Wednesday, August 22, 2018

नालगोंडा से नागार्जुन सागर की ओर

नालगोंडा से नागार्जुन सागर के लिए पहली बस सुबह 5.30 बजे से मिलने लगती है। मेरा होटल बस स्टैंड के सामने है तो मैं तैयार होकर सुबह 6.30 वाली बस में नागार्जुन सागर के लिए बैठ गया। किराया 44 रुपये। कोई दो घंटे का सफर है। रास्ते में नीदामानूर और हालिया जैसे दो प्रमुख कस्बे में बस रूकी। वैसे बस माचेरला तक जा रही है। माचेरला आंध्र प्रदेश के गुंटुर जिले का शहर है। सुबह 9.30 बजे बस ने विजय विहार के स्टाप पर उतार दिया। 
सामने एक टिफिन्स की दुकान है, तो सबसे पहले पेटपूजा। बीस रुपये में मसाला डोसा खाकर तृप्त हो गया। सामने दो मंदिर हैं। वहां मत्था टेकने के बाद नागार्जुन कोंडा जाने वाले मोटर लांच का स्टेशन पूछता हूं। लोगों ने बताया कि थोडा पैदल चलकर आगे की ओर जाएं। पैदल चलकर वहां पहुंच गया। बस का स्टाप तो यहां भी है, पर यहां कोई नास्ते की दुकान नहीं है। यहां से तेलंगाना टूरिज्म की ओर से नागार्जुन कोंडा के लिए मोटर लांच का संचालन किया जाता है। समय 9.30 और 1.00 बजे का है। पर सवारी कम हो तो दिन में एक बार ही मोटर लांच चलती है।
यहां आने पर पता चला कि कम से कम 60 लोगों के होने पर ही मोटर लांच चलेगी। अभी पहुंचे सिर्फ 8 लोग हैं। इंतजार करना होगा। गर्मी में सैलानी कम आते हैं। तो आंध्र प्रदेश शासन की ओर गुंटुर की तरफ से चलने वाली मोटर लांच बंद है। शनिवार रविवार को ज्यादा सैलानी आते हैं। आज सोमवार है तो लोगों को इंतजार है। तीन घंटे इंतजार के बाद भी लोग नहीं पूरे हुए। इस बीच हैदराबाद के राहुल से दोस्ती हुई। वे बाइकर हैं, बुलेट से देश भर में घूमते हैं। पूरा दक्षिण घूम चुके हैं, अब लेह जाने की इच्छा रखते हैं। इंतजार करते हुए दोपहर हो गई है। इस बीच शिकंजी पीया है। 
अब भूख लगी है। तो राहुल के साथ उनकी बुलेट पर हमलोग दो किलोमीटर पीछे तेलंगाना टूरिज्म के विजय विहार रिजार्ट पहुंचे। वहां दोपहर का लंच लिया। 137 रुपये में अनलिमिटेड बूफे लंच। खाना अच्छा था। वापस आने पर एक बार फिर मोटर लांच की कवायद। अभी भी 24 यात्री हो सके हैं। तो तय हुआ कि हमलोग अपना दिन क्यों खराब करें 150 रुपये प्रति व्यक्ति की जगह थोड़े ज्यादा पैसे दिए जाएं तो मोटर लांच चल सकती है। फिर यही किया गया 150 की जगह 350 प्रति व्यक्ति देने पड़े। इस तरह दोपहर 1.30 बजे नागार्जुन कोंडा के लिए सफर आरंभ हुआ। मोटर लांच अच्छी है। इसमें 150 लोग सफर कर सकते हैं।

नागार्जुन सागर बांध कृष्णा नदी पर बना है। आंध्र और तेलंगाना के विभाजन के बाद इसके 26 द्वार में से 13 आंध्र में पड़ते हैं तो 13 तेलंगाना में। नागार्जुन सागर आप आंध्र प्रदेश के गुंटुर जिले से या फिर तेलंगाना के नालगोंडा जिले से पहुंच सकते हैं। हैदराबाद से नागार्जुन सागर के लिए सीधी बसें भी हैं। नजदीकी रेलवे स्टेशन माचरेला है जो यहां से 24 किलोमीटर है।
नागार्जुन सागर बांध - राष्ट्र का नवीन मंदिर 
नागार्जुन सागर बांध का निर्माण स्वतंत्रता के बाद 1955 में करवाया गया। इसके वास्तुकार पद्मभूषण केएल राव थे। बांध के पास बने पार्क में केएल राव और आंप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के पूर्व राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी की प्रतिमाएं लगी हैं। 1955 में बांध की आधारशिला तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरु ने रखी थी। बांध पूरी तरह 1967 में तैयार हुआ। साल 2005 में इस बांध के 50 साल पूरे हो गए।
इस बांध के कारण 800 मेगावाट से ज्यादा बिजली का उत्पादन होता है। इस बांध से मिलने वाले पानी से न सिर्फ आंध्र तेलंगाना के सात जिलो में खेतों की सिंचाई होती है। साथ ही पूरे हैदराबाद शहर को पीने का पानी यहां से मिलता है। इसलिए पानी के  बूंद बूंद की कीमत हैदराबाद के लोग खूब जानते हैं।
( NAGARJUNA SAGAR DAM, NALGONDA, GUNTUR, ANDHRA, TELANGANA, KRISHNA RIVER, WATER) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Monday, August 20, 2018

