Monday, July 16, 2018

मेनाल का मोहक महानालेश्वर मंदिर

जोगणिया माता के दर्शन के बाद मैं आगे की यात्रा के लिए बस का इंतजार कर रहा हूं। पर दो घंटे इंतजार के बाद बस नहीं आई। यहां से हाईवे पर पहुंचने के दो रास्ते हैं 20 किलोमीटर दूर काटूंदा मोड़ या फिर 7 किलोमीटर दूर मेनाल। एक स्थानीय दुकानदार ने सलाह दी अब बस आने की उम्मीद नहीं है। आप पैदल मेनाल निकल जाओ। मुझे आगे कोटा की बस लेनी है। कोई उपाय न देख मैं पैदल मेनाल के लिए चल पड़ता हूं। जोगणिया माता और मेनाल के बीच 6 किलोमीटर कोई आबादी नहीं है। निर्जन वन क्षेत्र से होकर पक्की सड़क जा रही है। एक किलोमीटर चलने के बाद मुझे मेनाल 6 किमी का मील का पत्थर दिखाई देता है।
तभी पीछे से एक हीरो होंडा बाइक पर दो युवक आते दिखाई देते हैं। मैं उन्हें इशारा करके लिफ्ट मांगता हूं। बाइक पर तीसरी सवारी के तौर पर वे मुझे लिफ्ट दे भी देते हैं। रास्ते में उनसे थोड़ी बात होती है। वे मांडलगढ़ इलाके के रहने वाले हैं। मेनाल से मुझे कोटा की बस पकड़नी है। तभी मुझे अपने बायीं तरफ एक मंदिर दिखाई देता है। मैं उनसे पूछता हूं। वे बताते हैं कि यह मेनाल का ऐतिहासिक मंदिर है। आप तो घूमने ही निकले हो तो इस मंदिर को देख ही लो। बस तो आधे घंटे बाद भी मिल जाएगी। बस मैं उनसे आग्रह करता हूं और वे हमें मेनाल के ऐतिहासिक मंदिर के प्रवेश द्वार पर छोड़ देते हैं। उनका बहुत बहुत धन्यवाद।

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले का मेनाल ग्राम। यहां स्थित है महादेव शिव का अनूठा मंदिर। यह मंदिर अपने नैसर्गिक वैभव और शानदार कलाकृतियों के लिए जाना जाता है। मंदिर के पास ही बेहद खूबसूरत जल प्रपात है। मेनाल भीलवाडा जिले में मांडलगढ़ से 20 किलोमीटर दूर चितौडगढ़ की सीमा पर स्थित है। मेनाल का महानालेश्वर मंदिर 12 वीं शताब्दी के चौहान कला का सुंदर नमूना है। इसका निर्माण 1164 में पृथ्वीराज चौहान द्वितीय ने करवाया था। मंदिर का तोरण द्वार जयचंद और संयोगिता ने बनवाया था। लाल पत्थरों से निर्मित महानालेश्वर मंदिरइससे थोड़ी दूर पर स्थित रूठी रानी का महल और हजारेश्वर मंदिर यहां देखने योग्य हैं। 

महानालेश्वर मन्दिर पत्थर जड़े बड़े चौक के बीच में स्थित है। मंदिर के आगे विराज रहे नन्दी की प्रतिमा खंडित है। इस मन्दिर की बाहरी दीवारों पर बेल-बूटों और फूलों के बीच देवताओं की अनेक मूर्तियां बनी हैं। इन मूर्तियों में कई कामकला से जुडी हैं। मेनाल का यह मंदिर राजस्थान का ऐलोरा प्रतीत होता है। मन्दिर के मण्डप और शिखर के बीच एक ऊंचे विमान  पर एक विशाल शेर की मूर्ति बनाई गई है। इसके एक बगल में एक हाथी बैठा है। मंदिर परिसर में शिव के अलावा गौरी और गणेश के भी मन्दिर बने हैं। परिसर में कुछ और भवन बने हैं, जिनके बारे में बताया जाता है कि कभी वे धर्म शिक्षा के विद्यालय हुआ करते थे। इस परिसर में कभी सैकड़ो छात्र रहकर शिक्षा प्राप्त किया करते थे।  


 महानालेश्वर मन्दिर के ठीक सामने का द्वार जिस स्थल पर खुलता है ठीक उसी बिन्दु पर  मेनाल नदी झरने के रूप में सौ फीट से ज्यादा नीचे गिरती है। नदी के पाट के पार एक और शिव मन्दिर और मठ बना है। यह मंदिर 1170 में महारानी सूया देवी ने बनवाया था। इसे लोग रूठी रानी का मंदिर भी कहते हैं।
मेनाल वास्तव में पुरातत्व, धर्म और पर्यटन का अनोखा संगम है।  मेनाल के मंदिर के पास एक बरसाती नदी ग्रेनाइट की चट्टानों पर वेग से बहती हुई आती है और घोड़े की नाल की आकृति वाले एक गहरे गड्ढे में जा गिरती है। यहां एक खूबसूरत झरने का निर्माण होता है। तो झरने का नाम हुआ महानाल। यही शब्द लगता है कि अपभ्रंष हो कर बाद में मेनाल बन गया।


