Tuesday, February 18, 2020

बनारस में लिट्टी चोखा का स्वाद

शेरगढ़ से लौटते हुए हमलोग चेनारी में नास्ते के लिए रूके। अब शाम गहरा गई है। हमलोग सासाराम के लिए बेदा नहर वाली सड़क पर चल रहे हैं। अचानक रात के अंधेरे में कब हमने नहर वाला रास्ता छोड़ दिया ये पता ही नहीं चला। तो हमलोग भभासी,  चंद्र कैथी,  बिलासपुर गांव होते हुए आगे बढ़ रहे हैं। अगला गांव है कझांव। हमलोग चोर,  बड्डी,  आलमपुर के आसपास चल रहे हैं। थोड़ी देर में फिर से नहर के साथ चलती हुई सड़क मिल गई। अब इस सड़क पर चलते हुए हमलोग बेलाढ़ी पहुंचे हैं। इसके बाद बेदा में सासाराम के पुराने जीटी रोड पर पहुंचे गए। पर इस रास्ता भटकने के कारण अपने जिले के कई गांवों का भ्रमण हो गया।



वैसे तो खाने पीने और घूमने में बनारस दिल्ली मुंबई तरह महंगा शहर है। पर यहां आपको लिट्टी चोखा खाने में सस्ते में मिल सकता है। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन के बाहर कई लिट्टी चोखा के स्टाल हैं। अगर किसी दूसरे व्यंजन से तुलना करें तो लिट्टी चोखा बनारस में सबसे सस्ता है।  

ये लोग कोयले के चूल्हे पर लिट्टी पकाते हैं। इनकी लिट्टी की दरें हैं दस रुपये में दो। या बीस रुपये में चार। इसके साथ आलू बैगन का चोखा। इस चोखा का आलू बैगन भी इसी कोयले के चूल्हे पर पकता है। हालांकि वे लिट्टी के साथ घी , बटर जैसी कोई चीज नहीं लगाते। वाराणसी से गुजरने के क्रम में मैंने यहां पर लिट्टी चोखा का स्वाद लिया। 

हालांकि इनकी लिट्टी थोड़ी कड़ी होती है। आपको तोड़ने के लिए ताकत लगानी पड़ती है। पर वाराणसी में इससे सस्ता खाने में आपको कुछ और नहीं मिल सकता है। वैसे वाराणसी से आगे चलने पर दक्षिण बिहार के हर शहर में आपको लिट्टी चोखा खाने को मिल ही जाएगा।

इस बार जब सासाराम पहुंचा तो मां ने एक दिन घर में लिट्टी बनाई। पर घर में अब लकड़ी या कोयले का चूल्हा नहीं है पर लिट्टी बनी कैसे। गैस के चुल्हे पर ही बनी। उसके लिए भी तकनीक आ गई है। कई लोग गैस पर लिट्टी बनाने के लिए ओवन खरीदते हैं। यह ओवन एक हजार रुपये या उससे अधिक का आता है। पर उससे भी सस्ता तरीका है अप्पम पर लिट्टी पकाना।

वैसे तो अप्पम दक्षिण भारतीय रसोई घर का यंत्र है। से गैस चूल्हे पर रखकर गुंता या दूसरी चावल की गोल गोल डिश बनाई जाती है। पर उत्तर भारत के लोगों ने अप्पम पर लिट्टी बनाना शुरू कर दिया है। सासाराम के बर्तन दुकानों में यह बिकने लगा है। कुल 12 खाने वाला अप्पम स्टैंड 500 रुपये में मिल जाता है। इसमें हैंडल और ढक्कन भी लगा हुआ है। तो इसकी मदद से आप गैस चूल्हे पर भी बड़े आराम से लिट्टी बना सकते हैं।

इस तरह बनाएं लिट्टी - एक साथ 12 लिट्टी के गोले बनाएं। इन सब में सत्तू का मसाला मतलब मकुनी भरें। इस मकुनी को कैसे बनाते हैं। सरसों तेल, नमक, लहसुन, प्याज, मंगरैला, आजवाइन, धनिया पत्ता आदि को सत्तू में मिलाएं। गैस चूल्हे पर धीमी आंच पर अप्पम के स्टैंड में एक सथ 12 लिट्टी रख दें। इसके बाद ढक्कन से ढक दें। इसे धीमी आंच पर पकने दें। बीच में एक दो बार लिट्टी को उलटना पलटना पड़ता है। पर इस तरह बड़ी आसानी से तीन लोगों के खाने भर लिट्टी तैयार हो जाती है। बिना ज्यादा श्रम के और बिना किसी आवाज के भोजन तैयार।

