Sunday, November 18, 2018

शिव ही सुंदर है.... ओंकारेश्वर मंदिर- मडिकेरी

कुर्ग शहर के मध्य में स्थित है ओंकारेश्वर मंदिर। यह शिव जी का कुर्ग क्षेत्र का प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर का इतिहास कुर्ग के राजपरिवार से जुड़ा हुआ है। सन 1800 के आसपास कुर्ग के राजा लिंगराजेंद्र -2 ने यहां पर ओंकारेश्वर मंदिर का निर्माण कराया। कहा जाता है कि राजा के हाथों किन्ही कारणों से एक ब्राह्मण की हत्या हो गई। इसके बाद ब्रह्मराक्षस राजा को लगातार परेशान करने लगा। परेशान राजा को यह सलाह दी गई कि अगर वह काशी से शिवलिंगम मंगाकर उसी स्थल पर स्थापित करवाएं जहां पर ब्रह्म हत्या हुई तो उनकी परेशानी दूर हो सकती है।


इसके बाद राजा ने यही किया। काशी से शिवलिंगम मंगाया गया और उसकी स्थापना मडिकेरी में कर दी गई। इस मंदिर का ही नाम ओंकारेश्वर मंदिर पड़ा।  पीले रंग के इस सुंदर मंदिर के सामने सुंदर सा सरोवर है। यह मंदिर 1820 में बनकर तैयार हो गया था। कहा जाता है कि उसके बाद ब्राह्मण की आत्मा ने राजा को कभी तंग नहीं किया।

इस्लामिक वास्तु में बना मंदिर – ओंकारेश्वर मंदिर को इसके निर्माण की शैली देश के बाकी मंदिरों से काफी अलग लाकर खड़ा कर देती है। इस मंदिर के निर्माण में इस्लामिक स्टाइल की झलक दिखाई देती है। मंदिर में मसजिद की तरह मीनारे हैं वहीं गुंबद भी किसी मसजिद जैसा ही है।
मंदिर के सामने स्थित तालाब में मछलियां तैरती नजर आती हैं। तालाब के बीच में भी एक छोटा मंदिर बनाया गया है। मंदिर आम तौर पर सुबह 6.30 बजे से 12 बजे तक फिर शाम को 5 बजे से रात 8 बजे तक खुला रहता है। मंदिर परिसर में संस्कार मंडप भी बना हुआ है। मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको मुख्य बाजार से नीचे की ओर उतरना पड़ता है। ओंकारेश्वर मंदिर का परिसर बडा ही मनोरम है।

कुर्ग यानी कोडागू कर्नाटक का जनजातीय आबादी वाला क्षेत्र है। इस क्षेत्र में रहने वाली आबादी शेष कर्नाटक से अलग है। यहां के लोगों को कोडावा कहा जाता है। यहां 11 प्रमुख पिछड़ी जातियां निवास करती हैं। इसके अलावा जनजातीय लोग भी हैं। कुर्ग के लोग बड़े स्वाभिमानी और परिश्रमी होते हैं। परंपरागत रूप से ये लोग धान के खेतों में काम किया करते थे। उनके इस क्षेत्र में हजारों साल से रहने का प्रमाण मिलता है। 

कुर्ग के लोगों में हथियार साथ में रखना, जरूरत पड़े तो बहादुरी से लड़ना उनके खून में है। अपनी अलग पहचान के लिए कई बार ये लोग कुर्ग को कर्नाटक से अलग राज्य का दर्जा देने की मांग भी कर चुके हैं। दरअसल देश आजाद होने के बाद जो 27 राज्य बने उसमें कुर्ग अलग राज्य था। पर 1956 में इसे कर्नाटक में मिला दिया गया। इस क्षेत्र की स्थानीय भाषा कोडावा है जो कन्नड़ से अलग है।

चचेरे, ममेरे भाई बहनों के बीच विवाह संबंध
कोडावा में लोगो में विवाह की रस्म बिना किसी ब्राह्मण पुजारी के संपन्न कराई जाती है। यहां चचेरे, ममेरे भाई बहनों के बीच विवाह संबंध हो सकते हैं। कुर्ग के लोग हर साल 3 सितंबर को कालीपोल्डु  उत्सव मनाते हैं। यह हथियारों की पूजा का उत्सव है। कुर्ग की ज्यादातर आबादी हिंदू  है, पर टीपू सुल्तान के समय बड़ी संख्या में लोग मुसलमान भी बने थे।

ओंकारेश्वर मंदिर मडिकेरी। 

खेल जगत की कई बड़ी प्रतिभा कुर्ग से-  कुर्ग ने खेल जगत को भी बड़ी हस्तियां दी हैं। कुर्ग से हॉकी खेलने वाले 10 से ज्यादा ओलंपियन हुए हैं। वहीं एथलेटिक्स में भी कुर्ग का बड़ा योगदान है। अश्विनी नचप्पा, रोहन बोपन्ना जैसी खेल जगत की हस्तियां कुर्ग से हुई हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य, vidyutp@gmail.com
(COORG, OMKARESHWAR TEMPLE, MADIKERI ) 
आगे पढ़िए - हर साल गर्म होता जा रहा कुर्ग... (आखिरी कड़ी ) 


