Wednesday, October 16, 2019

कपिलवस्तु – राजा शुद्धोधन की राजधानी और प्रचीन स्तूप


पिपरहवा में कपिलवस्तु के पुरातन स्थल पर पहुंच गया हूं। मई 2019 से ही यहां प्रवेश के लिए 25 रुपये का टिकट निर्धारित कर दिया है। यह प्रवेश टिकट की दर भारत और सभी बिमस्टेक सदस्यों देशों के नागरिकों के लिए है। अन्य विदेशी नागरिकों के लिए प्रवेश टिकट 300 रुपये का है। इससे पहले यहां प्रवेश निःशुल्क था। प्राचीन स्मारकों के रखरखाव के लिए टिकट होना आवश्यक भी है। टिकट लिए जाने से लोग स्मारकों का महत्व भी समझते हैं। यह स्मारक सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है। मैं सुबह छह से सात बजे के बीच यहां पहुंच गया हूं।

इस पुरातन स्मारक के बाहर लगे बोर्ड पर लिखा गया है कि कपिलवस्तु ( वर्तमान में पिपरहवा) छठी शताब्दी ईसा पूर्व में शाक्य गणराज्य की राजधानी था। इसी कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन गौतम बुद्ध के पिता थे। भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अस्थि अवशेषों को आठ भागों  विभाजित किया गया था। उनमें से एक भाग शाक्य गणराज्य कपिलवस्तु को मिला था।

शाक्य परिवार ने बनवाया स्तूप - पिपहरवा में जो मूल स्तूप स्थित है वह शाक्यों द्वारा गौतम बुद्ध के अस्थि अवशेष पर निर्मित किया गया था। इसका संकेत सबसे पहले 1898 में डब्लू सी पेपे द्वारा यहां से प्राप्त खड़िया पत्थर से निर्मित अस्थि मंजूषा पर लिखे अभिलेख से मिलता है। इसमें लिखा गया है कि भगवान बुद्ध के लिए इस स्तूप का निर्माण उनके शाक्य भाइयों द्वारा अपनी बहनों, पुत्र-पुत्रियों और पत्नियों द्वारा मिल जुलकर किया गया था।

इसके बाद 1971 से 1976 के दौरान हुई खुदाई में यहां से मृणमुद्राएं मिली हैं। इन पर ओम देवपुत्र विहारे कपिलवस्तुस भिक्षुसंघसच लिखा है। इससे यह प्रमाणित होता है कि यह स्थल प्राचीन कपिलवस्तु का बौद्ध स्थल था। खुदाई के दौरान यहां चौथी, पांचवी, छठी शताब्दी इस्वी पूर्व की अस्थि मंजूषाएं मिली हैं। यहां पर बौद्ध विहार, मंदिर, मनौती स्तूप आदि के भी अवशेष मिले हैं।

पिपरहवा बौद्ध स्तूप से नेपाल में स्थित कपिलवस्तु की दूरी ज्यादा नहीं है। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा शुद्धोधन के गणराज्य के समय भारत और नेपाल के ये सभी क्षेत्र कपिलवस्तु राज्य की सीमा में रहे हों। यहां बौद्ध स्तूप का निर्माण कराया गया और राजा का राज प्रसाद नेपाल की वर्तमान सीमा के अंदर स्थित हो, ऐसा खूब संभव है। ऐसे में कपिलवस्तु पर दोनों देशों का दावा सही है।

सुंदर उद्यान और पके हुए आम - पिपरहवा का बौद्ध स्तूप परिसर कई एकड़ में फैला है। अंदर हरा भरा विशाल उद्यान है। मुख्य स्तूप, मनौती स्तूप के अलावा यहां पर सुंदर सरोवर है। इसमें कमल पुष्प खिले हुए हैं। परिसर में आम का बाग भी है। इससे पड़े के पके हुए आम टपक कर गिर रहे हैं। यहां पर मुझे दो पके मिलते हैं। मैं उन्हें भगवान बुद्ध का आशीर्वाद समझ कर ग्रहण कर लेता हूं। यहां मौजूद माली बताते हैं। इन पेड़ों के आम की बिक्री नहीं की जाती। यूं ही पक कर गिरते रहते हैं।

मुख्य स्तूप के आसपास कई संघाराम का निर्माण कराया गया था। इन संघाराम में बौद्ध भिक्षु निवास करते थे। पर चीनी यात्री फाहियान लिखता है कि जब वह यहां पहुंचा तो कपिलवस्तु उजाड़ हो चुका था। दूसरा विदेशी यात्री ह्वेनसांग भी कपिलवस्तु की खोजखबर लेने पहुंचा था। आजकल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और उद्यान विभाग ने इस परिसर को इतना सुंदर सजा रखा है कि यहां आकर दिल खुश हो जाता है। पर हर रोज गिनेचुने सैलानी ही यहां पहुंचते हैं। नमो बुद्धाय। आगे चलते हैं।  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        ( PIPRAHWA, KAPILVASTU, BUDDHA, STUPA )
   