नालगोंडा में ज्वार की रोटी और टमाटर की चटनी


तेलंगाना के नालगोंडा शहर की सैर के बाद शाम को लौटकर नालगोंडा के बाजार में मसाला डोसा खाया 20 रुपये का। यह मसाला डोसा नहीं बल्कि छोटा ओनियन डोसा है। इसका स्वाद अच्छा है। अब रात के खाने के लिए निकला हूं। स्थानीय स्वाद की तलाश में।
चलते चलते मैंने देखा शहर के अस्पताल रोड पर फुटपाथ पर महिलाएं लकड़ी के चुल्हे पर ज्वार की रोटियां बना रही हैं। आटा गूंथने के बाद हाथ से ही रोटी को थपका कर पराठे से भी बड़ा कर देती हैं। बिल्कुल पतला। फिर उन्हे तवे पर बड़े ही करीने से पका रही हैं। इसको पकाने के लिए पानी का इस्तेमाल करती हैं। कोई घी तेल नहीं। बिना परथन के पानी पर रोटी सेंक लेना यह भी एक कला है।


रोटी के साथ मिर्च और टमाटर की लाल चटनी। एक रोटी 10 रुपये की। एक खाई तो अच्छी लगी। और लेने की इच्चा हुई। एक एक कर मैं तीन ज्वार की रोटियां खा लेता हूं। अब देख रहा हूं कि कई लोग यहां से ज्वार की रोटियां पैक कराकर भी ले जा रहे हैं। लोगों ने बताया कि गरमी ज्वार की रोटी खाना सेहत के लिए अच्छा है। रोटी पकाने वाली महिला की श्रम को मन ही मन नमन करते हुए वापस होटल की ओर लौट आया।


 ज्वार की रोटी के फायदे (GRAIN SORGHUMSEED )

 ज्वार को मोटा अनाज माना जाता है। कई जगह इसकी खेती जानवरों के चारे के लिए की जाती है। ज्वार को संस्कृत में यवनालयवाकार या जूर्ण कहते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि ज्वार का आटा प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत है। यह हृदय और मधुमेह रोगियों समेत कई रोगों में फायदेमंद है। ज्वार के फायदे बवासीर और घावों को भरने में भी कारगर हैं। गर्मियों में इसका सेवन शीतलता प्रदान करता है। ज्वार ठंडा होता है जिसके कारण इसे खाने से हमे प्यास अधिक लगती है। ज्वार की रोटी को छाछ में भिगोकर भी खा सकते हैं।

आमतौर पर ज्वार की रोटी हाथो से ही बनाई जाती हैभारत के ग्रामीण लोग आज भी इसे मुख्य भोजन के रूप में खाते है। यह गेंहू की रोटी का सबसे अच्छा विकल्प बन सकता हैं।  ज्वार में पोटैशियमकैल्शियम और आयरन होता हैं। चावल और गेहूं की तुलना में ज्वार में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। मधुमेह वाले व्यक्ति के लिएगेहूं के आटे की चपाती की तुलना में ज्वारी आटा की रोटी बनाने की सलाह दी जाती है।


(NALGONDA, TELANGANA, JWAR KI ROTI )

   -        विद्युत प्रकाश मौर्य

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Sunday, August 19, 2018

नालगोंडा में सूफी संत लतीफ शाह की दरगाह - सौहार्द की मिसाल


दोपहर की गर्मी में बस के दो घंटे  के सफर के बाद मैं भुवनगिरी से नालगोंडा पहुंच गया हूं। बस स्टैंड में उतरने के बाद बाहर निकलते ही किसी ठिकाने की तलाश में हूं। सामने नजर आता है नालगोंडा लॉज। रिसेप्शन पर एक महिला हैं। बताती हैं कमरा 300 रुपये का है। मैं यहीं ठिकाना बना लेता हूं। इस होटल में दिन में भोजनालय भी संचालित होता है। पर मैं खाने के समय के बाद पहुंचा हूं। थोड़ी देर कमरे में आराम करने के बाद शाम गहराने के साथ नलगोंडा की सड़कों पर घूमने निकल पड़ता हूं।
नालगोंडा शहर बहुत बड़ा नहीं है। आबादी डेढ़ लाख के आसपास है। चौराहों पर कुछ महापुरुषों की प्रतिमाएं लगी हैं। इनमें महात्मा ज्योतिबा फूले भी हैं। गरमी बहुत है तो बाजार में जगह जगह शरबत की दुकाने हैं। यहां शरबत की दुकानें कुछ अलग किस्म की हैं। एक फ्रिजर में कई अलग अलग स्टील के पॉट हैं जिनमें अलग अलग तरह के शीतल पेय बनाकर रखे गए हैं। आप जो स्वाद मां करेंगे दुकानदार निकाल कर दे देता है। पांच, दस रुपये से लेकर 15 रुपये ग्लास तक।
नालगोंडा का पुराना नाम नीलगिरी था। यहां पाषाण युग और पूर्व पाषाण युग के अवशेष मिले हैं , इसलिए यह क्षेत्र पुरातात्व शास्त्रियों के लिए रुचि का विषय रहा है। मौर्य काल, सातवाहन काल और बहमनी सम्राज्य में नालगोंडा प्रमुख व्यापारिक केंद्र था।

लतीफ साहेब की दरगाह 570 सीढ़ियों की चढाई  - नालगोंडा शहर में सूफी संत लतीफ साहेब की दरगाह प्रमुख दर्शनीय स्थल है। शहर के मध्य में पहाड़ी पर स्थित दरगाह पर पहुंचने के लिए 570 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। पर रास्ता बड़ा ही साफ सुथरा और मनोरम है। रास्ते में नीम के पेड़ लगे हैं, जिनसे भीनी सी खुशबू आ रही है। पर इस दरगाह पर रोज श्रद्धालुओं की भीड़ नहीं उमड़ती। हर शुक्रवार को लोग वहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

