Thursday, June 20, 2019

गुजरात में पंजाबी स्वाद और जगदीश फरसाण


बात वडोदरा शहर के खाने पीने की। सयाजीगंज में अपने प्रूडेंट होटल के पास हमने एक सुंदर रेस्टोरेंट देखा। टेस्ट ऑफ पंजाब। क्या गुजरात में पंजाब जी हां। सही है। जैसे जसबीर जस्सी का गाना आया था दिल ले गई कुड़ी गुजरात दी...तो गुजरात में पंजाबी खाने का रेस्टोरेंट क्यों नहीं हो सकता। 

टेस्ट ऑफ पंजाब का डेकोरेशन बड़ा सुंदर है। इसे पंजाब के ग्राम्य परिवेश वाला लुक देने की पूरी कोशिश की गई है। बाहर एक विशाल ट्रक की पेंटिंग लगी है। अंदर की दीवारें भंगड़ा और गिद्दा के नृत्य से गुलजार हैं। कहीं खाट लगा है तो कहीं मचिया। खाने पीने के बरतन परंपरागत है। दीवारों  पर मिट्टी का लेप लगा है। तो यहां बैठना भी आनंद दायक है। और खाने पीने का स्वाद भी मजेदार। इन सबके बाद खाने पीने की दरें भी किसी समान्य रेस्टोरेंट जैसी ही हों तो खाने का आनंद और भी बढ़ जाता है। रेस्टोरेंट बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के मिनिरल वाटर भी पेश करता है।

इससे पहले की वडोदरा यात्रा में हमने स्टेशन के पास इंदिरा भवन और गायत्री भवन में खाने का मजा लिया था। इस बार भी हम उन रेस्टोरेंट में गए। वे रेलवे स्टेशन के सामने ही हैं।

 न्याय मंदिर के आसपास हमने स्थानीय गुजराती व्यंजनों का आनंद लिया। यहां पर होटल लारीलप्पा में भी पंजाबी थाली ही मिलती है। मतलब वडोदरा में आप पंजाबी थाली कई जगह आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

अरबी के पत्ते का पकौड़ा - जैसा घर में अरबी के पत्ते का सब्जी हम बिहार में बनाते हैं, वैसी सब्जी हमें वडोदरा के एमजी रोड के बाजार में बिकती हुई दिखाई दी। दुकानदार ने हमें टेस्ट करने का भी आफर दिया। हमने पहले की यात्रा में दाबेली खूब खाई पर इस बार सेव को मसाले के साथ मिलाकर अलग तरह के चाट का आनंद भी लेने का मौका मिला। वडोदरा रेलवे स्टेशन के आसपास आप कई तरह के खाने पीने का स्वाद ले सकते हैं।  

बड़ौदा शहर और जगदीश फरसाण - जगदीश फरसाण की बात करें। जगदीश फरसाण वडोदरा की प्रसिद्ध नमकीन वाली दुकान है। पूरे वडोदरा शहर में उनकी कई दुकाने हैं। इनमें से कई तो रेलवे स्टेशन के आसपास ही हैं। यहां पर किस्म किस्म के लड्डू भी बिकते हुए दिखाई दिए। वे तमाम तरह के नमकीन और भाखरवाडी का निर्माण करते हैं। उनके उत्पाद उनके नाम पर बिकते हैं। खट्टा मीठा, सोलापुरी मिक्स, मद्रासी मिक्स सब कुछ। जो आप मांगे मिल जाएगा। जगदीश फरसाण सिर्फ वडोदरा ही नहीं सूरत, भरूच, आनंद समेत गुजरात के तमाम शहरों में हैं। अब उनका ऑनलाइन कारोबार भी शुरू हो चुका है। (http://jagdishfarshan.com/) जगदीश फरसाण का कारोबार 1938 में आरंभ हुआ। इसके संस्थापक राजा रतनलाल केशवलाल कानदोई थे। बड़ौदा में एक छोटी सी जगह से शुरू हुआ उनका कारोबार अब बड़ा रुप ले चुका है। गुजराती में फरसाण नमकीन या स्नैक्स को संदर्भित करता है।

फरसाण गुजराती व्यंजनोंराजस्थानी व्यंजनों और सिंधी व्यंजनों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन्हें विशेष अवसरों पर और मेहमानों के स्वाद के लिए तैयार किया जाता है। इसका आप चाय के साथ भी आनंद ले सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि फरसाण सिंधी का शब्द है। यह फारस से बना लगता है। तो कभी वडोदरा आएं तो खरीदें नमकीन चिवडा और भाखरवाड़ी।अभी बस इतना ही। पढ़ते रहिए दानापानी,  आगे चलेंगे अहमदाबाद. 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
( JAGDISH FARSAN, VADODARA ) 

Tuesday, June 18, 2019

वडोदरा का न्याय मंदिर और बाजार


दिन भर महल घूमने के बाद शाम को हमलोग एक बार फिर घूमने के लिए तैयार हैं। पर अनादि तैयार नहीं हैं। वे होटल में ही आराम फरमाना चाहते हैं। तो मैं और माधवी निकल पड़ते हैं  वडोदरा के बाजार में घूमने के लिए । स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां का मुख्य बाजार न्याय मंदिर के आसपास है। हमलोग शेयर्ड आटो से न्यायमंदिर पहुंच जाते हैं। ये न्याय मंदिर क्या है। दरअसल न्याय मंदिर का मतलब वडोदरा की अदालत। यह विशाल और खूबसूरत इमारत है जो रात की रोशनी में दमक रही है।

