी सालों भर सैलानियों से गुलजार रहता है। वैसे यहां जाने के लिए सर्दी का मौसम ज्यादा अच्छा है। तब समंदर के किनारे टहलने का आनंद बढ़ जाता है। अगर आप पुरी जाएं तो समंदर के किनारे ही किसी होटल में रुकें तो ज्यादा आनंद आएगा। पुरी में समंदर के किनारे होटलों की लंबी फेहरिस्त है। सभी होटल समंदर के सामने खुलते हैं। यहां पर आप आनंद के कुछ दिन बड़े मजे से गुजार सकते हैं। कई सैलानियों को तो पुरी इतना पसंद आता है कि वे हर साल वहां जाने का कार्यक्रम बनाते हैं।

-  -   विद्युत प्रकाश मौर्य Email -vidyutp@gmail.com
NILANCHAL, BLUE SEA, PURI, ODISHA, PURI HOTEL )

Saturday, July 28, 2012

ओडिशा के नीलांचल समुद्र की ओर...

साल 1991 का जुलाई का महीना। हमलोग पिताजी को बैंक से मिलने वाली पहली एलटीसी में कहीं घूमने जाने वाले थे। काफी सोच विचार के बाद तय हुआ की पहली बार की इस यात्रा में कोलकाता और जगन्नाथ पुरी भ्रमण का आनंद उठाया जाए। इसमें कुछ शैक्षिक और कुछ धार्मिक यात्रा दोनों हो जाएगी। पर बिहार की राजधानी पटना से पुरी के लिए तब सीधी ट्रेन नहीं थी। 
दानापुर एक्सप्रेस के एसी 2 क्लास से हमलोग सपरिवार हावड़ा के लिए सवार हुए। तब ट्रेन में एसी-3 डिब्बा आया ही नहीं था। शाम को पटना से ट्रेन समय पर खुली। माताजी-पिताजी और हम छह भाई बहन। इनमें से कुछ तो पहली बार ट्रेन में बैठे हैं। उनको कौतूहल हो रहा है कि एसी डिब्बा होने के कारण बाहर का नजारा ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है। हमलोग रेल में बैठने के बाद लंबी रेल यात्रा की उम्मीद में आराम फरमा रहे थे। 

सुबह नींद खुली तो ट्रेन डानकुनी जंक्शन क्रॉस कर रही थी। थोड़ी देर बाद खिड़की से स्टेशन दिखाई दिया लिलुआ। और इसके तुरंत बाद हावड़ा आ गया। ये क्या ट्रेन में सफर का पूरा मजा भी नहीं आया।

विशाल हावड़ा रेलवे स्टेशन पर:
हम पहली बार विशाल हावड़ा रेलवे स्टेशन को देख रहे थे। यहां आदमी से आदमी टकरा रहा था। इस हावड़ा स्टेशन का तो नजारा कुछ अलग ही था। हमने देखा कि यहां प्लेटफार्म तक कारें चली आती हैं सरपट। हमारी अगली ट्रेन शाम को थी। तो हमारे पास दिन भर समय था कोलकाता घूमने का। तो हमलोगों ने इस समय का सदुपयोग किया। पिताजी के परिचित का हावड़ा में एक होटल था। वहां सामान रखकर हमलोग दिनभर कोलकाता में घूमे। शाम को खाने पीने के बाद अगली ट्रेन के लिए हावड़ा स्टेशन पर मुस्तैद हो गए।

तब कंप्यूटरीकृत रेल आरक्षण तो शुरू हो गया था पर पूरा देश एक लिंक से जुड़ा नहीं था। पिताजी ने अपने हावड़ा से जगन्नाथ पुरी तक के टिकट को पहले ही किसी मित्र की मदद से हावड़ा से पुरी जाने वाली ट्रेन में भी आरक्षण करा लिया था। इसलिए अगली ट्रेन को लेकर हमलोग आश्वास्त थे। आगे का सफर शाम को श्री जगन्नाथ एक्सप्रेस से आरंभ हुआ। यह सफर भी रात भर का ही था। ट्रेन बालासोर, भद्रक होती हुई कटक पहुंची। कटक के बाद भुवनेश्वर। उसके बाद खुर्दा रोड फिर साक्षी गोपाल और फिर पुरी। सुबह हुई तो हमारी ट्रेन ओडिशा के स्टेशनों को पार कर रही थी। पुरी से पहले खुर्दा रोड नामक रेलवे स्टेशन से ही ट्रेन में पुरी मंदिर के पंडे आने लगे। उन्होंने हमारे खानदान के बारे में पूछताछ करना शुरू कर दिया। पर हमने पुरी में कहां जाकर रूकना है पहले से ही तय कर रखा था। लिहाजा रेल में मिलने वाले पंडों के चक्कर में नहीं पड़े। 


पुरी आखिरी रेलवे स्टेशन है। हमारी ट्रेन यहीं पर खत्म हो रही थी। पुरी से देश के हर कोने के लिए ट्रेनें खुलती हैं। रेलवे स्टेशन साफ सुथरा है। यहां क्लाक रुम समेत कई तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं। पुरी रेलवे स्टेशन से बाहर निकल कर हमलोग पुरी होटल जाने वाली बस में बैठ गए। यह होटल की ओर से प्रदान की जाने वाली निःशुल्क सेवा है। हालांकि हमलोग जगन्नाथ मंदिर के पास ही उतर गए। पुरी में हमारा पहले दिन का ठिकाना बना, गोयनका धर्मशाला। इस धर्मशाला में तब रहने का कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। पर चलते समय में सफाई व्यवस्था के नाम पर अत्यल्प राशि दान करने का अनुरोध धर्मशाला वाले करते हैं। यह धर्मशाला पुरी जगन्नाथ मंदिर के काफी करीब स्थित है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य   - vidyutp@gmail.com 

