Tuesday, March 31, 2020

नानकमता से दिल्ली – वाया किच्छा रुद्रपुर- बिलासपुर,रामपुर


दुनिया के तमाम देश कोरोना जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं। ऐसे वक्त में घर में रहें। यात्राएं हरगिज न करें। यात्रा साहित्य पढें। नई किताबें पढ़ें। दानापानी ब्लॉग पर लगातार अपलोड हो रही यात्राएं पहले की गई हैं।

नानकमता गुरुद्वारा में मत्था टेकने के बाद एक बार फिर बाजार के चौराहे पर पहुंच गया हूं। यहां से रात को दिल्ली के लिए सीधी बस जरूर है। पर मैं दोपहर में ही आगे चलना चाहता हूं। ताकि बिलासपुर में अपने के पुराने मित्र से मुलाकात कर सकूं। तो मुझे सितारगंज जाने के लिए आटो रिक्शा मिल गया है। नानकमत्ता गुुरु घर से सितारगंज की दूरी 12 किलोमीटर है।

थोड़ी देर में मैं सितारगंज बाजार के चौराहा पर पहुंच गया हूं। आप नानकमत्ता आने पर सितारगंज शहर के होटलों में भी ठहर सकते हैं। वैसे नानकमता गुरुद्वारा में भी विशाल अतिथि गृह बना हुआ है। 

सितारगंज से किच्छा ट्रक से -  लगता है आगे की मेरी यात्रा टुकड़ो में होनी है। सितारगंज से किच्छा जाना है। वहां से रुद्रपुर फिर आगे बिलासपुर फिर रामपुर। थोड़ी देर इंतजार के बाद किच्छा या रुद्रपुर जाने वाली कोई बस नहीं आई। मेरे साथ एक और सज्जन किच्छा की बस का इंतजार कर रहे हैं। तभी एक ट्रक वाले ने अपनी ट्रक रोकी। उससे पूछने पर की क्या वह हमें किच्छा तक छोड़ देगा, हमलोग इस ट्रक में सवार हो गए। शानदार हाईवे से चलते हुए ट्रक चालक ने हमें थोड़ी देर बाद किच्छा के बाजार में उतार दिया। 

कई साल पहले अपनी नैनीताल यात्रा के दौरान मैं एक बार किच्छा आया था। तब हमारे एक मित्र दिग्विजय नाथ सिंह के पिता जी यहां किच्छा शुगर मिल में कार्यरत थे।

किच्छा  रुद्रपुर जिले का एक बाजार है। हमें अब रुद्रपुर जाना है। किच्छा के मुख्य बस स्टैंड से रुद्रपुर के लिए शेयरिंग आटो रिक्शा और टाटा मैजिक जैसी गाड़ियां हमेशा मिलती हैं। मैं एक शेयरिंग टैक्सी में बैठ गया। रुद्रपुर का किराया है 20 रुपये। दूरी 20 किलोमीटर से कम ही है। थोड़ी देर में हमलोग रुद्रपुर शहर के अंदर पहुंच चुके हैं। टैक्सी ने हमें रुद्रपुर बस स्टैंड में उतार दिया है।


रुद्रपुर उत्तराखंड का बड़ा औद्योगिक शहर है। हाल के कुछ सालों में यहां पर बड़े पैमाने पर उद्योग धंधे लगे हैं। इसलिए जिला उधम सिंह नगर के मुख्यालय रुद्रपुर का विस्तार तेजी से हुआ है। यह शहर नैनीताल जाने के मार्ग में पड़ता है। पास में पंतनगर एयरपोर्ट है। पर रुद्रपुर शहर देखने में सुंदर नहीं लगता है। धूल उड़ाती सड़कें और औद्योगिक शहर का प्रदूषण यहां साफ दिखाई देता है। रुद्रपुर से दिल्ली के लिए सीधी बसें खूब मिलती हैं। पर यहां से महज 18 किलोमीटर आगे रामपुर जिले का बिलासपुर शहर है। अब बिलासपुर शहर तक रुद्रपुर का औद्योगिक क्षेत्र पसर चुका है।

इस बिलासपुर में मेरे बहुत पुराने मित्र अतय कुमार रहते हैं। उनसे फोन पर बात हुई वे मिलेंगे। तो मैं बस में बिलासपुर तक का टिकट खरीदता हूं। बिलासपुर उतरने पर बाजार में अतय कुमार से 1991 के बाद दूसरी बार मुलाकात हुई। कुल 28 साल बाद मुलाकात। वे मुझे राष्ट्रीय युवा योजना के अलीगढ़ शिविर में मिले थे। तो इतनी पुरानी मुलाकात में अतय कुमार के साथ रसमलाई खाना तो बनता ही था।

छोटी सी यादगार मुलाकात के बाद अतय कुमार ने मुझे रामपुर होकर मुरादाबाद जाने वाली बस में बिठा दिया। रास्ते में देख रहा हूं इस हाईवे को चौड़ा करने का काम जगह जगह चल रहा है। रामपुर के बाद बस दिल्ली हाईवे पर दौड़ रही है। मुरादाबाद में मैं इस बस से उतरने के बाद मैं रेलवे स्टेशन चला गया।