न्याय मंदिर के पास ही विशाल झील है। इस झील का  नाम सुरसागर झील है। इस झील के अंदर नीलकंठ महादेव यानी शिव की विशाल प्रतिमा लगी है। यह बाजार के लिहाज से वडोदरा का दिल है। इसके पास ही प्रताप टाकीज है जो वडोदरा का प्रमुख पुराना सिनेमा घर है। हालांकि प्रताप सिनेमा का मल्टीप्लेक्स के दौर में वो गौरव नहीं रहा। पर कभी यह शहर का लोकप्रिय सिनेमाघर हुआ करता था।

इसके आसपास पद्मावती कांप्लेक्स और एमजी रोड का इलाका है। इन बाजारों खूब भीड़ है। पद्मावती कांप्लेक्स के पास एक खाने पीने वाले होटल से टकराया वे लोगों को रोक रोक कर अपने यहां खाने के लिए बुला रहे थे। हमने यहां पर खाना तो नहीं खाया पर इस होटल का नाम दिलचस्प था। नाम था होटल लारीलप्पा।  

हाथी दांत के बने सामान – हमलोग एमजी रोड पर चलते हुए हीरा लाल रतीलाल खंबात वाला की दुकान पर जा पहुंचे हैं। छोटी सी दुकान पर इसको एक ही परिवार के चार सदस्य मिलकर चला रहे हैं। इसके साइन बोर्ड पर लिखा है कि हाथी दांत के बने समान। हालांकि वे और भी कई तरह की आर्टिफिशियल जूलरी बेचते हैं। पर जहां तक मैं जानता हूं कि देश में हाथी दांत के बने सामान की बिक्री अब प्रतिबंधित है। पर वे बताते हैं कि अभी भी गांव के लोगों के पास हाथी दांत के बने सामान हैं। वे लेकर आते हैं तो हम उन्हें खरीद लेते हैं। फिर उस पुरानी जूलरी से नई जूलरी बनाकर बेचते हैं। पूरा परिवार कई तरह की जूलरी बनाने में निष्णात है। कमाल है। आपको गुजरातियों की व्यापारिक बुद्धि और उनकी व्यवहार कुशलता का कायल तो होना ही पड़ेगा।  

झूलेलाल का मंदिर – न्याय मंदिर के आसपास घूमते हुए हमें झूलेलाल साहेब का मंदिर नजर आता है। मतलब है कि यहां सिंधी समाज के लोग भी बड़ी संख्या में हैं। इसलिए उनका भी मंदिर है।
खादी मेले में दिखाई दे गया तेल निकालने वाला कोल्हू। 

गुजरात और खादी की बात - कीर्ति स्तंभ के पास ही खादी और ग्रामोद्योग की प्रदर्शनी लगी हुई है। यहां पर गुजरात के हर जिले से शिल्पी और खादी  ग्रामोद्योग से जुड़े उत्पाद आए हुए हैं। यहां पर मैंने बिजली से चलने वाला कोल्हू भी देखा। यहां पर सारे स्टाल का मुआयना करने के बाद मैंने खादी के रुमाल समेत ग्रामोद्योग के कुछ उत्पादों की खरीददारी भी की।  प्रदर्शनी में कई तरह की देसी दवाएं भी मिल रही हैं। एक घंटे तक प्रदर्शनी का मुआयना करने के बाद हम आगे के लिए निकल पडे। चलते चलते बड़ौदा बस स्टैंड के अंदर बने मॉल की दुकानों में भी हमने फुटकर शॉपिंग कर डाली।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( NAYAY MANDIR, VADODRA PRATAP TALKEES ) 

Sunday, June 16, 2019

फतेह सिंह संग्रहालय – दुनिया को चित्रों में देखें , महसूस करें


लक्ष्मी विलास पैलेस घूम लेने के बाद हमारी अगली मंजिल है महाराजा फतेह सिंह संग्रहालय। इसका टिकट हमने पहले से ही ले रखा है। दोनों संग्रहालय का टिकट साथ लेने पर थोड़ा सा डिस्काउंट मिल जाता है। महल से फतेह सिंह संग्रहालय जाने के लिए तकरीबन आधा किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। इस रास्ते में खूब हरियाली है। ताड़ के पेड़ हैं। मोर नृत्य करते हुए दिखाई दे रहे हैं। रास्ते में बड़ोदा जिमखाना क्लब और बड़ौदा गोल्फ क्लब दिखाई दे जाते हैं। 



बागनवेलिया के गुलाबी फूलों और बेहद सुंदर पीले फूलों के रास्ते से हम आगे बढ़ रहे हैं। बड़ौदा रियासत अपने संपदा का व्यसायिक इस्तेमाल खूब कर रहा है। महल के परिसर में मैरेज लॉन बना दिया गया है। इसकी शादी विवाह के लिए बुकिंग होती है। परिसर में एक बच्चों का स्कूल भी है। इसमें शहर के संभ्रांत परिवारों के बच्चे पढ़ने आते हैं। पर चलिए संग्रहालय में प्रवेश से पहले हम एक अनूठी चीज पर नजर डालते हैं। वो है रेलवे विरासत से जुड़ी हुई...


