Tuesday, December 1, 2020

सर्द रात में गोल्डेन टेंपल मेल से जालंधर तक का सफर

वह नौ दिसंबर 1999 की सर्द रात थी। मेरठ सिटी रेलवे स्टेशन से पत्रकारों का एक समूह गोल्डेन टेंपल मेल में सवार हुआ। यह सफर बहुत लंबा नहीं था,  पर यादगार था। कई लोगों के जीवन में बदलाव लाने वाले सफर। सबके मन में रोमांच था। एक नए राज्य में जाकर पत्रकारिता करने का। कई लोग तो पहली बार ही पंजाब जा रहे थे। हालांकि मैं इससे पहले 1993 में सदभावना रेल यात्रा के दौरान पंजाब के कई शहरों में घूम चुका था। मुझसे मेरठ में साक्षात्कार में रामेश्वर पांडे और राजेश रापरिया जी ने पूछा हम आपको पंजाब भेजेंगे। मैंने कहा, मैं उस राज्य में घूम चुका हूं और मुझे वहां जाकर अच्छा लगेगा।

हम सब लोगों की मेरठ में एक महीने से ज्यादा समय की ओरिएंटेशन ट्रेनिंग हो चुकी थी। इस दौरान हमारे शिक्षक वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत हमें कंप्यूटर सीखा रहे थे। क्योंकि यह वह दौर था जब पत्रकारों का कार्य कागज कलम से पूरी तरह कंप्यूटर पर शिफ्ट हो रहा था। यानी खबरें लिखना, संपादन और पेजमेकिंग सब कुछ कंप्यूटर पर।  उन्होंने हमें हिंदी टाइपिंग के लिए इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड ही सीखने की सलाह दी, क्योंकि यह रेमिंगटन की तुलना में  आसान है। 

तो नए पुराने सभी पत्रकारों के लिए कंप्यूटर सीखना जरूरी था। अमर उजाला ने पंजाब के लिए पत्रकारों की बहाली के लिए राष्ट्रव्यापी प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार का आयोजन किया था। अखबार में छपे विज्ञापन पर हजारों लोगों ने आवेदन किया था। उसमें से 500 लोग प्रवेश परीक्षा के लिए बुलाए गए। लिखित परीक्षा पास करने वाले साक्षात्कार के लिए बुलाए गए। जो पहला 10 लोगों का बैच चयनित हुआ उसमें मैं भी था। नवंबर महीने में मेरठ में अलग अलग चरणों में 50 के करीब लोग पंजाब के लिए योगदान दे चुके थे।

इस दौरान अमर उजाला ने पहले हमें दिल्ली रोड पर अंबर होटल में ठहराया था। वहीं होटल में हमारा परिचय शिव कुमार विवेक जी से हुआ जो नई दुनिया इंदौर से आए थे। विजय शंकर पांडे और नवीन श्रीवास्तव कोलकाता से आए थे। किशोर झा और कुमार भावानंद हमसे पहले से ज्वाएन करके उसी होटल में रह रहे थे। प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के दौरान मेरा परिचय सुधीर राघव से हुआ। मैं सुधीर राघव और अमिताभ श्रीवास्तव अंबर होटल और उसके बाद मेरठ के घंटा घर के पास स्थित पाल होटल में एक महीने से ज्यादा समय तक एक ही कमरे में रहे। इस दौरान घंटा घर के पास एक मारवाड़ी बासा में हमलोग रात्रि भोजन के लिए जाया करते थे। इसी दौरान एक दिन मेरठ के जाने माने फोटोग्राफर ज्ञान दीक्षित के पास जाना हुआ। उन्होंने मेरी और सुधीर राघव की यादगार पोट्रेट फोटो खींची।

मेरठ अमर उजाला में प्रशिक्षण के दौरान खेल पत्रकार पद्मपति शर्मा, फीचर में काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकार योगेंद्र कुमार लल्ला से परिचय हुआ। ट्रेनिंग के दौरान हमारे दिन मस्ती में गुजर रहे थे। हमलोग कुछ घंटे टाइपिंग अभ्यास करते फिर कुछ घंटे अमर उजाला की लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ाई करते।

इस बीच कई पुराने साथी ओम प्रकाश तिवारी, ह्रदय नारायण मिश्र, पुरुषोत्तम शर्मा, अरविंद शर्मा, संतोष कुमार सिंह ने भी अमर उजाला मेरठ योगदान दे दिया था। मेरठ में हमारे दिन अच्छे कट रहे थे। इसी बीच एक दिन हमें पंजाब कूच करने का फरमान जारी कर दिया गया।

मैंने रेलवे स्टेशन जाकर अपने कई साथियों का आरक्षण करा लिया। नौ दिसंबर की रात पंजाब मेल में सर्वश्री अजय शुक्ला, अनिल पांडे, नवीन पांडे, नवीन श्रीवास्तव, विजय शंकर पांडे, इष्टदेव सांकृत्यायन ( पांडे), राजीव तिवारी, अमिताभ श्रीवास्तव, धर्मेंद्र प्रताप सिंह,  सुधीर राघव समेत कई साथी सवार हुए। ये ट्रेन मुंबई से दिल्ली होकर वाया मेरठ अमृतसर जाती है। रात नौ बजे के बाद हमलोगों ने स्लिपर क्लास में जगह ली। पर किसी की आंखों में नींद नहीं थी। सारी रात गप्पे लड़ाते हुए कटी। अनिल पांडे के ठहाके और अजय शुक्ला जी अनुभव जन्य ज्ञान की बातें। इस बीच ट्रेन अंबाला क्रॉस करके पंजाब में प्रवेश कर गई। राजपुरा, खन्ना जैसे स्टेशन रात में गुजर रहे थे।