मेनाल को 1956 से भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया। वर्तमान में यहां की देखभाल पुरातत्व विभाग करता है। पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां पर विभाग द्वारा एक होटल भी स्थापित किया गया है।

बारिश में निखर जाता है सौंदर्य - मेनाल में वैसे तो पुरे साल भर लोग घूमने के लिए आते रहते हैं पर यहां पर आने का सबसे अच्छा समय बरसात का है। उस समय मेनाल का झरना बहुत ज्यादा तेजी से नीचे की और गिरता है और चारों और बहुत ज्यादा हरियाली होती है। बरसात के सीजन में यहां सैलानियों का तांता लगा रहता है। रविवार को यहां सैलानियों की संख्या ज्यादा होती है।

कैसे पहुंचे - मेनाल चित्तौड़-कोटा राज मार्ग पर स्थित बूंदी से करीब 100 किमी दूरी पर स्थित है। चित्तौड़गढ़ से करीब 70 किमी की दूरी पर स्थित है। वहीं कोटा से मेनाल की दूरी 86 किलोमीटर है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य ( MENAL , SHIVA TEMPLE, RAJSTHAN ) 

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Sunday, July 15, 2018

यहां हथकड़ी चढ़ाने से मुकदमे से मिलती है निजात

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के बेगूं कस्‍बे में जोगणिया माता का मंदिर है। इसके बारे में ऐसी ही मान्‍यता है कि लोग यहां हथकड़ीचढाते हैं। माना जाता है कि जो अपराधी पुलिस से पीछा छुडाना चाहते है वह यहां आकर यदि हथकड़ी चढ़ा देते हैं तो पुलिस और मुकदमे से निजात मिलती है। कहा जाता है कि अपराधी यहां भविष्‍य में अपराध न करने कसम खाता कर यहां हथकड़ियां बंधता है तो कुछ दिनों बाद ही हथकड़ियां अपने आप खुल जाती हैं।
ऊपरमाल पठार के दक्षिणी छोर पर जोगणिया माता का प्रसिद्ध मन्दिर स्थित है।


 माना जाता है कि इस मन्दिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में हुआ। लोकमान्यता है कि पहले यहां अन्नपूर्णा देवी का मन्दिर था। माता द्वारा पर्चा देने और चमत्कार दिखने की अनेक कथाएं लोक मानस में प्रचलित है। मनोकामना पूरी होने पर मन्दिर परिसर में मुर्गे छोड़कर जाने की भी प्रथा है।

लोक आस्था की देवी - जोगणिया माता लोक आस्था की देवी है। एक चमत्कारी देवी के रूप में उनकी मान्यता है। देवी मन्दिर के प्रवेश द्वार पर दो  शेरों की सजीव आकृतियां बनी हैं। मन्दिर के गर्भगृह में महाकालीमहालक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित है। मन्दिर परिसर में दो शिव मन्दिर बने हैं जहां सालों भर गोमुख से रिस-रिसकर जलधारा बहती है। जोगणिया माता परिसर की देव प्रतिमाओं में पद्मासनस्थ शिवअष्टभुजी नटराज और स्थानक सूर्य की प्रतिमायें बहुत सजीव और कलात्मक हैं। पर्वतमाला और सुरम्य वन्य प्रदेश के बीच स्थित होने के कारण मन्दिर का नैसर्गिक सौन्दर्य लोगों को मोह लेता है।

जोगणिया
 माता की कृपा से मनोवांछित फल पाने के लिए श्रद्धालु बड़ी संख्या में देवी के इस मन्दिर में आते हैं। माता द्वारा पर्चा देने और चमत्कार दिखने की अनेक कथाएं लोक मानस में खूब प्रचलित है। मन्दिर से एक किलोमीटर पर बम्बावदागढ़ का किला है जहां हाडा शासक बम्बदेव का शासन था। जनश्रुति है कि बम्बावदागढ़ के अन्तिम शासक देवा हाड़ा ने देवी अन्नपुर्णा को अपनी पुत्री के विवाह में आशीर्वाद देने हेतु आमन्त्रित किया। देवी अपने प्रति आस्था की परीक्षा लेने हेतु जोगन का रूप धारणं कर विवाह समारोह में आई लेकिन देवी को इस रूप में कोई पहचान नहीं सकाइसके कारणउन्हें यथेष्ठ सम्मान नहीं मिला। बाद में देवी एक  सुन्दर युवती का वेश धारण कर विवाह स्थल पर फिर से आयी तो सम्मरोह में आए अनेक लोग इस युवती के सौन्दर्य पर मुग्ध हो गए तथा उसे अपने साथ ले जाने हेतु आपस  में लड़ने लगे। स्वयं देवा हाडा भी इस युद्ध में घायल हो गया।

तत्पश्चात
 देवा हाड़ा ने अन्नपूर्णा देवी के मन्दिर में काफी अरसे तक उनकी आराधना की। इसके बाद देवी के आदेश से वह बूंदी चला गया और मेवाड़ के  महाराणा  हम्मीर  की सहायता  से सन 1341 में बूंदी पर हाडा राजवंश का  शासन स्थापित किया। देवा हाड़ा की पुत्री के विवाह में जोगन का रूप धारण करने के बाद से ही वे अन्नपूर्णा के बजाय जोगणियामाता के नाम से लोक में प्रसिद्ध हुई।
प्रसिद्ध पर्यटन स्थल
 मेनाल से मात्र सात किलोमीटर दूर होने कारण वहां आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक भी जोगणिया माता के दर्शनार्थ मन्दिर में आते हैं।