Monday, October 14, 2019

नौगढ़ से पिपरहवा बनाम कपिलवस्तु

सुबह पांच बजे जगकर स्नान करके तैयार हो गया हूं। अपने लॉज से रेलवे स्टेशन जाकर वहां लगे ऑटो वालों से पिपरहवा चलने की बात करता हूं। एक आटो वाले ने कहा आपको कपिलवस्तु का बौद्ध स्तूप देखना है तो आटो बुक कर लें। उनसे 400 रुपये में बात हुई। सभी साइट दिखाने के बाद वे हमें ककरहवा बार्डर जाने वाले आटो में बिठा देंगे ये तय हो गया। मैं आटो रिक्शा में बैठकर चल पड़ा।

हमारे आटो का ड्राईवर बिल्कुल नौजवान है। अभी तो ये 18 साल का भी नहीं लग रहा। उनके साथ एक युवा यादव जी भी हो लिए। बातों बातों में बताया कि ये आटो उनका है। नौगढ़ में वे कुछ टैक्सियां भी चलवाते हैं। वैसे तो वे गोरखपुर के रहने वाले हैं,पर नौगढ़ में आकर टैक्सी का कारोबार करते हैं। बोले यहां काफी पैसा है, पर यहां के स्थानीय लोग पैसा कमाने का तरीका नहीं जानते।
अलीगढ़वा बार्डर पर नेपाल का प्रवेश द्वार 

अलीगढ़वा वाया बर्डपुर -  नौगढ़ के शहर से बाहर निकलकर आटो नेपाल सीमा की ओर चल पड़ा है। नौगढ़ के बाजार में कोई ग्लैमर मतलब चाकचिक्य नहीं है। स्टेशन से आधा किलोमीटर आगे चलते ही ग्रामीण इलाका शुरू हो गया। अब नेपाल सीमा तक जाने वाली सड़क चौड़ी और बेहतर बन रही है। कुछ समय पहले तक ये सड़क बहुत बुरे हाल में थी। थोड़ा चलने के बाद हमलोग बर्डपुर गांव पहुंच गए हैं। बर्डपुर से पिपरहवा और ककहरवा का रास्ता बदल जाता है। सामने बुद्धद्वार से हमलोग बायीं ओर मुड़ जाते हैं। ये रास्ता अलीगढ़वा की ओर जा रहा है।
अलीगढ़वा में भारत नेपाल की सीमा पर। 

वैसे तो मैंने ये आटो बुक कर रखा है पर आटोवाले मेरी इजाजत लेकर एक सवारी बिठा लेते हैं। ये सवारी एक मास्टरनी हैं जो नेपाल में नौकरी करती हैं। नागरिकता भी नेपाल की है। पर उनका परिवार नौगढ़ में रहता है। यहां अपने बच्चों को पढ़ाती हैं। सिद्धार्थनगर जिले में भारत और नेपाल के बीच रिश्तेदारी बिल्कुल आम बात है। तो हमलोग करीब 20 किलोमीटर सफर तय करके पहुंच गए हैं अलीगढ़वा बार्डर। 

यहां भारत नेपाल सीमा है। यहां से भी भारतीय नागरिक नेपाल में प्रवेश करते हैं। पर अलीगढ़वा बार्डर से लुंबिनी पहुंचने का रास्ता बहुत खराब है। नेपाल के अंदर की सड़क अच्छी नहीं है। साथ ही शेयरिंग गाड़ियां भी नहीं मिलतीं। अलीगढ़वा में ही एक दुकान पर सुबह सुबह चाय और नास्ते में घुघनी और जलेबी खाई। हमने भी और आटो वाले भाइयों ने भी। अलीगढ़वा सीमा पर बाजार है। पर सुबह सुबह चाय नास्ते की दुकानों को छोड़ दें तो बाजार अभी सो रहा है। अलीगढ़वा से कपिलवस्तु पुरातत्व स्थल दो किलोमीटर पहले ही है। पर नेपाल वाली मास्टरनी को छोड़ने के लिए हमें अलीगढ़वा बार्डर तक आना पड़ा। यह अच्छा ही हुआ, इससे मैंने भी बार्डर देख लिया। 