नहीं हो सका टनकपुर एक्सप्रेस में सवार -  दिल्ली जाने वाली टनकपुर एक्सप्रेस का समय हो रहा है। मैं गाजियाबाद का टिकट लेकर प्लेटफार्म नंबर पांच की तरफ दौड़ पड़ा। पर ट्रेन को देखकर निराशा हुई। ट्रेन में इतनी भीड़ थी कि इसमें चढ़ना मुश्किल था। वापस टिकट घर लौटा। साठ रुपये का टिकट वापस करके 30 रुपये मिले। 

मैं वापस बस स्टैंड लौट आया। यहां से दिल्ली जाने वाली बस में मोहननगर की टिकट खरीद कर बैठ गया। मुरादाबाद के रेलवे स्टेशन के आसपास का इलाका साफ सुथरा नहीं नजर आता। दिल्ली जाने बस तकरीबन एक घंटे तक मुरादाबाद शहर के औद्योगिक क्षेत्र की सड़कों पर चक्कर घिन्नी काटती हुई शहर के बाहर निकली। इस दौरान मुझे शहर में जिगर मुरादाबादी द्वार नजर आया। महान शायर इसी शहर के रहने वाले थे। उन्होंने लिखा था -
ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लिजिए
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।

और 

हमको मिटा सके ये जमाने में दम नहीं
हमसे जमाना खुद है, जमाने से हम नहीं। 
अब हमारी बस दिल्ली की ओर जा रहे एक्सप्रेस वे पर दौड़ने लगी है। मैं चलती बस में सोने की कोशिश कर रहा हूं। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( NANAKMATA, SITARGANJ, KICHHA, RUDRAPUR, BILASPUR, RAMPUR, MORADABAD )


Sunday, March 29, 2020

नानकमत्ता गुरुद्वारा – गुरुनानकदेव जी की स्मृतियां हैं यहां


दुनिया के तमाम देश कोरोना जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं। ऐसे वक्त में घर में रहें। यात्राएं हरगिज न करें। यात्रा साहित्य पढें। नई किताबें पढ़ें। दानापानी ब्लॉग पर लगातार अपलोड हो रही यात्राएं पहले की गई हैं।

खटीमा से चले शेयरिंग आटो रिक्शा ने हमें नानकमत्ता बाजार के चौराहा पर उतार दिया है। नानकमत्ता उत्तराखंड के जिला उधम सिंह नगर का एक ऐतिहासिक शहर है। यह छोटा सा शहर सिखों के पहले गुरु और महान मानवतावादी गुरुनानक देव जी को समर्पित है। यह देवहा नदी की जल धारा के किनारे बसा हुआ है।

नानकमत्ता चौराहे से मुझे गुरुद्वारा जाना है। लोगों ने बताया सीधे सड़क पर चलते जाएं। आगे तिराहे से बायें मुड़ते ही गुरुद्वारा दिखाई दे जाएगा। छोटे से बाजार की सड़क पर हल्की बारिश में मैं आगे बढ़ने लगा। हालांकि बैटरी रिक्शा से जाने का भी विकल्प है। पर मैं पैदल ही चल पड़ा हूं। अब नानकमत्ता का विशाल गुरुद्वारा मेरी नजरों के सामने है। यहां पर निजी वाहनों के लिए विशाल पार्किग उपलब्ध है। गठरी घर में अपना बैग जमा करने और चप्पल जमा करने के बाद सिर में पटका बांध कर मैं गुरु घर में प्रवेश कर गया हूं।



गुरुद्वारे में मत्था टेकने के बाद थोड़ी देर बैठकर कीर्तन सुनने लगा। यह बड़ा सुकुन देने वाला क्षण होता है। नानकमत्ता सिखों के महत्वपूर्ण तीर्थ स्थानों में से एक है। यहां के गुरुद्वारा का नाम भी गुरुद्वारा नानक माता साहिब है। सिखों के पहले गुरु गुरु नानक देव सन 1515 में कैलाश पर्वत की यात्रा के दौरान नानकमत्ता पहुंचे थे। यहां उनका सिद्धों से कई मुद्दों पर विवाद हुआ था। 

धुना साहिब और भोरा साहिब - गुरुद्वारा के मुख्य भवन के अंदर गुरु नानक देव से जुड़ी हुई दो प्रमुख स्मृतियां हैं। यहां एक गड्ढा बना है जिसे भोरा साहिब कहते हैं। इस स्थल पर गुरुनानकदेव जी को सिद्ध लोगों ने परेशान करने की कोशिश की थी। कहा जाता है कि सिद्धों ने एक गड्ढा खोदकर एक बच्चे को छिपा दिया। पर उनकी ये चाल काम नहीं आई है। जब धरती से उस बच्चे के बारे में पूछा गया तो तीन बार आवाज आई – नानकमता, नानकमता, नानकमता।

गुरुघर के अंदर दूसरा ऐतिहासिक स्थल धूना साहिब है। कहा जाता है कि जब गुरुनानक देव जी के शिष्य मरदाना ने  सिद्धों से आग मांगा तो उन्होंने देने से इनकार कर दिया। तब मरदाना ने खुद लकड़ियां जुटाई। फिर इन लकड़ियों में गुरुजी के प्रताप से खुद ही आग जलने लगी।

पीपल साहिब – गुरुद्वारा परिसर में सरोवर के किनारे एक विशाल पीपल का वृक्ष है जिसे पीपल साहिब कहा जाता है। इस पीपल के वृक्ष के बारे में बताया जाता है कि गुरुनानक देव जी ने इसे अपने हाथों से लगाया था। अब इस विशाल वृक्ष को बड़े जतन से संरक्षित करके रखा गया है। यहां आने वाले श्रद्धालु इस वृक्ष के आगे श्रद्धा से सिर झुकाते हैं।