फरवरी- मार्च महीने में लतीफ शाह की दरगाह पर सालाना उर्स लगता है। तीन दिनों के इस उर्स के दौरान दूर-दूर से जायरीन यहां पहुंचते हैं। इस दौरान हनुमान जी के भक्त भी जलसे में हिस्सा लेते हैं। यह उर्स सांप्रदायिक सौहार्द का बेहतरीन नमूना होता है। हरे हरे पेड़ पौधों के बीच मेरी इच्छा सीढ़ियां चढ़कर दरगाह तक जाने की है। पर तकरीबन 100 सीढ़ियां चढ़ने के बाद लौट आया। लोगों ने बताया कि उपर कोई भी नहीं होगा। जो लोग आम दिनों में लतीफ शाह की दरगाह पर दुआ मांगने आते हैं, उनके लिए  नीचे आधारतल पर ही एक मसजिद बनी है। यहीं पर दुआ कबूल हो जाती है।



(NALGONDA, TELANGANA, LATIF SHAH, URS,  )
   -        विद्युत प्रकाश मौर्य
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Friday, August 17, 2018

मुसुनुरी नायकों की वीरगाथा सुनाता भुवनगिरी का किला

बालाजी के दर्शन के बाद हम भुवनगिरी बाजार के बस स्टैंड  पहुंच गए हैं। काफी गरमी है तो थोड़ा जूस ले लेना चाहिए। अब बात भुवनगिरी की। भुवनगिरी नाम सही है, पर अंग्रेजी में इसका स्पेलिंग है उसके हिसाब से इसे भोंगीर पढ़ा जाएगा। तो इसकी अंगरेजी की स्पेलिंग ठीक किए जाने की जरूरत है।
तेलंगाना राज्य का नया जिला है यदाद्रि भुवनगिरी। नया जिला नलगोंडा से विभाजित होकर अक्टूबर 2016 में बना है। रंगारेड्डी और नलगोंडा इसके पड़ोसी जिले हैं। हैदराबाद से महज 60 किलोमीटर दूर स्थित भुवनगिरी शहर जिले कामुख्यालय है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग 163 पर स्थित है। भुवनगिरी बस स्टैंड के सामने भुवनगिरी का किला दिखाई देता है। दरअसल पूरा शहर विशाल पहाड़ी की तराई में बसा हुआ है।

दसवीं सदी का किला - भुवनगिरी शहर का अपना इतिहास है, जिसकी कहानी भुवनगिरी का विशाल किला सुना रहा है। किले पर जाने के लिए बस स्टैंड से थोड़ा आगे चलने पर सीढ़िया बनी हुई है। प्रवेश के लिए 10 रुपये का टिकट भी रखा गया है। किले का रख रखाव राज्य सरकार का पुरातत्व विभाग करता है। भुवनगिरी शहर के किसी भी इलाके में आप खड़े हों वहां से किला दिखाई देता है। यह किला 10वीं सदी में बनवाया गया। इसका निर्माण चालुक्य राजा त्रिभुनमल विक्रमादित्य चतुर्थ ने 1074 ई में करवाया था। तब इसका नाम निर्माता राजा के नाम पर ही त्रिभुवनगिरी रखा गया था। बाद में इसे छोटा करके भुवनगिरी कहा गया। चौदहवीं सदी में यह किला मुसुनुरी नायकों को अधीन रहा। काकातीय सम्राज्य के अधीन मुसुनुरी नायक शूद्र समाज से आने वाले वीर योद्धा थे।
किले में कन्नड़ और तेलगु में लिखे कुछ अभिलेख मिलते हैं जो उस समय के लोगों के जीवन शैली पर प्रकाश डालते हैं। बाद में यह किला लंबे समय तक काकातीय सम्राज्य के अधीन रहा। पर एक हजार साल पुराना किला आज भी बेहतर हाल में दिखाई देता है। पंद्रहवी सदी में यह किला बहमनी सल्तनत के अधीन हो गया। निजाम के शासन में कुतुबशाही के दौरान इस किले का इस्तेमाल लंबे समय तक जेल के रूप में किया जाता रहा। पर ब्रिटिश काल में यह किला लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रहा।


रॉक क्लाइंबिंग की ट्रेनिंग - तकरीबन 500 फीट की ऊंचाई पर यह किला अंडाकार क्षेत्र में बना हुआ है। नीचे से किले तक जाने वाली सीढ़ियां अभी भी अच्छे हाल में हैं। सीढ़ियों की शुरुआत में आधार तल पर एक हनुमान जी का मंदिर है। किले में अस्तबल, तालाब, कुएं आदि का निर्माण कराया गया था। किले के ऊपर से पूरे शहर और आसपास का विहंगम दृश्य बड़ा शानदार दिखाई देता है। 
यहां लोग बताते हैं कि भुवनगिरी किले से गोलकुंडा किले तक कभी सुरंग हुआ करती थी। हालांकि इसकी कोई ऐतिहासिकता नहीं मिलती। भुवनगिरी के किले में एक रॉक क्लाइंबिंग का प्रशिक्षण केंद्र भी संचालित किया जाता है। यहां दूर दूर से सैर सपाटा के शौकीन लोग रॉक क्लाइंबिंग का प्रशिक्षण लेने आते हैं। इस स्कूल की स्थापना 2013 में तेलंगाना टूरिज्म की ओर से की गई।
भुवनगिरी तेलंगाना का छोटा सा शहर है। इसकी आबादी 60 हजार के आसपास है। यहां के बस स्टैंड से हैदराबाद, नलगोंडा समेत आसपास के शहरों के लिए बसें हमेशा मिल जाती हैं। बस स्टैंड सुविधाजनक बना हुआ है। स्टैंड के अंदर छोटा सा बाजार है। मुझे आधे घंटे के इंतजार के बाद नलगोंडा की ओर जाने वाली बस मिल जाती है।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य