पकी हुई लिट्टी में उपर से घी लगाकर खाएं। लिट्टी को आप चटनी और चोखा के साथ खा सकते हैं। आपकी मर्जी। शार्ट कट में चटनी बनाने का भी एक तरीका है। प्याज, टमाटर, लहसुन, धनिया पत्ता, सरसों तेल, आमचूर पाउडर मिलाएं। इसे मिक्की में एक मिनट पीस दें। बस चटनी तैयार हो गई।  तो इस तरह आप शहर में बिना धुआं वाले चुल्हे के भी लिट्टी चोखा खाने का मजा ले सकते हैं।     
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-        ( LITTI CHOKHA, APPAM STAND ON LPG STOVE )

Sunday, February 16, 2020

दुर्गावती जलाशय परियोजना - बन गई हकीकत


शेरगढ़ किले से उतरने के बाद हमलोग दुर्गावती जलाशय की ओर चल पड़े हैं। यह शेरगढ़ किले की तलहटी यानी राजघाट से कोई एक किलोमीटर आगे है। यह रोहतास और कैमूर जिले के बहुप्रतिक्षित जलाशय परियोजना है जो कई दशकों बाद जाकर पूरी हो सकी है। जलाशय परियोजना पर जो शिलापट्ट लगा है उसके मुताबिक यह 2014 में पूरी हुई। तब इसका उदघाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतन राम माझी ने किया था। हालांकि आसपास का नजारा देखकर लग रहा है कि यहां अभी भी काम चल रहा है।

इस परियोजना का निर्माण बिहार सरकार के सिंचाई विभाग ने किया है। सत्तर के दशक में दुर्गावती नदी में बांध बनाकर नहर निकालने पर विचार हुआ था। इस बांध की जद में करमचट नामक गांव आ गया। इसलिए आसपास के लोग इसे करमचट डैम भी कहते हैं। दुर्गावती जलाशय परियोजना के पूरा हो जाने से कैमूर और रोहतास जिले के काफी गांव को लाभ हुआ है। इससे निकाली गई  नहरों से भभुआ और चेनारी के आसपास के गांव में पानी पहुंचने लगा है। इससे खेती बाड़ी सहज हो गई है।

हमलोग दुर्गावती जलाशय के मुख्य बांध पर चल रहे हैं। यह करीब डेढ़ किलोमीटर से भी ज्यादा लंबा है। इसके दूसरे कोने पर पहुंचने पर एक पहाड दिखाई देता है। इस पहाड़ की लंबाई चौड़ाई ज्यादा नहीं है पर यह ऊंचाई में कई मंजिले मकान की तरह तनकर खडा है। इसे देखकर किसी दैत्य जैसा अनुभव होता है। कई लोग इस पहाड़ के साथ तस्वीरें निकालने में व्यस्त हैं।


दुर्गावती जलाशय परियोजना के बारे में हम बचपन से सुनते आए हैं। हमारे कई रिश्तेदार इस परियोजना में नौकरी करते थे। पर सरकारी लालफीताशाही के कारण ये परियोजना कई दशकों तक लटकी रही। इसका काम कछुए की गति से चल रहा था। कई सालों तक तो इसमें कर्मचारी बिना काम किए वेतन उठाते रहे। इस बीच कई सरकारें आई और गईं। इलाके की जनता मांग करती रही पर जन प्रतिनिधि अनसुना करते रहे। पर सन 2010 के बाद इसके काम में तेजी आई। तत्कालीन सांसद मीरा कुमार ने इसमें रुचि ली। राज्य सरकार ने भी सहयोग किया फिर जाकर ये परियोजना हकीकत बन सकी। 

इस परियोजना के पूरा होने में कुल 38 साल लगे। इस परियोजना की आधारशिला 1976 मे तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जगजीवन राम ने रखी थी। दुर्गावती नदी बिहार उत्तर प्रदेश की सीमा कर्मनाशा के आसपास से निकलती है। आगे इसमें और कई छोटी छोटी नदियां समाहित हो जाती हैं।


दुर्गावती जलाशय परियोजना के बांध की ऊंचाई 90 मीटर है। इससे पानी छोड़े जाने पर आसपास का 40 हजार हेक्टेयर जमीन सींचित हो सकता है। जब इस परियोजना की शुरुआत हुई तो इसकी लागात का आकलन 25 करोड़ रुपये किया गया था। पर अब तक इसमें एक हजार करोड रुपये से ज्यादा खर्च किया जा चुका है। 

