Monday, December 16, 2019

डिगलीपुर में है अंदमान की एकमात्र नदी


अंदमान एक द्वीप प्रदेश है। चारों तरफ से समंदर से घिरा हुआ। तो क्या इस प्रदेश में एक नदी भी हो सकती है। हां हो सकती है। डिगलीपुर शहर के बीचों बीच एक नदी भी बहती है। एक छोटी सी प्यारी सी नदी। पहाड़ों से निकल कर जंगलों से होते हुए समंदर में मिल जाती है। जी हां, कालीपोंग अंदमान की एकमात्र नदी है। डिगलीपुर के डालफिन चौराहा से एरियल बे जाते समय इस नदी पर पुल आता है।

पुराने पुल के बगल में अब एक नया पुल भी बन गया है। इस नदी की कुल लंबाई 35 किलोमीटर है। मैदानी भाग की नदियों की तुलना में यह जरूर लंबाई में छोटी पर यहां के लोगों के लिए काफी उपयोगी नदी है। हालांकि अंदमान में कुछ नाले भी हैं, जो देखने में नदियों जैसे लगते हैं। वैसे अंदमान के ग्रेट निकाबोर क्षेत्र में भी कुछ नाले हैं जिन्हें नदी भी कहा जाता है।
हम बात करें कलपोंग नदी की तो यह उत्तर अंडमान के सेडल पीक से निकलती है। डिगलीपुर के पास यह एरियल बे क्रीक के पास बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।

हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट - अंदमान की इस एकमात्र नदी के जल का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। कालीपोंग नदी पर हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट लगाया गया है। इससे बिजली बनाई जाती है। यहां 1750 किलोवाट के तीन टरबाइन लगाए गए हैं। कुल 5.25 मेगावाट बिजली इस प्रोजेक्ट से बनी जा रही है।

नदी के किनारे सुरम्य मंदिर – सुबह सुबह डिगलीपुर की सड़क पर टहलने निकला हूं। विवेकानंद स्टेडियम के कोने पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा लगी है। इस इलाके का नाम ही नेता जी की याद में सुभाष ग्राम रखा गया है। डालफिन चौराहे के एक तरफ ऊंची पहाड़ी क्षेत्र है। इसी क्षेत्र में प्रमुख सरकारी दफ्तर स्थित हैं।


वैसे तो डिगलीपुर शहर में कई मंदिर हैं। पर डिगलीपुर में कलपोंग नदी के किनारे एक सुंदर सा मंदिर दिखाई देता है। डालफिन चौराहा से चर्च की तरफ जाने के मार्ग में नदी के सुरम्य तट पर ये मंदिर स्थित है। वादीवेल मुरुगन मंदिर का निर्माण 1982 में दक्षिण भारतीय लोगों ने करवाया है। मंदिर परिसर से नदी के तट तक जाने के लिए सीढियां बनी हुई हैं। यहां से नदी की जलधारा बहुत ही सुंदर दिखाई दे रही है। मंदिर परिसर में शिव परिवार की सुंदर मूर्तियां और तस्वीरें लगी हुई हैं।
कलपोंग नदी के पुल के पास राधा गोविंद का एक और मंदिर स्थित है। हरे भरे बाग में स्थित कान्हा जी के इस मंदिर को बंगाली समुदाय के लोगों ने बनवाया है।   


सेंट इगनासियुस कैथोलिक चर्च – मंदिर से आगे चलकर जाने पर मै रास्ता पूछता हुआ कैथोलिक चर्च तक पहुंच गया हूं। चर्च के अंदर सूचना पट्ट पर हिंदी में सूचनाएं लगी हुई हैं। यह सूचना साप्ताहिक कार्य विभाजन का है। यहां हिंदी का इस तरह का प्रयोग देखकर प्रसन्नता होती है। चर्च के अंदर मदर मेरी की तस्वीर लगी है। 

चर्च के अंदर संत इगनासियुस की तस्वीर भी लगी है। मैं जब गया हूं तो चर्च में कोई मौजूद नहीं है। मैं अकेला चर्च का दरवाजा खोलकर अंदर प्रवेश करता हूं। पूरा चर्च घूमकर वापस बाहर निकलकर प्रवेश द्वार बंद कर देता हूं। इसके बाद वापस चल देता हूं अपने होटल की तरफ। माधवी और वंश को जगाकर आगे की यात्रा की तैयारी करनी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

