Friday, September 20, 2019

टपकेश्वर महादेव – जहां शिव का अनवरत होता है जलाभिषेक


महादेव शिव के देश के अलग अलग हिस्सों में अनूठे मंदिर हैं। उनमें से एक है देहरादून शहर का टपकेश्वर महादेव मंदिर। यह महादेव शिव का अनूठा मंदिर है। गुफा में स्थित इस मंदिर में शिवलिंग पर लगातार गुफा से चल टपकता रहता है। इस तरह शिव का अनवरत जलाभिषेक होता रहता है।

दरअसल टपकेश्वर मंदिर एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है। इस गुफा के अन्दर एक शिवलिंग विराजमान है। इस शिवलिंग पर चट्टानों से लगातार पानी की बूंदे टपकती रहती है। ये पानी की बूंदे स्वाभाविक तरीके से शिवलिंग पर गिरती हैं। इस कारण ही इस मंदिर का नाम टपकेश्वर मंदिर पड़ गया है।

मंदिर को लेकर कई रहस्य-  मंदिर को लेकर कई रहस्य हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यहां मौजूद शिवलिंग स्वयं से प्रकट हुआ है , तो कई लोग बताते हैं कि पूरा मंदिर ही स्वर्ग से उतरा है। यह माना जाता है कि मंदिर अनादि काल से इस स्थान पर विराजित है।

टपकेश्वर मंदिर में दो शिवलिंगम हैं। जिसमे से प्रमुख शिवलिंग स्वयम्भू है अर्थात शिवलिंग को किसी ने बनाया नहीं। मंदिर में दूसरा शिवलिंग पूरी तरह रुद्राक्ष से जड़ा हुआ है। भक्तगण मुख्य शिवलिंग के साथ-साथ दूसरे शिवलिंग के भी दर्शन करते हैं।

महाभारत कालीन मंदिर - यह मंदिर महाभारतकालीन बताया जाता है। कहा जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य को इसी स्थान पर भगवान शंकर से आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। यह भी कि स्वयं महादेव ने आचार्य को धनुर्विद्या और शस्त्र विद्या का ज्ञान दिया था। इस स्थल को महाभारत के पात्र अश्वथामा की जन्म स्थली और तप स्थली भी माना जाता है।  

वैष्णो गुफा मंदिर - टपकेश्वर मंदिर में सभी देवी देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। मंदिर परिसर में मां वैष्णो का भी मंदिर बनाया गया है जिसमें एक प्राकृतिक गुफा है जो कि कटरा स्थित मां वैष्णो देवी के मंदिर जैसा ही है।  इस मंदिर परिसर में हनुमान जी की भी एक विशाल मूर्ति स्थापित की गई है।

तमसा नदी का किनारा - टपकेश्वर मंदिर परिसर से मुख्य द्वार से जब आप आगे बढ़ते हैं तो आपको सैकड़ो सीढ़ियां उतरनी पड़ती है। इसके बाद आप एक मनोरम तमसा नदी के तट पर पहुंच जाते हैं। इसी नदी के किनारे गुफा में टपकेश्वर महादेव का मंदिर है। तमसा नदी में पानी ज्यादा नहीं है पर यहां का नजारा मनोरम है। नदी को पार करने के लिए पुल बना है। नदी के उस पार माता वैष्णो का गुफा मंदिर और दूसरे देवी देवता विराजते हैं। पर यह देखकर दुख होता है कि यहां आने वाले श्रद्धालु तमसा नदी के पानी को गंदा कर रहे हैं। प्रशासन की ओर से एक बोर्ड भी लगा है कि तमसा नदी को स्वच्छ रखने में सहयोग करें। 

मंदिर परिसर में प्रसाद और धार्मिक साहित्य की दुकाने हैं। मंदिर में हर रोज दिन भर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। पर सोमवार के दिन, सावन के महीने में और शिवरात्रि के दिन ज्यादा भीड़ रहती है। मंदिर सुबह से लेकर रात्रि नौ बजे तक खुला रहता है।

कैसे पहुंचे – देहरादून के घंटाघर चौक से गढ़ी कैंट के लिए शेयरिंग आटो रिक्शा मिल जाते हैं। गढ़ी कैंट इलाके में पहुंच कर आप किसी से भी टपकेश्वर महादेव का रास्ता पूछ सकते हैं। अब यह इलाका देहरादून के मुख्य शहरी क्षेत्र में आ गया है। देहरादून बस स्टैंड से मंदिर की दूरी 6 किलोमीटर है।
- vidyutp@gmail.com 
( TAPKESHWAR MAHADEV TEMPLE, DEHRADUN, GARHI CANT ) 