Saturday, November 17, 2018

कोडागू का इतिहास बयां करता – मडिकेरी फोर्ट

मडिकेरी शहर में हैं तो मडिकेरी फोर्ट देखना न भूलें।  सुंदर व्यवस्थित किला कोडागू क्षेत्र का इतिहास बताता है। किला बस स्टैंड से एक फर्लांग पहले शहर के मध्य में स्थित है। एक किलोमीटर की परिधि में फैले इस किले की बाउंड्री काफी ऊंची है। चारदीवारी इतनी बेहतर हाल में हैं कि मैं इस पर चढ़ककर किले का पूरा चक्कर लगा गया।

किले के प्रवेश द्वार पर गणपति का एक मंदिर है। इसका नाम कोटे महागणपति मंदिर है। मंदिर में दर्शन के बाद आगे बढ़ने पर किले का मुख्य द्वार है। किले के मुख्य  भवन में आजकल जिला पंचायत का दफ्तर संचालित किया जा रहा है। हालांकि कर्नाटक सरकार का पुरातत्व विभाग चाहता है कि जिला प्रशासन किले के भवन को खाली कर दे जिससे किले के संग्रहालय को भव्य रूप दिया जा सके हैं। पर भी ऐसा नहीं किया जा सका है। किले के परिसर में दो विशाल हाथियों की प्रतिमाएं लगी हैं। किला दिन भर सैलानियों से गुलजार रहता है। इसमें प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है।

मडिकेरी किले का निर्माण 17वीं सदी के उत्तरार्ध में राजा मृदुराजा ने बनवाया था। बाद में इस किले में टीपू सुल्तान ने भी निर्माण कराया। 1790 में इसमें कुछ निर्माण के बाद टीपू ने इसका नाम दिया था जाफराबाद। इसके बाद किला एक बार फिर डोडा वीर राजेंद्र के कब्जे  में आ गया। साल 1812-1814 के बीच लिंगा राजेंद्र ने भी किले में कुछ निर्माण कराया। पर 1834 में यह किला अंग्रेजों के अधीन हो गया।

मडिकेरी के किले में देखने के लिए सबसे खास इसका संग्रहालय है। ये म्युजियम वास्तव में एक चर्च के भवन में संचालित हो रहा है। सेंट मार्क्स चर्च का निर्माण 1855 में इस्ट इंडिया कंपनी द्वारा कराया गया था। गोथक शैली में बने इस चर्च का निर्माण एक मंदिर की जगह पर किया गया था। देश आजाद होने के बाद इस चर्च को बंद कर दिया गया। किला कर्नाटक सरकार के अधीन है। अब चर्च में राजकीय संग्रहालय है। हालांकि म्युजियम बहुत बड़ा नहीं है। पर इसमें संग्रह काफी बेहतरीन है। 

संग्रहालय में टीपू सुल्तान के कार्यकाल के दौरान के हथियारों का संग्रह देखा जा सकता है। इसके अंदर कुर्ग के वीर सपूत केएम करिअप्पा से जुड़ा हुआ संग्रह भी देखा जा सकता है। संग्रहालय में कोडागू क्षेत्र से प्राप्त कुछ सुंदर देवी-देवताों की मूर्तियां भी देखी जा सकती हैं। यहां उमा महेश्वर, जैन तीर्थंकरों की प्रतिमा, 15वीं सदी की बुद्ध प्रतिमा, कामाक्षी की प्रतिमा, शाही पुरुष और स्त्री की प्रतिमा देखी जा सकती है। इस छोटे से दायरे में आप कुछ सुंदर ग्लास पेटिंग भी देख सकते हैं।
संग्रहालय के लॉन में शिव लिंगम और नंदी की प्रतिमा। 

मडिकेरी किले के इस संग्रहालय के बाहर कई नायाब मूर्तियां और संग्रह यूं बाहर खुले में रखी हुई हैं। इनमें एक शिवलिंगम और एक नंदी की प्रतिमा है। राम सीता की मूर्तियां और कुछ और मूर्तियां लॉन में यूंही पड़ी हुई हैं। यह देखकर प्रतीत होता है कि हम अपनी विरासत की कद्र करना नहीं जानते।

खुलने का समय – मडिकेरी का किला सुबह 10 बजे से शाम 5.30 बजे तक खुला रहता है। इसमें प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। किले में घूमने के लिए दो घंटे का समय रखिए।

(MADIKERI FORT, COORG, KARNATKA ) 
      विद्युत प्रकाश मौर्य
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आगे पढ़िए - शिव ही सुंदर है - कुर्ग का ओंकारेश्वर मंदिर- 

Thursday, November 15, 2018

बुद्ध का विशाल मंदिर – गोल्डेन टेंपल ( नामद्रोलिंग मानेस्ट्री)

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अब मेरी मंजिल है कुशलनगर से कुर्ग क्षेत्र का  विशाल बौद्ध मंदिर जिसे लोग गोल्डेन टेंपल कहते हैं। वहां जाने के लिए आटो रिक्शा ले लिया है। शेयरिंग नहीं मिला तो 60 रुपये में आरक्षित रिक्शा लेना पड़ा।