Saturday, December 14, 2019

डिगलीपुर – अंदमान का एक सुंदर, सौम्य और शांत शहर


थोड़ी देर होटल में आराम फरमाने के बाद डिगलीपुर की सड़क पर हम तफरीह करने निकल पड़े हैं। होटल कार्तिका इन के ठीक सामने विवेकानंद स्टेडियम है। यहीं पर अंदमान की सरकारी बसों का पड़ा भी है। स्टेडियम के पास डॉलफिन तिराहा है। यहां पर अंडमान टूरिज्म का एक बोर्ड लगा है। इस पर लिखा है डिगलीपुर नहीं देखा तो क्या देखा। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कोशिश तो अच्छी है। पर अंदमान आने वाले सैलानियों में से 10 फीसदी भी डिगलीपुर तक नहीं आते।

जैसा कि हम पहले चर्चा कर चुके हैं कि डिगलीपुर अंदमान की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से 300 किलोमीटर से थोड़ा ज्यादा ही दूर है। तो यहां पहुंचने के लिए पोर्ट ब्लेयर से बस से 12 घंटे के सफर के अलावा दूसरा रास्ता समुद्री मार्ग से आने का भी है। पर पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर की फेरी सिर्फ हफ्ते में दो दिन चलती है। उसका टिकट भी ऑनलाइन नहीं मिलता है। समंदर का रास्ता सुहाना है, पर इसकी टिकटें काफी पहले से बुक रहती हैं। आप चाहें तो पोर्ट ब्लेयर से निजी टैक्सी या कार बुक करके भी डिगलीपुर आ सकते हैं। पर यह थोड़ा महंगा सौदा हो सकता है।

डिगलीपुर में ठहरने की बात करें तो कार्तिका इन बेहतरीन होटल है। इसके अलावा सुभाष ग्राम क्षेत्र में कई और बेसिक सुविधाओं वाले होटल लॉज हैं। पर यहां ज्यादा लग्जरी वाला होटल अभी कोई नहीं है। मैंने दिल्ली से ही डिगलीपुर के एपीडब्लूडी गेस्ट हाउस में कमरा बुक करने की कोशिश की थी। उन्हें फोन किया तो जवाब मिला कि आप अपना आग्रह फैक्स कर दें। साल 2019 में दिल्ली में कोई फैक्स का इस्तेमाल नहीं करता। हर जगह ईमेल है। पर डिगलीपुर में अभी फैक्स चलता है। भला क्यों। यह तो यहां आकर पता चला। दरअसल डिगलीपुर मे सिर्फ बीएसएनएल का डाटा चलता है, वह भी सिसकते हुए। कई बार दो दिन तक डाटा गायब रहता है। तो फैक्स का इस्तेमाल मजबूरी है यहां पर। निजी आपरेटर एयरटेल और वोडाफोन की भी मोबाइल सेवाएं यहां उपलब्ध हैं पर हर जगह उनका नेटवर्क नहीं मिलता।

अब कुछ बातें डिगलीपुर के बारे में। डिगलीपुर उत्तरी अंदमान का सबसे बड़ा शहर है। सन 2001 में इसकी आबादी 43 हजार से ज्यादा थी। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 43 मीटर है। यहां हिंदी, बांग्ला, तमिल, तेलुगू बोलने वाले लोग रहते हैं। धान और नारियल यहां की प्रमुख खेती है। डिगलीपुर इलाके में 43 गांव आबाद है। ज्यादातर गांव के लोग दो सौ सालों के दौरान मुख्य भारत भूमि से आए हुए लोग हैं। उन लोगों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखा है।
अंदमान द्वीप समूह की एकमात्र नदी कल्पोंग नदी इस शहर के बीच से होकर गुजरती है। वहीं पूरे अंदमान निकोबार द्वीप समूह का सबसे ऊंचा पहाड़, सैडल पीक, डिगलीपुर शहर से 10 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है।

डिगलीपुर के पास रॉस एंड स्मिथ आईलैंड, कालीपुर बीच, लिमिया बीच, मड वाल्केनो आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। अगर आप अंदमान में भीड़ भाड़ से दूर शांत स्थलों की तलाश में हैं तो डिगलीपुर आकर आपकी तलाश पूरी हो सकती है। आप चाहें तो डिगलीपुर आकर एक हफ्ते भी गुजार सकते हैं। पर कम से कम यहां दो दिन का प्रवास तो बनता ही है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य-  vidyutp@gmail.com