सरोवर में मछलियां - गुरुद्वारा के अंदर विशाल सरोवर है। ऐसे सरोवर देश के कई प्रमुख गुरुद्वारों में दिखाई देते हैं। सरोवर का जल अत्यंत निर्मल है। इसमें मछलियां भी पाली गई हैं। सरोवर में मछलियों को चहलकदमी करते हुए देखना अच्छा लगता है। लोगों को आम तौर पर इस सरोवर में स्नान करने की अनुमति नहीं है।
गुरुद्वारा परिसर में सरोवर के एक किनारे पर एक संग्रहालय का भी निर्माण कराया गया है। इसमें कई चित्र विथिकाएं हैं। यहां पर सिख धर्म के दस गुरुओं के बारे  में और सिख धर्म से जुड़ी प्रमुख ऐतिहासिक लड़ाइयों के बारे में काफी कुछ जाना जा सकता है।

गुरुद्वारा में मत्था टेकने के बाद मैं चल पड़ा लंगर हॉल की तरफ। लंगर में आज दाल रोटी, चावल, सब्जी के साथ खीर मिल रही है। लंगर छकने के बाद अब बाहर चलने की बारी है। गुरुद्वारा के बाहर सड़क के उस पार पार्किंग भी है। यहां पर निजी वाहनों से आने वाले लोग अपने वाहन खड़ा कर सकते हैं।

 दिल्ली और पंजाब की बसें - नानकमत्ता से हर रोज सीधे दिल्ली, अंबाला और पंजाब के सभी शहरों के लिए लग्जरी बसें चलती हैं। ये निजी बसें सिख श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए चलाई जाती हैं। वैसे नानक मत्ता का निकटतम शहर सितारगंज है। यहां पर आप रुद्रपुर या खटीमा कहीं से भी स्थानीय वाहनों से पहुंच सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com 
(NANAKMATTA GURUDWARA, SITARGANJ, UTTRAKHAND)


Saturday, March 28, 2020

टनकपुर से नानकमत्ता डैम वाया खटीमा




दुनिया के तमाम देश कोरोना जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं। ऐसे वक्त में घर में रहें। यात्राएं हरगिज न करें। यात्रा साहित्य पढें। नई किताबें पढ़ें। दानापानी ब्लॉग पर लगातार अपलोड हो रही यात्राएं पहले की गई हैं।

नेपाल के सिद्धेश्वर महादेव से लौटने के बाद अब टनकपुर से वापस लौटने की तैयारी है। धर्मशाला से चेकआउट करने के बाद टनकपुर के बस स्टैंड पहुंच गया हूं। यहां से खटीमा जाने वाली बस तुरंत ही मिल गई। अच्छी सड़क होने के कारण टनकपुर से खटीमा का रास्ता आधे घंटे का है। 

नेपाल का प्रवेश द्वार है बनबसा - तो टनकपुर से चलने के बाद पहले बनबसा आया। ये बनबसा शहर हमारे पड़ोसी देश नेपाल की सीमा पर है। यहां से बसें और वाहन नेपाल में प्रवेश करते हैं। दिल्ली से महेंद्र नगर जाने वाली बसें बनबसा होकर ही नेपाल में प्रवेश करती हैं। ये बसें दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे से चलती हैं। बनबसा कोई टूरिस्ट प्लेस नहीं है। पर नेपाल जाने वालों के लिए ये ट्रांजिट प्वाइंट की तरह है। इसलिए यहां पर कई सस्ते टूरिस्ट लॉज उपलब्ध हैं। यहां खाने पीने के ढाबों पर भी नेपाल की छाप नजर आती है। गोरखाली होटल और तिवारी ढाबा जैसा नाम नजर आता है।

बनबसा पन बिजली उत्पादन का भी बड़ा केंद्र है। शारदा नदी से यहां पर बिजली का उत्पादन किया जाता है। बनबसा में पावर स्टेशन भी बना हुआ है। एनएचपीसी के पावर स्टेशन का नाम टनकपुर पावर स्टेशन है। इसकी तीन इकाइयों से बिजली का 90 मेगावाट से बिजली का उत्पादन होता है।  



मुझे बस की खिड़की से दोनों तरफ हरे भरे वन दिखाई दे रहे हैं। इन वनों के बीच कहीं-कहीं लोगों को घर बड़े सुंदर दिखाई दे रहे हैं। रास्ते में सेना और एसएसबी का कैंप भी दिखाई देता है। इन्ही हरे भरे इलाके में कहीं आशियाना हो तो कितना अच्छा होता। तो टनकपुर, बनबसा के हरे भरे इलाके को अलविदा। फिर मिलेंगे। हम चंपावत जिले से दूर हो रह हैं। उधम सिंह नगर जिले की सीमा शुरू हो गई है।  


सड़क पर बस सरपट दौड़ती जा रही है। कब खटीमा आ गया पता ही नहीं चला। खटीमा उत्तराखंड के शहीद उधम सिंह नगर जिले में आता है। खटीमा उतरने पर पता चला कि नानकमत्ता जाने वाली बस चौराहे पर जाकर मोड़ पर दाहिनी तरफ वाली सड़क पर मिलेगी। खटीमा का मुख्य बाजार काफी अच्छा है। बड़ी बड़ी दुकानें दिल्ली से मुकबला करती प्रतीत होती हैं। इसी बीच एक मिठाई की दुकान में जलेबियां बनती दिखाई दे गईं। हल्की बारिश के बीच जलेबियों का स्वाद लेने के लिए मैं दुकान पर रुक गया। दस रुपये में 100 ग्राम जलेबी। 

