Tuesday, September 22, 2020

पलाश के फूलों संग ऊर्जांचल में रेल से गुजरते हुए


मामी के गांव महुआवं में रहते हुए अगले दिन हमने तय किया कि हमलोग रेलगाड़ी से शक्तिनगर जाएंगे। रॉबर्ट्सगंज शहर का नाम अंग्रेज अफसर फ्रेड्रिक रॉबर्ट के नाम पर पड़ा है। इसी नाम से रेलवे स्टेशन का भी नाम राबर्ट्सगंज पड़ गया। कभी यह मिर्जापुर जिले का हिस्सा हुआ करता था। पर अब स्वतंत्र जिला है। यह प्रदेश का एक मात्र ऐसा जिला है जिसकी सीमाएं चार राज्यों को स्पर्श करती हैं। जी बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश। सन 2020 में राबर्ट्सगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर सोनभद्र कर दिया गया है। इसका स्टेशन कोड हो गया है एसबीडीआर।

वाराणसी से चुनार होकर ट्रेन राबर्ट्सगंज पहुंचती है। यहां हमलोग शक्तिनगर की ओर जाने वाली ट्रेन मे सवार हुए। ये पैसेंजर ट्रेन है जो सभी स्टेशनों पर रुकती हुई जाएगी।  अगला स्टेशन आया चुर्क। चुर्क में सीमेंट फैक्टरी है। सोनभद्र जिला जंगल और पर्वतों से आच्छादित है। भौगोलिक क्षेत्र की बात करें तो यह लखीमपुर खीरी के बाद यूपी का सबसे बड़ा जिला है।  इसके बाद का स्टेशन है अगोरी खास । हमारी ट्रेन अब चोपन पर पहुंच गई है। चोपन सोनभद्र जिले का बड़ा शहर है। पर चोपन के बाद छह किलोमीटर ही चलने पर एक और स्टेशन आया बिल्ली जंक्शन।

जी हां स्टेशन का नाम है बिल्ली। नाम सुनकर हंसी आती है। पर भारतीय रेलवे में कई ऐसे स्टेशनों के नाम बड़े रोचक हैं।  बिल्ली जंक्शन है, क्योंकि यहां से एक लाइन रेनुकूट होते  हुए झारखंड के डाल्टेनगंज की तरफ चली जाती है। बिल्ली जंक्शन का स्टेशन कोड है बीएक्सएलएल। सन 1994 में एक बार फिर मैं बनारस से बिल्ली जंक्शन होता हुआ रेनुकूट पहुंचा था सदभावना रेल यात्रा के संग। 

पर अभी हम शक्तिनगर की ओर जा रहे हैं तो अगला स्टेशन है ओबरा डैम। यहां पर ओबरा थर्मल पावर स्टेशन है। यहां रेणुका नदी पर बांध बनाकर ओबरा थर्मल पावर स्टेशन का निर्माण किया गया है। यह उत्तर प्रदेश सरकार का अधीन आता है। ओबरा एक औद्योगिक शहर है। यहां पावर प्लांट के अलावा सीमेंट फैक्टरी भी है।

इसके बाद हमारी ट्रेन फाफराकुंड, मगरदहा, खुलदिल रोड से आगे बढ़ती हुई एक और स्टेशन पर रुकी। इस स्टेशन का नाम है मिर्चा धूरी। जी हां बिल्ली के बाद मिर्चा नामक स्टेशन।

मिर्चा और करैला रेलवे स्टेशन - ये पूरा सफर बड़ा मनोरम है। रेल पटरियों के दोनों तरफ हरे भरे जंगल हैं, जिनमें पलाश के पेड़ों पर लाल फूल खिले हुए हैं। तो लिजिए मिर्चा के बाद आठ किलोमीटर चलने पर आ गई एक और सब्जी करैला। जी हां स्टेशन का नाम है करैला रोड।  