सर्द रात में पंजाब के जगमग गांव देखकर अनिल पांडे ने कहा, मुफ्त की बिजली है, जितनी जलाओ। दरअसल उन दिनों पंजाब में बादल सरकार ने बिजली मुफ्त दे रखी थी। सबके लिए। पंजाब  सबसे बड़े शहर लुधियाना को पार करके हमारी ट्रेन सुबह पांच बजे जालंधर पहुंची। अनिल पांडे अमृतसर चले गए क्योंकि उनकी पोस्टिंग गुरदासपुर जिले के बटाला में हुई थी। हम सब लोग जालंधर सिटी स्टेशन के बाहर आए तो अमर उजाला की एक वैन हमारा इंतजार कर रही थी। हम सब लोगों को कपूरथला रोड पर स्पोर्ट्स एंड सर्जिकल गुड्स कांप्लेक्स ले जाया गया जहां अमर उजाला का नया प्रेस लगा था। प्रेस के ठीक पीछे एक भवन में हमारे रहने का अस्थायी इंतजाम किया गया था।

रात भर के जगे हमलोग जाकर डारमेटरी हॉल के खाटों पर सो गए। दोपहर में हमारी नींद खुली तो मैं और सुधीर राघव शहर की ओर निकले। कंपनी बाग चौक पर कोआपरेटिव बैंक में कार्यरत अपने पुराने साथी अमरीक सिंह जी से मिला। उन्होंने हमें छोले भठूरे खिलाए। अमरीक भाई ने कपूरथला रोड में बस्ती बावा खेल में रहने वाले कुछ साथियों का पता दिया। जो रहने के लिए मकान तलाशने में हमारी मदद करेंगे।

-      - विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
( (MEERUT CITY, MTC, JALLANDHAR CITY, JRC, AMAR UJALA, 1999 ) 
अमर उजाला का मेरठ दफ्तर । 



Sunday, November 29, 2020

कई शहरों में लें इंदौर के नमकीन का स्वाद


जैसे रतलाम सेव के लिए प्रसिद्ध है तो इंदौर नमकीन के लिए। पर इंदौर के नमकीन का स्वाद सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं है। यह मध्य प्रदेश के दूसरे शहरों से गुजरते हुए देश के बड़े शॉपिंग मॉल के मेगा स्टोर तक पहुंच गया है। हर साल करोड़ों का नमकीन विदेशों में भी एक्सपोर्ट होता है।
बेतूल बाजार में घूमते हुए मुझे इंदौर के प्रसिद्ध नरसिंह के नमकीन का स्टोर दिखाई दे गया। स्टोर पर जाने पर इतनी वेराइटी थी कि कई पैकेट खरीद डाले। नर सिंह नमकीन की ये खासियत है कि वे शुगर फ्री मिक्सचर भी तैयार करते हैं। उनके दूसरे मिक्सचर के नाम सुनें तो मुंह पानी आ ही जाएगा। लाजवाब मिक्सचर, मस्ताना मिक्सचर, नवरतन मिक्सचर, गुजराती मिक्सचर, चरखी बूंदी। नाम खत्म नहीं होता।

वे कई तरह के सेव भी बनाते हैं। रतलामी सेव, उज्जैनी सेव, टमाटर सेव, लहसुन सेव, चटनी मसाला सेव, आलू पायनेपल सेव, आलू आरेंज सेव। भला इतने तरह के सेव होंगे तो खाए बिना कैसे रहा जाएगा। वैसे इंदौरी सेव में मेरा पसंदीदा है लहसुन सेव।
वैसे इंदौर में दर्जनों ब्रांड हैं नमकीन, भुजिया और सेव के। इनमें आकाश और प्रकाश मशहूर ब्रांड हैं। इनके सेव दिल्ली समेत दूसरे बड़े शहरों में भी मिल जाते हैं।
मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के लोग तो सेव खाने के इतने शौकीन होते हैं कि वे हर खाने की थाली के साथ सेव जरूर मिलाते हैं। आप किसी घर मेहमान बनकर जाएं तो खाने की थाली के साथ सेव भी एक प्लेट में लाकर रख दिया जाता है। इंदौर के हमारे एक साथी जीतेश चंद्रवंशी की थाली में भी सेव जरूर होता है। इंदौर वासी सेव के बगैर नहीं रह सकते। सेव इंदौरयों की कमजोरी भी है। मालवा के ढाबों में तो टमाटर सेव सब्जी का टॉप ट्रेंड होता है। तो होलिका दहन के बाद बांटे जाने वाले प्रसाद में रतलामी सेव होती है।


रोज 20 टन सेव का उत्पादन-  यह माना जाता है कि संगठित और असंगठित क्षेत्र मिलाकर इंदौर में रोज 20 टन सेव का निर्माण होता है। ये बाजार में जो कई तरह के सेव मिलते हैं ना उनके निर्माण में मुख्य रूप से बेसन का इस्तेमाल होता है। साथ ही ये अलग अलग मसालों और दालों के आटे मिला कर बनाए जाते हैं। सिर्फ बेसन और मसालों को मिलाकर बनाए गए सेव कुरकुरे होते हैं।