अतीत में जाएं तो इस परियोजना की मांग 1951-52 में स्थानीय लोगों ने तत्कालीन वित्त मंत्री अनुग्रह नारायण सिंह से की थी। तब इस क्षेत्र में अकाल पड़ा था। एक बार फिर 1966 के अकाल के बाद इस परियोजना की मांग की गई। पर इस पर काम की शुरुआत इसके दस साल बाद हो सकी।  
दुर्गावती जलाशय के पास से ही गुप्ता बाबा के धाम जाने का रास्ता है। यहां से धाम की दूरी 12 किलोमीटर है। आप पैदल,  बाइक या फिर ट्रैक्टर से जा सकते हैं। स्थानीय लोग सुगवा घाट और पनेरिया घाट से पदयात्रा करते हुए धाम तक जाते हैं। 


- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( DURGAWATI DAM PROJECT, KARAMCHAT DAM, ROHTAS, KAIMUR, JAGJEEVAN RAM, MIRA KUMAR) 


Friday, February 14, 2020

शेरशाह ने जीत लिया था भुरुकड़ा का किला


खरवार राजाओं ने शेरगढ़ के किले को बनवाने के लिए अपने समय में अदभुत तकनीक का सहारा लिया था। ज्यादातर भूमिगत अपार्टमेंट इसलिए बनवाए थे ताकि वे बारिश और धूप से सुरक्षा दे सकें। साथ रास्ते इस तरह के बने हैं कि दुश्मनों की सेना को जल्दी पता ही नहीं चले रास्ता किधर से है और वे चकमा खा जाएं।

खरवार राजाओं ने जब दसवीं सदी में इस किले का निर्माण कराया तो इसका नाम भुरुकुड़ा का किला हुआ करता था। यह नाम किले के पूर्वी क्षेत्र में स्थित भुरुकुड़ा गांव के नाम पर है। पर सोलहवीं सदी में इसे शेरशाह ने जीत लिया। तब शेरशाह ने इसे नया नाम दिया शेरगढ़।

शेरगढ़ के इस किले में दीवाने खास, रनिवास और नाच घर आदि का निर्माण कराया गया था। ये सभी आवास भूमिगत हैं। इन भूमिगत आवास में रोशनी जाने के लिए भी प्रबंध किया गया था। विशाल महल में कुएं के पास एक तहखाना भी है। कहा जाता है कि इसमें अब भी राजा का खजाना कहीं छिपा हुआ है। पर यह अदभुत किला कई सौ सालों तक दुनिया की नजरों से ओझल रहा। ब्रिटिश काल में यह किला थोड़ा प्रकाश में आया।   

ब्रिटिश सरकार ने अपने अधिकारी फ्रांसिस बुकानन को 1807 में दक्षिण बिहार के सर्वेक्षण का दायित्व सौंपा। बुकानन 30 नवम्बर 1812 को रोहतास जिले में आया और उसने जिले के कई पुरातात्विक स्थलों का दौरा किया। बुकानन ने 7 जनवरी 1813 में शेरगढ किले का दौरा किया था। उसने शेरगढ़ किले को अदभुत बताया है।

बुकानन लिखता है कि इस किले में कुल 28 भूमिगत आवास बनाए गए हैं। पर रोहतास जिले के इतिहास पर लगातार शोध करने वाले सासाराम के इतिहासकार मर्मज्ञ श्याम सुंदर तिवारी बताते हैं कि बुकानन के बाद 170 सालों में 28 में से शेरगढ़ किले के 20 भूमिगत आवास दबकर नष्ट हो गए। हमने इस अनमोल ऐतिहासिक विरासत का संरक्षण नहीं किया। अगर आगे भी इसी तरह की उपेक्षा जारी रही तो हो सकता है कि बाकी भूमिगत आवास भी आने वाली पीढ़ी को देखने को नहीं मिलें।

हां एक बात और शेरगढ़ किले के पास भुरुकुड़ा गांव में आज भी खरवार समाज के लोग रहते हैं। वे लोग खुद को खरवार राजा के वंशज मानते हैं। कई सौ सालों से उनके बीच आज भी राजा चुनने की परंपरा चली आ रही है। इन दिनो कामेश्वर सिंह खरवार राजवंश के सबसे नूतन पीढ़ी के राजा हैं।

मैं देश भर में दो सौ के आसपास छोटे बड़े किले देख चुका हूं। पर इन सब के बीच मैं शेरगढ़ के किले को काफी अलग और अनूठा पाता हूं। कुछ मामलों में यह राजस्थान के झालावाड़ के गगरोन के किले जैसा दिखाई देता है। क्योंकि वहां भी किले के तीन तरफ से नदियां बहती हैं। वहीं कई बार यह किला महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास स्थित दौलताबाद के किले जैसा भी लगता है।