Wednesday, September 18, 2019

देहरादून का रोवर्स केव – डाकुओं की गुफा - गुचू पानी


लैंसडाउन चौक से चली सिटी बस पैवेलियन ग्रांउड, कर्जन रोड, राजापुर रोड होते हुए देहरादून के  कैंटोनमेंट इलाके से गुजरने लगी। इस क्षेत्र में उत्तरखंड सरकार के कई मंत्रियों के निवास हैं। आगे साफ सुथरा कैंट का इलाका आ गया। इस इलाके में ही उत्तराखंड सरकार का स्टेट गेस्ट हाउस बाजपुर हाउस दिखाई दिया। इसी क्षेत्र में मुख्यमंत्री का आवास भी है। ये देहरादून का हरा भरा प्रदूषण मुक्त इलाका है। संभवत इस इलाके को छोड़ कर राजनेता और अधिकारी जाना नहीं चाहते इसलिए देहरादून में ही बने रहना चाहते हैं।

और हम पहुंच गए गुचू पानी - हमें आगे केंद्रीय विद्यालय और मिलिट्री हास्पीटल दिखाई देता है। पर सिटी बस आगे गुचू पानी नामक जगह पर जाकर रुक जाती है। ये गुचू पानी क्या है। हमने यहां आने से पहले गुचू पानी का नाम कभी नहीं सुना था। लेकिन यहां उतरने पर देखा कि काफी लोगों की भीड़ लगी है जो आगे जा रहे हैं। पार्किंग में दर्जनों वाहन लगे हैं। तो हम भी उनके पीछे हो लिए।


मतलब की डाकुओं की गुफा - गुच्चु पानी को राबर्स केव यानी डाकुओं की गुफा भी कहते हैं। इस गुफा की लंबाई 650 मीटर है जिसमें हमेशा घुटने भर पानी रहता है। यह अद्भुत गुफा है जिसके अंदर कई रहस्यपूर्ण रास्ते बताए जाते हैं। इसमें अंदर जाकर काफी रोमांच का अनुभव होता है। इसमें आम तौर पर सालों भर पानी रहता है।

अनूठी और डरावनी गुफा - अद्भुत गुफा डरावनी के साथ-साथ रहस्यपूर्ण भी है। कहने वालों का तो यह भी कहना है की अंग्रेजी शासन में जब डकैत डकैती करने जाते थे तो उसके बाद इसी गुफा में आकर छुप जाते थे।

ब्रिटिश काल में डकैत छुपते थे यहां - यहां पर अंग्रेजी सेना पहुंच नहीं पाती थी क्योंकि इसके रहस्यपूर्ण रास्ते भी थे। जिसकी वजह से डकैत डकैती का सामान और खुद यहां से बच निकलने में कामयाब भी हो जाते थे। पर आज यह रहस्यमयी गुफा यहां आने वाले लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनी रहती है।

झरने के नीचे स्नान का मजा – गुफा के अंदर कई झरने हैं। गुफा का सबसे ऊंचे झरने में 10 मीटर की ऊंचाई से पानी गिरता है। लोग इसमें देर तक नहाने का भी मजा लेते हैं। देहरादून शहर के लोग तो यहां अक्सर आते रहते हैं। वहीं काफी संख्या में दूर-दूर से यहां पर पर्यटक आते हैं और इस गुफा में बहते झरने घुटनों से नीचे तक के पानी में अपना समय का आनंद ही नहीं बल्कि गर्मी से राहत भी पाते हैं।

इस गुफा के चारों तरफ से पानी की धाराएं निकलती है और यह पानी इतना साफ और स्वच्छ है कि चांदी की तरह इस पानी में पत्थर भी चमकते रहते हैं। ये जल धाराएं आगे जाकर नदी में समाहित हो जाती हैं।

कैसे पहुंचे - गुचू पानी के रूप में जानी जाने वाली यह डाकू गुफा देहरादून शहर के केंद्र से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह जगह देहरादून के सबसे लोकप्रिय पिकनिक स्पॉट में से एक है। आप यहां सिटी बस या फिर अपने निजी वाहन से पहुंच सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-        (GUCHU PANI, ROBERS CAVE, DEHRADUN )   


Monday, September 16, 2019

ऋषिकेश से देहरादून की ओर – लैंसडाउन चौक


नीर झरना से लौटकर तपोवन पहुंचने के बाद लक्ष्मण झूला की तरफ चल पड़ा। वैसे तो यहां कई बार आ चुका हूं। पर हर बार यहां आना सुखकर और कुछ नया लगता है। लक्ष्मण झूला के इस पार प्रकाशानंद का मंदिर और धर्मशाला है। 