कुशल नगर शहर से मैसूर रोड पर एक किलोमीटर आगे बढ़ने के बाद कावेरी नदी का पुल पार कर दाहिनी तरफ ग्रामीण अंचल में जा रहे रास्ते में तकरीबन 5 किलोमीटर चलने पर विशाल बौद्ध मंदिर में पहुंचा जा सकता है। कुशल नगर शहर से मंदिर की दूरी 6 किलोमीटर है। यह मंदिर अरलीकुमारी, बायलाकुप्पे ग्राम में पड़ता है। वास्तव में इसका नाम नामद्रोलिंग मानेस्ट्री है। मंदिर सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है।



नामद्रोलिंग मानेस्ट्री दक्षिण भारत में तिब्बती बौद्ध लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र है। यहां कई हजार बौद्ध भिक्षु विशाल परिसर में रहते हैं। मंदिर परिसर में सुनहली मूर्तियों और सुनहली पेंटिंग के कारण इसे गोल्डेन टेंपल के नाम से जाना जाने लगा है। इस मंदिर की स्थापना बौद्ध धर्म गुरु पेमा नोरबु रिनपोछे द्वारा 1963 में की गई थी। वह 1959 में तिब्बत से निर्वासित होकर भारत में आए थे।


 गौतम बुद्धगुरु पद्मसंभव और अमितायुस की मूर्तियां - 
कई एकड़ में फैले इस गोल्डेन टेंपल में परिसर में कई मंदिर हैं। मुख्य मंदिर में तीन मूर्तियां हैं। ये मूर्तियां गौतम बुद्ध, गुरु पद्मसंभव और अमितायुस की हैं। ये तीनों मूर्तियों में गौतम बुद्ध की मूर्ति 60 फीट ऊंची हैं। बाकी दोनों मूर्तियों की ऊंचाई 58 फीट है। इनका सौंदर्य देखते बनता है। मंदिर परिसर में एक साथ कई हजार बौद्ध भिक्षु बैठकर प्रार्थना करते हैं। मंदिर का परिसर अत्यंत हरा भरा है। 

मैं जब इस विशाल बौद्ध मठ में पहुंचा हूं विशेष पूजा जारी है। हजारों बौद्ध भिझु एक सुर में साधना में लगे हैं। बाहर बैठे लोग उन्हें साधना करते हुए देख रहे हैं। एक अदभुत आधात्मिक माहौल का सृजन हो रहा है। आधे घंटे में पूजा खत्म हो गई फिर लोगों को मंदिर की विशाल मूर्तियों को देखने का मौका मिला।

3500 बौद्ध भिक्षु निवास करते हैं - 
इस मठ में कुल 3500 बौद्ध भिक्षु निवास करते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु कुछ घंटे जरूर गुजारते हैं। मंदिर परिसर में एक कैंटीन हैं जहां आप तिब्बती व्यंजनों का स्वाद ले सकते हैं। कैंटीन में बैठकर मैंने चाय पी। कैसी चाय तिब्बती चाय विद बटर। यह 20 रुपये की चाय नमकीन स्वाद की है।


नामद्रोलिंग मानेस्ट्री में कुछ घंटे गुजारने के बाद मैं वापसी की राह पर पैदल ही चल पड़ा हूं। ग्रामीण सड़क इतनी मनोरम है और रास्ता इतना हरा भरा है कि पैदल ही चलने की इच्छा हुई। दोनो तरफ हरे भरे खेत। मैं कच्चा आम खाता हुआ पैदल सफर कर रहा हूं। रास्ते में कुछ स्कूली बच्चे मिले। उनसे उनकी पढ़ाई के बारे में पूछताछ की। सबको हिंदी आती है। 

करीब एक घंटे में 5 किलोमीटर पैदल चलकर मैं कुशल नगर पहुंच गया। कुशल नगर में कावेरी नदी के पुल पर मां कावेरी का मंदिर बना है। यहां नदी पर दो पुल हैं। एक नया दूसरा पुराना। पुराने पुल से पैदल पार करने के बाद मैं कुछ देर कुशल नगर के बाजार की सैर करने के बाद बस लेकर मडिकेरी की तरफ चल पड़ता हूं।

- vidyutp@gmail.com

( BYLAKUPPE BUDDHIST GOLDEN TEMPLE, NAMADROLING MONASTERY, KAVERI RIVER )



Wednesday, November 14, 2018

एक नदिया की धार सुहानी - कावेरी निःसर्ग धाम

मडिकेरी से कुशल नगर की राह पर हूं। हमारी प्राथमिकता में आज तीन स्थलों का दौरा करना है। पहला है दुबारे फारेस्ट। यहां जाने के लिए मैं कुशल नगर से पहले गुडेहोसुरु उतर जाता हूं। यहां से दाहिनी तरफ की सड़क दुबारे फारेस्ट जाती है। वहां पर एक परिवार भी दुबारे जाने वाली गाड़ी का इंतजार कर रहा है। उनसे पूछने पर पता चलता है कि दुबारे ज्यादा पानी आ जाने के कारण बंद है। तो मैं वहां जाने का इरादा बदल देता हूं। वैसे दुबारे में खास तौर पर लोग हाथियों की अटखेलियां देखने जाते हैं। तो ये नजारा भी फिर कभी सही।