दुनिया का सबसे छोटा स्टीम लोकोमोटिव
पर फतेह सिंह संग्रहालय में प्रवेश से पहले थोड़ी चर्चा एक अनूठी रेलगाड़ी के बारे में। हमारी नजरों के सामने द फ्लाइंग स्काट्समैन नामक नन्ही सी स्टीम इंजन है। बात सन 1941 की है महाराजा प्रताप सिंह अपने बच्चों के लिए एक तोहफा लेकर आए । यह लंदन मेंचलने वाली ट्रेन द फ्लाइंग स्कॉट्समैन का छोटा रूप था। यह राजकुमारों को महल में घुमाया करता था। इसके लिए लक्ष्मी विलास महल में तीन किलोमीटर का ट्रैक बिछाया गया था। इस मिनिएचर ट्रेन का सफर महल से प्रिंसेज स्कूल तक चलता था।

 अब उस प्रिंसेज स्कूल को ही महाराजा फतेह सिंह म्युजियम बना दिया गया है। महल तक लौटने से पहले इस ट्रेन का मार्ग महल के बागीचे से होकर गुजरता था। इस ट्रेन में कुल तीन डिब्बे हुआ करते थे। इसमें कुल 30 बच्चे बैठ सकते थे।  सन 1941 में महाराजा रंजीत सिंह गायकवाड के तीसरे जन्मदिन पर इस ट्रेन ने अपना पहला सफर किया था। इस ट्रेन का निर्माण 1936 में एसबी एंड सीआर नामक कंपनी ने किया था। यह मूल रूप से हार्वेस्टर लोकोमोटिव का प्रोटोटाइप था। 

ऐसे इंजनों का संचालन लंदन और नार्थ इस्टर्न रेलवे में हुआ करता था। मूल हार्वेस्टर लोकोमोटिव ब्रिटेन के प्रसिद्ध फ्लाइंग स्काट्समैन ट्रेन को खिंचता था। सन 1940 के आसपास ब्रिटेन में फ्लाइंग स्काट्समैन काफी लोकप्रिय ट्रेन हुआ करती थी। यह ट्रेन लंदन से इडिनबर्ग के बीच चलती थी। तो उसके नाम पर ही इस प्रोटोटाईप खिलौना गाड़ी को यह नाम दिया गया।   

पर 1956 में इस ट्रेन के बड़ौदा के आम बच्चों के लिए दे दिया गया। इसकी ट्रैक को महल से हटाकर सयाजीबाग में बिछाया गया। इसका संचालन वजोदरा महानगर सेवा सदन करने लगा। यह 1993 तक सयाजीबाग में बच्चों का मनोरंजन करता रहा। पर 1993 में इसके लोकोमोटिव का बायलर खराब हो गया। तब 2001 में इसके मूल इंजन को फिर से महल में लाकर संरक्षित करके रख दिया गया। तो महाराजा फतेह सिंह संग्रहालय के पास आने वाले लोग दुनिया के लघुतम स्टीम इंजन का दीदार कर सकते हैं।

तो अब चलते हैं संग्रहालय के अंदर। महाराजा फतेह सिंह संग्रहालय का भवन दो मंजिला है। खास तौर पर संग्रहालय के अंदर बेशकीमती पेंटिंग का संग्रह है। फतेह सिंह संग्रहालय में राजा रवि वर्मा के अलावा कुछ विदेशी कलाकारों की प्रसिद्ध पेंटिंग का भी संग्रह है। 
अदभुत 3डी पेंटिंग - 
इसमें इटालियन पेंटर ए फीलीसी की चित्रकला देखी जा सकती है। यहां पर आप एक 3डी पेंटिंग भी देख सकते हैं। यह दो अलग अलग सिरों से देखने पर अलग अलग दिखाई देती है। यह बड़े अचरज की बात है कि जिस जमाने में 3डी के बारे में हम नहीं जानते थे, तब कलाकार ने इस तरह की पेंटिंग कैसे बनाई होगी। 

न्यूड मूर्तियों और चित्रकला का विशाल संग्रह - 
इस संग्रहालय में न्यूड मूर्तियों का संग्रह भी बड़ी संख्या में है। पर उनकी कलात्मकता ऐसी है कि वे उत्तेजक नहीं प्रतीत होतीं। यहां आप दुनिया के प्रमुख शहरों को पेटिंग में देख सकते हैं। इसमें स्वीटजरलैंड की झील, समंदर की लहरें आदि को पेटिंग में दिखाया गया है। दुनिया के सुंदरतम शहरों में शुमार वेनिस को पेंटिंग में देख सकते हैं। संग्रहालय के अंदर फोटोग्राफी बिल्कुल निषिद्ध है। पर ये संग्रहालय देश के कला प्रेमियों के लिए मक्का है। मूर्ति और चित्रकला के छात्र यहां अध्ययन के लिए पहुंचते हैं।  

-       विद्युत प्रकाश मौर्य   
( MAHARAJ FATEH SINGH, NUDE PAINTINGS  ) 

Friday, June 14, 2019

महान चित्रकार राजा रवि वर्मा और बड़ौदा रियासत

राजा रवि वर्मा की राधा माधव पेंटिंग 
वडोदरा रियासत का कला और संगीत से काफी गहरा संबंध हैं। देश के महान पेंटर राजा रवि वर्मा और वडोदरा का गहरा नाता रहा है। लक्ष्मी विलास पैलेस के दरबार हॉल में राजा रवि वर्मा द्वारा बनाए गए कई बेशकीमती चित्र लगे हुए हैं। इन चित्रों को बनाने के लिए राजा रवि वर्मा ने पूरे देश की यात्रा की थी।

