Sunday, April 21, 2019

कोल्हापुर से पंढरपुर- सितार, सरोद, तानपुरा का शहर मिरज

कोल्हापुर से सुबह-सुबह महाराष्ट्र के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पंढरपुर के लिए चल पड़ा हूं। विठोबा की नगरी में जाने की सालों पुरानी इच्छा पूरी हो रही है। होटल से सुबह 4.30 बजे ही स्नानादि से निवृत होकर चेकआउट कर दिया है। बस स्टैंड के लिए एक आटो भी मिल गया। सुबह 5 बजे पंढरपुर जाने वाली बस मिल गई है। ये एमएसआरटीसी की 2 बाई 2 बस है। इसमें पंढरपुर का किराया 315 रुपये है। सफर चार घंटे से ज्यादा का हो सकता है। 

कोल्हापुर से पंढरपुर वाया मिरज 190 किलोमीटर के आसपास है। हालांकि कोल्हापुर से पंढरपुर की सीधी बसें ज्यादा नहीं है। पर कोल्हापुर से मिरज और फिर मिरज से पंढरपुर भी जाया जा सकता है।

 कोल्हापुर से मिरज की दूरी 48 किलोमीटर है। रास्ते में शिरोली नामक कस्बा आया। मैं सूरज उगने से पहले मिरज बस स्टैंड में पहुंच गया हूं। यहां पर बस पांच मिनट डिपो में रूकी रही।

शास्त्रीय संगीत का शहर मिरज -  मिरज सांगली जिले का एक शहर है। इस शहर में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा रही है। मिरज सितार के लिए जाना जाता है। यहां सितार, सरोद और तानपुरा का निर्माण होता है। यहां गंधर्व महाविद्यालय का मुख्यालय है। शास्त्रीय संगीत की महान हस्तियां पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर और बाल गंधर्व का संबंध मिरज से है।


बस मिरज से आगे चल पड़ी है। शिरढोण के बाद नागज से बस गुजर रही है। यहां पर पवन ऊर्जा से बिजली बनाने वाले तमाम विंड टरबाइन चलते हुए दिखाई दे रहे हैं।

बस संगोला पहुंची है। यह सोलापुर जिले का कस्बा है। यहां बस स्टैंड में बस तकरीबन दस मिनट रुक रही। इसके बाद चलने के बाद पंढरपुर चलकर ही रूकी। 

पंढरपुर का बस स्टैंड काफी बड़ा है। परिसर में अहिल्याबाई होल्कर और शिवाजी के विशाल चित्र लगे हैं। बस स्टैंड परिसर में जो सुलभ शौचालय का भवन बना है वह तीन मंजिला है जो दूर से कोई विशाल सरकारी दफ्तर या होटल सा नजर आता है।
पंढरपुर यानी बिठोबा की नगर में पंहुच गया हूं। बस स्टैंड से निकलकर एक रेस्टोरेंट में सुबह के नास्ते के लिए बैठ गया। नास्ता करके पैदल मंदिर की तरफ चल पड़ा।


यहां रुक्मिणी के साथ पूजे जाते हैं कृष्ण
महाराष्ट्र के शहर पंढरपुर में विट्ठलस्वामी यानी भगवान कृष्ण का प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर है। पंढरपुर सोलापुर के पास भीमा नदी के तट पर बसा शहर है। इस शहर का एक नाम पंढारी भी है। महाराष्ट्र के लोग इस शहर को भू बैकुंठ मानते हैं। यहां पर भीमा नदी को चंद्रभागा नदी के नाम से भी जाना जाता है। विट्ठल स्वामी को स्थानीय लोग प्यार से बिठोबा और रुक्मिणी को रखुमाई भी कहते हैं। पंढरपुर बस स्टैंड से मंदिर का मार्ग एक किलोमीटर का है। रास्ते में तमाम बड़ी बड़ी धर्मशालाएं बनी हैं।

बिठोबा के मंदिर में दर्शन के लिए सालों भर भीड़ रहती है। तकरीबन 30 घंटे दर्शन  में लग जाते हैं। मंदिर के आसपास क्लॉक रुम बने हैं। यहां आप अपने बैग और जूते आदि जमा करके दर्शन के लिए पंक्ति में लग सकते हैं। बिठोबा के मंदिर में दो तरह के दर्शन है। गर्भ गृह दर्शन के अलावा समय कम हो तो मुख दर्शन भी किया जा सकता है।

मंदिर के गर्भगृह में विट्ठल और रुक्मिणी की प्रतिमाएं है। यह देश का प्रमुख मंदिर है जहां कृष्ण राधा के साथ नहीं बल्कि अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ पूजे जाते हैं। काले पत्थर की बनीं ये मूर्तियां काफी सुंदर हैं। विट्ठल मतलब नटवर नागर कन्हा। मुख्य मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में देवगिरी के यादव शासकों द्वारा कराया गया था। मंदिर का परिसर बहुत विशाल है। इसमें चारों तरफ से चार द्वार बने हैं। मंदिर के निर्माण में पत्थरों का ज्यादा काम हुआ है।