Friday, December 13, 2019

मायाबंदर से डिगलीपुर वाया ऑस्टिन ब्रिज


मायाबंदर बस स्टैंड में स्थानीय बसों की समय सारणी लगी है। यहां से पोर्ट ब्लेयर, रंगत, कदमतल्ला आदि के लिए बसे हैं। मायाबंदर से चैनपुर और करमाटांड के लिए भी रास्ता जाता है। मतलब मायाबंदर इस मार्ग का प्रमुख पड़ाव है। मायाबंदर में रहने के लिए होटल और गेस्ट हाउस उपलब्ध हैं।

मायाबाबंदर का बाजार भी अच्छा खासा है। यहां जरूरत की सारी चीजें मिल जाती हैं। हमारी बस में दुकानदारों का कुछ सामान लदा था जिसे कंडक्टर ने मायाबंदर में उतरवाया। यहां पर आनंद बस का बुकिंग काउंटर भी बना हुआ है। 

थोड़ी देर रुकने के बाद हमारी बस मायाबंदर से डिगलीपुर के लिए चल पड़ी है। आधे घंटे चलने के बाद रास्ते में समंदर पर बना सड़क पुल आया। इसे ऑस्टिन ब्रिज कहते हैं। आधा किलोमीटर लंबा यह पुल 2002 में बनकर तैयार हुआ। यह पुल ऑस्टिन क्रीक पर बनाया गया है।

यहां पर ऑस्टिन जेट्टि स्थित है। जब ये पुल नहीं बना था तब यहां भी फेरी से रास्ता पार करना पड़ता था। यानी 2002 से पहले डिगलीपुर जाने के लिए तीन बार समंदर को फेरी से पार करना पड़ता था। ऑस्टिन क्रीक पर बने पुल ने सफर को आसान कर दिया है। इस पुल का असली नाम चेंगप्पा ब्रिज है। इस पुल को ये नाम वन अधिकारी बीएस चेंगप्पा के नाम पर दिया गया है। चेंगप्पा ने इस क्षेत्र के वन संपदा के संरक्षण के लिए काफी काम किया था। पर लोग इस पुल को ऑस्टिन ब्रिज के नाम से ज्यादा बुलाते हैं। 

आजकल यहां एक नेचर पार्क का निर्माण कराया गया है। मायाबंदर रुकने वाले सैलानी इसे देखने आते हैं। लोग यहां पिकनिक मनाने भी पहुंचते हैं। मायाबंदर में रुककर आप बेतापुर के पास धनीनाला देखने भी जा सकते हैं। यहां मेंग्रोव देखे जा सकते हैं। बेतापुर में ठहरने के लिए टूरिस्ट गेस्ट हाउस उपलब्ध है। यहां पर आप करमाटांग बीच, एवीस आइलैंड की भी सैर कर सकते हैं।

अंडमान ट्रंक रोड पर मायाबंदर से डिगलीपुर की तरफ जाते समय कलारा जंक्शन से रास्ता बदलकर रामनगर बीच पर भी जाया जा सकता है। यह बीच भी डिगलीपुर क्षेत्र का प्रमुख आकर्षण है।
हमारी बस तेजी से डिगलीपुर की तरफ भागी जा रही है। जब मंजिल करीब आ जाए तो कई बार वाहनों की गति तेज हो जाती है। वैसा ही कुछ हो रहा है अभी। इधर सड़क की दशा भी पहले से बेहतर है। हमलोग दोपहर के बाद साढ़े तीन बजे डिगलीपुर शहर में प्रवेश कर रहे हैं। 

बस ने हमें डिगलीपुर बाजार के चौराहे पर लाकर उतार दिया है। अपने सामान के साथ उतरते हुए हमें काफी राहत मिली है। अब हमें रहने के लिए एक होटल की तलाश है। यहां हमने पहले से ऑनलाइन बुकिंग नहीं कर रखी है। बस स्टॉप के सामने एमवी लॉज है। पर इस लॉज के स्वागत कक्ष पर कोई कर्मचारी मौजूद नहीं है। मैं माधवी और वंश को यहीं छोड़कर आसपास के दूसरे ठिकाने ढूंढने निकल पड़ा। 