करैला रोड जंक्शन से अब एक लाइन सिंगरौली होकर कटनी चली जाती है। जब हम सफर कर रहे थे तब यह लाइन नहीं बनी थी। पर अब करैला जंक्शन बन चुका है। करैला से 11 किलोमीटर के सफर के बाद हमलोग पहुंच चुके हैं अनपरा। अनपरा में भी विशाल थर्मल पावर स्टेशन है। यह रिहंद नदी पर जलाशय का निर्माण करके बनाया गया है। ओबरा, अनपरा, शक्तिनगर के कारण ही इस क्षेत्र को ऊर्जांचल कहते हैं। इस क्षेत्र में कोयले का भी प्रचूर मात्रा में उत्पादन होता है। यहां से बनने वाली बिजली काफी दूर तक जाती है। अकेले अनपरा की क्षमता 2630 मेगावाट बिजली उत्पादन की है।

अगला स्टेशन है कृष्णशिला। इसके बाद हमलोग पहुंच गए हैं शक्तिनगर टर्मिनल। यह आखिरी रेलवे स्टेशन है। यहां उतर कर ऐसा लगा मानो किसी सपनों की नगरी में आ गए हों। शक्तिनगर में एनटीपीसी का थर्मल पावर स्टेशन है। यह देश में एनटीपीसी द्वारा स्थापित पहला पावर प्लांट है। शक्तिनगर में एनटीपीसी की विशाल स्टाफ कालोनी बनी हुई है। यह किसी बड़े सुंदर व्यवस्थित नगर सा नजर आता है। हरे-भरे पार्क, केंद्रीय विद्यालय आदि सब कुछ यहां पर है। शाम हो गई तो तो शक्तिनगर में ही हमलोग अशोक भाई के एक मामाजी के घर जाकर रुके। उनके बेटे का नाम योगेंद्र है।

अगले दिन शक्तिनगर से हमलोग अमलोरी के लिए चले। शक्तिनगर उत्तर प्रदेश में है पर अमलोरी कोलफील्ड मध्य प्रदेश में। यह एनसीएल की खुली हुई कोयले की खान है।
इसके आसपास जयंत, बीना, निगाही जैसी और कई कोयले की खान हैं। अमलोरी में काशीनाथ भैया के से मुलाकात तो हुई ही हमें खुली हुई कोयले की खान देखने का भी मौका मिला। तो ये यात्रा बड़ी सार्थक रही। हमारी वापसी भी इसी रेल मार्ग से हुई। वापसी में ट्रेन से सीधा बनारस चला आया जबकि अशोक सोनभद्र में ही उतर गए।
-     --    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(( SONBHADRA, CHOPAN, BILLI JN, MIRCHA DHURA, OBRA, ANPRA, SHAKTINAGAR, AMLORI ) 

Sunday, September 20, 2020

सोनभद्र जिले मे मामी जी के गांव में


कुछ यात्राएं ऐसी होती हैं जो सालों नहीं भूलतीं। ये यात्रा मेरे बनारस में पढ़ाई के दिनों की है। वैसे तो मेरा घर रोहतास जिले में और ननिहाल भोजपुर जिले में हैं। पर मेरे एक तिहाई ननिहाल उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में है। दरअसल मेरे स्वर्गीय मामा लक्ष्मण सिंह जी का परिवार सोनभद्र जिले में राबर्ट्सगंज के पास ग्राम महुआवं में रहता है। इस मामाजी के परिवार से नानी के यहां शादी विवाह समारोहों में ही मिलना होता था। 

बनारस में सन 1990 से 1995 तक पांच साल की पढ़ाई के दौरान मेरी बार बार इच्छा होती लक्ष्मण मामा के परिवार के लोगों से मिलने की। मुझे लक्ष्मण मामा की धुंधली सी याद है। सन 1977 के आसपास की बात होगी। मेरे नाना जी रामगहन सिंह का निधन हो गया था। मैं मां के साथ कुसुम्ही अपने ननिहाल गया था। ननिहाल के दलान पर रहंट चल रहा था। लक्ष्मण मामा के बच्चे अशोक, मनोज, सुमिता दीदी रहंट के पानी में झूम झूम कर नहा रहे थे। मुझे नहाने से डर लगता था बचपन में । तो मैं रहट के पास मचान पर चढ़कर बैठ गया था नहाने से बचने के लिए। तभी लक्ष्मण मामा आए – बोले आओ तुम्हें भी साबुन लगाकर नहला दूं। मैं ना-ना करता रहा पर मेरी एक नहीं चली। इसके कुछ साल बाद लक्ष्मण मामा नहीं रहे। वे बरौनी थर्मल पावर स्टेशन में कार्यरत थे। पक्की सरकारी नौकरी थी। पर एक दिन घर में कपड़े टांगते हुए बिजली का करंट आ जाने से वे चल बसे। परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। कुछ साल बाद मामी ने अपने बच्चों के साथ कुसुम्ही छोड़कर अपने भाई के पास महुआवं जिला सोनभद्र में रहना तय किया। बाद में यहीं पर उन्होंने खेतीबाड़ी की जमीन खरीदकर स्थायी निवास बना लिया।  