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( BHUWANGIRI, BHONGIR, TELANGANA, ROCK CLIMBING ) 

Wednesday, August 15, 2018

दिल्ली से यदाद्रि बालाजी नरसिम्हा के चरणों में

एक बार फिर दक्षिण की ओर। अब तक कितनी बार दक्षिण जा चुका हूं इसकी गिनती मुश्किल है। पर जनवरी 1992 में पहली बार दक्षिण जाना हुआ था। इसके बाद दिसंबर 2006 में। फिर जनवरी 2007 से हैदराबाद लंबा ठिकाना बन गया। फिर हैदराबाद से दिल्ली वापसी हो गई। पर 2012 में एक बार फिर दक्षिण की लंबी यात्रा। उसके बाद तकरीबन हर साल दक्षिण के किसी न किसी हिस्से में जाना हुआ। दक्षिण भारत की कई बातें अच्छी लगती हैं। खासतौर पर खाना पीना, मंदिर और ऐतिहासिक विरासत के स्थल।
इस बार हमारी उड़ान टी-2 से है। सुबह 3 बजे टी 2 के प्रवेश द्वार पर पहुंच गया हूं। टी-3 से टी-2 जाने के लिए एक लंबा गलियारा बन गया है। हालांकि टी-3 की टी2 विशाल और आकर्षक नहीं है। चेकइन के बाद गो एयर के विमान का इंतजार। 
एयरोब्रिज के बजाय बसों में सवार होकर विमान तक पहुंचाया गया। हालांकि टी-2 में एयरोब्रिज की सुविधा है। सुबह 5.40 की उडान है।पायलट हैं कैप्टन दीप वर्धन, को पायलट आदित्य पाटिल। क्रू मेंबर हैं सुमित, अयान, सिमरन और प्रज्ञा। मुझे सीट नंबर 5 एफ मिली है। खिड़की वाली सीट। पर मैं रात भर जगा हूं सो फ्लाइट में सीट पर आते ही सो गया। 
 हैदराबाद के राजीव गांधी विमानपत्तन पर साढ़े सात बजे सुबह पहुंच गए हैं हम। वहां से सिटी में जाने के लिए बस। किराया 210 रुपये। हैदराबाद के हर इलाके के लिए बसें मिलती हैं यहां से। मैं उप्पल वाली बस में बैठा। एक घंटे बाद उप्पल में उतर गया। सड़क पार करके भुवनगिरी-यादगिरीगुट्टा जाने वाली बस तुरंत मिल गई। एक घंटे का रास्ता है उप्पल से।

तेलंगाना की के चंद्रशेखरराव की सरकार ने यदाद्रि-भुवनगिरी को नया जिला बना दिया है। पहले यह नलगोंडा जिले का हिस्सा था। भुवनगिरी जिले का मुख्यालय है। भुवनगिरी काजीपेट-सिकंदराबाद लाइन का रेलवे स्टेशन भी है। बस भुवनगिरी बस स्टैंड में पहुंची। वहां से फिर यदाद्रि के लिए चल पड़ी। कोई 11 किलोमीटर और आगे। पुराना नाम तो यादगिरीगुट्टा है, पर अब छोटा नाम दिया गया है यदाद्रि। बस ने यदाद्रि स्टैंड के अंदर उतार दिया। पर मंदिर जाना है तो स्नान करना जरूरी है। सुलभ में स्नानागार की सुविधा 30 रुपये में है।
स्नान कर कपड़े बदल कर मंदिर जाने वाली बस में बैठ गया। मंदिर यहां 4 किलोमीटर ऊंची पहाड़ी पर है। रास्ता बहुत अच्छा बन गया है। तेलंगाना रोडवेज की बस चलती है मंदिर के प्रवेश द्वार तक। किराया 10 रुपये। वैसे आटो वाले भी 10 रुपये में ले जाते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के बाहर श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ है। काफी संख्या में ग्रामीण लोग पहुंचे हैं।यदाद्रि के बालाजी नरसिम्हा का मंदिरतेलंगाना का सबसे बड़ा मंदिर है। एक घंटे लाइन में लगे रहने के बाद बालाजी नरसिम्हा के दर्शन लाभ प्राप्त हो गए। मंदिर के निकास द्वार पर प्रसाद मिल रहा है।