डॉल्फिन चौराहा से पहले हमें दूर्वा लॉज दिखाई देता है। इसमे 600 रुपये का नॉन एसी और 1200 का एसी कमरा है। हमें कुछ खास पसंद नहीं आया। तो थोड़ी और तलाश में आगे बढ़े। डॉल्फिन चौराहा से आगे एक नए बने मार्केट कांप्लेक्स में होटल कार्तिक इन में दाखिल हुआ। होटल का कमरा बड़ा शानदार है। एसी रूम वे 1500 रुपये में देने को तैयार हो गए। तो तय हो गया। सामान लेकर हमलोग कार्तिक इन की तीसरी मंजिल पर बने कमरे में जाकर पसर गए।

अरे हमलोग 300 किलोमीटर से ज्यादा का बस का सफर करके यहां तक पहुंचे हैं। इस बीच यात्रा में कितने ठहराव। दो बार समंदर को पार करना। उबड़ खाबड़ सड़के और पीछे की सीट। तो थोड़ा आराम तो बनता है न। पर डिगलीपुर की बातें तो जारी रहेंगी।

Wednesday, December 11, 2019

रंगत के रंग और नींबूडेरा में दोपहर का भोजन


रंगत पोर्ट ब्लेयर और डिगलीपुर के बीच सबसे बड़ा शहर है। पोर्ट ब्लेयर से कुछ बसें रंगत तक के लिए रोज आती हैं। यहां तक पोर्ट ब्लेयर से समंदर के रास्ते से भी पहुंचा जा सकता है। रंगत का बाजार बंगाली बहुल है। सन 2001 में रंगत की आबादी 40 हजार के आसपास थी। यहां हमें गन्ने की जूस वाली दुकान दिखाई दे रही है।

हमारी बस रंगत पुलिस थाना के सामने रुक गई है। पर बस से उतरने वाला कोई नहीं है। हमें थोड़ी उम्मीद जगी थी कि यहां कोई उतर जाए तो हमें आगे की सीट मिल जाएगी। पर ऐसा नहीं हो सका। मतलब पूरा सफर पीछे वाली सीट पर ही करना पड़ेगा। रंगत बाजार में सामने डाकघर का भवन नजर आ रहा है। नन्हा सा लेटर बॉक्स लगा है, पर यहां भी अब चिट्ठी लिखने वाले लोग कम हो गए हैं।

रंगत के आसपास आठ किलोमीटर की दूरी पर आमकुंज बीच है। रंगत में रुकने वाले सैलानी इस समुद्र तट पर समय गुजारने जाते हैं। पर हमने इस बीच का नजारा अपनी बस की खिड़की से ही किया। रंगत के पास टर्टल नेस्टिंग ग्राउंड देखा जा सकता है। पर इसके लिए दिसंबर से फरवरी तक का समय मुफीद है। रंगत में अंदमान का जवाहर नवोदय विद्यालय भी स्थित है।

हमारी बस रंगत से आगे चल पड़ी है। सड़क की हालत इतनी खराब है कि इसे नेशनल हाईवे कहना तौहीन होगी। थोड़ी देर बाद हमारी बस समंदर के किनारे किनारे चल रही है। यानी सड़क मरीन ड्राईव में बदल गई है। नीले समंदर को देखते हुए सफर करते रहना बड़ा आनंददायक है। किनारे के पत्थरों से टकराकर लहरें वापस जा रही हैं। वहां दूर समंदर में एक नाव भी दिखाई दे रही है।

समंदर के साथ चलने का ये नजारा बड़ा मोहक है। समुद्र तट पर कुछ आम के पेड़ दिखाई दे रहे हैं। शायद इसलिए तट का नाम आम्रकुंज बीच रखा गया होगा। इसी बीच हमें समंदर में आकर मिलती हुई एक नदी भी दिखाई देती है।
अब हमलोग रंगत से आगे बकुलतल्ला नामक गांव से गुजर रहे हैं। अब हमें भूख लगने लगी है। जोरों की भूख। हमें इंतजार है कि ड्राईवर महोदय खाने के लिए कब और कहां पर रोकेंगे।

मैं रास्ते में पड़ने वाले छोटे छोटे पड़ाव के नाम पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। हमारी बस बकुलतल्ला के बाद पद्मनाभपुरम, बेटापुर, शिवापुरम से गुजरते हुए बिल्लीग्राउंड पहुंच गई है। बिल्ली ग्राउंड मे थाना है। थाने का भवन हमारी नजरों के सामने है।