दिन भर में पांच बार पूजा - पंढरपुर के मुख्य मंदिर में बड़वा परिवार के ब्राह्मण पुजारी पूजा-विधी करते हैं। इस पूजा में पांच दैनिक संस्कार होते हैं। सबसे पहले, सुबह लगभग तीन बजे, भगवान को जागृत करने के लिए एक अरती है, जिसे काकड आरती कहा जाता है। इसके बाद पंचामृत पूजा की जाती है। आखिरी पूजा रात्रि दस बजे होती है। इसके बाद भगवान सोने के लिए चले जाते हैं।
विट्ठल स्वामी के मंदिर में संगीत की परंपरा है। मंदिर परिसर में साधक सितार लिए ईश्वर की अराधना में लीन रहते हैं। आते जाते लोग उनके सामने श्रद्धा से सिर झुकाते हैं।

पंढरपुर की यात्रा और वारकरी  - पंढरपुर वारी एक वार्षिक यात्रा है जो हिंदू महीने ज्येष्ठ और आषाढ़ के समय विट्ठल स्वामी मंदिर के लिए निकाली जाती है। इस यात्रा में शामिल होने वाले वारकरी कहलाते हैं। विठोबा के सम्मान में पंढरपुर के लिए तीर्थयात्रियों की यह यात्रा निकलती है। इस यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु पंढरपुर पहुंचते हैं। तब पूरे शहर में श्रद्धालुओं का रेला उमड़ता है।

सभी जातियों के पुजारी - साल 2014 में पंढरपुर के विठ्ठल−रखुमाई मंदिर ने नई मिसाल कायम की। राज्य में ऐसा पहली बार हुआ जबकि इतने बड़े धार्मिक स्थल पर सभी जातियों के पुजारियों की नियुक्ति की गई। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(PANDHARPUR, MIRAJ, SANGLI, BITHOBA TEMPLE ) 

Friday, April 19, 2019

सज्जा कोठी या सदर महल – यहां शिवाजी करते थे गुप्त बैठकें


पन्हाला गढ़ का खास आकर्षण है सज्जा कोठी। वास्तव में इसका निर्माण एक वाच टावर की तरह कराया गया है। पन्हाला गढ़ की यह इमारत वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। इसका लंबाई चौड़ाई 36-36 फीट और ऊंचाई 72 फीट है। ऊपर जाने के लिए बाहर से सीढ़ियां बनी हैं। इसके ऊपरी तल से पन्हाला का सुंदर विस्तार नजर आता है। शिवाजी इसका इस्तेमाल अपनी गुप्त बैठकों के लिए करते थे। 1660 में शिवाजी इसी इमारत से विशालगढ के लिए रवाना हुए थे। यहीं पर शिवाजी ने संभाजी को पन्हाला दुर्ग की जिम्मेवारी सौंपी थी। इसकी ऊंचाई से जोतिबा मंदिर और कोल्हापुर शहर भी नजर आता है। इस इमारत को देखने के लिए हमेशा सैलानियों की भीड़ लगी रहती है।

प्राचीन शिव मंदिर – राजवाड़ा के सामने स्थित शिवमंदिर का निर्माण छत्रपति शाहूजी महाराज ने करवाया था। इस मंदिर के अंदर महारानी ताररानी की चरण पादुका रखी हुई है।

शत्रु संहारक बाघ दरवाजा – पन्हालागढ़ के उत्तरी प्रवेश द्वार का नाम बाघ दरवाजा है। इसकी बनावट ऐसी है कि शत्रु को यहां आसानी से कब्जे में लिया जा सकता है। दरवाजे पर गणेजी की मूर्ति बनी हुई है। यहां तोप रखने की और सैनिकों के विश्राम करने जगह भी बनी हुई है।

दौलती बुर्ज से दूर तक नजर – पन्हाला कोर्ट इमारत के पास दौलती बुर्ज है। इस बुर्ज से 25 मील दूर तक की आवाजाही पर नजर रखी जा सकती है। इसका नाम दौलती बुर्ज यूं पड़ा कि यहां जितने शत्रुओं के टुकड़े किए जाते राज्य की दौलत में उतना ही इजाफा होता था।


तीन दरवाजा या कोंकणी दरवाजा – पन्हाला के पश्चिम की तरह का प्रवेश द्वार तीन दरवाजा है। इसे कोंकणी दरवाजा भी कहते हैं। इसमें पांच मेहराबें और तीन दरवाजे हैं। दरवाजे के मेहराब पर तीन शेरों की आकृति खुदी हुई है। सैनिकों के पानी पीने के लिए यहां एक कुआं बना है जिसका नाम विष्णु तीर्थ है। पन्हाला में आप चार दरवाजा और हरिहरेश्वर विट्ठल मंदिर भी देख सकते हैं।

