Thursday, January 23, 2020

अंदमान में जल क्रीड़ा और राजीव गांधी वाटर स्पोर्ट्स कांप्लेक्स

आप अंदमान में हैं और टाइम पास करना है तो सबसे अच्छी जगह है राजीव गांधी वाटर एंड स्पोर्ट्स कांप्लेक्स। यहां पर कई तरह की जल क्रीड़ा का आनंद ले सकते हैं। यह पोर्ट ब्लेयर का केंद्रीय स्थल है। चाहे आप शहर के किसी कोने से आए यहां पर बैठकर आप अपना टाइम पास कर सकते हैं। इसके आसपास मनोरंजन के कई साधन और खाने-पीने के विकल्प मौजूद हैं। इसके पास ही अंदमान का सरकारी कॉलेज जवाहरलाल नेहरु कॉलेज स्थित है। पास में रामकृष्ण आश्रम भी है।

पोर्ट ब्लेयर की आखिरी सुबह- खट्टे मीठे आम का स्वाद 

पोर्ट ब्लेयर शहर में हमारा आज आखिरी दिन है। सुबह साढ़े दस बजे यहां से उड़ान है। पर आखिरी दिन भी घूमने से कोताही कैसी। तो मैं सुबह पांच बजे ही होटल से बाहर आकर सुबह की सैर करने निकल पड़ा है। ब्लेयर होटल से बाहर निकलने पर चौराहे पर आकर मैं डेलानीपुर जाने वाली सड़क पर पैदल पैदल चल पड़ा हूं। ये एक सुहानी सुबह है। इस सड़क पर भी कई आवासीय होटल बने हुए हैं। इस सड़क का नाम मौलाना आजाद रोड है। संक्षेप में इसे एम ए रोड कहते हैं। इस संक्षिप्तिकरण से नई पीढ़ी को असली नाम का पता ही नहीं चलता। ये बड़ी गलत बात है।

मुझे सामने मसजिद नूर दिखाई दे रही है। पोर्ट ब्लेयर शहर की प्रमुख मस्जिद। इस इलाके का नाम क्वैरी हिल भी है। इसके आगे रिट्ज होटल दिखाई दिया। इसमें चूल्हा चौका नामक रेस्टोरेंट है। इसके आगे केरला समाजम का भवन और विशाल मैदान दिखाई देता है। यह मलयाली भाइयों को सामाजिक भवन है। हमारे होटल के सामने आंध्रा के लोगों को भवन है। इस मौलाना आजाद रोड पर होटलों के अलावा आटो मार्केट भी है।

थोड़ा आगे चलने पर एक आम के पेड़ से मुलाकात हो गई। उस पेड़ से अधपके आम टूट कर गिर रहे थे। मैंने कुछ छोटे छोटे आम उठाए। उनमें से एक आम को चखकर देखा। आम मीठा है। बचपन याद आ गया जब हम ढेला मार कर आम तोड़ा करते थे। जिसका निसाना अचूक होता वह आम तोड़ने में विजय प्राप्त कर लेता। जो मजा उस आम को खाने में था, वह बाजार से खरीदकर पके हुए आम खाने में कहां हैं। उस आम के साथ के जीत का स्वाद होता था। वह निशानेबाजी का प्रतिफल होता था।

और चलते चलते हम डिलानीपुर पहुंच गए हैं। चौराहे से पहले राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय का बोर्ड दिखाई देता है। यहां मनीषा रिजेंसी नामक एक होटल दिखाई देता है। अंदमान में सैलानियों की जरूरत के मुताबिक हर बजट के होटल बन चुके हैं। आप 400 से लेकर 5000 रुपये प्रतिदिन के होटल में यहां ठहर सकते हैं। जैसा दाम वैसी सुविधाएं। तो मैं दो किलोमीटर से ज्यादा पैदल चल चुका हूं। तो अब लौटना चाहिए। तो इसी रास्ते पर लौट चला हूं। घड़ी की सूई भी आगे बढ़ती जा रही है।

होटल के करीब पहुंच कर एक चाय की दुकान से माधवी और वंश के लिए चाय पैक करा लिया। उन्हें बेड टी मिल जाएगा तो वे लोग जल्दी तैयार हो जाएंगे। मैंने तो दूध वाली चाय पीनी काफी कम कर दी है। नींबू चाय या ग्रीन टी पी लेता हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( WALKING ON PORT BLAIR ROADS )

Tuesday, January 21, 2020

हैवलॉक जैसा ही सुंदर है नील द्वीप


अंदमान आने वाले सैलानी हैवलॉक द्वीप जरूर जाना चाहते हैं। यह बड़ा ही सुंदर द्वीप है। पर जैसा हैवलॉक सुंदर है उसी तरह नील द्वीप भी अंदमान के सुंदर दर्शनीय स्थलों में से एक है। मैं अपनी पिछली यात्रा के क्रम में हैवलॉक द्वीप गया था। पर इस बार तारीखें स्पष्ट नहीं होने के कारण हैवलॉक जाने और आने का टिकट नहीं मिल पाया।

