Tuesday, December 18, 2018

बहादुरी की सैकड़ो दास्तां सुनाता- दिल्ली का वायुसेना संग्रहालय

Featured post on IndiBlogger, the biggest community of Indian Bloggers
दिल्ली के एयरपोर्ट के पास स्थित वायुसेना का संग्रहालय। भारतीय वायु सेना की बहादुरी की कई कही और अनकही कहानियां सुनाता है। एक दिन समय निकालिए कुछ घंटे और जानिए समझिए हमारी वायुसेना की ताकत को। उनके अतीत के गौरव को। खास तौर यहां वायु सेना द्वारा स्वतंत्रता के बाद हुए युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए कई लड़ाकू विमानों को देखा जा सकता है। कुछ विमान क्षतविक्षत अवस्था में हैं तो कुछ काफी चालू हालत में भी हैं।

सुखोई के साथ। 
यहां हैंगर में 15 विभिन्न प्रकार के सैन्य वायुयान खड़े हैं जो 08 अक्तूबर 1932 को वायु सेना के गठन के समय से ही सेना की रीढ़ की हड्‌डी रहे हैं। इनमें 1929 में खैबर दर्रे से गुजरने वाला पहला वायुयान वेस्टलैण्ड भी है। वेस्टलैण्ड लाईसैण्डर (लिजिक), हॉकर हरीकेन, हॉकर टेम्पेस्ट तथा वाइकर्स स्पिटफायर ने द्वितीय विद्गवयुद्ध के दौरान तबाही मचाई थी।

पालम स्थित वायु सेना संग्रहालय में एक एनैक्सी है जिसमें विंग कमांडर (बाद में एयर मार्शल) एस मुखर्जी, ओ बी ई, स्क्वाड्रन लीडर (बाद में एयर कमोडोर) मेहर सिंह, एम वी सी, डी एस ओ, विंग कमांडर (बाद में एयर मार्शल) ए एम इंजीनियर, डी एफ सी तथा एयर चीफ मार्शल अर्जन सिंह, डी एफ सी की भव्य तस्वीरों से सुसज्जित है। ये अफसर भारतीय वायु सेना के अग्रणी थे। संग्रहालय में रखा हुआ वायु सेना का ध्वज एक अप्रैल 1954 को पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद द्वारा भारतीय वायु सेना को प्रदान किया गया था।

संग्रहालय का दूसरा भाग द्वितीय विश्व युद्ध के पदक विजेता भारतीय अफसरों की तस्वीरों से सजा हुआ है। इन अफसरों ने बड़ी दिलेरी से दुश्मनों की युद्ध मशीनो को तबाह कर दिया तथा अपने उड़ान मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए। 1966 तथा 1971 की लड़ाइयों में पाकिस्तान से जब्त किए गए कुछ छोटे शस्त्र जैसे रिवॉल्वर, पिस्टल आदि तथा वायु सेनाध्यक्ष को भेंट की गई समारोह-किर्च आदि को भी यहां देखा जा सकता है।
एमआई4 हेलीकाॉप्टर। 

वायु सेना से जुड़े देश  दो प्रमुख संग्रहालय हैं। एक संग्रहालय मेघालय की राजधानी शिलांग  हैं तो दूसरा दिल्ली में। आश्चर्य की बात है कि दिल्ली में रहने वाले लोग इतने शानदार संग्रहालय से अनजान हैं। रोज इस बेहतरीन  संग्रहालय को देखने बहुत कम लोग ही पहुंचते हैं।  
ये सब कुछ पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब्त हुआ था

खुलने का समय : प्रातः 10 बजे से सायं 5 बजे तक। आप वायु सेना संग्रहालय से निकलते समय वायु सेना से जुड़े कई प्रतीक चिन्ह भी खरीद सकते हैं।जैसे वायुसेना की टोपियां, चाबी रिंग और दूसरी उपहार में दी जाने योग्य वस्तुएं। वायुसेना स्टेशन परिसर में एक कैंटीन भी है। भूख लगने पर हल्का फुल्का रिफ्रेशमेंट यहां उपलब्ध है।

दो दिन का अवकाश : सोमवार एवं मंगलवार को संग्रहालय बंद रहता है। यानी बुधवार से रविवार तक आप यहां जा सकते हैं। प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं है। पर कोई सरकारी पहचान पत्र होना जरूरी है। जैसे आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या फिर मतदाता पहचान पत्र।

भारतीय वायुसेना का आदर्श वाक्य
क्या आपको पता है कि भारतीय वायु सेना का आदर्श वाक्य गीता के ग्यारहवें अध्याय से लिया गया है।  - नभः स्पृशं दीप्तम्।
यह महाभारत के महायुद्ध के दौरान कुरूक्षेत्र की युद्धभूमि में भगवान श्री क्रष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश का एक अंश है। भगवान श्री क्रष्ण, अर्जुन को अपना विराट रूप दिखा रहे हैं। भगवान का यह विराट रूप आकाश तक व्याप्त है जो अर्जुन के मन में भय और आत्म-नियंत्रण में कमी उत्पन्न कर रहा है। इसी प्रकार भारतीय वायु सेना राष्ट्र की रक्षा में वांतरिक्ष शक्ति का प्रयोग करते हुए शत्रुओं का दमन करने का लक्ष्य करती है।