जलेबी खाकर आगे चल पड़ा। सितारगंज मोड़ पर नानकमत्ता जाने वाला एक आटो रिक्शा खड़ा था। तो मैं आटोरिक्शा में ही बैठ गया। अब आटो में बैठना फायदे का सौदा रहा। अगर बस से जाता तो बस हमें नानकमत्ता के चौराहे पर या बाइपास चौराहे पर उतार देती। पर आटो रिक्शा वाला नानकमत्ता बाजार आने से पहले दाहिनी तरफ की सड़क पर मुड़ गए वे नानकमत्ता डैम के किनारे होते हुए चल पड़े। तो धीमी गति से चल रहे आटो में हमें नानकमत्ता जलाशय के भी दर्शन हो गए।

नानकमत्ता में नानक सागर बांध – कुछ सैलानी जलाशय देखने पहुंचे हुए हैं। डैम के किनारे व्यू प्वाइंट पर कुछ खाने पीने की भी दुकाने हैं। नानक सागर बांध के जलाशय से निकाली गई नहर से उत्तर प्रदेश के तीन जिलों को सिंचाई के लिए पानी मिलता है। इस जलाशय के पानी से यूपी के पीलीभीत, बरेली और उत्तराखंड के उधम सिंह नगर के खेतों को पानी मिलता है। खटीमा शहर से 14 किलोमीटर दूर देवहा (सरयू) नदी की धारा को रोककर उस पर नानक सागर बांध का निर्माण किया गया है। इस बांध का निर्माण 1962 में किया गया था।

देवहा है गंगा की सहायक नदी - देवहा नदी हिमालय से निकलने वाली छोटी नदियों में से है। इसे देवा, नंधौर या गर्रा नाम से भी जाना जाता है। यह पीलीभीत जिले से गुजरती हुई आगे जाकर गंगा में मिल जाती है। हालांकि पीलीभीत में जाकर नदी बड़े पैमाने पर प्रदूषण का शिकार हो जाती है। नदी पीलीभीत शहर से होकर गुजरती है। बरेली से पीलीभीत आने पर इस नदी पर पुल मिलता है।

नानक सागर बांध की ऊंचाई 16.5 मीटर है। पहाड़ों में अच्छी बारिश होने पर नानक सागर डैम में पानी लबालब भर जाता है। पर कम बारिश होने पर कई साल इस जलाशय में पानी की कमी हो जाती है। साल 2014 और 2017 में यहां पानी काफी कम था। पर इस साल 2019 में जलाशय में खूब पानी है। कभी नानक सागर बांध उत्तर प्रदेश का हुआ करता था। उत्तराखंड बनने के बाद ये इलाका नए राज्य में आ गया। पर कुछ बांधों का परिसंपत्ति का विवाद अभी दोनों राज्यों के बीच हल नहीं किया जा सका है, उनमें नानक सागर जलाशय का भी मामला है।

नानक सागर डैम से आगे निकलने के बाद तकरीबन दो किलोमीटर चलने के बाद आटोरिक्शा ने हमें नानकमत्ता बाजार के चौराहे पर उतार दिया है। यहां कुछ निजी बस आपरेटरों के दफ्तर हैं। वहां से पता चला कि नानकमत्ता से रोज रात को दिल्ली के लिए सीधी बस सेवा है। किराया 400 रुपये है। यहां से पंजाब के प्रमुख शहरों के लिए भी सीधी निजी बसों का संचालन होता है। क्योंकि पंजाब से बड़ी संख्या में श्रद्धालु नानकमत्ता पहुंचते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( TANAKPUR, BANBASA, KHATIMA, NANAKMATTA, NANAK SAGAR DAM ) 

Thursday, March 26, 2020

सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, ब्रह्मदेव नेपाल



दुनिया के तमाम देश कोरोना जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं। ऐसे वक्त में घर में रहें। यात्राएं हरगिज न करें। यात्रा साहित्य पढें। नई किताबें पढ़ें। दानापानी ब्लॉग पर लगातार अपलोड हो रही यात्राएं पहले की गई हैं।

टनकपुर से सुबह साढ़े पांच बजे स्नान करके मैं नेपाल के ब्रह्मदेव के लिए निकल पड़ा हूं। शिवाला चौक से आगे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शाखा वाली सड़क पर आगे बढ़ता हुआ मैं शारदा नदी के तट पर पहुंच गया हूं। एक बैटरी रिक्शा वाले से बात हुई। उसने 20 रुपये में शारदा बैराज तक पहुंचाने की बात कही, और मैं उसके के रिक्शा में बैठ गया। बाजार से बैराज की दूरी कोई दो किलोमीटर है। यह रास्ते नदी के तट से होकर जाता है। रास्ते में काफी लोग सुबह की सैर करते हुए दिखाई दिए। मैं भी सैर करता हुआ आ सकता है।

किराये पर बाइक - बैराज के पास कुछ चाय नास्ते की दुकाने हैं। सुबह सुबह ये दुकाने खुल चुकी हैं। वहां पर कई बैटरी रिक्शा वाले भी पहुंच चुके हैं। यहां पर कुछ बाइक वाले हैं जो ब्रह्मदेव तक जाने के लिए आपको बाइक किराये पर देते हैं। किराया है 125 रुपये। पर मैंने आगे का सफर पैदल करने का तय किया।  