तो लेमन राइस, नमकीन चावल मंदिर का प्रमुख प्रसाद है। मंदिर के रास्ते में खिलौनों की भी दुकाने हैं। ये खिलौने देखकर अपना बचपन याद आ जाता है। जब हम रुक कर मचल उठते थे। पर मैं एक बार फिर यहां अपना पसंदीदा कच्चे आम खाता हूं। दक्षिण  कच्चे आम को बड़े सुंदर ढंग से काटकर बेचते हैं। सिर्फ 10 रुपये में। मंदिर से लौटकर बस स्टैंड के पास एक रेस्टोरेंट में वेज बिरयानी खाई।
वेज बिरयानी 35 रुपये में - स्वाद अच्छा है...
यहां वेज बिरयानी सिर्फ 35 रुपये में मिली। दही-रायता के साथ। खूब स्वाद है। अब दोपहर हो चुकी है। आगे का सफर आटो रिक्शा से हुआ भुवनगिरी तक। रास्ते में यादगीर का रेलवे स्टेशन दिखाई दिया। पर आपको यदाद्रि आना हो तो हैदराबाद से रेल या बस से भुवनगिरी आएं। भुवनगिरी भी रेलवे स्टेशन है। भुवनगिरी में भी रहने खाने पीने के अच्छे इंतजामात उपलब्ध हैं।
-    - विद्युत प्रकाश मौर्य  

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Tuesday, August 14, 2018

लखनऊ की बारादरी और मैगलगंज का कालाजाम

लखनऊ के विकास नगर से निकलने के बाद कैसरबाग डिपो जाने के लिए शेयरिंग आटो रिक्शा में बैठ गया। आटो वाले भाई ने कैसरबाग से थोड़ा पहले उतार दिया और कहा, सामने बारादरी पार करके चले जाइए बस डिपो पहुंच जाएंगे।
बारादरी मतलब लखनऊ की एक ऐतिहासिक इमारत। कैसर बाग के अंदर पूर्वी और पश्चिमी दीवार के मध्य में बारादरी का निर्माण कराया गया था। अवध के अंतिम शासक वाजिद अली शाह द्वारा निर्मित यह यादगार इमारत है। सन 1850 में वाजिद अली शाह ने इसका निर्माण अपने निजी उपयोग के लिए कराया था। कहा जाता है कि मुहर्रम के समय इस बारादरी का प्रयोग साहिबे आलम ( वाजिद अली शाह) स्वयं करते थे। पत्थरों से बनी इस इमारत को प्रारंभ में ही चूने से रंग कर सफेद बना दिया गया था। 

आज भी दूर से दिखाई देने वाली सफेद रंग की ये इमारत आकर्षक लगती है। ज्यादा तामझाम के बिना निर्मित इस इमारत में मुगल स्थापत्यकला की झलक दिखाई देती है। इस भवन में जगह जगह कांच का इस्तेमाल किया गया है जो फ्रांसिसी स्थापत्य कला से प्रभावित जान पड़ता है। जब 1857 की क्रांति हुई तब इस बारादरी का इस्तेमाल बेगम हजरत महल ने अपने सैनिकों के राशन आदि रखने के लिए भी किया। बारादरी की इमारत को देखकर नहीं लगता कि यह 150 साल से ज्यादा पुरानी है।
लाखी दरवादजा - बारादरी से आगे चलने पर कैसर बाग का विशाल प्रवेश द्वार नजर आता है जो लाल बलुआ पत्थर से बना है। इसमें विशाल लकड़ी और लोहे के द्वार लगे हैं। अब इस गेट से वाहन गुजरते रहते हैं। पश्चिमी कैशर बाग गेट राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित स्मारक है। इसे लाखी दरवाजा भी कहते हैं। 1847 से 1850 के बीच इस विशाल द्वारा का निर्माण कराया गया तो इस पर एक लाख रुपये का खर्च आया इसलिए इसे लाखी दरवाजा नाम मिला। यह दरवाजा वाजिद अली शाह के समय के कैसरबाग के वैभव को बयां करता है। इसके खूबसूरत मेहराबों पर दो मछलियां बनी हैं जो अवध का राज चिन्ह हुआ करती थीं। इन मछलियों के बीच आसफी गुलदस्ता बना है। इसे हिंद इरानी बूटा भी कहते हैं।
लाखी दरवाजा से आगे निकल कर बर स्टैंड आ गया हूं। बस समय पर आकर प्लेटफार्म पर लग गई है। कंडक्टर टिकट चेक करने आते हैं, पर वे वर्दी में नहीं हैं। उनका बातचीत करने का अंदाज भी भदेस है। हमें दक्षिण भारत से लग्जरी बसों के संचालन के मामले में काफी कुछ सीखने की जरूरत है। खैर बस निकल पड़ी है। बस में हर सीट के पास मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट है। लखनऊ शहर से निकल कर सीतापुर होते हुए लखीमपुर खीरी जिले में बस प्रवेश कर गई है।
मैगलगंज का काला जामुन - रात नौ बजे के आसपास नेशनल हाईवे के किनारे खीरी जिले में मैगलगंज में एक ढाबे पर बस खाने के लिए रूकी। अपना टूरिस्ट होटल में खाने की थाली 90 रुपये की है। नेशनल हाइवे के किनारे बसा लखीमपुर खीरी जिले के मैगलगंज कस्बे के कालाजाम यानी गुलाब जामुन और रसगुल्ले पूरे प्रदेश में मशहूर हैं। खोए से बनने वाले मुलायमआकार में छोटे और रसीले रसगुल्लों की दुकानें पूरे हाइवे पर सजी हैं। बात सिर्फ मैगलगंज की नहीं है। पड़ोस के जिले हरदोई के जहानीखेड़ा में भी इन्हीं रसगुल्लों का दबदबा है। वहां के व्यापारी भी मैगलगंज के रसगुल्लों के नाम से अपनी दुकान चलाते हैं।
1941 में बनने शुरू हुए रसगुल्ले : मैगलगंज के रसगुल्लों का अलग स्वाद 1941 में श्यामलाल हलवाई ने खोजा था। उन्होंने पहली बार यह दुकान खोली थी। इसके बाद मैगलगंज का नाम ही इन रसगुल्लों के लिए प्रसिद्ध हो गया। कई नामचीन हस्तियों ने हाइवे पर रुककर रसगुल्लों का स्वाद लिया है। यहां रसगुल्ले या गुलाब जामुन 15 रुपये के दो मिल रहे हैं। दरें काफी वाजिब हैं। आप ज्यादा खरीदें तो मटके में पैक करके दे देतें हैं।
बस आगे चल पड़ी है। शाहजहां पुर, बरेली सेटेलाइट के बाद मुरादाबाद होते हुए गढ़ मुक्तेश्वर के आगे बस एक बार फिर सुबह 4 बजे एक ढाबे पर रुकी। मैं नींद में ही था अचानक कि अचानक देखा गाजियाबाद के मोहन नगर में बस रुकी है। मैं तुरंत उतर कर अपने घर जाने वाली आटो में बैठ गया।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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(BARADARI, LUCKNOW, MAIGALGANJ, KHIRI, UPSRTC BUS TO DELHI)
आगे ...चलिए दक्षिण भारत की लंबी यात्रा पर ... पढ़ते रहिए . .दानापानी और हमारे साथ देखिए सारा देश...

