Friday, May 14, 2021

सिटी फारेस्ट गाजियाबाद वन हैं सुंदर घनेरे...


गाजियाबाद शहर में एक सिटी फारेस्ट है। यानी शहर में जंगल। यह जंगल  175 एकड़ में फैला हुआ है। स्थानीय लोगों की कच्ची  माप में पांच हजार  बीघा में है।  इसके अंदर नौ किलोमीटर लंबा साइकिल ट्रैक बना हुआ है।


 

Wednesday, May 12, 2021

दक्षिण के पांच लोकप्रिय हिल स्टेशन


ठंडे मौसम के लिए आप पहाड़ों का रुख करते हैं। तो सिर्फ उत्तर भारत में नहीं दक्षिण भारत में भी कई हिल स्टेशन हैं जहां का मौसम सालों भर लुभाता है। वैसे तो आपने दक्षिण के लोकप्रिय हिल स्टेशन ऊटी के बारे में सुना ही होगा। पर आपको हम आज बताते हैं दक्षिण के टॉप पांच हिल स्टेशन के बारे में।


सबसे पहले बात करते हैं ऊटी की। उटी यानी उदगमंडलम। यह तमिलनाडु में पड़ता है। हमने साल 2012 में ऊटी की यात्रा की थी। यह दक्षिण भारत का सबसे लोकप्रिय हिल स्टेशन है। इसकी खासियत है कि यहां पर आपको रहने के लिए सस्ते होटल भी मिल जाएंगे तो पांच सितारा भी। उटी आप कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू से मैसूर होते  हुए पहुंच सकते हैं।  तो दूसरा रास्ता तमिलनाडु के बड़े शहर  कोयंबटूर से होकर है। 

 

कन्नूर ( तमिलनाडु )

कोडइकनाल ( तमिलनाडु)

मुन्नार (केरल)

कुर्ग ( कर्नाटक )

 

 

 




Monday, May 10, 2021

स्वामी विवेकानंद और बोध गया

महान आध्यात्मिक संत स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। ये तो सभी जानते हैं। पर उनपर कई और आध्यात्मिक शक्तियों का प्रभाव पड़ा था। वे गाजीपुर में पवहारी बाबा से मिले थे। पर इससे पहले उन्होंने बुद्ध को समझने के लिए बोध गया की यात्रा की थी।

 दो बार बोध गया आए - स्वामी विवेकानंद दरअसल दो बार बोध गया आए थे।   एक बार नरेंद्र नाथ दत्त के रूप में तो दूसरी बार स्वामी विवेकानंद के रूप में।  वास्तव में उनके जीवन पर गौतम बुद्ध का भी व्यापक प्रभाव पड़ा था। 

गौतम बुद्ध



 

 

Saturday, May 8, 2021

यहां शहीद हुए थे महाराजा सूरजमल


प्रतापी राजा महाराजा सूरजमल की स्मृतियां पूर्वी दिल्ली में बिखरी हुई हैं। इसे संजोया भी गया है। आपका पता है पूर्वी दिल्ली के एक विशाल आवासीय कालोनी का नाम सूरजमल विहार है। इसके ठीक सामने स्थित है महाराजा सूरजमल पार्क।


Thursday, May 6, 2021

वीके कृष्णमेनन - देश के दूसरे शक्तिशाली व्यक्ति


दिल्ली में सेना भवन के बाहर एक मूर्ति लगी है। यह मूर्ति वीके कृष्ण मेनन की है। इसके बगल में उनके नाम पर एक सड़क का भी नाम है। कौन थे वीके कृष्ण मेनन। वे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के मंत्रीमंडल में रक्षा मंत्री हुआ करते थे। साठ के दशक में नेहरु के बाद वे देश की दूसरी सबसे शक्तिशाली शख्सियत थे। वे भले ही मूल रूप से केरल के रहने वाले थे। पर उन्होंने मुंबई और बंगाल के मिदनापुर से लोकसभा का चुनाव जीता था। बाद में केरल से भी लोकसभा के लिए चुने गए। इस तरह लोकसभा में उन्होंने तीन राज्यों का प्रतिनिधित्व किया।

 