पर जरूरत इस बात कि है इस किले को संरक्षित किया जाए। इसे पर्यटन के मानचित्र पर लाया जाए। सासाराम से यहां आने के लिए पैकेज टूर का इंतजाम किया जाए। आप वाराणसी से भी यहां पहुंच सकते हैं। आप चाहें तो एक साथ मुंडेश्वरी देवी, गुप्ता धाम और शेरगढ़ का किले देखने का कार्यक्रम भी बना सकते हैं। ये सब कुछ दो दिनों में हो सकता है। पर शेरगढ़ पहुंचने के लिए आपको कुदरा या चेनारी से आरक्षित वाहन का इंतजाम करना पड़ेगा।  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( SHERGARH FORT, SHERSHAH, KHARWAR KINGS, WONDER OF INDIA )
   

Wednesday, February 12, 2020

शेरगढ़ – कैमूर की पहाड़ी पर अनूठा किला


दोपहर में हमने शेरगढ़ के किले पर चढ़ाई शुरू कर दी है। करीब एक किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई के बाद हम किले की पहाड़ी पर पहुंच गए हैं। इस चढ़ाई में कई जगह सीढ़ियां हैं तो कई जगह पत्थर लगे हैं। अब वन विभाग द्वारा रास्ते में एक जगह यात्री शेड का निर्माण कराया जा रहा है। रास्ते में हम काम करते हुए कुछ मजदूर मिले। उम्मीद है अगली बार आने पर आपको रास्ता थोड़ा बेहतर मिले। तकरीबन एक घंटे की चढ़ाई के बाद हमलोग किले के प्रवेश द्वार पर पहुंच गए हैं। यह सिंह द्वार कहलाता है। यहां संतरियों के रहने के लिए आवास भी बना हुआ है। ये पक्का दो मंजिला आवास है। देखकर लगता है कि यहां से दुश्मनों पर निगरानी रखी जाती होगी। जिस रास्ते से हमने चढ़ाई की है उसे राजघाट कहा जाता है।

यहां पर अर्धचंद्राकार परकोटा बना हुआ है। इस परकोटे की मोटाई 27 फीट है। पहाड़ी के चारों ओर दस फीट मोटी सुरक्षा दीवार बनाई गई है। ये दीवारें अब कई जगह टूट चुकी हैं।

शेरगढ़ का यह किला अदभुत है। इसका निर्माण दसवीं सदी के आसपास खरवार राजाओं ने कराया था। खरवार आज भले ही बिहार झारखंड में अनुसूचित जनजाति समाज का हिस्सा बन गए हों। पर कभी ये लोग कैमूर के राजा हुआ करते थे। 

कई सौ साल राज करने के दौरान उन्होंने ये अदभुत किला बनवाया था। इस किले की खास बात है कि इसके ज्यादातर महल भूमिगत बने हुए हैं। मतलब बारिश धूप के साथ दुश्मनों से भी सुरक्षित। इसलिए ये किला देखने में तिलस्मी प्रतीत होता है। कई लोग से भुतहा भी मानते हैं।

शेरगढ़ का यह किला लगभग छह वर्ग मील में फैला हुआ है। सुरक्षा के लिहाज से भी इस स्थान का चयन काफी सोच समझ कर किया गया होगा। इसे दो तरफ से दुर्गावती नदी घेरती है। यानी इस किले पर सिर्फ दो रास्ते से ही आक्रमण किया जा सकता था।

किले के परिसर में रानी पोखर - सिंहद्वार से दक्षिण की तरफ लगभग तीन किलोमीटर चलने के बाद मुख्य किले तक पहुंचने का रास्ता है। हमलोग इस रास्ते पर चल पड़े हैं। कोई और सैलानी आने जाने वाले रास्ते में नहीं मिले। हां कुछ मजदूर जरूरत रास्ते की सफाई में जुटे हुए हैं। थोड़ी दूर चलने के बाद दाहिनी तरफ एक विशाल तालाब नजर आता है। हमलोग रुककर इस तालाब को देखने के लिए चल पड़े। इस तालाब का नाम रानी पोखर है। इसका निर्माण खरवार राजाओं ने वर्षा जल संचय के लिए किया था। पानी बरबाद न हो इसलिए तालाब के चारों तरफ पक्की दीवारें बनाई गई थीं। तालाब में उतरने के लिए सीढ़ियां भी बनी हुई हैं।