एक बार इच्छा हुई राबर्ट्सगंज जाने की। एक सुबह काशी हिंदू विश्वविद्यालय से निकला। रामनगर में पीपा के पुल से गंगाजी को पार किया। वही रामनगर जहां काशी नरेश का किला है। बचपन में हम एक कविता गाते थे –
रामनगर से राजा आवे,
 श्यामनगर से रानी।
रानी रोटी सेंक रही 
राजा भरते पानी ।
बनारस से चलकर राबर्ट्सगंज की तरफ जाने वाली सारी बसें रामनगर होकर ही जाती हैं। तो मैं रामनगर चौराहे पर था। नानी ने बता रखा था कि महुआवं जाने के लिए राबर्ट्सगंज बाजार से कुछ किलोमीटर पहले तेंदु पुल पर उतर जाना है। मैंने बस कंडक्टर को बता दिया तेंदु पुल तक का टिकट दे दो। नारायणपुर, अहरौरा, मधुपुर के बाद तेंदु पुल पर मैं दोपहर से पहले उतर गया। तेंदु पुल बभनौली गांव के पास है। जैसा कि नानी ने बताया था कि नहर पकड़कर पैदल ही पूरब की तरफ चलना है। तो मैं चलने लगा। लोगों से शांगो गांव के बारे में पूछा। जवाब के बदले सवाल आया – किसके घर जाना है। मैंने बोला विद्यासागर सिंह। तो गांव में हर किसी को आसपास के गांव के लोग भी जानते हैं। और विद्यासागर सिंह तो शांगो गांव ( पोस्ट – तेंदु ) के बड़े किसान हैं। उन्होंने रास्ता बता दिया। मैं दोपहर से पहले विद्यासागर सिंह के घर पहुंच गया। न उनसे मैं पहले कभी मिला था न वे मुझे पहचानते थे। मैंने अपना परिचय दिया कि मैं अशोक के फूफा का बेटा हूं। बनारस में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ता हूं। दरअसल अशोक का गांव महुआवं शांगो से भी थोड़ा आगे है। तो मां ने कहा था कि अगर जाना हो तो पहले शांगो विद्यासागर सिंह के यहां चले जाना वे लोग तुम्हें मामी के पास पहुंचा देंगे। तो श्री विद्यासागर सिंह मेरे मामा के साले हैं तो मेरे भी मामा हुए। मेरा परिचय जानकर वे प्रसन्न हुए। घर में मेरा स्वागत सत्कार हुआ।


दोपहर का खाना जिसमें चावल, दाल सब्जी के साथ घर की बनी शानदार दही थी, खाकर मैं तृप्त हो गया। मामा ने बताया कि थोड़ी देर में अशोक यहीं आने वाले हैं। तो आप आराम किजिए। मामा जी का घर दो मंजिला है। मैं छत पर एक कमरे में सो गया। शाम को नींद खुली तो अशोक आ चुके थे। उनके साथ हमलोग चल पड़े महुआवं। वहां मामी से मुलाकात हुई कोई दो दशक बाद। उन्होंने मुझे छुटपन में देखा था, अब मैं स्नातक कक्षा में पढ़ रहा था। मामी पर भी उम्र का असर दिखने लगा था। पर वे मिलकर बड़ी भावुक हो गईं। रात को हम वहीं रुके। महुआंव गांव में ही। महुआवं एक छोटा सा गांव है जो कैथी पोस्ट ऑफिस के तहत आता है।