वे नार्थ मुंबई 1957 और 1961 में चुनाव जीते। बाद में कांग्रेस पार्टी  से अलग होकर पश्चिम बंगाल के मिदनापुर से 1969 में चुनाव जीता। अपने गृह राज्य केरल में त्रिवेंद्रम से 1971 में स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीते।

Tuesday, May 4, 2021

इंदिरा स्मृति - सफदरजंग बंगला नंबर एक


भारत की राजधानी दिल्ली में। सफदरजंग बंगला नंबर एक।   यह लंबे समय तक आवास रहा देश सबसे शक्तिशाली प्रधान मंत्री,  लौह महिला श्रीमती इंदिरा गांधी का।   यहीं उनका आखिरी वक्त भी गुजरा। यहीं पर 31 अक्तूबर 1984 को उनकी हत्या भी कर दी गई थी।


तो चलिए आज चलते हैं इस बंगले में। देश की राजधानी दिल्ली के लुटियन जोन में बहुत कम बंगले हैं जिसमें आम आदमी का प्रवेश संभव है। पर अब संग्रहालय में तबदील हो जाने के कारण आप इसमें प्रवेश कर सकते हैं। इस बंगले का रिश्ता देश के दो प्रधानमंत्रियों से है।


इंदिरा गांधी के अलावा उनके बेटे राजीव गांधी भी लंबे समय तक इस बंगले में रहे। इसी बंगले में रहते हुए देश के प्रधानमंत्री बने। तो इस बंगले घूमते हुए राजीव गांधी का कक्ष भी देखा जा सकता है। युवावस्था में राजीव अपनी मां के साथ इसी बंगले में रहते थे।  हांलाकि वे पायलट थे पर परिस्थितिवश उन्हें राजनीति में आना पड़ा।


दिल्ली के पृथ्वीराज रोड से चलकर सफदरजंग के मकबरे वाले चौराहे पर पहुंचने पर दाहिनी तरफ का रास्ता सफदरजंग रोड कहलाता है। इसी सड़क पर दिल्ली का प्रसिद्ध जिमखाना क्लब स्थित है। सफदरजंग और अकबर रोड के चौराहे पर ये बंगला नंबर एक स्थित है।

 


इंदिरा गांधी जब पंडित नेहरू के मंत्रीमंडल में मंत्री बनीं तो उन्होने अपने रहने के लिए इस बंगले को पसंद किया। वैसे यह बंगला 1926 के आसपास का बना हुआ है। लुटियन बंगलों की तरह यह आसपास के बाकी बंगलों जैसा ही है। इसमें कुछ खास या कुछ अलग नहीं था। पर मंत्री से प्रधानमंत्री बनने तक इंदिरा गांधी इसी बंगले में रहीं। उन्होंने जीवन भर अपना आवास कभी नहीं बदला।


इस बंगले कई कमरों को संग्रहालय में तबदील कर दिया गया है। यहां प्रवेश करने के बाद 1966 से 1984 के बीच के देश के इतिहास से रुबरू हो सकते हैं। इस दौरान की बड़ी घटनाओं के अखबारों के मुख पृष्ठ की प्रतियां यहां डिस्प्ले किया गया है। 

इंदिरा गांधी ने पहली बार प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली। 1969 में कांग्रेस में विद्रोह हुआ और प्रधानमंत्री को ही पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद कांग्रेस में विभाजन हुआ। पर बड़े धड़े पर इंदिरा गांधी का कब्जा रहा।   दरअसल सन 1966  से  1984  तक देश का इतिहास इंदिरा युग है।



सन 1971 में पूर्वी पाकिस्तान को आजादी मिलना और बांग्लादेश का गठन होना। इसमें इंदिरा गांधी की बड़ी भूमिका थी। फिर इमरजेंसी का भी दौर आया। 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी को बड़ी हार मिली। सन 1980 में उन्होंने सत्ता में वापसी की। इन सब घटनाओं को आप यहां अखबारों की हेडलाइन में देख सकते हैं।   इंदिरा गांधी को कई बड़े फैसलों के लिए याद किया जाता है। उन्होंने बैंको का राष्ट्रीयकरण किया।   प्रिंसले  स्टेट के राजाओं का प्रिवी पर्स खत्म कर दिया। 