कहां है असली कपिलवस्तु -  नौगढ़ रेलवे स्टेशन पर लगे बोर्ड में लिखा गया है कि गौतम बुद्ध के पिता शुद्धोधन की राजधानी कपिलवस्तु यहां से 20 किलोमीटर है। पर अलीगढ़वा बार्डर नेपाल सीमा के अंदर लगे स्वागत द्वार पर लिखा है वेलकम टू कपिलवस्तु। आखिर ये कपिलवस्तु है कहां भारत में की नेपाल में। जवाब है दोनों जगह। नेपाल का दावा है कि कपिलवस्तु उसके यहां है। बुद्ध के जन्म स्थल लुंबिनी से कोई 60 किलोमीटर पश्चिम की तरफ। पर उत्तर प्रदेश शासन का दावा है कि अलीगढ़वा से दो किलोमीटर पहले स्थित पिपरहवा की कपिलवस्तु है। वहां बने बौद्ध स्तूप के बाहर विशाल बोर्ड लगाकर इसकी घोषणा भी कर दी गई है। कुछ इतिहासकारों से इसके समर्थन में तर्क भी गढ़ दिए गए हैं। फिलहाल हम भारत वाले कपिलवस्तु की राह पर हैं।
तो अब हमलोग चल पड़े हैं पिपरहवा बौद्ध स्तूप की ओर। वास्तव में यह स्तूप नौगढ़ से अलीगढ़वा बार्डर के रास्ते पर अलीगढ़वा से दो किलोमीटर पहले बायीं तरफ स्थित है। तो चलिए इस प्राचीन बौद्ध विरासत की ओर चलते हैं...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य -   vidyutp@gmail.com
-        ( PIPRAHWA, ALIGARHWA, KAPILWASTU, NAUGARH, SIDHYARTHNAGAR )      

Sunday, October 13, 2019

तुलसीपुर से नौगढ़ – सिद्धार्थनगर


देवी पाटन मंदिर से चलकर मैं वापस रेलवे स्टेशन आ गया हूं। तुलसीपुर से अब मुझे नौगढ़ जाना है। नौगढ़ मतलब जिला सिद्धार्थनगर का मुख्यालय। लखनऊ से गोंडा, बलरामपुर तुलसीपुर का सफर मैंने बसों से किया था, पर आगे की यात्रा रेलगाड़ी से होनी है। पर रेलगाड़ी रात को 8.15 बजे आएगी। तब तक मेरे पास समय है दो घंटे का। स्टेशन के पास हल्का फुल्का नास्ता करके वक्त गुजारता हूं। गाड़ी आने के आधे घंटे पहले स्टेशन परिसर में जाकर नौगढ़ का एक टिकट खरीद लिया। इंटरसिटी एक्सप्रेस 15070 लखनऊ के बादशाहनगर से शाम को 4.55 बजे चलती है। यह गोरखपुर रात को 12 बजे पहुंचती है। मैं ट्रेन का रनिंग स्टेटस मोबाइल फोन में देख रहा हूं। ट्रेन को 20 मिनट लेट तुलसीपुर पहुंची।

इसका ठहराव बढ़नी और शोहरतगढ़ में है। उसके बाद नौगढ़ आ जाएगा। कुल 80 किलोमीटर का सफर है जो ट्रेन डेढ़ घंटे में तय करेगी। तुलसीपुर में ट्रेन में काफी लोग चढ़ने वाले दिखाई दे रहे हैं। पर संयोग रहा कि मुझे खिड़की के पास वाली सीट मिल गई। मेरे आसपास एक परिवार बैठा है जो गोरखपुर जा रहा है। महिलाओं और बच्चियों का ये भरापुरा परिवार गोरखपुर से तुलसीपुर देवी पाटन मंदिर दर्शन करने के लिए आया था। 

तुलसीपुर से चलने के बाद ट्रेन पचपेडवा मेंरुकी। इसके बाद यह ट्रेन बढ़नी में रुकी। यह नेपाल की सीमा पर बसा एक शहर है। यह सिद्धार्थनगर जिले में आता है। इसके बाद ट्रेन का ठहराव शोहरतगढ़ में है। यह भी सिद्धार्थनगर जिले का ही बाजार है। रात दस बजे के करीब ट्रेन नौगढ़ पहुंच गई। रेलवे स्टेशन पर खूब चहल पहल है। बाहर निकलने पर आटो वाले ककरहवा के लिए आवाज लगा रहे हैं।