इंदौरी सेव के कई ब्रांड देश के बाहर भी मशहूर हो चुके हैं। हर साल बडे पैमाने पर इंदौरी सेव का निर्यात भी होता है। वहीं सेव निर्माता कंपनियों के  बीच होड़ रहती है स्वाद को बेहतर बनाने की। इसलिए लोग अपने खास ब्रांड के सेव को पसंद करते हैं। अब इंदौरी और रतलामी सेव के नाम पर आसपास के शहरों में भी सेव बनने लगे हैं। पर इंदौर जैसा स्वाद कहीं और नहीं मिलता।
वहीं इंदौर में कुछ ऐसे ब्रांड है जो ठेले पर ही बिकते हैं, पर उनकी भी प्रसिद्धी ऐसी है कि शाम होने से पहले माल खत्म हो जाता है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-         ( INDORE, SEV, NAMKEEN )



Friday, November 27, 2020

कोलकाता से लंदन तक चलती थी बस


कुछ दिन पहले जालंधर में प्रोफेसर रजनीश बहादुर सिंह से बात हुई तो उन्होंने बताया कि कभी कोलकाता से लंदन के लिए सीधी बस चलती थी। मुझे थोड़ा अचरज हुआ पर ये सच है। यह दुनिया का सबसे लंबा बस मार्ग था। यानी हावड़ा ब्रिज से शुरू होकर बस आपका टावर ब्रिज के शहर लंदन ले जाती थी। तो है ना मजेदार बात।

सत्तर    के दशक तक सिडनी की एक टूर एजेंसी कोलकाता से लेकर लंदन तक और लंदन से कोलकाता तक आरामदायक बस सेवा चलाती थी। इसमें खाना-पीना,   रास्ते में होटलों में ठहरना सब कुछ शामिल था। बस में सोने का भी इंतजाम होता था। ये बस कई देशों से होते हुए जाती-आती थी। तो इसका रुट कुछ इस तरह था भारत, पश्चिमी पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इरान, तुर्की, बल्गारिया, युगोस्लाविया, आस्ट्रिया, वेस्ट जर्मनी, बेल्जियम और    इंग्लैंड। यानी 11 देशों से होकर गुजरती थी ये बस।

पहली सेवा शुरुआत - 15 अप्रैल 1957 को लंदन से इसकी पहली सेवा आरंभ हुई थी। पहली बार यह बस कोलकाता पहुंची 5 जून 1957 को। तब लोगों ने इसका कोलकाता में स्वागत किया था। और मीडिया में तब बहुत बड़ी खबर भी बनी थी। वाराणसी में रुकने के बाद दो दिन का सफर करके यह कोलकाता पहुंची थी। बस औसतन एक दिन में 320 किलोमीटर का सफर तय करती थी। इस बस से सफर कर पहुंची 76 वर्षीय ब्रिटिश महिला मिसेज जे नेस्टर ने कहा था कि मुझे बड़ा आनंद आया। 

145 पाउंड था किराया - ये   बस सेवा    1972   में   कोलकाता   से लेकर    लंदन    तक का किराया 85 पाउंड लेती थी लेकिन बाद ये किराया बढ़ कर 145 पाउंड तक पहुंच गया था। लेकिन इस किराए में   बस    का भाड़ा,   खाना,   नाश्ता और रास्ते के होटलों में रुकने की सुविधा सब कुछ शामिल रहता था।

सफर के लिए अग्रिम आरक्षण - इस बस सेवा से सफर करने के लिए अग्रिम आरक्षण होता था। इसका कोलकाता और लंदन में दफ्तर हुआ हुआ करता था। सिडनी ट्रैवल्स ने ये भी जानकारी दे रखी थी अगर पाकिस्तान से होकर बस को जाने की इजाजत नहीं मिली तो उतनी दूर का सफर विमान द्वारा कराया जाएगा और इसके लिए अतिरिक्त शुल्क देना पड़ेगा। 


इस बस के जाने का दिन पहले से तय होता था और लंदन पहुंचने का दिन भी। भारत से लेकर लंदन तक ये कई देशों से होकर गुजरती थी। रास्ते में कई जगह रुकती थी। कई बार अगर रास्ते में घूमने की जगह होती थीं तो वहां यात्रियों को टूर संचालित करने वाली कंपनी होटल में ठहराती थी।

इस बस सेवा की शुरुआत कोलकाता से होती थी। इसके बाद यह बिहार उत्तर प्रदेश के शहरों से होती हुई नई दिल्ली पहुंचती थी। यहां से बारास्ता पाकिस्तान होते हुए काबुल,   तेहरान,   इस्तांबुल होते हुए लंदन पहुंचती थी। लंदन से फिर ये बस वापस इसी रूट से कोलकाता लौटती थी। इस यात्रा का कार्यक्रम इस तरह से बनाया जाता था कि इसमें    45   दिन लगते थे लेकिन बस रास्ते में इस तरह से रुकती थी कि लोगों की यात्रा काफी आरामदायक और यादगार रहे।



आरामदेह हुआ करती थी बस -   बस में चलने वाले यात्रियों के लिए ये स्लीपिंग बर्थ की सुविधा मिलती थी। खिड़की से वो बाहर का नजारा ले सकते थे। बस में सैलूनकिताबों को पढ़ने की जगह और बाहर का नजारा लेने के लिए एक खास बालकनी भी थी। बस ये दावा करती थी कि इतनी आरामदायक यात्रा आपको कहीं नहीं मिलेगी।