रानी पोखर देखने के बाद हमलोग आगे चल पड़े हैं। यहां से तकरीबन ढाई किलोमीटर चलने के बाद किले का मुख्य प्रवेश द्वार आया। रास्ते में जंगल में पेड़ पौधे हैं। बेल (श्रीफल) के पेड़ हैं। कहीं कही लंगूर भी दिखाई दे जाते हैं। किले के मुख्य प्रवेश द्वार के पास फिर सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। यहां पर भी संतरियों के रहने के लिए आवास बना हुआ है। मुख्य द्वार से दाहिनी तरफ फिर कुछ मंजिले चढ़ने के बाद आपको ऐतिहासिक किले के दर्शन होने लगते हैं। किले के पृष्ठ भाग में दुर्गावती नदी बह रही है।

शेरगढ़ के किले के कई हिस्से हैं। इसमें विशाल बारादरी बनी है। इसमें अलग अलग कई कमरे बने हैं। पर एक जगह हमें नीचे उतरने की सीढ़ियां नजर आती हैं। हमलोग टार्च की रोशनी में नीचे उतरने लगे। नीचे एक विशाल कुआं नजर आता है। कुएं के चारों तरफ बरामदा बना हुआ है। इस कुएं में हमेशा शीतल जल मौजूद रहता था। इतनी ऊंचाई पर कुआं देखकर कर अचरज होता है। बगल में दुर्गावती नदी की धारा काफी नीचे बह रही है। फिर इस  कुएं में इस स्तर तक पानी कैसे आता होगा।

कुएं से बाहर निकलकर हमलोग आगे बढ़े तो कई और कौतूहल हमारा इंतजार कर रहे थे। आगे फिर ऐसी सीढ़ियां सुरंग की ओर उतरती नजर आईं। हमलोग कौतूहलवश उतर गए। अंदर पूरा भूमिगत आवास बना हुआ नजर आया। अगले कुछ घंटे में हमने चार ऐसा आवास में सीढ़ियां उतरकर नजारा किया। अंदर बिल्कुल अंधेरा रहता है। इसलिए अच्छी तरह देखने के लिए आपके पास शक्तिशाली टार्च होना चाहिए। (अभी जारी है...)  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( SHERGARH FORT, SHERSHAH, KHARWAR KINGS, WONDER OF INDIA )


Monday, February 10, 2020

शेरगढ – एक तिलिस्मी किले की ओर

सासाराम के जिला सत्र न्यायालय की ऐतिहासिक इमारत। 
इस बार जब अपने गृह जिला रोहतास पहुंचा हूं तो अपने जिले के किसी दर्शनीय स्थल को घूमने की योजना बनाई। अपने कुछ दोस्तों से बात की। पहले रोहतासगढ चलने पर चर्चा हुई। हमारे साथ परमेश्वर प्रताप ने सलाह दी कि रोहतासगढ सावन के मेले मे चलेंगे। फिर तय हुआ कि शेरगढ ही चला जाए। भले ही मैं रोहतास जिले का निवासी हूं और मेरे गांव से शेरगढ की दूरी महज 40 किलोमीटर के दायरे में है मेरे लिए ये किला अनदेखा था। 

तो हमलोग चल पडे सासाराम से शेरगढ की ओर। अगर आप देश के किसी कोने से शेरगढ़ पहुंचना चाहते हैं तो आपको दीनदयाल नगर- गया रेलवे लाइन पर कुदरा रेलवे स्टेशन उतरना चाहिए। पर रोहतास जिला के मुख्यालय सासाराम से शेरगढ़ जाने के लिए तीन रास्ते हैं। पहला वाया कुदरा चेनारी।दूसरा वाया शिवसागर चेनारी। तीसरा सासाराम से सीधे बेदा नहर के साथ लगती सड़क पकड़ कर चेनारी पहुंचे। मैं मेरे फुफेरे भाई अरविंद मेहता और साथी परमेश्वर प्रताप एक गाड़ी में चल पड़े हैं। पर सासाराम शहर से बाहर निकलते ही जीटी रोड पर भारी जाम लगा है। हमारे चौथे साथी जो हमारे साथ जाने वाले हैं वे कुदरा में सकरी मोड पर हमारा इंतजार कर रहे हैं।

वे हैं मेरे एक और भाई अशोक वर्मा। हमने अशोक को सलाह दी कि आप सीधे चेनारी पहुंच कर हमें मिलें। हमलोग शिवसागर से ही जीटी रोड छोड़ कर चेनारी की तरफ चल पडेंगे। पर सासाराम से शिवसागर पहुंचने में ही हमें दस किलोमीटर के सफर में जाम के कारण एक घंटे लग गए। खैर शिवसागर से चेनारी जाने वाली सड़क स्टेट हाईवे है और काफी अच्छी हालत में है। रास्ते में एक गांव पड़ा बरताली। यहां रुक कर हमने गाड़ी में पेट्रोल लिया। थोडी दूर चलने पर यह सड़क। नहर वाली सड़क में मिल गई।