(PATNA- HOWRAH, PURI, JAGANNATH EXPRESS ) 


Friday, July 27, 2012

आस्था की यात्रा- बोलबम, सुलतानगंज से देवघर

सुलतानगंज में गंगा नदी का विस्तार 
हर साल सावन में उमड़ता है शिवभक्ति सैलाब। देश भर में शिव की पूजा के अलग अलग रंग देखने को मिलते हैं।जम्मू में अमरनाथ यात्रा तो हरिद्वार में कावड़ यात्रा। पश्चिम बंगाल में शिवभक्त तारकेश्वर नाथ जलाभिषेक करने जाते हैं। लेकिन बिहार और झारखंड में सुल्तानगंज से देवघर की 119 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा अनूठी है। बिहार में सुल्तानगंज में उत्तरायणी गंगा से जल लेकर श्रद्धालु बोलबम के नारे लगाते चल पड़ते हैं देवघर की ओर। बोलबम का नारा है बाबा एक सहारा है। लाखों श्रद्धालु तो हर साल जाते हैं बोलबम।
आस्था की इस अनूठी यात्रा का सहभागी बनने का मौका मिला था मुझे  साल 1990 में। इंटर पास करने के बाद बीएचयू में एडमिशन लेने की प्रक्रिया में था। इसी दौरान पिता जी के बैंक के कुछ पारिवारिक मित्रों की मंडली बनी और हम निकल पड़े।

पहला दिन - भागलपुर जिले के सुल्तानगंज से शुक्रवार की सुबह हम सबने एक साथ जल उठाया। जल उठाने से पहले गंगा में स्नान कांवर की पूजा। इसके बाद के लंबे पैदल सफर की शुरुआत। नंगे पांव। हाथी ना घोड़ा ना कौनो सवारी...पैदल ही पैदल अइनी हम भोला तोहरे दुआरी... 119 किलोमीटर के सफर में पहले सड़क भी कच्ची रास्ता, फिर नदी, पहाड़, जंगल सबकुछ आता है। सुलतानगंज से तारापुर तक का रास्ता पक्की सड़क के साथ साथ चलता है। उसके बाद नहर पकड़ कर कच्ची सड़क पर कुछ किलोमीटर का रास्ता। हमारा पहला पडाव था 36 किलोमीटर की पदयात्रा करने के बाद कमरसार धर्मशाला में। दिन की यात्रा में हमारी पूरी मंडली साथ रही। रात को हमलोग एक साथ ही रूके। पहला दिन अच्छा रहा। पिताजी के दोस्त आईडीएन सिंह और आरबी राय के बेटे साथ थे। वे मेरी उम्र के थे। उनके साथ हंसी खुशी में सफर कट गया।

दूसरा दिन -  अगले दिन से कमरसार से हमलोग सुबह सुबह चल पड़े। पापा के मित्र आरबी राय के बोलबम कहने और उत्साह बढ़ाने का अंदाज निराला था। पर कुछ घंटे चलने के बाद सबकी गति अलग अलग हो गई। कोई  तेज चल रहा था तो कोई धीरे-धीरे। यानी सब आगे पीछे चलने लगे। थोड़ी देर बाद मैं और पिता जी ही साथ चल रहे थे। बाकी सब लोग अलग हो चुके थे।

जब मैं पड़ गया अकेला - इस दौरान एक वक्त ऐसा भी आया जब मैं अपनी मंडली से अकेला पड़ गया।  कई किलोमीटर तो मैं पिता जी से भी बिछुड़ गया। मेरे जेब में ज्यादा रुपये भी नहीं थे। अगर देवघर पहुंच भी जाउं तो पिता जी और उनकी बाकी मंडली से आस्था के महाकुंभ में मुलाकात कैसे होगी। पहली यात्रा थी। कहां रुकना है ये भी मालूम नहीं था। मैं अपना कांवर एक जगह स्टैंड पर रखकर एक यात्रा द्वार के पास बैठ गया। कुछ घंटे बाद अचानक पिता जी ने मुझे देख लिया।

बोलबम के सारे रास्ते में मेले सा माहौल रहता है। लेकिन रात्रि विश्राम के लिए जहां रुकते हैं वहां जगह को लेकर मारा मारी रहती है। दूसरे दिन दोपहर के बाद मैं पिता जी के साथ काफी उत्साह से चलता रहा। रात को रुकने के बजाए सफर तेजी से तय करते रहे। पर जब चलते चलते रात को भूख लगी तो आसपास कोई भोजनालय नहीं मिला। कुछ किलोमीटर और चले। तब जाकर खाना नसीब हुआ। लेकिन क्या मिला, सिर्फ भात दाल और चोखा। खैर भूख लगी थी तो उसमें भी बहुत स्वाद लगा। दूसरी रात सोने की जगह नहीं मिली। बारिश भी हो रही थी। भींगते हुए किसी तरह नींद ली और किसी तरह रात गुजारी।