केरल में 29 अप्रैल 1848 को जन्मे देश के महान चित्रकार राजा रवि वर्मा तकरीबन दस साल तक बड़ौदा रियासत में रहे। वडोदरा के महाराजा उनकी चित्रकला के बड़े कद्रदान थे। महाराजा सयाजीराव गायकवाड तृतीय ने राजा रवि वर्मा को शाही परिवार के लिए पेंटिंग बनाने के लिए अधिकृत किया था।

राजा रवि वर्मा की शकुंतला 
कला के पारखी उनके बनाए बड़ौदा के महाराज और महारानी के पोर्ट्रेट को लाजवाब मानते हैं। राजा रवि वर्मा ने दमयंती-हंसा संभाषण, संगीत सभा, अर्जुन और सुभद्रा, विरह व्याकुल युवती, शकुंतला, रावण द्वारा जटायु वध, इंद्रजीत-विजय, नायर जाति की स्त्री, द्रौपदी कीचक, राजा शांतनु और मत्स्यगंधा, शकुंतला और राजा दुष्यंत के चित्र बनाए जो उनकी प्रसिद्ध कृतियां मानी जाती हैं। राजा रविववर्मा ने बड़ौदा रियासत के लिए बनाए गे कई चित्रों को महाराजा से अनुमति लेकर अपने लिथोग्राफी प्रेस से प्रकाशित कर बिक्री के लिए बाजार में भी पेश किया। राजा रवि वर्मा ने 1894 में मुंबई मंक रंगीन लिथोग्राफी प्रेस लगाई थी।
राजा रवि वर्मा की उर्वसी 

राजा रवि वर्मा की देश भर में प्रसिद्धि उनके द्वारा बनाए गए हिंदू देवी देवताओं के चित्रों के कारण है। पर वे प्राकृतिक पोट्रेट और न्यूड पेंटिंग बनाने के लिए भी जाने जाते हैं। 

राजा रवि वर्मा का जीवन काफी उतार चढ़ाव भरा रहा था। पर सयाजीराव गायकवाड ने समय समय पर राजा रवि वर्मा की काफी मदद की। राजा रवि वर्मा का निधन 2 अक्तूबर 1906 को हो गया था। उनके जीवन पर केतन मेहता ने शानदार फिल्म बनाई। फिल्म का नाम है रंगरसिया। मौका मिले तो आप ये फिल्म जरूर देखें।

आपको पता है पहली हिंदी फिल्म बनाने वाले दादा साहेब फाल्के कभी राजा रवि वर्मा के यहां नौकरी करते थे। राजा रवि वर्मा ने फाल्के साहब को काफी प्रोत्साहित किया था।

एक बार फिर चलते हैं महल में ...लक्ष्मी विलास पैलेस के दरबार हॉल में रवि वर्मा द्वारा बनाई गई सरस्वती, लक्ष्मी की सुंदर विशाल चित्र लगे हैं। यहां पर महाभारत के आख्यान कीचक और द्रौपदी का सुंदर चित्र भी देखा जा सकता है। इसके अलावा रामायण के प्रसंग सीता भूमि प्रवेश का सुंदर चित्र भी देखा जा सकता है।


लक्ष्मी विलास पैलेस के दरबार हाल में सयाजीराव गायकवाड के असली पिता काशीनाथ गायकवाड की मूर्ति भी लगी हुई है। यहां पर आप सैकड़ो तरह की पगड़ियों का भी संग्रह देख सकते हैं।

हर साल शास्त्रीय संगीत का समागम - वडोदरा में साल 1914 में अखिल भारतीय संगीत सभा का आयोजन महाराजा सयाजीराव गायकवाड ने करवाया था। इस सभा में देश के चोटी के शास्त्रीय साधकों का आगमन हुआ। उसके बाद से हर साल यहां शास्त्रीय संगीत का विशाल समागम होता है। वडोदरा रियासत के वर्तमान उत्तराधिकारी महाराजा रणजीत सिंह भी खुद चित्रकार और संगीतकार हैं।

लक्ष्मी विलास पैलेस घूमते हुए थक जाएं तो यहां एक रेस्टोरेंट भी है। यहां पर कुछ खाना पीना हो जाए। महल में खाने पर कुछ शाही एहसास तो होता ही है। हमने यहां समोसा और सैंडविच का स्वाद लिया। साथ में कॉफी भी पी। यहां पर सोवनियर शॉप भी है। यहां स्थानीय कलाकारों द्वारा बनवाई गई सामग्री को आप यादगारी के तौर पर खरीद सकते हैं। हम भी माने नहीं एक वॉल हैंगिग खरीद ही डाली। तो अब आगे चलते हैं लेकिन जान लें कि लक्ष्मी विलास पैलेस हर सोमवार को बंद रहता है।
-       विद्युत प्रकाश मौर्य  
( RAJA RAVI VERMA N VADODRA ) 

Wednesday, June 12, 2019

महान शासक सयाजीराव गायकवाड और बड़ौदा रियासत


वडोदरा के लक्ष्मी विलास पैलेस के बीचों बीच 300 फीट ऊंची मीनार बनी हुई है। इस मीनार के ऊपर एक लैंप लगाया गया है। इस लैंप में जब लाल रोशनी जल रही हो तो वह इस बात का संकेत है कि राजा अभी वडोदरा में ही हैं। दिन में इस मीनार पर केसरी झंडा लहराता है जो राजा के होने का संकेत देता है। 
थोड़ी बाद वडोदरा के गायकवाड राजाओं के बारे में। ब्रिटिश राज में वडोदरा की गायकवाड रियासत एक प्रिंसले स्टेट थी। पर यह देश  500 से ज्यादा रियासतों में सबसे सम्मानित थी। इसे अंग्रेज सरकार ने 21 तोपों की सलामी का दर्जा दिया था। तोपों की सलामी का दर्जा रियासत की औकात के हिसाब से तय होता था।