अब गुडेहोसुरु से शेयरिंग आटो में बैठकर तीन किलोमीटर आगे कावेरी निःसर्ग धाम में उतर गया। यह स्थल कुशलनगर से ठीक पहले स्थित है। प्रवेश के लिए 10  रुपये का टिकट है। अंदर जाते ही कावेरी नदी पर बना लोहे का झूला पुल है। यहां कावेरी की चौड़ाई महज 30 फीट है। नदी का नजारा बड़ा ही मोहक है। यहां पर कावेरी की धारा बहुत मनोरम नजर आती है। नदी का जल पूरे वेग से आगे बढ़ रहा है। वही कावेरी जो पूरे कर्नाटक और तमिलनाडु की जीवन धारा है। वही कावेरी जिसके जल के बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु में तनातनी रहती है। उसका जल यहां कल कल निर्मल नजर आ रहा है। बल खाती कावेरी शायद ये कह रही है पानी में सबका हक है। मैं किसी खास के लिए नहीं।

कावेरी के पुल को पार करने के बाद कई एक फैला विशाल बागीचा है। इस बागीचा में कुर्ग की संस्कृति से जुड़ी कई तरह की झांकिया लगी हैं। वन में प्राकृतिक आबोहवा के बीच देर का विचरते रहना बड़ा अच्छा लग रहा है। यहां आप कई घंटे गुजार सकते हैं। कई जगह मचान बने हैं जहां उपर चढ़कर दूर तक नजारा किया जा सकता है। कई झूले भी लगे हैं। क्रॉस द वैली जैसे मनोरंजक गेम्स का भी इंतजाम है।

वापस लौटने पर यहां खाने पीने की कई दुकाने हैं।कपड़ो की दुकाने हैं और गिफ्ट शॉप भी हैं। आप चाहें जी भरकर शॉपिंग कर सकते हैं। यह परिवार के साथ आनंद के पल गुजराने वाली जगह है। निःसर्ग धाम से निकलकर कुशलनगर शहर में आ गया हूं। बीच चौराहे पर मंच सजा है और कुछ लोक कलाकार गा रहे हैं। मैं उनकी संगीत मंडली के करीब पहुंच कर थोड़ी देर संगीत का आनंद लेने लगता हूं। वे लोग बड़े प्रेम से मुझे अपने पास बिठाते हैं। कुछ गीत सुनने के बाद आगे बढ़ गया। दोपहर के खाने का वक्त हो गया तो आगे के सफर से पहले पेट पूजा। एक कन्नड रेस्टोरेंट में 50 रुपये की थाली है चावल की। थाली खाने के बाद आगे के सफर पर निकल पड़ा हूं।
     विद्युत प्रकाश मौर्य

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( KUSHALNAGAR, KAVERI RIVER, NISARG DHAM  )

Monday, November 12, 2018

जिन पर नाज है कुर्ग को... फील्ड मार्शल करिअप्पा, जनरल थिमैया

कर्नाटक का कुर्ग वीरों की धरती है। देश के लिए अपनी जीवन देने वाले बहादुरों की धरती है। हमेशा से बड़ी संख्या में कुर्ग से लोग फौज में गए हैं। इनमें से कई तो उच्च पदों तक पहुंच कर कुर्ग का नाम रोशन किया। इन वीरों की प्रतिमा मडिकेरी और कुशलनगर के चौराहों पर लगी है।

सबसे पहले नाम लें फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा का। कोडेंद्रा मडप्पा करिअप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को हुआ था। कुशल नगर के चौराहे पर उनकी प्रतिमा लगी है। उनके पिता मडिकेरी में राजस्व अधिकारी थे। उनकी स्कूली पढ़ाई मडिकेरी के सेंट्रल हाई स्कूल में हुई थी। 15 मई 1993 को  करिअपप्पा का इंतकाल 94 साल की उम्र में बेंगलुरु में हुआ। करिअप्पा 1919 में इंडियन आर्मी में आफिसर के तौर पर कमिशन हुए थे। करिअप्पा आजाद भारत के सेना के पहले प्रमुख थे। वे 15 जनवरी 1949 में भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ चुने गए। फील्ड मार्शल बनने वाले वे एकमात्र आर्मी चीफ रहे हैं। 

भारतीय सेना में सैम मानेक शॉ और करिअप्पा को ही फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई है। रिटायरमेंट के बाद 1953 से 1965 तक करिअप्पा आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के हाईकमिशनर भी रहे। अवकाश प्राप्ति के बाद फील्ड मार्शल करिअप्पा मडिकेरी में आकर रहने लगे। उनके बेटे केसी करिअप्पा भी सेना में भर्ती हुए थे और एयर मार्शल बने। 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने काफी बहादुरी दिखाई थी। अवकाश प्राप्ति के बाद वे भी मडिकेरी में ही रहते हैं। 2007 में एयर मार्शल केसी करिअप्पा ने अपने पिता की एक जीवनी भी लिखी है।

आइए बात करते हैं जनरल थिमैया का। मडिकेरी के ओंकारेश्वर मंदिर के बगल में बच्चों का बड़ा स्कूल है। उसका नाम जनरल थिमैया पब्लिक स्कूल है। जनरल केएस थिमैया यानी कोडन्डेरा सुबैया थिमैया 08 मई 1957 से 07 मई 1961 तक भारत के थल सेनाध्यक्ष थे। वे 1926 में सेना में भर्ती हुए थे। जनरल थिमैया की बहादुरी और उनकी प्रशासकीय सेवा क्षेत्र में दक्षता को देखते हुए उन्हें पद्म भूषण से 1954 में सम्मानित किया गया। वे कर्नाटक के कोडागू क्षेत्र के वीर सपूत थे। उनका जन्म 30 मार्च 1906 को मडिकेरी में हुआ था।