कैसे पहुंचे - चित्तौड़गढ़ से लगभग 85 किलोमीटर दूर राजस्थान और मध्य प्रदेश राज्यों की सीमा पर जोगणिया माता का मंदिर स्थित है। भीलवाड़ा-कोटा हाईवे पर मेनाल से उतर कर मंदिर पहुंचना सहज है। मेनाल से मंदिर की दूरी 7 किलोमीटर है।

मंदिर का जीर्णोद्धार जारी मैं जब जोगणिया माता के मंदिर में पहुंचा हूं तो देख रहा हूं कि मंदिर का जीर्णोद्धार जारी है। बताया जा रहा है कि जोगणिया माता मंदिर का शिखर 71 फीट ऊंचा होगा। इसका जीर्णोद्धार करोड़ों की लागत से हो रहा है।

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(JOGANIA MATA TEMPLE, MENAL ) 


Thursday, July 12, 2018

मध्यम वर्गीय परिवार का पसंदीदा स्कूटर – टीवीएस जुपिटर


एक मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार सुबह से शाम तक जिंदगी की भागदौड़ में संघर्ष करता हुआ जीता है। बच्चे को स्कूल भेजना, दफ्तर जाना, शापिंग करना, रेलवे स्टेशन बस स्टाप तक की भागदौड़। इस भागदौड़ में अगर उसके पास एक स्कूटर हो तो जिंदगी आसान बन जाती है। पर स्कूटर कौन सा हो। कई स्कूटरों से तुलना के बाद हमारी नजर टीवीएस जुपिटर पर जाकर टिकती है। साल 2013 में टीवीएस द्वारा लांच इस स्कूटर को खासतौर पर 30 से 45 साल के उम्र के लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। पर ऐसी खूबियां है कि यह 18 से 30 और 45 से 70 साल के लोगों को भी खूब पसंद आ सकता है।
ज्यादा का फायदा
अगर हम बाजार में उपलब्ध 4 स्ट्रोक वाले गेयरलेस स्कूटरों के मॉडल का तुलनात्मक अध्ययन करें तो टीवीसी का जुपिटर कई मामलों में ज्यादा सुविधाजनक है। जैसे बार बार पेट्रोल डालने के लिए सीट खोलने की जरूरत नहीं। फ्यूल टैंक का ढक्कन बाहर उपलब्ध है।


जुपिटर में मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट बना है। सफर शुरू करने के साथ अपना मोबाइल चार्जिंग में लगा दिजिए। जुपिटर हैंडल और सीट के बीच दूसरे माडल की तुलना में ज्यादा लेग स्पेस भी प्रदान करता है। और इन सबसे आगे अगर आपको प्रति लीटर पेट्रोल में ज्यादा माइलेज मिले तो सोने पर सुहागा। तो 110 सीसी इंजन वाला स्कूटर जुपिटर मानक स्थितियों में 62 किलोमीटर प्रति लीटर माइलेज का दावा करता है। इसलिए जुपिटर ने अपने एड कंपेन का नारा दिया है ज्यादा का फायदा।

नौजवान और बुजुर्गों की भी पसंद
शानदार पिकअप और मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट जैसी सुविधा जुपिटर को युवा वर्ग की पसंद बनाती है। तो बड़े ही श्रम से पाई पाई कमाने में जिंदगी गुजार चुके बुजुर्गों के नजरिए से देखें तो अपने सिगमेंट में सबसे ज्यादा माइलेज इसे प्रौढ़ लोगों की भी पसंद बनाता है। वजन में हल्की और बड़े पहिए इसे और भी खास बनाते हैं।
फेमिली बाइक – यूनीसेक्स बाइक
टीवीएस मोटर्स के जनरल मैनेजर वैकिल प्रोग्राम पवन भास्करराव पवार कहते हैं कि वास्तव में टीवीएस जुपिटर एक फेमिली बाइक या यूनीसेक्स बाइक है जिसे मम्मी, पापा, दादा-दादी और बच्चे को भी लेकर फर्राटा भर सकता है। अपनी इन सारी विशेषताओं के बीच टीवीएस जुपिटर ने पिछले दिनों हिंदी फिल्मों के मेगा स्टार अमिताभ बच्चन को अपना ब्रांड एंबेस्डर बनाया है।

तमिलनाडु के कृष्णागिरी जिले का औद्योगिक शहर होसुर, जहां कई नामचीन ब्रांड के प्लांट लगे हैं यहीं बनता है टीवीएस जुपिटर। बेंगलुरु शहर से 40 किलोमीटर के सफर के बाद कर्नाटक की सीमा खत्म होते ही जैसे ही आप तमिलनाडु में प्रवेश करते हैं टीवीएस का विशाल हरा भरा प्लांट आ जाता है। 400 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैले टीवीएस प्लांट में जुपिटर का उत्पादन होता है। यहीं पर टीवीएस के दूसरे लोकप्रिय ब्रांड टीवीएस एक्सएल हेवी ड्यूटी मोपेड, टीवीएस किंग तिपहिया और टीवीएस के कुछ बाइक माडल का भी उत्पादन होता है। उत्तर भारत में सुलभ ढंग से सप्लाई के लिए हिमाचल प्रदेश के नालागढ़ में भी प्लांट लगाया है।