1973 में बंद हुई बस सेवा - ये बस सेवा साल   1973   तक जारी रही। उसके बाद बंद हो गई थी। आखिरी दिनों में बस की लोकप्रियता में गिरावट आने लगी थी। यह घाटे का सौदा बनने लगी तो संचालकों ने इसका परिचालन बंद कर दिया।   वास्तव में देखा जाए तो ये एक टूरिस्ट बस सेवा थी। आपको कोलकाता से लंदन की इस यात्रा में डेढ़ महीने देने पड़ते थे। जो लोग आवश्यक कार्य से लंदन जाना चाहते थे उनके लिए ये सेवा मुफीद नहीं थी।

45 से 50 दिनों में पहुंचाती थी कोलकता से लंदन
320 किलोमीटर औसत चलती थी एक दिन में 
11 देशों से होकर गुजरती थी ये टूरिस्ट बस 
16 साल तक बदस्तूत जारी रहा बस का सफर 
145 पाउंड था आखिरी समय में इसका किराया 

- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
REFRENCE - 



Wednesday, November 25, 2020

अच्छी किताबों की तलाश और दिल्ली का दरियागंज



कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट की तरह दिल्ली के दरियागंज में पटरी पर किताबों का बाजार लगता है। दरियागंज को कुछ लोग किताबों का दरिया कहते हैं। यहां पर हर विषय और हर स्ट्रीम की किताबें मिल जाती हैं। हर रविवार की सुबह दिल्ली के कोने कोने से पुस्तक प्रेमी दरियागंज का रुख करते हैं। यहां पर कोर्स की किताबें, डिक्सनरी, हिंदी और अंगरेजी के उपन्यास बाजार से काफी कम दरों पर मिल जाते हैं। यहां नई किताबें भी होती हैं तो पुरानी किताबें भी।
जो पढ़ी गई किताबें लोग किलो पर बेच देते हैं रद्दीवाले को वह दरियागंज के इस बाजार में पहुंच जाती हैं। सन 1995 मैं दिल्ली आया तब से इस किताब के बाजार को देख रहा हूं। पर यह बाजार पांच दशकों से लग रहा है। कई बार अनमोल पुस्तकें जिन्हें आप बरसों से तलाश रहे हैं यहां आपको पांच, दस रुपये में मिल सकती हैं।

यहां दुकान लगाने वाले कई दुकानदारों का ज्ञान देखकर मैं चकित हो जाता हूं। उन्हे तमाम लेखकों की प्रसिद्ध पुस्तकों के नाम जुबानी याद होते हैं। ये दुकानदार हर किताब की कीमत भी खूब समझते हैं। इसलिए कई बार वे दुर्लभ पुस्तकों के लिए मुहंमांगी दाम भी मांगते हैं। दरियागंज के इस पटरी बाजार में सिर्फ किताबें ही नहीं मिलती हैं बल्कि कपड़े, बैग, हैंड टूल्स और तमाम तरह की दूसरी चीजें भी बिकती हुई दिखाई देती हैं।  

कोई किताब आपको बाजार में नहीं मिल रही है तो दरियागंज आकर उसकी तलाश करें, हो सकता है दो चार स्टाल तलाशने पर वह मिल जाए। अंग्रेजी के प्यारी सी कॉलिंस डिक्सनरी मुझे इसी बाजार से मिली थी। इसे मैं अनुवाद में सहायता के लिए हमेशा बैग में लेकर चलता था।

हमारे पत्रकार साथी धर्मेंद्र सुशांत इस पुस्तक बाजार के नियमित विजिटर हैं। वे हर हफ्ते कुछ नई किताबें खरीदते भी हैं। इस बाजार पर उनका शोध जारी रहता है। आखिर ये किताबें आती कहां से हैं। बड़े प्रकाशकों को अनसोल्ड बुक्स के गोदाम से आती हैं। लोग जो रद्दी में किताबें बेच देते वे यहां पहुंच जाती हैं। कई छोटी मोटी निजी लाइब्रेरी अगर बंद हो जाए तो वैसी किताबें भी यहां पहुंच जाती हैं। पर इस बाजार में पहुंचकर लोगों को किताबें तलाशते देखकर लगता है कि किताबों के कद्रदान खत्म नहीं हुए हैं।

किलो पर बिकता साहित्य - इसी बाजार के बीच एक दुकान खुल गई है जहां किलो पर किताबें बिकने लगी हैं। साहित्य को किलो पर बिकता हुआ देखकर लोगों को कोफ्त हुई। कुछ लोगों ने इसे साहित्य की अवनति माना तो कुछ ने कहा, अच्छा है कि किताबें लोगों को सस्ते में मिल रही हैं। हमारे एक लेखक औऱ पत्रकार मित्र ओम प्रकाश तिवारी कहते हैं, सचमुच अच्छा साहित्य अगर सस्ते में मिल रहा है तो हर्ज क्या है। 

2019 में महिला हाट में शिफ्ट हुआ बाजार - पिछले पांच दशकों से दरियागंज की जिन पटरियों पर किताबें सजती थीं वह अब नेताजी सुभाष चंद्र मार्ग से हटकर महिला हाट में शिफ्ट हो गई हैं। अगस्त 2019 में इस बाजार को नया पता मिला। इस बाजार में स्थायी शेड बने हुए हैं। सड़क के किनारे के ट्रैफिक से हटकर अब यह बाजार पार्क में शिफ्ट हो गया है। दुकानदारों और ग्राहकों दोनों के लिए यह बाजार सुविधाजनक हो गया है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-         ( BOOK MARKET,DARIAGANJ, MAHILA HAT )