हमने सोचा हैवलॉक न सही तो नील द्वीप का दौरा किया जाए। पर ग्रीन ओसन और मैक्रूज की नील द्वीप जाने वाले सेवाओं की समय सारणी मेरी यात्रा से मैच नहीं हो पा रही थी। तो हमने सरकारी फेरी सेवा तलाश करने की सोची। इसके लिए मैं फिनिक्स बे स्थित सरकारी फेरी सेवा के बुकिंग दफ्तर गया। वह कई एकड़ में फैला हुआ विशाल परिसर है। यहां पर भारत भूमि में कोलकाता, चेन्नई, विशाखापत्तनम जाने के लिए जहाज के टिकट भी बुक होते हैं। वहीं अंदमान के अलग अलग द्वीप पर जाने के लिए टिकट भी बुक किए जाते हैं। पर ये सारी बुकिंग ऑनलाइन नहीं की जा सकी है। इसलिए आपको टिकटों के लिए इस दफ्तर में आना ही पड़ता है। हम साल 2019 में चारों तरफ डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं पर यहां पर हम अभी काफी पीछे हैं।


बहुत सारे काउंटर यहां पर टिकट खरीदने के लिए तमाम काउंटर बने हुए हैं। मैं एक काउंटर पर जाकर नील द्वीप के टिकट के लिए बात करता हूं। काउंटर पर मौजूद मोहतरमा ने बताया कि कल का टिकट उपलब्ध नहीं है। हां टिकट की उपलब्धता बताने से पहले उन्होंने पूछा कि आप अंदमान के हो या मेनलैंड के। मेरे बताने पर की मेन लैंड का हूं उन्होंने ना में उत्तर दिया। मतलब स्टीमर की टिकटों में मेनलैंड और अंदमान के लोगों को कोटा निर्धारित है।
अलग अलग दरें – चाहे आपको कोलकाता या चेन्नई जाना हो या किसी अंदमान के ही द्वीप पर मेनलैंड के निवासी और अंदमान के लोगों के लिए टिकट की अलग अलग दरें निर्धारित हैं। इन दरों में तीन गुने का अंतर है। पर सारे लोग पहले सरकारी फेरी सेवा का टिकट पता करते हैं क्योंकि इसकी दरें निजी सेवा से काफी सस्ती है। जैसे नील का टिकट निजी क्रूज में 1200 है तो सरकारी फेरी में 500 के आसपास वहीं अंदमान वासियों के लिए तो यह 80 रुपये के आसपास ही है।  

नहीं मिल नील का टिकट – खैर हमें नील द्वीप का टिकट नहीं मिला। एक स्थानीय अंदमानी भाई से मुलाकात हुई। उन्होंने सलाह दी कि कल सुबह आठ बजे आप फेरी के समय पर यहां पहुंचिए, अगर कई अंदमान के लोग नहीं आएंगे तो आपको जहाज में जगह मिल जाएगी। पर मेरे साथ तीन लोग हैं।अगर जाने की जगह मिल गई और अगले दिन वापसी की नहीं मिली तो मेरी परेशानी बढ़ जाएगी। इसलिए ये सलाह व्यहारिक नहीं लगी। तो मैं वापस लौट आया। नील द्वीप की सैर फिर कभी सही।
नील द्वीप का नाम बदलकर अब शहीद द्वीप कर दिया गया है। यह पोर्ट ब्लेयर से 36 किलोमीटर उत्तर पूर्व दिशा में स्थित है। यह दक्षिण अंदमान में ही आता है। नील द्वीप पर हैवलॉक (स्वराज द्वीप ) की तरह की रहने के लिए कई होटल उपलब्ध हैं। यह बड़ा ही शांत द्वीप है। इसका सौंदर्य दुनिया भर के सैलानियों को लुभाता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( ANDAMAN , SHAHEED ISLAND )




Sunday, January 19, 2020

एक बार फिर बारिश के बीच माउंट हेरिएट की ओर


डिगलीपुर से लौटने के बाद हमारे पास एक दिन का वक्त था। हालांकि मैं माउंटर हेरियेट अपनी पिछली यात्रा में घूम चुका था, पर मैंने तय किया कि माधवी और अनादि को माउंट हेरियेट जरूर दिखा दिया जाए। सच तो ये है कि इस निराले पर्वत का आकर्षण मुझे भी एक बार फिर बुला रहा था। दूसरा बात की पोर्ट ब्लेयर से यहां पहुंचना काफी आसान है।

तो हमने एक बार फिर सार्वजनिक परिवहन साधनों का इस्तेमाल किया। हमलोग अबरडीन बाजार से आटो रिक्शा बुक करके चाथम जेट्टी पहुंच गए। हालांकि यहां स्थानीय बसों से और भी सस्ते में पहुंचा जा सकता था पर उसमें समय थोड़ा ज्यादा लगता। बस में तीन लोगों के 30 रुपये लगते पर आटो रिक्शा वाले ने 60 रुपये लिए। वह हमें शार्ट कट रास्ते यानी समंदर के किनारे बनी सड़क जो फिनिक्स बे से होकर जाती है उधर से लेकर गया। पर चाथम जेट्टि तक पहुंचते हुए हमें हल्की बारिश ने घेर लिया। 

हमलोग जल्दी से बंबू फ्लैट द्वीप की ओर जा रहे स्टीमर में सवार हो गए। जल्दीबाजी ऐसी की हम टिकट लेना ही भूल गए। खैर रास्ते में चेकिंग नहीं हुई। आधे घंटे में हमलोग बंबू फ्लैट में थे। यहां भी बारिश जारी है। इसी बारिश में सामने एक छोटे से रेस्टोरेंट में हमलोग सुबह के नास्ते के लिए बैठ गए। नास्ते में मिला इडली सांभर और चाय। नास्ते के दौरान ही हमारी एक जीप वाले से बात हुई। वह 450 रुपये में हमें माउंट हेरियेट ले जाने को तैयार हो गया। इसमें इंतजार करना और वापस छोड़ना भी शामिल है।