शारदा नदी पर एनएचपीसी द्वारा बनवाए गए बैराज को मैं पैदल ही पार करने लगा। बैराज से पानी तेज गति से नीचे गिर रहा। शारदा की जलधारा की तेज आवाज वातावरण में लगातार समाहित हो रही है। इस ध्वनि के बीच मैं पैदल पैदल भारत से नेपाल की ओर बढ़ रहा हूं। नदी का पुल पार करने के बाद सीमा पर चौकी है जहां एसएसबी के जवान तैनात हैं। उन्होने मुझसे पूछा कहां जा रहे हो। मैंने बताया बाबा के दर्शन करने। 


यहां से तकरीबन डेढ़ किलोमीटर नदी के तट पर बने सड़क पर चलने के बाद दाहिनी तरफ नीचे उतरने का रास्ता है। सड़क के दोनों तरफ कुछ खाने पीने की दुकाने हैं। हम ब्रह्मदेव पहुंच गए हैं।

सिद्धेश्वर महादेव के दर्शन बिना अधूरी है पूर्णागिरी की पूजा

सिद्धेश्वर महादेव का मंदिर नेपाल के कंचनपुर जिले में ब्रह्मदेव नामक ग्राम में स्थित है। पर यह गांव शारदा नदी के किनारे भारत की सीमा पर है। माता पूर्णागिरी के दर्शन करने के बाद अक्सर श्रद्धालु नेपाल के ब्रह्मदेव में सिद्धेश्वर महादेव के दर्शन करने जरूर जाते हैं। लोग मानते हैं कि बिना सिद्धेश्वर महादेव के दर्शन किए माता पूर्णागिरी की यात्रा अधूरी है। टनकपुर शहर से नेपाल के ब्रह्मदेव की दूरी सिर्फ 4 किलोमीटर है।


मंदिर का विशाल परिसर अत्यंत हरा भरा है। इस हरित परिसर के बीचों बीच सिद्धेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर में शिवलिंगम के साथ सिद्धेश्वर महादेव की आवक्ष मूर्ति स्थापित की गई है। मंदिर के चारों तरफ लोग पीले रंग का वस्त्र के टुकड़ा बांधते हैं। सिद्धेश्वर महादेव का यह मंदिर कई सौ साल पुराना बताया जाता है।



मंदिर परिसर में एक विशाल यज्ञ शाला भी बनी हुई है। मंदिर के पीछे अखंड धूना भी जलता रहता है। इस मंदिर में हर रोज न सिर्फ नेपाल से बल्कि बड़ी संख्या में भारत के राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क शौचालय का भी निर्माण कराया गया है। मंदिर का स्वच्छ वातावरण यहां आने वाले लोगों का मनमोह लेता है। परिसर में पक्षी कलरव करते नजर आते हैं। यहां के पुजारी श्रद्धालुओं को किसी तरह के पूजा पाठ संस्कार के लिए दबाव नहीं बनाते हैं।

ब्रह्मदेव में मंदिर परिसर के आसपास छोटे से बाजार में 30 से ज्यादा खाने पीने के होटल हैं। ये सभी होटल शाकाहारी हैं। यहां पर पराठे, रोटी सब्जी और चावल दाल की थाली मिल जाती है। यहां पर कपड़े, रेडीमेड वस्त्र, कंबल, कास्मेटिक्स आदि की कुछ दुकाने भी हैं।

ब्रह्मदेव से नेपाल के प्रमुख शहर महेंद्र नगर की दूरी 15 किलोमीटर है। यहां महेंद्र नगर जाने के लिए आटो रिक्शा मिल जाता है। वे साठ रुपये किराया मांगते हैं।

मैं सिद्धेश्वर महादेव के दर्शन के बाद कुछ दुकानों में गया। वहां कपड़ों और कास्मेटिक्स के बारे में जानकारी ली। उसके बाद एक भोजनालय में सुबह के नास्ते के लिए बैठ गया। दो आलू पराठा, सब्जी और दाल के साथ 60 रुपये में। खाने के बाद वापसी की राह पकड़ ली है। इस बार एक बाइक वाले मिल गए। उन्होने 20 रुपये में शारदा बैराज के भारतीय किनारे तक छोड़ दिया। यहां रोज काफी लोग बाइक से लोगों को लाने और छोड़ने का कारोबार करते हैं। छोटी सी विदेश यात्रा के बाद एक बार फिर में टनकपुर की जमीन पर हूं।



-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
( NEPAL, BRAHAMDEV, SIDHESHWAR TEMPLE, BIKE RIDE, SHARDA RIVER ) 




Tuesday, March 24, 2020

टनकपुर में शारदा नदी का विस्तार – बैराज और बिजली


माता पूर्णागिरी मंदिर के रास्ते में जितनी भी दुकानें बनी हैं सभी वन विभाग की जमीन पर अवैध तरीके से ही बनी हैं। किसी के पास यहां जमीन का मालिकाना हक नहीं है। पर रास्ते में पक्के घर, बिजली कनेक्शन, डिश टीवी पहुंच गया। चाय नास्ते और भोजन की दुकानें खुल चुकी हैं। श्रद्धालुओं को इनसे सुविधा होती है और स्थानीय लोगों का कारोबार चल रहा है। पर ये सब कुछ अधिकृत नहीं है। मंदिर के आसपास की चट्टाने कोमल हैं। उनके खिसकने का खतरा भी बना रहता है।