इंजन एसेंबलिंग में 90 फीसदी महिलाएं
टीवीएस के होसुर प्लांट में जुपिटर को बनते हुए देखना बड़ी ही सुखद अनुभूति है। फैक्ट्री में प्रवेश के साथ ही सबसे पहले हम इंजन का निर्माण देखते हैं। इसमें बड़ी संख्या में रोबोट काम करते दिखाई देते हैं। इंजन की एसेंबलिंग प्लांट में 90 फीसदी महिलाएं कार्यरत है। यह महिला सशक्तिकरण का बेहतरीन उदाहरण है। टीवीएस प्रबंधन ने महिलाओं को बड़ी संख्या में रोजगार देने को लेकर अपनी ओर से विशेष सक्रियता दिखाई है।

रोबोट बनाते हैं स्कूटर
टीवीएस जुपिटर का इंजन पूर्णतः धूल रहित वातावरण में तैयार होता है। स्कूटर के मेटल और प्लास्टिक वाले हिस्से के पेंट का काम भी अत्याधुनिक प्लांट में रोबोट करते हैं। पर उनकी मदद के लिए युवा इंजीनियर्स भी तैनात हैं। इसके बाद शुरू होती है अलग अलग पार्ट्स की एसेंबलिंग की प्रक्रिया। तमाम जिम्मेवार लोग हर चरण में एसेंबलिंग प्रक्रिया की जांच में लगे रहते हैं।

हर 27 सेकेंड में एक नया स्कूटर
निर्माण की सारी प्रक्रिया से गुजरते हुए हर 27 सेकेंड में एक नया टीवीएस जुपिटर स्कूटर तैयार होकर बाहर आ जाता है। यानी हर मिनट में दो स्कूटर। टीवीएस की फैक्टरी में दो शिफ्ट में काम होता है। फैक्टरी के अंदर कामकाज में गजब का अनुशासन दिखाई देता है। यह त्रुटि रहित निर्माण के लिए काफी जरूरी भी है।
पांच दशक से आटोमोबाइल सेक्टर में भरोसेमंद नाम टीवीएस अपने कर्मचारियों की सुविधाओं का भी अच्छा खासा ख्याल रखती है। कंपनी परिसर में विशाल कैंटीन है। यहां रियायती दरों पर भोजन मिलता है। हाल में यहां चपाती बनाने वाली मशीन भी लगाई गई है। भोजन सुस्वादु है। अधिकारी कर्मचारी एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। यहां थाली धोने के लिए आटोमेटिक मशीन लगाई गई है।   
25 लाख लोगों की पसंद बना

साल 2013 में सितंबर महीने में लांच किया गया टीवीएस जुपिटर अब देश में 25 लाख से ज्यादा लोगों की पसंद बन चुका है और स्कूटर के बाजार में तेजी से अपना वर्चस्व बढ़ा रहा है। टीवीएस मोटर्स में डिजाइन इंजीनियर अमित राजावाडे बताते हैं कि हम इसके डिजाइन और एस्थेटिक (सौंदर्य) को लेकर लगातार शोध करते हैं।  इस शोध का परिणाम है जुपिटर का क्लासिग मॉडल। बाहरी कास्मेटिक में कुछ बेहतरीन बदलाव के साथ यह कुछ ज्यादा ही यूथफुल लगता है। जेडी पावर 2018 के सर्वे में टीवीएस जुपिटर को इसके डिजाइन के कारण मोस्ट अपीलिंग स्कूटर का अवार्ड दिया गया है।

तो अब ड्राइव पर चलें - हर सफर का साथी...
तो अब चलते हैं टेस्ट राइड के लिए। टीवीएस जुपिटर को चलाना शानदार अनुभव है। होसुर के हरिता परिसर में 2 किलोमीटर लंबा टेस्ट ड्राईव ट्रैक बना है। हर नए स्कूटर को कम से कम 0.75 किलोमीटर चलाकर इसकी जांच की जाती है।  पर हमने जुपिटर का चलाया 4 किलोमीटर। इस दौरान इसका पिकअप, ब्रेक की जांच की। टेढे मेढ़े रास्तों पर घूमा फिराकर देखा। मुझे तो लगता है कि शहर में ही नहीं लॉंग ड्राईवर पर जुपिटर के साथ निकला जा सकता है। तो आप अगर अपने या अपने परिवार के लिए स्कूटर लेने का मन बना रहे हैं तो एक बार जुपिटर को जरूर देखकर कोई फैसला लें।    
-विद्युत प्रकाश मौर्य

( TVS JUPITER, HOSUR PLANT ) 

