Sunday, December 30, 2012

आदि रंगम हैं - श्रीरंगपट्टनम का रंगनाथस्वामी मंदिर


वैसे तो श्रीरंगपट्टनम को टीपू सुल्तान के शहर के तौर पर जाना जाता है। लेकिन टीपू सुल्तान के महल के अवशेषों के बीच स्थित रंगनाथ स्वामी मंदिर का इतिहास और भी पुराना है। इस शहर का नाम ही रंगनाथ स्वामी के नाम पर पड़ा है। 

श्रीरंगपट्टनम मैसूर शहर से महज 19 किलोमीटर आगे बेंगलुरु के रास्ते पर है। ऐतिहासिकता की दृष्टि से श्रीरंग पट्टनम दक्षिण भारत का महत्वपूर्ण स्थल है जो मध्य तमिल सभ्यताओं के केन्द्र बिन्दु के रुप में स्थापित था। कावेरी नदी के तट पर स्थित यह शहर इतिहास के कई कालखंड में काफी उन्नत शहर था।

रंगनाथस्वामी यानी भगवान विष्णु के मंदिर को गंग वंश के राजाओं ने 894 ई. में बनवाया था। यहां भी पद्मनाभ स्वामी की तरह विष्णु की शेषनाग पर लेटी हुई प्रतिमा है। रंगनाथ स्वामी का मंदिर दक्षिण भारत के वैष्णव संप्रदाय के लोगों में काफी महत्व रखता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु यहां आदि रंगम के रुप में हैं। रंगनाथ स्वामी के आंतरिक मुख्य भाग का निर्माण होयसल राजाओं ने कराया था। इसमें ग्रेनाइट के कई बड़े स्तंभ देखे जा सकते हैं। जबकि मंदिर का मुख्य द्वार यानी गोपुरम विजय नगर स्टाइल में है। मंदिर के दो स्तंभों पर विष्णु के 24 भाव भंगिमाओं में मूर्तियां हैं। 

दक्षिण भारत में पंच रंगम - दक्षिण के वैष्णवों में पंच रंगनाथ स्वामी की भी मान्यता है जिन्हें पंच रंगक्षेत्रम के नाम से जाना जाता है। पांचों रंगनाथ स्वामी के मंदिर अलग-अलग शहरों में कावेरी नदी के ही तट पर स्थित हैं। जिनमें श्रीरंगपट्टनम के रंगनाथ स्वामी आदि रंगम हैं। अगले चार रुपों के मंदिर श्रीरंगम, कुंभकोणम, त्रिची और मायलादुताराई में हैं।
 
टीपू सुल्तान का योगदान - श्री रंगनाथस्वामी के मंदिर का विस्तार और विकास होयसल, विजयनगर, मैसूर के वाडियार और हैदर अली द्वारा भी कराया गया। मुस्लिम शासक होते हुए भी हैदर अली और टीपू सुल्तान की रंगनाथ स्वामी में आस्था थी। हैदरअली ने मंदिर का पाताल मंडप बनवाया था। टीपू सुल्तान ने भी मंदिर के विस्तार में योगदान किया।
 टीपू की श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर के पुजारियों का सम्मान करता था। एक बार पुजारियों द्वारा टीपू सुल्तान के लिए एक भविष्यवाणी की गई थी जिसके अनुसार अगर टीपू सुल्तान मंदिर में एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान करवाता था जिससे वह दक्षिण भारत का सुलतान बन सके। अंग्रेजों से एक बार युद्ध में विजय प्राप्त होने का श्रेय टीपू ने ज्योतिषों की उस सलाह को दिया था। इसके बाद टीपू ने उन ज्योतिषियों को और मंदिर को आर्थिक सहयोग देकर सम्मानित किया था। 

मंदिर में दर्शन - मंदिर सुबह आठ बजे से एक बजे तक और शाम को चार बजे से आठ बजे तक दर्शन के लिए खुला रहता है। मंदिर में दर्शन के लिए लंबी भीड़ नहीं होती। दक्षिण के तमाम मंदिरों की तरह यहां भी मंदिर का अपना प्रसाद काउंटर है।

कैसे पहुंचे - श्री रंगपट्टनम कर्नाटक के मंड्या जिले में आता है। बेंगलुरू से श्री रंगपट्टनम 125 किलोमीटर है। सड़क मार्ग से ढाई घंटे का रास्ता है। वहीं मांड्या से इसकी दूरी 26 किलोमीटर है। मैसूर से भी यहां पहुंचना सुगम है। मैसूर से दूरी महज 22 किलोमीटर है।

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य
( RANGNATH SWAMI TEMPLE, SRIRANGPATTANAM, TIPU SULTAN, HAIDAR ALI, KARNATKA, MANDYA, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 59  ) 

Friday, December 28, 2012

सपनों की दुनिया यानी वृंदावन गार्डन


मैसूर से थोड़ी दूर कृष्णराज सागर डैम एवं उससे लगा वृंदावन गार्डन देश के अत्यंत मोहक स्थलों में शुमार है। इस गार्डन की साज-सज्जा, इसके संगीतमय फव्वारे के कारण यह सैलानियों की पसंदीदा स्थलों में एक है।