अंधार बाव मतलब अंधेरी बावड़ी तीन दरवाजा के पास ही दो बावड़ियां हैं जिनके नाम अंधार बाव और श्रंगार बाव है। अंधार बाव मतलब अंधेरी बावड़ी। इसमें तीन मंजिलें पर सामने से एक ही मंजिल नजर आती है। इसके सबसे नीचली मंजिल में कुआं है। बीच की मंजिल से बाहर निकले का एक गुप्त मार्ग है। इस बावड़ी के आसपास नगर परिषद ने सुंदर बागीचा विकसित किया है। इसके आसपास मनोरंजन का पूरा साजो सामान है। कोल्हापुर से काफी लोग पन्हाला पिकनिक मनाने पहुंचते हैं।  



इस बागीचे का पास खाने-पीने की दुकानें हैं। यहां आप ज्वार की रोटी, झुणका भाखरी आदि खा सकते हैं। बच्चों के मनोरंजन के लिए कई तरह खेल तमाशे हैं।
तो चलिए वापस लौट चलते हैं। पन्हाला गढ़ से अगर आप सार्वजनिक वाहन से कोल्हापुर जाना चाहते हैं तो शाम 6.30 बजे के बाद कोई बस या जीप नहीं मिलती है।


कैसे पहुंचे – पन्हालागढ़ की दूरी कोल्हापुर से 24 किलोमीटर है। आप टाउन हाल से जीप से या फिर बस स्टैंड से चलने वाली बसों से यहां पहुंच सकते हैं। या फिर कोल्हापुर आसपास घूमने के लिए दिन भर के लिए टैक्सी आरक्षित कर सकते हैं। अगर आपके पास समय है तो पन्हाला गढ़ में रात्रि विश्राम भी कर सकते हैं। यह एक यादगार अनुभव हो सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  ( SHIVAJI, PANHALA FORT, KOLHAPUR ) 








Wednesday, April 17, 2019

पन्हाला दुर्ग - महाराष्ट्र का अनूठा किला कई मायने मे है खास

जोतिबा मंदिर के दर्शन के करके वापस लौट आया हूं। अब पन्हाला किला जाने की तैयारी है। ज्योतिबा मंदिर से 11 किलोमीटर पहले केरली में मुख्य सड़क पर खड़ा होकर पन्हाला जाने वाली बस का इंतजार कर रहा हूं। पर काफी देर तक कोई बस नहीं आई। कुछ और लोग भी पन्हाला जाना चाहते हैं। थोड़ी देर में एक जीप आई। हम सब उसमें लद गए। वैसे कोल्हापुर से सीधे पन्हाला दुर्ग जाना हो तो दूरी 24 किलोमीटर है।

कोल्‍हापुर के पास स्थित पनहला किला समुद्र तल से 3127 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां के खूबसूरत प्राकृतिक नजारे  लोगों को सालों भर लुभाते हैं। पहाड़ी पर स्थित पन्हाला दुर्ग कई किलोमीटर में विस्तारित है। दुर्ग के दायरे में पूरा शहर बसा हुआ है। इसलिए यहां घूमने के लिए कोई वाहन होना आवश्यक है। पन्हाला में कुछ होटल और रिजार्ट भी हैं, जहां आकर आप ठहर सकते हैं। पनहाला नगर परिषद है। यहां की आबादी 4000 के आसपास है।

पनहाला का तापमान सालों भर मनोरम रहता है। यहां अधिकतम तापमान 34 डिग्री से ऊपर नहीं जाता। मानसून के दौरान यहां खूब बारिश भी होती है। पनहाला के सदाबहार मौसम से आकर्षित होकर फिल्मकार वी शांताराम की अभिनेत्री बेटी राजश्री ने यहां अपना आवास बनवाया था जिसे बाद में होटल में तब्दील कर दिया गया।

पनहाला का इतिहास तीसरी सदी ईस्वी पूर्व से मिलता है। यहां कुछ सातवाहन कालीन अवशेष भी मिलते हैं। यह भी कहा जाता है कि पराशर मुनि ने यहां पर तप किया था।

नाम मिला पन्‍न्‍ना नामक जनजाति के नाम पर पड़ा जो आरंभ में इस किले पर शासन करती थी। इस किले का निर्माण 1052 में राजा भोज ने करवाया था। बाद में शिलहार और यादव वंशों ने भी यहां राज किया। 1209-10 में इस पर देवगिरी के यादवों ने कब्जा किया। आदिलशाही मुस्लिमों के शासन में जब यह दुर्ग आया तो इसका नाम शहानबी दुर्ग रखा गया। वीर मराठा शिवाजी ने 28 नवंबर 1659 में इस स्‍थान को आदिल शाह से जीत कर अपने कब्जे में लिया। शिवाजी के समय इसका नाम पन्हाला दुर्ग रखा गया। यह दुर्ग 1701 में औरंगजेब के कब्जे में भी आया। महारानी ताराबाई ने 1705 में पनहाला को अपनी राजधानी बनाई। यहां से 1782 तक राजधानी का कामकाज चलता रहा।  

