Saturday, July 21, 2018

बिना किसी नींव के खड़ा है विशाल गागरोन का किला

झालावाड़ में हमारी मंजिल है गागरोन फोर्ट। गागरोन का किला। रेलवे स्टेशन पर एक आटो रिक्शा वाले से बात हुई। उन्होंने किला घूमाने और वापस शहर छोड़ देने के लिए वाजिब कीमत मांगी। तो मैं उनके साथ चल पड़ा किले की ओर। आटो वाले का नाम विनोद सिंह है। (मोबाइल नंबर – 96028 66751 ) आप कभी झालावाड़ जाएं तो उनके साथ घूम सकते हैं।
गागरोन का किला रेलवे स्टेशन से 9 किलोमीटर और मुख्य बाजार से 5 किलोमीटर की दूरी पर है। तो चलिए चलते हैं। आटो रिक्शा शहर पार करके ग्रामीण इलाके से होते हुए एक बरसाती नदी को पार करता है। इसके बाद हम किले के मुख्य द्वार तक पहुंच चुके हैं। यह किला राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग के अधीन है। अपना टिकट लेने के बाद सुरक्षा गार्डों से मैं आटो रिक्शा अंदर ले जाने का अनुरोध करता हूं। मुझे यह अनुमति मिल जाती है। पहला फायदा पैदल कम चलना पड़ेगा दूसरा फायदा की हमारे आटो वाले अच्छे गाइड भी हैं। उनका सानिध्य मिलेगा।
गागरोन का किला – राजस्थान के कुछ दूसरे किलों के साथ गागरोन का किला 2013 में यूनेस्को के विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल किया गया। तो कुछ तो खास बात है इस किले में। पहली बात की यह किला दो नदियों के संगम पर बना है। एक तरफ सिंध नदी तो दूसरी तरफ आहू नदी बहती है। इसलिए कहीं से भी आक्रमणकारियों को इन नदियों को पार करके ही आना होगा। तो सामरिक तौर पर यह किला अति सुरक्षित है। किले के प्रवेश द्वारा पर सूफी संत मीठे शाह की दरगाह है।


किले की नींव नहीं – एक और खास बात है जो इस किले तो बाकी दुर्ग से काफी अलग करती है। यह भारत का एकमात्र ऐसा किला है जिसकी को नींव नहीं है। बस किला बनता चला गया। यह अनगढ़ शैली में बना प्रतीत होता है बिना किसी डिजाइन के। पर धीरे धीरे विशाल रूप लेता गया। इतिहासकारों के मुताबिक दुर्ग का निर्माण सातवीं सदी से 14वीं सदी तक चलता रहा।

वैसे गागरोन किले का निर्माण मुख्य रूप से डोड राजा बीजलदेव ने बारहवीं सदी में करवाया था। यहां अगले 300 साल तक यहां खींची वंश का राज्य रहा। इस किले से कुल 14 युद्ध और दो जौहर हुए। तीन तरफ से पानी से घिरा होने है इस कारण इसे जलदुर्ग के नाम से भी पुकारा जाता है। यह एकमात्र ऐसा किला है जिसमें तीन परकोटे बने हैं। सामान्यतया सभी किलो के दो ही परकोटे होते हैं। कुछ लोग इस किले को हाउंटेड यानी भुतहा भी मानते हैं। एक टीवी चैनल पर हाउंटेड किलों की सूची में इस किले को लेकर कार्यक्रम प्रसारित हुआ था, उसके बाद किले के बारे में देश भर के लोगों ने ज्यादा जाना।  

हजारों महिलाओं ने किया था जौहर - जब यहां के शासक अचलदास खींची मालवा के शासक होशंग शाह से हार गए थे तो यहां की राजपूत महिलाओं ने खुद को दुश्मनों से बचाने के लिए जौहर (जिंदा जला दिया) कर दिया था। सैकड़ों की तादाद में महिलाओं ने मौत को गले लगा लिया था। अचलदास खींची गागरोन के अंतिम प्रतापी नरेश थे। 1423 ई. में मांडू के सुल्तान होशंगशाह ने 30 हजार घुड़सवार, 84 हाथी और पैदल सेना लेकर कई राजाओं के साथ इस दुर्ग को घेर लिया। अचलदास इस युद्ध में राजपूती परंपरा में बहादुरी लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इस दौरान दुश्मन से बचने के लिए हजारों महिलाओं ने किले में जौहर किया था। इसके बाद सैकड़ो साल तक यह दुर्ग मुस्लिम शासकों के अधीन रहा।
किले के चारों तरफ पदयात्रा करते हुए नदी की जलधारा का बना मनोरम नजारा दिखाई देता है। बारिश के दिनों में इन नदियों में पानी बढ जाता है, तब इस किले को देखने का आनंद भी बढ़ जाता है।


हुक्का पीने की आवाज आती थी - किले मे राजा अचल दास के शयन कक्ष और उनके पलंग को लेकर कई बातें कही जाती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यहां से रोज रात को कई तरह की आवाजें आती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि पलंग के पास से हुक्का पीने की आवाज आती थी। जब यह दुर्ग मुस्लिम शासकों के कब्जे में आया तो भी अचलदास के शयन कक्ष और उनके पलंग से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई। किले के अंदर एक मंदिर भी है। यह मंदिर खींची राजाओं द्वारा स्थापित है। इसमें आज भी पूजा अर्चना होती है। किले के आसपास अब गांव बस गया है।
हालांकि गागरोन दुर्ग को करीब से देखना अत्यंत रोचक अनुभूति है, पर यहां दैनिक तौर पर सैलानियों का आमद कम ही होती है। पर किले के बारे में सुनकर अक्सर यहां विदेशी सैलानी पहुंचते रहते हैं।  
( RAJSTHAN, GAGRON FORT,  JHALAWAR CITY , REMEMBER IT'S A WORLD HERITAGE SITE)
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Friday, July 20, 2018