केआरएस डैम - कृष्णाराज सागर डैम यानी केआरएस बांध 1932 में बना था। यह बांध मैसूर से 12 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित है। इसका डिजाइन देश के महान इंजीनियर एम.विश्वेश्वरैया ने बनाया था। इसका निर्माण कृष्णराज वाडेयार चतुर्थ के शासन काल में हुआ था। इस बांध की लंबाई 8600 फीट, ऊंचाई 130 फीट और क्षेत्रफल 130 वर्ग किलोमीटर है। यह बांध आजादी से पहले की सिविल इंजीनियरिंग का अदभूत नमूना है। यहां एक छोटा सा तालाब भी हैं जहां बोटिंग के जरिए बांध उत्तरी और दक्षिणी किनारों के बीच की दूरी तय की जा सकती है। बांध के उत्तरी कोने पर संगीतमय फव्वारे हैं।
संगीतमय  फव्वारा - वृंदावन गार्डन नाम के मनोहारी बगीचा बांध के ठीक नीचे बनाया गया है। हर रोज शाम को वृंदावन गार्डन में हजारों सैलानियों की भीड़ जुटती है। वृंदावन गार्डन को कश्मीर के शालीमार बाग की नकल में बनाया गया था। 2005 में इस गार्डन को नया रुप दिया गया। वृंदावन गार्डन का मुख्य आकर्षण है संगीतमय फव्वारा। ये फव्वारा जब शाम को शुरू होता है तो वंदे मातरम की धुन पर लहरे नाचती हैं। उसके बाद कई और फिल्मी गाने- रंबा हो हो...जैसी। संगीत की धुनों पर जल राशि का नृत्य मनमोह लेता है। फव्वारा बंद होता सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा की धुन पर।
बॉलीवुड की पसंद - सैकड़ों फिल्म निर्माताओं ने वृंदावन गार्डन में फिल्मों की शूटिंग की है। पुरानी फिल्म दिल ही तो है का गीत तुम्हारी मस्त नजर....। पड़ोसन का गीत एक चतुर नार करके श्रंगार। सड़क का गीत – तुम्हे अपना बनाने की कसम खाई है...फिल्म राजा हिंदुस्तानी – कितना प्यारा तुझे रब ने बनाया...फिल्म तेजाब का गीत- कह दो की तुम मेरी हो वरना...फिल्म मेहबूबा का गीत- मेरे नैना सावन भादो....जैसे तमाम गीत हैं जो वृंदावन गार्डन में फिल्माए गए।
-  -----  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
  ( VRINDAVAN GARDEN, MYSORE, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 58

Wednesday, December 26, 2012

अदभुत और विशाल- मैसूर का महाराजा पैलेस

दशहरे पर रोशनी में नहाया मैसूर पैलेस। 

मैसूर शहर के बिल्कुल केंद्र में स्थित है मैसूर का महाराजा पैलेस। यह महल मैसूर में आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र है। मिर्जा रोड पर स्थित यह महल भारत के सबसे बड़े महलों में से एक है। इस किले में सात दरवाजे हैं। इसका निर्माण मैसूर राज्य के वाडियार महाराजाओं ने कराया था। पहली बार यहां लकड़ी का महल बनवाया गया था। जब लकड़ी का महल जल गया था, तब इस महल का निर्माण कराया गया।

 वर्तमान महल 1912 में बना है। इस महल का नक्शा ब्रिटिश आर्किटैक्ट हेनरी इर्विन ने बनाया था। कल्याण मंडप की कांच से बनी छत, दीवारों पर लगी तस्वीरें और स्वर्णिम सिंहासन इस महल की खासियत है। बहुमूल्य रत्‍नों से सजे इस सिंहासन को दशहरे के दौरान जनता के देखने के लिए रखा जाता है।