बिल्ली ग्राउंड के बाद हम हरिनगर से गुजर रहे हैं। हमारी नजरों के सामने हरिनगर का पंचायत भवन है। पंचायत की इमारत काफी सुंदर है। रास्ते में पड़ने वाले इन ज्यादातर शहरों के नाम देखकर सुनकर लगता है कि ये बाद में बसाए हुए शहर है। ये सही है क्योंकि इनमें ज्यादातर सेटलर्स की आबादी है। 

अब हमारी बस नींबूडेरा पहुंच गई है। दोपहर के सवा बारह बजे हैं। हमें बस में बैठे आठ घंटे हो चुके हैं। चालक महोदय ने लक्ष्मी होटल के सामने बस रोक दी है। होटल के मालिक का नाम केसी ब्यापारी है। यहां शाकाहारी और मांसाहारी दोनो तरह की थाली खाने में उपलब्ध है। हमने शाकाहारी थाली ली। यह थाली 120 रुपये की है। यहां पर समोसा और मिठाइयां भी मिल रही हैं। माधवी और वंश से ज्यादा कुछ नहीं खाया।

उन लोगों ने थाली के बजाय समोसा और मिठाइयां लीं। इस होटल का खाना औसत दर्जे का है। थाली वंश को पसंद नहीं आई। बस में पीछे की सीट होने के कारण भी वे लोग ज्यादा खाने से बचना चाह रहे हैं। दोपहर के खाने के बाद बस एक बार फिर चल पड़ी है। थोड़ी देर में ही हमलोग मायाबंदर पहुंच गए हैं। शहर से पहले हमें एयर स्ट्रीप दिखाई दे जाती है। आपात स्थिति में यहां विमानों की उडा़न होती है। 

मायाबंदर डिगलीपुर से पहले बड़ा बाजार है। रंगत और मायाबंदर तक पोर्ट ब्लेयर से पानी के जहाज के मार्ग से भी पहुंचा जा सकता है। हमारी बस मायाबंदर में 20 मिनट से ज्यादा रुकी। यहां पर बस से कुछ सामान उतारा गया। लंबी दूरी की ये बस यात्रियों के साथ सामान ढोने का भी काम करती है। रंगत से मायाबंदर की दूरी 70 किलोमीटर है। मायाबंदर शहर में डिग्री कॉलेज भी है। यहां से डिगलीपुर दो घंटे से ज्यादा का रास्ता है और हमारी यात्रा अभी जारी है।

( यात्रा मार्ग -  रंगत - बकुलतल्ला – पद्मनाभपुरम-  बेटापुर-  शिवापुरम – बिल्लीग्राउंड – हरिनगर- नींबूडेरा –मायाबंदर )

पोर्ट ब्लेयर से रंगत – 162 किलोमीटर
रंगत से मायाबंदर – 70 किलोमीटर
रंगत से डिगलीपुर – 74 किलोमीटर।
-विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

Monday, December 9, 2019

उत्तरा जेट्टि से रंगत वाया कदमतल्ला - बंगाली बस्ती


उत्तरा जेट्टि से बस में सवार होकर हमलोग एक बार फिर आगे चल पड़े हैं। अब हम कदमतल्ला से होकर गुजर रहे हैं। कदमतल्ला अंदमान का एक बड़ा गांव है ऐसा समझ लिजिए। यह मध्य अंदमान के रंगत तहसील का हिस्सा है। पोर्ट ब्लेयर से कुछ सरकारी बसें कदमतल्ला तक भी आती हैं। 

उत्तरा जेट्टि से कदमतल्ला बाजार तक के लिए आटो रिक्शा भी चलते हैं। ये दिन में 20 रुपये किराया लेते हैं। कदमतल्ला बाजार में रहने के लिए समान्य सुविधा वाले गेस्ट हाउस भी उपलब्ध हैं। कदमतल्ला में क्षेत्र में जारवा लोगों का निवास पड़ता है। इस बात की जानकारी हमें डिगलीपुर से वापस आते समय मिली।
कदमतल्ला में बंगाली समुदाय के लोग ज्यादा संख्या में है। ये लोग भी सेटलर हैं। संभवतः उन लोगों ने इस इलाके का नाम कदमतल्ला रखा होगा। क्योंकि ऐसा नाम बंगाली बहुत इलाकों में सुनने को मिलता है।

बस से चलते हुए हमें कुछ पक्के मकान, स्कूल और सरकारी भवन दिखाई दे रहे हैं। नारियल के पेड़ों के संग रास्ता हरा भरा है। पर सड़क की दशा ज्यादा ठीक नहीं है। सड़क किनारे संदेश लिखा है कि प्लास्टिक कचरा जहां तहां नहीं फेंके। यहां हमें आनंद की डिगलीपुर से आकर पोर्ट ब्लेयर की ओर जाती हुई बस दिखाई दी।