इंदिरा जी का दुनिया महान हस्तियों से पत्रव्यवहार, वार्ताओं और उनसे मिले कुछ स्मृति चिन्हों को भी यहां देखा जा सकता है। इसके अलावा आप इंदिरा जी अध्ययन कक्ष ( पुस्तकालय) उनका डायनिंग रूम और उनका शयन कक्ष भी देख सकते हैं। उस कक्ष भी देख सकते हैं जहां बैठकर वह प्रमुख लोगों के वार्ता किया करती थीं।


सफदरजंग के इस बंगले के लॉन में आगे बढ़ते हुए आप उस स्थल तक पहुंच जाते हैं जहां 31 अक्तूबर 1984 की मनहूस सुबह उनके ही दो सुरक्षा गार्डों ने गोलियां बरसा कर उनकी हत्या कर दी। और एक शक्तिशाली आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। जिसने कहा था मैं नहीं रहूंगी तो भी मेरे खून का एक एक कतरा इस देश को मजबूती प्रदान करेगा। यहां से चलते हुए बिक्रय केंद्र से पुस्तकें और कई तरह के स्मृति चिन्ह भी खरीद सकते हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( INDIRA GANDHI, RAJEEV GANDHI,  SAFDARJANG  BANGLAW NO 01 )  


Sunday, May 2, 2021

टाटा नैनो - सुंदर सपने का यूं अंत हो जाना

अंदमान निकोबार की सड़क पर नैनो।  ( फोटो 2016 ) 

जब कभी कोई नैनो कार सड़क पर चलती हुई या खड़ी दिखाई देती है तो मुझे बड़ा अच्छा लगता है पर   नैनो के सपने का दुखद अंत हो चुका है।  मार्च   2009   में पेश देश की सबसे सस्ती कार नैनो का उत्पादन शुरू हुआ था। पर यह दौर दस साल ही चल सका। 



  

नैनो का उत्पादन और इसकी बिक्री 2019 में पूरी तरह बंद हो चुका है। दरअसल बाद के सालों में इस कार को लोगों का अच्छा रेसपांस नहीं मिल रहा था। अंततः  कंपनी ने चुपके से उत्पादन बंद करने का फैसला लिया।   हालांकि नैनो देश की मध्यम वर्गीय आबादी के लिए रतन टाटा का एक भावुक सपना हुआ करती थी जिसे मूर्त रूप दिया गया था।



दुनिया की सबसे  सस्ती कार -  टाटा की नैनो दुनिया की सबसे सस्ती कार हुआ करती थी। जब यह सड़क पर आई तो दुनिया की तमाम आटोमोबाइल कंपनियों को काफी आश्चर्य हुआ था।  उनका कौतूहल ये था कि कोई कैसे एक लाख रुपये में कार उपलब्ध करा सकता है। पर साल 2009 में ऐसा हुआ था।   नैनो आई और देश-विदेश की सड़कों पर शान से चली। 



कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक बार देश के जाने माने उद्यमी रतन टाटा मुंबई में अपनी कार से जा रहे थे। बाहर बारिश हो रही थी। रेड लाइट पर एक दंपत्ति अपने स्कूटर पर सवार बारिश से बचने की असफल कोशिश कर रहा था। यह सब कुछ देखकर रतन टाटा के मन में ख्याल आया कि क्यों ने एक ऐसी कार बनाई जाए जो स्कूटर बाइक से थोड़ी ही महंगी हो। यहीं से एक लाख रुपये के दायरे में एक कार बनाने के सपने ने जन्म लिया। 


टाटा ने जब एक लाख रुपये की कार बनाने की शुरुआत की तो उसकी राह में रोड़े भी खूब आए। टाटा की इस नैनो कार का प्लांट लगना तय हुआ बंगाल के सिंगूर में। पर वहां जमीन विवाद शुरू हो गया। कई साल चले इस विवाद के बाद सिंगूर में नैनो का प्लांट लगाने का इरादा टाटा को बदलना पड़ा। इससे नैनो को सड़क पर आने में देरी भी हुई। अंत में नैनो का प्लांट लगा गुजरात के साणंद में।


पर इससे पहले नैनो की पहली कार बन कर निकली उत्तराखंड के रुद्रपुर के पास स्थित प्लांट से। इसकी पहली झलक साल 2008 में सड़कों पर दिखाई दी। टाटा ने नैनो के रूप में छोटी पर मजबूत कार बनाने की कोशिश की थी। इसकी पहाड़ों पर और रेगिस्तान में लंबी ड्राईव करके टेस्टिंग की गई। इसके बाद इसे जनता के बीच पेश किया गया। हालांकि इसे लोगों से बहुत शानदार रेस्पांस नहीं मिला।