महल में सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक जाया जा सकता है। कैमरा ले जाना मना है। मैसूर महल की रविवार, राष्ट्रीय अवकाश के दिन शाम सात से आठ बजे तक और दशहर के दौरान शाम सात बजे-रात नौ बजे तक रोशनी की जाती है। तब महल सौन्दर्य देखते ही बनता है।
मोहम्मद हसन के साथ तांगे पर मैसूर की सैर। 
चांदनी रात में  तांगे पर बैठकर मैसूर महल देखने का मजा और बढ़ जाता है। हमने भी एक तांगा किराये पर लिया महल देखने के लिए। दशहरे से एक दिन पहले महल जगमगा रहा था। लेकिन तांगा चलाने वाले मोहम्मद हसन निराश थे। बताया 40 साल से यहां तांगा चला रहा हूं। लेकिन इस बार दशहरे पर सैलानी कम आए हैं।
वे कहते हैं कि कावेरी नदी जल विवाद के कारण तमिलनाडु के लोग इस बार दशहरा देखने नहीं आए। हमारी कर्नाटक सरकार तमिलनाडु को पानी देने से रोक रही है। तो तमिलनाडु भी हमें बिजली नहीं देगा।
जगन मोहन पैलेस - जगन मोहन पैलेस मैसूर का दूसरा प्रमुख महल है। इस महल का निर्माण महाराज कृष्णराज वोडेयार ने 1861 में करवाया था। 1915 में इस महल को श्री जयचमाराजेंद्र आर्ट गैलरी का रूप दे दिया गया जहां मैसूर और तंजौर शैली की पेंटिंग, मूर्तियां और दुर्लभ वाद्ययंत्र रखे गए हैं। यहां त्रावणकोर के शासक और प्रसित्र चित्रकार राजा रवि वर्मा और रूसी चित्रकार रोएरिच के बनाए गए चित्र देखे जा सकते हैं। कला प्रेमियों को जरूर यहां जाना चाहिए। किले के आंतरिक हिस्से में फोटोग्राफी वर्जित है।
-    -------विद्युत प्रकाश मौर्य   ( SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 57, DASHARA, MYSORE PALACE, JAGAN MOHAN PALACE  ) 

Tuesday, December 25, 2012

चलो देखने मैसूर का दशहरा

सयाजी राव रोड से गुजरती दशहरे की झांकी। - विद्युत 
गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के राजपथ पर आपने झांकियां देखी होंगी। लेकिन इसी तरह की झांकिया निकाली जाती हैं मैसूर के दशहरे में जहां राज्य का विकास और संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। मैसूर के दशहरे की झांकी को देखने के लिए हर साल लाखों लोग जुटते हैं। विजयादशमी के दिन मैसूर की मुख्य सड़क जिस पर झांकियां निकाली जाती हैं सुबह होने से पहले लोग जगह कब्जा करना शुरू कर देते हैं। मैसूर पैलेस  से निकलने वाली झांकी पांच किलमीटर से लंबा सफर करती है। 


झांकी देखने के लिए पेड़ पर चढ़े लोग। - विद्युत 
दुनिया भर में प्रसिद्ध मैसूर दशहरा उत्सव करीब 400 साल पुराना है। हर साल नवरात्रों के बाद आयोजित होने वाले इस उत्सव को कर्नाटक में राज्य उत्सव दर्जा हासिल है। इसके आयोजन का सारा खर्चा राज्य सरकार उठती है। मैसूर दशहरा उत्सव सन 1610 में आरंभ हुआ था।
यूं तो दशहरा पूर देश में मनाया जाता है लेकिन मैसूर में इसका विशेष महत्व है। किसी जमाने में मैसूर के दशहरे में हाती पर सवार होकर राजा झांकी में निकलते थे। लेकिन अब देश आजाद होने के बाद हाथियों के हौदे पर माता चामुंडेश्वरी की प्रतिकृति को विराजमान किया जाता है। अब वही राजा की प्रतीक हैं। दस दिनों तक चलने वाला यह उत्सव चामुंडेश्वरी द्वारा महिषासुर के वध का प्रतीक है। इसमें बुराई पर अच्छाई की जीत माना जाता है। 

इस पूरे महीने मैसूर महल को रोशनी से सजाया जाता है। इस दौरान अनेक सांस्कृतिक, धार्मिक और अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उत्सव के अंतिम दिन बैंड बाजे के साथ सजे हुए हाथी देवी की प्रतिमा को पारंपरिक विधि के अनुसार शहर के बाहर बन्नी मंडप तक पहुंचाते है। करीब पांच किलोमीटर लंबी इस यात्रा के बाद रात को शानदार आतिशबाजी का कार्यक्रम होता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी उत्साह के साथ निभाई जाती है। वीआईपी गैलरी में इस आतिशबाजी को देखने के लिए टिकट खरीदना पड़ता है जिसकी एडवांस बुकिंग काफी पहले हो जाती है।
-    ---- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( ( MYSORE, DASHARA, KARNATKA, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 56 ) 

Monday, December 24, 2012

वनराज से मिलिए - मैसूर के चिड़ियाघर में

देश के सबसे सुंदर और व्यवस्थित चिड़ियाघरों में से एक है मैसूर का जू। अगर आप मैसूर में हैं तो इस चिड़ियाघर को देखने के लिए वक्त जरूर निकालें। अगर अच्छी तरह से घूमना चाहते हैं तो आधे दिन का वक्त निकालें या फिर तेजी से घूमना चाहते हैं  तो डेढ़ घंटे का वक्त निकालें। मैसूर के चिड़ियाघर का कुल ट्रैक 3 किलोमीटर का है। प्रवेश द्वार से आगे जाने के लिए पथ प्रदर्शक बने हुए हैं इसलिए घूमने में कोई परेशानी नहीं होती।