वैसे गायकवाड का मतलब होता है गायों का रक्षक। ये एक मराठा राजवंश है। पिलाजी गायकवाड (1721-32 ) के समय से यह वंश प्रमुखता से चर्चा में आता है। वे पेशवा बाजीराव प्रथम के समकालीन थे। वे कोल्हापुर के राजा शाहू के सेनापति के गुट में थे। उन्होंने बड़ौदा को अपना केंद्र बनाया। पिलाजी के बाद के दमाजी गायकवाड द्वितीय, उसके बाद गोविंद राव, आनंद राव, सयाजीराव द्वितीय शासक हुए। सयाजीराव के तीन पुत्र हुए गणपति राव, खंडेराव और मल्हारराव। मल्हारराव की कोई संतान नहीं थी, उन्होंने एक बालक को गोद लिया जिसका नाम सयाजीराव गायकवाड तृतीय रखा गया।

महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय गायकवाड़ राजवंश के अति प्रतापी राजा थे। उनके राज में बड़ौदा रियासत का कायाकल्प हुआ। पर सयाजी राव गायकवाड असली नाम गोपाल था। वे एक गरीब चरवाहे काशीनाथ गायकवाड के बेटे थे। महाराजा ने 27 मई 1875 को उन्हें 12 साल की उम्र में गोद लेकर उनका नाम सयाजीराव गायकवाड रखा। वे 12 साल तक अनपढ़ ही थे। बाद में महल में उनके शिक्षादीक्षा का इंतजाम किया गया।  उनका राज्याभिषेक 28 नवंबर 1881 को महज 18 साल की उम्र में हुआ। अत्यंत कुशाग्र बुद्धि, अध्ययनशील वृति, होनहार औ जिद्दी स्वभाव ने उन्हें प्रिंसले राजाओं के बीच महान राजा के तौर पर स्थापित किया। 1911 के दिल्ली दरबार में जार्ज पंचम को झुक कर सलाम करने से उन्होंने इनकार कर दिया था।

महात्मा फूले से प्रभावित थे - सयाजीराव गायकवाड पर महात्मा फूले के सत्यशोधक समाज का बहुत प्रभाव था। 1885 में उनकी मुलाकात पुणे में महात्मा फूले के साथ हुई थी। 19 मार्च 1918 में बम्बई में हुए छुआ छूत विरोधी परिषद के अध्यक्ष बडौदा के नरेश श्रीमंत सयाजीराव गायकवाड बने। महात्मा फूले से प्रेरणा लेकर, ब्राह्मणवाद की बुराइयों से लड़ने वाले महाराजा सयाजीराव गायकवाड ने  बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए 4 जून 1913 में छात्रवृति देने का महान कार्य किया। उनका निधन 6 फरवरी 1939 को हुआ।

फिर चलते हैं महल की ओर... वडोदरा के लक्ष्मी विलास पैलेस में पच्चीकारी वाले टाइल्स, बहुरंगे संगमरमर के टाइल्स, कई तरह की चित्रकलाएं, फव्वारे देखे जा सकते हैं। महल के प्रवेश द्वार पर ताड़ के पेड़ इस महल को एक अलग खूबसूरती देते हैं। इस महल तब लिफ्ट भी लगाई गई थी। यहां के दरबार हॉल में फेलिसकी द्वारा संकलित किए गए कांसे, संगमरमर व टेरीकोटा की मूर्तियां लगाई गई हैं। 

विलियम गोर्डलिंग ने महल के बगल में बागीचे तैयार किया था जिसे देखकर लोग रोमांचित हो उठते हैं। महल के अंदर आप गादी कक्ष देख सकते हैं जहां महाराज प्रताप सिंह का राज्याभिषेक हुआ था।

सुंदर सुरम्य सयाजी बाग  वडोदरा रेलवे स्टेशन के पास महाराजा सयाजीराव गायकवाड के नाम पर विशाल सयाजी बाग बना हुआ है। इस हरे भरे बाग में सुबह शाम टहलने वाले लोगों की भीड़ रहती है। वडोदरा रेलवे स्टेशन के ठीक सामने सयाजीराव विश्वविद्यालय का विशाल परिसर है।


 आपको पता है देश के सबसे बड़े कैंपस विश्वविद्यालय काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना में सयाजीराव गायकवाड का क्या योगदान है। इस विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी का निर्माण उनके द्वारा दिए गए चंदे से हुआ। यह देश की तीसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी है। यह संयोग ही है कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में 1990 से 1995 के दौरान अध्ययन करते हुए मुझे पांच साल इस पुस्तकालय में दिन रात पढ़ने का मौका मिला था। 

सयाजीराव के बाद इस वंश में फतेह सिंह, प्रताप सिंह फिर रंजीत सिंह उत्तराधिकारी हुए। क्या आपको पता है कि ग्वालियर रियासत से उत्तराधिकारी ज्योतिरादित्य सिंधिया का विवाह गायकवाड घराने में हुआ है। उनकी पत्नी प्रियदर्शिनी राजे इसी राज परिवार की बेटी हैं।
-       विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( SAYAJI RAO GAIKWAD, VADODRA ) 