नौगढ़ आने से पहले मैंने कई लोगों से सिद्धार्थनगर में मदद मार्गदर्शन के लिए बात की थी। पर किसी से मदद मिल नहीं पाई। पर मुझे यहां कोई परेशानी नहीं हुई।
पहले तो ये जान लिजिए की नौगढ़ सिद्धार्थनगर जिले का मुख्यालय है। यह उत्तर प्रदेश के नए जिलों में से एक है। हमारे आईआईएमसी के सिनियर और आजतक के पत्रकार विकास मिश्र इसी जिले के रहने वाले हैं। एक और आईआईएमसी के पूर्व छात्र मणिंद्र मिश्र भी यहीं के रहने वाले हैं। इन लोगों से मैंने नौगढ़ के बारे में मार्गदर्शन लिया था।

रात को दस बजे उतरने के बाद अब मुझे तलाश थी एक अदद होटल की जहां मैं रात को ठहर सकूं। मैंने फोन पर होटल सिटी हार्ट से बात की थी। ये होटल स्टेशन से 300 मीटर की दूरी पर है। मैं सिटी हार्ट की तरह जा ही रहा था कि रास्ते में जेपी लॉज का बोर्ड दिखाई दे गया। वहां जाकर बात की। यहां 300 रुपये में कमरा मिल गया। कमरा आकार में काफी बड़ा है। इसकी छत ऊंची है। पर अटैच टायलेट वाला नहीं है। होटल के केयरटेकर संजय का व्यवहार बहुत अच्छा है। मैंने उनको बताया कि मुझे सुबह पांच बजे निकलना है तो उन्होने मुझे सुबह के साढ़े चार आकर जगा दिया।  

जून के महीने में गर्मी बहुत है। होटल में आने के बाद मैंने एक बार फिर स्नान किया। उसके बाद रात के भोजन की तलाश में निकला। लोगों ने बताया बालाजी में जाएं। स्टेशन के पास है बालाजी स्वीट्स और भोजनालय। यहां 80 रुपये की थाली में उम्दा किस्म का भोजन था।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( TULSIPUR TO NAUGARH, BARHNI, SHOHRTGARH, BUDDHA ) 

Friday, October 11, 2019

देवी का कंधा गिरा था यहां - देवीपाटन मंदिर – तुलसीपुर


बलरामपुर जिले में स्थित देवीपाटन मंदिर देश के प्रमुख शक्ति स्थलों में से एक है। देवी के नाम पर ही उत्तर प्रदेश के मंडल का नाम देवी पाटन मंडल रखा गया है।  देवीपाटन में स्थित जगदमाता पाटेश्वरी का मंदिर का अलौकिक इतिहास है। यह स्थल युगों-युगों से ऋषि-मुनियों के तप व वैराग्य का साक्षी रहा है।
मंदिर का परिसर विशाल और सुंदर है। परिसर की स्वच्छता मनमोह लेती है। देवी के मंदिर के चारों तरफ परिक्रमा मार्ग पर कई और मंदिर हैं। मंदिर के दाहिनी तरफ अखंड ज्योति जलती है।  

देवी का कंधा गिरा था यहां - यह मंदिर मा दुर्गा के प्रसिद्ध 51 शक्ति पीठों में से एक है। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां माता के दाहिने कंधा यहां गिरा था। हिंदी में कंधे को पाट भी कहते हैं इसलिए देवी का नाम पाटेश्वरी है। इसलिए यह भी शक्ति पीठ में से एक है और देवी पाटन के रूप में कहा जाता है। यह महान धार्मिक महत्व का एक स्थान है।

पहले पशु पक्षियों को प्रसाद - पशु-पक्षियों को मंदिर में चढ़ाए प्रसाद को खिलाने के बाद ही भक्तों को बांटने की परंपरा है। दरअसल ऐसा इस मान्यता के अनुसार किया जाता है कि ईश्वर का वास मनुष्य ही नहीं अपितु पशु-पक्षियों के संग संसार के कण-कण में है। इसी कारण यहां कई वर्षों से यह  परंपरा चली आ रही है

पाताल तक सुरंग और अखंड धुना - पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवीपाटन मंदिर के गर्भगृह से पाताल तक अति प्राचीन सुरंग बनी हुई है। त्रेतायुग से यहां जल रहे अखंड धुना में मां दुर्गा की शक्तियों का वास बताया जाता है। लोग इस धुने से भभूत लेकर जाते हैं। कहा जाता है कि त्रेता युग में माता सीता का पाताल लोक गमन भी यहीं से हुआ था।

नवरात्र में विशाल मेला - बलरामपुर के आसपास के दस जिलों के श्रद्धालु यहां सालों भर पहुंचते हैं। पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। चैत्र और शरद नवरात्रि के समय मंदिर में बहुत भीड़ उमड़ती है। लोग अपने बच्चों के मुंडन समारोह के लिए यहां पहुंचते है। यहां पर बाल दान पवित्र माना जाता है। 