चेनारी से ठीक पहले हाटा गांव आया। इस हाटा गांव में हमारी एक रिश्तेदारी है। गांव के सुदर्शन चाचा की ननिहाल है। इसलिए हमलोग उनकी मां को हाटा वाली दादी कहते थे।
चेनारी बाजार में हमारी मुलाकात अशोक वर्मा से हुई। चेनारी रोहतास जिले का एक ब्लॉक, थाना और विधानसभा क्षेत्र भी है। कैमूर की पहाड की तलहटी में चेनारी अच्छा खासा बाजार बन चुका है। बचपन में अपने गांव के एक चाचा की बारात में ट्रैक्टर से हमलोग चेनारी आए थे। इसके आगे तुर्की नाम के गांव में बारात गए थे। लौटते हुए चेनारी के बाजार से हमने महुआ खरीदा था। ये महुआ दूध देने वाली गाय को खिलाने के लिए था। मुझे पता चला कि चेनारी गुड़ के लड्डू के लिए प्रसिद्ध है। पर बाजार के अंदर गुड़ के लड्डू की प्रसिद्ध दुकान पर हमलोग नहीं जा सके।

चेनारी बाजार में अशोक वर्मा साथ हो लिए। हम चार लोग आगे बढ चुके हैं। अगला गांव है -मल्हीपुर । पर मेरे पिताजी बताते हैं किसी समय में मल्हीपुर बडा बाजार हुआ करता था। हमारे गांव के लोग हल बैल से जुडे कई उपकरण खरीदने यहां आते थे। यहां बड़ी मंडी लगा करती थी। अब चेनारी बड़ा बाजार हो गया है। इसे छेदी पासवान ने आदर्श ग्राम बनाने के लिए गोद ले रखा है। पर यहां एक प्रवेश द्वार के अलावा आदर्श के नाम पर कोई चीज नहीं दिखाई दी।

गांव में लोगों ने बताया कि शेरगढ़ यानी करमचट डैम तक जाने के लिए सीधे जाकर दाहिनी तरफ जाने वाली सड़क पर मुड़े। ये सड़क एक नहर के साथ चल रही है। शेरगढ़ के बगल में बादलगढ गांव है। यहां सीआरपीएफ का शिविर है। पहाड़ की तलहटी में अपनी गाड़ी पार्क करके हमलोग शेरगढ़ की ओर बढ़ चले हैं। किले तक पहुंचने के लिए कोई चार किलोमीटर की चढ़ाई करनी है। (यात्रा जारी है...)
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
( CHENARI, SHERGARH FORT,  ROHTAS ) 


Saturday, February 8, 2020

सारनाथ का धमेक स्तूप और मूलगंध कुटी


मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन से उतर कर वाराणसी कैंट पहुंच गया हूं। मेरी अगली ट्रेन तीन घंटे बाद है तो क्यों ने एक बार फिर सारनाथ घूम लिया जाए। आटो रिक्शा में बैठकर सारनाथ चल पडा। चौकाघाट के बाद वरुणा नदी का पुल पार करके हुकुलगंज फिर आशापुर चौराहा पहुंचा। हमारे आटो वाले यहीं तक जाने वाले हैं। यहां से आगे बैटरी रिक्शा मिल गया। पहडिया मंडी फिर आशापुर चौराहा होते हुए हम पहुंच गए हैं सारनाथ। प्रवेश टिकट लेकर मैं चल पडा हूं एक बार फिर सारनाथ में खुदाई से मिले अवशेषों को देखने के लिए।   

मौर्यवंश के बाद सारनाथ का भी पतन होने लगा था। पर ब्रिटिश काल में उत्खनन के बाद सारनाथ के ऐतिहासिक महत्व का पता चलने लगा। आप संग्रहालय से आगे बढकर सारनाथ के खनन वाले स्थल से प्राप्त अवशेषों को देख सकते हैं। इस क्षेत्र का सबसे पहले कम पैमाने पर उत्खनन का काम कर्नल कैकेंजी ने 1815 में करवाया। हालांकि उनको कोई महत्त्वपूर्ण सफलता नहीं मिली। इस उत्खनन से मिली सामग्री कलकत्ता के भारतीय संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।

कनिंघम की अगुवाई में बडे पैमाने पर उत्खनन
कैकेंजी के उत्खनन के 20 साल बाद 1835-36 में कनिंघम ने सारनाथ का विस्तृत उत्खनन करवाया। उत्खनन में उन्होंने मुख्य रूप से धमेख स्तूप, चौखंडी स्तूप एवं मध्यकालीन विहारों को खोद कर निकाला गया। इससे पहले ये सारे स्मारक लोगों को नहीं मालूम थे।