भारत नेपाल की सीमा - मंदिर के आसपास की ऊंचाई से शारदा नदी का व्यापक विस्तार नजर आता है। नदी में सालों भर पानी रहता है। शारदा नदी को काली, महाकाली या काली गंगा के नाम से भी जाना जाता है। ये नदी नेपाल से निकलती है। यह टनकपुर के पास भारत में प्रवेश करती है। लंबी यात्रा करते हुए सरयू (घाघरा) नदी में जाकर मिल जाती है। नेपाल में से महाकाली नदी के नाम से जाना जाता है।

माता पूर्णागिरी के दर्शन के बाद मैं वापस शहर जाने के लिए तैयार हूं। पर कोई जीप वापस जाने वाली नहीं है क्योंकि उनके पास सवारियां नहीं है। थोड़ी देर इंतजार के बाद एक निजी कार वाले जाने लगे। उन्होने मुझे अपनी गाड़ी में जगह दे दी। वे टनकपुर बाजार के ही रहने वाले हैं। शहर आने पर उन्होंने मुझसे कोई किराया लेने से भी इनकार कर दिया।

अब में रात्रि विश्राम के लिए कोई होटल या धर्मशाला तलाश में निकल पड़ा। लोगों ने पंचमुखी मंदिर धर्मशाला जाने की सलाह दी। पर मुझे उससे पहले सुमंगल धर्मशाला में अच्छा कमरा मिल गया। इसका किराया 250 रुपये है, अटैच लैट-बाथ के साथ वाला कमरा। बड़ा और हवादार भी है। तो मैंने यहीं डेरा जमा लिया। उसके बाद रात्रि भोजन के लिए निकला। राजाराम चौराहा पर अग्रवाल शाकाहारी भोजनालय (मेरठ वाले) के यहां दाल रोटी खाने के बाद वापस आकर सो गया।

सुबह सुबह टनकपुर की सड़क पर फिर से निकल पड़ा हूं। थोड़ी दूर चलने पर शारदा नदी के तट पर पहुंच गया हूं। यहां सुंदर घाट बना हुआ है। पर शारदा नदी तेज जलधारा देखकर इसमें स्नान करने का साहस नहीं हुआ। यहां नदी की चौड़ाई एक किलोमीटर से भी ज्यादा नजर आ रही है। घाट पर जल पुलिस चौकी भी बनी हुई है।

टनकपुर में बैराज और नहर - टनकपुर में शारदा नदी पर बैराज बना है। इस बैराज के साथ पुल भी है। शारदा बैराज कुल 26 दरवाजे बने हैं। इसकी चौड़ाई तकरीबन आधा किलोमीटर है। टनकपुर और बनबसा में इस नदी पर एनएचपीसी का हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट भी है। बनबसा पावर प्रोजेक्ट से 120 मेगावाट बिजली पैदा की जाती है। बनबसा में 40 मेगावाट की तीन इकाइयां लगाई गई हैं। इस परियोजना की शुरुआत 1993 में हुई थी। टनकपुर में शारदा नदी पर बैराज बनाकर सिंचाई के लिए नहर निकाली गई है। इससे बड़ा इलाके की सिंचाई हो पाती है।

पंचेश्वर परियोजना प्रस्तावित - वैसे शारदा नदी पर कई और विद्युत परियोजनाएं निर्माणधीन है। शारदा नदी इस क्षेत्र में भारत और नेपाल की सीमा बनाती है। टनकपुर और बनबसा के उस पार नेपाल है। बनबसा के उस पार नेपाल का महेंद्रनगर शहर है। शारदा नदी पंचेश्वर परियोजना प्रस्तावित है। पर भारत नेपाल के बीच इस परियोजना को लेकर करार नहीं हो सका है। इसलिए ये परियोजना लटकी हुई है। भारत में शारदा नदी उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में दुधवा नेशनल पार्क से होकर गुजरती है। यहां पर भी शारदा नदी पर एक बैराज का निर्माण किया गया है। शारदा नदी यूपी- उत्तराखंड के बड़े हिस्से के लिए वरदान है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SHARDA RIVER, TANAKPUR, DAM, BORDER, MAHENDRANAGAR, NEPAL ) 


Sunday, March 22, 2020

हिमालय की वादियों में विराजती हैं मां पूर्णागिरी


मां पूर्णागिरि मन्दिर भारत के उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित है। चंपावत जिले की तहसील टनकपुर के पास अन्नपूर्णा शिखर पर 5500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह 108 सिद्ध पीठों में से एक माना जाता है। यह स्थान महाकाली की पीठ माना जाता है। कहा जाता है कि यहां पर माता दक्ष गिरा था। माता का मंदिर अत्यंत छोटा सा है। आसपास हिमालय की नाजुक पहाड़ी चट्टाने हैं। इसलिए श्रद्धालुओं को यहां देर तक रुकने और भीड़ भाड़ बढ़ाने की  इजाजत नहीं है।
तीन किलोमीटर की पदयात्रा -  मंदिर के आधार तल जहां वाहनों के लिए पार्किंग का इंतजाम है, वहां से श्रद्धालुओं को तीन किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करना पड़ता है। इस रास्ते में काफी सीढ़ियां भी चढ़नी पड़ती है। कहीं कहीं पर रास्ता सपाट भी है। पर मंदिर जाने के लिए किसी चेयर लिफ्ट, पालकी आदि का इंतजाम नहीं है। सिर्फ पैदल चलने में सक्षम लोग ही मंदिर तक पहुंच सकते हैं। अक्सर श्रद्धालु स्नान करने के बाद प्रसाद लेकर पदयात्रा की शुरुआत करते हैं। पार्किंग से लेकर अगले दो किलोमीटर तक मंदिर के पैदल यात्रा मार्ग में दोनों तरफ दुकाने, खाने पीने के रेस्टोरेंट और रहने के लिए छोटी छोटी धर्मशालाएं बनी हैं। इनमें से आप कहीं भी दिन या रात्रि में विश्राम कर सकते हैं।