Sunday, August 12, 2018

पटना से दिल्ली वाया लखनऊ - कुछ अपनों से मुलाकातें

पटना से 22 तारीख को भागलपुर गरीब रथ से दिल्ली वापसी के लिए मेरा कनफर्म टिकट था। अचानक 21 की शाम को मोबाइल पर संदेश आया कि आपकी ट्रेन रद्द हो गई है। रेलवे आजकल अनिश्चित लेट होने पर कई ट्रेनों को अचानक रद्द कर दे रहा है। एक दिन पहले संपूर्ण क्रांति के रद्द होने की खबर पढ़ी थी। अब मेरा दिल्ली जाना मुश्किल में पड़ गया है। देर रात गए चेक किया तो पाटलिपुत्र लखनऊ एक्सप्रेस के चेयरकार में लखनऊ तक का टिकट 22 तारीख में उपलब्ध है। मैंने उसमें रात 2 बजे ही मोबाइल से आरक्षण करा लिया। हालांकि पाटलिपुत्र जंक्शन से बाद दोपहर 3.15 बजे खुलने वाली ट्रेन शाम को पौने छह बजे खुली।

तब तक नए बने पाटलिपुत्र जंक्शन स्टेशन के बाहर इंतजार में लिट्टी चोखा खाता रहा। पाटलिपुत्र लखनऊ एक्सप्रेस हाल में शुरू हुई अच्छी ट्रेन है, यह बिहार और उत्तर प्रदेश की राजधानी को जोड़ती है। ट्रेन नए बने दीघा-पहलेजा रेलपुल से गुजरी। पुल शुरू हुए दो साल हो गए हैं पर अभी इसकी दूसरी लाइन चालू नहीं हो सकी है। पटना की तरफ एक दीघा पुल हाल्ट बना है। तो सोनपुर की तरफ हरपुरवा पहलेजा रेलवे स्टेशन। ट्रेन दीघवारा, छपरा, सीवान होती हुई चल रही है। कई साल बाद इस रेल मार्ग पर सफर कर रहा हूं। 

गोरखपुर से पहले कुसुम्ही के जंगल के पास एक स्टेशन पर ट्रेन आधे घंटे यूं ही रुक गई। गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर वाटर एटीएम से पानी लिया। यहां ट्रेन 10 मिनट रुकी। इसके बाद मुझे नींद आ गई। सुबह ट्रेन बाराबंकी को पार कर लखनऊ शहर में प्रवेश कर रही थी। प्रधानमंत्री को स्वच्छ भारत अभियान को धता बताते हुए लोग रेलवे लाइन के किनारे निपटान कर रहे हैं। ऐसा नजारा दिल्ली में भी खूब दिखाई देता है। ट्रेन ढाई घंटे लेट साढ़े छह बजे सुबह लखनऊ जंक्शन पहुंची है। सुबह दिल्ली जाने वाली गोमती एक्सप्रेस भी रद्द चल रही है। वैसे चल भी रही होती है तो लेट होने के कारण उस ट्रेन को पकड़ना मुश्किल होता।

मैं अब दिल्ली तक का सफर बस से तय करने की योजना बनाता हूं। रेलवे स्टेशन से कैसरबाग डिपो पहुंच गया। दिल्ली की अगली बस आठ बजे है। पर वह रात को 9 बजे आनंद विहार पहुंचाएगी। मतलब उस बस से जाकर भी मैं दफ्तर नहीं जा सकूंगा। शाम को 6 बजे तक भी आनंदविहार पहुंचने पर दफ्तर जा सकता था। सो अब तय किया कि भारी गर्मी में बस में दिन का सफर तय करने से बेहतर होगा कि रात की बस से दिल्ली जाया जाए। शाम को 7.30 बजे वाली जनरथ एक्सप्रेस में अग्रिम आरक्षण करा लिया।

बस कैसरबाग डिपो से ही खुलेगी। यूपी रोडवेज के कैसरबाग डिपो का कायाकल्प हुआ है। स्टेशन की बिल्डिंग रंगरोगन किया गया है। प्रथम तल पर एक अच्छा रेस्टोरेंट भी बना है, पर वह बंद है। अग्रिम बुकिंग काउंटर पर कैशलेस पेमेंट की कोई सुविधा नहीं है। देश के सबसे बड़े राज्य यूपी के लिए शर्मनाक स्थिति है। खैर बस का टिकट बुक करा लेने के बाद हमारे पास अब दिन भर का समय है। शायद मैं सातवीं या आठवीं बार लखनऊ शहर में हूं।