पिछली बार हमें जिस जीप वाले ने माउंट हेरियेट की सैर कराई थी, हमने पहले उन्ही बशीर भाई को ढूंढने की कोशिश की। उनका मोबाइल नंबर नहीं लगा। साथी जीप वालों ने बताया कि आज वे अपनी जीप की मरम्मत करा रहे हैं। खैर नए जीप वाले भी काफी अच्छे थे। थोड़ी देर में हमलो पहाड़ी पर चढ़ते हुए माउंट हेरियेट पहुंच चुके हैं। पहाड़ी रास्तों में बारिश के बाद ठंड और बढ़ गई है। पर इस ठंड और बारिश के बीच माउंट हेरिय़ेट का हरियाला मौसम और रुमानी हो गया है। अनादि और माधवी को को इस हरियाली और हल्की बारिश के बीच खूब मजा आ रहा है। तो हमलोगों ने इस मौसम के बीच माउंट हेरियेट की पहाड़ी पर आबोहवा का खूब लुत्फ उठाया।
 यहां पर कुछ व्यू प्वाइंट और शेड का निर्माण कराया गया है,जहां से आप चारों तरफ का नजारा देख सकते हैं। प्रकृति के रंग को काफी करीब से महसूस कर सकते हैं। अगर यहां ठहरना चाहें तो प्रशासन की तरफ से गेस्ट हाउस का भी इंतजाम किया गया है। कुछ लोग माउंट हेरियेट काला पत्थर तक ट्रैक करने भी जाते हैं। अगर थोड़ा समय लेकर चले हैं तो इस ट्रैकिंग का भी मजाल जरूर लिजिए।

बस यहां आने पर देर तक रुकना हो तो अपने साथ खाने पीने की कुछ चीजें भी अपने साथ लेकर आएं तो अच्छा रहेगा। क्योंकि यहां जंगल में कुछ नहीं मिलता है। तो और कितनी देर गुजारेंगे इस हरियाली में चलिए ना अब वापस भी चलना है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        (MOUNT HERIET AGAIN, GREEN FOREST )


Saturday, January 18, 2020

कार्बाइन कोव की रुमानी शाम और चना जोर गरम


विज्ञान केंद्र से हमलोग कारबाइन कोव की तरफ चल पड़े हैं। समंदर के साथ बनी सड़क का सफर बड़ा ही मनोरम है। थोड़ी देर में हमलोग कारबाइन कोव तट पर पहुंच गए हैं। पोर्ट ब्लेयर शाम गुजारने के लिए यह बेहतरीन जगह है। यहां पर दूसरी बार पहुंचा हूं। पर पिछली बार अकेला था। पर इस बार इस द्वीप पर कुछ बदलाव हो चुका है। यहां पर स्पीड बोट भी चलने लगी है। मतलब समंदर में अटखेलियां करनी हो तो स्पीड बोट पर सवार हो जाइए। वरना इस तट पर उछल कूद मचाएं। मजे लें। यहां हर उम्र के लोग मिल जाएंगे। बच्चे, बूढ़े और जवान। समुद्र तट पर कुछ रेस्टोरेंट हैं। स्ट्रीट फूड की कई दुकाने हैं। शॉपिंग के लिए छोटी छोटी दुकाने सजी हैं। हां नारियल पानी तो होगा ही।

पीछे नारियल के हरे भरे पेड़, उसके बाद बालुका राशि की चौड़ी पट्टी और उसके आगे आती जाती समंदर की लहरें। ये सब कुछ मिलकर कारबाइन कोव के माहौल को रुमानी बनाती हैं। यहां जब शाम को धीरे धीरे सूरज समंदर के आगोश में समाने लगता है तो यह नजारा बड़ा ही सुंदर लगता है। ऐसा लगता है जैसे समंदर सूरज को निगलता जा रहा हो।
कारबाइन कोव समुद्र तट पर 1986 में एक स्तंभ का निर्माण कराया गया है। हालांकि यह स्तंभ है लेकिन इसका नाम रखा गया है कारबाइन कोव समुद्री दीवार।

बंगाली बाबू का चना जोर गरम - तो बहुत हो गया घूमना फिर अब कुछ खाना पीना हो जाए। कारबाइन कोव तट पर मिल गए हैं चना जोर गरम वाले। ये बंगाली बाबू हैं नाम है शिवदास। हमने उनसे 40 रुपये का चना जोर गरम बनवाया। फरही, चना, नमक, प्याज, मिर्च, खीरा, टमाटर, मूली, मसाले, सेव दालमोट, सरसों तेल आदि मिलाकर उन्होंने बड़ा ही सुस्वादु चना जोर गरम बनाया। अनादि को भी इनका चना जोर गरम खूब पसंद आया। 
यह एक सेहतमंद खाद्य पदार्थ है जिसे आप कहीं भी खा सकते हैं। हमने गंगटोक जाने के रास्ते में भी खाया था चना जोर गरम। वैसे तो आपने चना जोर गरम जगह जगह खाए होंगे, पर हर जगह का स्वाद भी अलग अलग होता है। पर ये चना जोर गरम बंगाल में खूब प्रसिद्ध है। तो शिवदास भी बंगाली मानुस हैं। पर वे पिछले दो दशक से पोर्ट ब्लेयर में ही हैं। जब यहां आए तो पहले कई जगह मजदूरी का काम किया। पर इन कामों में मन नहीं रमा। बाद में उन्होंने अपना स्टार्ट अप शुरू किया। मतलब चना जोर गरम बेचने का काम। 