वैसे अगर सीधे महुआवं गांव आना हो तो राबर्टसगंज से पहले हिंदुआरी में उतरकर आने का रास्ता सुगम है। अगले दिन अशोक भाई के साथ तय हुआ कि समय है तो हमलोग शक्तिनगर से आगे अमलोरी कोल फील्ड्स में चलेंगे जहां सबसे बड़े भैया काशीनाथ यानी सतीश कुमार सिंह कार्यरत हैं। तो हमलोग अगली दोपहर चल पड़े हैं शक्तिनगर के लिए। महुआवं से पैदल चलकर हिंदुआरी पहुंचे। वहां से बस से राबर्ट्सगंज बाजार में। वहां जाकर हमें अशोक के दूसरे नंबर के मामा रामलायक सिंह के घर रुके। इन मामा का पुकार का नाम जज है। वे जज तो नहीं बने पर वे आढ़ती का काम करते हैं। राबर्टसगंज में रेलवे क्रॉसिंग के पास जोगिया बाबा के पास उनका घर है। अगले दिन हमारा कार्यक्रम शक्तिनगर जाने का है। पर अब बस। उस यात्रा का बातें आगे करेंगे।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-         ( RAMNAGAR, AHRAURA, MADHUPUR, TENDU PUL, SHANGO, MAHUAON, KAITHI, HINDUWARI, ROBERTSGANJ, COLORS OF BANARAS )

Friday, September 18, 2020

हीरामन और कमली आए हमारे गांव

भाई का नाम था हीरामन और बहन का कमली। उनके माता-पिता हमारे खेतों में धान और गेहूं काटने और बोझा ढोने का काम करते। इस दौरान हीरामन और कमली खेतों में गिरी हुई बालियां चुनते। दिन भर में बालियां चुनकर अपने खाने के लिए कुछ अनाज जुटा लेते।

हीरामन और कमली अपने माता पिता के साथ हमारे घर आए थे। कहां से आए थे। पलामू जिले के किसी गांव से। हमारे गांव के सीवान से वे लोग काम की तलाश में चलते जा रहे थे। दादा जी से बात हुई और उन्हें रोक लिया गया। इसके बाद वे कई महीने हमारे साथ ही रहे।

कुछ यूं होता था कि हर साल धान और गेहूं काटने के समय कटनिहार हमारे यहां पलामू जिले से ही आते थे। ये लोग पैदल पैदल एक गांव से दूसरे गांव घूमते जिस गांव में काम मिल जाता वहीं उस सीजन में रुक जाते। हमारे दलान में उनके रहने का इंतजाम कर दिया जाता। वे अपना खाना खुद बनाते थे। दिन चढ़ने के साथ हमारे खेतों में काम में जुट जाते।

पूरे सीजन हीरामन और कमली का परिवार हमारे परिवार के सदस्य की तरह था। हीरामन के पिता भले मजदूर थे पर रामकथा के बड़े जानकार थे। शाम होने पर वे अपने बेटे को रामकथा सुनाते। कथा सुनाने के बात सवाल करते। बताओ किस गलती से सीता का हरण हुआ। बेटा हीरामन इसका तार्किक जवाब देता। जवाब सही नहीं होने पर पिता उसे दुरुस्त भी करते।

मौका मिलता तो हीरामन और कमली हम भाई बहनों के साथ खेलते भी थे। हमारे लिए खुशी की बात थी कि हमारे घर में दो बच्चे और आ गए थे। हमारे खेलने वाली मंडली बड़ी हो गई थी। पर हीरामन और कमली हमारी तरह नहीं थे। उनका संघर्ष अलग था। वे पलामू जिले के भूमिहीन परिवार से आते थे। उनका साल भर का दाना पानी हमारे यहां के दो मौसम की कटनी और दंवनी पर ही निर्भर करता था।

हीरामन और कमली हमारी तरह किसी स्कूल में नहीं जाते थे। जहां उनके पिता मजूरी करने जाते वे उनके साथ हो लेते। कमली सुबह सुबह अपनी मां की रसोई में उनका हाथ बंटाती। हीरामन अपने पिता को बोझा ढोने में मदद भी करता। बोझा उठाने के समय खास तौर पर मदद की जरूरत पड़ती है।