झूला के इस पार लक्ष्मण जी की विशाल प्रतिमा भी है। यहां पर फ्रूट सलाद खाने और जूस पीने के बाद आगे बढ़ा। पैदल लक्ष्मण झूला पुल पार किया। पर बाद में पता चला कि मैं इस पुल को आखिरी बार ही पार कर रहा हूं। एक महीने बाद जुलाई 2019 में इस पुल को सदा के लिए बंद कर दिया गया। प्रशासन ने पुराना हो जाने के कारण इसे खतरनाक घोषित कर दिया है। 

नहीं जा सका कुंजापुरी - लक्ष्मण झूला पुल के उस पर नीलकंठ जाने के लिए टैक्सियां मिल रही हैं। पर मैं कुछ साल पहले नीलकंठ जा चुका हूं। आज दिन भर का समय है तो कहीं और चलता हूं। मैं कुंजापुरी देवी जाने की योजना बनाता हूं। यह सोचते हुए ऋषिकेश के बस स्टैंड पहुंच गया। वहां चार धाम जाने वाले यात्रियों की चारों तरफ भीड़ है। पता चला सारी बसें चार धाम में लगी हैं। कोई बस टेहरी मार्ग पर नहीं चल रही है। प्राइवेट टैक्सी स्टैंड के यूनियन ने कहा कि कुंजापुरी जाना है तो टैक्सी बुक करके जा सकते हैं। फिर इससे सस्ता हो सकता था कि मैं दिन भर के लिए बाइक या स्कूटी किराये पर ले लेता। तो अब मैं कहीं भी जाने का इरादा त्याग देता हूं। 

देहरादून की ओर - मैं वापस हरिद्वार चलने वाली बस में बैठ गया। हरिद्वार तक का टिकट भी ले लिया। ऋषिकेश शहर से बाहर निकलने पर देहरादून वाले तिराहे पर मैं अचानक बस से उतर गया। मैंने देहरादून जाने का इरादा बना लिया। पर तिराहे पर थोडी देर इंतजार के बाद देहरादून की कोई बस नहीं मिली। एक आटो रिक्शा मिला। उसने कहा मैं बाजवाला तक जाउंगा। वहां से आपको सिटी बसें मिल जाएंगी। तो इस आटो वाले ने हमें जॉली ग्रांट एयरपोर्ट के पास वाले चौराहे पर छोड़ दिया। 

यहां से मुझे देहरादून शहर में जाने वाली सिटी बस मिल गई। सिटी बस में खूब भीड़ है। बैठने की जगह नहीं मिली। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट से विमानन कंपनियों का ग्राउंड स्टाफ इस बस में सफर कर रहा है। बस के कंडक्टर आने वाले स्टाप का नाम बताते जाते हैं। पर मुझे कहां उतरना है ठीक से नहीं मालूम। तो मैं शहर में किसी स्टाप पर उतर जाने का तय करता हूं। बस डोईवाला से आगे बढ़ कर तहसील इलाके से गुजर रही है। इसके बाद गांधी रोड आता है। यह देहरादून का मुख्य बाजार वाला इलाका है। 

लैंसडाउन चौक पर - गांधी रोड से आगे चलकर लैंसडाउन चौक पर मैं उतर गया। उत्तराखंड में कोटद्वार से आगे लैंसडाउन नामक जगह पर यहां लैंसडाउन के नाम पर चौराहा है। यहां से मैं टपकेश्वर महादेव मंदिर जाना चाहता हूं। बस के कुछ सहयात्रियों ने बताया कि मुझे टपकेश्वर महादेव के लिए बस लैंसडाउन चौक से ही मिल जाएगी। लैंसडाउन चौक देहरादून का वह इलाका है जहां से हर जगह के लिए सिटी बसें मिल जाती हैं। तो मैं यहां से एक दूसरी बस में बैठ गया। उन्होंने मुझे भरोसा दिलाया कि वे टपकेश्वर महादेव मंदिर के पास मुझे छोड़ देंगे। थोड़ी देर बाद सिटी बस आगे के लिए चल पड़ी।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
( RISHIKESH, DEHRADUN ) 

Saturday, September 14, 2019

ऋषिकेश का नीर झरना – जंगल में मंगल


हरिद्वार के देव संस्कृति विश्वविद्लाय से सुबह सुबह ऋषिकेश के लिए निकल पड़ा। हालांकि ऋषिकेश तो कई बार पहले भी आना हुआ है। पर इस बार हमारा लक्ष्य था नीर झरना तक पहुंचना। सुबह सुबह शांतिकुंज के बाहर आटो रिक्शा मिला गया उसने मुझे ऋषिकेश में लक्ष्मण झूला तक छोड़ दिया। अब लक्ष्मण झूला से नीर झरना की दूरी कोई तीन किलोमीटर है। पर यहां से आगे जाने के लिए कोई साधन नहीं मिला। मैं सड़क पर सीधे चल पड़ा , पैदल पैदल। बद्रीनाथ हाईवे पर। दूरी बताने वाला बोर्ड जिस पर लिखा है बद्रीनाथ 291 और केदारनाथ 223 किलोमीटर।