कदमतल्ला गांव को पार कर हमारी बस रंगत की ओर बढ़ रही है। सुबह के 11 बजने वाले हैं और हमलोग रंगत पहुंच गए हैं। रंगत पहुंचने का मतलब हम अपने सफर की आधी से ज्यादा दूरी तय कर चुके हैं। रंगत की बातें आगे भी करेंगे पर पहले थोड़ी चर्चा अंडमान ट्रंक रोड की।

लाइफलाइन है अंडमान ट्रंक रोड - वास्तव में अंडमान ट्रंक रोड जो राजधानी पोर्ट ब्लेयर को डिगलीपुर से जोड़ती है अंदमान की लाइफलाइन है। यह नेशनल हाईवे नंबर 223 के तौर पर भी पहचानी जाती है। इसकी कुल लंबाई 333 किलोमीटर है। अब इसे 2100 करोड़ रुपये की लागत से अपग्रेड किया जा रहा है।

सन 2000 के आसपास अंडमान ट्रंक रोड की हालत बहुत खराब थी। स्थानीय आदिवासी जनजातियों पर आसन्न खतरों को लेकर इस सड़क पर आवाजाही पर रोक लगा दी गई थी। पर अब इस सड़क को फोर लेन का बेहतर ऑल वेदर रोड बनाने पर काम चल रहा है। नीति आयोग की 2018 की रिपोर्ट कहती है कि शानदार सड़क बन जाने के बाद इस क्षेत्र में साल 2030 तक सालाना 12 लाख सैलानी आएंगे जो अभी चार लाख के आसपास ही आते हैं। 

भारत सरकार ने 1960 से 1970 के दशक में अंदमान ट्रंक रोड का निर्माण कराया था। तब इस क्षेत्र के जंगलों में रहने वाले जारवा लोगों ने सड़क निर्माण का खूब विरोध किया था। इस दौरान जारवा लोगों ने सड़क निर्माण से जुड़े कई लोगों की हत्या भी कर दी थी। पर कई दशक गुजरने के बाद जारवा लोगों के व्यवहार में बदलाव आया है।

बेशकीमती लकड़ियों का कारोबार – एटीआर पर सफर करते हुए हमें रास्ते में कई जगह सड़क के किनारे लकड़ियां काटकर रखी हुई दिखाई देती हैं। दरअसल इन क्षेत्रों से अंदमान पादुक समेत दूसरी बेशकीमती लकड़ियों का कारोबार होता है। तो ये जंगल बेशकीमती हैं। इन्हें हमें बचाकर रखना होगा।    


बाराटांग से उत्तरा जेट्टि – 28 किलोमीटर
उत्तरा जेट्टि से कदमतल्ला बाजार – 20 किलोमीटर
उत्तरा जेट्टि से रंगत – 43 किलोमीटर
पोर्ट ब्लेयर से रंगत – 210 किलोमीटर
रंगत से मायाबंदर – 70 किलोमीटर
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
(KADAMTALLA, ANDAMAN TRUNCK ROAD, RANGAT ) 

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Saturday, December 7, 2019

समंदर पर पुल – अंदमान ट्रंक रोड का सफर करेंगे आसान


बाराटांग द्वीप पार करने के बाद हमलोग गांधी जेट्टि से एक बार फिर समंदर में सफर कर रहे हैं। इस बार का सफर गांधी जेट्टि से उत्तरा जेट्टि के बीच है। पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर जाने के रास्ते में कुल दो बार समंदर को फेरी सेवा से पार करना पड़ता है। पहली बार मिड्ल स्ट्रेट से नीलांबर जेट्टि के बीच और दूसरी बार गांधी जेट्टि से उत्तरा जेट्टि के बीच। एक बार फिर समंदर के किनारे मैंग्रोव दिखाई दे रहे हैं। नीला समंदर और हरे भरे वन।

पर मैं क्या देख पा रहा हूं कि गांधी जेट्टि और उत्तरा जेट्टि के बीच समंदर पर विशाल पुल बनाया जा रहा है। पुल का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। यह पुल काफी ऊंचा बन रहा है। इतना ऊंचा कि इसके नीचे जहाज गुजर सकें। जाहिर है इस पुल के बन जाने के बाद बसों और दूसरे वाहनों को फेरी से पार करने की जरूरत नहीं रह जाएगी। इससे पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर की तरफ जाने में समय की काफी बचत होगी। 