धीरे-धीरे ये काम चल पड़ा। अब वे इस काम में रम गए हैं। पोर्ट ब्लेयर आने वाले सैलानी और स्थानीय लोग भी चना जोर गरम खाते हैं। बताते हैं इसमें जीने खाने पर कमाई हो जाती है। पोर्ट ब्लेयर के बाहरी इलाके में किराये पर रहने के लिए कमरा ले लिया है। बंगाल की तुलना में यहां पर रहने में उन्हें ज्यादा आनंद आता है। पर उनका बंगाल से मोह कम नहीं हुआ है। वे साल में एक बार अपने घर चले जाते हैं। हालांकि आना जाना महंगा है। वे पानी के जहाज से जाते हैं। बंक क्लास में बैठ कर। तो चना जोर गरम वाले भाई की मेहनत को सलाम। आगे चलते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( PORT BLAIR, CHANA JOR GARAM, CARBYNS COVE )





Thursday, January 16, 2020

पोर्ट ब्लेयर का विज्ञान केंद्र – ज्ञान की अनूठी दुनिया


पोर्ट ब्लेयर में राजीव गांधी वाटर स्पोर्ट्स कांप्लेक्स से कारबाइन कोव जाते समय रास्ते में विशाल विज्ञान केंद्र स्थित है। आपके पास समय है तो विज्ञान केंद्र का जरूर भ्रमण करें।
अपने पोर्ट ब्लेयर प्रवास के आखिरी दिन हमलोग आटो आरक्षित करके शाम को कारबाइन कोव की तरफ चले थे। फोर शोर रोड पर चलते हुए हमें विज्ञान केंद्र का विशाल परिसर दिखाई दिया। तो बस हमलोग यहां रुक गए। बेटे अनादि साथ तो विज्ञान केंद्र घूमना बनता है। परिसर के हरित लॉन ने ही हमारा मन मोह लिया। लॉन में कई किस्म के जानवरों के सुंदर चित्र लगे हैं। हरियाली भी खूब है।

 थोड़ी देर इस हरियाली का लुत्फ उठाने के बाद टिकट लेकर हमलोग विज्ञान केंद्र के अंदर पहुंच गए। केंद्र में प्रवेश की टिकट राशि भी मामूली सी है। दस रुपये का टिकट लेकर आप यहां काफी समय गुजार सकते हैं। टिकट की दरें सबके लिए एक जैसी हैं। अंदर फोटोग्राफी के लिए 15 रुपये का टिकट लेना पड़ता है।

विज्ञान भवन के अंदर एक आडिटोरियम भी है। इसके अंदर 30 रुपये के टिकट पर एक शो होता है। इस शो में 15 मिनट की थ्रीडी फिल्म दिखाई जाती है। विज्ञान पर केंद्रित ये फिल्म भी काफी रोचक होती है। इसी तरह की फिल्म के लिए महानगरों में 100 रुपये या उससे ज्यादा का टिकट लेना पड़ता है। तो हमने इस शो का भी मजा लिया।
विज्ञान केंद्र तीन घंटे आपके मनोरंजन और ज्ञान रंजन के लिए खूब सामग्री उपलब्ध कराता है। हां बाजार से दूर होने के कारण यहां हर रोज कम लोग ही पहुंच पाते हैं। विज्ञान केंद्र मैजिक शो, बब्बल शो, स्काई शो जैसे ज्ञान बढ़ाने वाले शो भी छात्रों के लिए उपलब्ध कराता है।
भवन के अंदर अलग अलग तरह के सीसे में आप अपनी रोचक तस्वीरें देख सकते हैं। एक इनफिनीटी रेलगाड़ी भी है। ऐसी रेलगाड़ी जिसका ओर अंत नजर ही नहीं आता। ये सब कुछ जादू नहीं बल्कि विज्ञान का कमाल है।

भौतिकी और रसायन विज्ञान से जुड़े हुए तमाम तरह के खेल हैं यहां पर जिसे बच्चे देखकर खूब मजे लेकर खेलते हैं। इस तरह खेल खेल में उनका ज्ञान भी बढ़ता है।
ये विज्ञान केंद्र अंडमान निकोबार के जलवायु, मिट्टी के बार में भी कई तरह की जानकारियां परोसता है। सब कुछ देखते हुए हमलोग थ्रीडी थियेटर की तरफ बढ़ चले। इस थियेटर की शुरुआत 2018 में हुई है। शो देखने वाले हम कुछ लोग ही हैं।

मुझे लगता है इस तरह के विज्ञान केंद्र देश के तमाम शहरों में बनने चाहिए और स्कूली बच्चों को वहां ले जाया जाना चाहिए। हमने इससे पहले हरियाणा के कुरुक्षेत्र में साइंस पैनोरमा देखा है। वह भी काफी रोचकता लिए हुए है। पटना में गांधी मैदान के पास श्रीकृष्ण विज्ञान केंद्र भी है। कोलकाता में इस तरह की साइंस सिटी भी बनी है। देश में मंदिर मसजिद से ज्यादा जरूरत इस तरह के केंद्रों की है जो आने वाली पीढ़ी को संवार सकें।
शो देखने के बाद हमलोग अगली मंजिल की ओर चल पड़े। हमारे आटो रिक्शा वाले बाहर हमारा बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( PORT BLAIR, SCIENCE CENTRE )