साल 2011 में टाटा मोटर्स ने आधिकारिक तौर पर श्रीलंका में छोटी कार की पेशकश करते हुए नैनो का निर्यात शुरू कर दिया। इसकी कीमत श्रीलंकाई मुद्रा में   9.25 लाख रुपये (यानी   3.80 लाख भारतीय रुपये) थी। टाटा नैनो के लिए श्रीलंका पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार था,जहां जनता की कार कहलाने वाले टाटा की नैनो को आधिकारिक तौर पर पेश किया गया।


नैनो जब  सड़क पर दौड़ने लगी तो लोग इसे कौतूहल से देखते थे। इस नन्ही सी कार को मेरे  स्कूल में पढ़ने वाले और बेटे ने  बड़े प्यार से एक नाम दिया - बिना पूंछ वाला चूहा।  यह बड़ी बड़ी कारों की भीड़ में कुछ कुछ चूहे जैसा ही प्रतीत होता था।  पर टाटा की दूसरी कारों की तरह इसको लोगों ने  ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया।  इसलिए बाजार में इसकी धीरे धीरे लोकप्रियता कम होने लगी।  

- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
 ( TATA NANO, CAR, SINGUR, RUDRAPUR, SANAND ) 


Friday, April 30, 2021

हमारे सिर पर कैसा हेलमेट होना चाहिए

बड़ा सवाल है कि हमारे सिर पर कैसा हेलमेट होना चाहिए। अक्सर लोग सस्ता हेलमेट खरीद लेते हैं।  यह सिर्फ लाइसेंस बचाने के लिए होता है। ट्रैफिक के चालान से बचने के लिए।  पर वास्तव में हेलमेट तो आपकी सिर के सुरक्षा के लिए होना चाहिए। 

आरिफ खान गाजियाबाद के रहने वाले युवा उद्यमी हैं। वे सुरक्षित हेलमेट के अभियान से जुड़े हुए हैं।   वे बताते हैं कि अक्सर हमलोग लाइसेंस बचाने के लिए फुटपाथ पर बिकने वाली अस्थायी दुकानों से सस्ती हेलमेट खरीद लेते हैं। वे आपके सिर की सुरक्षा कर पाने में बिल्कुल सक्षम नहीं है। कई बार तो ये हेलमेट  मामूली सी हथौड़ी मारने  से टूट जाते हैं। 


गुणवत्ता से समझौता नहीं करें-  आजकल नई बाइक या स्कूटी खरीदने पर   बिल के साथ   हेलमेट लेना जरूरी होता है। पर अक्सर एजेंसी वाले आपको जो हेलमेट थमा देतें हैं वह भी टॉप ब्रांड का नहीं होता।  जब हम बाइक खरीदने में 40 हजार से दो लाख रुपये खर्च कर देते हैं हेलमेट के साथ कुछ सौ रूपये के लिए समझौता क्यों करते हैं। 


तो कैसा होना चाहिए हमारा हेलमेट।  जो लोग लंबी यात्राएं करते हैं प्रोफेशनल बाइकर हैं वे हेलमेट का महत्व जानते हैं। वे जानते हैं कि आपका हेलमेट उच्च गुणवत्ता का होना चाहिए। ऐसे लोग कभी सस्ते हेलमेट का इस्तेमाल नहीं करते। 


फुटपाथ से हेलमेट न खरीदें - तो आप भी कभी फुटपाथ या किसी दुकान से सस्ती क्वालिटी का हेलमेट नहीं खरीदें। जब भी खरीदें उच्च गुणवत्ता का मजबूत हेलमेट ही खरीदें । पर उच्च गुणवत्ता की पहचान कैसे हो। क्या आईएसआई मार्क लगा हर हेलमेट ठीक  है। तो इसका जवाब भी ना में है। सिर्फ आईएसआई मार्क दिखाई दे जाने से कुछ नहीं होता। 