तीसरा दिन - तीसरे दिन पांव थकने लगे थे। लेकिन देवघर नजदीक आता जा रहा था। ऐसा लग रहा था मानो को चुंबकीय शक्ति हमें खींच रही थी अब। भुल भुलैया, गोरियारी, पटनिया, कलकतिया में छोटी छोटी नदियां आती हैं, इन्हें नंगे पांव पार करने में आनंद आता है। बाबाधाम नजदीक आने पर कई राहत और सेवा शिविर भी रास्ते में आते हैं। यहां थके पांव में बाम और आयोडेक्स लगाने का इंतजाम रहता है। एक जगह हमने भी गर्म पानी में पांव डाल कर राहत महसूस करने की कोशिश की। दर्शनिया वह जगह है जहां से बाबा मंदिर के दर्शन हो जाते हैं। देवघर से पहले दर्शनिया में ही हम अपने पंडा रत्नेश्वर मठपति झा के घर में रुके। उनका घर हिंदी विद्यापीठ गेट के पास था। शायद अब वे इस दुनिया में नहीं होंगे क्योंकि वे काफी बुजुर्ग हो चुके थे। उनके बेटे अपने पुरोहितों का ख्याल रखते होंगे। वह रविवार की शाम थी। हमने सोमवार का इंतजार नहीं किया श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए। रविवार की शाम को ही जलाभिषेक करने का फैसला किया। कहते हैं आप बाबाधाम तभी पहुंचते हैं जब आपको बाबा बुलाते हैं। तभी तो भक्त कहते हैं.. चलो बुलावा आया है... बाबा ने बुलाया है। तो ...चल रे कांवरिया शिव के नगरिया...


बोलबम का यात्रा मार्ग   

- बाबा अजगैबी नाथ मंदिर (सुल्तानगंज) से कामराय 6 किमी
- कामराय से मासूमगंज 2 किमी 
- मासूमगंज से असरगंज 5 किमी
- असरगंज से रणगांव 5 किमी
- रणगांव से तारापुर 3 किमी
- तारापुर से माधोडीह 2 किमी
- माधोडीह से रामपुर 5 किमी
- रामपुर से कुमारसार 8 किमी
- कुमारसार से विश्वकर्मा टोला 4 किमी
- विश्वकर्मा टोला से महादेव नगर 3 किमी
- महादेव नगर से चंदन नगर 3 किमी
- चंदननगर से जिलेबिया मोड 8 किमी
- जिलेबिया मोड से तागेश्वरनाथ 5 किमी 
- तागेश्वरनात से सूईया पहाड़ 3 किमी
- सुईया से शिवलोक 2 किमी
- शिवलोक से अबरखिया 6 किमी
- अबरखिया से कटोरिया 8 किमी
- कटोरिया से लक्ष्मण झूला 8 किमी
- लक्ष्मण झूला से इनरावरण 8 किमी
- इनरावरण से भूलभुलैया नदी 3 किमी
- भूलभुलैया नदी से गोरियारी 5 किमी
- गोरियारी से पटनिया 5 किमी
- पटनिया से कलकतिया 3 किमी
- कलकतिया से भूतबंगला 5 किमी
- भूतबंगला से दर्शनिया 1 किमी
- दर्शनिया से बाबा वैद्यनाथ मंदिर 1 किमी


सूईया पहाड़ -  मार्ग में सूइया पहाड़ नामक स्थान पर दुर्गम पहाड़ी रास्ता है। इसे पार करते समय शिव-भक्तों के पांवों में नुकीले पत्थर चुभते हैं, पर बाबा के मतवाले भक्त इसे हंसते खेलते पार कर जाते हैं। कहते हैं इस पहाड़ से गुजरना कुछ कुछ एक्यूप्रेशर चिकित्सा की तरह है।
दर्शनिया - बाबा मंदिर से एक किलोमीटर पहले आता है। यह वैद्यनाथ देवघर शहर का बाहरी इलाका है। यहां से बाबा मंदिर के दर्शन हो जाते हैं इसलिए इसका नाम है दर्शनिया। अगर सीधे देवघर पहुंचना चाहते हैं दिल्ली हावड़ा लाइन पर जैसीडीह नामक रेलवे स्टेशन से वैद्यनाथ देवघर की दूरी 6 किलोमीटर है। हालांकि देवघर तक भी सीधी रेलवे सेवा है।   


-vidyutp@gmail.com

(DEVGHAR, DEOGHAR, SULTANGANJ, BABADHAM, BOLBAM, SAWAN, SHIVA) 

Thursday, July 26, 2012

मैया बाबू लाइन होटल- मलयपुर

वैसे तो देश भर में अनगिनत लाइन होटल और ढाबे हैं। लेकिन पटना से देवघर जाते हुए जमुई के मलयपुर में है  अनूठा लाइन होटल। जी हां, नाम है मैया बाबू लाइन होटल। जैसे ही आप इस होटल में रूकते हैं..होटल की दीवारों पर ढेर सारे नीति वचन और प्रेरक वाक्य लिखे हुए दिखाई देते हैं। आप चाय नास्ता लेते हुए काफी कुछ यहां से प्रेरणा भी ले सकते हैं। अगर अंग्रेजी में अनुवाद करें तो नाम होता है मम्मी पापा लाइन होटल। ये होटल 1935 से चल रहा है। जब जमुई से बाबा धाम यानी देवघर जाने के लिए कच्ची सड़क हुआ करती थी। तब से चल रहा ये होटल बाबा धाम जाने वाले कांवरियों को राह दिखाता आ रहा है। होटल खोलने वाले महेंद्र सिंह पास के ही गांव मलयपुर के रहने वाले हैं। महेंद्र सिंह जीवन के 90 वसंत देख चुके हैं,लेकिन आंखे और दांत सलामत हैं। सेहत बहुत अच्छी है। बाबा भोले के भक्तों से उन्हें खास लगाव है।