जनरल थिमैया कुर्ग के सम्मानित कॉफी की खेती करने वाले परिवार से आते थे। उनके मामा जी सीबी पोनप्पा भी भारतीय सेना में भर्ती होने वाले पहले बैच के अधिकारियों में शामिल थे। आठ साल की उम्र में जनरल थिमैया को सेंट जोसेफ कालेज कन्नूर में पढ़ने के लिए भेजा गया था। जनरल थिमैया भारतीय सेना से अवकाश प्राप्ति के बाद 1964 में यूनाइटेड नेशंस पीस किपिंग फोर्स में अपनी सेवाएं देने साइप्रस चले गए। 18 दिसंबर 1965 को साइप्रस में उनका निधन हो गया। मडिकेरी के एक चौराहे पर उनकी विशाल प्रतिमा लगी है। कुर्ग के लोग जनरल थिमैया और करिअप्पा पर गर्व करते हैं।


हम भूल न जाएं उनको - वीर सपूत मेजर मांगरिया मुथन्ना-
मडिकेरी के एक चौराहे पर वीर सपूत मेजर मांगरिया मुथन्ना की प्रतिमा लगी है। मेजर मांगरिया मुथन्ना का जन्म कुर्ग के चेट्टामणि गांव  में 21 अप्रैल 1964 को हुआ था। साल 1984 में सिख लाइट इन्फेंट्री में आफिसर बने।  12 जनवरी 2000 को जम्मू कश्मीर के खानबल में उग्रवादियों से लोहा लेते हुए वे बुरी तरह घायल हो गए। बाद में वे शहीद हो गए। भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र प्रदान किया।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
(MADIKERI, COORG, ARMY, AIR FORCE, CARIAPPA, GEN THIMAYYA ) 

Sunday, November 11, 2018

कुर्ग की होम मेड वाइन – और शाकाहारी भोजनालय


कुर्ग की प्रसिद्धि कॉफी के अलावा शराब के लिए भी है। जी हां होम मेड वाइन। ऐसी वाइन आपको यहां हर दुकान पर बिकती हुई मिल जाएगी। हालांकि मैं पीता नहीं इसलिए इसके बारे में आपको गहराई से नहीं बता सकता। पर दुकानों हमने अलग अलग तरह के फलों के नाम से बोतलें बिकती हुई देखीं। इन बोतलों की कीमत आमतौर पर 150 रुपये से लेकर 300 रुपये तक है। वाइल्ड चिली वाइन, ग्रेप वाइन,  पोमग्रेनेट वाइन, एप्पल वाइन, ग्वावा वाइन, पाइनएप्पल वाइन, गूज बेरी वाइन, कॉफी वाइन, पैसन फ्रूट वाइन जैसी किस्में मुझे यहां दुकानों पर डिस्प्ले में दिखाई देती हैं। 

जाहिर सी बात है इस तरह के शराब का उत्पादन यहां घर में किया जाता है। इनको बेचने के लिए कोई ब्रांडिंग या लाइसेंस प्रक्रिया की यहां जरूरत नहीं है। कुर्ग में यह गैरकानूनी भी नहीं है। क्योंकि हर दुकान पर यह खुलेआम बिकती है। तो इसके बारे में गहराई से प्रकाश तो वाइन के कद्रदां भी डाल सकेंगे।

कुर्ग में बड़ी संख्या में गुजराती और महाराष्ट्र के सैलानी परिवार के साथ घूमने आते हैं। इसलिए यहां पर कई शाकाहारी भोजनालय हैं। यहां पर आपको कर्नाटका थाली के अलावा गुजराती और महाराष्ट्रियन स्टाइल की थाली भी खाने को मिल जाएगी। मतलब यहां शाकाहारियों को कोई परेशानी नहीं है।

मैंने कुर्ग की हर शाम को अलग अलग शाकाहारी रेस्टोरेंट में खाने की थाली का स्वाद लिया। ज्यादातर रेस्टोरेंट बस स्टैंड के आसपास ही हैं। पहली रात का खाना उडुपी होटल में। शाकाहारी थाली 70 रुपये की है। थाली में चपाती, चावल, चार तरह की सब्जियां, दाल , दही, पापड़ आदि है। खाना अच्छा है। इस होटल में कुछ गुजराती लोग आए हुए हैं जो जैन फूड की तलाश कर रहे हैं। उन्हें बिना लहसुन प्याज वाला खाना चाहिए। उन्हें ऐसा भोजन यहां मिलने में दिक्कत आती है। फिर वे होटल के रसोइये से बात करके अपने लिए अलग से कुछ तैयार करवाते हैं। हालांकि उनको पूरी संतुष्टि नहीं मिल पाती है। फिर वे किसी और रेस्टोरेंट का रुख करते हैं।

अगले दिन पहुंचा हूं मैं अंबिका उपहार उडुपी होटल में। ये भी शाकाहारी मीनू वाला होटल है। इसका डायनिंग हॉल बड़ा है। सेवाएं अच्छी है। एक दोपहर में कुशल नगर में खाने का मौका मिला। एक औसत रेस्टोरेंट में50 रुपये की थाली है। भरपेट खाना 50 रुपये में। पर इस थाली में चावल है, चपाती नहीं है।