कोटा से झालावाड़ वाया रामगंज मंडी

रोज सुबह सात बजे कोटा से झालावाड़ के लिए पैसेंजर ट्रेन चलती है। इलेक्ट्रिक इंजन से चलने वाली यह पैसेंजर ट्रेन 25 रुपये किराया में 98 किलोमीटर का सफर सुगमता से कराती है। इतनी दूर बस से जाना चाहें तो 100 रुपये लग जाएंगे। सुबह सुबह कोटा जंक्शन पहुंच गया हूं। कोटा झालावाड़ पैसेंजर 7 बजे है। इससे पहले कोटा रतलाम पैसेंजर मिल गई। यह छह बजे ही खुलती है। इसमें जगह मिल गई और मैं रामगंज मंडी तक का सफर इस ट्रेन से करता हूं। 73 किलोमीटर का सफर आराम से गुजरा। रामगंज मंडी में स्टेशन से बाहर निकल कर नास्ता। और क्या पोहा और जलेबी। 20 रुपये में। मेरे पास एक घंटा है। 8.35 में झालावाड़ पैसेंजर आएगी। तब रामगंज मंडी रेलवे स्टेशन के बाहर सड़क पर चहलकदमी। रामगंज मंडी कोटा जिले का शहर है।


धनिया के लिए मशहूर - पर यह धनिया के लिए मशहूर है। यहां धनिया की बहुत बड़ी मंडी है। बताया जाता है कि मसालों की सबसे बड़ी कंपनी एमडीएच भी धनिया पाउडर बनाने के लिए धनिया रामगंज मंडी से खरीदती है। आसपास के गांव के लोग खूब धनिया बोते हैं। सीजन मे मंडी धनिया के बोरों से पट जाती है। एक दिन में 20 हजार बोरी तक धनिया आ जाता है यहां की मंडी में। साल 2018 में मौसम अनुकूल होने के कारण धनिया का उत्पादन बंपर हुआ है।
झालावाड़ तक रेलमार्ग बन जाने के बाद कोटा से रतलाम के बीच रामगंज मंडी रेलवे स्टेशन अब जंक्शन बन चुका है। कोटा जिले के रामगंज मंडी से झालावाड़ शहर की दूरी 26 किलोमीटर है जो रेल नेटवर्क से अब जुड़ गया है।
साल 2012 से इस मार्ग पर रेल चल रही है पर मार्च 2016 में झालावाड विद्युतीकृत रेल नेटवर्क से जुड़ गया। अब कोटा से झालावाड सिटी के बीच कोटा से वाया रामगंज मंडी पैसेंजर ट्रेन का संचालन होता है। रामगंजमंडी-भोपाल ब्राडगेज रेल परियोजना से कोटा-झालावाड से भोपाल के लिए कम दूरी का वैकल्पिक मार्ग मिल जाएगा। नई रेलवे लाइन के भोपाल से रामगंज मंडी तक लगभग 287 किलोमीटर होगी।

इसके तहत रामगंज मंडी जंक्शन से झालावाड़ तक 27 किलोमीटर रेलवे लाइन तो बिछाई जा चुकी है। आगे झालवाड से अकलेरा-ब्यावरा के बीच काम शुरू कर दिया गया है । झालावाड़ से अकलेरा के बीच चार स्टेशन बने हैं। यह सफर आधे घंटे में तय हो जाएगा। इसमें झालरा पाटनजूनाखेड़ाआमेठा और अकलेरा स्टेशन बने हैं।
झालावाड ब्यावरा रूट पर तीन सुरंगे भी बनाई जा रही हैं। सबसे बड़ी टनल घाटोली में बनेगी। झालावाड़ से अकलेरा-ब्यावरा के बीच 14 नए रेलवे स्टेशन और तीन सुरंगे बनेंगी। इसमें एक अकलेरा में दूसरी पिछोला तीसरी घाटोली में होगी। सबसे बड़ी सुरंग एक किलोमीटर की घाटोली में होगी। रामगंजमंडी से भोपाल बड़ी रेल लाइन परियोजना के तहत 165 किलोमीटर के ब्यावरा तक के रूट के लिए अनुमानित लागत 1450 करोड़ रुपये तय की गई है। इस कार्य को 2021 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। ब्यावरा मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले का शहर है।

रामगंज मंडी  में एक घंटा गुजर गया है। ठीक 8.35 मे झालावाड पैसेंजर आकर लग गई है। मुझे आसानी से खिड़की वाली सीट मिल गई है। अगला स्टेशन से जुल्मी। हां जी जुल्मी। सही सुना आपने। इसके बाद का स्टेशन झालावाड़ है। रेल पटरियों के दोनों तरफ पथरीले रास्ते हैं। झालावाड़ सिटी रेलवे स्टेशन काफी सुंदर है। यह फिलहाल आखिरी रेलवे स्टेशन है। सारे लोग उतर रहे हैं तो हम भी उनके साथ हो गए।
(KOTA, RAMGANJ MANDI, JHALAWAR CITY, RAJSTHAN, CHAMBAL RIVER )