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Wednesday, July 11, 2018

चित्तौड़गढ़ से काटूंदा मोड़ और अफीम के खेत

चित्तौड़गढ़ की दाल बाटी खाने के बाद वापस आकर होटल नटराज से चेकआउट किया और बस स्टैंड आ गया।  मैंने पता किया था कि चित्तौड़ और कोटा के रास्ते में जोगणिया माता का प्रसिद्ध मंदिर है। स्थानीय लोगों ने बताया कि कोई बस सीधी जोगणिया माता नहीं जाती, पर आप काटूंदा मोड़ उतर सकते हैं। वहां से जोगणिया माता के लिए दूसरी बस मिल जाएगी। तो मैं एक बस में सवार हो गया काटूंदा मोड का टिकट लेकर। कुछ समय बात बस्सी नामक एक कस्बा आया। कुछ मिनट रुकने के बाद बस आगे चल पड़ी। पारसौली और बिछौर जैसे कस्बे आए रास्ते में।



अफीम की खेती - हाईवे बहुत अच्छा बन चुका है। बस तेजी से दौड़ रही है। तभी रास्ते में  सडक के किनारे खेतों में हरे हरे पौधे लहलहाते नजर आते हैं। ये पौधे किस चीज के हैं। इनमें सुंदर सफेद फूल लगे हैं। सहयात्रियों से पूछने पर पता चला कि ये अफीम के पौधे है। तो इस इलाके में अफीम की खेती होती है। पर अफीम की खेती के लिए सरकार से पट्टा यानी लाइसेंस प्राप्त करना पड़ता है। जितने इलाके में स्वीकृति है उतने ही दायरे में अफीम लगा सकते हैं। सरकार खेतों में एक इंस्पेक्टर बहाल कर देती है। वह खेती की निगरानी करता है। तैयार अफीम की सरकारी खरीद होती है।
किसान इसे कहीं और नहीं बेच सकता है। बिना अनुमति के अगर अफीम बोया तो छापा पडता है और पुलिसिया कार्रवाई भी हो जाती है। अफीम की खेती सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स के अधीन होती है। चित्तौड़गढ़ के अलावा राज्य के झालावाड़, बारां, प्रतापगढ़, भीलवाड़ा में अफीम की खेती होती है। वास्तव में यह एक अत्यधिक महत्वपूर्ण औषधीय फसल हैं। इसमें लगभग 42 से भी अधिक प्रकार के अल्केलॉइट पाए जाते हैं। जिनमे मुख्य रूप मॉरफीन, कोडीन, थीवेन, नारकोटिन तथा पेपेवरिन अधिक ही महत्वपूर्ण हैं। इनका उपयोग विभिन्न प्रकार की दवाइयां बनाने में होता हैं। अफीम के दानों में लगभग 52 फीसदी तेल होता हैं। अफीम के फूल के नीचे वाले हिस्से से डोडा निकलता है। यह भी नशा करने के काम आता है। हालांकि सारा अफीम सरकार खरीद लेती है। पर यह सुनने में आता है कि तय स्टाक सरकार को बेचने के बाद कुछ किसान बचे हुए अफीम को तस्करों के हाथ बेच देते हैं।
मैं बस से काटूंदा मोड पर उतर जाता हूं। यहां हाईवे के बगल में अफीम के पेड़ दिखाई देते हैं। काटूंदा छोटा सा बाजार है। यहां से मुझे जोगणिया माता के लिए दूसरी बस लेनी है। पर दूसरी बस के लिए एक घंटे से ज्यादा इंतजार करना पड़ा। इस बीच काटूंदा मोड के बाजार का मुआयना कर रहा हूं। बाजार में कई म्युजिकल बैंड पार्टी के दफ्तर हैं। उनकी सजी धजी गाड़ियां यहां लगी हुई हैं।
अब जोगणिया माता जाने वाली बस आ गई है। काटूंदा मोड़ से जोगणिया माता मंदिर की दूरी 20 किलोमीटर है। बस रावतभाटा रोड पर जाकर एक ग्रामीण सड़क में मुड़ जाती है। जोगणिया माता का मंदिर चितौड़गढ़ जिले के बेगू तहसील में पड़ता है।
ग्राम पंचायत का नाम रावडदा है। पर यहां पहुंचने के लिए सार्वजनिक वाहनों की कमी है। माता मंदिर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर के आसपास बाजार बन चुका है। यहां पर रात में रुकने के लिए अलग अलग समाज के कुछ धर्मशालाओं का भी निर्माण हुआ है। जाट समाज, गूजर समाज की धर्मशालाओं के बीच मुझे यहां धाकड़ समाज का धर्मशाला दिखाई देता है। हां भाई धाकड़। मतलब जिसकी धाक चलती हो। तो चलिए चलते हैं जोगणिया माता के दरबार में। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KATUNDA MOR, AFIM FARMING, JOGANIA MATA MANDIR ) 