 हमारे दिल्ली कई साल तक स्थानीय अभिभावक रहे रामकृपाल मौर्य जी को फोन किया। वे अब लखनऊ शिफ्ट हो गए हैं। वे अपने घर का पता और आने का रास्ता बताते हैं। मैं उनसे मिलने चल पड़ा। कई सालों बाद मिलना हुआ। सुखदुख साझा किया। कुछ घंटे साथ गुजारने के बाद अपने एक और पुराने साथी से मिलना तय किया। अशोक वाजपेयी हमारे अग्रज पत्रकार। हमारी पहली नौकरी कुबेर टाइम्स के 1996-97 के साथी। विकास नगर में रहते हैं। लंबे समय से हिन्दुस्तान लखनऊ में हैं। संयोग से आज अवकाश पर भी हैं। 1998 के बाद 20 साल बाद उनसे मिलना हुआ। इस बीच हम दोनों की उम्र में 20-20 साल का इजाफा हो गया है।
अशोक जी के बेटे पढ़ाई में अच्छा कर रहे हैं। टीआईएसएस, महाराष्ट्र में स्नातक कक्षा में अध्ययनरत हैं। अशोक भाई के घर सात्विक घर का खाना खाकर और छाछ पीकर आनंद आ गया। कुछ घंटे गप्पे लड़ाते और ज्ञान की बातें साझा करते शाम गहराने लगी, तो मैंने उनसे विदा ली। अब दिल्ली की बस पकड़नी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य   
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(LUCKNOW, PATNA, RAIL, KAISHAR BAG DEPOT ) 

Friday, August 10, 2018

पटना का गांधी संग्रहालय – चरखा चलता बापू का...

पटना की धरती को सौभाग्य प्राप्त है कि बापू 1917 में चंपारण जाते समय में पटना में रुक कर आगे के सफर पर गए थे। पटना में बापू की स्मृति में जो स्थल हैं उनमें गांधी संग्रहालय प्रमुख है। गांधी मैदान के एक कोने पर गोलघर के पास स्थित यह संग्रहालय छात्रों और बापू में रूचि रखने वालों के लिए सुंदर स्थल है। परिसर में एक साहित्य स्टाल भी है जहां से गांधी और सर्वोदय से जुड़ा साहित्य खरीदा जा सकता है।
परिसर में प्रवेश करते ही राष्ट्रीय एकता का संदेश देती सुंदर मूर्ति दिखाई देती है। बायीं तरफ बापू और टैगोर दो महान आत्माओं के मिलन को मूर्तियां बना कर प्रदर्शित किया गया हैं। आगे बापू और बा (कस्तूरबा) की सुंदर मूर्तियां बनाई गई हैं। अंदर संग्रहालय में जाने के लिए कोई प्रवेश टिकट नहीं है। बस रजिस्टर में अपना परिचय अंकित करें। रोज बड़ी संख्या में स्कूली छात्र यहां पहुंचते हैं। संग्रहालय बहुत बड़ा नहीं है। पर बापू के जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष पर अच्छा प्रकाश डालता है।

संग्रहालय से बाहर आने पर इस परिसर में
ही राजकुमार शुक्ल की प्रतिमा स्थापित की गई है। कौन राजकुमार शुक्ल । वही किसान जो बापू को चंपारण बुलाने में काफी संघर्ष के बाद सफल हो सके थे। यहां पर शुक्ल का छोटा सा परिचय भी लिखा है। बापू को मोहन से महात्मा बनाने में इस महान किसान का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। राजकुमार शुक्ल का जन्म 23 अगस्त 1875 को चंपारण के चनपटिया में हुआ था। शुक्ल को नील की खेती के कारण काफी कष्ट झेलना पड़ा था। इसलिए वे इसका कोई स्थायी निदान चाहते थे। नील आंदोलन की अगुवाई करने के लिए बापू को चंपारण लाने की उन्होंने काफी कोशिश की जिसमें उन्हे अंततोगत्वा सफलता मिली। 20 मई 1929 को मोतिहारी में उनका निधन हो गया। वे आजाद भारत का का सूरज नहीं देख सके। पर उनकी कोशिशें महान थीं।

गांधी संग्रहालय परिसर में चरखों का विशाल संग्रह देखा जा सकता है। चरखा यानी स्वदेशी और स्वावलंबन का प्रतीक। अलग से बने भवन में 20 से ज्यादा तरह के चरखे यहां देखे जा सकते हैं। इनमें कई चरखे काफी पुराने हैं। यहां आप अंबर चरखा (राजकोट माडल), बिल्कुल साधारण माडल वाला किसान चरखा के अलावा सादा सा बिहार चरखा देख सकते हैं।

बहुत से शहरी बच्चों ने जांता नहीं देखा होगा। वही पीस खाए संसार वाला। तो यह भी देख लिजिए यहां। चक्की का पुराना रूप। चरखों में आगे बसावन बिगहा माडल,  अंबर चरखा का पूसा माडल देख सकते हैं। इसके बाद पेटी चरखा जो एक पोर्टेबल माडल है। इसे आसानी से कहीं ले जाया जा सकता है, इसे भी यहां देखा जा सकता है। यहां चरखे का आधुनिकतम माडल कौवाकोल माडल का चरखा भी देखा जा सकता है।