वायु सेना संग्रहालय कैसे पहुंचे -  यह पालम में दिल्ली केंटोण्मेंट इलाके में स्थित है। दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल 1डी से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अब आप यहां दिल्ली मेट्रो के मेजेंटा लाइन के सदर बाजार छावनी स्टेशन से भी पहुंच सकते हैं। यहां से संग्रहालय काफी करीब है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य


Monday, December 17, 2018

न्यू महाराष्ट्र सदन में सुबह का नास्ता- बडा पाव और मिसल पाव

Featured post on IndiBlogger, the biggest community of Indian Bloggers
हल्की बारिश में भिंगते हुए सुबह सुबह हमलोग दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित न्यू महाराष्ट्र सदन में पहुंच गए हैं। लोदी गार्डन की सैर के बाद हमारी योजना यहां ब्रेकफास्ट करने की है।


कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित महाराष्ट्र सदन कुछ साल पहले ही अपने नए नवेले रुप में मेहमानों का स्वागत करता है। इसका विशाल हरा भरा भवन काफी भव्यता लिए है। इसके परिसर में प्रवेश करते ही बायीं तरफ महात्मा ज्योतिबा फूले की विशाल बैठी हुई प्रतिमा है। वहीं दाहिनी तरफ डाक्टर आंबेदकर की प्रतिमा है। इन दोनों प्रतिमाओं को देखने और नमन करने कोई भी नागरिक जा सकता है। हालांकि प्रवेश द्वार पर तैनात सुरक्षा कर्मी आपके आने का कारण पूछते हैं। महाराष्ट्र सदन के पोर्टिको में प्रवेश करने के बाद आपको अपना परिचय पत्र दिखाना पड़ता है। भवन के अंदर सिर्फ सरकारी कर्मचारियों और पत्रकारों को ही प्रवेश की अनुमति है। यानी इसकी कैंटीन में खाने का आनंद आम लोग नहीं ले सकते। हां आप किसी मित्र के साथ जा सकते हैं।

प्रवेश द्वार के बाद मुख्य हाल में माता सावित्री बाई फूले की प्रतिमा देखी जा सकती है। यह संयोग है कि देश महान दलित और पिछड़े महानायकों की जन्म स्थली और कार्य स्थली महाराष्ट्र रही है। दिल्ली का महाराष्ट्र सदन उन महानायकों को अपने यहां गर्व से सम्मान पूर्वक स्थान देता है।
महाराष्ट्र सदन की आंतरिक डिजाइन भी सुरुचिपूर्ण है। महाराष्ट्र से आने वाले सांसदों विधायकों का अस्थायी निवास है यह। कैंटीन बिल्कुल सामने है। यह कोई निजी कंपनी ठेके पर चलाती है। पर  अत्यंत साफ सुथरी कैंटीन की सेवाएं अच्छी है।
सुबह के नास्ते में हमने बड़ा पाव, साबुदाना की खिचड़ी, पोहा, समेत जितनी चीजें उपलब्ध थी सब आर्डर कर डाली। सबका स्वाद लिया। हर चीज का स्वाद अपने स्तर पर बेहतर है।हां बहुत दिनों बाद यहां मिसल पाव का भी स्वाद लिया। अपने माथेरन दौरे में मैंने मिसल पाव खाया था। और बटाटा बड़ा भी। सुस्वादु नास्ते के बाद कॉफी की चुस्की। हम चार लोगों का इतना सब कुछ खाने के बाद बिल भी कुछ खास नहीं आया।
कुछ दिनों के बाद एक बार फिर महाराष्ट्र सदन जाना हुआ। इस बार हमलोग रात्रि में डिनर के लिए पहुंचे थे। लंच और डिनर का मीनू अलग है। हालांकि यहां उत्तर भारतीय डिश भी मिलते हैं। पर महाराष्ट्र सदन में हमने मराठी डिश आर्डर किया। मिक्स वेज कोल्हापुरी, साउजी पनीर। पर सभी मराठी सब्जियां खूब मसाले वाली हैं। उनमें मिर्च भी ज्यादा है। तो माधवी और वंश को यहां का डिनर कुछ खास पसंद नहीं आया।तो लब्बोलुआब ये है कि नास्ता तो अच्छा है पर लंच और डिनर कुछ  खास नहीं।

पर अगर आपको नास्ते में मराठी वड़ा पाव का स्वाद दिल्ली में लेना हो तो  यहां जरूर पहुंच सकते हैं। वैसे महाराष्ट्र सदन के बगल में कोपरनिक मार्ग पर पुराना महाराष्ट्र सदन है। इसमें कैंटीन है। यहां सभी लोग जा सकते हैं। मतलब आम आदमी भी। यहां जाकर भी आप मराठी खाने का स्वाद ले सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
 ( MAHARASTRA SADAN, BADA PAV, MISAL PAV ) 