शिवाजी के शासन काल में पन्हाला दुर्ग चर्चा में रहा। शिवाजी ने इसके कई गढ़ और बुर्ज की मरम्मत कराई। 2 मार्च 1660 को शिवाजी पन्हालागढ़ आए। इसके बाद सिद्दी जौहर ने फौज के साथ पन्हाला गढ़ को घेर लिया। कई महीने तक घेराबंदी कायम रही। जब रशद खत्म होने लगा तो शिवाजी सिद्दी जौहर की फौज को चकमा देकर यहां से विशालगढ़ किले के लिए रवाना हो गए। शिवाजी के हमशक्ल शिवा कासीद को यहां शहीद होना पड़ा।



पन्हाला गढ़  में क्या क्या देखें-

अंबर खाना यानी विशाल अनाज गोदाम – पन्हाला गढ़ में प्रवेश करने के साथ ही आप सबसे पहले अंबर खाना या बाले किला को देखते हैं। यहां खजाना और शस्त्रागार को कड़ी निगरानी में रखा जाता था। इसका निर्माण 1052 में राजा भोज ने करवाया था। यहां कुल तीन गोदाम बने हैं। 

एक का इस्तेमाल अनाज रखने  के लिए होता था। इनके नाम क्रमशः गंगा, यमुना और सरस्वती दिए गए थे। इनमें चावल, रागी, करई आदि का संग्रह किया जाता था। इन गोदामो की दीवारें काफी मजबूत और मोटी हैं। जब सिद्दी जौहर ने किले के चारों तरफ घेरा डाला तो इस अन्न भंडार से ही फौज और हाथी घोड़ों के लिए रसद का इंतजाम किया गया। यहां पास में एक चांदी की टकसाल भी हुआ करती थी। अंबर खाना इमारत के आसपास 1982 में आई फिल्म मासूम की शूटिंग हुई थी।


छत्रपति ताराराणी राजवाड़ा – इसका निर्माण 1708 में तारारानी ने करवाया था।  समान्य सी दिखने वाली इमरात से 74 साल तक राजधानी का संचालन किया गया। अब इस भवन में सरकारी दफ्तर का संचालन हो रहा है। इसके अलावा आप पन्हालागढ़ में सज्जा कोठी, बाघ दरवाजा, तीन दरवाजा, चार दरवाजा, दौलती बुर्ज, अंधेरी बावड़ी आदि भी देख सकते हैं। तो इनकी बात करेंगे अगली पोस्ट में...

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com  (PANHALA FORT ) 



Monday, April 15, 2019

जोतिबा मंदिर – हर दिन यहां गुलाल खेला जाता है...


कोल्हापुर के टाउन हॉल से जोतिबा मंदिर जाने के लिए शेयरिंग टैक्सी और बसें मिलती हैं। बसें बस स्टैंड से भी मिल जाती हैं। कोल्हापुर शहर पंचगंगा नदी के तट पर बसा है। रास्ते में नदी पर बना सुंदर घाट नजर आता है। नदी के पुराने पुल को पार कर गाड़ी हरे भरे रास्ते से आगे बढ़ रही है। कोल्हापुर शहर से जोतिबा मंदिर की दूरी 25 किलोमीटर के करीब है। जोतिबा का मंदिर पहाड़ी पर स्थित है। बस स्टैंड से आपको आधे किलोमीटर पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचना पड़ता है। 

जोतिबा कोल्‍हापुर के उत्‍तर में पहाड़ों से घिरा एक खूबसूरत मंदिर है। इस मंदिर की मान्यता स्थानीय लोगों में ज्योतिर्लिंग के समान है। लोग इसे केदारलिंगम कहते हैं। इसके दर्शन से केदारनाथ के दर्शन का पुण्य मिलता है। मंदिर परिसर में शिव के तीन मंदिर हैं। श्रद्धालु तीनो के दर्शन करते हैं। ये तीनों शिव के रूप सत,रज और तम के प्रतीक हैं। इन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप भी माना जाता है। मंदिर में विवाह के बाद दुल्हादुल्हन आशीर्वाद लेने आते हैं। आसपास के श्रद्धालु लोग ढोल बाजा के साथ समूह में मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