गुरु गोरखनाथ को यहीं मिली थी सिद्धि - ऐसा कहा जाता है कि सिद्ध रत्ननाथ (नेपाल) और गुरु गोरखनाथ को सिद्धि यहीं प्राप्त हुई थी। इसलिए इस मंदिर का गोरक्ष पीठ से गहरा रिश्ता है। देवी पाटन मंदिर का प्रबंधन गोरक्षपीठ के हवाले है। देवीपाटन मंदिर गोरक्षपीठ की उत्तराधिकारी योगी आदित्नाथ के संरक्षण में है।   

माता का प्रसाद  - देवी पाटन मंदिर में मुख्य रूप से प्रसाद के तौर पर माता को चुनरी, नारियल, लावा, नथुनी, सिन्दूर, मांग टीका, चूड़ी, बिछिया, पायल, कपूर, धूप, लौंग, इलाइची, पुष्प, चरणामृत और रोट का प्रसाद प्रमुख रूप से चढ़ाया जाता है। इन प्रसाद के साथ लोग अपने और परिवार के लिए सौभाग्य की कामना करते हैं। 

सुंदर सरोवर और अतिथिशाला - मंदिर परिसर में एक सुंदर सरोवर है। इस सूर्य कुंड में आप नौका विहार का भी आनंद ले सकते हैं। मंदिर में दर्शन करने आए श्रद्धालु इस सरोवर में स्नान भी करते हैं। सरोवर में बतखों का झुंड तैरता नजर आता है। मंदिर परिसर में विशाल यज्ञशाला और अतिथिशाला भी है। अगर मेले का समय नहीं हो तो आपको अतिथि गृह में रियायती दरों पर रहने के लिए आवास मिल सकता है। मंदिर के बगल में चिकित्सालय भी है।

मैं जिस समय मंदिर पहुंचा हूं, श्रद्धालुओं की ज्यादा भीड़ नहीं है। इसलिए दर्शन बहुत आसानी से हो सका। मंदिर के मनोरम परिसर में तकरीबन तीन घंटे का वक्त मैंने गुजारा। अतिथिशाला का पास समय माता का एक नया मंदिर भी बना है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(DEVIPATAN TEMPLE, PATESWARI TEMPLE, GURU GORAKHNATH, TULSIPUR, BALRAMPUR, UP ) 

Thursday, October 10, 2019

तुलसीपुर – दसहरी आम की मिठास


तुलसीपुर चौराहे पर लगा पथ संकेतक बता रहा है कि यहां से बलरामपुर 26 किलोमीटर, श्रावस्ती 41 किलोमीटर और अयोध्या की दूरी 124 किलोमीटर है। गर्मी की दोपहरी में तुलसीपुर चौराहे पर  गन्ने का जूस पीने के बाद आगे चल पड़ा हूं। हालांकि रेलवे स्टेशन की तरफ बैटरी रिक्शा भी जा रहे हैं, पर मैं कस्बे को देखता हुआ पैदल ही चल पड़ा। रास्ते में तुलसीपुर तहसील का दफ्तर आया। इसके आगे बढ़ने पर रेलवे का फाटक आ गया। 
मैं यहां से रेलवे लाइन पकड़कर स्टेशन की तरफ चल पड़ा। सामने तुलसीपुर रेलवे स्टेशन दिखाई दे रहा है। रेलवे स्टेशन पर दो ही प्लेटफार्म हैं, एक अप और एक डाउन ट्रेनों के लिए। तुलसीपुर रेलवे स्टेशन पर दिनभर में गिनती की रेलगाडियां ही रुकती हैं। कुछ साल पहले ये ट्रैक मीटर गेज हुआ करता था। अब ब्राडगेज सिंगल लाइन का ट्रैक है। रेलवे स्टेशन पर लगे एक बोर्ड में तुलसीपुर में स्थित पाटेश्वरी मंदिर के बारे में जानकारी दी गई है। पर स्टेशन पर बुनियादी सुविधाओं के नाम पर कुछ खास नहीं है। रेलवे स्टेशन के आसपास रहने के लिए कोई होटल आदि नहीं है।

रेलवे स्टेशन के बाहर सुलभ शौचालय और स्नानागार है। मैं यहां स्नान करने के लिए चला गया। जून की दोपहर की गर्मी है। तो पसीने से तरबतर हूं। इसके बाद मंदिर जाना है तो वैसे भी स्नान जरूरी है। तरोताजा होकर एक बार फिर तुलसीपुर की सड़क पर हूं। 