Saturday, December 15, 2018

गढ़ी हरसुरू से गुरग्राम वापसी और रेवाड़ी स्वीट्स की मिठास

Featured post on IndiBlogger, the biggest community of Indian Bloggers
गढ़ी हरसुरू अभी गुरुग्राम नगर निगम का हिस्सा नहीं बना है। पर रेलवे स्टेशन के आसपास काफी बिहार-यूपी बंगाल के लोगों ने प्लाट खरीदकर घर बना लिया है। आवासीय कालोनियां आबाद हो रही हैं। प्रदूषण मुक्त वातावरण है। गढी रेलवे स्टेशन उतरने के बाद सड़क पर आ गया हूं। यहां पर  एक माता वैष्णो देवी का प्रसिद्ध मंदिर है, जहां लोग दूर दूर से दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर के आसपास मेले जैसा माहौल है। यहां से गुरुग्राम बस स्टैंड के लिए एक शेयरिंग आटो रिक्शा मिल गया है। आटो बैठी सवारियां गुरुग्राम से माता वैष्णो के दर्शन करने आई थीं। गढ़ी रोड पर गोदरेज प्रोपर्टी बहुमंजिला अपार्टमेंट का निर्माण कर चुकी है। मतलब पटौदी रोड पर शहर का विस्तार यहां तक आ चुका है। पटौदी रोड पर गडौली फिर कादीपुर इलाके आते हैं। इसके बाद गुरुग्राम का सेक्टर 10 आया। अब हम शहर में आ चुके हैं। आटो वाला हमें बस स्टैंड के पास महावीर चौराहा पर उतार देता है।

रेवाड़ी स्वीटस – 1935 से कुछ मीठा हो जाए
मुझे फरुखनगर से लौटते हुए गुरुग्राम के कुछ साथियों ने बताया था कि आप गुरुग्राम जाएं तो रेवाडी स्वीट्स की मिठाइयों का स्वाद जरूर लें। यह दुकान सदर बाजार में मुख्य पोस्ट आफिस से थोडा आगे है। तो मैं पूछता हुआ रेवाड़ी स्वीट्स पहुंच गया हूं। यादव जी ने मुझे रेवाड़ी स्वीट्स की कई प्रसिद्ध मिठाइयों के नाम गिनाए थे। मैं डोडा बर्फी, सोहन हलवा, बेसन लड्डू और पनीर वाली जलेबी पैक करा लेता हूं। ये सब मिठाइयों तो घर के लिए है। लेकिन रेवाड़ी स्वीट्स का मिठाई की दुकान के साथ रेस्टोरेंट भी है। तो मेरी इच्छा यहां रबड़ी खाने की होती है।

 मैं एक प्लेट रबड़ी का आर्डर करके बैठ जाता हूं। देख रहा हूं। लोग यहां छोला भठूरा भी खूब खा रहे हैं। दरअसल रेवाड़ी स्वीट्स पुराने गुरुग्राम की प्रसिद्ध दुकान है। यह मिठाई की दुकान 1935 से चल रही है। इसके वर्तमान मालिक चौधरी धन सिंह गणपत राम सैनी हैं। मैंने देखा है कि हरियाणा,राजस्थान और यूपी के मथुरा, भरतपुर इलाके में बड़ी संख्या में सैनी समाज के लोग हलवाई के पेशे में भी हैं। वैसे सैनी समाज खेती बाड़ी करने वाली बिरादरी है। पर ये देखिए ना गुरुग्राम के सबसे बड़े हलवाई सैनी हैं। कई पीढ़ियों से रेवाड़ी स्वीट्स की प्रसिद्धि गुरुग्राम में चली आ रही है। वे अपने पैकेट पर लिखते हैं- शुद्धता ही हमारी प्राचीन परंपरा है। वे इस शुद्धता और स्वाद की परंपरा को निभा रहे हैं। उनकी मिठाइयां थोड़ी महंगी जरूर है पर खरीदने वालों की लाइन लगी रहती है।
पर याद रखिए कि दिल्ली से सटे गुरुग्राम शहर में दो शहर हैं। एक पुराना गुरुग्राम और नया गुरुग्राम। 

नया गुरुग्राम हाईटेक आईटी सिटी है। जहां आसमान से बात करती ऊंची इमारते हैं। पर पुराना गुरुग्राम हरियाणा का परंपरागत शहर है। तो अब मैं पुराने परंपरागत शहर ने नए गुरुग्राम की ओर चल पड़ा हूं। यहां एमजी रोड मेट्रो स्टेशन के लिए जाने वाली बस में बैठ गया हूं। अब अपने घर जाने वाली मेट्रो पकड़नी है।    
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(REWARI SWEETS GRUGRAM)


Thursday, December 13, 2018

रेवाड़ी रेलवे स्टेशन- रात है या बारात फूलों की...