मंदिर में जोतिबा को गुलाल चढ़ाने की पंरपरा है। इसलिए पूरा मंदिर सालों भर गुलाबी रंग के गुलाल से रंगा नजर आता है। मंदिर के आसपास सुंदर सा बाजार और बड़ी संख्या में प्रसाद की दुकाने हैं। बाजार से होकर सीढ़ियां उतरने के बाद आप मंदिर के प्रांगण में पहुंच जाते हैं।

जोतिबा मंदिर का निर्माण 1730 में नवाजीसवा ने करवाया था। पूरा मंदिर काले रंग के पत्थरों से बना हुआ है। मंदिर के दीवारों पर सुंदर नक्काशी देखी जा सकती है। प्रवेश द्वारा पर विशाल नंदी की प्रतिमा है। जोतिबा मंदिर का वास्‍तु प्राचीन शैली का है। यहां स्‍थापित जोतिबा की प्रतिमा चारभुजा धारी है। स्थानीय लोगों में माना जाता है कि जोतिबा भैरव का पुनर्जन्‍म था। उन्‍होंने रत्‍नासुर से लड़ाई में महालक्ष्‍मी का साथ दिया था। रत्‍नासुन के नाम पर ही इस गांव का नाम रत्‍नागिरी पड़ा। बाद में गांव वालों ने इसका नाम जोतिबा रख दिया।

आसपास के लोग जोतिबा मंदिर में पुत्र या पुत्री की कामना लेकर आते हैं। कहा जाता है उनकी कामना पूरी भी होती है। आसपास के काफी लोग तो हर साल जोतिबा के दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर में दर्शन के लिए रोज काफी भीड़ उमड़ती है। दर्शन में कम से कम दो घंटे का समय लग जाता है।
जोतिबा के मंदिर में चैत्र पूर्णिमा के अवसर पर यहां भव्‍य मेले का आयोजन किया जाता है। उस समय गुलाब उड़ाकर भक्‍त अपनी श्रद्धा का परिचय देते हैं। उस समय तो पूरा पहाड़ भी मानो गुलाबी रंग में रंग जाते हैं।

जोतिबा मंदिर के निर्माण में ग्वालियर के सिंधिया राजघराने का भी योगदान है। मंदिर परिसर में उनके द्वारा बनवाई गई एक बावड़ी है। यहां पर ग्वालियर स्टेट का बोर्ड भी लगा हुआ है। 

मंदिर खुलने का समय -  जोतिबा का मंदिर सुबह 5.30 बजे खुल जाता है। इसके बाद यह रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। मंदिर की व्यवस्था देवस्थान व्यस्थापन समिति वाडी रत्नागिरी देखता है। मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं के रहने के लिए होटल और धर्मशालाएं उपलब्ध हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य Email- vidyutp@gmail.com
( JOTIBA MANDIR, KEDAR LING, SHIVA TEMPLE, KOLHAPUR ) 


Saturday, April 13, 2019

रंकाला झील की शाम, कोल्हापुरी चप्पल और रंग-बिरंगा कोल्हापुरी फेटा


कोल्हापुर की बात हो और कोल्हापुरी चप्पल और कोल्हापुर फेटे की बात न हो तो चर्चा अधूरी रहेगी। कोल्हापुरी फेटा मतलब पगड़ी। वैसे तो महाराष्ट्र में शादी-विवाह के मौकों पर फेटा बांधने का चलन है। पर कोल्हापुरी फेटे की अपनी शान है। कोल्हापुर शहर में फेटे की कई दुकाने हैं। यहां पर आप तमाम डिजाइन के फेटे 200 से लेकर हजारों रुपये तक के रेंज में खरीद सकते हैं। कोल्हापुरी फेटा फूलदार होता है। इसमें राजस्थान के बांधनी जैसा प्रभाव होता है। इसके बांधने का अपना अलग तरीका होता है। कोल्हापुर के बाजार से फेटा खरीदकर ले जा सकते हैं।


कोल्हापुरी चप्पलों की शान – ये शहर जाना जाता है देश भर में कोल्हापुरी चप्पलों के लिए। लेदर के बने हल्के चप्पल और जूतियां। नगर निगम के पास कोल्हापुरी चप्पलों का बाजार है। यहां पर चप्पलों की कई सौ दुकाने हैं। पीले रंग के हल्के कोल्हापुरी चप्पल पूरे देश में अपनी पहचान रखते हैं। वैसे तो कोल्हापुरी चप्पल 250 रुपये से मिलना आरंभ हो जाता है। पर हाथ की कारीगरी वाले अच्छे कोल्हापुरी चप्पल की कीमत 450 रुपये से आरंभ होती है। यहां आप कोल्हापुरी चप्पल फुटपाथ के दुकानदार से लेकर बड़े शोरूम से खरीद सकते हैं।
 कोल्हापुरी चप्पल अपनी सुंदर कढ़ाई के लिए जाने जाते हैं। इसमें चमड़े की रंगाई के लिए वनस्पति रंगों का इस्तेमाल होता है। चमड़े में डाई का काम स्थानीय स्तर पर होता है। कोल्हापुरी चप्पलों के निर्माण में बेहतर कढ़ाई का काम हाथ से ही हो पाता है। पर आजकल मशीनें तेजी से चप्पल बनाने लगी हैं। काफी लोग यहां से 10 रुपये में छोटा नजरिया चप्पल भी खरीदते हैं। घर के बाहर लगाने के लिए बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला...