यहां आम खूब बिक रहे हैं। ज्यादातर दशहरी आम हैं। इसका भाव यहां महज 30 रुपये किलो के आसपास है। पर ये दशहरी दिल्ली में मिलने वाले दशहरी से काफी अलग है। ये पेड़ का पका हुआ आम है। इसकी शक्ल सूरत काफी अलग है। देखने में सुंदर खाने में सुस्वादु। हमें दिल्ली में जो आम मिलता है उसे कच्चा तोड़ा जाता है और बाद में गैस से पकाया जाता है। इसलिए ऐसे आम को ज्यादा मात्रा में खाना सेहत के लिए हानिकारक हो जाता है। पर लखनऊ से कर्नलगंज, गोंडा, बलरामपुर से लेकर सिद्धार्थनगर इलाके में जो आम मिल रहे हैं उनकी खुशबू भी अलग है और स्वाद भी। जी तो करता है कुछ दिन यहीं रुक कर बस आम ही आम खाता रहूं। आम मेरा सबसे पसंदीदा फल है। इसका स्वाद मेरी कमजोरी भी। वैसे तो तुलसीपुर बलरामपुर जिले की तहसील का छोटा सा शहर है जहां कारोबारी चाक-चिक्य के नाम पर कुछ खास नहीं। पर यहां के आमों ने तो मेरा मन मोह लिया।

रेलवे स्टेशन से देवी पाटन मंदिर की दूरी तकरीबन डेढ़ किलोमीटर है। यह दूरी मैं पैदल टहलते हुए तय करता हूं। मंदिर के करीब पहुंचने से पहले सड़क के दोनों तरफ बाजार शुरू हो गया है। कुछ खाने पीने की और कपड़ों की दुकाने दिखाई दे रही हैं। थोड़ी देर चलने के बाद सड़क के दाहिनी तरफ मंदिर का प्रवेश द्वार दिखाई देता है। यहां से अंदर की तरफ तकरीबन 200 मीटर चलने के बाद मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंच गया हूं। यहां पर पहुंचने के बाद रौनक बढ़ गई है। वैसी ही रौनक जैसी किसी हिंदू मंदिर के आसपास होती है। जय मां पाटेश्वरी।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        ( TULSIPUR, BALRAMPUR, RAILWAY STATION, MANGO, DASAHARI )




Tuesday, October 8, 2019

बलरामपुर से तुलसीपुर – राप्ती नदी और चीनी की मिठास


बलरामपुर बस स्टैंड से मुझे तुलसीपुर की बस लेनी है। दोपहर के एक बजे हैं। आधे घंटे बाद यानी डेढ़ बजे तुलसीपुर की बस जाने वाली है। इस बीच बहुत गर्मी है तो गला तर करने के लिए मैं शीतल पेय (लिम्का) पीने लगा। 
दुकानदार से तुलसीपुर की बस के बारे में पूछा तो उसने बताया कि दोपहर दो बजे के बाद वहां जाने के लिए बस मिलने की कोई गारंटी नहीं होती। बलरामपुर जिला मुख्यालय से तुलसीपुर महज 30 किलोमीटर है। तुलसीपुर बलरामपुर जिले की तहसील है पर सार्वजनिक परिवहन की इतनी कमी। यह सुनकर आश्चर्य होता है। 

खैर बस चल पड़ी है। ये बस बढ़नी तक जाने वाली है। तीन किलोमीटर बाद झारखंडी नामक रेलवे स्टेशन दिखाई दिया। यह बलरामपुर शहर का ही एक छोटा रेलवे स्टेशन है। इस स्टेशन के पास कुछ ठीक-ठाक बाजार दिखाई देता है। यहां पर विश्वास लॉज और होटल पथिक जैसे आवासीय होटल भी दिखाई देते हैं।

प्रिंसले स्टेट था बलरामपुर - इस क्षेत्र में शहर की कुछ प्राचीन इमारते दिखाई देती हैं। ऐसी ही एक प्राचीन इमारत में आईसीआईसीआई बैंक की शाखा है। आगे महाराजा पाटेश्वरी प्रसाद इंटर कॉलेज की प्राचीन इमारत दिखाई देती है। बलरामपुर शहर की स्थापना 16वीं सदी में बलरामदास ने की थी। यह ब्रिटिश काल में एक प्रिंसले स्टेट हुआ करता था। पर आज यह यूपी के अन्य शहरों की तुलना में विकास की दौड़ में काफी पीछे रह गया है।