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

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Thursday, July 19, 2018

कोटा उम्मीदों का शहर, सपनों का शहर

चंबल नदी के किनारे बसा कोटा शहर अब देश भर में अपनी नई पहचान रखता है। कोटा कोचिंग हब बन चुका है। कभी यह शहर कोटा स्टोन के लिए जाना जाता था। रात को आठ बजे के आसपास कोटा बस स्टैंड पर उतरा हूं। यहां से शेयरिंग आटो से रेलवे स्टेशन पहुंच गया हूं। कोटा रेलवे स्टेशन का भवन बाहर से सुंदर लग रहा है। स्टेशन के मुख्य भवन के बाहर रंग बिरंगे फव्वारे स्टेशन भवन की सुंदरता और बढ़ा रहे हैं।
कोटा मथुरा से मुंबई मार्ग का अति व्यस्त रेलवे स्टेशन है। मैं अनगित बार कोटा से होकर गुजरा हूं। पर कोटा में उतरने का कभी मौका नहीं मिला। मेरे एक पत्रकार साथी अनिल भारद्वाज कोटा के रहने वाले हैं। पर संयोग है कि जब मैं कोटा आया हूं वे शहर के बाहर हैं। इसलिए उनसे मिलना नहीं हो सका।
कोटा रेलवे स्टेशन पश्चिम मध्य रेलवे जोन में आता है। पश्चिम मध्य रेलवे जोन का मुख्यालय जबलपुर में है। कोटा देश के सौ अति व्यस्त रेलवे स्टेशनों में शामिल है। 1987 से ही यह मार्ग विद्युतीकृत है। स्टेशन भवन के पास ही मंडल रेल प्रबंधक का कार्यालय है। यहां पर रेल कर्मचारी यूनियन के कई पोस्टर लगे हैं। इनमें एक पोस्टर में प्रधानमंत्री जी से मांग की गई है कि रेलवे में पुरानी पेंशन योजना को फिर लागू किया जाए। इसके लिए रेल कर्मचारी प्रधानमंत्री को पत्र लिख रहे हैं। उन्हें एनपीएस में जाना रास नहीं आ रहा है।
रेलवे स्टेशन पर हरियाणा की लोकप्रिय गायिका सपना चौधरी के कार्यक्रम का पोस्टर लगा है। सपना अब हरियाणा से निकल कर राजस्थान, यूपी और बिहार में जाकर स्टेज शो कर रही हैं।
मुझे सुबह झालावाड़ की ट्रेन लेनी है तो रात को यहां रुकना है। स्टेशन के बाहर बायीं तरफ राम मंदिर रोड पर एक होटल में ठिकाना बनाया है। सिंगल कमरा 300 रुपये में। अब रात की पेट पूजा करनी है। पर इसके पहले थोड़ा सड़क पर टहलने निकल पड़ता हूं।
आगे चलकर राम मंदिर में प्रवेश कर गया। यह कोटा शहर का अति सुंदर मंदिर है। परिसर काफी बड़ा है। मुख्य मंदिर में रामजी का सुंदर दरबार सजा है। मंदिर परिक्रमा पथ में राम जानकी के अलावा दूसरे देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित है। यहां थोडा वक्त गुजारना काफी अच्छी अनुभूति देता है। मंदिर में शहर व्यापारी वर्ग के लोगों की आवाजाही लगी रहती है। मंदिर प्रबंधन की ओर से कई कार्यक्रमों का भी नियमित आयोजन किया जाता है। मंदिर की ओर से चिकित्सालय और धर्मशाला का भी संचालन किया जाता है। मंदिर सुबह 5 बजे खुल जाता है। अगले दिन सुबह ट्रेन पकड़ने से पहले एक बार फिर मैं राम मंदिर में मत्था टेकने पहुंच जाता हूं।
कोटा शहर के हर इलाके में कोचिंग संस्थान और हास्टल की भरमार है। इन कोचिंग संस्थानों ने कोटा शहर की अर्थव्यवस्था बदल दी है। देश भर से छात्र यहां जागती आंखों में सपना लेकर आते हैं और कई सालों तक जमकर इंजीनयरिंग या मेडिकल की तैयारी करते हैं। बड़ी संख्या में छात्रों का चयन भी हो जाता है। तो कुछ हिस्से में निराशा भी आती है। लेकिन कोटा तो उम्मीदों का शहर है। सपनों का शहर है।
(KOTA, RAJSTHAN, CHAMBAL,  COACHING CITY )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Tuesday, July 17, 2018

बिजौलिया का किसान आंदोलन और विजय सिंह पथिक

मेनाल के मंदिर दर्शन के बाद आधा किलोमीटर पैदल चलकर मैं भीलवाडा – कोटा हाईवे पर आ जाता हूं। यहां एक दो लाइन होटल हैं और जोगणिया माता मंदिर की तरफ जाने वाले रास्ते का प्रवेश द्वार है। बस अंधेरा होने ही वाला है। कुछ मिनट इंतजार के बाद कोटा की तरफ जाने वाली बस दिखाई दे गई। मैंने बस को हाथ दिया और बस रूक गई। अब मैं कोटा की तरफ जा रहा हूं। बस हाईवे पर सरपट भाग रही है। पहले आरोली बाजार आया, फिर बस बिजौलिया नामक कस्बे में जाकर रुक गई। यहां तकरीब 20 मिनट का ठहराव था।

यह बिजौलिया भीलवाड़ा जिले में पड़ता है। पर मुझे पता चलता है कि राजस्थान के प्रजा-मंडल आन्दोलन में विशिष्ट स्थान रखता है। यहीं से महान स्वतंत्रता सेनानी और गुर्जर समाज के गौरव विजय सिंह 'पथिकके नेतृत्व में जागीरदारी के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत हुई थी। यह स्वतंत्रता से पहले देश का प्रमुख किसान आंदोलन था। 27 फरवरी 1882 को विजय सिंह पथिक का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुठावली कलां गांव में हुआ था। उनकी मृत्यु 28 मई 1954 को हुई।