 मलयपुर बिहार के बड़े गांवों में शुमार है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह इसी गांव से हुए। 500 राजपूत परिवारों के इस गांव के रहने वाले महेंद्र सिंह ने अपना पारिवारिक व्यवसाय छोड़कर कांवर लेकर जाने वाले बाबा भोले के भक्तों की सेवा में ये लाइन होटल खोला।

मैया बाबू लाइन होटल नाम क्यों...महेंद्र सिंह कहते हैं, जब जब आप मेरे होटल का नाम लेंगे अनायास ही आप अपने मां और पिताजी को याद कर लेंगे। तो भला इससे बढ़िया कोई नाम हो सकता है क्या..मलयपुर से देवघर की दूरी 101 किलोमीटर है। होटल दीवारें कांवरियों को रास्ता बताती हैं साथ ही आगे के मार्ग की सावधानियों के बारे में भी आगाह करती हैं। आगे सोनो और चकाई के जंगल हैं। रास्ता टेढ़ा-मेढा और खतरनाक है। जहां से जो बातें अच्छी लगीं महेंद्र सिंह जी ने उसे अपने होटल के दीवारों पर चस्पा कर दिया है। कहते हैं, इन दीवारों पर लिखे नीति वचन से एक पर भी अगर आपने अमल कर लिया तो मेरी कोशिश सफल होगी। साथ ही आपके जीवन में भी बदलाव आएगा।

 महेंद्र सिंह की बूढ़ी आखों को 1934 का भूकंप याद है। आजादी  संघर्ष याद है। देश के आजाद होने का जश्न भी याद है। इतिहास के स्मृति चिन्हों में रूचि है। जमुई के खादी आश्रम में लंबे समय तक रहे आचार्य राममूर्ति का भी उन्हें साहचर्य मिला। जमुई और आसपास के चप्पे चप्पे का इतिहास उनके जुबान पर है। वे जमुई जिले के भीम बांध की चर्चा करते हैं। कहते हैं पांडवों ने अज्ञातवास के समय भीम बांध बनाया था। इन सरे इलाकों को बहुत अच्छे पर्यटक स्थल में विकसित किया जा सकता है लेकिन भीमबांध इलाके में नक्सलियों का कब्जा है।

प्रेरक किताब बोल अनमोल - मलयपुर गांव का जैन धर्म के इतिहास में भी महत्व है। मैया बाबू लाइन होटल के ठीक सामने जैन मंदिर भी है। यहां जल्द ही एक करोड़ की लागत से बनी महावीर स्वामी की मूर्ति लगाई जाने वाली है। अपने होटल में आने वाले लोगों को लिए महेंद्र सिंह ने एक किताब भी प्रकाशित कराई है. बोल अनमोल..अच्छी अच्छी बातों और प्रेरक गीतों का संग्रह। महेंद्र सिंह समाज में कई तरह की विकृतियों और मूल्यों का ह्रास देख रहे हैं लेकिन फिर भी वे जीवन में निराश नहीं हैं। कहते हैं बहुत तपस्या के बाद मानव जीवन मिलता है। इसलिए हमें सत्कर्म ही करना चाहिए। अगर दुबारा जन्म लेने का मौका मिला तो भी मनुष्य ही बनना चाहूंगा। नहीं मोक्ष की कामना बिल्कुल नहीं है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   Email- vidyutp@gmail.com
(MAIYA BABU LINE HOTEL, MAHENDRA SINGH, MALAYAPUR, BABA DHAM ROAD ) 

Wednesday, July 25, 2012

रोग और दुख हरते हैं वैद्यनाथ ( बैजनाथ मंदिर, हिमाचल)

कांगड़ा की मनोरम वादियों में बैजनाथ पपरोला में है भगवान शिव का अनूठा वैद्यनाथ मंदिर। वैद्यनाथ यानी चिकित्सकों के देवता। सभी रोग दुख को दूर करने वाले शिव। पठानकोट से जोगिंदर नगर तक चलने वाली कांगड़ा घाटी रेल मार्ग पर बैजनाथ पपरोला रेलवे स्टेशन आता है। बैजनाथ में ही नेशनल हाईवे पर ये मंदिर स्थित है।

तेरहवीं सदी में पत्थरों से बना ये मंदिर स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। चौकोर चबूतरे पर पत्थरों से बना महादेव का विशाल मंदिर। उत्तर भारतीय मंदिर निर्माण की नागर शैली में बने इस मंदिर समूह में दीवारों पर उत्कृष्ट कलाकृतियां उकेरी गई हैं। मंदिर में 1204 ई. से लगातार पूजा होने का प्रमाण मिलता है। बताया जाता है कि मंदिर का निर्माण बारहवीं सदी में हकू और मयंक नामक दो व्यापारी भाइयों ने शुरू करवाया था।


मंदिर में संस्कृत में लगे शिलालेख में मंदिर के निर्माण की कथा लिखी गई है। 18 वीं सदी में राजा संसारचंद ने इसकी मरम्मत कराई। पूरा मंदिर ऊंची बारादरी से घिरा है। बारादरी की दीवारों पर भी खूबसूरत नक्काशी में प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। मुख्य मंदिर के पास ही तीन-चार छोटे-छोटे मंदिर और हैं। मंदिर परिसर शिव की सवारी नंदी बैल की भी एक अनूठी प्रतिमा है।

भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित इस बैजनाथ मंदिर के तीन तरफ छोटे-छोटे हरे-भरे पार्क हैं। एक तरफ बहुत गहरी नदी बहती है। नदी के उस पार हिमालय की विशाल पर्वत श्रंखला दिखाई देती है। प्रकृति के गोद में बना इस मंदिर में जाने पर बाकी मंदिरों से कुछ अलग सा एहसास होता है। स्थानीय श्रद्धालु मंदिर को देशभर के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक बताते हैं।