Tuesday, July 10, 2018

मुंबई की विक्टोरियन गोथिक शैली की इमारतें विश्व विरासत की सूची में


मायानगरी मुंबई के शिखर पर नए सितारे जड़ गए हैं। 30 जून 2018 को यूनेस्को ने मुंबई की तीसरे स्थल को विश्व विरासत की सूची में शामिल किया। मुंबई की विक्टोरियन गोथिक और आर्ट डेको इमारतों के भव्य क्लस्टर को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल होने के साथ 37 भारतीय स्थल इस सूची में आ चुके हैं।
यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति के 42वें सत्र में इस पर फैसला किया गया। एलिफेंटा गुफाओं और छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस रेलवे स्टेशन (विक्टोरिया टर्मिनसके बाद विक्टोरियन गोथिक और आर्ट डेको के भवनों की श्रंखला को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित किया जाना मुंबई को मिला तीसरा ऐसा सम्मान है।
यूनेस्को ने ट्वीट कर जानकारी दी कि यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थल के रूप में मुंबई का विक्टोरियन गोथिक और आर्ट डेको एनसेंबल्स शामिल कर लिया गया है। पिछले साल गुजरात के अहमदाबाद को विश्व धरोहर शहर घोषित किया गया था। अहमदाबाद विश्व धरोहर शहर घोषित किया जाने वाला भारत का पहला शहर था।

बांबे हाईकोर्ट का भवन विक्टोरियन गोथिक का नमूना
जब मुंबई में आप छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन से गेटवे ऑफ इंडिया की ओर आगे बढ़ते हैं तो विक्टोरियन गोथिक इमारतों के दर्शन होते हैं। दक्षिण मुंबई में स्थित विक्टोरियन गोथिक आर्ट डेको के भवनों को मियामी के बाद दुनिया की सबसे बड़ी भवन श्रंखला में शामिल किया जाता है। बांबे हाईकोर्ट का भवन विक्टोरियन गोथिक शैली का बेहतरीन उदाहरण है। ये भवन में विशाल मैदान के आसपास स्थित हैं इनका निर्माण 19वीं सदी में हुआ था।  बांबे हाईकोर्ट के भवन का निर्माण 1871 में आरंभ हुआ और 1878 में पूरा हुआ। तब 16.44 लाख में बने इस भवन के वास्तुविद जेए फुलेर थे।हाईकोर्ट का भवन 562 फीट लंबा187 फीट चौड़ा और औसतन 90 फीट ऊंचा है। पर इसके केंद्रीय टावर की ऊंचाई 178 फीट है।  

गोथिक शैली की इमारतों में मुंबई यूनीवर्सिटी का फोर्ट कैंपस भी शामिल है। इसके अलावा सिविल और सेशंस कोर्ट की इमारतें इसी शैली में बनी हैं। इसी श्रेणी में राजाबाई क्लाक टावर का भी नाम लिया जा सकता है।

1930 से 1950 के बीच बनी आर्ट डेको इमारतें
इरोज सिनेमा का भवन -  आर्ट डेको बिल्डिंग
मैदान के पश्चिमी इलाके में स्थित आर्ट डेको भवनों का निर्माण 1930 से 1950 के बीच हुआ है। मुंबई की आर्ट डेको बिल्डिंग में आवासीय भवनव्यवसायिक दफ्तरअस्पतालमूवी थियेटर आदि आते हैं। इसी क्षेत्र में रीगल और इरोस सिनेमा घर हैं। चर्चगेट के पास स्थित इरोज सिनेमा का भवन आर्ट डेको शैली का बेहतरी उदाहरण है। इस सिनेमाघर में 1,204 लोगों की बैठने की क्षमता है।  साल 1938 बने इस भवन के वास्तुविद शोरबाजी भेदवार थे।

घुमावदार सीढ़ियां और खूबसूरत बरामदे
पीले बैंगनी और नीले रंगों में रंगी आर्ट डेको बिल्डिंग मुंबई के मरीन ड्राइव पर तीन किलोमीटर के दायरे मे हैं। ज्यादातर भवन अधिकतम पांच मंजिल के हैं। इन भवनों में घुमावदार सीढ़ियांखूबसूरत बरामदे और संगमरमर की फर्श इसकी विशेषताएं हैं।
मैदान एक तरफ बांबे हाईकोर्ट की विशाल बिल्डिंग है तो दूसरी तरफ चर्च गेट रेलवे स्टेशन है। बीच में स्थित यह मैदान मुंबई के लोगों का लोकप्रिय स्थल है। इस मैदान में राजनीतिक रैलियों और धार्मिक कार्यक्रम पर प्रतिबंध है। यहां दुपहरिया में लोग खेलते नजर आ जाएंगे, तो मैदान के चारों तरफ विशाल स्ट्रीट मार्केट है। इन फुटपाथ के बाजार में खाने पीने के सस्ते स्टाल से लेकर लेटेस्ट फैशन तक दिखाई देता है।
 - vidyutp@gmail.com
( REMEMBER IT'S A WORLD HERITAGE SITE ) 
मुंबई में विश्व विरासत इमारतों के मध्य से गुजरती बेस्ट की दो मंजिला बस 