Tuesday, January 14, 2020

पोर्ट ब्लेयर में कन्नड, आंध्रा और रांची वाले

पोर्ट ब्लेयर के गुरुद्वारा लाइन पर आंध्र प्रदेश के लोगों का भवन बना हुआ है। इसमें शाम को कोई शादी समरोह चल रहा है। तेलुगू लोग सज संवर कर पहुंच रहे हैं। इस आंध्रा भवन में बाहर अल्लूरी सीताराम राजू की विशाल प्रतिमा लगी है। कौन थे अल्लूरी सीताराम राजू। वे भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक गुमनाम नायक थे। उनका जन्म 4 जुलाई 1897 को विशाखापत्तनम जिले के पांडिक गांव में हुआ था। उनके पिता अल्लूरी वेंकट रामराजू ने बचपन से ही सीताराम राजू को यह बताकर क्रांतिकारी संस्कार दिए कि अंग्रेजों ने ही हमें गुलाम बनाया है और वे हमारे देश को लूट रहे हैं।

राजू ने 1920 से पहले कई साल तक संन्यासी जीवन जीया। राजू पर 1920 में गांधीजी के विचारों का प्रभाव पड़ा। उन्होंने आदिवासियों को मद्यपान छोड़ने तथा अपने विवाद पंचायतो को हल करने की सलाह दी किन्तु जब एक वर्ष में स्वराज्य का गांधीजी का सपना साकार नही हुआ तो राजू अपने अनुयायी आदिवासियों की सहायता से अंग्रेजो के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह के रास्ते पर उतर गए। आरम्भ में वे पुलिस थानों पर आक्रमण करके वहां से शस्त्र छीनने लगे, जिससे विद्रोह को आगे बढाया जा सके। 1922 से 1924 तक राजू के दल ने तमाम पुलिस थानों पर कब्जा करके हथियार लूटा। सात मई 1924 को अल्लूरी अंग्रेजों की पकड़ में आ गए और शहीद हो गए। अल्लूरी की याद में आंध्र के लोगों ने पोर्ट ब्लेयर में उनकी विशाल प्रतिमा स्थापित की है।

पोर्ट ब्लेयर के गांधी चौक से आगे बढ़ने पर हमें रांची भवन दिखाई देता है। यहां पर बिरसा मुंडा की बड़ी प्रतिमा लगी है। उनकी तीर चलाती हुई प्रतिमा उनकी बहादुरी की याद दिलाती है। अलग अलग समय में झारखंड से आए लोगों ने यहां रांची बस्ती बसा ली। इसके साथ ही झारखंड के महान क्रांतिकारी बिरसा मुंडा को भी याद रखा।

पोर्ट ब्लेयर में तमिल भाइयों की अच्छी संख्या है तो यहां पर के कामराज कामराज की प्रतिमा भी दो जगह दिखाई देती है। यहां पर हर साल कामराज की जयंती भी मनाई जाती है। यहां की सड़कों पर चलते हुए कई और राज्यों के लोगों की भाषायी मौजूदगी दिखाई दे जाती है।


यहां केरल के लोग भी अच्छी संख्या में हैं। उनका अपना केरला समाजम भी है। इसके कई कार्यक्रम होते रहते हैं। डिलानीपुर के रास्ते में उनके समाज का एक बोर्ड दिखाई दे जाता है। नगर में एक जगह डाक्टर आंबेडकर की प्रतिमा लगी है। गांधी चौक पर चौराहे के बीचों बीच गांधी जी की लाठी लेकर चलती हुई सुंदर प्रतिमा लगी है।के पास इंदिरा गांधी की भी एक प्रतिमा एक सरकारी दफ्तर के बाहर लगी है। यानी की हर विचारधारा के लोगों का पूरा सम्मान और पूरी जगह है।    

और मिल गए बुद्ध भी – राजीव गांधी वाटर स्पोर्ट्स कांप्लेक्स से सेल्लुलर जेल की तरफ जाते समय सड़क के किनारे एक जगह गौतम बुद्ध की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। सफेद रंग की यह बुद्ध प्रतिमा शांति का संदेश देती प्रतीत होती है। राजीव गांधी स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में राजीव गांधी की बहुत ही कलात्मक प्रतिमा स्थापित की गई है। यह प्रतिमा तो बिल्कुल समंदर के किनारे ही है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com   ( ALLURI SITARAM RAJU, KAMRAJ, BIRSA MUNDA, BUDDHA ) 






Monday, January 13, 2020

और अंदमान निकोबार में जीत गई कांग्रेस


सत्रहवीं लोकसभा चुनाव के परिणाम 23 मई 2019 को आ गए हैं। इस चुनाव में देश भर में भाजपा 302 सीटों पर जीतकर पूर्ण बहुमत से सत्ता में एक बार फिर वापस लौटी है। पर केंद्र शासित प्रदेश अंदमान निकोबार की एक लोकसभा सीट पर इस बार कांग्रेस उम्मीदवार कुलदीप राय शर्मा ने जीत दर्ज की है। 24 तारीख की सुबह मैं जब अंदमान की बस में बैठा हूं को ड्राईवर और कंडक्टर चर्चा कर रह हैं कि पूरे देश में भाजपा जीत गई है पर अंदमान में कांग्रेस ने कैसे जीत दर्ज कर ली है। 