मैसूर जू का विस्तार कुल 157 एकड़ या 64 हेक्टेयर में है। मैंने अब तक दिल्ली, पटना, कोलकाता, भुवनेश्वर, चेन्नई, हैदराबाद आदि शहरों का जू देख रखा है। इन अनुभवों के आधार पर कह सकता हूं कि आपको मैसूर जू भी जरूर देखना चाहिए। मैसूर चिड़ियाघर की स्थापना 1892 में हुई। इस लिहाज से यह देश के पुराने चिड़ियाघरों में से एक है। इसका नाम चामराजेंद्र जूलोजिकल गार्डन है।


जहां अभी ये चिड़ियाघर बना है यह कभी महाराजा चामराजेंद्र का समर पैलेस हुआ करता था।धीरे धीरे यहां चिड़ियाघर का संग्रह तैयार किया गया। पर यह राजा का निजी संग्रह था। पर इसे 1902 में आम लोगों के लिए भी खोल दिया गया। 1948 में देश के आजाद होने के बाद मैसूर सरकार के उद्यान विभाग के अधीन आ गया। तब इसमें 150 एकड़ करीब और भूमि को जोड़कर इसे विशाल रूप प्रदान किया गया। 1972 में यह चिड़ियाघर वन विभाग के अधीन आ गया। 1979 में जू आथरिटी ऑफ कर्नाटका का गठन कर जू उसके हवाले कर दिया गया। आजकल यहां 168 तरह के जानवर देखे जा सकते हैं। कुल 1300 से ज्यादा जंतु आजकल चिड़ियाघर में मौजूद है। 1992 में इस चिड़ियाघर ने अपना शताब्दी वर्ष मनाया।

साल 2000 के बाद यहां जानवरों को एडाप्ट करने की योजना भी लागू की गई। इससे लोगों को वन्य जीवों के प्रति साहचर्य बढ़ता है। यह योजना लोकप्रिय हुई तो देश के दूसरे चिड़ियाघरों ने भी इसे अपनाया। इस जू के परिसर में 77 एकड़ में कारंजी लेक स्थित है जो बड़ा आकर्षण का केंद्र है। इसमें कई तरह के जलीय जीव और पक्षी देखे जा सकते हैं।
चिड़ियाघर में हरियाली और जीव जंतुओं का बहुत बड़ा संग्रह है जहां से बच्चों की तो बाहर आने की इच्छा ही नहीं होती। चिड़ियाघर का रख-रखाव भी बहुत व्यवस्थित है। यहां के बगीचों को खूबसूरती से सजाया गया है। शेर के अलावा हाथीसफेद मोरदरियाई घोड़ेगैंडे और गोरिल्ला भी यहां देखे जा सकते हैं। यहां कोलंबो जू से मिले पांच एनाकोंडा देखे जा सकते हैं। जिराफ और जेब्रा भी यहां के खास आकर्षण हैं।

प्रवेश टिकट – बड़े लोगों के लिए 60 रुपये और बच्चों के लिए 30 रुपये का टिकट प्रवेश के लिए निर्धारित है। अगर आप टूरिस्ट बस वाले पैकेज में जू पहुंचते हैं तो बस का गाइड आपके लिए पहले से ही टिकट लाकर दे देता है। इससे आपका समय बचता है। जू के खुलने का समय सुबह 8.30 से शाम 5.30 तक है। हर मंगलवार को यह बंद रहता है। अगर आप दोपर 3 बजे के बाद जाएं तो आपको जानवर और चिड़िया ज्यादा सक्रिय दिखाई देंगी। चिड़ियाघर के अंदर घूमने के लिए बैटरी कार भी उपलब्ध है। रास्ते में पेयजल और शौचालय आदि का बेहतर इंतजाम है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य 

http://mysorezoo.info/  (MYSORE ZOO, ANIMAL, LAKE, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 55 )




Saturday, December 22, 2012

मैसूर का चामुंडेश्वरी देवी का मंदिर

चामुंडी पहाड़ी मैसूर के ऐतिहासिक पर्यटक आकर्षणों में से एक है। इस पहाड़ी पर स्थित है मां चामुंडेश्वरी का मंदिर। मां को मैसूर के राजा का दर्जा प्राप्त है।  मैसूर से 13 किलोमीटर दूर चामुंडा पहाड़ी पर मां चामुंडा का मंदिर है। ये मंदिर 700 साल से ज्यादा पुराना है। पहाड़ की चोटी से मैसूर का मनोरम दृश्य दिखाई पड़ता है। मंदिर के पास ही महिषासुर की विशाल प्रतिमा रखी हुई है। पहाड़ी के रास्ते में काले ग्रेनाइट के पत्थर से बने नंदी बैल के भी दर्शन होते हैं।

मैसूर का चामुंडेश्वरी मंदिर देवी दुर्गा को समर्पित है। यह मंदिर देवी दुर्गा की राक्षस महिषासुर पर विजय का प्रतीक है। हालांकि चामुंडा का मतलब होता है चंडमुंड का संहार करने वाली देवी। इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में किया गया था।