बैजनाथ मंदिर में आप कभी जाएं ज्यादा भीड़भाड़ नहीं दिखती। एक खास तरह की शांति का एहसास होता है यहां। दशहरे पर भी यहां मेला नहीं लगता। भक्तों का मानना है कि शिव के बड़े भक्त रावण ने अपने दस सिर शिव को न्योछावर कर दिए थे। तो इतने बड़े शिवभक्त के पराजय का उत्सव कैसे मनाया जा सकता है भला।

साल 2006 से मंदिर का प्रबंधन हिमाचल सरकार के हाथ में है। पठानकोट-जोगिन्दर नगर सेक्शन उत्तर रेलवे का मनोरम पर्वतीय सेक्शन है जोकि हिमाचल प्रदेश की मनोहारी कांगड़ा घाटी की सैर कराता है। इसी मर्ग पर पालमपुर से 16 किलोमीटर आगे है शिव का बैजनाथ मंदिर। यहां आने वाले श्रद्धालु कांगड़ा घाटी के बाकी पर्यटक स्थलों और धार्मिक स्थलों को घूमने का भी आनंद उठा सकते हैं।



 बैजनाथ मंदिर के आसपास का पूरा क्षेत्र श्रद्धालुओं तथा प्रकृति प्रेमियों के आकर्षण का खास केन्द्र है। क्योंकि इस रेलमार्ग के आसपास चामुंडा देवीमैगलोडगंज बौद्ध मंदिरब्रजेश्वरी देवीज्वालादेवी जैसे भी मंदिर हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपके परिवार तथा मित्रों के लिए विशेष रेलगाड़ी हो तो लगभग 20 हजार देकर स्पेशल ट्रेन भी बुक कर सकते हैं।

-    माधवी रंजना

 (JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA) 

Tuesday, July 24, 2012

चेन्नई- मरीना बीच पर मछली का स्वाद

आध्यात्मिक युवा शिविर बेंगलुरु  से लौटकर हमलोग सुबह सुबह चेन्नई पहुंचे। हमलोगों ने एक दिन चेन्नई में रूकना तय किया। हमारी ट्रेन अगले दिन थी इसलिए हमारे पास चेन्नई घूमने का अच्छा मौका था। रात को हमलोग बेंगलुरु सिटी रेलवे स्टेशन से कावेरी एक्सप्रेस से चले थे। सुबह 7 बजे चेन्नई सेंट्रल में थे। हमारी योजना थी चेन्नई शहर घूमने की। पर जनवरी में भी वहां गरमी लग रही थी। तब इस शहर का नाम मद्रास हुआ करता था। हमारे साथ बीएचयू के साथी और पटना के सुनील सेवक की पूरी टीम थी। हमलोगों ने चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन के सामने एक गली में एक दिन के लिए एक होटल में आसरा लिया। अब होटल का नाम याद नहीं आ रहा। अब हमें करनी थी पेट पूजा। छात्र जीवन में होटलों का मीनू में खाने पीने की दरें पहले देखा करते थे। अगर जेब के अनुकूल लगे तभी खाने की टेबल की ओर जाते थे। काफी खोजबीन कर एक होटल में खाने पहुंचे। नाम था मुरादी होटल भागीरथी। महज 7 रुपये में भरपेट खाना। केले के पत्ते पर। मजा आ गया।



चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन के बगल में वाल टैक्स रोड पर स्थित है मुरुदी होटल भागीरथी। ये शुद्ध शाकाहारी भोजनालय केरला लॉज के बगल में है। होटल में खाते समय एक सीतामढ़ी के सज्जन हमारे बगल वाले टेबल पर खाते हुए मिल गए। बताया स्टेशन के पास खाने की सबसे अच्छी जगह है। मैं तो रोज यहां आता हूं। यहां दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय भोजन दोनों ही मिलते हैं। यहां से आप खाना पैक भी करा सकते हैं। होटल के बाहर हिंदी में लिखा है खाना तैयार है। होटल के अंदर दो तरह के डाइनिंग हाल हैं। एक समान्य दूसरा वातानुकूलित। वातानुकित में खाने की दरें थोड़ी ज्यादा हैं। ( Murudi Hotel Bhagirathi, 339, Wall Tax Rd Edapalaiyam, George Town, Chennai, Tamil Nadu 600003  TEL.  044- 25353437,  25330812,  42358577)
इसके बाद चेन्नई में सबसे पहले हम मरीना बीच पर पहुंचे। रेलवे स्टेशन से कुछ किलोमीटर दूरी पर ही है ये समुद्र तट। वहां दिनभर काफी चहल पहल रहती है।  हालांकि यहां साफ सफाई ज्यादा नहीं रहती। मरीना बीच पर समुद्र की भुनी हुई मछली का स्वाद लिया। इसके बाद हम आगे बढ़े  चेन्नई में हमलोग सी अन्ना दुर्रै की समाधि देखने भी गए। वे तमिलनाडु के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री और द्रविड मुनेत्र कडगम के संस्थाापक भी थे। इसके बाद हमारा पड़ाव था बस से चलकर गोल्डन बीच। बीच क्या यह एक विशाल रिजार्ट है। गोल्डन बीच पर रेस्टोरेंट थोड़े महंगे लगे, लेकिन यहां भी हम मसाला डोसा का जायका लेना नहीं भूले।