साठ के दशक में दुनिया में आए हिप्पी मूवमेंट ने कोल्हापुरी चप्पलों को अमेरिका में खूब लोकप्रिय बनाया।

रंकाला लेक पर एक शाम –
महालक्ष्‍मी मंदिर के पश्चिम में स्थित रंकाला झील यहां के स्‍थानीय लोगों के साथ-साथ सैलानियों के बीच भी लोकप्रिय है। कहा जाता है कि झील का सौंदर्यीकरण महाराजा छत्रपति शाहू जी ने करवाया था। इसकी चौपाटी पर कुछ सुंदर मीनारें बनी हैं। यह तथ्य मिलता है कि नौवीं शताब्दी में आए एक भूकंप के बाद यहां पानी का सोता निकल आया और यहां एक विशाल झील बन गई। 

कहा जाता है कि झील के बीचों बीच रणक भैरव का मंदिर था जो भूकंप के दौरान अंदर समा गया। इसी रणक भैरव के नाम पर झील को रंकाला कहा जाने लगा। झील का विस्तार साढ़े चार मील में है। इसका कैचमेंट एरिया 700 हेक्टेयर में है। झील की अधिकतम गहराई 15 मीटर तक है।

झील के आसपास चौपाटी और और उद्यान भी बना हुआ है। खास तौर पर रंकाला झील के दो तरफ विशाल चौपाटी बनी है। इस पर सुबह और शाम को लोग टहलते नजर आते हैं। चौपाटी के आसपास का इलाका स्ट्रीट फूड से गुलजार रहता है। मैं देर रात गए रंकाला लेक पर पहुंचा हूं। अंधेरे में झील का विस्तार ठीक से नजर नहीं आ रहा है। पर चौपाटी की पीली रोशनी में युवा दिल धड़क रहे हैं।

झील से लगता हुआ पद्मराजे उद्यान बना हुआ है। झील की चौपाटी पर बैठने के लिए बेंच बनी हुई है। रंकाला झील में दिन में बोटिंग भी की जा सकती है। पर झील का पानी ज्यादा साफ नहीं है। लोगों द्वारा कचरा फेंके जाने के कारण झील के कई हिस्सों में गंदगी नजर आती है। हम शहरों में ऐसी अमूल्य धरोहर को लेकर कब जागरूक होंगे। उदयपुर झील की तरह रंकाला में भी सफाई अभियान चलाने की जरूरत है। तमाम सैलानियों को शिकायत है कि झील की और आसपास के इलाके की सफाई की जरूरत है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
( KOLHAPURI CHAPPAL, FETA, RANKALA LAKE EVE ) 

  

Thursday, April 11, 2019

कोल्हापुरी स्वाद के क्या कहने...पालक रोटी, चाय और मटन


महाराष्ट्र का कोल्हापुर शहर अपने स्वाद के लिए जाना जाता है। यहां लोग व्यवहार में मीठे हैं तो खानेपीने में कोल्हापुरी स्वाद की अपनी पहचाना है। चाहे शाकाहारी व्यंजन की बात हो या फिर मांसाहारी कोल्हापुर स्टाइल अलग होता है। इसलिए जब भी महाराष्ट्रियन फूड की बात चलती है कोल्हापुर का नाम सबसे पहले आता है।

सुबह के नास्ते में पालक रोटी – सुबह सुबह कोल्हापुर की सड़क पर महालक्ष्मी मंदिर से ठीक पहले फुटपाथ पर कई औरतें नास्ते स्टाल लगाए ग्राहकों का इंतजार कर रही थीं। पूछने पर बताया कि वे पालक रोटी बना रही हैं। तीस रुपये में एक प्लेट। आटे में पालक के साथ नमक और कुछ मसाले मिलाए गए हैं जो रोटी के स्वाद को काफी जायकेदार बना देते हैं। इसके साथ तीन तरह की चटनी और सलाद। सुबह का इससे बढ़िया नास्ता और क्या हो सकता है। तो सुबह सुबह हमने पालक रोटी खाई। 