अलवर से रेवाड़ी के लिए लौट रहा हूं। मुझे अलवर जंक्शन से ट्रेन मिली है पोरबंदर मोतिहारी एक्सप्रेस। इसके इंजन की तरफ से लगने वाली जनरल बोगी में मैं सवार हो गया हूं। ट्रेन में जगह मुश्किल से मिली है। एक साइड वाली एक आदमी की सीट पर एडजस्टमेंट करके बैठ गया हूं। गुजरात से बिहार जा रहे एक श्रमिक भाई जो इस सीट पर बैठे हैं उन्होंने मेरे लिए भी थोड़ी जगह बना दी है। मैंने उन्हें बताया कि मेरा डेढ़ घंटे का सफर है रेवाडी उतर जाउंगा। मैं आखिर रेवाड़ी क्यों उतरने वाला हूं। क्योंकि मुझे सुबह सुबह गढ़ी हरसुरु जंक्शन पहुंचना है। और वहां से फरूखनगर जाना है।
रात है या बारात फूलों की....
ट्रेन रात के आठ बजे रेवाड़ी जंक्शन पर पहुंच गई है। पर रेवाड़ी जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर 3 पर उतरने पर गेंदे फूलों की खुशबू से वातावरण महकता हुआ नजर आया। देखता हूं प्लेटफार्म पर गेंदे के फूल के विशाल ढेर लगे हैं। ऐसा लग रहा है मानो रात में फूलों का बाजार सज गया हो रेलवे प्लेटफार्म पर। हां फूलों का बाजार  ही तो है। पर पूछने पर ये पता चला कि यह तो हर रोज का नजारा है। दरअसल रेवाड़ी और उसके आसपास के गांव में बड़े पैमाने पर फूलों की खेती होने लगी है। इन फूलों को संग्रहित करके रोज दिल्ली के खारी बावली की फूल मंडी में भेजा जाता है। मैंने किसी जमाने में वाराणसी में बांस फाटक का फूल बाजार देखा था। रेवाड़ी स्टेशन के प्लेटफार्म पर इन फूलो के ढेर के साथ मौजूद व्यक्ति ने बताया कि लोकल ट्रेन से ये फूल दिल्ली भेजे जाते हैं। शादी विवाह के मौसम में फूलों की मांग और बढ़ जाती है। रेवाड़ी जिले में गेंदे की खेती का क्षेत्रफल हर साल बढ़ रहा है। यह साल 2017 में 300 हेक्टेयर से ऊपर पहुंच चुका था। 


किसानों को फूलों की खेती से लाभकारी मूल्य मिल रहा है। इसलिए काफी किसान परंपरागत खेती छोड़कर फूलों की खेती को अपना रहे हैं। ये खुशबू का कारोबार है जो मुनाफा दिला रहा है। रेवाड़ी में गुलाब और गेंदे के फूलों की खेती होती है। त्योहारी सीजन में तो फूलों की कीमतें दोगुनी हो जाती हैं। आम दिनों में 50 से 60 रुपये किलो बिकने वाले फूल त्योहार के मौके पर 100 रुपये किलो तक हो जाते हैं।
तो फूलों पर एक शायरी याद आती है...
जिंदगी है बहार फूलों की
दास्तां बेशुमार फूलों की
तुम क्या तस्सवुर में
आई खुशबू हजार फूलों की...

मुझे रात में रेवाड़ी में ही रुकना है तो रेलवे स्टेशन से बाहर निकल कर पहला जो होटल दिखाई देता है उसमें कमरा बुक करके ठहर जाता हूं। इसके बाद रात्रि भोजन के लिए निकल गया। कुछ होटलों के मीनू देखने के बाद एक भीड़ भाड़ वाले ढाबे में खाने के लिए बैठ गया। थाली आर्डर की। खाने के बाद काउंटर पर जब पैसे देने आया तो अचानक वेटर पीछे दौड़कर आया। भाई साहब ये मोबाइल आपका  है क्या। मैं चौंका । हां मेरा ही है। दरअसल खाने के बाद मैं अपना फोन अपनी कुरसी पर छोड़ आया था। वेटर की इमानदारी और जागरूकता से मेरा फोन मिल गया। उन्हें दिल से धन्यवाद।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(ALWAR TO REWARI, FLOWERS ) 

Tuesday, December 11, 2018

अलवर में मोती डूंगरी, रेलवे स्टेशन और फतेह गुंबज

कंपनी बाग से निकल कर मैं पैदल चलता हुआ मोती डूंगरी की तरफ बढ़ रहा हूं। कंपनी बाग के एक कोने में अमर जवानों की समाधि दिखाई देती है। यह सेना के विभिन्न ऑपरेशन में शहीद होने वाले अलवर के फौजियों की याद में बनी समाधि है। यहां पर शहीदों की एक लंबी सूची भी लगी है। मतलब साफ है कि अलवर क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग फौज में भर्ती होते हैं। मैं उन शहीदों को नमन करके आगे बढ़ जाता हूं।