चेन्नई से महाबलीपुरम की ओर

चेन्नई के गोल्डेन बीच से हम बाहर निकले तो चल पड़े महाबलीपुरम की ओर। एक घंटे का बस सफर करके हमलोग पहुंच गए मामल्लापुरम। यहां सबसे पहले हमने देखा समुद्रतटीय मंदिर। वह मंदिर जिसके बारे में अब तक इतिहास की सिर्फ किताबों में पढ़ा था।  महाबलीपुरम का समुद्र तट काफी खूबसूरत है। भीड़ भाड़ और कोलाहल से दूर। शांत। यहां घंटो गुजारो तो भी कम है। हम लहरों की अटखेलियां का मजा ले रहे थे तभी आ गई घनघोर बारिश। अब हम लोगों में से किसी के पास कोई छाता नहीं था। हाल में चेन्नई सफर के दौरान धूप से बचने के लिए खरीदी गई स्ट्रा हैट भी तेज बारिश में काम नहीं आई। 

महाबलीपुरम में संजय कुमार  (पटना), राजीव सिंह और मैं । (जनवरी 1992)
इस बारिश में हमलोग जमकर भींगे। वह भींगना कभी नहीं भूलेगा। एक बार फिर घूमते घूमते भूख भी खूब लगी थी। दौड़कर भागे और जो भी नजदीक दिखाई दे गया, एक रेस्टोरेंट में शरण ली। और टूट पड़े मसाला डोसा पर। मामल्ला होटल में महज साढ़े तीन रुपये का था एक मसाला डोसा। लेकिन स्वाद था...भाई वैसा स्वादिष्ट मसाला डोसा दुबारा कभी नहीं खाया। बारिश के कारण महाबलीपुरम के दूसरे ऐतिहासिक स्मारक हमलोग नहीं देख सके।
डोसा का स्वाद लेने के बाद हमलोग वापस चल पड़े हैं चेन्नई की ओर। रात को हमारी ट्रेन थी पटना मद्रास एक्सप्रेस। आना गंगा कावेरी से हुआ था वापसी पटना मद्रास एक्सप्रेस से हो रही है। मार्ग लगभग वही है। रेल मंत्रालय की कृपा से हमारा आरक्षण कन्फर्म था। मजे की बात यह रही है कि टीटीई ने हमसे आरक्षण शुल्क भी नहीं मांगा। कई राज्यों से गुजरते हुए लंबे सफर के बाद हमलोग मुगलसराय पहुंचे। हमें हमारा विश्वविद्यालय बुला रहा था। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com ( जनवरी 1992) 
(CHENNAI, GOLDEN BEACH, MAHABALIPURAM, SHORE TEMPLE AND RAIN ) 

Monday, July 23, 2012

शिविर का आखिरी दिन बेंगलुरू दर्शन के नाम

बेंगलुरू का श्री राधाकृष्ण मंदिर ।
मैजिस्टिक में मस्ती की दोपहर 
आध्यात्मिक युवा शिविर का आखिरी दिन। शिविर के समापन के बाद हमारे पास पूरा एक दिन का खाली समय था। हमारी वापसी की ट्रेन देर रात को थी। तो हम सबने आज बेंगलुरू शहर घुमने का तय किया। पटना और वाराणसी से आए साथी एक साथ सबसे पहले पहुंचे मैजेस्टिक। यह बस स्टैंड के पास का बाजार है। बेंगलुरु शहर का दिल धड़कता है मैजेस्टिक में। सिटी रेलवे स्टेशन के पास मैजेस्टिक वहां का चाकचिक्य वाला बाजार है। हम यहां घूमते रहे पर कोई शॉपिंग नहीं की। थोड़ी देर बाजार में घूमने के बाद तय किया गया कि ह्वाईट फील्ड साईं बाबा के आश्रम चलते हैं।
सत साईं बाबा के आश्रम की ओर


तो सुनील सेवक भाई अगुवाई में हमलोग चल पडे साई बाबा के आश्रम की ओर। मैजेस्टिक से हमलोग लोगों से रास्ता पूछते हुए बसें बदलते हुए ह्वाईट फील्ड की तरफ चल पड़े। हमें कोई सीधी बस नहीं मिली। तो यात्रा टुकड़ों में करनी पड़ी। कुछ देर में हमलोग शहर के बाहर थे। अब पैदल सफर। आसपास में हरे भरे खेत थे। एक जगह एक ठेले पर अमरूद बेचने वाले से हमने कुछ अमरूद लेकर खाए। पर भाषा की समस्या आ गई। हमें कन्नड़ नहीं आती थी और अमरुद वाला हिंदी नहीं जानता था। खैर किसी तरह उसे पैसे देकर हमलोग आगे बढ़े। अगली बस से ह्वाईट फील्ड पहुंचे। यह एक छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है।
आश्रम में जाने पर पता चला कि साईं बाबा थोड़ी देर में बाहर से आने वाले हैं। बाकी श्रद्धालुओं की तरह हमलोग बैठ गए इंतजार में। 
बाबा के दर्शन का इंतजार करने वालों में एक मुजफ्फरपुर के व्यापारी भी थे। कहने लगे उनके दर्शन मात्र से कई बिगड़े काम बन जाते हैं। तो हम भी बैठकर इंतजार करने लगे। 
थोड़ी देर में साईं बाबा एक बड़ी सी मोटरकार में आए और संयोग से हमें भी उनके दर्शन हुए। वहां देश भर के कई राज्यों के श्रद्धालु उनके दर्शन के इंतजार कर रहे थे। उनके दो आश्रम है एक सत साईं निलयम पुट्टवर्ती में और दूसरा ह्वाईट फील्ड बेंगलुरू में। जब बाबा आए उनके गाड़ी में बैठे हुए श्रद्धालुओं को दर्शन हुए। लोग अपने निहाल समझने लगे। हम भी उस भीड़ में शामिल थे। 
( 24 अप्रैल 2011 को सत साईं बाबा का निधन हो गया, उन्होंने दक्षिण भारत में बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक सामाजिक कार्य किए थे।)  