अगर आप मांसाहारी हैं तो यहां के रेस्टोरेंट में फिश करी और राइस का मजा लें। यह मेंगलोर स्टाइल में बनता है। इस तरह के कई रेस्टोरेंट कुशलनगर के आसपास हैं। कुर्ग में भी आप कई तरह के मांसाहारी व्यंजनों का स्वाद यहां के रेस्टोरेंट में ले सकते हैं। अगर आप कुर्ग की स्थानीय थाली का स्वाद लेना चाहते हैं तो यहां पर ऐसे भी रेस्टोरेंट मौजूद हैं।

कुर्ग में फल भी ज्यादा महंगे नहीं है। मुझे यहां अच्छे केले सस्ते भाव में मिल गए। भुट्टा और कच्चा आम भी इधर खूब मिलता है। यहां आप कई किस्म के होम मेड चाकलेट का भी मजा ले सकते हैं। चाहें तो चाकलेट खरीदकर ले भी जा सकते हैं। तो अब आगे चलें।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
(COORG, MADIKERI, FOOD, HOME MADE WINE  ) 

Friday, November 9, 2018

मॉनसून इन मडिकेरी - राजा सीट - यहां से राजा सूरज को देखता था

मडिकेरी में पहुंचते ही बारिश ने हमारा स्वागत किया था। हमारे होटल वाले ने पूछा था तुम बारिश में मडिकेरी आया है... मैंने कहा हां, मानसून को करीब से महसूस करने आया हूं। आखिर हम तो यहां घूमने आएं तो बारिश से परेशान क्यों होना। 12 जून को यहां आया सावन झूम के तर्ज पर बारिश हो रही है। हमारे पास नीले रंग का विंडचिटर है। मैंने बस स्टैंड के पास की एक दुकान से उसी रंग का मैच करता हू पायजामा खरीद लिया। अब बिना छाता के बारिश से बचने के लिए तैयारी हो गई। वैसे हमारे तीन दिन के मडिकेरी प्रवास में खूब बारिश हुई। 


रात में तो कभी कभी कभी इतनी तेज बादलों के गरजने की आवाज आती थी कि बार बार नींद टूट जाए। पर यहां मौला मेहरबान है। गरज बरस कर खूब पानी दे रहे हैं। कई बार तो मूसलाधार बारिश में दुकान में या कहीं बरामदे में ओट लेकर खड़ा होना पड़ा। पर इस मानसून में कुर्ग का सौंदर्य और निखर आया है। वैसे कुर्ग में हर साल जून से सितंबर-अक्तूबर तक खूब बारिश होती है। साल 2018 में दुखद ये रहा है कि सितंबर महीने में हुई कई दिनों तक लगातार हुई जोरदार बारिश ने कुर्ग को तबाह कर दिया।

मडिकेरी की सबसे लोकप्रिय लोकेशन है राजा सीट। अपने होटल फोर्ट व्यू से राजा सीट का रास्ता पूछता हुआ पैदल ही चल पड़ा हूं। हल्की हल्की बारिश के रिमझिम में आगे बढ़ रहा हूं। एक जगह साइन बोर्ड देखकर पता चलता है कि कुर्ग में क्लब महिंद्रा का रिजार्ट भी है। मैं राजा सीट पहुंच गया हूं। दोपहर मे ठंडा-ठंडा मौसम है। एक सुंदर सा पार्क और उसके कोने में व्यू प्वाइंट। पार्क में प्रवेश के लिए 10 रुपये का टिकट है। राजा सीट इसलिए कहते हैं कि कभी कोडागू का राजा यहीं से बैठकर नजारे देखता था। वह अपनी रानियों के साथ सूरज को देखा करता था। सूरज की सुनहरी किरणें यहां से काफी मनभावन लगती हैं।

अब यह जगह हर आम और खास के लिए खुली है। यहां पर हमारी मुलाकात पटना के डॉक्टर परिवार से हुई। हवा कुंआरी है। मौसम जवां है। रंग बिरंगे लोग राजा सीट पर विभिन्न भाव भंगिमाओं में तस्वीरें खिंचवा रहे हैं।    

राजा सीट के पास पार्क में एक खिलौना ट्रेन भी चलती है। इसका ट्रैक ज्यादा लंबा नहीं है। पर मुझे छोटी छोटी रेल गाड़ियों से इतना प्रेम है कि इस ट्रेन पर बैठकर सफर करने का लोभ मैं छोड़ नहीं सका। आधे किलोमीटर का यादगार सफर है। आसपास मे खाने पीने की भी कुछ दुकाने हैं। राजा सीट घूमने के बाद पैदल ही चलता हुआ मडिकेरी मुख्य बाजार तक पहुंच गया।

हिंदू राजाओं ने बनवाई अपनी समाधि – (राजा टॉम्ब ) – मडिकेरी शहर के बाहरी इलाके में राजा की समाधि टॉम्ब स्थित है। कोडागू के राजा हिंदू थे, पर उन्होने अपनी समाधि बनवाई। यह अपने आप में अनूठी बात है क्योंकि देश में ज्यादातर मकबरे मुस्लिम राजाओं के मिलते हैं।