 ब्रांडेड कंपनी का उत्पाद खरीदें -  हेलमेट हमेशा किसी  ब्रांडेड कंपनी का ही खऱीदें। कानून से बचने के लिए हेलमेट नहीं खरीदें। आपका जीवन कीमती है इसलिए जीवन को बचाने वाला हेलमेट ही खरीदें।   ब्रांडेड कंपनियों में आप स्टड्स और स्टीलबर्ड पर भरोसा रख सकते हैं। इनका हेलमेट 900 रुपये से आरंभ हो जाता है। आपको पता महंगे  हेलमेट को 32 हजार रुपये तक के आते हैं।


हर यात्रा पर हेलमेट पहनें -  सिर्फ लंबी दूरी की यात्राओं ही नहीं छोटी छोटी दूरी पर निकलते समय भी बाइक या स्कूटी पर सवार हों तो हेलमेट जरूर लगा लें।  आपको पता ही होगा कि हादसे कभी बता कर नहीं आते।   मेरे कई ऐसे दोस्तों के  सड़क हादसों से उदाहरण हैं जहां सिर्फ हेलमेट होने के कारण वे जिंदा बच सके। 

पिछली सवारी के लिए भी जरूरी - और हां  बाइक या स्कूटी चलाते समय  सिर्फ अपने सिर पर ही नहीं बल्कि पिछली सवारी के लिए हेलमेट जरूरी है। यह कानून भी  जरूरी है। साथ ही पिछली सवारी की सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।


साइज के अनुरूप हो हेलमेट - हमेशा  हेलमेट अपने सिर के साइज के अनुरूप खरीदें। यह  बहुत ढीला भी नहीं होना चाहिए और बहुत टाइट भी नहीं होना चाहिए।  अक्सर हाफ कट वाले और ठीक से नहीं बंधे हुए हेलमेट से बचना चाहिए। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( GOOD QUALITY HELMET , TRAVEL, STUDDS, STEELBIRD )

Wednesday, April 28, 2021

और इस तरह बेगाना हो गया तमिलनाडु का गांव



राजधानी  दिल्ली में  अलग अलग राज्यों से आए लोग  समय समय  पर अपना आशियाना बनाते रहे हैं।  उनमें से  बड़ी संख्या में तमिल  भाई भी हैं। दुरा राज नाम है उनका। दिल्ली के ताहिरपुर रोड पर उनकी मोटर कार चलाना सीखाने केंद्र है उनका मीनाक्षी मोटर्स के नाम से। जब उनसे थोड़ी बातचीत करने का मौका मिला तो वे थोड़े दिलचस्प इंसान लगे। मैं पूछ बैठा आप मूल रूप से कहां के रहने वाले हैं। बताने लगे मैं पैदा तो दिल्ली में ही हुआ पर मेरे पिता यहां तमिलनाडु के पायनूर से आए थे। यह कांचीपुरम जिले में महाबलीपुरम के पास एक गांव है। दिल्ली कैसे पहुंच गए। इस सवाल पर वे भावुक हो गए और उनकी आंखों से यादों की एक दरिया बह निकली।

हमारा परिवार तमिलनाडु में पटवारी हुआ करता था। बहुत बड़ी जमींदारी हुआ थी हमारे दादा के पास। पर अब कुछ नहीं बचा। वह आजादी से पहले का समय था। मेरे दादाजी एक दिन अचानक क्या सुझा कि वे चेन्नई से सिंगापुर जाने वाले जहाज में सवार हो गए। जहाज पर उनसे पूछा गया कि तुम्हारी बाकी फेमिली कहां है। उन्होंने कहा, कोई परिवार नहीं है। पर तभी किसी ने बता दिया इसके तो तीन बच्चे हैं। इसके बाद वे जहाज से उतार दिए गए। पर कुछ दिनों बाद वे नहीं माने एक और सिंगापुर जाने वाले जहाज में सवार हुए और इस बार पलायन करने में सफल हो गए। दादा जी के जाने  के बाद मेरे दस साल के पिता अनाथ हो गए। मां के लिए बच्चों को पालना मुश्किल हो गया। उनके सामने कोई रोजी रोटी का जरिया नहीं था। समय बहुत मुफलिसी में कट रहा था। थोड़ी उम्र बढने के बाद एक दिन पिता रोजगार की तलाश में दिल्ली आ गए। तो मेरा जन्म दिल्ली में हुआ। यहीं पर संघर्ष करके हमने रोजी रोटी का इंतजाम किया। लंबे समय तक मोटर पार्टस का बिजनेस किया। पर बार-बार याद आता था कि हमारा तमिलनाडु में कहीं पर हमारा घर और जमीन जायदाद है। 