Monday, June 10, 2019

बंकिंगघम पैलेस से भव्य है लक्ष्मी विलास पैलेस वडोदरा


डभोई जाना हुआ था ट्रेन से लौटा बस से। मिनी बस ने मुझे कीर्ति स्तंभ चौराहे पर ही उतार दिया है। कीर्ति स्तंभ पोलो ग्राउंड के पास है। यह 1935 की बना हुआ स्तंभ है। इसे महाराजा सयाजीराव गायकवाड के शासन के 60 साल पूरे होने के मौके पर बनवाया गया था।  नेहरु भवन के पास स्थित इस स्तंभ के शीर्ष पर शेर की मूर्ति बनी है। मूर्ति का पार्श्व भाग लक्ष्मी विलास पैलेस के मुख्य द्वार की तरफ है। इस स्तंभ का निर्माण शिल्पी कृष्णराव चौहान ने किया था।

कीर्ति स्तंभ से शेयरिंग आटो लेकर मैं होटल लौट आया। अनादि और माधवी तैयार हैं। हमलोग वडोदरा का लक्ष्मी विलास पैलेस देखने निकल पड़े हैं। लक्ष्मी विलास पैलेस का प्रवेश टिकट 225 रुपये प्रति व्यक्ति है। पर इस टिकट में पैलेस का आडियो गाइड का शुल्क भी शामिल है। पैलेस के अंदर फोटोग्राफी की प्रतिबंधित है। लक्ष्मी विलास पैलेस और महाराजा फतेह सिंह संग्रहालय का संयुक्त टिकट खरीदा जा सकता है। फतेह सिंह म्युजियम का टिकट 150 रुपये का है। आप भुगतान क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड से कर सकते हैं। महल सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। हर सोमवार को बंद रहता है।

वडोदरा आए और लक्ष्मी विलास पैलेस नहीं देखा तो क्या देखा। यह देश के बेहतरीन राजसी महलों में से एक है। लक्ष्मी विलास पैलेस को अगर वडोदरा की पहचान कहा जाए तो गलत नहीं होगा। सूर्यास्त के बाद सुनहरे उजाले में इस महल का वैभव और निखर जाता है। इस शानदार पैलेस का निर्माण 1890 में पूरा हुआ था। इसका निर्माण महाराजा महाराजा सयाजीराव गायकवाड ने करवाया था।

इस महल  का डिजाइन बनाने की जिम्मेदारी अंग्रेज आर्किटेक्ट चा‌र्ल्स मंट को दी गई थी। लक्ष्मी विलास पैलेस इंडो सरैसेनिक रिवाइवल वास्तुकला में बनी संरचना है।  इसे दुनिया के आलीशान महलों में गिना जाता है। इस विशाल महल की नींव 1878 में रखी गई थी और इसका निर्माण कार्य 1890 में पूरा हुआ। इस महल की संरचना में राजस्थानी, इस्लामिक और विक्टोरियन वास्तुकला का अनोखा संगम देखने को मिलता है। इसलिए बाहर से देखने में महल के गुंबदों में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च के गुंबद नजर आते हैं।

कुल 700 एकड़ में फैला ये महल लंदन के बंकिघम पैलेस से चार गुना बड़ा है। यह सभी आधुनिक सुविधाओं से लैस है। ये भारत में अभी तक का बना सबसे बड़ा महल है जिसके अंदर और भी कई भवन स्थित हैं। इसके परिसर में मोती बाग पैलेस, माकरपुरा पैलेस, प्रताप विलास पैलेस और महाराजा फतेह सिंह म्यूजियम स्थित है।

यह महल अपने आप में गयकवाड़ राजवंश की बहुमूल्य वस्तुओं का संग्रहालय है। महल के अंदर प्रवेश करने के साथ अपना आडियो गाइड लगा लिजिए यह हर हॉल में स्थित संग्रह के बारे मेंआपको जानकारी देता जाता है।

शस्त्रों का विशाल व अनूठा संग्रह - महल का शस्त्रागार में आप नवदुर्गा तलवार, शिवाजी और महाराणा प्रताप की तलवार, दूधा तलवार, जापानी समुराई नागिन तलवार देख सकते हैं। नागिन तलवार को आग में लाल करके जहरीले पानी में डूबो दिया जाता था। 

आगे आप शत्रु को धड़ काटने वाली चक्र जैसी मशीन देख सकते हैं। यहां गुरु गोबिंद सिंह द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला हथियार पंच कला भी संग्रह में मौजूद है। आगे सात साल में तैयार की जाने वाली शकीला तलवार के दर्शन कर सकते हैं। गायकवाड राजाओं द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला बघनखा भी यहां देखा जा सकता है। वही बघनखा जिसका इस्तेमाल शिवाजी ने किया था।
लक्ष्मी विलास पैलेस के वैभव और गायकवाड राजाओं के बारे में और भी बातें करेंगे पर अभी बस इतना ही…
-       विद्युत प्रकाश मौर्य
( LAXMI VILAS PALACE VADODARA, KIRTI STAMBH ) 
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Saturday, June 8, 2019

डभोई का हीरा बा गेट – कलात्मकता का बेहतरीन नमूना

डभोई गुजरात के वडोदरा जिले का एक शहर है। कभी ये शहर बड़ा व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। पर आज इस शहर की सड़कों को देखकर ऐसा लगता है जैसे हम किसी 100 साल पुराने शहर में आ गए हों।