कोल्हापुरी मटन और नारियल की चटनी  – तो बात करें कोल्हापुर मटन की। जो लोग मांसाहार करते हैं उनके बीच कोल्हापुर मटन काफी लोकप्रिय है। खास तौर लोग यहां पर मटन की थाली आर्डर करते हैं। इसमें मटन के के साथ नारियल का बना तांबड़ा पांढरा रस्सा पेश किया जाता है।यह कोल्हापुर की खासियत है। नारियल का यह रस्सा खाने की प्लेट को खास बनाता है। इसके अलावा कोल्हापुर की मटन गोली बिरयानी भी काफी प्रसिद्ध है। कोल्हापुर के रेस्टोरेंट के आगे बोर्ड लगा मिलता है- जेवण तैयार आहे.. मतलब खाना तैयार है। और लिखा मिलता है – घरगुती जेवण... मतलब घर जैसा भोजन। 

मुझे रास्ते में एक टैक्सी ड्राईवर बताते हैं कि कोल्हापुर के रेस्टोरेंट वाले खाने को इतना पवित्रता और सफाई से तैयार करते हैं कि यहां खाकर आपका पेट नहीं खराब होगा। हां कोल्हापुर के खाने को खास बनाते हैं यहां के कोल्हापुरी मसाले। कोल्हापुर का गरम मसाला हो या दूसरे मसाले इनका बनाने का अपना अलग तरीका है। तो लब्बोलुआब यह है कि आप अगर चिकेन मटन खाने के शौकीन हैं तो कोल्हापुर आपको खूब पसंद आएगा। बड़े रेस्टोरेंट से लेकर स्ट्रीट फूड तक हर तरह के खाने के स्वाद ले सकते हैं। आपकी जेब अनुकूल काफी कुछ है यहां।

महाराष्ट्र के दूसरे शहरों में कोल्हापुरी स्वाद के नाम पर रेस्टोरेंट का संचालन होता है। अगर आप शाकाहारी हैं तो भी कोल्हापुर में तमाम रेस्टोरेंट आपका स्वागत करने को तैयार हैं। यहां भोजनालय के लिए खानवाल शब्द चलता है मराठी में। महालक्ष्मी मंदिर के पास निर्मल साई खानवाल में 55 रुपये की थाली है। इस थाली में भाकरी, ताक (छाछ) , चपाती, भाजी, खर्डा, भात, वरण, आमटी आदि मिलता है। कई होटलों पर बोर्ड लगा है – अस्सल कोल्हापुरी स्वाद। रसोई घर के लिए बोर्ड लगा है – जेवण विभाग।

कोल्हापुर की चाय – बिंदू चौक से महालक्ष्मी मंदिर जाने के रास्ते में एक पढे लिखे नौजवान चाय की दुकान लगाए खड़े हैं। वे 10 रुपये में एक कप चाय दे रहे हैं। पर उनकी चाय खास है। इसमें वे 10 तरह की जड़ी बूटियां मिलाते हैं। सारी जड़ी बूटियां उन्होने सजा रखी हैं। उन्हें खल में कूटकर चाय में मिला रहे हैं। हालांकि मैं चाय कम पीता हूं, पर ऐसी चाय पीने के लिए तो एक बार रुक ही गया।

येवले अमृततुल्य चहा... कोल्हापुर में बिंदू चौक पर येवले चहा की ब्रांडेड दुकान दिखी। चाय 10 रुपये की है। पर इंपोरियम की तरह साफ सुथरी विशाल दुकान है। इनकी ब्रांच कई और शहरों में खुल चुकी है। सभी जगहों पर एक जैसी चाय के स्वाद का दावा करते हैं। उनका दावा है कि वे फिल्टर पानी का इस्तेमाल करते हैं। सर्वोत्तम क्वालिटी की चाय पत्ती की चाय लोगों को पिलाते हैं।

दाबेली का स्वाद - कोल्हापुर के रंकाला लेक के पास रात को स्ट्रीट फूड की लंबी चौड़ी दुकाने सजती है। पावभाजी, चाउमीन से लेकर काफी कुछ। पर मुझे यहां पसंद आई दाबेली। दाबेली पाव है पर इसमें भाजी या बड़ा की जगह चटनी सेव और मसाले भरे जाते हैं।

देर रात गए कोल्हापुर के बाजार में मैं एक आईसक्रीम और जूस की दुकान में पहुंच गया हूं। इंपिरियल कोल्ड ड्रिंक हाउस। यह 1910 में स्थापित जूस की दुकान है। यहां पर आप आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक और अलग अलग तरह के जूस का स्वाद ले सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(KOLHAPUR FOOD, TEA, NON VEG FOOD, PALAK ROTI ) 

Tuesday, April 9, 2019

बाबू राव पेंटर और वी शांताराम का कोल्हापुर

कोल्हापुर शहर के बीचों बीच टाउन हाल स्थित है। टाउन हॉल के बाहर सुंदर पार्क है। टाउन हॉल की इमारत में एक छोटा सा पर सुंदर और जानकारी परक संग्रहालय है। इस संग्रहालय का प्रबंधन महाराष्ट्र सरकार करती है। इस संग्रहालय का प्रवेश टिकट महज 3 रुपये है। पर इसके आंतरिक हिस्सों में फोटोग्राफी की अनुमति नहीं है। हालांकि बदलते वक्त में इसकी अनुमति दी जानी चाहिए।