इस मल्टी काउंट मल्टी फाइबर चरखे को त्रिपुरारी माडल भी कहते हैं। इसे नवादा जिले के कौवाकोल गांव में विकसित किया गया है। यह आठ तकुवे वाला चरखा है। इसमें आठो तुकवे एक साथ चलाए जा सकते हैं। इसमें एक ही चरखे से सूती,  रेशमी, पोली सूत की कताई हो सकती है।
चरखे से आगे बढ़ कर रुई धुनने वाली धुनकी भी यहां देखी जा सकती है। इसके अलावा आप यहां खेत जोतने वाले हल भी देख सकते हैं। धीरे धीरे गांव में हल बैल से खेती खत्म होती जा रही है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
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(PATNA, CHARKHA, BAPU, ) 
हल बैल से होती थी खेती 


कभी घरों में चलता था ऐसा जांता....


Thursday, August 9, 2018

पटना का नया आकर्षण - बिहार संग्रहालय

दिल्ली से पटना का सफर इस बार सीमांचल एक्सप्रेस में हो रहा है। मई 2018 में यह संयोग है कि दिल्ली से ट्रेन समय से चल पड़ी है। वर्ना ज्यादातर ट्रेनें लेट हो रही हैं। हमने इस बार कानपुर में ट्रैवल खाना एप से अपने लिए खाने की थाली बुक की। यह कानपुर के पंडित रेस्टोरेंट से आया। कुल 255 रुपये की थाली। डिलेवरी के लिहाज से देखें तो उनकी सेवा काफी समय पर थी। कानपुर में ट्रेन लेट हो गई थी, पर आर्डर लेकर हमारे कोच के सामने रेस्टोरेंट के प्रतिनिधि हाजिर थे। ये खाना 255 रुपये के लिहाज से थोड़ा महंगा जरूर है, पर रेलवे के खाने से काफी उम्दा है। इसमें थोड़ी क्वांटिटी बढ़ा दें तो अच्छा रहेगा।

खैर ट्रेन पटना पहुंचते-पहुंचते चार घंटे लेट हो गई। लेट तो मुगलसराय तक की काफी हो गई थी। मुगलसराय के बाद तो बिना बाधा के तेज चली। हमलोग नए स्टेशन पाटलिपुत्र जंक्शन पर उतरे। यह दानापुर से गंगा पर नए रेल पुल दीघापुल के मार्ग पर स्टेशन बना है। स्टेशन पर ज्यादा सुविधाएं नहीं है। पर सारी रात आपको पटना जंक्शन और बस स्टैंड के लिए शेयरिंग आटो मिल जाते हैं।  
इस बार के पटना यात्रा में हम बिहार संग्रहलाय देखने पहुंचे। बेली रोड पर पटना हाईकोर्ट के आगे नया विशाल संग्रहालय बना है। इसका प्रवेश टिकट 100 रुपये का है। संग्रहालय रोज 10 से 4.30 बजे तक खुलता है। हर सोमवार को बंद रहता है। छात्रों के आईकार्ड पर 50 फीसदी का टिकट मे डिस्काउंट है।


 संग्रहालय का परिसर पूरी तरह वातानुकूलित है। अगर आपके पास बड़ा बैग है तो काउंटर पर जमा कराने की सुविधा है। संग्रहालय में एक आडिटोरियम है जिसमें हर घंटे एक 12 मिनट का शो होता है। इस शो में बिहार के गौरवशाली इतिहास से रुबरू कराया जाता है। वास्तव में लंबे समय तक मगध देश की राजधानी रहा है। इसलिए जो बिहार का इतिहास है वह काफी हद तक देश का इतिहास है।
संग्रहालय की प्राचीन भारत दीर्घा में काफी मूर्तियां पटना संग्रहालय से ही लाकर यहां रखी गई हैं। इसमें सबसे प्रमुख है दीदारगंज की यक्षिणी जो अब बिहार संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही है। बिहार संग्रहालय में मार्डन आर्ट पेंटिंग की विशाल दीर्घा बनी है जिसमें आप कई जाने माने कलाकारों की पेटिंग देख सकते हैं। इसके साथ ही बिहार की प्रसिद्ध मधुबनी पेंटिंग के कई बेहतरीन नमूने देखे जा सकते हैं।

बिहार संग्रहालय का सबसे खास है बिहार डायस्पोरा खंड। इसमें बिहार के लोगों के मॉरीशस और सूरीनाम जैसे देशों में जाकर बसने की दास्तान को पिरोया गया है। कुछ चित्रों के माध्यम से कुछ कहानियों के माध्यम से। बिहार डायस्पोरा से बाहर निकलें तो बच्चों से सेक्शन में पहुंचे। यहां काफी मनोरंजन है। बच्चों को इतिहास, पुरातत्व और विज्ञान से रूबरू कराने के लिए रोचक आख्यान प्रस्तुत किया गया है। जिसे बड़े भी काफी आनंद से देखते हैं। इसी खंड में सम्राट अशोक के राजसिंहासन को भी देखा जा सकता है। पर यह असली नहीं है, एक परिकल्पना है। आप इस सिंहासन पर बैठकर फोटो भी खिंचवा सकते हैं।
संग्रहालय में जगह-जगह टायलेट्स के बेहतरीन इंतजाम हैं। इसके साथ ही यहां एक कैंटीन भी है। पर इसका खाना पीना काफी महंगा है। तो अब बाहर चलें।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य      
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