पथिक का युवावस्था में ही सम्पर्क रास बिहारी बोस और शचीन्द्र नाथ सान्याल जैसे क्रान्तिकारियों से हो गया था। साल 1915 के लाहौर षड्यन्त्र के बाद उन्होंने अपना असली नाम भूप सिंह गुर्जर से बदल कर विजय सिंह पथिक रख लिया था। बाद में हमेशा इसी नाम से जाने जाते रहे। महात्मा गांधी के सत्याग्रह आन्दोलन से भी पहले 1916 में पथिक ने राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के बिजौलिया में किसानों का आंदोलन खड़ा कर किसानों में स्वतंत्रता के लिए अलख जगाने का काम किया था। तब बिजौलिया उदयपुर रियासत में आता था। यहां के किसान अंग्रेजों द्वारा मालगुजारी के तौर पर ज्यादा राशि वसूले जाने से परेशान थे। किसानों पर 84 तरह के कर लगाए जाते थे। पथिक ने कई साल इस आंदोलन का नेतृत्व किया। 1919 में मुंबई जाकर गांधी जो को किसानो की करुण दशा सुनाई। पथिक उच्च कोटि के पत्रकार भी थे। उन्होने वर्धा में रहकर राजस्थान केसरी नामक पत्र निकाला। बाद में अजमेर से नवीन राजस्थान नामक पत्र भी निकाला।

बिजौलिया के गांधी - पथिक को बिजौलिया का गांधी भी कहा गया। 1921में पथिक ने बेगू, पारसोली, भिन्डर, बस्सी और उदयपुर में शक्तिशाली आन्दोलन खड़ा किया। बिजौलिया दूसरे क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया। अंतत: ब्रिटिश सरकार ने जी हालैण्ड को बिजौलिया किसान पंचायत बोर्ड और राजस्थान सेवा संघ से बातचीत करने के लिए नियुक्त किया। दोनो पक्षों में समझौता हुआ और किसानों की तमाम मांगें मान ली गईं। कुल 84 में से 35 लागन माफ हुए। यह किसानों की बड़ी जीत थी।
पैनोरमा बनाने की मांग - मांडलगढ़ में विजय सिंह पथिक की पुण्यतिथि 28 मई 2018 में मनाई गई। इस मौके पर राजस्थान गुर्जर महासभा ने सरकार से मांग रखी कि बिजौलिया किसान आंदोलन के नायक विजय सिंह पथिक का पैनोरमा बिजौलिया में बनाया जाएजिससे आने वाली पीढ़ियां पथिक के जीवन से प्रेरणा ले सकें। 
बिजौलिया की ऐतिहासिक बावड़ियां और मंदिर - बिजौलिया में कुछ ऐतिहासिक इमारते भी हैं। यहं पर प्रसिद्ध मंदाकिनी मंदिर एवं कुछ बावडियां स्थित हैं। ये मंदिर 12 वीं शताब्दी के बने हुए हैं। लाल पत्थरों से बने ये मंदिर पुरातात्विक व ऐतिहासिक महत्व के हैं।
बस बिजौलिया से आगे चल पडी है। आगे बूंदी जिले का डाबी नामक कस्बा आता है। कुछ देर बाद बस राजस्थान के सबसे बड़े शहरों में से एक कोटा में प्रवेश कर चुकी है। बस हमें कोटा के बस स्टैंड में उतार देती है। पर मुझे अगले दिन सुबह रेल से सफर करना है इसलिए मैं बस स्टैंड से आटो पकड़कर रेलवे स्टेशन के लिए चल देता हूं। कोटा रेलवे स्टेशन के पास राम मंदिर रोड पर एक होटल में रात के लिए ठिकाना बनाता हूं।  
(BIJAULUA, RAJSTHAN, VIJAY SINGH PATHIK, FARMER MOVEMENT ) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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रात में राजस्थान का बिजौलिया शहर। 

Monday, July 16, 2018

मानसून में चलें - मेनाल, मनमोहक महानालेश्वर मंदिर

जोगणिया माता के दर्शन के बाद मैं आगे की यात्रा के लिए बस का इंतजार कर रहा हूं। पर दो घंटे इंतजार के बाद बस नहीं आई। यहां से हाईवे पर पहुंचने के दो रास्ते हैं 20 किलोमीटर दूर काटूंदा मोड़ या फिर 7 किलोमीटर दूर मेनाल। एक स्थानीय दुकानदार ने सलाह दी अब बस आने की उम्मीद नहीं है। आप पैदल मेनाल निकल जाओ। मुझे आगे कोटा की बस लेनी है। कोई उपाय न देख मैं पैदल मेनाल के लिए चल पड़ता हूं। जोगणिया माता और मेनाल के बीच 6 किलोमीटर कोई आबादी नहीं है। निर्जन वन क्षेत्र से होकर पक्की सड़क जा रही है। एक किलोमीटर चलने के बाद मुझे मेनाल 6 किमी का मील का पत्थर दिखाई देता है।

तभी पीछे से एक हीरो होंडा बाइक पर दो युवक आते दिखाई देते हैं। मैं उन्हें इशारा करके लिफ्ट मांगता हूं। बाइक पर तीसरी सवारी के तौर पर वे मुझे लिफ्ट दे भी देते हैं। रास्ते में उनसे थोड़ी बात होती है। वे मांडलगढ़ इलाके के रहने वाले हैं। मेनाल से मुझे कोटा की बस पकड़नी है। तभी मुझे अपने बायीं तरफ एक मंदिर दिखाई देता है। मैं उनसे पूछता हूं। वे बताते हैं कि यह मेनाल का ऐतिहासिक मंदिर है। आप तो घूमने ही निकले हो तो इस मंदिर को देख ही लो। बस तो आधे घंटे बाद भी मिल जाएगी। बस मैं उनसे आग्रह करता हूं और वे हमें मेनाल के ऐतिहासिक मंदिर के प्रवेश द्वार पर छोड़ देते हैं। उनका बहुत बहुत धन्यवाद।