कोल्‍हापुर शहर के बीचों बीच स्थित टाउन हॉल की इमारत का निर्माण 1872-1876 के बीच किया गया था। टाउन हॉल के अंदर स्थित संग्रहालय में कई ऐतिहासिक चीजें देखी जा सकती हैं। संग्रहालय में ब्रह्मपुरी से लाई गई वस्‍तुएं, प्राचीन मूर्तियां, सुप्रसिद्ध चित्रकारों द्वारा बनाए गए चित्र, कलाकृतियां, प्राचीन सिक्‍के, कढ़ाई किए गए सामान, वस्‍त्र, तलवारें, बंदूक आदि रखे गए हैं। संग्रहालय में कुल सात गैलरियां हैं।

कभी रोम से होता था व्यापार -  टाउन हॉल परिसर में सरकारी कार्यालय, कोर्ट, सरकारी अस्‍पताल, टेलीफोन विभाग का कार्यालय हैं। इसलिए यहां आसपास में हमेशा भीड़ भाड़ रहती है। यहां के उद्यान में विशाल फव्‍वारा और एक महादेव का मंदिर भी है।
संग्राहलय के अंदर घूमते हुए ये जानकारी मिलती है कि  कभी कोल्हापुर का रोम के साथ भी व्यापार होता था। संग्रहालय में खास तौर पर बरतनों का संग्रह है जिसमें आप  1100 से 1500 ई के बीच के कई बरतन देख सकते हैं। यहां हथियारों का भी बेहतरीन संग्रह है। 


बाबू राव पेंटर की कलाकृतियां -  कोल्हापुर के टाउन हॉल संग्रहालय की सबसे महत्वपूर्ण दीर्घा है पेंटिंग की। यहां पर कई शानदार तैल चित्र देख सकते हैं। इस दीर्घा बाबूराव पेंटर के बनाए चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। बाबू राव पेंटर का समय 1890–1954 का है। उनका मूल नाम बाबूराव मिस्त्री था। कोल्हापुर में 3 जून 1890 को जन्में बाबू राव पेंटर बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे अपने भाई आनंदराव पेंटर के साथ पारसी थियेटर के लिए बैकड्रॉप पेंटिंग बनाया करते थे। सन 1919 में बाबू राव पेंटर ने महाराष्ट्र फिल्म कंपनी बनाई और 1920 में अपनी पहली फिल्म हिंदी सैरंध्री बनाई। बाबूराव पेंटर अपनी फिल्मों के स्क्रीन प्ले खुद लिखते थे। बाबूराव पेंटर फिल्मों की दुनिया के साथ साथ पेंटिंग में भी खूब सक्रिय रहे। उन्हें हिंदी सिनेमा में वी शांताराम को ब्रेक देने का श्रेय जाता है। वी शांताराम का जन्म भी 18 नवंबर 1901 में कोल्हापुर में ही हुआ था। 16 जनवरी 1954 को बाबू राव पेंटर का निधन कोल्हापुर में ही हो गया।

टाउन हाल संग्रहालय में बाला गजबरे के बनाए चित्र भी देखे जा सकते हैं। संग्रहालय की मूर्ति दीर्घा में कई ऐतिहासिक मूर्तियां देखी जा सकती हैं। कुछ मूर्तियां टाउन हॉल के बाहर लॉन में भी रखी हुई हैं। टाउन हॉल के परिसर में शिवाजी की 1927 में स्थापित प्रतिमा देखी जा सकती है। परिसर में 1904 का बना हुआ एक ग्लास हाउस भी है।    



कोल्हापुर शहर का जो पुराना किला हुआ करता था उसमें अब राजाराम कालेज है। वहीं कोल्हापुर में छत्रपति शाहू जी महाराज के नाम पर विश्वविद्यालय की भी स्थापना की गई है। हालांकि यूपी के कानपुर विश्वविद्यालय के नाम में भी मायावती के शासन में छत्रपति शाहूजी महाराज का नाम जोड़ दिया गया है।


खुलने का समय - टाउन हॉल संग्रहालय सुबह 10.30 से शाम 5.30 तक खुला रहता है। यह सोमवार को बंद रहता है। पहले बता चुका हूं कि टिकट सिर्फ 3 रुपये का है। शहर  के बीचों बीच स्थित टाउन हॉल कोल्हापुर के किसी भी इलाके से आसानी से पहुंचा जा सकता है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( KOLHAPUR, CHATRAPATI SHAHUJI MHARAJ MUSEUM, TOWN HALL)