 यह मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का एक अच्छा नमूना है। मंदिर मुख्य गर्भगृह में स्थापित देवी की प्रतिमा शुद्ध सोने की बनी हुई है। मंदिर की इमारत सात मंजिला है जिसकी कुल ऊंचाई 40 मीटर है। मुख्य मंदिर के पीछे महाबलेश्वर को समर्पित एक छोटा सा शिव मंदिर भी है जो 1000 साल से भी ज्यादा पुराना है। पहाड़ की चोटी से मैसूर का मनोरम दृश्य दिखाई पड़ता है।

कहा जाता है मैसूर शहर के लोगों पर मां चामुंडा की खास कृपा है। उनके आशीर्वाद से ही मैसूर शहर हर सदी में तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। मैसूर के दशहरे के मौके पर निकाली जाने वाली झांकी में मां चामुंडा की प्रतिकृति को ही राजा की जगह पालकी पर आसीन किया जाता है।

महिषासुर की विशाल प्रतिमा - मंदिर के पास ही महिषासुर की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है। यह आते जाते लोगों को दूर से ही दिखाई देती है। हालांकि इसके बारे में लोग बताते हैं कि इस प्रतिमा को ज्यादा देर तक नहीं देखना चाहिए नहीं तो महिषासुर पीछा करने लगते हैं।

चामुंडा मंदिर में पूजा का समययहां आप सुबह 7.30-दोपहर 2 बजे तक और फिर  दोपहर 3.30-शाम 6 बजे तक पूजा कर सकते हैं। फिर शाम 7.30-रात 9 बजे तक मंदिर के द्वार खुले रहते हैं।

अगर आप मंदिर में दर्शन करना चाहते हैं तो दो से तीन घंटे का समय लेकर पहुंचे। टूरिस्ट बस से आने वाले लोगों को समय कम रहने के कारण दर्शन नहीं मिल पाता है। इसलिए आप अलग से ही समय निकाल कर आएं तो बेहतर होगा।


विशेष दर्शन भी -  दक्षिण के अन्य मंदिरों की तरह ही चामुंडेश्वरी मंदिर में समान्य दर्शन के अलावा विशेष दर्शन का भी कूपन उपलब्ध रहता है। चामुंडा देवी के दर्शन के लिए रोज देश भर से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। वैसे नवरात्र के समय मंदिर में ज्यादा भीड़ होती है। चामुंडा पहाड़ी पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए धर्मशाला में आवास की सुविधा उपलब्ध है। यहां अन्न क्षेत्र का भी संचालन होता है जहां आप भोजन ग्रहण कर सकते हैं।

कैसे पहुंचे – मैसूर शहर के मुख्य बस स्टैंड से चामुंडा पहाड़ी के लिए दिन भर बस सेवा उपलब्ध रहती है। यहां से वातानुकूलित वोल्वो बसें भी श्रद्धालुओं के लिए चलाई जाती हैं। -         माधवी रंजना 
(KARNATKA, CHAMUNDA TEMPLE, MYSORE, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 54 ) 

Friday, December 21, 2012

दक्षिण भारत का सदाबहार शहर मैसूर

मैसूर दक्षिण भारत का सदाबहार शहर है। प्रचीनता और आधुनिकता का संगम। इसे कर्नाटक की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है। इस शहर की गिनती देश के सबसे साफ-सुथरे शहरों में होती है। कई बार स्वच्छता के मानकों पर यह अव्वल नंबर पर आ चुका है। दक्षिण भारत घूमने वाले सैलानियों में ज्यादातर लोगों को मैसूर पूरे दक्षिण के दौरे में सबसे ज्यादा पसंद आता है। मैसूर मैं पहली बार 1992 में पहुंचा था। तब स्पिरिचुअल यूथ कैंप के दोस्तों के साथ था। इस बार पहुंचा  अक्तूबर 2012 में माधवी और वंश के साथ। इस बार हमलोग मैसूर में तीन दिन रूके। पूरा मैसूर देखना जो था। और खास तौर पर मैसूर का दशहरा। ऐतिहासिक शहर मैसूर सालों पर त्योहार मनाता नजर आता है।  

मैसूर का इतिहास में भारत पर सिकंदर के आक्रमण (327 ईपू ) के बाद से मिलने लगता है। 18वीं शती में मैसूर पर हैदर अली की पताका फहराई। 1782 में उसकी मृत्यु के बाद 1799 तक उसका पुत्र टीपू सुल्तान शासक रहा। इन दोनों ने अंग्रेजों से अनेक लड़ाईयाँ लड़ी। श्रीरंगपट्टम् के युद्ध में टीपू सुल्तान की मृत्यु हो गई। इसके बाद मैसूर पर वाडियार वंश के राजाओं ने राज किया।
मैसूर शहर के बीचों बीच वाडियार परिवार द्वारा बनवाया गया विशाल मैसूर महल है। इस महल के आसपास जगन मोहन पैलेस, जयलक्ष्मी विलास एवं ललित महल जैसे किले हैं। इसके अलावा आप यहां चिड़ियाघर देख सकते हैं।