 तपोवन से पैदल पैदल -  गंगाजी की धारा के साथ चलती हुई सड़क। सुबह सुबह गंगा में राफ्टिंग करती नावें दिखाई दे रही हैं। रास्ते में कुछ लोग मिले सुबह की सैर करने वाले। एक महिला से मैंने पूछा नीर झरना। बोलीं आप सही जा रहे हैं। तो दो किलोमीटर से ज्यादा चलने के बाद एक पड़ाव आया। यहां से नीर झरना के लिए बायीं तरफ सड़क जाती है। 


वहां पर संकेतक लगा है। पर आप कभी जाएं तो दाहिनी तरफ महादेव रेस्टोरेंट, नीर बुद्धा गेस्ट हाउस समेत दो तीन रेस्टोरेंट मिलेंगे। नीर झरना का नाम नीर गुड्डू भी है। दायीं तरफ की थोड़ी चढ़ाई चढ़ने पर नीर झरना का टिकट काउंटर है। प्रति व्यक्ति प्रवेश 30 रुपये। आधार कार्ड भी दिखाना पड़ता है।

वह अनजान साथी - इसके बाद फिर  आगे चढ़ना शुरू कर दी। एक रास्ता सड़क मार्ग का है तो दूसरा छोटा रास्ता जंगलों से होकर है। मैंने जंगलों वाला पैदल रास्ता अख्तियार किया। आधा किलोमीटर चलता रहा। एक अनजान कुत्ता मेरे साथ चलने लगा। जैसे ही नीर झरना की की कल कल बहती धारा दिखाई दी मैं रूक गया। पर वह कुत्ता अब गायब हो गया था। शायद मेरे अकेले मार्ग का साथी बनकर आया था। अभी झरने के पास मेरे अलावा कोई नहीं है। मैं कपड़े उतार कर नहाने के लिए कूद गया। काफी देर स्नान के बाद वापसी के लिए चल पड़ा।

गरम हो रहे पहाड़ - वापस लौटते समय कुछ परिवारिक के लोग आते दिखाई दिए। थोड़ी देर बाद एक ग्रामीण विजेंद्र मिल गए। उन्होंने बताया कि झरने से दो किलोमीटर ऊपर नीर गांव है उसी गांव में रहता हूं। बातें होने लगी। कहने लगे, मेरे गांव में भी टूरिस्ट कैंप लगने लगे हैं। पर अब इन पहाड़ों पर बारिश कम होती है। जो खेती है उसे दिन में बंदर तो रात में भालू जैसे जंगली जानवर खा जाते हैं। गांव में कोई रोजगार नहीं। हमारे गांव के लोग दिल्ली जाकर होटलों में रेस्टोरेंट में छोटी मोटी नौकरियां कर रहे हैं।

हम बद्रीनाथ हाईवे पर पहुंच चुके हैं। देख रहा हूं ऋषिकेश कर्ण प्रयाग रेल लिंक का काम शुरू हो चुका है। गांव वाले साथी इस रेल लाइन को लेकर काफी चिंता में हैं। यह रेल लाइन पहाड़ का सीना चीर देगी। हिमालय की प्राकृतिक स्थित के साथ बड़ा छेड़छाड़ हो रहा है। आखिर क्या जरूरत है इस रेलवे लाइन की। वैसे भी बद्री केदार का मार्ग साल के छह महीने बंद ही तो रहता है।

नहीं जा सका वशिष्ठ गुफा -  नीर झरना से आगे मैं वशिष्ठ गुफा जाना चाहता हूं। यह शिवपुरी से आगे गूलर के पास है। पर यहां से कोई बस नहीं मिली। काफी इंतजार के बाद। अंत में यहीं पर नास्ते में एक आलू पराठा खाने के बाद वापस तपोवन की तरफ चल पड़ा।वापसी में भी कोई सवारी या लिफ्ट नहीं मिली। पैदल पैदल ही मां गंगा का दर्शन लाभ प्राप्त करते हुए लक्ष्मण झूला तक पहुंचा।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( HARIDWAR, RISHIKESH, TAPOWAN, NEER JHARNA ) 