प्राचीन कौसल राज और श्रावस्ती - बस बलरामपुर शहर से बाहर निकल चुकी है। देखकर अच्छा लग रहा है कि बुद्धिस्ट सर्किट के नाम पर अब सड़क का चौड़ीकरण कार्य जारी है। बलरामपुर इलाका देश के सोलह महाजनपद में से कोशल क्षेत्र हुआ करता था। तब इसकी राजधानी श्रावस्ती थी। प्राचीन श्रावस्ती नगर बलरामपुर से 25 किलोमीटर की दूरी पर है। यह भी बौद्ध सर्किट में महत्वपूर्ण स्थान है। श्रावस्ती नगर भगवान बुद्ध को काफी प्रिय था। यहां बुद्ध अपने जीवन काल में 24 बारिश के मौसम यानी चतुर्मास यहीं गुजारे।

पर आजकल बलरामपुर देश भर में चीनी मिल के लिए जाना जाता है। यह देश की सबसे बड़ी चीनी मिलों में से एक है। 
जी हां, बलरामपुर चीनी मिल देश की दूसरी सबसे बड़ी चीनी मिल है। इलाके में इस समूह की कुल छह चीनी मिले हैं। बलरामपुर चीनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध सम्मानित कंपनी है। इस कंपनी की स्थापना 1975 में कमलनयन सारावगी ने की थी। इन दिनों विवेक सारावगी इस कंपनी के प्रबंध निदेशक हैं।


राप्ती नदी को पार कर तुलसीपुर - बलरामपुर जिले की बड़ी सीमा पड़ोसी देश नेपाल के साथ साझा होती है। जिले की सीमा गोंडा, श्रावस्ती और सिद्धार्थनगर जिले से भी साझा होती है। हमारी बस के छोटी सी नदी के पुल को पार कर रही है। इसका पानी बिल्कुल साफ है। यह वेस्ट राप्ती नदी की धारा है। नेपाल से निकलने वाली यह नदी यूपी के सीमांत जिले के कई शहरों से घूमती हुई डुमरियागंज, गोरखपुर होते हुए बरहज के पास घाघरा में जाकर मिल जाती है।

ये लिजिए हमारी बस तुलसीपुर पहुंच गई है। मैं शहर के चौराहे पर उतर गया। भरी गरमी में एक गिलास गन्ने का रस पीने के बाद लोगों से पूछने पर पता चला कि तुलसीपुर रेलवे स्टेशन यहां से दो किलोमीटर दूर है। मैं पैदल ही स्टेशन की ओर चल पड़ा। रास्ते में एक बोर्ड नजर आया जिसपर लिखा था तुलसीपुर से दिल्ली और पंजाब के लिए सीधी बस सेवा शुरू हो चुकी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-          ( BALARMAPUR, TULSIPUR, RAPTI RIVER, SUGAR MILL )  बलरामपुर चीनी की वेबसाइट-  https://chini.com


Monday, October 7, 2019

लखनऊ से बलरामपुर वाया गोंडा - गोमती और घाघरा के संग

लखनऊ के कैसरबाग डिपो पहुंच गया हूं। यहां से मुझे गोंडा की बस लेनी है। वैसे तो गोंडा ट्रेन से भी जा सकता था। पर सुबह सात बजे कोई ट्रेन नहीं है। इसलिए बस से यात्रा करने को तय किया। वैसे तो मुझे गोंडा से आगे बलरामपुर जाना है। कैसरबाग डिपो से एक बस सीधे बलरामपुर भी जा रही है। यह वाया बहराइच जाएगी। पर मैंने वाया गोंडा जाना तय किया। गोंडा जाने वाली बस ज्यादा आरामदेह नहीं है। इसकी सीट सिटी बस जैसी यानी ऊंचाई में कम है।

गोमती नदी का काला जल - कैसरबाग डिपो से बस निकलने के बाद गोमती नगर, अंबेडकर चौराहा को पार करती हुई गोमती नदी के रिवर फ्रंट से होकर गुजर रही है। मैं देख पा रहा हूं कि भले ही रिवर फ्रंट बन गया हो पर गोमती नदी का पानी काला है। बिल्कुल गंदा। पानी भी यूं जैसे किसी गांव के तालाब का ठहरा हुआ काला जल हो। तहजीब के शहर लखनऊ में गोमती की यह दशा देखकर बड़ी निराशा हुई। स्वच्छ गंगा की बात चल रही है सालों पर पर गोमती की स्वच्छता पर कब बात होगी। आगे चलकर हमारी बस पोलीटेक्निक चौराहे पर थोड़ी देर के लिए रूकी। यह लखनऊ शहर का व्यस्त चौराहा है। इसके बाद निकल पड़ी शहर से बाहर। बाराबंकी रोड पर। लखनऊ से बाराबंकी की दूरी महज 30 किलोमीटर है। यानी अब ये लखनऊ के उपनगर जैसा हो चुका है।