मोती डूंगरी अलवर शहर का पॉश इलाका है। इस इलाके में एक उद्यान वाले होटल स्वरूप विलास में एक साहित्यिक आयोजन चल रहा है। हां, जनवादी लेखक संघ राजस्थान का सम्मेलन चल रहा है। मैं थोड़ी देर के लिए उस आयोजन में शामिल हो जाता हूं। इसके बाद फिर आगे की ओर। सामने मोती डूंगरी चिल्ड्रेन पार्क नजर आता है। बच्चों का सुंदर पार्क। मोती डूंगरी ऊंची पहाड़ी पर बना एक किला है। इस किले के निर्माण की प्रेरणा स्कॉटलैंड के महल से मिली। इस पहाड़ी पर एक गणेश मंदिर और लक्ष्मीनारायण मंदिर का निर्माण कराया गया है। मोती डूंगरी पार्क में अलवर के एक राजा जय सिंह प्रभाकर की विशाल प्रतिमा लगी है। उनका जन्म विनय विलास पैलेस में 14 जून 1882 को हुआ था। उन्हें आधुनिक अलवर का निर्माता माना जाता है। उनका निधन 19 मई 1937 को पेरिस में हुआ था।
मोती डूंगरी के टॉप से रात को अलवर शहर का बड़ा सुंदर नजारा दिखाई देता है। मोती डूंगरी में सूफी संत सैय्यद बाबा की मजार भी है। इस मजार पर महिलाओं को जाने की मनाही है। क्यों पता नहीं। मोती डूंगरी इलाके में कुछ अच्छे होटल भी हैं।
मैं अब मोती डूंगरी से वापस रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़ा हूं। अलवर शहर का रेलवे स्टेशन साफ सुथरा दिखाई देता है। स्टेशन का भवन एक मंजिला ही है पर लंबा चौड़ा है। स्टेशन की दीवारों पर सुरुचिपूर्ण ढंग से राजस्थानी पेंटिंग की गई हैं। पर स्टेशन के आसपास कोई आवासीय होटल नहीं है। मेरी ट्रेन में अभी देर है। अचानक स्टेशन के उस पर मेरी नजर एक ऐतिहासिक इमारत पर पड़ती है। मैं स्टेशन को फुटओवर ब्रिज से पार करके उस पार पहुंच जाता हूं।

मैं फतेह गुंबज के सामने खड़ा हूं। यह स्मारक फतेह जंग जो मुगल सम्राट शाहजहां का एक मंत्री था उसको समर्पित है। उसका संबंध अलवर के खानजादा शासकों से था। गुंबज के शीर्ष पर उर्दू और फारसी में आलेख लिखा है। बलुआ पत्थर से बने इस भवन में कुल पांच मंजिलें हैं। इसका डिजाइन मुगल और राजपूत शैली का मेल दिखाई देता है। गुंबज परिसर में सुंदर उद्यान बना हुआ है। यह स्मारक सुबह 10 बजे से शाम 4.30 बजे तक ही खुला रहता है। 


स्मारक का विशाल भवन रेलवे स्टेशन के फुटओवर ब्रिज से दिखाई देता है। यह स्टेशन के मुख्य प्रवेश द्वार के उल्टी तरफ स्थित है। फतेह गुंबज देखने के बाद मैं फिर से रेलवे स्टेशन लौट आया हूं। अब मुझे अपनी अगली ट्रेन का इंतजार है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( MOTI DUNGRI, ALWAR, FATEH GUMBAJ ) 
-         

Monday, December 10, 2018

अलवर का होप सर्कस- लेडी होप के सम्मान में मिला नाम

Featured post on IndiBlogger, the biggest community of Indian Bloggers
होप सर्कस। यूं कहें तो अलवर शहर का दिल। चौराहे के बीचों बीच विशाल और सुंदर मंदिर। है हिंदू मंदिर पर नाम है होप सर्कस। भला कैसे पड़ा होगा इसका नाम होप सर्कस। दोपहर की धूप में होप सर्कस ऊपरी मंजिल पर चढकर देखने पर अलवर शहर का सुंदर नजारा दिखाई देता है।

अलवर को मत्स्य नगर के नाम से भी जाना जाता है। पर अलवर शहर के बीचों बीच स्थित अलवर के होप सर्कस दुनिया में अलग पहचान है। इसका निर्माण 1935 में आरंभ किया गया था। यह पांच साल में बनकर तैयार हुआ। खास बात यह है कि रियासत काल में बना यह स्मारक एक महिला लेडी होप को समर्पित है। वे 1940 में अलवर यात्रा पर आईं थी। लेडी होप तत्कालीन वायसराय लार्ड लिनलिथगो की बेटी थीं। 3 मार्च 1940 को इसका नामकरण अलवर के तत्कालीन महाराजा ने लेडी होप के सम्मान में  होप सर्कस रखवा दिया। सर्कस मतलब चौराहा। ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली में कनॉट सर्कस बना तो अलवर में होप सर्कस। इस स्थल पर बाद में आजादी के लिए मर मिटने वाले स्वतंत्रता सेनानियों ने आंदोलन भी किए।  
अब होप सर्कस अलवर का प्रमुख टूरिस्ट प्लेस और शहर का लैंडमार्क बन चुका है। यह एक वृताकार संरचना है। यह तीन मंजिला है। हर मंजिल नीचे वाली मंजिल से थोड़ी छोटी होती जाती है। मतलब इसकी संरचना पिरामिड शैली में है। इसकी तीसरी मंजिल पर शिव का मंदिर बना है। इसके चारों तरफ से ऊपर चढ़ने के लिए चार सीढ़ियां बनी है। चारों तरफ चार कलात्मक गेट बने हैं। इन गेट पर कलात्मक मूर्तियां स्थापित की गई हैं। चौराहे के बीच स्थित इस भवन के चारों तरफ शहर के अलग अलग हिस्सों की ओर चार सड़के जा रही हैं। एक सड़क कंपनी बाग की तरफ, एक सड़क बस स्टैंड की तरफ एक सड़क घंटाघर की तरफ तो एक सड़क सिटी पैलेस की तरफ जा रही है।