Monday, November 23, 2020

चांदनी चौक का घंटेवाला – शाही हलवाई का स्वाद


दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरुद्वारा शीशगंज वाली लाइन में ही एक मिठाइयों को दुकान हुआ करती थी-घंटेवाला। मैं 1995 से नियमित रूप से दिल्ली रहने आया। 1996 से 1998 के बीच अक्सर चांदनी चौक के फिल्म मार्केट में रिपोर्टिंग के लिए जाना पड़ता था। इस दौरान मैंने पहली बार घंटेवाला की दुकान के बारे में सुना। पुराने फिल्म प्रचारक ओम प्रकाश पूछते थे – घंटेवाला गए कभी...वहां के समोसे खाए। तो मैं पहुंच गया घंटेवाला। दुकान के साइन बोर्ड पर लिखा है – घंटे वाला शाही हलवाई। स्थापित 1790 जी हां 1790 घंटेवाला की मिठाई की दुकान मुगलकालीन थी।

अंग्रेजों के दिल्ली में राजधानी बनाने से बहुत पहले से मिठाइयों की दुकान यहां पर संचालित थी। वह मुगल शासक शाह आलम का शासन काल था (1760 से 1806 ) जब चांदनी चौक में घंटेवाला ने मिठाइयों की दुकान शुरू की।



मैं 1999 में दिल्ली छोड़कर चला गया। साल 2007 में एक बार फिर दिल्ली वापस आया तो मेरे बेटे ढाई साल के थे। हम परिवार के साथ जब भी चांदनी चौक इलाके में खरीददारी करने जाते तो घंटेवाला की दुकान पर जरूर रुकते। उनकी मिठाइयां थोड़ी मंहगी जरूर थीं, पर यहां कुछ  खाते पीते ये गर्व होता कि हम एक अति प्राचीन ऐतिहासिक दुकान की बनी मिठाइयां खा रहे हैं। मुझे घंटेवाला का कराची हलवा खूब पसंद आता था। तो मेरे बेटे वहां के बर्फी और समोसे खाया करते थे।

देश की सबसे पुरानी मिठाई की दुकान – घंटेवाला देश की सबसे पुरानी मिठाइयों की दुकान थी। इस दुकान को आमेर से आए सुखलाल जैन ने शुरू किया था। इसके बाद आठ पीढ़ियां इस परंपरा को आगे बढ़ाती रहीं। दुकान का नाम घंटेवाला रखे जाने को लेकर कई तरह की बातें कही जाती है। कहा जाता है कि ये दुकान एक विशाल घंटे के नीचे खुली थी। इसलिए इसे घंटेवाला कहा जाने लगा। दूसरी कहानी ये है कि सुखलाल जैन शुरुआत में ठेले पर गलियों में घूमघूम कर मिठाइयां बेचा करते थे। इस दौरान वे लोगों का ध्यान खींचने के लिए घंटा बजाया करते थे। इसलिए उनका नाम ही घंटेवाला पड़ गया। बाद में इसी नाम से उन्होने अपनी दुकान शुरू की।

घंटेवाला अपनी दुकान के साइनबोर्ड पर शाही हलवाई यूं ही नहीं लिखते थे। दरअसल यह दुकान मुगल बादशाहों को केटरिंग सुविधा उपलब्ध कराती थी। इनकी बनाई मिठाइयां बादशाह के घरों में जाती थी। मुगल बादशाह शाह आलम खुद अपने नौकरों को भेजकर यहां से मिठाइयां मंगाते थे।

देसी घी की मिठाइयां - घंटेवाला देसी घी में मिठाइयां बनाते थे। उन्होंने मिस्री मावा से शुरुआत की थी। उनकी दुकान सोहन हलवा, कराची हलवा, पिस्ता, पतीशा जलेबी आदि मिठाइयों के लिए प्रसिद्ध थी। जब 1857 में सिपाही विद्रोह हुआ तो चांदनी चौक पहुंचे विद्रोहियों ने भी घंटेवाला की मिठाइयों का स्वाद लिया था। घंटेवाला के सोहन हलवा के स्वाद की प्रसिद्धि खाड़ी देशों तक पहुंच गई थी।

ब्रिटिश काल में घंटेवाला की लोकप्रियता का ये आलम था कि लोग जब चांदनी चौक खरीददारी करने जाते तो घंटेवाला से मिठाइयां खरीदकर अपने घर ले जाते थे।

मोरारजी देसाई से राजीव गांधी तक यहां आए - किसी जमाने में पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई घंटेवाला में जलेबी खाने आया करते थे। इस दुकान पर प्रख्यात गायक मोहम्मद रफी और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी आ चुके थे।

हिंदी फिल्मों में घंटेवाला - साल 1954 में एक फिल्म बनी थी चांदनी चौक। इस फिल्म में अभिनेत्री मीना कुमारी कुछ दृश्य घंटेवाला की दुकान के बाहर फिल्माए गए थे। फिल्म के हीरो थे शेखर। इस फिल्म का टाइटिल गीत था - जमीं भी वही है वही आसमां, मगर वह दिल्ली की गलियां की बात कहां... फिल्म के निर्देशक थे बीआर चोपड़ा।

बंद हुई 225 साल पुरानी दुकान - पर साल 2015 के जुलाई में ऐतिहासिक घंटेवाला की दुकान बंद हो गई।  कुल 225 सालों तक दस पीढ़ियों से ज्यादा के लोगों को अपनी मिठास का एहसास कराने वाली दुकान इतिहास के पन्नों का हिस्सा बन गई। वे अपनी दुकान का टैग लाइन लगाते थे – 200 साल पुरानी मीठी परंपरा। घंटे वाला के आखिरी मालिक थे सुशांत जैन। उन्होंने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा कि ये एक मुश्किल फैसला था। घटती बिक्री के कारण हमें दुकान बंद करनी पड़ रही है।