Friday, September 13, 2019

देव संस्कृति विश्वविद्यालय - शिक्षा के साथ स्वावलंबन भी


हरिद्वार ऋषिकेश मार्ग पर शांतिकुंज से थोड़ा आगे देव संस्कृति विश्वविद्यालय का परिसर है। सन 2002 में गायत्री परिवार ने इस विश्वविद्यालय की शुरुआत की। यह विश्वविद्यालय 70 एकड़ में आम बाग में बना हुआ है। कभी यह बिड़ला परिवार का आम का बगान हुआ करता था। विश्वविद्यालय के तमाम भवन के निर्माण के बीच आम के बगान को संरक्षित रखा गया है। इस तरह के बागीचे बन गया है उच्च शिक्षा का सुंदर केंद्र।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय बीसीए, पर्यावरण विज्ञान, ग्राफिक्स एनीमेशन, पत्रकारिता जनसंचार, टूरिज्म मैनेजमेंट जैसे पाठ्यक्रमों का संचालन करता है। सभी पाठ्यक्रम रोजगार परक हैं। पर इन पाठ्यक्रमों के साथ छात्रों को स्वावलंबी बनाने और अच्छा इंसान बनाने की शिक्षा दी जाती है। छात्रों को योगासान, प्राणयाम , यज्ञ कराना भी सिखाया जाता है। इसके साथ ही छात्रों को पढ़ाई के दौरान सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की कोशिश की जाती है। इसके तहत छात्रों को कुछ दिनों के लिए अलग अलग राज्यों के ग्रामीण अंचल में इंटर्नशिप के लिए भेजा जाता है। मतलब सिर्फ पढ़ाई सिर्फ किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों का की शिक्षा देने पर भी जोर रहता है देव संस्कृति विश्वविद्यालय का।

विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रमुख डॉक्टर सुखनंदन सिंह के सौजन्य से परिसर का मुआयना करने का मौका मिला। परिसर में एक विशाल गौशाला भी है। इसमें सैकड़ो गाय रहती हैं। यहां पर इन गायों का घी आप चाहें तो खरीद सकते हैं।

विश्वविद्यालय परिसर में स्वावलंबन केंद्र भी है। इसमें स्वरोजगार शुरू करने के लिए अल्पकालिक प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके तहत जैम,अचार, मुरब्बे बनाना और दूसरे कई तरह के प्रशिक्षण भी शामिल है। यहां देश भर से कार्यकर्ता प्रशिक्षण प्राप्त करने आते है। मांग होने पर ऐसा केंद्र देश के दूसरे शहरों में भी संचालित किया जाता है।

वस्त्र निर्माण केंद्र - आपने खादी के बारे में सुना होगा। पर आप देव संस्कृति विश्वविद्यालय परिसर में खादी के वस्त्रों निर्माण की पूरी प्रकिया देख सकते हैं। धागे से करघे की मदद से रंग बिरंगे वस्त्रों का निर्माण करने के बाद इन वस्त्रों की यहां पर बिक्री भी की जाती है। यहां आने वाले कार्यकर्ता चाहें तो वस्त्र निर्माण का प्रशिक्षण भी ले सकते हैं।


कागज निर्माण केंद्र -  वस्त्र निर्माण के अलावा यहां पर हैंड मेड पेपर निर्माण का भी बड़ा केंद्र है। आप कागज बनाए जाने की पूरी प्रकिया को यहां पर करीब से देख और समझ सकते हैं। भले विशाल मिलों में बड़े पैमाने पर कागज बनता हो पर हैंड मेड पेपर अपनी कलात्मकता के लिए जाने जाते हैं। ऐसे कागज की बाजार में मांग बनी हुई है।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र स्वावलंबन की इन प्रक्रिया से रूबरू होते  रहते हैं। यहां पर अधिकतम छात्र और छात्राओं के लिए आवासीय सुविधा उपलब्ध है। छात्रावास में छात्रों को सात्विक शाकाहारी भोजन दिया जाता है। विश्वविद्यालय परिसर में सुबह सुबह एक काउंटर है जहां पर कई फलों और सब्जियों का जूस रियायती दरों पर मिलता है।

सभी पाठ्यक्रमों में प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के आधार पर होता है। हां विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए ली जाने वाली फीस भी निजी विश्वविद्यालयों की तुलना में काफी कम है। अब तक यहां से कई हजार छात्र विभिन्न पाठ्यक्रमों से उतीर्ण होकर निकल चुके हैं।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
(DSV, SHANTI KUNJ, HARIDWAR, UTTRAKHAND ) 
   
    

   