होप सर्कस के शीर्ष पर गौरीशंकर यानी शिव का सुंदर मंदिर बना है। यह शहर का प्रमुख मंदिर है। इस शिव मंदिर के आस पास खड़े होकर अलवर शहर की सुंदरता का नजारा कर सकते हैं। हर साल होली, दिवाली, विजयादशमी जैसे त्योहारों के समय होप सर्कस को बड़ी सुंदरता से सजाया जाता है। बाद में होप सर्कस का नाम बदलकर कैलास बुर्ज रखा गया, पर सारे लोग इसे होप सर्कस के नाम से ही बुलाते हैं।  

अलवर के कोने कोने से खरीददारी करने वाले लोग होप सर्कस के आसपास के बाजारों में पहुंचते हैं और समय निकालकर इस मंदिर में दर्शन करने पहुंच जाते हैं। होप सर्कस शहर के केंद्र में है और शहर के प्रमुख बाजार इसी मंदिर के आसपास स्थित हैं। इसके शीर्ष पर चारों तरफ पार्क और सुंदर बेंच बनी है। यहां बैठकर आप टाइम पास भी कर सकते हैं।

होप सर्कस के कंपनी बाग वाले रोड को चर्च रोड भी कहते हैं। इस मार्ग पर 1885 का बना सेंट एंड्रयूज चर्च स्थित है। इसके निर्माण में पत्थरों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया गया है। अलवर शहर का यह अत्यंत पुराना चर्च है। यह कोलोनियल स्थापत्य कला का सुंदर नमूना है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(ALWAR, HOPE CIRCUS, SHIVA TEMPLE  ) 
आगे पढ़ें : अलवर का मोती डूंगरी, रेलवे स्टेशन और फतेह गुंबद 

Saturday, December 8, 2018

अलवरी मावा मतलब कलाकंद - इसका जवाब नहीं

राजस्थान का अलवर शहर प्रसिद्ध है अपने कलाकंद या मिल्क केक के लिए। मिल्क केक को यहां अलवरी मावा कहा जाता है। पर आखिर यहां मिल्क केक ही क्यों बनता है। दरअसल राजस्थान का अलवर जिला दूध का बड़ा उत्पादक इलाका है। इतना बड़ा इसे मिल्क सरप्लस इलाका माना जाता है। अब दूध अधिक होता हो तो उससे मिठाई बनाना श्रेष्ठ विकल्प है। तो अलवर में बडे पैमाने पर बनती है मिठाई। उसमें भी सबसे प्रसिद्ध मिठाई मिल्क केक यानी कलाकंद। तो आप अलवर आएं और कलाकंद न खाएं ऐसा कैसे हो सकता है। तो हम पहुंच गए हैं घंटा घर इलाके में। यहां है अलवर की सबसे प्रसिद्ध मिल्क केक वाली दुकानें हैं। 

पहले थोड़ा स्वाद लेते हैं फिर खरीददारी करेंगे। मैं अलग अलग दुकानों पर कलाकंद के भाव पूछता हूं। 280 रुपये किलो है कलाकंद। पर घंटाघर के ठाकुरदास एंड संस में कलाकंद की दरें हैं 320 रुपये किलो। वह भला इसलिए कि ठाकुरदास एंड संस अलवर की सबसे लोकप्रिय कलाकंद की दुकान है। तो मैं भी यहीं से घर के लिए कलाकंद पैक करा लेता हूं।


पर अब बात हो जाए अलवरी मावा की। अलवर का कलाकंद इतना लोकप्रिय है राजस्थान और हरियाणा के कई शहरों में यह अलवर के कलाकंद के नाम से बिकता है। अलवर से गुजरने वाली हर ट्रेन के ठहराव पर भी लोक प्लेटफार्म से कलाकंद खरीद लेते हैं। आखिर अलवर में ही कलाकंद क्यों .. कहा जाता है कि राजस्थान के अलवर के मिल्क केक में जो स्वाद है वह कहीं और नहीं। यहां दूध का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है। तो दूध से बनी मिठाइयां भी यहां सदियों से बनती आ रही हैं। कलाकंद मतलब खोआ (मावा) की मिठाई। दूध को देर तक गर्म कर जलाते रहिए तो तैयार होता है मावा। इस मावा में मिठास मिलाकर तैयार किया जाता है कलाकंद। यानी यह खालिश दूध की मिठाई है। अलवर में आप फीका मावा भी खरीद सकते है। मतलब बिना चीनी का।