तो सन 1980 में मैं एक बार अपने गांव गया। अपनी जमीन जायदाद के बारे में दरियाफ्त करने। गांव में हमारे एक पड़ोसी मिले। उन्होंने मुझे मेरे परिवार के पुराने दिन याद दिलाए। यह भी याद दिलाया कि कैसे तुम्हारी दादी और पिताजी को भूखों मरने से बचाया था। उन्होंने बताया कि जब तुम्हारी दादी और पिता के पास खाने को कुछ नहीं था तो हमने रहम करते हुए खाने के लिए उन्हें माड़ भात दिया था। यह सब सुनकर मेरा मन भावुक हो गया। अब पड़ोसी ने कहा, मैंने तुम्हारे परिवार को कभी भूखा मरने से बचाया था। अब तुम उसके बदले में मेरे उपर थोड़ा एहसान करो। मैंने पूछा क्या,,, उसने कहा, ये जो गांव में तुम्हारी जमीन है वह सब मेरे नाम कर दो। अब तुम तो दिल्ली में रहते हो तुम्हे इस जमीन की क्या जरूरत होगी। मैं अतीत में उनके द्वारा अपने परिवार पर किए गए एहसान से भावनाओं में बह रहा था। तो बिना किसी धन की इच्छा किए उन्हें सारी जमीन लिखने को तैयार हो गया। उन्होंने आनन-फानन में जमीन के कागज तैयार कराए। हमलोग रजिस्ट्री आफिस में गए। मैंने सारे कागजात पर हस्ताक्षर कर दिए। रजिस्ट्री हो जाने के बाद उस पड़ोसी ने दफ्तर के बाहर आकर मुझे खाना खिलाया। 


उसके बाद हमलोग गांव लौटे। अब  उसने मुझे कुछ दिखाने की कोशिश की। कहा, यहां से उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम जहां तक तुम्हारी नजर जाती है ये सारी जमीन तुम्हारी हुआ करती थी। पर ये अब सारी जमीन हमारी हो चुकी है। अब मेरी आंखे चौंधियां गईं तो इतनी संपत्ति मेरे दादा की हुआ करती थी गांव में, जो अब मेरी नहीं रही। गांव से मेरा बचा खुचा रिश्ता भी टूट चुका था। मैं चुपचाप दिल्ली के लिए लौट चला। पुरानी हिंदी फिल्म भाभी का ये गीत दिल के किसी कोने में बज रहा था- चल उड़ जा रे पंक्षी की ये देश हुआ बेगाना... अब तो बस दिल में तमिलनाडु की यादें भर हैं।

-विद्युत प्रकाश मौर्य

-         ( TAMIL IN DELHI ) 

 


Monday, April 26, 2021

महापुरुषों की मूर्तियों का शहर दिल्ली

दिल्ली के चौक-चौराहों पर घूमते हुए आपको कई महापुरुषों की मूर्तियां नजर आती हैं। संसद भवन के करीब संसद मार्ग पर पटेल चौक पर आप देखेंगे तो गोलंबर के बीचों बीच सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति लगी है। उनकी प्रतिमा संसद भवन की ओर देख रही है।  

 पटेल की इस प्रतिमा का अनावरण 18 सितंबर 1963 को राष्ट्रपति डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने  किया था।  अब भले ही देश में सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा बन गई है पर पटेल चौक की यह दिल्ली की सबसे पुरानी प्रतिमाओं में  से एक है। हर साल 31 अक्तूबर को उनकी जयंती पर यहां श्रद्धा  के पुष्प चढ़ाए जाते हैं।

देशरत्न डाक्टर राजेंद्र प्रसाद -   दिल्ली के पंत मार्ग पर गोल डाकखाना से आगे गुरुद्वारा रकाबगंज की ओर जाने पर बायीं तरफ नजर डालें तो देश रत्न डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की प्रतिमा नजर आती है। ये प्रतिमा संसद के एनेक्सी भवन के पीछे है। इसके आगे चलें तो संसदीय संग्रहालय का प्रवेश द्वार मिलता है। देश के पहले राष्ट्रपति को याद करने के लिए उनकी प्रतिमा सही जगह पर लगाई गई है। वैसे दिल्ली में उनके नाम पर एक सड़क का नाम भी राजेंद्र प्रसाद रोड है।