वडोदरा से डभोई जाने के लिए प्रताप नगर रेलवे स्टेशन से रेलगाड़ियां चलती हैं। प्रतापनगर वडोदरा जंक्शन से 5 किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह 5 बजे मैं होटल से निकलकर प्रताप नगर के लिए चल पड़ा हूं। वडोदरा के आटोरिक्शा वाले गलत किराया नहीं मांगते। एक आटोवाले ने मुझे वाजिब किराया पर रेलवे स्टेशन पहुंचा दिया। टिकट लेकर मैं डभोई जाने वाली पैसेंजर ट्रेन में बैठ गया हूं।

 कभी प्रतापनगर से डभोई की लाइन भी नैरो गेज हुआ करती थी। प्रतापनगर से डभोई की पहली पैसेंजर ट्रेन सुबह 7.20 बजे है। सर्दी के दिन में अभी उजाला नहीं हुआ है और ट्रेन चल पड़ी। ट्रेन में मुझे जगह आसानी से मिल गई है। ट्रेन एक घंटे में डभोई पहुंच गई है। वैसे ये पैसेंजर ट्रेन छोटा उदयपुर तक जाती है। पर मैं डभोई उतर कर लोगों से हीरा गेट का रास्ता पूछता हुआ शहर में चल पड़ा हूं।

रास्ते में एक दुकान पर रुककर खम्मण खाने से खुद को रोक नहीं पाया। गुजरात में इससे बेहतर नास्ता कुछ होता भी नहीं है। नास्ते के बाद पैदल ही लोगों से रास्ता पूछता हुआ आगे बढ़ रहा हूं। पतली सड़क के दोनों तरफ प्राचीन इमारतें दिखाई दे रही हैं। रास्ते में एक सफेद रंग का विशाल घंटाघर नजर आता है।

डभोई छठी शताब्दी में गुजरात का समृद्ध शहर था। गिरनार के जैन अभिलेखों में भी डभोई शहर का जिक्र आता है। पर डभोई में किले और सुंदर अलंकरण वाले द्वार का निर्माण 11वीं सदी में राजा सिद्धराज जय सिंह के कार्यकाल (1093 -1133 ई ) में हुआ। 

डभोई का किला हिंदू सैन्य परंपरा के दुर्लभ उदाहरणों में से एक है। इसकी वास्तुकला शास्त्रों वर्णित शास्त्रीय परंपराओं पर आधारित है। शहर में प्रवेश के लिए कुल चार प्रवेश द्वार बनाए गए थे। इनमें पूर्व का द्वार जिसे हीरा भागोल कहते हैं वह सबसे ज्यादा अलंकृत प्रवेश द्वार था। इस गेट को यह नाम इसके वास्तुकार हीराधर के नाम पर मिला।

हीरा गेट में शिव, लक्ष्मी, विष्णु की सुंदर मूर्तियां बनी हैं। महाभारत कुछ दृश्यों को भी इसमें चित्रित किया गया है। भारतीय संस्कृति के प्रतीक जानवर हाथी की कलात्मक प्रतिमाएं हैं। इस गेट में बनी कई प्रतिमाएं खंडित हो गई हैं। संभवतया ये मुस्लिम आक्रमण के समय हुआ होगा। हीरा गेट तीन मंजिला है। इसमें ऊपर कुछ झरोखे भी बने हुए हैं। हीरा गेट की मूर्तियां खजुराहो जैसी कला शिल्प की याद दिलाती हैं। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्थल है। पर गेट का रखरखाव अच्छा नहीं है। शहर के लोगों के भी इस गेट की कलात्मकता के बारे में ज्यादा नहीं मालूम।  

इसके अलावा डभोई में वडोदरा गेट (पश्चिम), चंपानेर गेट (उत्तर ) और नांदोद गेट (दक्षिण) तीन और प्रवेश द्वार बनाए गए थे। हीरा गेट के आसपास प्रवेश द्वार के अलावा कुछ नहीं बचा है। शहर की बाउंड्री वाल वाली दीवारें दरक चुकी हैं।


डभोई 13वीं सदी में मुस्लिम शासकों के अंतर्गत आ गाया। एक अप्रैल 1731 को डभाई का प्रसिद्ध युद्ध बाजीराव पेशवा और टिंबकराव दाबुद्धे के बीच लड़ा गया था। डभोई गुजराती के प्रसिद्ध भक्तिमार्गी कवि दयाराम की स्थली भी है। यहां पर उन्होने काफी पद्य रचे थे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(DABHOI, GUJRAT, HIRA GATE ) 





Thursday, June 6, 2019

चंपानेर का सात कमान, गुजरात की पहचान



चंपानेर-पावागढ़ के ऐतिहासिक स्थलों में सात कमान प्रमुख है। यह सात कमान गुजरात राज्य की पहचान बन चुका है। गुजरात के सरदार वल्लभाई पटेल एयरपोर्ट पर सात कमान की विशाल तस्वीर को गुजरात की प्रमुख ऐतिहासिक प्रतीक के तौर पर पेश किया गया है। सात कमान का निर्माण स्थानीय पीले बलुआ पत्थर से किया गया है। यह ऐसे स्थल पर बना है जहां से पूरे पावागढ़ की सुरक्षा को फौज के अधिकारी देख सकते थे।