ये समाधियां इंडो इस्लामिक वास्तुकला का नमूना है। हरे भरे परिसर में तीन इमारते हैं। इन इमारतों में कोडागू के राजा की समाधियां बनी हैं। भवन निर्माण की शैली इस्लामिक है। पर इसमें नदीं की भी स्थापना की गई है। वहीं अंदर शिव की अराधना भी की जाती है। केंद्र में स्थित बड़ी समाधि कुर्ग के राजा दोदावीरराजा राजेंद्र और उनकी महारानी महादेवीअम्मा की है। दूसरी समाधि का निर्माण राजाचिक्कवीर राजेंद्र ने अपने पिता लिंगाराजेंद्र के लिए 1820 में कराया था। तीसरी समाधि वीर राजेंद्र गुरू की है जो 1834 की बनी हुई है। इसे स्थानीय लोग गादिगे भी कहते हैं।
-        Write me – vidyut@daanapaani.net
(GADDIGE, RAJA TOMB, RAJA SEAT, MADIKERI )

 ..... आगे पढ़िए - कुर्ग की होम मेड वाइन ....

Wednesday, November 7, 2018

मडिकेरी अब्बे फॉल्स - रुमानियत का संगीत

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मडिकेरी में सुबह सुबह मेरे मोबाइल के साथ कुछ परेशानी को दूर कराने की सोची। मोबाइल में खींची गई तस्वीरें इसकी मेमोरी कार्ड में नहीं सेव हो रही हैं। ये दिक्कत तो नागार्जुन सागर के दौरे वाले दिन से ही आ रही है। तस्वीरें फोन के मेमोरी में सेव हो रही थीं। वह मेमोरी भी अब भर गई है। तो क्या करूं। आगे की तस्वीरें कहां सेव करूं। तुरंत निदान जरूरी है। आखिर दिक्कत फोन में है या मेमोरी कार्ड में। 

मैं एक स्थानीय दुकानदार के पास गया। नई मेमोरी कार्ड की कीमत पूछी। मडिकेरी के बाजार मे अधिकतम 32 जीबी का ही मेमोरी कार्ड मिल रहा है। वह भी दिल्ली से महंगा। दुकानदार को अपनी समस्या बताई। उसने कहा,  पहले आपके मोबाइल में मैं एक मेमोरी कार्ड डालकर देखता हूं। अगर सपोर्ट करे तभी आप नया खरीदना। दूसरी मेमोरी कार्ड को मोबाइल ने रीड कर लिया। मतलब खराबी मेरी मेमोरी कार्ड में ही थी। मैंने नया 32 जीबी का मेमोरी कार्ड ले लिया। अब जाकर मेरी समस्या दूर हुई। 

अब मैं अब्बे फाल्स जाना चाहता हूं। यह मडिकेरी शहर से 9 किलोमीटर दूर है। जाने का एकमात्र तरीका है कि आप यहां के लिए आटो या टैक्सी रिजर्व करके जाएं। सुना है बड़ा सुंदर झरना है। मोबाइल वाले दुकानदार साथी की मदद से वहां जाने के लिए आटो बुक किया। आटो वाले ने शहर से आने जाने का 300 रुपये मांगा। यह वाजिब ही है। आटो वाले का नाम संतोष है। (मोबाइल नं – 9741627290 ) अब हम चले पड़े हैं अब्बे फल्स की ओर। रास्ते में कुछ होम स्टे दिखाई दे रहे हैं। मतलब मडिकेरी के आसपास हर तरफ होम स्टे बने हैं। 


अब्बे फाल्स से पहले पार्किंग है। यहां से 400 मीटर की पदयात्रा करनी पड़ती है जंगलों के बीच से। इसके बाद बने प्लेटफार्म से झरना दिखाई देता है। दो विशाल झरने इनसे बहुत ही तीव्र गति से 70 फीट की ऊंचाई से पानी गिर रहा है। इस झरने में सालों भर पानी आता है। पर मानसून के दिनों में यहां का सौंदर्य निखर जाता है। मैं झरने का संगीत सुनने की कोशिश करता हूं। अत्यंत रुमानी संगीत। अनवरत चल रहा है... जो रुह को सुकुन पहुंचाता है। यहां आप घंटों गुजार सकते हैं।

पर इस झरने के आप करीब नहीं जा सकते। नहा नहीं सकते। करीब जाना खतरनाक है। तो दूर से ही पर्वतों से गिरते पानी का नजारा करें। आजकल खूब बारिश हो रही है तो झरने की रफ्तार भी तेज है। ये पानी आगे कावेरी नदी में जाकर मिल जाता है। अब्बे फाल्स के आसपास कॉफी के सुंदर बाग हैं। अब्बे फाल्स सुबह 9 से 5 बजे तक खुला रहता है। प्रवेश टिकट 15 रुपये है।