पुल को साल 2021 तक पूरा करने का लक्ष्य है। मैं अपनी इस यात्रा में देख पा रहा हूं कि अधिकांश पीलर का काम पूरा हो चुका है। समंदर में बड़े बड़े क्रेन और तकनीकी उपकरण लगे हैं जो पुल पर दिन रात काम में जुटे हुए हैं। इंजीनियरों और मजदूरों की टीम निर्माण कार्य में मुस्तैद है।



अंदमान ट्रंक रोड पर मिड्ल स्ट्रेट- बाराटांग और गांधी जेट्टि-कदमतल्ला पर दो समंदर पुल के निर्माण के बाद बाराटांग, कदमतल्ला, मायाबंदर जैसे तमाम शहर और द्वीपों पर पहुंचना आसान हो जाएगा। इन दोनों समंदर पुल के निर्माण के लिए 270 – 270 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण  के मुद्दों को ध्यान रखते हुए अंदमान में समंदर पर इन पुलों के निर्माण की अनुमति प्रदान की। नेशनल हाईवे एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कारपोरेशन इन पुलों का निर्माण करा रहा है। मिडल स्ट्रेट से बाराटांग के बीच बनने वाले पुल की लंबाई 960 मीटर होगी। जबकि गांधी जेट्टि और उत्तरा जेट्टि के बीच बनने वाला पुल इससे थोड़ा लंबा होगा।

अगले कुछ सालों में इन पुल के तैयार होने के बाद ये सफर सुगम होने वाला है। पर अभी बार बार बस से उतरना फिर फेरी में सवार होना, फेरी के रास्ते समंदर को पार करना इस सफर का भी अपना रोमांच है। तो ये रोमांच भविष्य में खत्म होने वाला है। पर विकास के साथ बहुत कुछ बदलाव भी होता है। अंदमान पर लगातार शोध करने वाले पर्यावरणविदों का मानना है कि फोर लेन की चौड़ी सड़कें और विशाल पुल इस द्वीप की मूल संरचना को बदल देंगे। अंदमान भूकंप प्रभावित क्षेत्र में आता है। इसलिए द्वीप पर विकास कार्य काफी सोच समझ कर ही कराया जाना चाहिए।

फेरी का सफर पूरा करके हमलोग इस पार आ गए हैं। सामने बोर्ड पर लिखा है – उत्तरा जेट्टि में आपका स्वागत है। हमलोग कदमतल्ला द्वीप पर पहुंच गए हैं। जेट्टि के भवन के आसपास बांस के बने सुंदर यात्री शेड बनाए गए हैं। भवन में शौचालय का निर्माण कराया गया है। यहां पर स्थानीय केले बिक रहे  हैं। एक दर्जन 15 रुपये में। मैंने खाने के लिए कुछ केले खरीद लिए हैं। ये प्राकृतिक रूप से पके हुए केले हैं। जेट्टि के भवन के बगल में मछली बाजार बना है। बाहर बोर्ड पर लिखा है – मत्स्य अवतरण केंद्र। यहां समंदर से निकाली जाने वाली मछलियों को स्टॉक किया जाता है। फिर उन्हें आगे भेजा जाता है।

बाराटांग से उत्तरा जेट्टि – 28 किलोमीटर
बाराटांग से रंगत – 71 किलोमीटर
बाराटांग से मायाबंदर – 141 किलोमीटर
बाराटांग से डिगलीपुर – 230 किलोमीटर
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( GANDHI JETTY , UTTRA JETTY, FISH, BRIDGE ON SEA )

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Thursday, December 5, 2019

अंदमान का बाराटांग द्वीप – रांची वालों की बस्ती


बाराटांग में ताजे नारियल भी बिक रहे हैं। वैसे अंदमान में आप जहां से भी गुजरेंगे नारियल पानी तो मिल ही जाएगा। बाराटांग में नीलांबर जेट्टी पर थोड़े इंतजार के बाद अगली फेरी में हमारी बस भी आ गई। सब लोग तेजी से बस में चढ़ने लगे। हमने भी एक बार फिर बस में अपनी जगह ले ली। सभी लोगों के बैठते ही बिना किसी देरी के बस एक बार फिर आगे बढ़ने लगी है। पर अब सड़क पहले जैसी अच्छी नहीं है। 