Thursday, September 12, 2019

शांति कुंज हरिद्वार - आध्यात्मिक चेतना का केंद्र


हरिद्वार ऋषिकेश मार्ग पर स्थित शांतिकुंज आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख केंद्र है। यहां जितनी बार भी जाएं नई प्रेरणा और नई ऊर्जा मिलती है। मैंने शांतिकुंज का नाम बचपन में पांचवी-छठी कक्षा में पढ़ाई के दौरान सुना था। वैशाली जिले के कन्हौली में हमारे घर एक सज्जन आते थे विभूति भूषण। उन्होंने हमें युग निर्माण योजना के बारे में बताया था। वैशाली जिले के डुमरी गांव में गायत्री शक्तिपीठ की स्थापना की गई थी। उनके सौजन्य से ही हमें अखंड ज्योति पत्रिका पढ़ने को मिली। उसके बाद ये पत्रिका हमारे घर में नियमित आती रही।

पहली बार शांतिकुंज जाने का मौका 1991 में मिला। उसके बाद 1993 में। उसके बाद तो कई बार जा चुका हूं। आप शांति कुंज में दर्शन या हवन पूजन के लिए जाना चाहते हैं तो यहां पर श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क आवास उपलब्ध कराया जाता है। इसके लिए आपको प्रवेश द्वार पर अपना परिचय देना पड़ता है। आजकल प्रवेश के लिए आधार कार्ड साथ होना जरूरी हो गया है। ऐसा सुरक्षा कारणों से किया गया है। आम तौर पर दर्शन करने आने वाले श्रद्धालु यहां अधिकतम तीन दिवस रूक सकते हैं।

गायत्री परिवार से जुड़े हुए कार्यकर्ता यहां पर 10 दिन का आध्यात्मिक जीवन का पाठ्यक्रम करने भी आते हैं। इसके लिए पहले से आरक्षण कराना पड़ता है। ऐसे सत्र सालों भर चलते रहते हैं। अगर आप गायत्री परिवार से जुड़े कार्यकर्ता हैं तो यहां एक माह या उससे अधिक का समय दान देकर कार्य भी कर सकते हैं।
शांति कुंज आने वाले श्रद्धालु यहां पर आकर युग निर्माण योजना के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य और माता भगवती देवी शर्मा की समाधि पर दर्शन के लिए जरूर जाते हैं। काफी लोग समाधि के आसपास बैठकर ध्यान लगाते हैं। इन समाधि के नाम प्रखर प्रज्ञा और सजल श्रद्धा दिए गए हैं।

हर रोज सुबह यहां पर आप हवन में हिस्सा ले सकते हैं। हवन के लिए धोती धारण करना पड़ता है जो यहां उपलब्ध हो जाती है। यह तकरीबन एक घंटे की प्रक्रिया है। आगे आप यहां 1926 से अनवरत प्रज्जवलित अखंड ज्योति के दर्शन लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

अब शांतिकुंज का नया आकर्षण बन गया हिमालय दर्शन। देवात्मा हिमालय मंदिर में आप दर्शन कर हिमालय का विलक्षण अनुभव प्राप्त कर सकते हैं। इसके बगल में देव संस्कृति दिव्य दर्शन स्थित हैं। यहां बने सुंदर फव्वारे और आयुर्वेदिक उद्यान आपका मन मोह लेते हैं। इसके आगे हरितिमा देवालय का निर्माण किया गया है। इन सबके साथ समय गुजारना आत्मिक शांति की अनुभूति प्रदान करता है।

शांतिकुंज में श्रद्धालुओं के लिए सुबह और शाम भोजन (प्रसाद) का निःशुल्क इंतजाम है। यहां हजारों लोग प्रतिदिन भोजन करते हैं। यहां भोजनालय में लोगों के लिए सात्विक भोजन परोसा जाता है। इसके अलावा यहां पर अत्यंत रियायती दर वाली कैंटीन भी है। इसमें प्रज्ञा पेय जो चाय का विकल्प है के अलावा आप अंकुरित चने समेत कई तरह क नास्ता और मिठाइयां प्राप्त कर सकते हैं।    
शांतिकुंज की दिनचर्या सुबह 3.30 बजे से आरंभ हो जाती है। शयन का समय रात्रि नौ बजे का है। यहां रहने वाले लोगों को इस दिनचर्या का पालन करना पड़ता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
(SHANTI KUNJ, HARIDWAR, YUG NIRMAN YOJNA, GAYATRI SHAKTI PEETH ) 

       





Tuesday, September 10, 2019

और इस तरह गयासपुरा बन गया निजामुद्दीन

दिल्ली की बस्ती निजामुद्दीन। हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर आने के बाद सड़क के उस पार एक बस्ती गुलजार है जिसका नाम है निजामुद्दीन। उसे यह नाम महान सूफी संत हजरत निजामुद्दीन के नाम पर मिला। कौन थे हजरत निजामुद्दीन। महान शायर अमीर खुसरो के गुरू।  