इंद्र भवन, धन्वंतरि रोड, खानेपीने की किफायती जगह

क्या खरीदें -  मैसूर कर्नाटक में पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। क्योंकि शहर और आसपास देखने लायक बहुत कुछ है। अपने तमाम आकर्षण के कारण ही मैसूर को सैलानियों का स्वर्ग कहते हैं। मैसूर में सूती एवं रेशमी कपड़े, चंदन का साबुन, बटन, बेंत एवं अन्य कलात्मक वस्तुएं भी तैयार की जाती हैं। मैसूर शिक्षा का भी बड़ा केंद्र है। अगर आप मैसूर से जा रहे हैं तो चंदन के बने सामान खरीद सकते हैं।
कैसे घूमें - आप मैसूर पहुंच गए हैं तो यहां घूमने के लिए सबसे अच्छा तरीका टूरिस्ट बस बुकिंग करके घूमना है। इसमें वे आपको मैसूर शहर, चामुंडा हिल्स, फिलमोनिया चर्च, चिड़ियाघर के अलावा वृंदावन गार्डेन और श्रीरंगपट्टनम भी लेकर जाते हैं। आप निजी टैक्सी करके भी घूम सकते हैं। वह थोड़ा महंगा पड़ेगा। मैसूर कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू से 139 किलोमीटर की दूरी पर है। यह रेलवे का बड़ा केंद्र है। शहर का रेलवे स्टेशन भी काफी साफ सुथरा है। 

कहां ठहरें - होटल बांबे टिफिन्स ( शहर के मध्य में ), धन्वतरि रोड पर इंदिरा भवन, गायत्री भवन। हम लोग एक दिन बांबे टिफिन्स में और दो दिन गायत्री भवन में ठहरे। बांबे टिफिन्स आनलाइन बुक किया था पर होटल के रिसेप्शन पर व्यवहार अच्छा नहीं था इसलिए हमने यहां रहना विस्तारित नहीं किया। गायत्री भवन रेलवे स्टेशन के करीब भी है और आसपास में खाने पीने के लिए अच्छे विकल्प भी हैं। ( Hotel Gayathri, New Gayathri Building, Opp: Rlys. Stn. Dhanavantri Road, MYSORE. 0821-2425654, 9901256961 ) 
-   ----- विद्युत प्रकाश मौर्य 
( (MYSORE CITY, KARNATKA, CHAMUNDA HILLS, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 53 ) 

Thursday, December 20, 2012

आ अब लौट चलें – वोल्वो का सफर


ऊटी घूमने के बाद अब लौटने की बारी थी। आए तो थे कोयंबटूर की तरफ से जाना था मैसूर। सो रात को होटल में बैठकर बस का विकल्प ढूंढा अपने लैपटॉप पर। पता चला कि बस स्टैंड से कर्नाटक रोडवेज की वोल्वो बस मिल रही है। बस खुलने से 10 घंटे पहले ऑनलाइन आरक्षण करा लिया। मोबाइल फोन पर ईटिकट एसएमएस के रुप में आ गया। क्या हाईटेक सुविधा है। लिखा था बस ऊटी बस स्टेशन से 14 नंबर प्लेटफार्म पर मिलेगी।
बस बिल्कुल उसी प्लेटफार्म पर खुलने के समय से आधे घंटे पहले आ गई। बस का कंडक्टर सफेद वर्दी में था। उसने अपनी जेब से कंप्यूटर शीट निकाली। सभी यात्रियों के टिकट चेक कर प्रवेश देना शुरू किया। सबके लगेज लगेज वैन में डाले गए। बिल्कुल फ्लाइट्स की तरह। और बस समय से चल पड़ी। 
सभी यात्रियों को मिनरल वाटर की एक एक बाटल दी गई। और ये क्या एक एक पॉलीथीन भी।बेटे ने पूछा पापा ये पॉलीथीन क्यों दे रहे हैं। मैने कहा शायद कचरा रखने के लिए...पर मतलब थोड़ी देर बाद समझ में आया। बस ऊटी से निकलने के बाद जब घूमावदार रास्तों से चलने लगी तो कई लोग उल्टी करने लगे। अपनी अपनी उल्टी अपने पॉलीथीन में। थोड़ी देर बाद माधवी का भी मिजाज खराब होने लगा। उसने उल्टी की और मेरे राजकुमार वंश भी उल्टी करने लगे। सबको देखकर मेरा भी जी मिचलाने लगे।
थोड़ी देर में मैं भी उल्टी करने लगा। अब ये सफर काफी मुश्किल और भयावह लगने लगा। आग्रह करके वातानूकुलित बस का छत की खिड़की खोलवाई। थोड़ी प्राकृतिक हवा आए। घुटन कम हो। पर सब बेअसर। सबकी तबीयत खराब। हसीन वादियों का सफर दुखद बन गया था। 
गुंडलपेट पहुंचने के बाद अनादि और माधवी। 