कनिंघम का धमेख स्तूप से तीन फीट नीचे 600 ई. का एक अभिलिखित शिलापट्ट भी ढूंढ मिला। इसके अलावा यहां से बड़ीं संख्या में भवनों में इस्तेमाल पत्थरों के टुकड़े एवं मूर्तियां भी मिलीं थीं। ये सब कुछ अब कलकत्ता के भारतीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई हैं। सन 1851-52 ई. में मेजर किटोई ने यहां एक बार फिर उत्खनन करवाया जिसमें उन्हें धमेक स्तूप के आसपास अनेक स्तूपों एवं दो विहारों के अवशेष मिले।

 आजकल आप इन्हे सारनाथ में देख सकते हैं। किटोई के बाद एडवर्ड थामस और प्रोफेसर फिट्ज एडवर्ड हार्न ने खोज कार्य आगे भी जारी रखा। उनके द्वारा उत्खनित वस्तुएं अब भारतीय संग्रहालय कलकत्ता में पहुंचा दी गई हैं।


सारनाथ क्षेत्र का विस्तृत एवं वैज्ञानिक उत्खनन एचबी ओरटल ने करवाया। यह उत्खनन 200 वर्ग फीट क्षेत्र में किया गया। तब यहां से मुख्य मंदिर और अशोक स्तंभ के अतिरिक्त बड़ी संख्या में मूर्तियां एवं शिलालेख मिले। प्रमुख मूर्तियों में बोधिसत्व की विशाल अभिलिखित मूर्ति, आसनस्थ बुद्ध की मूर्ति, अवलोकितेश्वर, बोधिसत्व, मंजुश्री, नीलकंठ की मूर्तियां मिली। यहां से तारा, वसुंधरा आदि की प्रतिमाएं भी मिली हैं।

धमेक स्तूप   यह सारनाथ का प्रमुख स्तूप है। इसे धर्माराजिका स्तूप भी कहते हैं। इसका निर्माण अशोक ने करवाया था। दुर्भाग्यवश 1794 में जगत सिंह के आदमियों ने काशी का प्रसिद्ध मुहल्ला जगतगंज बनाने के लिए इसकी ईंटों को खोद डाला था। खुदाई के समय 8.23 मीटर की गहराई पर एक संगरमरमर की मंजूषा में कुछ हड्डियां एवं स्वर्ण पात्रमोती के दाने एवं रत्न मिले थेजिसे तब लोगों ने गंगा में बहा दिया। धमेक स्तूप के आसपास खुदाई के अवशेष देखे जा सकते हैं। 

मूलगंध कुटी मंदिर  – सारनाथ का मूलगंध कुटी गौतम बुद्ध से जुड़ा हुआ प्रमुख  मंदिर है। सातवीं शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसका वर्णन 200 फीट ऊंचे मूलगंध कुटी विहार के नाम से किया है। इस मंदिर पर बने हुए नक्काशीदार गोले और छोटे-छोटे स्तंभों से लगता है कि इसका निर्माण गुप्तकाल में हुआ होगा। मंदिर के बदल में गौतम बुद्ध के अपने पांच शिष्यों को दीक्षा देते हुए मूर्तियां बनाई गई हैं।




मूलगंध कुटी के आसपास सडक पर बाजार है। यहां से कई तरह के बुद्ध की मूर्तियां खरीद सकते हैं। यहां खाने पीने की दुकाने भी हैं। आप गन्ने का जूस पी सकते हैं। लिट्टी-चोखा या गोलगप्पे का स्वाद ले सकते हैं। मूलगंध कुटी के सामने बिडला परिवार द्वारा निर्मित धर्मशाला भी है। यहां रहने के लिए रियायती दरों पर कमरे उपलब्ध हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
( SARNATH, BUDDHA, MULGANDH KUTI, DHAMEK STUPA)

Thursday, February 6, 2020

मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन और कबीर की काशी


दिल्ली मंडुवाडीह सुपरफास्ट एक्सप्रेस बिल्कुल समय पर मंडुवाडीह स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर छह पर पहुंच गई है। कई साल बाद इस रेलवे स्टेशन पर पहुंचा हूं। इस बीच स्टेशन का कायाकल्प हो चुका है। किसी जमाने में यह मीटर गेज का रेलवे स्टेशन हुआ करता था। वाराणसी से इलाहाबाद सिटी जाने वाली छोटी लाइन की ट्रेने यहां से गुजरती थीं। बाद में मीटरगेज लाइन ब्राडगेज में बदल गई। हाल के सालों में मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन का विस्तार किया गया है। अब यहां कुल आठ रेलवे प्लेटफार्म हैं। 