दरअसल 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव में अंदमान के एकमात्र लोकसभा सीट पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी। पर इस बार जबरदस्त लहर में भी अंदमान में भाजपा चुनाव हार गई। पांच लाख के आसपास आबादी वाला अंदमान एक सांसद चुनकर भेजता है। अंदमान एक केंद्र शासित प्रदेश है। यहां राज्य में दिल्ली या पुड्डुचेरि की तरह विधानसभा नहीं है। पर यहां लोक सांसद चुनते समय उस उत्साह से वोट डालते हैं मानो सरकार चुन रहे हों।

यहां लोक लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। पोर्ट ब्लेयर शहर पर कांग्रेस की जीत के बाद बधाई देने वाले कई पोस्टर जगह जगह लगे हुए हैं। दस साल बाद यहां कांग्रेस का सांसद बना है तो लोग खूब विजय जुलुस निकाल रहे हैं।
मैं 26 तारीख की दोपहर के बाद पोर्ट ब्लेयर 325 किलोमीटर दूर उत्तर अंदमान के शहर दिगलीपुर पहुंचता हूं तो वहां पर कांग्रेस के कार्यकर्ता विजय जुलुस निकाल रहे हैं। रंग गुलाल के साथ जीत की खुशियां मना रहे हैं। वहां मेरी मुलाकात एक भाजपा के कार्यकर्ता आदेश से होती है। वे कहते हैं कि कांग्रेस जीत की खुशी में पागल हो रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि मानो उन्होंने दिल्ली जीत लिया हो। 

बेशक कांग्रेस का उम्मीदवार 1200 से कुछ ज्यादा मतों से ही जीता है। पर जीत तो जीत होती है और हार हार ही होती है। वे कहते हैं कि निकोबारी लोगों के वोट के कारण कांग्रेस ये चुनाव जीत गई है। निकोबारी लंबे समय से कांग्रेस को वोट देते आए हैं। आदेश कहते हैं कि पंडित नेहरू एक बार निकोबार द्वीप गए थे। वहां उन्होंने खुश होने पर अपना कोट उतार कर निकोबारी लोगों को दे दिया था। उस घटना को याद करके निकोबार के आदिवासी समुदाय के लोग कांग्रेस को ही वोट देते हैं। पर अंदमान के अच्छी संख्या बंगाली लोगों की है। बंगाली समुदाय में भाजपा ने अच्छी पैठ बना ली है।

कुछ लोगों का कहना है कि भाजपा ने इस चुनाव में उम्मीदवार बदल दिया था। इस नए उम्मीदवार की इमेज अच्छी नहीं थी इसलिए भी उन्हें कम वोट मिले। पोर्ट ब्लेयर के जिस ब्लेयर होटल में हमलोग ठहरे हैं उसके ठीक सामने अंदमान कांग्रेस कमेटी का दफ्तर है। बाद में हमें पता चला कि हम जिस ब्लेयर होटल में ठहरे हैं उसके मालिक कांग्रेस के सांसद कुलदीप राय शर्मा ही हैं। हालांकि ये होटल उन्होने लीज पर चलाने के लिए किसी और व्यक्ति को दे रखा है। उनकी पोर्ट ब्लेयर में कई संपत्तियां हैं। वैसे अंदमान की राजनीतिक बयार पर तमिलनाडु और बंगाल की राजनीति का असर सबसे ज्यादा होता है। भौगोलिक तौर पर निकटता के साथ ही यहां की आबादी में बांग्ला और तमिल लोगों की अच्छी संख्या है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 
( ANDAMAN POLITICS, CONGRESS, KULDEEP RAI SHARMA ) 

Saturday, January 11, 2020

फजले हक खैराबादी- जिन्होंने ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ फतवा लिखा


पोर्ट ब्लेयर के फोरशोर रोड पर जिसे कार्बाइन कोव रोड भी कहते हैं तिरंगा मेमोरियल से आगे और साइंस सेंटर से पहले एक मजार है। यह मजार है महान स्वतंत्रता सेनानी फजले हक खैराबादी की। पोर्ट ब्लेयर का यह इलाका साउथ प्वाइंट कहलाता है। 

समंदर के किनारे खूबसूरत सड़क पर यह मजार किसकी है। स्थानीय लोग इसे मजार बाबा के तौर पर जानते हैं। अत्यंत साफ सुथरी इस मजार का इंतजाम अंडमान वक्फ बोर्ड देखता है। कौन थे फजले हक खैराबादी। वे उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र के सीतापुर जिले खैराबाद के रहने वाले थे। वे इस्लामिक मामलों के महान विद्वान थे। लोग उन्हें अल्लमा कहते थे। उनका जन्म यूपी के सीतापुर जिले खैराबाद कस्बे के मियां सराय मुहल्ले में संपन्न परिवार में हुआ था। इस्लामिक विद्वान होने के कारण उनका सम्मान भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान से लेकर अरब देशों तक है।

दार्शनिक, तर्कशास्त्री और शायर
बहादुर शाह जफर पर डाक्यूमेंटरी फिल्म का निर्माण करने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा कहते हैं कि अल्लामा फजले-हक खैराबादी अध्येता, दार्शनिक, तर्कशास्त्री और अरबी के मशहूर शायर थे। वे मिर्जा गालिब के करीबी दोस्त और आखिरी मुगल बहादुर शाह जफर के सलाहकार भी थे। उन्हें 1857 के स्वाधीनता संघर्ष में लोगों का जी जान से नेतृत्व करने के जुर्म में अंग्रेजों ने काला पानी की सजा दी गई थी।