भैरव मंदिर और झूठे का मंदिर - पदयात्रा की शुरुआत करते ही सबसे पहले भैरव मंदिर आता है। काफी श्रद्धालु भैरव मंदिर में पूजा अर्चना करने के बाद आगे की यात्रा शुरू करते हैं। अब रास्ते में जगह जगह बारिश से बचने के ले शेड भी बनाए गए हैं। पर अच्छा होगा कि आप छाता, टार्च, रेनकोट आदि लेकर माता के दरबार तक पदयात्रा करें। 

पूरे रास्ते दुकानकार आपको प्रसाद लेने के लिए या खाने पीने के लिए पूछते नजर आएंगे। तकरीबन एक किलोमीटर चलने के बाद एक मंदिर आता है उसका नाम है झूठे का मंदिर। कहा जाता है कि एक श्रद्धालु ने माता का मंदिर यहां निर्मित कराया पर उसने सोने की जगह नकली सुनहले रंगों का इस्तेमाल किया। लोग इस मंदिर के प्रति आस्था रखते हैं। पर यह झूठे के मंदिर के नाम से ही जाना जाता है।

तकरीबन दो किलोमीटर चलने के बाद रास्ते में मां काली का मंदिर आता है। वापसी में काफी श्रद्धालु इस मंदिर में भी आस्था से पूजन करते हैं। तकरीबन तीन किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलते हुए आप माता पूर्णागिरी के दरबार में पहुंच जाते हैं। माता का मंदिर आकार में बहुत बड़ा नहीं है। यह मंदिर जितनी ऊंचाई पर है वहां पर मंदिर को विस्तारित रूप प्रदान करने की कोई जगह भी नहीं है। श्रद्धालु माता के दर्शन करने के बाद शीघ्र वापस लौटने लगते हैं। यहां श्रद्धालुओं को ज्यादा देर रुकने की इजाजत नहीं दी जाती, क्योंकि पहाड़ की चोटी पर भीड़ बढ़ने पर सबको परेशानी हो सकती है।

माता पूर्णागिरी का मेला-  होली के बाद आने वाली नवरात्रि से माता पूर्णागिरी का मेला शुरू हो जाता है। यह मेला अगले तीन महीने तक चलता है। यानी अप्रैल, मई और जून महीने में। तब माता पूर्णागिरी के दरबार में श्रद्धालओं की भीड़ उमड़ती है।

कैसे पहुंचे – चंपावत जिले के टनकपुर शहर से पूर्णागिरी मंदिर तक के लिए जीप का एक आदमी का किराया एक तरफ का किराया 50 रुपये है। आप टनकपुर में रुक कर मंदिर की ओर प्रस्थान कर सकते हैं। टनकपुर शहर से पूर्णागिरी मंदिर के आधार तल की दूरी 21 किलोमीटर है। इस रास्ते को तय करने के लिए टनकपुर शहर से जीप मिलती है।

माता पूर्णागिरी के मंदिर के रास्ते में चलते हुए प्रकृति का मनोरम नजारा दिखाई देता है। सामने बादल नजर आते हैं, तो नजरें नीचे झुकाने शारदा नदी बड़े ही वेग से बहती हुई नजर आती है। मंदिर बिल्कुल भारत नेपाल की सीमा पर है। मंदिर के आसपास भारत की मोबाइल कंपनियों का नेटवर्क कम पर नेपाल का नेटवर्क आसानी से पकड़ लेता है।

मैं जब माता पूर्णागिरी के दरबार में जाने के लिए चल पड़ा हूं तो पूरे रास्ते आते जाते अकेला यात्री हूं। बारिश के कारण आज कम श्रद्धालु पहुंचे हैं। मंदिर के बीच रास्ते में टुन्नास में पांडे जी मिल गए। वे हमारे साथ जीप में आए थे। उनका यहां पर धर्मशाला, होटल और प्रसाद की दुकान हैं। वे मुझे रोक लेते हैं। मैं उनके यहां एक कप चाय पीकर आगे बढ़ता हूं। वापसी में उनके होटल में दाल चावल खाया। पांडे जी के पास रहने के लिए कमरे का भी इंतजाम है। वे फिर आने का आमंत्रण देते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
( MATA PURNAGIRI TEMPLE, TANAKPUR, UTTRAKHAND) 


Friday, March 20, 2020

टनकपुर से माता पूर्णागिरी के दरबार में


टनकपुर बाजार से मां पूर्णागिरी के दरबार में जाने के लिए शेयरिंग जीप की सेवा मिल जाती है। ये जीप वैसे तो आपको बस स्टैंड के आसपास से मिल सकती है। पर जब यात्री कम होते हैं तो ऐसी जीप शिवाला चौक से चलती हैं। मैं लोगों से रास्ता पूछता हुआ राजाराम चौक से आगे बढ़कर शिवाला चौक पहुंच गया हूं। एक जीप वाले ने कहा कि वह पूर्णागिरी की सवारियां बिठा रहा है। मैं एक सीट पर कब्जा कर लेता हूं।