महादेव शिव का 12वीं सदी में बना अनूठा मंदिर 
राजस्थान के भीलवाड़ा जिले का मेनाल ग्राम। यहां स्थित है महादेव शिव का अनूठा मंदिर। यह मंदिर अपने नैसर्गिक वैभव और शानदार कलाकृतियों के लिए जाना जाता है। मंदिर के पास ही बेहद खूबसूरत जल प्रपात है। मेनाल भीलवाडा जिले में मांडलगढ़ से 20 किलोमीटर दूर चितौडगढ़ की सीमा पर स्थित है। मेनाल का महानालेश्वर मंदिर 12 वीं शताब्दी के चौहान कला का सुंदर नमूना है। इसका निर्माण 1164 में पृथ्वीराज चौहान द्वितीय ने करवाया था। मंदिर का तोरण द्वार जयचंद और संयोगिता ने बनवाया था। लाल पत्थरों से निर्मित महानालेश्वर मंदिरइससे थोड़ी दूर पर स्थित रूठी रानी का महल और हजारेश्वर मंदिर यहां देखने योग्य हैं। 

महानालेश्वर मन्दिर पत्थर जड़े बड़े चौक के बीच में स्थित है। मंदिर के आगे विराज रहे नन्दी की प्रतिमा खंडित है। इस मन्दिर की बाहरी दीवारों पर बेल-बूटों और फूलों के बीच देवताओं की अनेक मूर्तियां बनी हैं। इन मूर्तियों में कई कामकला से जुडी हैं। मेनाल का यह मंदिर राजस्थान का ऐलोरा प्रतीत होता है। मन्दिर के मण्डप और शिखर के बीच एक ऊंचे विमान  पर एक विशाल शेर की मूर्ति बनाई गई है। इसके एक बगल में एक हाथी बैठा है। मंदिर परिसर में शिव के अलावा गौरी और गणेश के भी मन्दिर बने हैं। परिसर में कुछ और भवन बने हैं, जिनके बारे में बताया जाता है कि कभी वे धर्म शिक्षा के विद्यालय हुआ करते थे। इस परिसर में कभी सैकड़ो छात्र रहकर शिक्षा प्राप्त किया करते थे।  


 महानालेश्वर मन्दिर के ठीक सामने का द्वार जिस स्थल पर खुलता है ठीक उसी बिन्दु पर  मेनाल नदी झरने के रूप में सौ फीट से ज्यादा नीचे गिरती है। नदी के पाट के पार एक और शिव मन्दिर और मठ बना है। यह मंदिर 1170 में महारानी सूया देवी ने बनवाया था। इसे लोग रूठी रानी का मंदिर भी कहते हैं। 

महानाल या मेनाल - मेनाल वास्तव में पुरातत्व, धर्म और पर्यटन का अनोखा संगम है।  मेनाल के मंदिर के पास एक बरसाती नदी ग्रेनाइट की चट्टानों पर वेग से बहती हुई आती है और घोड़े की नाल की आकृति वाले एक गहरे गड्ढे में जा गिरती है। यहां एक खूबसूरत झरने का निर्माण होता है। तो झरने का नाम हुआ महानाल। यही शब्द लगता है कि अपभ्रंश हो कर बाद में मेनाल बन गया।


मेनाल को 1956 से भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया। वर्तमान में यहां की देखभाल भारत सरकार पुरातत्व विभाग (एएसआई) करता है। पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां पर विभाग द्वारा एक होटल भी स्थापित किया गया है।

बारिश में निखर जाता है सौंदर्य - मेनाल में वैसे तो पुरे साल भर लोग घूमने के लिए आते रहते हैं पर यहां पर आने का सबसे अच्छा समय बरसात का है। उस समय मेनाल का झरना बहुत ज्यादा तेजी से नीचे की और गिरता है और चारों और बहुत ज्यादा हरियाली होती है। बरसात के सीजन में यहां सैलानियों का तांता लगा रहता है। रविवार को यहां सैलानियों की संख्या ज्यादा होती है।

कैसे पहुंचे - मेनाल चित्तौड़-कोटा राज मार्ग पर स्थित बूंदी से करीब 100 किमी दूरी पर स्थित है। चित्तौड़गढ़ से करीब 70 किमी की दूरी पर स्थित है। वहीं कोटा से मेनाल की दूरी 86 किलोमीटर है।
( MENAL , SHIVA TEMPLE, RAJSTHAN ) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
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Sunday, July 15, 2018

यहां हथकड़ी चढ़ाने से मुकदमे से मिलती है निजात

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के बेगूं कस्‍बे में जोगणिया माता का मंदिर है। इसके बारे में ऐसी ही मान्‍यता है कि लोग यहां हथकड़ीचढाते हैं। माना जाता है कि जो अपराधी पुलिस से पीछा छुडाना चाहते है वह यहां आकर यदि हथकड़ी चढ़ा देते हैं तो पुलिस और मुकदमे से निजात मिलती है। कहा जाता है कि अपराधी यहां भविष्‍य में अपराध न करने कसम खाता कर यहां हथकड़ियां बंधता है तो कुछ दिनों बाद ही हथकड़ियां अपने आप खुल जाती हैं।
ऊपरमाल पठार के दक्षिणी छोर पर जोगणिया माता का प्रसिद्ध मन्दिर स्थित है।


 माना जाता है कि इस मन्दिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में हुआ। लोकमान्यता है कि पहले यहां अन्नपूर्णा देवी का मन्दिर था। माता द्वारा पर्चा देने और चमत्कार दिखने की अनेक कथाएं लोक मानस में प्रचलित है। मनोकामना पूरी होने पर मन्दिर परिसर में मुर्गे छोड़कर जाने की भी प्रथा है।