पुश्किन की प्रतिमा - मंडी हाउस गोल चक्कर के एक कोने पर मंडी हाउस की तरफ अलेक्जेंडर पुश्किन की आदमकद प्रतिमा नजर आती है। पुश्किन को रूसी भाषा के छायावादी कवियों में से एक थे। उन्हें रूसी का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। साथ ही उन्हें आधुनिक रूसी कविता का संस्थापक भी माना जाता है। उनका जीवन काल सिर्फ 38 साल का ही रहा।


लोकमान्य  तिलक की प्रतिमा -  आपने दिल्ली  में  लोकमान्य  बालगंगा धर तिलक की प्रतिमा तो देखी होगी। यह प्रतिमा देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के पास है।   आईटीओ से प्रगति मैदान की तरफ चलने पर ये प्रतिमा आपकी आंखों के सामने नजर आती है। 



 संपूर्ण क्रांति का नारा देने वाले और सन 1977 में देश में तख्ता पलट के नायक को दिल्ली  में आपने  कहां  देखा है। लोकनायक दिल्ली में जय प्रकाश नारायण  की प्रतिमा दिल्ली गेट के पास देखी जा सकती है।  यहीं पर पास में उनके नाम पर एलएनजेपी अस्पताल भी है।   पहले  इस  अस्पताल  को इर्विन  हॉस्पीटल के नाम से जाना जाता था।  पर  सन 1977 में  आई जनता सरकार ने इसका नाम बदल डाला। 

इसी पार्क में जय प्रकाश नारायण के  बगल में  और महान देशभक्त  की प्रतिमा लगाई गई है। थोड़ा सा उत्तर की ओर चलें तो श्यामा  प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा  दिखाई देती है। यह  फिरोजशाह कोटला मैदान की बाउंड्री वाल के बिल्कुल पास है।  इस हरे भरे पार्क में दोपहर में काफी लोग टाइम पास करने पहुंचते हैं।  

क्या आपको पता है दिल्ली में देश के दूसरे प्रधानमंत्री  लाल बहादुर शास्त्री की  प्रतिमा कहां है। मुझे उनकी प्रतिमा दिखाई दे जाती है   सीजीओ कांप्लेक्स के पास।  दयाल सिंह कालेज से जब  जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम की ओर बढ़ते हैं तो  बायीं तरफ लाल बहादुर शास्त्री की प्रतिमा नजर आती है।  यहां सीआरपीएफ के दफ्तर के बाहर उनकी प्रतिमा लगाई गई है। 

दांडी मार्च की याद  11 मूर्ति -  दांडी मार्च की याद में दिल्ली में ग्यारह मूर्ति प्रतिमा बनाई गई है। यह चाणक्यपुरी में सरदार पटेल मार्ग और मदर टेरेसा क्रिसेंट के चौराहे पर स्थित है।   पटेल मार्ग की ओर जाते हुए अक्सर  इस प्रतिमा पर लोगों की नजर चली जाती है। 


इस मूर्ति में  सबसे आगे  बापू लाठी लिए हुए चल रहे हैं। उनका अनुसरण कर रहे हैं दांडी मार्च के कुछ और नायक। इन नायकों में एक महिला और सभी धर्मों के लोग हैं। यह अत्यंत कलात्मक प्रतिमा है।   इसे देखने  के लिए राह चलते  लोग रुक जाते हैं। इस मूर्ति के शिल्पकार देवी प्रसाद राय चौधरी ( 1899-1975 ) हैं।  यह नमक सत्याग्रह की याद दिलाता है। 


-- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  
(  STATUE IN DELHI, SARDAR PATEL, LAL BAHADUR SASHTRI,  PUSHKIN, 11 MURTI) 

Saturday, April 24, 2021

क्या संभव है जीरो बजट मे ट्रैवेल

 