चांदनी चौक में तमाम पुरानी दुकानें और भवन अब भी दिखाई दे जाते हैं। वह टाउन हॉल, वही दाना चुगते कबूतरों का झुंड, मेट्रों स्टेशन से बाहर निकलते पार्क। पर अब चांदनी चौक जाने पर घंटेवाला की कमी काफी खलती है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य   - vidyutp@gmail.com 
( GHANTEWALA, SWEET SHOP, CHANDNI CHAWK, 1790-2015 ) 

Saturday, November 21, 2020

देश का दूसरा विशाल मंदिर है दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर


दिल्ली आने वाले सैलानियों के लिए नया आकर्षण बन चुका है अक्षरधाम मंदिर। अब दिल्ली की टूरिस्ट बसें शाम को सैलानियों को यहां छोड़ देती हैं। वहीं दिल्ली के लोग भी यहां खूब पहुंचते हैं। कभी कभी तो शाम को इतनी भीड़ हो जाती है कि लोगों का प्रवेश रोकना पड़ता है। दुनिया में कई प्रमुख शहरों में स्वामीनारायण संप्रदाय द्वारा अक्षरधाम मंदिर का निर्माण कराया गया है। पर इन सब मंदिरों में आकार में दिल्ली का मंदिर सबसे विशाल है।


लाल पत्थरों की विशाल परिक्रमा-  मंदिर में राजस्थान से लाए हुए लाल पत्थरों से बनी 3000 फीट लंबी परिक्रमा गैलरी है। इसकी संरचना दो मंजिला है। इसमें 1,152 खंभे और 145 खिड़कियां हैं। यह परिक्रमा मंदिर के चारों तरफ एक सुंदर माला की तरह फैली हुई है। परिक्रमा में चलते समय इन 108 गौमुख से पानी की ध्वनि भी सुनाई पड़ती है। 


दस दिशाओं में दस द्वार -  अक्षरधाम मंदिर में 10 द्वार बनाए गए हैं, जो वैदिक साहित्य के अनुसार 10 दिशाओं का प्रतीक हैं। ये द्वार दर्शाते हैं कि सभी दिशाओं से अच्छाई आती रहेगी। मंदिर का यज्ञ कुंड है दुनिया में सबसे विशाल है। इसमें 108 छोटे तीर्थ हैं। यह शानदार और भव्य मंदिर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह हासिल कर चुका है। 


देश का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर - आकार में यह त्रिचुरापल्ली के श्रीरंगम मंदिर के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। यह दिल्ली में यमुना नदी के तट पर बनाया गया है। 


सुंदर म्यूजिकल फाउंटेन मंदिर परिसर के अंदर नीलकंठ नाम का एक थियेटर है, जहां स्वामीनारायण की जिंदगी की घटनाएं दिखाई जाती हैं। यहां का म्यूजिकल फाउंटेन भी बहुत खूबसूरत है। हर शाम यहां पर 15 मिनट का शो चलता है। मंदिर में कई शो और गैलरियों को देखने के लिए टिकट का प्रावधान है। ये टिकट महंगे भी हैं।

मंदिर परिसर में कैंटीन भी - मंदिर परिसर में एक साफ सुथरी शाकाहारी कैंटीन भी है। पर यहां पर खाने पीने दरें बाजार से भी ऊंची हैं। हालांकि मंदिर प्रशासन देसी घी में व्यंजन बनाने का दावा करता है। कैंटीन का डायनिंग हॉल विशाल है।

मंदिर में प्रवेश – मंदिर के प्रवेश द्वार पर विशाल पार्किंग बनी हुई है। पर मंदिर में प्रवेश के लिए सुरक्षा कारणों से पर्स, मोबाइल, कैमरा, बेल्ट, जूते आदि जमा करने पड़ते हैं। आप सिर्फ जेब में रुपये लेकर ही अंदर जा सकता है। मंदिर के आंतरिक हिस्सों में फोटोग्राफी भी नहीं कर सकते हैं। 

2005 में छह नवंबर इस विशाल अक्षरधाम मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए खोला गया था। 


11,000 कारीगरों और हजारों बीएपीएस स्वयंसेवकों के प्रयास से पांच वर्ष में इसका निर्माण पूरा किया गया था।


100 एकड़ के दायरे में फैला हुआ है। इसमें 350 फीट लंबे, 315 फीट चौड़े और 141 फीट ऊंचे स्मारक बनाए गए हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( DELHI, SWAMI NARAYAN AKSHARDHAM TEMPLE ) 

Thursday, November 19, 2020

सिगनेचर ब्रिज- दिल्ली की नई पहचान


सिग्नेचर ब्रिज का निर्माण दिल्ली के वजीराबाद में यमुना नदी पर किया किया गया है। यह दिल्ली का नया आकर्षण बन गया है। आते जाते लोग इस पुल के पास रुक कर तस्वीरें खिंचवाते हैं। यमुना नदी पर बना यह दिल्ली का पहला रज्जु कर्षण सेतु है। यह दिल्ली की एक नई पहचान बन चुका है।  

देश का पहला केबल रक्षित पुल - यह देश का पहला केबल-रक्षित पुल है। हस्ताक्षर पुल दिल्ली में सबसे ऊंची संरचना है और 154 मीटर ऊंचे देखने वाले बॉक्स के साथ कुतुबमीनार की ऊंचाई दोगुनी है। इसका मध्य स्तंभ 175 मीटर ऊंचा है। यह दिल्ली में स्थित किसी भी इमारत से ज्यादा उंचा है। 