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे क्रांति वीर हुए, जिन्होंने इस जंग-ए-आजादी में योगदान दिया और इतिहास के पन्नों में नाम दर्ज कराया। उसी में कुछ क्रांतिकारी ऐसे भी थे जिनके बारे में कम चर्चा होती है। उन्हीं में से एक थे अल्लामा फजले हक खैराबादी। यूपी की सीतापुर में जन्में फजले हक खैराबादी के पिता दिल्ली सिविल कोर्ट में उपन्यायाधीश थे, जो बाद में अदालत के जज (मुफ्ती) भी हुए।

फजले हक ने पहले खैराबाद में अध्यापन किया फिर 1816  में 19  साल की उम्र में ब्रिटिश सरकार में नौकरी शुरू की। इसके बाद उन्हें दिल्ली के सिविल कोर्ट में अधिकारी पद पर नियुक्त किया गया। पर बाद में उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी नहीं करने का मन बना लिया और फिर 1831  में ब्रिटिश नौकरी को छोड़ दी।

मिर्जा गालिब के दोस्त
उस समय उनकी मुलाकात मशहूर शायर मिर्जा गालिब से हुई। इन्हीं के साथ ये मुगल बादशाह शाह अब्दुल जफर के दरबार में जाने लगे। इसके बाद इन्होंने बहादुर शाह जफर की अदालत में सदस्य के तौर पर नौकरी की। कुछ समय बाद इन्होंने बादशाह की नौकरी छोड़कर झज्जर के नवाब की सेवा में चले गए। कुछ ही समय बाद झज्जर के नवाब की मौत हो गई, और फिर ये सहारनपुर, रामपुर और नवाब वाजिद अली की सेवाओं में रहे। सन 1856 में ब्रिटिश सरकार के अवध कब्जे के बाद मौलाना खैराबादी अलवर के राजा विनय कुमार के निमंत्रण पर अलवर चले गए। अलवर के राजाय के यहां उन्होंने लगभग डेढ़ साल नौकरी की।

ब्रिटिश सरकार के खिलाफ फतवा ए जेहाद
जब 1857 की क्रांति शुरू हुई तो बहादुर शाह जफर ने खैराबादी को मदद के लिए बुलाया। अल्लामा ने बहादुर शाह जफर के निमंत्रण पर राजा विनय कुमार से बात की और अलवर से एक बार फिर दिल्ली के लिए रवाना हो गए।

बहादुर शाह जफर और फजले हक खैराबादी की मुलाकात हुई जिसमें क्रांतिकारी जनरल बख्त भी शामिल थे। ऐसा माना जाता है कि जनरल बख्त खान की रणनीति के तहत ही जिहाद का फतवा जारी हुआ। मौलाना फजले हक खैराबादी ने फतवा तैयार किया, जिस पर कई प्रतिष्ठित धार्मिक गुरुओं ने हस्ताक्षर किए। ऐसा कहा जाता है कि मौलाना खैराबादी ने दिल्ली की जामा मस्जिद में जुमा की नमाज के बाद अंग्रेजों के खिलाफ फतवा दिया। मुसलमानों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का फरमान जारी किया।

खैराबादी को सजा ए कालापानी
फतवे के बाद से ही अंग्रेजों ने उनकी तलाश शुरू कर दी थी। इस बीच वे किसी तरह से बचते बचाते दिल्ली से अवध पहुंच गए और फिर खैराबाद से इनको गिरफ्तार कर लिया गया। इनको लखनऊ ले जाया गया, जहां इनके ऊपर मुकदमा चलाया गया। उन्हें सजा के तौर पर कालापानी यानी अंडमान भेज दिया गया। वे 08 अक्तूबर 1859 को अंदमान भेजे गए। दो साल बाद अंदमान में ही 12 फरवरी 1861 को उनका इंतकाल हो गया। फिर यहीं पर उनकी कब्र बना दी गई। उनके कब्र की देखभाल अंदमान वक्फ बोर्ड करता है। खैराबादी की कब्र पर उनका विस्तार से परिचय भी लिखा है। हर साल फरवरी में मौलाना खैराबादी की याद में पोर्ट ब्लेयर में उर्स का भी आयोजन होता है।

जावेद अख्तर के परदादा
फजले हक खैराबादी के खानदान में शायरी की परंपरा चली आ रही है। वे बॉलीवुड के गीतकार और मशहूर शायर जावेद अख्तर के परदादा थे। फजले हक खैराबादी के बेटे अब्दुल हक ( शमशुल उलेमा) हुए। उनके बेटे इफ्तिखार हुसैन उर्फ मुजतर खैराबादी भी शायर हुए। मुजतर खैराबादी के बेटे जांनिसार अख्तर भी जाने माने शायर हुए। जांनिसार अख्तर के बेटे जावेद अख्तर भी शायर हैं।  सीतापुर के खैराबाद में उनकी याद में अल्लामा फजले खैराबादी मेमोरियल डिग्री कॉलेज की स्थापना की गई है। खैराबाद में भी उनकी याद में स्मारक बनवाया गया है।

अल्लामा खैराबादी
1797 में यूपी के सीतापुर के खैराबाद में जन्म हुआ।

1859 में 08 अक्तूबर को सजा-ए-कालापानी के तहत अंदमान भेजे गए।

1861 में 12 फरवरी को पोर्ट ब्लेयर में उनका इंतकाल हुआ।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
(FAJLE HAQUE KHARABADI ) 