चालक महोदय ने कहा कि बाकी की सवरियां आसपास से आ रही हैं। तब तक आप चाय नास्ता कर लें। मैं सामने एक मिठाई की दुकान पर पहुंचा। समोसा 5 रुपये का एक। दो समोसे खाए। उसके बाद कलाकंद जो आज का ताजा बना हुआ था। तो 20 रुपये का कलाकंद भी खा लिया। वापस जीप के पास पहुंचा। सारी सवारियां भर लेने के बाद हमारे जीप वाले मुझे और एक दूसरी सवारी को कहा कि आप पीछे वाली जीप में चले जाएं क्योंकि हमारे पास एक समूह की सवारियां हो गईं हैं। इन्हें अलग नहीं कर सकता। खैर हमें पिछली जीप में जाना पड़ा। थोड़ी देर में भरने के बाद ये जीप चल पड़ी। शहर सेबाहर निकलने से पहले जीप ने शहर का एक चक्कर लगाया। एक सहयात्री को सोम रस लेना था।

बारिश के साथ सफर - शहर से बाहर निकलने के बाद लंढौरा वन क्षेत्र का चेकपोस्ट आया। यहां से जीप दाहिनी तरफ मुड़ गई। आगे बूम आश्रम आया। यह भी पूर्णागिरी का के मार्ग का एक दर्शनीय स्थल है। पर हम यहां पर नहीं रुक सके। थोड़ी दूर आगे पहाड़ से गिरते तीन जलस्रोत मिले। इनका पानी सड़क के ऊपर से बह रहा था। बहाव तेज था। मेरे साथ बैठी महिलाओं ने बताया कि पहाड़ पर तेज बारिश होने पर इन टपरों में पानी और बढ़ जाता है फिर रास्ता कुछ घंटों के लिए बंद हो जाता है। बारिश रुकने पर ही रास्ता खुलता है।

पत्थर गिरने पर रास्ता बंद हो जाता है - दो दिन पहले 18 अगस्त को भी पूर्णागिरी के मार्ग में पत्थर गिरने के कारण रास्ता बंद हो गया था। आगे हमें सड़क पर क्रेन दिखाई दी। वह अभी भी पत्थर हटाकर रास्ता साफ करने में लगी हुई थी। तब समझ में आया कि माता पूर्णागिरी के लिए आने वाले श्रद्धालु बारिश के दिनों में कम क्यों हो जाते हैं।

ये पहाड़ों से गिर रहे पानी के स्रोत आगे जाकर शारदा नदी में समाहित हो जाते हैं। हमारी जीप तेजी से अब पहाड़ के घुमावदार रास्ते पर चढ़ाई करने लगी है। ऊंचाई बढ़ती जा रही है। रास्ता मनोरम होता जा रहा है। इस मनोरम रास्ते में कुछ गांव भी हैं। इस बीच बारिश तेज हो गई है। हमारे ड्राईवर ने गाड़ी रोककर छत पर रखे सभी यात्रियों के बैग को उतारकर नीचे रखा। हमलोग अब ठूलीगाड़ चेकपोस्ट पर पहुंच गए हैं। यहां पर पुलिस थाना भी है। आगे एक बैरियर लगा है। हमारे ड्राईवर गाड़ी रोककर बैरियर हटाते हैं फिर आगे के लिए चल पड़ते हैं। 

दरअसल माता पूर्णागिरी की ओर शाम 6 बजे के बाद वाहनों के जाने पर रोक है। तब ठूलीगाड़ से आगे का रास्ता बंद कर दिया जाता है। यहां से पूर्णागिरी मंदिर के आधार तल यानी भैरव मंदिर की दूरी लगभग छह किलोमीटर है। थोड़ी देर में हम अपनी मंजिल पर पहुंच गए हैं। हमारी जीप में जितनी भी सवारियां बैठी हैं सभी स्थानीय लोग हैं सिर्फ एक मैं ही दर्शनार्थी हूं। पार्किंग से पहले से पूर्णागिरी मंदिर से जुड़ी दुकाने शुरू हो जाती हैं। पर इन दुकानो का नाम धर्मशाला है। इन सभी दुकानों में शौचालय, स्नानघर और सोने के लिए बिस्तर का इंतजाम है। इन सेवाओं का दुकानदार कोई शुल्क नहीं लेते। पर आपको इन दुकानदार से माता का प्रसाद लेना जरूरी होता है। इस प्रसाद की कीमत 101, 151 रुपये या उससे ज्यादा हो सकती है।

स्नान कर थकान मिटाई - मैं पार्किंग के पास स्थित एक दुकान पर अपना बैग रख देता हूं। इसके बाद उनके स्नानघर में जाकर घूब जमकर स्नान करता हूं। बारिश से लेकर जनवरी महीने तक यहां सभी दुकानों में पानी पहाड़ों से आता है। इस पानी को पाइप के सहारे जमा किया जाता है। हिमालय से आने वाले प्राकृतिक जल स्रोतों के पानी में जमकर स्नान के बाद मैंने अपनी थकान मिटा ली है। अब यहां से मां पूर्णागिरी के दरबार तक जाने के लिए तीन किलोमीटर की पदयात्रा करनी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( PURNAGIRI, TEMPLE, UTTRAKHAND )