वाराणसी कैंट स्टेशन से गुजरने वाली ट्रेनों की भीडभाड कम करने के लिए कई ट्रेनों को मंडुवाडीह स्थानांतरित किया गया है। अब शिवगंगा एक्सप्रेस, नई दिल्ली सुपरफास्ट एक्सप्रेस, काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस जैसी तमाम ट्रेनें यहीं से बनकर चलती हैं। अब यह स्टेशन एक टर्मिनल के तौर पर विकसित हो रहा है। स्टेशन के बगल में स्थित रेलवे फाटक के ऊपर सुंदर फ्लाईओवर बन चुका है।   

मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर मुझे कबीर नजर आते हैं। कबीर के चित्र के साथ उनका एक दोहा लिखा है-
कबीरा कुआं एक है पानी भरें अनेक।
भांडे में ही भेद है, पानी सबमें एक।
काशी मतलब कबीर की काशी, आदि कवि महर्षि वाल्मिकी की काशी। यह संयोग है कि कबीर को  जुलाहे नीरू और नीमा से जिल तालाब से प्राप्त किया था वह तालाब मंडुआडीह रेलवे स्टेशन से महज एक किलोमीटर की दूरी पर है। 

लहरतारा का तालाब। इसी तालाब के किनारे एक दिन जुलाहे नीरु को एक बच्चा मिला था। उसका धर्म क्या था। किसी को नहीं मालूम। वैसे बच्चा पैदा होता है तो उसका धर्म क्या होता है। धर्म की चादर तो हम बाद में ओढा देते हैं ना। तो इस तरह कबीर मुसलमान ही हुए। खैर मंडुआडीह रेलवे स्टेशन पर रेलवे प्रशासन ने कबीर की यादें संजोई हैं। तो इसके साथ ही सारनाथ के गौतम बुद्ध को याद किया है। दीवारों पर लगे म्युरल में सारनाथ का धमेक स्तूप दिखाई देता है।

अर्धनारीश्वर शिव की प्रतिमा - प्लेटफार्म नंबर आठ के द्वार के पास बने विशाल झरना युक्त प्रदर्शनी में शिव के अर्धनारीश्वर रूप को प्रदर्शित किया गया है। यह प्रदर्शनी इतनी सुंदर और भव्य बनी है कि आते जाते लोग रुक जाते हैं। देर तक उसे निहारते हैं फिर उसके साथ अपनी तस्वीरें लेते हैं।

प्लेटफार्म नबंर आठ की ओर से अब मुख्य प्रवेश द्वार बना दिया गया है। मुख्य भवन मंदिर की शक्ल में है। प्लेटफार्म नंबर आठ पर कई नए वेटिंग हॉल बनाए गए हैं। ये हॉल वातानुकुलित है। शानदार सोफे लगे हैं। दीवारों पर शहर बनारस की पेंटिंग लगी है। प्लेटफार्म नबंर आठ पर विशाल कैफेटेरिया भी बना है। स्टेशन के बाहर विशाल मैदान है। इसमें एक सरोवर बनाकर उसमें कई फव्वारे लगाए हैं। मतलब आप स्टेशन पर कुछ घंटे भी गुजारें तो बोरियत नहीं महसूस होगी।

नैरोगेज का स्टीम लोकोमोटिव - प्लेटफार्म नंबर आठ के प्रवेश द्वार पर रेलवे ने नैरोगेज का एक डीजल इंजन भी स्थापित किया है। यह इंजन गुजरात के बडौदा के आसपास में चलने वाले नैरोगेज नेटवर्क से लाया गया है। यह मियागाम कर्जन से मोतीकोरल, डभोई के बीच संचालित होता था। हालांकि यह इंजन ज्यादा पुराना नहीं है। इस लोकोमोटिव जेडडीएम 541 का निर्माण 1993 में चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स द्वारा किया था। कई सेवाएं देने के बाद ये जब रिटायर हो गया तो इसे मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन पर लाकर स्थापित कर दिया गया।

मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन से महज एक किलोमीटर की दूरी पर डीजल रेल कारखाना स्थित है। पहले यह मीटर गेज और ब्राडगेज के लोकोमोटिव का देश का एकमात्र निर्माता था। अब यहां पर इलेक्ट्रिक इंजन बनाए जा रहे हैं। साथ ही पुराने डीजल इंजन को इलेक्ट्रिक इंजन में परिवर्तित भी किया जा रहा है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-        ( MANDUVADIH RAILWAY STATION, NG LOCO, VARANASI )