अगर आपको चीनी की बीमारी है तो फीका मावा खाए। वैसे तो अलवर शहर में कलाकंद की तमाम दुकाने हैं। पर सबसे ज्यादा दुकान शहर के घंटाघर के आसपास हैं। होप सर्कस और घंटाघर के बीच कलाकंद का बाजार सजा है। पर यहां पर कलाकंद की अलग अलग दरें हैं। पर इन सबके बीच ठाकुरदास एंड संस दुकान ज्यादा प्रसिद्ध है। वे कई पीढ़ियों से कलाकंद बेच रहे हैं। छोटी सी दुकान में दिन भर कलाकंद खरीदने वालों की भीड़ रहती है। अब उनकी दूसरी ब्रांच रेलवे स्टेशन पास के चौराहे पर भी खुल गई है।
पर आप अलवर का कलाकंद खरीदते समय सावधान रहें। कई जगह मिलावटी मावे की मिठाइयां भी बनने लगी हैं। सस्ते में बेचने और ज्यादा कमाई के चक्कर में ऐसा हो रहा है। कई बार स्वास्थ्य विभाग ऐसे मावे को पकड़ता है और उन्हें नष्ट करता है। इसलिए मिठाइयां भरोसेमंद दुकानों से ही खरीदें। अलवर में मावा बनता है तो घी भी बनती है। आप अलवर से देसी घी भी खरीद कर ले जा सकते हैं।
अलवर कलाकंद इस तरह से यहां की कला संस्कृति में रचा बसा है कि इसके नाम से लोक गायक घनश्याम गुर्जर ने गीत गाया है ...अलवरो कलाकंद...
-       ... विद्युत प्रकाश मौर्य 

( ALWAR MAWA, KALAKAND, MILK CAKE ) 


Thursday, December 6, 2018

अलवर शहर का कंपनी गार्डन और स्वामी विवेकानंद

पैदल पैदल अलवर शहर का मुआयना करते हुए  मैं पुरजन विहार पहुंच गया हूं। इसे यहां के लोग कंपनी गार्डन भी कहते हैं। इसका एक और नाम है शिमला। अलवर शहर के बीचों बीच विशाल हरा भरा उद्यान है। पर इस उद्यान की यादें स्वामी विवेकानंद से जुड़ी हुई हैं।
स्वामी विवेकानंद दो बार अलवर आए थे। वे पहली बार 7 फरवरी 1891 को अलवर पहुंचे थे। इस दौरान वे कई हफ्तों तक यहां रुके। जल्द ही शहर के लोगों  में उनकी प्रसिद्धी फैल गई। वे पुरजन विहार में जहां आजकल शिवाजी की प्रतिमा लगी है। वहीं पर बैठकर रोज प्रवचन करते और शहर के लोग सुनने आते थे। अपने अलवर प्रवास के दौरान ही वे पैदल चलकर सरिस्का के जंगलों में भी गए थे।

स्वामी विवेकानंद 1891 में पहले अलवर प्रवास के दौरान वहां अनेक हिंदू-मुसलमान युवक उनके प्रवचन सुनने आते थे। अलवर राज्य के दीवान भी स्वामीजी के परम-भक्त बन गए। तब उन्होंने अलवर के महाराज मंगल सिंह से स्वामीजी की मुलाकात कराई। कुछ दिन बाद वह अलवर राज्य के दीवान के अतिथि भी बने। अलवर नरेश उनसे मिलकर इतने प्रभावित हुए कि उनके भक्त बन गए। 
पहली बार अलवर प्रवास में स्वामी जी यहां के सरकारी अस्पताल के प्रमुख डॉक्टर गुरुचरण लश्कर के आवास में ठहरे। यह वह स्थान है, जहां अब स्वामीजी का स्मारक बनाया है। उन चिकित्सक की पहचान बंगाली डॉक्टर के रूप में थी। 

इस प्रवास में स्वामीजी की दीवान रामचंद्र की हवेली, मंगलसर रेजीमेंट के हैड क्लर्क लाला गोविंद सहाय विजयवर्गीय, पंडित शंभूनाथ इंजीनियर सहित अन्य लोगों से घनिष्ठता हुई। वे अलवर के अशोका टॉकीज के समीप स्थित गोविंद सहाय के निवास पर भी कुछ दिन रुके थे। स्वामी जी घनिष्ठता के कारण शिकागो में भी अलवर के लोगों को याद करते थे। इसलिए उन्होंने शिकागो से गोविंद सहाय को कई पत्र भी लिखे। पहले  प्रवास के दौरान स्वामी जी ने मालाखेड़ा गेट के पास स्थित एक टीले पर बैठकर कई प्रवचन भी दिए थे। इसी टीले का नाम अब विवेकानंद चौक है, जहां स्वामीजी की प्रतिमा स्थापित की गई है। 31 मार्च 1891 को स्वामी जी अलवर से रवाना हो गए। इस दौरान मूर्ति पूजा को लेकर उनकी महाराज मंगल सिंह से भी चर्चा हुई। एक मौलवी साहब से भी उनकी गहन चर्चा हुई।
साल 1893 शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद भारत लौटने पर विवेकानंद पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो चुके थे। उसके बाद वे एक बार फिर अलवर आए थे। दूसरी बार स्वामी विवेकानंद दिसंबर 1897 में अलवर  आए। दूसरी बार अलवर आने पर अलवर के लोगों ने उन्हें विशेष सम्मान दिया। इस बार उन्हें राजमहल में ठहराया गया। तत्कालीन महाराजा जय सिंह प्रभाकर ने उनका स्वागत किया। स्वामी विवेकानंद की राजस्थान के खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह से भी काफी मित्रता थी। उन्होंने स्वामी जी को शिकागो जाने में मदद भी की थी।