क्या शून्य बजट में यात्राएं हो सकती हैं। यह सवाल कई सैर सपाटा से जुड़े हुए साथी पूछ रहे हैं। कुछ का जवाब हां में है तो कुछ का जवाब ना में है। पर मुझे लगता है कि बिल्कुल की जा सकती है जीरो बजट यात्राएं। एक मित्र ने  सवाल किया तो मैंने उत्तर  कुछ यूं दिया - ऐसी यात्राओं के लिए आपको खुद को ईश्वर के हवाले कर देना होगा। 


इसका मतलब कुछ यूं समझिए कि आपकी यात्रा का खर्च दूसरे उठाएं। मांग कर खाएं, लिफ्ट लेकर यात्राएं करें। स्वाभिमान को मार कर भिक्षाटन कर चलते रहें। इससे मन निर्मल होगा। आत्मा पवित्र होगी। और आप धीरे धीरे परिव्राजक बनते जाएंगे। साधुत्व को प्राप्त होंगे। संत ज्ञान मिल जाएगा।


आधुनिक युग में एक शब्द चल रहा है हिचहाइकिंग। मतलब लिफ्ट मांग कर घूमना।  देश में विदेश में कई ऐसे लोग हैं जो हिचहाइकिंग करके घूम रहे हैं। वे लोग सड़क पर खड़े होकर लिफ्ट मांगते हैं। जाहिर कई बार आपको हो सकता है कि घंटों तक लिफ्ट नहीं मिले। 


वैसे देश-विदेश में अपनी कुछ यात्राओं में हमने भी लिफ्ट मांगी हैं। कुछ ऐसे मौके आए जब कोई सार्वजनिक वाहन नहीं मिल रहा था तो ऐसे वक्त में लिफ्ट मांगना भी काम आ गया। पर हिचहाइकिंग भी एक तरह से भिक्षाटन करके घूमने जैसा ही है। कई बार राह चलते जान पहचान  हो जाने पर भी लोग लिफ्ट दे  देते हैं। जैसे भूटान की राजधानी थिंपू में एक इंजीनियर ने हमें अपनी कार में लिफ्ट दे दी थी।


वैसे कुछ समझदार लोग  जीरो बजट ट्रैवेल का  मतलब  ये  लगाते हैं कि  बहुत कम खर्चे में घूमना। इतना ही खर्च करना जितना आप घर में रहने के दौरान  खर्च करते हैं।   जैसे आप घर में रहते हैं तभी आपका खाना नास्ता, मकान किराया  , बिजली बिल आदि में तो खर्च होता ही है।  तो यात्रा में भी उतना ही खर्च करें।

मतलब यात्रा के दौरान आप 200 से 300 रुपये के होटल धर्मशाला में रहने की आदत डालें। कहीं अगर मुफ्त में रहने का मौका मिल जाए तो इसका लाभ उठाएं । किसी शहर में दोस्त रिश्तेदार रहते हों तो उनके घर को ठिकाना बनाएं। 


इस तरह खाने नास्ते में भी बजट कम रखें।  जैसे  गुरुद्वारा या मंदिरों के लंगर में भोजन कर लें। बडे  स्टार होटल में खाने की  जगह स्ट्रीट फूड का आनंद लेते हुए आगे बढ़ते रहें।  खाने के लिए कई संस्थाओं या मंदिरों की रियायती कैंटीन का भी लाभ उठाएं।  इस तरह आप कम खर्च में  सफर जारी रख सकते हैं।


छात्र जीवन में इस तरह का जीरो बजट ट्रैवल का प्लान हमने कई बार बनाया था।   मैं एक परीक्षा देने  भोपाल गया तब अपने मित्र प्रिय अभिषेक अज्ञानी के घर कुछ दिन रुका। इस दौरान रोज लोकल बसों से भोपाल की सैर करता था। इसमें मेरा बहुत कम खर्च आया पर  पूरा भोपाल देख डाला। 


किसी नए शहर में घूमने के लिए अगर छोटा शहर  हो पैदल पैदल ही घूमिए।  अगर बड़ा शहर है तो लोकल बसों का यानी सार्वजनिक परिवहन का सहारा लें।   अगर बसों का दिन भर का पास बनता हो तो उसका लाभ उठाएं। इससे  आप कम खर्च में पूरा शहर देख लेंगें।  दिल्ली में महज 50 रुपये का पास खरीदकर आप दिन भर दिल्ली  में घूम सकते हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 

( ZIRO BUDGET TRAVEL )