Thursday, January 9, 2020

दीवान सिंह कालापानी – एक डॉक्टर जो वतन के लिए शहीद हो गए



पोर्ट ब्लेयर में अबरडीन बाजार के पास ही स्थित है गुरुद्वारा लाइन। इसका नाम गुरुद्वारा लाइन इसलिए है कि यहां पर स्थित है दीवान सिंह गुरुद्वारा। यह पोर्ट ब्लेयर के प्रसिद्ध गुरु घर में से एक है। पर ये दीवान सिंह कौन थे जिनके नाम पर यहां गुरुद्वारा बना है।

गुरुद्वारा के ठीक सामने एक छोटा सा उद्यान बनाकर दीवान सिंह कालापानी की विशाल मूर्ति की स्थापना की गई है। यहां पर दीवान सिंह का संक्षिप्त परिचय लिखा गया है। अमर शहीद डॉक्टर दीवान सिंह कालापानी का जन्म 12 मई 1897 को मलोटिया जिला सियालकोट (पंजाब, अब पाकिस्तान में है) हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार सुंदर सिंह और माता का नाम सरदारनी इंदर कौर था। उन्होंने 1916 में हाईस्कूल की परीक्षा पास की। आगरा से 1921 में उन्होंने डॉक्टरी का डिप्लोमा लिया। इसके बाद में इंडियन आर्मी के चिकित्सा सेवा कोर में शामिल हो गए। उनकी पोस्टिंग ब्रिटिश बर्मा (अब म्यांमार) के रंगून में हुई। बाद में उनका तबादला अंदमान कर दिया गया।

जापानी भी हमें आजादी नहीं देंगे - सरदार दीवान सिंह की एक डॉक्टर के तौर पर सन 1926 में अंदमान निकोबार में नियुक्ति हुई। उन्होंने 1927 में सेल्युलर जेल में कैदियों की चिकित्सा का कार्यभार संभाला और देश भक्तों की सेवा में अपना जीवन न्योक्षावर कर दिया। पोर्ट ब्लेयर में रहते हुए उन्होंने भारत की स्वतंत्रता की आवाज बुलंद की। वे भारतीय स्वतंत्रता संघ के अगुवा भी बने। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पोर्ट ब्लेयर पर जब जापान ने कब्जा कर लिया तो उन्होंने जापानियों के खिलाफ आवाज उठाई। 
उनका साफ विचार था कि अंग्रेजों ने हमें आजादी नहीं दी, जापानी भी हमें आजादी नहीं देंगे। उनके विचारों से ज्ञात होता है कि वे वैचारिक रूप से कितने प्रखर रहे होंगे। जापानियों ने दीवान सिंह को रेडियो पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बोलने को कहा, पर उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। दीवान सिंह ब्रिटिश और जापानी दोनों को ही भारत का दुश्मन मानते थे।

1944 में शहीद हो गए - दीवान सिंह के उग्र आंदोलन के कारण 23 अक्तूबर 1943 को उन्हें सेल्युलर जेल में गिरफ्तार कर लिया गया। तकरीबन 82 दिन तक उनके साथ जेल में काफी क्रूर व्यवहार किया गया। लगातार आंदोलन करते हुए 14 जनवरी 1944 को दीवान सिंह शहीद हो गए। भारत सरकार ने इस भूले बिसरे शहीद को 1987 में जाकर स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया। यहां पर यह समझने की बात है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस जापान के सहयोग से अपना आंदोलन चला रहे थे। पर सरदार दीवान सिंह जैसे लोग जापान से सहयोग लेने पर बिल्कुल सहमत नहीं थे। वे जापानियों को अंग्रेजों से भी ज्यादा क्रूर मानते थे।

बाद में पोर्ट ब्लेयर में रहने वाले सिख समाज ने शहीद दीवान सिंह की याद में इस गुरुद्वारा का निर्माण कराया। गुरुद्वारा का परिसर अत्यंत सुंदर है। प्रार्थना कक्ष के बाहर बैठने की जगह है। परिसर में रंग बिरंगे फूल खिले हैं।
सन 2011 में दीवान सिंह की याद मे उनकी एक प्रतिमा की स्थापना की गई है। इस मूर्ति की स्थापना सरदार हरगोविंद पाल सिंह जो गुरुद्वारा दीवान सिंह के अध्यक्ष हैं, उनके प्रयासों से की गई। सेल्युलर जेल में क्रूर यातन सहते हुए वतन के लिए प्राण गंवाने वालों में सरदार दीवान सिंह भी एक बड़ा नाम है। पर उनकी प्रतिमा सेल्युलर जेल के बाहर नहीं है। उसे देखने के लिए आपको एक किलोमीटर दूर गुरुद्वारा लाइन में आना पड़ेगा।

दीवान सिंह पंजाबी के कवि भी थे। उन्होंने पंजाबी में दो काव्य संग्रह लिखे। उनका पंजाबी में काव्य संग्रह वगदे पानी 1938 में आया। उनका दूसरा कविताओं का संग्रह अंतिम लहरें 1962 में मरणोपरांत प्रकाशित हुआ। वे छंदमुक्त कविताएं लिखते थे जिनमें रुमानी पुट हुआ करता था।
सरदार दीवान सिंह जैसे शहीदों की कहानी को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को इस महान शहीद के बारे में पता चल सके।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( SHAHEED DIWAN SINGH KALAPANI, PORT BLAIR, GURUDWARA )