वे चिश्ती घराने के चौथे संत थे। इस सूफी संत ने वैराग्य और सहनशीलता का संदेश दिया। उनके बारे में कहा जाता है कि 1303 में इनके कहने पर बादशाह की सेना ने हमला रोक दिया था। अपने महान संदेशों के कारण वे सभी धर्मों के लोगों के बीच लोकप्रिय बन गए। उनका जन्म 9 अक्तूबर 1228 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था। पांच साल की उम्र में पिता अहमद बदायूंनी के निधन के बाद वे अपनी मां जुलेखा के साथ दिल्ली आ गए।

बाबा फरीद के शिष्य - 
वे बड़े हुए तो सूफी संत फरीदुद्दीन गंज शक्कर ( बाबा फरीद ) के शिष्य बन गए। शुरुआत में वे पाकिस्तान के अजोधन नामक कस्बे में रहते थे और वहीं अपनी आध्यात्मिक पढ़ाई कर रहे थे। बाद में बाबा फरीद ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

हजरत निजामुद्दीन ने दिल्ली के गयासपुरा इलाके को अपना निवास बनाया। तब यह विरान इलाका हुआ करता था। यह यमुना नदी और दक्षिण में बहते एक नहर के बीच का इलाका था। यह शहर के शोर शराबे से दूर शांत इलाका था। यहां उन्होंने एक खानकाह शुरू की जहां गरीबी अमीरी का भेद भुलाकर विभिन्न समुदाय के लोगों को खाना खिलाया जाता था। यह सिलसिला आज भी जारी है। शेख निजामुद्दीन के दो शिष्य प्रसिद्ध हुए शेख नसीरुद्दीन मुहम्मद उर्फ चिरागे दिल्ली और अमीर खुसरो।

चल खुसरो घर आपने – 
हजरत निजामुद्दीन का इंतकाल 3 अप्रैल 1325 को दिल्ली में हुआ। उनके निधन पर उनके शिष्य खुसरो बहुत निराश हुए। उन्हे दुखी होकर लिखा – चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहुं देश... जब 92 साल की उम्र में उन्होंने प्राण त्यागे तो उनके मकबरे का निर्माण शुरू हो गया। तकरीबन 1562 तक उनके मकबरे का निर्माण चलता रहा। उनका मकबरा बहुत भव्य नहीं है पर हिंदू और मुसलमान सभी वर्गों के लोग वहां हमेशा से पहुंचते हैं। इसके साथ ही यह जगह दुनिया भर में मशहूर हो गई। यहां सालाना उर्स  लगता है तब लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

निजामुद्दीन की अनूठी बाउली -
सन 1321-22 में दिल्ली सल्तनत पर गयासुद्दीन तुगलक का शासन था। वह अपनी राजधानी तुगलकाबाद बसाने में व्यस्त था तो निजामुद्दीन में रह रहे सूफी संत गरीबों के लिए खानकाह का इतंजाम कर रहे थे तो पीने के पानी के लिए विशाल बावड़ी खुदवा रहे थे। सुल्तान चाहता था कि दिल्ली के मजदूर कहीं और काम नहीं करें। तो रात की रोशनी में मजदूर आकर निजामुद्दीन में बावड़ी खोद रहे थे। इस बावड़ी में कुल सात जल स्रोत हैं। इनसे हमेशा पानी निकलता रहता है। चौदहवीं सदी में इस बावड़ी के निर्माण के दौरान इसके आधार तल में जामुन लकड़ी लगाई गई थी। पर ये लकड़ी सात सौ साल बाद भी सड़ी नहीं है। 

पानी में चमत्कारी शक्तियां -
कुछ लोग निजामुददीन बावड़ी के पानी को चमत्कारी शक्तिओं वाला मानते हैं। इसकी गहराई 80 फीट तक है। इसके दो हिस्से में मजबूत दीवारें बनाई गई हैं। 2008 में इस बावड़ी की कुछ दीवारें क्षतिग्रस्त हो गईं। बाद में आगा खां ट्रस्ट ने इसके संरक्षण पर काम किया। आज यह बावड़ी निजामुद्दीन दरगाह का खास हिस्सा है।
-- vidyutp@gmail.com  
( NIZAMUDDIN, DELHI ) 

Monday, September 9, 2019

सदभावना की मिसाल- चुन्ना मियां ने बनवाया मंदिर

देश के कई हिस्सों में मंदिर के नाम पर झगड़े होते हैं। दो धर्मों के लोग लड़ते हैं। राम जन्मभूमि और बाबरी मसजिद का विवाद तो सैकड़ों सालों से चलता आ रहा है। पर बरेली की पहचान एक ऐसे मंदिर से है जो सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। शहर में एक ऐसा मंदिर है जिसे एक मुस्लिम परिवार ने बनवाया है। ऐसा उदाहरण देश में बहुत कम मिलेगा।