बस इंतजार था कब मंजिल आएगी। हमारे साथ मुंबई के फ्री लांस पत्रकार अनील जागीरदार सफर कर रहे थे। उन्होंने सलाह दी कभी भी पहाड़ों पर बस का सफऱ करने के तुरंत पहले कुछ नहीं खाएं। हमलोग होटल से नास्ता करके तुरंत चल पड़े थे। मैं लौंग लेना भी भूल गया था। लौंग चबाने से पहाड़ी घूमावदार सफर में राहत मिलती है। ये उत्तर काशी जाते समय आजमाया था। ऊटी से मैसूर के रास्ते में कुल 36 हेयर पिन बैंड आते हैं। ये काफी तीखे मोड़ हैं इसलिए इन्हें हेयरपिन बैंड कहते हैं।

खैर राम जी का नाम लेते लेते हमारी बस गुंडलपेट पहुंची तो राहत मिली। हमलोग 101 किलोमीटर का सफर तय कर चुके हैं। यहां से मैसूर तकरीबन 60 किलोमीटर रह गया है। पर अब रास्ता काफी सीधा है। जंगल पहाड़ खत्म हो चुके हैं। पर बस का आधे घंटे का ठहराव था। सामने एक रिजार्ट है। हम सबके चेहरे उतरे हुए थे। माधवी को तो लगा मानो मौत के मुंह से वापसी हुई हो। मेरे बेटे अनादि कहते हैं पापा अब जिंदगी में कभी वोल्वो का सफर नहीं। और इस सफर को तो कभी याद भी मत दिलाना। 

ऊटी से मैसूर बस का मार्ग - ऊटी से पायकरा लेक ( 25 किमी) - गुडालूर टाउन 25 किमी। थेपाकाकाडू (मदुमलाई) - 17 किमी पर। बांदीपुर नेशनल पार्क - 12 किमी पर। गुंडलपेट 22 किमी पर। नानजानगुड 37 किमी पर। मैसूर सिटी 22 किमी पर। 
दरअसल ऊटी से मैसूर के दो रास्ते हैं एक मसानगुडी होकर (125 किमी) का है जिसमें रास्ते में 36 हेयर पिन बैंड आते हैं। दूसरा रास्ता वाया गुडालूर होकर है जो 160 किलोमीटर का है। गुंडलपेट से एक रास्ता केरल के कोझिकोड के लिए जाता है तो दूसरा रास्ता कोयंबटूर के लिए जाता है।

आपको दोस्ताना सलाह -  अगर आपको पहाड़ी रास्तों से परेशानी है तो बेहतर होगा कि इन रास्तों पर छोटी बसें, नॉन एसी बसें या टैक्सी में सफऱ करें। इनमें हेयरपिन बैंड का असर कम होगा। ऊटी में निजी आपरेटर छोटी बसों का संचालन करते हैं।     

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य  

   ( VOLVO, BUS, KSRTC, HAIR PIN BAND, MADUMALAI, BANDIPUR GUNDLUPET, NANJANGUD, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 52 ) 

Wednesday, December 19, 2012

मदुमलाई - यहां छुट्टियां मनाने आते हैं गजराज



तमिलनाडु में नीलगिरी की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच है मदुमलाई टाइगर रिजर्व। दक्षिण भारत के एक मात्र हिल स्टेशन उटी से जब आप मैसूर का सफर शुरू करते हैं तो आपकी यात्रा का बड़ा हिस्सा मदुमलाई टाइगर रिजर्व से होकर गुजरता है। मदुमलाई की सीमा समाप्त होने के साथ ही कर्नाटक राज्य की सीमा शुरू हो जाती है। इसके साथ ही शुरू हो जाती है बांदीपुर टाइगर रिजर्व की सीमा। बांदीपुर को यूनेस्को हेरीटेज का दर्जा प्राप्त है, जबकि मदुमलाई को ये दर्जा दिए जाने की कवायद चल रही है।

कुल 321 वर्ग किलोमीटर में फैले इस जंगल में हरियाली के साथ हिरण, हाथी और दूसरे जानवरों को विहार करते देखा जा सकता है। हालांकि इंतजामात के लिहाज से देखें तो मदुमलाई की हालात बांदीपुर से काफी अच्छी है। ऊटी घूमने जाने वाले सैलानी मदुमलाई की सैर की योजना भी बना सकते हैं। इसके लिए मदुमलाई सफारी का पैकेज लिया जा सकता है। मदुमलाई में बाघ कितने हैं इसके बारे में सही सही अंदाजा तो नहीं है लेकिन मदुमलाई हाथियों की ऐशगाह है। यहां बड़ी संख्य़ा में हाथी हैं।
इतना ही नहीं तमिलनाडु के तमाम मंदिरों में सेवा करने वाले हाथियों को छुट्टियां बीताने के लिए मदुमलाई अभ्यारण्य में भेजा जाता है। कुछ महीने बाद फिर इन्हें वापस मंदिर की सेवा में लाया जाता है।  
तमिलनाडु में मदुमलाई के जंगल। 
कई तमिलनाडु के मंदिरों में आप हाथियों से लोगों को आशीर्वाद प्राप्त करते देख सकते हैं। ऐसा करना शुभ माना जाता है। इन हाथियों को लोगों को आशीर्वाद देने का प्रशिक्षण दिया जाता है। हालांकि ये हाथी उन्ही लोगों को आशीर्वाद देते हैं जिनसे उनको दक्षिणा प्राप्त होता है।  अगर शहर के कोलाहाल से दूर कुछ दिन प्रकृति के सानिध्य में गुजारना चाहते हैं तो इसके लिए मदुमलाई अच्छा विकल्प हो सकता है।