Monday, July 9, 2018

चित्तौड़गढ़ की राबड़ी – स्वाद अनूठा रहेगा याद

चित्तौड़गढ़ में घूमते हुए आप खालिश राजस्थानी स्वाद को महसूस कर सकते हैं। मुझे किले में जय चित्तौड़ सोडा शिकंजी की दुकानें दिखाई देती हैं। गर्मी के दिन हो तो शिकंजी तो पानी ही चाहिए। आगे बढ़ने पर किले के अंदर राजस्थान हस्तकला केंद्र का विशाल शो रूम नजर आता है। इसमें वे जयपुरी रजाई, साड़ियां आदि बिक्री करते हैं। कुछ और हस्तशिल्प वस्तुएं भी खरीदी जा सकती हैं। पर मेरी फिलहाल शापिंग में रूचि नहीं है। हम तो चले छाछ और राबड़ी का स्वाद लेने। हस्तकला केंद्र के बाहर एक राजस्थानी पगड़ी में सजे ग्रामीण दुकान लगाए हैं। पहले मैं एक ग्लास छाछ पीता हूं। वे राबड़ी पीने का आग्रह करते हैं।
हां ये राबड़ी है, रबड़ी नहीं। राजस्थानी राबड़ी नमकीन होती है। समझो इसमें छाछ के साथ बूंदी और मसाला मिलाया जाता है। दुकान कहते हैं पी लो, काफी अच्छी बनाई है। मैं पैसे नहीं लूंगा पर एक बार पीकर तो देखो। अब इतना मनुहार कर रहे हैं तो पी ही लेता हूं। सममुच राबड़ी का स्वाद काफी अच्छा है।
गंभीरी नदी के किनारे दाल बाटी – किला देखकर वापस आ चुका हूं। दोपहर हो गई है। आगे जाने के लिए बसों की समय सारणी पता कर ली है। अब बस स्टैंड के बगल में बह रही गंभीरी नदी के ऐतिहासिक नक्काशीदार पुल पर पहुंच गया हूं।

इस पुल के नीचे चौपाटी नुमा बाजार बना है। यह बाजार खासतौर पर खाने पीने का है। यहां पर दाल बाटी की दुकाने सजी हैं। दाल बाटी की प्लेट 50 रुपये की है जाहे जितना भी खाओ। दाल बाटी के साथ छाछ का एक गिलास भी है। मैं एक प्लेट आर्डर कर देता हूं।

धीरे धीरे दाल बाटी उदरस्थ करने में लगा हूं। मेरे लिए तो पांच दाल बाटी ही काफी है। दुबारा नहीं ले पाता। बाटी वाले बताते हैं कि राजस्थान के गांव में दाल बाटी काफी लोकप्रिय है। इसका फायदा है कि आप पूरे घर की बाटी बनाकर बाटी स्टैंड में सजा कर रख दो। अब बाटी धीमी आंच पर पकती रहती है। इसे बार बार आकर देखना नहीं पड़ता। इस बीच महिलाएं घर के दूसरे काम निपटाती रहती हैं।  

चित्तौड़गढ़ शहर के बीचों बीच गंभीरी नदी बहती है। होटल वाले बताते हैं कि गंभीरी नदी में साल 2016 में भीषण बाढ़ आया।  तब पास का सरकारी बस स्टैंड भी डूब गया था। गंभीरी नदी मध्य प्रदेश के जावरा (रतलाम) की पहाड़ियों से निकलती है। यह चित्तौड़गढ़ के निम्बाहेड़ा में राजस्थान में प्रवेश करती है। हालांकि चित्तौड़गढ़ में इसका विस्तार ज्यादा नहीं है, पर इसने 2016 में रौद्र रूप दिखाया था।

गंभीरी चित्तौड़गढ़ में बेडच नदी में मिल जाती है। आगे बेडच नदी बिगोंद में बनास नदी में मिल जाती है। बनास आगे चंबल में मिल जाती है।  
रात की थाली – चित्तौड़ शहर के बस स्टैंड के आसपास कई शाकाहारी भोजनालय हैं जहां थाली 70 से 100 रुपये की मिल जाती है। इसमें तवे की चपातियां और कई किस्म की सब्जियां होती हैं। खाना सुस्वादु है। यहां कई गुजराती नमकीन की दुकानें दिखाई देती हैं। खाने पीने लिहाज से चित्तौड़ का स्वाद यादगार रहेगा।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
 ( RAJSTHANI RABRI, BATI N DAL, GAMBHIRI RIVER, WATER ) 



Saturday, July 7, 2018

शक्ति की प्रतीक - कालिका माता मंदिर का चित्तौडगढ

चित्तौड़ के किले के मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर कुंभा महल, विजय स्तंभ, जौहर स्थल, समृद्धेश्वर शिव मंदिर, गौमुख कुंड आदि स्थल आसपास हैं। यहां से कोई दो किलोमीटर आगे चलने पर रानी पद्मिनी का महल आता है जो किले का मुख्य आकर्षण है। इस महल के पास कालिका माता का सुंदर मंदिर स्थित है।

मूल रूप से सूर्य मंदिर था - पद्मिनी के महल के उत्तर में बांयी ओर कालिका माता का सुन्दर मंदिर स्थित है। यह एक ऊंची कुर्सीवाला विशाल महल जैसा प्रतीत होता है। इस मंदिर का निर्माण संभवतः नौवीं शताब्दी में मेवाड़ के गुहिल वंशीय राजाओं ने करवाया था। कहा जाता है कि पहले मूल रूप से यह मंदिर एक सूर्य मंदिर था। इसके मुख्य  मंदिर के द्वार और गर्भ गृह के बाहरी पार्श्व के ताखों में स्थापित सूर्य की मूर्तियां इस बात को प्रमाणित करती हैं। बाद में मुसलिम शासको के आक्रमण के दौरान इस मंदिर की कई मूर्ति तोड़ डाली गई और बरसों तक यह मंदिर सूना रहा।