लोक आस्था की देवी - जोगणिया माता लोक आस्था की देवी है। एक चमत्कारी देवी के रूप में उनकी मान्यता है। देवी मन्दिर के प्रवेश द्वार पर दो  शेरों की सजीव आकृतियां बनी हैं। मन्दिर के गर्भगृह में महाकालीमहालक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित है। मन्दिर परिसर में दो शिव मन्दिर बने हैं जहां सालों भर गोमुख से रिस-रिसकर जलधारा बहती है। जोगणिया माता परिसर की देव प्रतिमाओं में पद्मासनस्थ शिवअष्टभुजी नटराज और स्थानक सूर्य की प्रतिमायें बहुत सजीव और कलात्मक हैं। पर्वतमाला और सुरम्य वन्य प्रदेश के बीच स्थित होने के कारण मन्दिर का नैसर्गिक सौन्दर्य लोगों को मोह लेता है।

जोगणिया
 माता की कृपा से मनोवांछित फल पाने के लिए श्रद्धालु बड़ी संख्या में देवी के इस मन्दिर में आते हैं। माता द्वारा पर्चा देने और चमत्कार दिखने की अनेक कथाएं लोक मानस में खूब प्रचलित है। मन्दिर से एक किलोमीटर पर बम्बावदागढ़ का किला है जहां हाडा शासक बम्बदेव का शासन था। जनश्रुति है कि बम्बावदागढ़ के अन्तिम शासक देवा हाड़ा ने देवी अन्नपुर्णा को अपनी पुत्री के विवाह में आशीर्वाद देने हेतु आमन्त्रित किया। देवी अपने प्रति आस्था की परीक्षा लेने हेतु जोगन का रूप धारणं कर विवाह समारोह में आई लेकिन देवी को इस रूप में कोई पहचान नहीं सकाइसके कारणउन्हें यथेष्ठ सम्मान नहीं मिला। बाद में देवी एक  सुन्दर युवती का वेश धारण कर विवाह स्थल पर फिर से आयी तो सम्मरोह में आए अनेक लोग इस युवती के सौन्दर्य पर मुग्ध हो गए तथा उसे अपने साथ ले जाने हेतु आपस  में लड़ने लगे। स्वयं देवा हाडा भी इस युद्ध में घायल हो गया।

तत्पश्चात
 देवा हाड़ा ने अन्नपूर्णा देवी के मन्दिर में काफी अरसे तक उनकी आराधना की। इसके बाद देवी के आदेश से वह बूंदी चला गया और मेवाड़ के  महाराणा  हम्मीर  की सहायता  से सन 1341 में बूंदी पर हाडा राजवंश का  शासन स्थापित किया। देवा हाड़ा की पुत्री के विवाह में जोगन का रूप धारण करने के बाद से ही वे अन्नपूर्णा के बजाय जोगणियामाता के नाम से लोक में प्रसिद्ध हुई।
प्रसिद्ध पर्यटन स्थल
 मेनाल से मात्र सात किलोमीटर दूर होने कारण वहां आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक भी जोगणिया माता के दर्शनार्थ मन्दिर में आते हैं।

कैसे पहुंचे - चित्तौड़गढ़ से लगभग 85 किलोमीटर दूर राजस्थान और मध्य प्रदेश राज्यों की सीमा पर जोगणिया माता का मंदिर स्थित है। भीलवाड़ा-कोटा हाईवे पर मेनाल से उतर कर मंदिर पहुंचना सहज है। मेनाल से मंदिर की दूरी 7 किलोमीटर है।

मंदिर का जीर्णोद्धार जारी मैं जब जोगणिया माता के मंदिर में पहुंचा हूं तो देख रहा हूं कि मंदिर का जीर्णोद्धार जारी है। बताया जा रहा है कि जोगणिया माता मंदिर का शिखर 71 फीट ऊंचा होगा। इसका जीर्णोद्धार करोड़ों की लागत से हो रहा है।

   (JOGANIA MATA TEMPLE, MENAL )

    --- विद्युत प्रकाश मौर्य 
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Thursday, July 12, 2018

मध्यम वर्गीय परिवार का पसंदीदा स्कूटर – टीवीएस जुपिटर


एक मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार सुबह से शाम तक जिंदगी की भागदौड़ में संघर्ष करता हुआ जीता है। बच्चे को स्कूल भेजना, दफ्तर जाना, शापिंग करना, रेलवे स्टेशन बस स्टाप तक की भागदौड़। इस भागदौड़ में अगर उसके पास एक स्कूटर हो तो जिंदगी आसान बन जाती है। पर स्कूटर कौन सा हो। कई स्कूटरों से तुलना के बाद हमारी नजर टीवीएस जुपिटर पर जाकर टिकती है। साल 2013 में टीवीएस द्वारा लांच इस स्कूटर को खासतौर पर 30 से 45 साल के उम्र के लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। पर ऐसी खूबियां है कि यह 18 से 30 और 45 से 70 साल के लोगों को भी खूब पसंद आ सकता है।
ज्यादा का फायदा
अगर हम बाजार में उपलब्ध 4 स्ट्रोक वाले गेयरलेस स्कूटरों के मॉडल का तुलनात्मक अध्ययन करें तो टीवीसी का जुपिटर कई मामलों में ज्यादा सुविधाजनक है। जैसे बार बार पेट्रोल डालने के लिए सीट खोलने की जरूरत नहीं। फ्यूल टैंक का ढक्कन बाहर उपलब्ध है।


जुपिटर में मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट बना है। सफर शुरू करने के साथ अपना मोबाइल चार्जिंग में लगा दिजिए। जुपिटर हैंडल और सीट के बीच दूसरे माडल की तुलना में ज्यादा लेग स्पेस भी प्रदान करता है। और इन सबसे आगे अगर आपको प्रति लीटर पेट्रोल में ज्यादा माइलेज मिले तो सोने पर सुहागा। तो 110 सीसी इंजन वाला स्कूटर जुपिटर मानक स्थितियों में 62 किलोमीटर प्रति लीटर माइलेज का दावा करता है। इसलिए जुपिटर ने अपने एड कंपेन का नारा दिया है ज्यादा का फायदा।