मदुमलाई तक पहुंचने के लिए आप कर्नाटक की ओर से मैसूर से पहुंचने का रास्ता अपना सकते हैं या फिर कोयंबटूर रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट से ऊटी होते हुए भी मदुमलाई पहुंचा जा सकता है। आप मदुमलाई में रूकने के बाद वहीं से जंगल में सफारी की योजना बना सकते हैं। ज्यादा जानकारी के लिए मदुमलाई अभ्यारण्य की वेबसाइट पर जा सकते हैं। -( https://www.mudumalaitigerreserve.com ) कुछ लोग बांदीपुर नेशनल पार्क में भी घूमने जाते हैं। दोनों ही आसपास हैं। पर मदुमलाई ज्यादा व्यवस्थित है।

vidyutp@gmail.com  ( SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 52, MADUMALAI, TIGER ) 

Tuesday, December 18, 2012

हिंदी फिल्मकारों को खूब लुभाता है ऊटी


सिर्फ सैलानियों को ही नहीं दक्षिण भारत का अति खूबसूरत हिल स्टेशन ऊटी हिंदी फिल्मकारों को हमेशा से रिझाता रहा है। अनगिनत ऐसी फिल्में हैं जिनकी शूटिंग ऊटी में हुई। मिथुन चक्रवर्ती को तो ऊटी इतना पसंद आया कि वे अपनी कई फिल्मों की शूटिंग वहां जरूर रखवाते थे। उनकी फिल्म प्यार झुकता नहीं ने उनकी मद्धिम पड़ते कैरियर को एक बार फिर से नई रवानी दी थी। बाद में मिथुन दादा ने ऊटी में अपना होटल  ही खोल लिया नाम रखा मोनार्क। मोनार्क की शाखाएं ऊटी के अलावा मैसूर व दक्षिण एक और शहर मसानगुडी में है।

प्रियदर्शन ने पहली हिंदी फिल्म बनाई मुस्कुराहट 1992 में तो उसकी पूरी शूटिंग ऊटी में की। हालांकि जय मेहता और रेवती की ये फिल्म बाक्स आफिस पर ज्यादा कमाल नहीं दिखा सकी। लेकिन इस फिल्म की सिनेमेटोग्राफी में ऊटी का सौन्दर्य यूं नजर आता है जैसे आप किसी कलाकार की पेंटिंग देख रहे हों।
पर हिंदी फिल्म में दोस्ताना, साजन, राजा हिंदुस्तानी जैसे नाम हैं जिनमें ऊटी शहर का सौन्दर्य निखर कर आता है। ऊटी अमिताभ बच्चन को भी काफी पसंद है उन्होंने दोस्ताना की शूटिंग वहां की थी तो बाद में मर्द और आखिरी रास्ता में भी ऊटी के नजारे हैं। तो संजय दत्त और आमिर खान को भी ये हिल स्टेशन खूब भाता है।
संजय दत्त माधुरी की फिल्म साजन में आप ऊटी का दिलकश नजारा जगह जगह देख सकते हैं। 

याद करें फिल्म साजन का गीत – मेरा दिल भी कितना पागल है ये प्यार तो तुमसे करता है। फिल्म के कई गानों में भी ऊटी की रुमानी दुनिया दिखाई देती है। दक्षिण के निर्माताओं की खास तौर पर तमिल और मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को तो ऊटी खूब पसंद है। मणिरत्नम ने जब फिल्म दिल से बनाई तो इसका एक गीत ऊटी के नीलगिरी माउंटेन रेल पर शूट किया। 


याद करें चलती ट्रेन की छत पर – चल छईंया छईंया पर शानदार कोरियोग्राफी में नृत्य करते मलयिका अरोड़ा और शाहरूख खान। इस गीत में नीलगिरी के पहाड़ों का अद्भुत आभा देखने को मिलती है।
ऊटी के पास स्थित पयाकरा फाल्स को भी कई फिल्मों में देखा जा सकता है। गुरू (तमिल) के अलावा हिंदी फिल्में जांबाज, ( गीत- तेरा मेरा साथ कितना प्यारा)  गैंगेस्टर, कामचोर, नगीना ( गीत- आजकल याद कुछ भी रहता नहीं) फिल्मों की शूटिंग ऊटी में की गई थी।

-     ------विद्युत प्रकाश मौर्य
राजा हिंदुस्तानी ( 1996 ) , ऊटी में। 
 




(( OOTY, HINDI FILMS, TAMILNADU, SOUTH INDIA IN SEVENTEEN DAYS 51 )