इस सड़क पर चलते हुए लग रहा है जैसे हम गांव की इस उबड़ खाबड़ सड़क पर चल रहे हैं। पीछे की सीट पर होने के कारण हमें कुछ ज्यादा ही बस की उछाल झेलनी पड़ रही है। हालांकि सड़क के दोनों तरफ खूब हरियाली है। पर बस का सफर मुश्किलों भरा हो रहा है। वैसे ये मुश्किल दिन भर हमारे साथ रहने वाली है।

बाराटांग अंदमान निकोबार का एक विशाल द्वीप है। पर बाराटांग द्वीप के क्षेत्र में रहने और खाने पीने के लिए कुछ सीमित विकल्प ही उपलब्ध हैं। बाराटांग का विस्तार करीब 238 वर्ग किलोमीटर में है। साल 2011 की जन गणना के मुताबिक इस द्वीप क्षेत्र में महज 5600 लोग निवास करते हैं।  इसे रांची वाला द्वीप भी कहते हैं। ब्रिटिश काल में यहां रांची से लाए गए लोगों को बसाया गया था। ये मजदूर वर्ग के आदिवासी लोग थे जिन्हें यहां खेती करने के लिए लाया गया था। ये लोग यहां आने के बाद ब्रिटिश काल में चर्च के प्रभाव में आकर ईसाई बन गए।  

बाराटांग द्वीप पर लाइम स्टोन गुफा के अलावा मड वाल्केनो भी है। नीलांबर जेट्टी से आठ किलोमीटर आगे मड वाल्केनो देखा जा सकता है। प्रशासन के लिहाज से बाराटांग रंगत तालुका का हिस्सा है। बाराटांग द्वीप पर कुल 12 गांव हैं। इनमें नीलांबर, सुंदरगढ़ आदि की आबादी सबसे ज्यादा है। पर इस द्वीप के लोग 100 फीसदी साक्षर हैं। अगर आप नीलांबर में रुकना चाहते हैं तो यहां पंचायत का गेस्ट हाउस और पीडब्लूडी का गेस्ट हाउस भी उपलब्ध है। 



वैसे आमतौर पर यहां आने वाले सैलानी दिन भर घूमने के बाद शाम को वापस पोर्ट ब्लेयर लौट जाते हैं। तो चलिए आगे चलते हैं हमारी बस का सफर तो जारी है। नीलांबर गांव के लोगों को मुख्य काम मछली पकड़ना है। यहां पर सरकार की ओर फिश मार्केट भी बनाया गया है। इधर से मछलियों को पोर्ट ब्लेयर के बाजार में भेजा जाता है।

उबड़ खाबड़ रास्तों पर कुछ किलोमीटर चलने के बाद हमारी बस सुंदरगढ़ से होकर गुजर रही है। यह एक गांव है। यहां पर बस स्टाप बना है। इस पर लिखा है ग्राम पंचायत सुंदरगढ़। यह नीलांबर के बाद का गांव है। इसके बाद भी सड़क की हालत काफी खराब है। आबादी कम दिखाई दे रही है। दोनों तरफ हरे भरे जंगल हैं।

करीब 28 किलोमीटर के उबड़खाबड सफर के बाद हमलोग गांधी जेट्टी या गांधी घाट पहुंच गए हैं। यहां हमें एक बार फिर बस से उतर जाना है। एक बार फिर समंदर को स्टीमर से पार करना है। गांधी घाट पर यात्रियों के बैठने के लिए दो सुंदर शेड बने हुए हैं। पर हमारे पास यहां बैठने का वक्त बिल्कुल नहीं है। यहां पर कुछ खाने पीने की दुकाने हैं। कुछ फल भी मिल रहे हैं।

हमलोग पहले की तरह फटाफट जाकर सामने लगे स्टीमर में सवार हो गए हैं। हमारी बस भी इसी स्टीमर में आकर लद गई है। हमलोग एक बार फिर बस समेत समंदर में सफर कर रहे हैं। हां हम अपनी 325 किलोमीटर की यात्रा में तकरीबन 120 किलोमीटर की दूरी तय कर चुके हैं। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( BARATANG, SUNDARGARH, LIME STONE CAVES, KADAMTALLA, GANDHI GHAT ) 
बाराटांग से कदमतल्ला – 28 किलमीटर
बाराटांग से रंगत – 71 किलोमीटर
बाराटांग से मायाबंदर – 141 किलोमीटर