अलवर शहर में बस स्टैंड के पास विवेकानंद चौराहा है जहां स्वामी जी की विशाल प्रतिमा लगी है। हालांकि कंपनी बाग या पुरजन विहार उद्यान में उनके बारे में कुछ नहीं लिखा है। कंपनी बाग उद्यान के बीच में बहुत सुंदर बागीचा है। इसमें बहुत सुंदर फूल खिलते हैं। कंपनी बाग का मौसम बड़ा सुहाना रहता है। इसे लोग शिमला उद्यान भी कहते हैं। उद्यान की हरियाली और रखरखाव मनमोह लेता है।
--- vidyutp@gmail.com
( ALWAR, VIVEKANAND, PURJAN VIHAR, PARK ) 

Tuesday, December 4, 2018

मूसी महारानी की छतरी - पिता की याद में बेटे ने बनवाई

Featured post on IndiBlogger, the biggest community of Indian Bloggers
अलवर सिटी पैलेस के बगल में स्थित है मूसी महारानी की छतरी। वैसे तो राजस्थान में घूमते हुए आपको जगह जगह छतरियां देखने को मिलती हैं।पर अलवर की मूसी महारानी की छतरी का सौंदर्य कुछ अलग है।

इस दो मंजिल वाली छतरी को महाराजा विनय सिंह ने अपने पिता बख्तावर सिंह और उनकी रानी मूसी की याद में 1815 में बनवाया था। जैसा कि यहां लगे साइन बोर्ड पर लिखा है कि महाराजा बख्तावर सिंह के साथ उनकी रानी मूसी सती हो गई थीं। इसलिए शहर के लोग सम्मान में इसे मूसी महारानी की छतरी कहते हैं। 

बख्तावर सिंह का समय शासन काल के लिहाज से 1790-1814 का रहा था। छतरी का निचला भाग बलुआ पत्थर से तो उपर का हिस्सा सफेद संगमरमर से बना है। पत्थर में कई तरह के डिजाइन हैं। इन पर रामायण और भागवत कथा के दृश्य अंकित किए गए हैं। कुछ चित्रों में महाराज बख्तावर सिंह को घोड़े पर सवार चित्रित किया गया है। कई चित्र पानी के रिसाव के कारण ध्वस्त हो चुके हैं। छतरी के निर्माण के लिए लाल बलुआ पत्थर राजस्थान के करौली इलाके से मंगाए गए थे। छतरी की आंतरिक सज्जा भी अत्यंत सुंदर है।

किले के पीछे सुंदर सरोवर - छतरी के परिसर में ही अभिमन्यु के चक्रव्यूह का चित्रण किया गया है। जिसे आते जाते लोग ध्यान से देखते हैं। किले के पीछे और छतरी के सामने एक विशाल सरोवर है। इस सरोवर के चारों तरफ घाट बने हैं। इन घाटों के साथ सुंदर छतरियां बनी हैं। पूरा इलाका किसी फिल्म के गाने की शूटिंग के लिए मुफीद है। सरोवर को सागर कहते हैं। इस सरोवर के चारों तरफ नजर घुमाएं तो अरावली की पर्वत मालाएं दिखाई देती है। पूरा अलवर शहर तीन तरफ से पहाड़ियों से घिरा है।  पता नहीं इतने मनोरम स्थल पर किसी फिल्म की शूटिंग यहां हुई या नहीं। पर इस इलाके को देखने के लिए हर रोज कुछ सैलानी जरूर पहुंचते हैं। सागर तट से किले का पृष्ठ भाग सुंदर दिखाई देता है।

दुल्हा दुल्हन के रूप में है शिव पार्वती
मूसी महारानी की छतरी के ठीक सामने राज परिवार द्वारा बनवाया गया शिव जी का मंदिर है। प्राचीन मंदिर श्री श्री 108 बख्तेश्वर महादेव का निर्माण काल 1872 का है। मंदिर परिसर में पहुंचे एक अलवर के बुजुर्ग ने इस मंदिर की खास बात बताई। इस मंदिर में शिव पार्वती की प्रतिमा है, इसमें शिव और पार्वती दुल्हा दुल्हन के रूप में हैं। ऐसी शिव प्रतिमाएं विलक्षण हैं। पर्वत की तलहटी में स्थित मंदिर का परिसर हरा-भरा है।मंदिर सुबह और शाम को श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुलता है। अलवर में आप करणी माता मंदिर के भी दर्शन कर सकते हैं।

मूसी महारानी की छतरी के सामने सागर के उस पार से आप पहाड़ पर ट्रैकिंग कर सकते हैं। इस ट्रैकिंग के मार्ग पर आगे मनसा देवी का मंदिर स्थित है। अगर समय हो तो अलवर में कई जगह ऐसी पहाडो की ट्रैकिंग की जा सकती है। यहां से ऊंचाई पर बना बाला किला दिखाई देता है। यह किला इन दिनों पुलिस प्रशासन के कब्जे में है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

-