नौजवान और बुजुर्गों की भी पसंद
शानदार पिकअप और मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट जैसी सुविधा जुपिटर को युवा वर्ग की पसंद बनाती है। तो बड़े ही श्रम से पाई पाई कमाने में जिंदगी गुजार चुके बुजुर्गों के नजरिए से देखें तो अपने सिगमेंट में सबसे ज्यादा माइलेज इसे प्रौढ़ लोगों की भी पसंद बनाता है। वजन में हल्की और बड़े पहिए इसे और भी खास बनाते हैं।
फेमिली बाइक – यूनीसेक्स बाइक
टीवीएस मोटर्स के जनरल मैनेजर वैकिल प्रोग्राम पवन भास्करराव पवार कहते हैं कि वास्तव में टीवीएस जुपिटर एक फेमिली बाइक या यूनीसेक्स बाइक है जिसे मम्मी, पापा, दादा-दादी और बच्चे को भी लेकर फर्राटा भर सकता है। अपनी इन सारी विशेषताओं के बीच टीवीएस जुपिटर ने पिछले दिनों हिंदी फिल्मों के मेगा स्टार अमिताभ बच्चन को अपना ब्रांड एंबेस्डर बनाया है।

तमिलनाडु के कृष्णागिरी जिले का औद्योगिक शहर होसुर, जहां कई नामचीन ब्रांड के प्लांट लगे हैं यहीं बनता है टीवीएस जुपिटर। बेंगलुरु शहर से 40 किलोमीटर के सफर के बाद कर्नाटक की सीमा खत्म होते ही जैसे ही आप तमिलनाडु में प्रवेश करते हैं टीवीएस का विशाल हरा भरा प्लांट आ जाता है। 400 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैले टीवीएस प्लांट में जुपिटर का उत्पादन होता है। यहीं पर टीवीएस के दूसरे लोकप्रिय ब्रांड टीवीएस एक्सएल हेवी ड्यूटी मोपेड, टीवीएस किंग तिपहिया और टीवीएस के कुछ बाइक माडल का भी उत्पादन होता है। उत्तर भारत में सुलभ ढंग से सप्लाई के लिए हिमाचल प्रदेश के नालागढ़ में भी प्लांट लगाया है।

इंजन एसेंबलिंग में 90 फीसदी महिलाएं
टीवीएस के होसुर प्लांट में जुपिटर को बनते हुए देखना बड़ी ही सुखद अनुभूति है। फैक्ट्री में प्रवेश के साथ ही सबसे पहले हम इंजन का निर्माण देखते हैं। इसमें बड़ी संख्या में रोबोट काम करते दिखाई देते हैं। इंजन की एसेंबलिंग प्लांट में 90 फीसदी महिलाएं कार्यरत है। यह महिला सशक्तिकरण का बेहतरीन उदाहरण है। टीवीएस प्रबंधन ने महिलाओं को बड़ी संख्या में रोजगार देने को लेकर अपनी ओर से विशेष सक्रियता दिखाई है।

रोबोट बनाते हैं स्कूटर
टीवीएस जुपिटर का इंजन पूर्णतः धूल रहित वातावरण में तैयार होता है। स्कूटर के मेटल और प्लास्टिक वाले हिस्से के पेंट का काम भी अत्याधुनिक प्लांट में रोबोट करते हैं। पर उनकी मदद के लिए युवा इंजीनियर्स भी तैनात हैं। इसके बाद शुरू होती है अलग अलग पार्ट्स की एसेंबलिंग की प्रक्रिया। तमाम जिम्मेवार लोग हर चरण में एसेंबलिंग प्रक्रिया की जांच में लगे रहते हैं।

हर 27 सेकेंड में एक नया स्कूटर
निर्माण की सारी प्रक्रिया से गुजरते हुए हर 27 सेकेंड में एक नया टीवीएस जुपिटर स्कूटर तैयार होकर बाहर आ जाता है। यानी हर मिनट में दो स्कूटर। टीवीएस की फैक्टरी में दो शिफ्ट में काम होता है। फैक्टरी के अंदर कामकाज में गजब का अनुशासन दिखाई देता है। यह त्रुटि रहित निर्माण के लिए काफी जरूरी भी है।
पांच दशक से आटोमोबाइल सेक्टर में भरोसेमंद नाम टीवीएस अपने कर्मचारियों की सुविधाओं का भी अच्छा खासा ख्याल रखती है। कंपनी परिसर में विशाल कैंटीन है। यहां रियायती दरों पर भोजन मिलता है। हाल में यहां चपाती बनाने वाली मशीन भी लगाई गई है। भोजन सुस्वादु है। अधिकारी कर्मचारी एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। यहां थाली धोने के लिए आटोमेटिक मशीन लगाई गई है।   
25 लाख लोगों की पसंद बना

साल 2013 में सितंबर महीने में लांच किया गया टीवीएस जुपिटर अब देश में 25 लाख से ज्यादा लोगों की पसंद बन चुका है और स्कूटर के बाजार में तेजी से अपना वर्चस्व बढ़ा रहा है। टीवीएस मोटर्स में डिजाइन इंजीनियर अमित राजावाडे बताते हैं कि हम इसके डिजाइन और एस्थेटिक (सौंदर्य) को लेकर लगातार शोध करते हैं।  इस शोध का परिणाम है जुपिटर का क्लासिग मॉडल। बाहरी कास्मेटिक में कुछ बेहतरीन बदलाव के साथ यह कुछ ज्यादा ही यूथफुल लगता है। जेडी पावर 2018 के सर्वे में टीवीएस जुपिटर को इसके डिजाइन के कारण मोस्ट अपीलिंग स्कूटर का अवार्ड दिया गया है।