अब बेंगलुरु से घर वापसी -  साईं बाबा के आश्रम के बाद वापसी में जब हम रेलवे स्टेशन पर पहुंचे तो वहां हमारे हाजीपुर के साथी मिल गए। वे थोड़े परेशान थे। क्योंकि उन्हें वापसी का आरक्षण नहीं मिल पा रहा था। शिविर के दौरान रेलवे का विशेष काउंटर कैंप साइट में ही लगा था जहां हमने आरक्षण करा लिया था जो रेल मंत्री की अनुकंपा से कन्फर्म भी हो गया था साथ ही हमसे कोई रिजर्वेशन चार्ज में रास्ते में नहीं लिया गया। पर पंकज भाई और उनके साथियों ने इस सुविधा का लाभ नहीं उठाया था।

रात होने पर भूख लगी तो स्टेशन के पास खाने के लिए होटल ढूंढने निकले। ज्यादातर होटल हमें मंहगे लगे। अभी तक हमलोग कैंप में खाना खा रहे थे जो कोई शुल्क नहीं लग रहा था। अंत में एक बेसमेंट में स्थित रेस्टोरेंट में सांबर चावल खाकर भूख मिटाई। यह सात रुपये की एक प्लेट थी। रात की ट्रेन से हमलोग वाराणसी और पटना के साथियों के संग चेन्नई के लिए रवाना हो गए।   
-    विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
( BANGLURU, SPIRITUAL YOUTH CAMP , NYP, 1992, PALACE GROUNDS )

Sunday, July 22, 2012

लाल बाग का रुमानी सफर और जूड़े में गजरा

बिहार की प्रस्तुति - राधा ना बोले रे....
पैलेस ग्राउंड बेंगलुरू में हमारे दस दिन गुजरे। देश भर से आए थे 1200 युवाओं के साथ रेलवे के दो सौ कर्मचारी भी हमारे साथ घुलमिल गए थे इस आध्यात्मिक युवा शिविर में। यह पैलेस ग्राउंड शहर के ऐतिहासिक बेंगलुरु पैलेस से लगा हुआ है। इस विशाल मैदान में अक्सर बड़े बड़े आयोजन हुआ करते हैं। 

बंगलुरू शिविर में बिहार से आए हमारे साथियों का नारा होता था- आए हम बिहार से नफरत मिटाने प्यार से।

शिविर के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम में हमने एक दिन बिहार की टीम की ओर होली पेश किया। इसकी पंक्तियां थी - हो मधुबन में...खेलत रंग गुजरिया हो मधुबन में। इसके आखिरी पंक्तियों में हम सभी मंच पर खड़े होकर रंग गुलाल उड़ाने लगे। खूब रंग जमा। 
राधा ना बोले, ना बोले रे...

एक दिन बिहार के मुजफ्फरपुर से आई टीम ने सुंदर नृत्य गीत की प्रस्तुति दी। बोल थे राधा ना बोले,, ना बोले.. ना बोले रे...इसमें कामाक्षी बनी थी कान्हा तो स्निग्धा बनी थी राधा की सहेली और प्रियंका बनी थी राधा। यह आयोजन रात को बेंगलुरू के किसी और कोने में हुआ था। इस आयोजन के बाद में चलने को हुआ तो मेरा चप्पल चोरी हो गया था। फिर मैंने बाजार से एक कोल्हापुरी चप्पल खरीदा जिसने अगले कुछ दिनों तक मेरा साथ निभाया। शिविर के दौरान एक दिन के सांस्कृतिक आयोजन के दौरान बिहार की टीम ने तय किया कि अगर हमारे कार्यक्रम में ढोल बज जाए तो अच्छा होगा। एक दूसरे राज्य की टीम में ढोल वाला था हमने उससे आग्रह किया। पर हमें तब झ़टका लगा जब उसने ढोल बजाने के लिए दो सौ रुपये की मांग कर दी। खैर हमारा कार्यक्रम बिना ढोल के ही हुआ। 
बेंगलुरू शिविर में बिहार के मुजफ्फरपुर और हाजीपुर की टीम के साथी। 
खूब याद आते हैं यश शर्मा -  इस शिविर में कश्मीर से डोगरी के साहित्यकार यश शर्मा भी पहुंचे थे। उन्हे अगले साल साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। कश्मीर दूरदर्शन पर खबरें भी पढ़ते थे। मुलाकात और परिचय होते ही पूछा- बिहार से आए हो तो क्या फणीश्वरनाथ रेणु को पढ़ा है। हमने कहा हां पढ़ा है तो काफी खुश हुए। यश शर्मा को डोगरी साहित्य का प्रिंस कहा जाता था। उनकी बेटी सीमा सहगल जानी मानी सूफी गायिका हैं। 1993 में जम्मू जाने पर हमारी उनसे दुबारा मुलाकात हुई थी।  ( इस प्रकरण को यहां पढ़ें)  5 सितंबर 2011 को 82 साल की आयु में उनका जम्मू में निधन हो गया।