इस पर दो भूमिगत मार्ग, फुटपाथ और साइकिल पथ भी बनाए गए हैं। इसके अलावा इस पर दोहरे चार-लेन के सड़क मार्ग बनाए गए हैं। इनमें से प्रत्येक 14 मीटर चौड़ा है। इसके मध्य में 1.2 मीटर चौड़ी मध्यपट्टी है।  केबलों को गांठने के लिए स्थान, रखरखाव पैदल मार्ग और मध्यपट्टी के दोनों किनारों पर टक्कर अवरोधक भी बनाए गए हैं। इस पुल का मुख्य स्पैन 251 मीटर का है। दोनों किनारों पर अभिगमन स्पैन प्रत्येक 36 मीटर का है।

इस सेतु के निर्माण को दिल्ली मंत्रीमंडल ने 23 फरवरी 2010 को स्वीकृति दी गई थी। पुल के बनने में कई साल लगे। इसके निर्माण कार्य पूरा होने की तारीखें टलती रहीं। अंततोगत्वा पुल का उदघाटन 4 नवंबर 2018 को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने किया। इस सेतु के निर्माण की कुल लागत 1128 करोड़ का अनुमान था।

सिगनेचर ब्रिज का निर्माण पुराने वजीराबाद पुल के ट्रैफिक का दबाव कम करने के लिए किया गया है। यह पुराने वजीराबाद पुल के दक्षिण किनारे पर बनाया गया है। यह उत्तर और पूर्वोत्तर दिल्ली के बीच यात्रा के समय को कम कर देता है। इस पुल के बन जाने से लोगों को काफी राहत मिली है। इससे पहले वजीराबाद पुल पर सुबह और शाम के समय दो दो घंटे का लंबा जाम लगता है। कई किलोमीटर तक वाहनों की कतार लग जाती थी। पर अब इससे निजात मिल चुकी है।

इस पुल के निर्माण का विचार पहली बार 1997 में आया था। पर इस पुल की अवधारणा 2004 में जाकर बन सकी। फिर 2007 में दिल्ली कैबिनेट द्वारा इस परियोजना को अनुमोदित किया गया। वैसे तो इसका निर्माण तो 2010 में दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों से पहले ही पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। पर पर्यावरण मंजूरी न मिल पाने से यह परियोजना शुरू ही नहीं हो सकी। इसके बाद भी कई सालों तक इस पुल का मामला अधर में लटका रहा। 

आखिरकार 2011 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ, और इसकी समय सीमा दिसंबर 2013 तय की गई। निर्माण कार्य पूरा न हो पाने की वजह से समापन तिथि को बाद में जून 2016 और फिर जुलाई 2017 तक आगे बढ़ा दिया गया। जुलाई 2017 में दिल्ली सरकार ने इस परियोजना के लिए 100 करोड़ रुपये जारी किए। फिर मार्च 2018 की एक नई समय सीमा तय की गई। इसे बाद में अप्रैल 2018 फिर अक्तूबर 2018 तक बढ़ा दिया गया।

अब पिकनिक स्थल भी - दिल्ली सरकार सिग्नेचर ब्रिज को पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित कर रही है।  सिग्नेचर ब्रिज परियोजना के तहत तैयार किया जा रहा पिकनिक स्थल लोगों का नया आकर्षण होगा। साथ ही यहां पर  सेल्फी प्वाइंट भी विकसित किया जा रहा है। इसमें लिफ्ट से  ऊंचाई पर जाने का इंतजाम होगा। यहां से दिल्ली का विहंगम  दृश्य दिखाई देगा।  
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com  
    (SIGNATURE BRIDGE, DELHI, WAJIRABAD ) 


Tuesday, November 17, 2020

दिल्ली की शान – दिल्ली मेट्रो


दिल्ली मेट्रो, दिल्ली की शान है। यह दिल्ली की लोगों की जरूरत का हिस्सा बन चुकी है। सन 2002 में शुरू हुई मेट्रो रेल सेवा अब दिल्ली एनसीआर के लगभग हर हिस्से में लोगों को पहुंचाती है। नोएडा, गाजियाबाद, बहादुरगढ़, गुरुग्राम, फरीदाबाद जैसे शहर मेट्रो के कारण आपस में अच्छी तरह जुड़ चुके हैं। आजकल इसकी कुल लंबाई 389 किलोमीटर है। यानी  400 किलोमीटर के करीब। 
 
कई साल से चल रहे प्रयास के बाद 24 दिसंबर 2002 को सपना साकार हुआ। पहली मेट्रो पूर्वी  दिल्ली  शहादरा के पास वेलकम से तीस हजारी के बीच चली। मुझे 2004 में पहली बार दिल्ली मेट्रो की सवारी करने का मौका मिला। जब मैं जालंधर से दिल्ली किसी काम से आया था।

ई श्रीधरन की बड़ा योगदान - दिल्ली मेट्रो के पहले पहले चेयरमैन ई श्रीधरन थे। वे केरल के रहने वाले हैं। उनका दिल्ली मेट्रो से पहले कोंकण रेल के निर्माण का पुराना अनुभव था। दिल्ली मेट्रो के सपने को साकार करने में उनक बड़ी भूमिका रही। साल 2011 तक श्रीधरन दिल्ली मेट्रो को अपनी सेवाएं देते रहे। बढ़ती उम्र के बाद जब वे अलग हुए तो मंगू सिंह को अपना कार्यभार सौंपा। 25 साल दिल्ली मेट्रो को  अपनी सेवाएं देेने के बाद श्रीधरन  ने जब अपना  रिटायरमेंट   तय किया तो   रहने के लिए वे    अपने केरल के गांव में लौट गए। 