बाद में इस मंदिर में शक्ति का प्रतीक कालिका माता की मूर्ति स्थापित की गई। मंदिर के स्तम्भों, छतों और अन्तःद्वार पर नक्काशी का बेहतरीन काम देखा जा सकता है। मेवाड़ के राजा महाराणा सज्जन सिंह ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। इस मंदिर में कालिका माता की मूर्ति प्रतिष्ठा वैशाख शुक्ल अष्टमी को हुई थी, इसलिए हर साल यहां वैशाख में एक विशाल मेला लगता है। इस मंदिर की व्यवस्था राजस्थान सरकार का देवस्थान विभाग देखता है।
कालिका माता मंदिर में सालों भर हर रोज श्रद्धालुओं की आगमन होता रहता है। लोग यहां परिवार समेत मनौती मांगने आते हैं। मंदिर में प्रसाद चढ़ाते हैं। मंदिर के बाहर खुले मैदान में लोग भोजन भी पकाते हैं। इस मंदिर में प्रवेश करते समय बंदरों से सावधान रहना चाहिए। यहां बड़ी संख्या में बंदर हैं। यहां आप बंदरों को चना और गुड़ भी खिला सकते हैं। इसके ले 5 किलो चना और 5 किलो गुड़ दान करने की परंपरा है।

मंदिर के आसपास पास कुछ दुकाने भी हैं। यहां पर आप आईसक्रीम, शिंकजी के अलावा थोड़ी सी पेट पूजा कर सकते हैं। यहां राजस्थानी परिधान में फोटो खिंचवाने वाली भी कई दुकानें स्थित हैं। कुल मिलाकर यह चितौड़गढ़ किले का सबसे मनोरंजक स्थल है।

पद्मिमनी महल गोरा - बादल की घुमरें
कालिका मंदिर के सामने ही पद्मिनी महल स्थित है। इस महल में जाने के लिए आपको प्रवेश टिकट चेक करवाना पड़ता है। महल के अंदर सुंदर पार्क बनाए गए हैं। महल से लगा हुआ एक सुंदर ताल है। कहा जाता है इसी ताल में महारानी जल क्रीड़ा करती थीं। हालांकि यह ताल इन दिनों बहुत अच्छे हाल में नहीं है।

इस तालाब के बीचों बीच भी एक छोटा सा जल महल दिखाई देता है।
पद्मिनी महल से दक्षिण-पूर्व में दो गुम्बदाकार इमारतें हैं, जिसे लोग गोरा और बादल के महल के रूप में जानते हैं। गोरा महारानी पद्मिनी का चाचा था तथा बादल चचेरा भाई था। रावल रत्नसिंह को अलाउद्दीन के खेमे से निकालने के बाद युद्ध में पाडन पोल के पास गोरा वीरगति को प्राप्त हो गये और बादल युद्ध में 12 साल की अल्पायु में ही मारा गया था। देखने में ये इमारत इतने पुराने नहीं मालूम पड़ते। इनकी निर्माण शैली भी कुछ अलग है।

चित्तौडगढ़ किले मे कीर्ति स्तंभ और जैन मंदिर 
चित्तौड़गढ के जैन मंदिर – चित्तौडगढ़ के किले में दिगंबर परंपरा के दो विशाल जैन मंदिर भी हैं। ये जैन मंदिर काफी अच्छी हालत में हैं। इनमें जैन मुनियों और श्रद्धालुओं का आगमन होता रहता है। इन मंदिरों को देखकर प्रतीत होता है कि मेवाड़ शासकों से सानिध्य में जैन धर्म यहां पुष्पित पल्लवित हो रहा था। यह स्थल सालों तक जैन विद्या, साथना का केंद्र रहा है। यह जैन संत श्री सिद्धसेन दिवाकर की कर्मस्थली रही है। वर्तमान में देश के प्रमुख जैन उद्योगपतियों द्वारा चित्तौड़गढ़ के इन जैन मंदिरों की देखभाल की जाती है।  

कीर्ति स्तंभ - किले के पीछे की ओर जाने पर कीर्ति स्तंभ देखा जा सकता है। यह जैन धर्म के पहले तीर्थंकर आदिनाथ की याद में बना है। इसका निर्माण 11वीं शताब्दी में कराया गया। यह 75 फीट ऊंचा है। इसमें ऊपर जे के लिए एक संकरे जीने वाला रास्ता भी बना है।

लाइट एंड साउंड शो - अगर आपके पास समय हो तो चित्तौड़गढ़ के किले में शाम को लाइट एंड साउंड शो भी देखें। यह कुंभा महल में हर शाम को होता है। अगर आपके पास समय हो तो लाइट एंड साउंड का आनंद जरूर लें। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
( KALIKA MANDIR, SUN TEMPLE, KIRTI STAMBH, RANI MAHAL, CHITAURGARH)