तब सी.के. जाफरशरीफ केंद्र में रेल मंत्री थे। युवा शिविर के संचालन में उनकी बड़ी भूमिका थी। रोज आते थे शिविर में हाल चाल लेने। वे कांग्रेस सेवा दल के जमाने में सुब्बराव जी के पुराने शिष्य रहे। बताते थे
, कांग्रेस सेवा दल में उनसे काफी कुछ सीखा था। इस शिविर में मेरे दर्जनों नए दोस्त बने।
 रक्तदान और रोटियां
 बंगलुरू शिविर में मैंने पहली बार रक्तदान किया। शिविर के दौरान दो दिन रक्तदान कैंप लगाया गया था। शिविर में सब कुछ ठीक था लेकिन यहां उत्तर भारत के लोगों को खाने में रोटी नहीं मिलती थी। लिहाजा रोटी के लिए किचेन हेल्प में ड्यूटी लगती थी और रोटियां हमें खुद बनानी पड़ती थीं। ऐसी ही एक ड्यूटी के दौरान जॉन राजेश्वर कुजुर ने अकेले 200 रोटियां बनाईं। हमारे समूह की रोटियां बनाने की ड्यूटी जिस दिन लगी उस दिन मैंने रक्तदान किया था लिहाजा मैं चूल्हे के पास बैठकर काम नहीं कर सकता था। पर जॉन ने कहा, काम करो या मत करो पर हमारे लीडर का हमारे पास होना जरूरी है। लिहाजा मैं उनके पास ही बैठा रहा। बंगलोर यात्रा के दौरान हम चिन्ना स्वामी स्टेडियम भी गए। यहां अक्सर इंटरनेशनल क्रिकेट मैच हुआ करते हैं।


चांदनी रात में लालबाग की सैर

बेंगलुरू के चिन्नास्वामी स्टेडियम में राजीव और दिग्विजय के साथ
अगर आप बेंगलुरू जाएं तो लाल बाग की सैर करने जरूर जाएं। ये  अद्भुत उद्यान है। चांदनी रातों में लाल बाग की खूबसूरती और बढ़ जाती है। एक शाम हमलोग लालबाग की सैर करने गए। हमारे साथ चल रही कामाक्षी और स्निग्धा ने लाल बाग से निकलने के बाद कहा कि हम बालों में गजरा लगाएंगे। हमलोग जल्दी शिविर पहुंचना चाहते थे। दक्षिण की महिलाओं में बालों में गजरा लगाने का शौक है। गजरा लगाने के बाद प्रफुल्लित स्निग्धा बोल उठी- तुम क्या जानो विद्युत कि बालों में गजरा लगाने के बाद कैसी सुखद अनुभूति होती है। मुझे शिवमंगल सिंह सुमन की कविता की पंक्तियां याद आ गईं - तुम जुड़े में गजरा मत बांधो मेरा गीत भटक जाएगा। 


कुमार गंधर्व के निधन की खबर - 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती है। इसी दिन दोपहर में शिविर का भव्य औपचारिक उदघाटन हुआ। शाम को छह बजे रोज की तरह होने वाली प्रार्थना सभा में सुब्बराव जी ने जानकारी दी की कुमार गंधर्व नहीं रहे। महान शास्त्रीय गायक का 67 साल की उम्र में निधन हो गया। वे मूल रूप से कर्नाटक के थे लेकिन देवास मध्य प्रदेश में रहते थे। उन्होंने खास तौर पर कबीर के भजन शास्त्रीय सुर में गाए। कुमार गंधर्व को श्रद्धांजलि देते हुए सुब्बराव जी ने उनका प्रिय भजन गाकर सुनाया – अवधूता हम युगानाम योगी....  

शिवपुत्र सिद्धरमैया कोमकली यानी कुमार गंधर्व का जन्म कर्नाटक के बेलगाम जिले में 8 अप्रैल 1924 को हुआ था। पर वे ज्यादातर समय मध्य प्रदेश में रहे। जन्म से कन्नड़ होने के बावजूद उन्हे कन्नड़ नहीं आती थी। 12 जनवरी 1992 को देवास में ही उनका निधन हो गया। उनकी पत्नी वसुंधरा कोमकली और बेटी काल्पिनी कोमकली भी शास्त्रीय गायक हैं।

टैलेंट एक्सचेंज क्लास – शिविर में हर रोज दो घंटे टैलेंट एक्सचेंज की क्लास होती है। इसमें या तो आप किसी दूसरे राज्य की भाषा सीखें सिखाएं या फिर किसी दूसरे राज्य की नृत्य सीखें। कुछ और भी चीजें जैसे योगा आदि सीखा जा सकता है। मैंने बेंगलुरू शिविर में पंजाबी नृत्य भंगड़ा सीखने की क्लास में हिस्सा लिया। कुछ दिन में मालूम हुआ कि भंगड़ा कितना मुश्किल है। बहुत अभ्यास चाहिए। मैं ज्यादा भंगड़ा तो नहीं सीख पाया पर साथी राजीव असमिया बीहू काफी हद तक सीख गए।

वह मैसूर में दोपहर का खाना  - शिविर के दौरान हमलोग एक दिन मैसूर घूमने गए। यहां पर दोपहर का खाना हमें अपनी जेब से खर्च करके खाना था। पूछताछ करते हुए हमलोग एक भोजनालय में गए। 14 रुपये में भरपेट खाना। हमारे साथ कुछ लोग बड़े खुश हुए। बिहार के भाई राकेश पाठक ने जब छक कर खाना शुरू किया तो रेस्टोरेंट के वेटरों का चेहरा देखने लायक था। खाना सुस्वादु तो था ही। हमें चेन्नई के होटल मुरादी भागीरथी के शानदार खाने की याद आ गई।


- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( NYP, BENGALURU, YOUTH CAMP, KUMAR GANDHARVA )