ब्रॉडगेज और स्टैंडर्ड गेज – जब दिल्ली मेट्रो का परिचालन शुरू किया जाना था तो इस पर काफी समय तक कवायद चलती रही कि इसके लिए ब्राडगेज ( 1676 मिली मीटर) पटरियों का नेटवर्क अपनाया जाए या फिर स्टैंडर्ड गेज ( 1435 मिली मीटर ) पर बाद में ब्रॉडगेज पर सहमति बनी। तो पहला नेटवर्क ( रेड लाइन ) जो अब रिठाला से नया गाजियाबाद तक जाता है ब्रॉडगेज वाला है।
पर बाद जो नए नेटवर्क बने वे स्टैंडर्ड गेज के अपनाए गए। कश्मीरी गेट से बल्लभगढ़ वाली लाइन, बोटानिकल  गार्डन से जनकपुरी (मेजेंटा लाइन ) और पिंक लाइन ( रिंग रोड के साथ साथ चलने वाली) सभी स्टैंडर्ड गेज की हैं।  

मेट्रो के बारे में और जाने – पटेल चौक और केंद्रीय सचिवालय में आर मेट्रो का संग्रहालय देख सकते हैं। यहां पर आप मेट्रो के प्रगति की कहानी को समझ सकते हैं। पटेल चौक मेट्रो स्टेशन पर सोवनियर शॉप भी है। यहां पर आप मेट्रो से जुड़ी कई चीजें जैसे कलम, टोपी, मेट्रो का मिनिएचर माडल आदि खरीद सकते हैं।

कश्मीरी गेट तीन मेट्रो का संगम – कश्मीरी गेट ऐसा मेट्रो स्टेशन है तो तीन मेट्रो लाइनों का संगम है। यहां रेड लाइन, येलो लाइन और वायलेट लाइन का संगम है। यहां पर तीनों मेट्रो नेटवर्क तीन अलग अलग तल पर हैं। रेड लाइन आसमान में है तो बाकी दो लाइनें भूमिगत हैं। 


दिल्ली मेट्रो के मेजेंटा लाइन और पिंक लाइन के कोच पुराने मेट्रो के कोच से ज्यादा आधुनिक हैं। इसमें डिजिटल डिस्प्ले सिस्टम भी लगा हुआ है। सीटों की बनावट में भी सुधार किया गया है। भले स्टैंडर्ड गेज की पटरियों की चौड़ाई कम हो पर इसके कोच की चौड़ाई अंदर से कम नहीं दिखाई देती। खास तौर पर मैजेंटा लाइन और पिंक लाइन में। 


नई दिल्ली से एयरपोर्ट तक जाने वाली एयरपोर्ट मेट्रो के कोच ज्यादा लग्जरी वाले हैं। यह मेट्रो पहले निजी क्षेत्र में अनिल अंबानी की कंपनी चलाती थी। पर लगातार घाटे में चलने के बाद दिल्ली मेट्रो ने इसका अधिग्रहण कर लिया। अब इसमें दिल्ली मेट्रो का यात्रा कार्ड मान्य रहता है। साथ ही कार्डधारियों को 10 फीसदी डिस्काउंट भी मिलता है। यह मेट्रो आपको सीधे एयरपोर्ट के टर्मिनल 3 तक पहुंचाती है।  




कुछ ऐसी है दिल्ली मेट्रो 

12 लाइनें आजकल संचालित हैं दिल्ली मेट्रो की ( एक्वा  लाइन और रैपिड मेट्रो के साथ ) 
389 किलोमीटर है कुल लंबाई मेट्रो नेटवर्क की 
285 मेट्रो स्टेशन हैं  दिल्ली मेट्रो के 
20 सेकेंड औसतन रुकती है मेट्रो एक स्टेशन पर
07 वां सबसे बड़ा दुनिया का मेट्रो नेटवर्क है दिल्ली में
01 नंबर पर भारत के मेट्रो में दिल्ली मेट्रो
1995 में 3 मई को दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन कंपनी का गठन हुआ 
( आंकड़े 2019 के ) 


दिल्ली मेट्रो का नेटवर्क - 
रेड लाइन – नया गाजियाबाद से रिठाला
येलो लाइन – समयपुर बादली से हुडा सिटी सेंटर
ब्लू लाइन – इलेक्ट्रानिक सिटी नोएडा से द्वारका, यमुना बैंक से वैशाली
ग्रीन लाइन – बहादुरगढ से इंद्रलोक, अशोक पार्क से कीर्ति नगर
वायलेट लाइन – कश्मीरी गेट से बल्लभगढ
पिंक लाइन – शिव विहार से आनंद विहार होकर आजादपुर तक   ( सबसे लंबी लाइन ) 
आरेंज लाइन – नई दिल्ली से द्वारका सेक्टर 21 ( एयरपोर्ट मेट्रो)
मेजेंटा लाइन – बोटानिकल गार्डन से जनकपुरी
एयरपोर्ट मेट्रो - नई  दिल्ली से   द्वारका के बीच 
ग्रे लाइन - द्वारका से नजफगढ़ 
एक्वा   लाइन - नोएडा से ग्रेटर नोएडा ( अलग कंपनी है ) 
रैपिड मेट्रो - गुरुग्राम में  चलती है 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( DELHI METRO, GAZIABAD, NOIDA, VAISHALI, FARIDABAD, GURUGRAM, BAHADURGARH )