तो अब ड्राइव पर चलें - हर सफर का साथी...
तो अब चलते हैं टेस्ट राइड के लिए। टीवीएस जुपिटर को चलाना शानदार अनुभव है। होसुर के हरिता परिसर में 2 किलोमीटर लंबा टेस्ट ड्राईव ट्रैक बना है। हर नए स्कूटर को कम से कम 0.75 किलोमीटर चलाकर इसकी जांच की जाती है।  पर हमने जुपिटर का चलाया 4 किलोमीटर। इस दौरान इसका पिकअप, ब्रेक की जांच की। टेढे मेढ़े रास्तों पर घूमा फिराकर देखा। मुझे तो लगता है कि शहर में ही नहीं लॉंग ड्राईवर पर जुपिटर के साथ निकला जा सकता है। तो आप अगर अपने या अपने परिवार के लिए स्कूटर लेने का मन बना रहे हैं तो एक बार जुपिटर को जरूर देखकर कोई फैसला लें।    
-विद्युत प्रकाश मौर्य

( TVS JUPITER, HOSUR PLANT ) 

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Wednesday, July 11, 2018

चित्तौड़गढ़ से काटूंदा मोड़ और अफीम के खेत

चित्तौड़गढ़ की दाल बाटी खाने के बाद वापस आकर होटल नटराज से चेकआउट किया और बस स्टैंड आ गया।  मैंने पता किया था कि चित्तौड़ और कोटा के रास्ते में जोगणिया माता का प्रसिद्ध मंदिर है। स्थानीय लोगों ने बताया कि कोई बस सीधी जोगणिया माता नहीं जाती, पर आप काटूंदा मोड़ उतर सकते हैं। वहां से जोगणिया माता के लिए दूसरी बस मिल जाएगी। तो मैं एक बस में सवार हो गया काटूंदा मोड का टिकट लेकर। कुछ समय बात बस्सी नामक एक कस्बा आया। कुछ मिनट रुकने के बाद बस आगे चल पड़ी। पारसौली और बिछौर जैसे कस्बे आए रास्ते में।



अफीम की खेती - हाईवे बहुत अच्छा बन चुका है। बस तेजी से दौड़ रही है। तभी रास्ते में  सडक के किनारे खेतों में हरे हरे पौधे लहलहाते नजर आते हैं। ये पौधे किस चीज के हैं। इनमें सुंदर सफेद फूल लगे हैं। सहयात्रियों से पूछने पर पता चला कि ये अफीम के पौधे है। तो इस इलाके में अफीम की खेती होती है। पर अफीम की खेती के लिए सरकार से पट्टा यानी लाइसेंस प्राप्त करना पड़ता है। जितने इलाके में स्वीकृति है उतने ही दायरे में अफीम लगा सकते हैं। सरकार खेतों में एक इंस्पेक्टर बहाल कर देती है। वह खेती की निगरानी करता है। तैयार अफीम की सरकारी खरीद होती है।
किसान इसे कहीं और नहीं बेच सकता है। बिना अनुमति के अगर अफीम बोया तो छापा पडता है और पुलिसिया कार्रवाई भी हो जाती है। अफीम की खेती सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स के अधीन होती है। चित्तौड़गढ़ के अलावा राज्य के झालावाड़, बारां, प्रतापगढ़, भीलवाड़ा में अफीम की खेती होती है। वास्तव में यह एक अत्यधिक महत्वपूर्ण औषधीय फसल हैं। इसमें लगभग 42 से भी अधिक प्रकार के अल्केलॉइट पाए जाते हैं। जिनमे मुख्य रूप मॉरफीन, कोडीन, थीवेन, नारकोटिन तथा पेपेवरिन अधिक ही महत्वपूर्ण हैं। इनका उपयोग विभिन्न प्रकार की दवाइयां बनाने में होता हैं। अफीम के दानों में लगभग 52 फीसदी तेल होता हैं। अफीम के फूल के नीचे वाले हिस्से से डोडा निकलता है। यह भी नशा करने के काम आता है। हालांकि सारा अफीम सरकार खरीद लेती है। पर यह सुनने में आता है कि तय स्टाक सरकार को बेचने के बाद कुछ किसान बचे हुए अफीम को तस्करों के हाथ बेच देते हैं।
मैं बस से काटूंदा मोड पर उतर जाता हूं। यहां हाईवे के बगल में अफीम के पेड़ दिखाई देते हैं। काटूंदा छोटा सा बाजार है। यहां से मुझे जोगणिया माता के लिए दूसरी बस लेनी है। पर दूसरी बस के लिए एक घंटे से ज्यादा इंतजार करना पड़ा। इस बीच काटूंदा मोड के बाजार का मुआयना कर रहा हूं। बाजार में कई म्युजिकल बैंड पार्टी के दफ्तर हैं। उनकी सजी धजी गाड़ियां यहां लगी हुई हैं।
अब जोगणिया माता जाने वाली बस आ गई है। काटूंदा मोड़ से जोगणिया माता मंदिर की दूरी 20 किलोमीटर है। बस रावतभाटा रोड पर जाकर एक ग्रामीण सड़क में मुड़ जाती है। जोगणिया माता का मंदिर चितौड़गढ़ जिले के बेगू तहसील में पड़ता है।
ग्राम पंचायत का नाम रावडदा है। पर यहां पहुंचने के लिए सार्वजनिक वाहनों की कमी है। माता मंदिर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर के आसपास बाजार बन चुका है। यहां पर रात में रुकने के लिए अलग अलग समाज के कुछ धर्मशालाओं का भी निर्माण हुआ है। जाट समाज, गूजर समाज की धर्मशालाओं के बीच मुझे यहां धाकड़ समाज का धर्मशाला दिखाई देता है। हां भाई धाकड़। मतलब जिसकी धाक चलती हो। तो चलिए चलते हैं जोगणिया माता के दरबार में। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KATUNDA MOR, AFIM FARMING, JOGANIA MATA MANDIR )