कावेरी नदी का उदगम स्थल -  मडिकेरी से कोई 48 किलोमीटर दूर कावेरी थल कावेरी स्थित है। यहां से कावेरी नदी का उदगम माना जाता है। यहीं ब्रह्म गिरी पर्वत से कावेरी नदी की धारा निकलती है। यह स्थल केरल के कासरगोड जिले से भी निकट है। यहां एक कुंड बनाया गया है जिसमें श्रद्धालु गण स्नान भी करते हैं। कोडागू के लोगों में इस स्थल को लेकर असीम श्रद्धा है। थल कावेरी तक बस या निजी वाहन से जाया जा सकता है। पर आजकल वहां पानी बढ़ गया है इसलिए रास्ता बंद है। तो हम कावेरी थल कावेरी नहीं जा सके। फिर कभी सही। अक्तूबर महीने में तल कावेरी में विशाल मेला लगता है। तल कावेरी की दूरी केरल के पांथुर (कासरगोड जिला) शहर से 36 किलोमीटर है। कोडागू जिले के भागमंडला से तल कावेरी 8 किलोमीटर है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(ABBE FALLS , MADIKERI, KARNATKA, RIVER KAVERI ) 
आगे पढ़िए:  मॉनसून इन मडिकेरी और राजा सीट


Monday, November 5, 2018

कुर्ग मतलब कॉफी और क्या...

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क्या आपको पता है देश में कुल कॉफी के उत्पादन का 40 फीसदी हिस्सा कुर्ग में होता है।  इसलिए कुर्ग और कॉफी एक दूसरे के पर्याय हैं। मडिकेरी शहर के 30 किलोमीटर पहले से कॉफी के बाग दिखाई देने लगते हैं। जानी मानी कॉफी निर्माता कंपनियां नेस्ले, ब्रू और टाटा सभी कुर्ग से कॉफी प्राप्त करती हैं।
कुर्ग में कॉफी के हरे भरे पौधों को देखकर दिल खुश हो जाता है। कॉफी के फूल को अत्यंत ही खूबसूरत होते हैं। इनके साथ वक्त गुजारना रुमानी अनुभूति है। तमाम होम स्टे कुर्ग में कॉफी बगानों के बीच बने हैं। वहीं कुर्ग आने वाले बड़ी संख्या में सैलानी कॉफी के बाग देखने के लिए जाते हैं।

कॉफी की खेती के लिए कुर्ग का मौसम बेहतरीन है। कर्नाटक में कुर्ग के अलावा कॉफी की खेती चिकमंगलूर जिले में होती है। कुर्ग से लगे केरल के कई हिस्सों में भी कॉफी उगाई जाती है। देश के कुल कॉफी उत्पादन का 53 फीसदी कर्नाटक में होता है तो 28 फीसदी केरल में।  

कहा जाता है कि 17वीं सदी में बाबा बुढन यमन से भारत में कॉफी लेकर आए थे। 1854 में एक अंग्रेज जॉन फावलेर ने कुर्ग क्षेत्र में पहले कॉफी स्टेट का निर्माण किया। इसके बाद तो कॉफी लोग इस क्षेत्र में कॉफी उगाने लगे। कुर्ग में कुल 270 तरह के पेड़ पौधे हैं, उनके बीच सालों भर सदाबहार मौसम में यहां बेहतरीन किस्म की कॉफी का उत्पादन होता है। अब पूरे कर्नाटक में सालाना 1.40 लाख टन कॉफी का उत्पादन होता है। कुर्ग को कॉफी कप ऑफ इंडिया भी कहते हैं। यहां अरेबिका और रुबुस्टा कॉफी का उत्पादन होता है।


कॉफी का निर्माण – आपके कप तक पहुंचने से पहले कॉफी की प्रोसेसिंग होती है। पौधे से कॉफी हमें बिन्स के तौर पर मिलता है। इन्हें दो तरीके से प्रोसेस किया जाता है। एक ड्राई तरीका है तो दूसरा वेट। इसके बाद इसे ग्राइंडिंग मशीन में पीसा जाता है। गुणवत्ता के लिहाज से कॉफी कई प्रकार की होती है। प्योर कॉफी में कुछ नहीं मिलाया जाता। जबकि सस्ती कॉफी में चिकोरी मिलाया जाता है। कुर्ग में प्योर कॉफी 500 रुपये किलो मिल जाती है। पर बाहर जाकर इसका भाव कई गुना हो जाता है।  


कॉफी की दुकानें – पूरे मडिकेरी शहर के हर कोने  में कॉफी के छोटे बड़े कई शो रुम हैं। कई जगह आप यहां कॉफी ग्राइंडिंग मशीन में पीसते हुए भी देख सकते हैं। मडिकेरी बस स्टैंड के ठीक सामने हमारी मुलाकात वी  श्रीधर से होती है। वे एक कॉफी शॉप चलाते हैं। उनके पास ग्राइंडिंग मशीनें लगी हैं। वे बताते हैं कि मैं देश के किसी भी कोने में कॉफी आपको कूरियर से भी भेज सकता हूं। पहले ऑर्डर को कोई कूरियर चार्ज नहीं दूसरे आर्डर से कूरियर चार्ज देना होगा।

फिल्टर कॉफी का आनंद – श्रीधर मुझे फिल्टर कॉफी बनाने के तरीके से अवगत कराते हैं। वे बताते हैं कि कॉफी पीना सेहत के लिए गुणकारी है। पर आपको इंस्टेट कॉफी नहीं पीना चाहिए। इसमें डस्ट की मात्रा होती है। कहा जाता है कि सबसे बेहतर है फिल्टर कॉफी का सेवन करना। यह आपको तरोताजा रखता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(COORG, COFFEE, KARNATKA  ) 

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