बारह वर्ग मील में बसा था शहर - प्राचीन चंपानेर नगरी 12 वर्ग मील में बसी हुई थी। पावागढ़ की पहाड़ी पर उस समय एक दुर्ग भी था, जिसे पवनगढ़ या पावागढ़ कहते थे। पर यह दुर्ग अब नष्ट हो गया है। जगह जगह दुर्ग के अवशेष देखे जा सकते हैं। पर वहां प्राचीन महाकाली का मंदिर आज भी विद्यमान है। चांपानेर की पहाड़ी समुद्र तल से 2800 फुट ऊंची है। इसका संबंध ऋषि विक्रमादित्य से बताया जाता है। 
चांपानेर का संस्थापक गुजरात नरेश वनराज का चंपा नामक मंत्री था। चांद बरौत नामक गुजराती लेखक के अनुसार 11वीं शती में गुजरात के शासक भीमदेव के समय में चांपानेर का राजा मामगौर तुअर था। 1300 ई. में चौहानों ने चांपानेर पर अधिकार कर लिया। पर 1484 ईस्वी में महमूद बेगड़ा ने इस नगरी पर आक्रमण किया और वीर राजपूतों ने विवश होकर शत्रु से लड़ते-लड़ते अपने प्राण गवां दिए। मुस्लिम शासकों ने इस शहर का नाम मुहम्मदाबाद भी रखा था।


विश्व विरासत स्थल – यूनेस्को ने चंपानेर पावागढ़ पुरात्विक स्थल समूहों को साल 2004 में विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल किया। गुजरात में इसके अलावा पाटन का रानी का बाव (2014) भी इस सूची में है।

चंपानेर शहर को आजकल आप दक्षिण का भद्रा गेट और पूर्व के भद्रा गेट के बीच महसूस कर सकते हैं। इन दोनों के बीच कई ऐतिहासिक इमारतों के अवशेष मौजूद हैं।


शहर की मसजिद के बाद आगे बढ़ने पर हमें आमिर मंजिल और केवड़ा मसजिद का पथ संकेतक नजर आता है। लेकिन ठहरिए इससे पहले हमें मांडवी यानी सीमा शुल्क गृह की इमारत नजर आती है। यह मुस्लिम शासकों के प्रशासन का प्रमुख दफ्तर था। सीमा शुल्क दफ्तर को गुजराती में मांडवी कहते हैं। मतलब यह तब का कस्टम हाउस था। यहां पर दो पुरानी तोपें भी रखी हुई दिखाई दे जाती हैं। मांडवी यानी चुंगीघर एक समानुपातिक चौरस इमारत है। इसका निर्माण 15वीं सदी में हुआ था। यह चंपानेर किले के मध्य में स्थित है। मराठों का शासन काल में इस इमारत का इस्तेमाल चुंगी संग्रह केंद्र के तौर पर किया जाता था। इसमें कुल 11 कक्ष बने हुए थे।

आगे चलते हुए पुराना चंपानेर शहर की सड़क पर हम पहुंच गए हैं। यहां कुछ गेस्ट हाउस और धर्मशाला बने हुए हैं। ऐसा लग रहा है कि हम किसी गांव में टहल रहे हों। सामने पावागढ़ डाकघर नजर आता है। भले ही आजकल डाकघर की अहमियत कम हो रही हो पर मेरा बचपन से पोस्ट ऑफिस से बड़ा प्रेमपूर्ण रिश्ता रहा है। इसलिए डाकघर का बोर्ड मुझे आह्लादित करता है। मुझे दिगंबर जैन पथिक आश्रम का बोर्ड नजर आता है। यहां पर दो दिगंबर जैन धर्मशालाएं हैं। 

आगे एक बार फिर हम पावागढ़ की पुरानी इमारतों से रुबरु हो रहे हैं। कुछ इमारतें जो खंडहर का रुप ले चुकी हैं। इन इमारतों को देखते हुए हमलोग पूर्व के भद्र गेट से बाहर निकल गए हैं। चंपानेर के इन गेट का निर्माण महमूद बेगड़ा द्वारा सोलहवीं सदी में करवाया गया था। दक्षिण गेट, पूर्व गेट के अलावा हालोल गेट और गोधरा गेट नाम से दो और प्रवेश द्वार हुआ करते थे।
हमें चंपानेर मे बड़ा तालाब और कबूतरखाना देखने भी जाना था। पर वह जामा मसजिद से तीन किलोमीटर आगे है। वहां जाने के लिए कोई वाहन नहीं मिल पाया तो हमें अपना इरादा बदलना पड़ा।

एक बार फिर हमलोग बस स्टैंड पहुंच गए हैं वडोदरा वापसी के लिए। अभी कोई बस खड़ी नहीं है। तो एक आटोवाले कहते हैं कि हम आपको हालोल तक छोड़ देंगे बस वाले किराए में ही। पावागढ़ से हालोल 7 किलोमीटर है। रास्ते में हमें हालोल गेट और पुराने किले के कुछ और अवशेष नजर आते हैं। हमलोग आटो में बैठ जाते हैं। थोड़ी देर में हालोल पहुंच गए हैं। हालोल बस स्टैंड से हमें वडोदरा जाने वाली बस तुरंत मिल जाती है। हमें जो बस मिली है यह राजस्थान से उदयपुर के भी पीछे से चली है और वडोदरा जा रही है।  
 - vidyutp@gmail.com
( CHAMPANER, HALOL, PAWAGARH, GUJRAT )