बरेली के सेठ फजल उर्र रहमान ऊर्फ चुन्ना मियां ने यहां पर भगवान विष्णु का लक्ष्मी- नारायण मंदिर का निर्माण कराकर हिंदू- मुस्लिम एकता की एक मिसाल कायम की। ये मंदिर बड़ा बाजार के पास खोखरा पीर इलाके में कटरा मानराय में है। इसके ठीक बगल में बुधवारी मस्जिद भी है। इस इलाके में पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को बसाया गया था। 

इस मंदिर का इंतजाम देखने में आज भी उनके परिवार के मोहम्मद अतिकुर रहमान साहब सहयोग करते हैं। सुबह की पूजा समय अक्सर वे मौजूद रहते हैं। बरेली गंगा जमुनी तहजीब का नायब उदाहरण वाला शहर है। मंदिर परिसर में लक्ष्मी नारायण, बजरंग बली, शिव और अन्य देवी देवताओं की मोहक मूर्तियां हैं।


चुन्ना मियां ने मंदिर के लिए ईंट ढोई - बरेली में हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल सीख लेने वाली है। बरेली में हिंदू राजा मकरंद राय ने विशाल मस्जिद का निर्माण कराया तो चुन्ना मियां से लक्ष्मी नारायण मंदिर बनवाया। पूरा शहर इसे चुन्ना मियां के मंदिर के नाम से ही जानता है। सन 1958 में चुन्ना मियां ने इस मंदिर के निर्माण में सबसे ज्यादा एक लाख 10 हजार रुपये का योगदान किया। साथ ही उन्होंने अपनी जमीन भी मंदिर निर्माण के लिए दान में दी।

चुन्ना मियां मंदिर के लिए जयपुर से मूर्तियां खरीद कर लाए। साथ ही मंदिर के निर्माण के लिए अपना काफी वक्त भी दिया। उन्होंने मंदिर के निर्माण में खुद ईट भी ढोई थी। मंदिर के अंदर चुन्ना मियां की ईंट ढोते हुए तस्वीर भी लगी है। बरेली के लोग इस मंदिर पर गर्व करते हैं।
राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने उदघाटन किया -  देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने जब चुन्ना मियां के इस प्रयास के बारे में सुना तो वे काफी प्रभावित हुए। इस मंदिर का उद्घाटन करने 16 मई 1960 में राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद आए थे। इतना ही नहीं राजेद्र बाबू ने भी इस मंदिर के निर्माण में अपनी ओर से राशि दान में दी। उनका नाम भी मंदिर के दान दाताओं की सूची में लिखा हुआ है। जबकि मंदिर में चुन्ना मियां का नाम सबसे ज्यादा दान देने वालों की सूची में लिखा हुआ है।

मुकदमा वापस लेकर मंदिर बनवाया - कहा जाता है चुन्ने मियां ने पहले मंदिर पास पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के खिलाफ जमीन अतिक्रमण का एक मुकदमा दायर किया हुआ था। पर हरिद्वार के एक संत से मुलाकात ने उनकी जिंदगी बदल दी। 
इस मंदिर के निर्माण के लिए उन्हे महान संत हरिमिलाप जी महाराज से प्रेरणा मिली। उनकी तस्वीर भी मंदिर के अंदर लगाई गई है। उन्होंने न सिर्फ मुकदमा वापस ले लिया बल्कि मंदिर निर्माण में मदद करने लगे। पुराने बरेली शहर के लोग चुन्ना मियां की नजीर देेते हैं। बरेली का चुन्ना मियां का लक्ष्मी नारायण मंदिर शहर के लोकप्रिय मंदिरों में शामिल है।

 चुना मियां के लक्ष्मीनारायण मंदिर में सालों भर कई तरह के आयोजन होते रहते हैं। सुबह से लेकर शाम तक यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। कई तरह के धार्मिक आयोजन मंदिर परिसर में चलते रहते हैं। देश के दूसरे हिस्से लोग बरेली में सदभावना के इस मंदिर से प्रेरणा ले सकते हैं। ऐसे मंदिर हमारी सूझबूझ और सोच को मजबूत करते हैं। 
कैसे पहुंचे : बरेली रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी चार किलोमीटर है। शेयरिंग ऑटोरिक्शा से बड़ा बाजार पहुंचे। वहां किसे से भी कटरा मनराय का चुन्ना मियां मंदिर पूछ लें।

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-        : विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
( CHUNNA MIYAN TEMPLE, BAREILLY, MUSLIM MADE A HINDU TEMPLE )