गंगा की दूसरी बड़ी सहायक नदी घाघरा - बस घाघरा नदी पर बने पुल से गुजर रही है। सामने रेल का पुल भी दिखाई दे रहा है। नदी के इस पार चौका घाट रेलवे स्टेशन है तो पुल के उस पार घाघरा घाट रेलवे स्टेशन। घाघरा नदी नेपाल से भारत में आती है। यह लंबाई के लिहाज से यमुना के बाद गंगा की दूसरी सबसे लंबी सहायक नदी है।

 यूपी के बाराबंकी, बहराइच,  गोंडा, अयोध्या, फैजाबाद, देवरिया जैसे शहर घाघरा नदी के आसपास आबाद हैं। ये नदी सरयू के नाम से भी जानी जाती है और ये बिहार में छपरा के पास जाकर गंगा में मिल जाती है। कर्नलगंज से पहले घाघरा पर रेलवे का यह पुल काफी लंबा नजर आता है। बलिया और छपरा के बीच माझी में भी इस नदी पर रेल पुल बना है। 

कर्नलगंज से पहले चाय नास्ता -  घाघरा घाट के बाद बस रामनगर में एक लाइन होटल पर सुबह के नास्ते के लिए रुक गई। हम अभी बहराइच जिले में हैं। यहां पर चाय नास्ते के अलावा बेहतरीन किस्म के दशहरी आम भी बिक रहे हैं। बस आगे चल पड़ी है। कर्नलगंज कस्बा आ गया है। यह गोंडा जिले की तहसील है। लगभग तीन घंटे में 125 किलोमीटर के सफर के बाद बस गोंडा शहर में प्रवेश कर गई है। हमारे एक पत्रकार मित्र प्रमोद कुमार तिवारी गोंडा के रहने वाले हैं। उनसे मैंने अपने यात्रा मार्ग को लेकर सलाह ली थी। यूं तो मैं गोंडा रेल से कई बार गुजरा हूं। पर बस से पहली बार गोंडा शहर में प्रवेश किया है। 

गोंडा एक थका हुआ शहर - कुछ चौराहों को पार करती हुई बस गोंडा के बस स्टैंड में जाकर लगी। बस स्टैंड की छोटी सी पुरानी इमारत है। ऐसा लग रहा है मानो किसी गांव के छोटे से बस अड्डे में आ गए हों। गोंडा बस स्टैंड उत्तर प्रदेश के पिछड़ेपन की कहानी बयां करता है। यूपी के इस पुराने जिला मुख्यालय शहर के बस स्टैंड को देखकर निराशा होती है। यात्री सुविधाओं के नाम पर यहां कुछ भी तो नहीं है।


मुझे भूख लगी है तो बस स्टैंड के चौराहे से बायीं तरह चलकर एक साधारण से होटल में खाने बैठ गया। थाली है खाने की 50 रुपये की। खाना संतोषजनक है। ताजी रोटियां और चावल, दाल, सब्जी। खाने के बाद बलरामपुर जाने वाली बस की तलाश में लग गया। चौराहे से पूरब की तरफ बलरामपुर की बस लगती है। थोड़ी ही देर में एक अच्छी बस मिल गई। गोंडा से बलरामपुर की दूरी 40 किलोमीटर है। गोंडा से छह किलोमीटर आगे शहर के बाहरी इलाके में सभापुर नामक रेलवे स्टेशन आया। गोंडा से बलराम भी रेलवे मार्ग है। दिन भर में कई पैसेंजर एक्सप्रेस रेलगाड़ियां इस मार्ग पर हैं। एक घंटे के सफर के बाद बस बलरामपुर शहर में प्रवेश कर चुकी है। 

वैसे तो बलरामपुर कभी रियासत हुआ करती थी। पर ये शहर भले ही अब यूपी जिला बन चुका है पर यह किसी पुराने कस्बे सा नजर आता है। शहर का बस स्टैंड पतली सी सड़क पर अंदर जाकर है। आसपास में कोई अच्छा होटल रेस्टोरेंट नहीं दिखाई देता। यहां से प्रस्थान करने वाली बसों की संख्या भी ज्यादा नहीं है। बस स्टैंड का परिसर अत्यंत गंदा और अव्यवस्थित है।
 साल 1997 में गोंडा जिले का विभाजन करके बलरामपुर नया जिला बनाया गया। पर देवीपाटन मंडल का यह जिला यूपी के पिछड़ेपन की तस्वीर दिखाने के लिए आदर्श उदाहरण हो सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( LUCKNOW, GOMATI, BARABANKI, GHAGHRA, COLONELGANJ, GONDA, BALRAMPUR )