भले वे स्कूल नहीं जाते थे पर जिम्मेवारियों के मामले में वे हमारी उम्र में हमसे ज्यादा परिपक्व हो गए थे। वक्त के थपेड़ों ने उन्हें अन्य एक एक दाने की कीमत समझा दी थी। तभी तो वे खेतों में बिखरी हुई बालियों को भी चुन लेते थे।
हीरामन कमली के परिवार से पहले वाले साल में हमारे घर धान काटने के लिए दो मजदूर आए थे जो साधु थे। ये दो भाई या दो मित्र थे। लंबी जटाएं और लंबी दाढ़ी पर वे साधु हो गए थे। पर ऐसे साधु थे जो मांग कर नहीं खाते थे। पेट के लिए रोजी रोजगार करते थे। दोनों कबीरपंथी साधु हमारे घर दो महीने से ज्यादा रहे। हमारा पुराना दलान जिसके आगे एक शहतूत का पेड था, उसी में उनका डेरा था।

एक रात मैं जल्दी सो गया था। अचानक नींद खुली तो देखा दलान में संगीत की महफिल जमी है। दोनों साधु पांव में घूंघरू बांध कर नाच रहे थे और गा भी रहे थे। काफी देर तक उनकी संगीत की महफिल चलती रही। वे दोनों साधु लकड़ी का काम भी जानते थे। हमारे घर में रहकर खाली समय में उन्होने काठ की पांच प्यालियां बनाईं। इसे वे कठुली कहते थे। वे साधु तो चले गए पर वह कठुलियां कई सालों तक हमारे साथ रहीं और उन साधुओं की याद दिलाती रहीं। पर वे दोनों साधु दुबारा हमारे खेतों में काम करने नहीं आए।

फिर बात हीरामन और कमली की। हीरामन कमली अपने साथ एक लाल रंग का कुत्ता भी लाए थे। जब तक वे हमारे घर रहे कुत्ते को हमारे घर से खाना मिलता था। तो कुत्ते की हमसे भी जान पहचान हो गई। जब हीरामन और कमली अपने माता पिता के साथ जाने लगे तो मेरे दादा जी ने आग्रह किया इस कुत्ते को हमें दे दो। हालांकि को वह कुत्ता हीरामन कमली का साथ नहीं छोड़ना चाहता था पर थोड़े मान-मनुहार के बाद वह हमारे घर रुक गया।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
(SOHWALIA DAYS 33 , HIRAMAN AND KAMLI )
( सोहवलिया की बातों को फिलहाल अल्पविराम पर फिर कभी मौका मिला तो यादों की पोटली से और भी कहानियां निकलेंगी। ) 

Wednesday, September 16, 2020

और बन गई हमारी बंदूक

बचपन में गुलेल बहुत से लोगों ने चलाई होगी। कई लोग पछियों का शिकार करने के लिए इसका इस्तेमाल करते थे। पर हमारे मिस्त्री जी ने गुलेल से आगे बढ़कर हमारे लिए एक बंदूक बना दी थी।

गुलेल के लिए अंगरेजी के अक्षर वाई के आकार के एक लकड़ी की जरूरत होती है। इसमें रबर बांधते हैं। रबर के बीच में चमड़े का एक टुकड़ा लगा होता जिसमें गोली रखकर गुलेल को फायर कर दिया जाता है। अगर निशाना ठीक बैठा तो पक्षी मर भी जाते हैं।

पर हमारे घर आते महाराज मिस्त्री। वे वैसे तो हमारे हल, हेंगा और दूसरे कृषि उपकरण को ठीक करने के लिए आते थे। पर वे आर्डर पर कुरसी, चौकी आदि भी बनाते थे। लकड़ी  के दूसरे उपकरणों की मरम्मत भी करते थे। पर महाराज मिस्त्री छोटे मोटे इंजीनियर ही नहीं अन्वेषक भी थे। उन्होंने गुलेल का विकास कर हमारे लिए बंदूक बना डाली। वैसे बंदूक बनाने का आडिया दादाजी ने दिया था। उसपर महाराज मिस्त्री ने शोध किया। 

फिर तीन फीट की लकड़ी को खूब चिकना किया। उसके साथ ढाई फीट की एक लकड़ी लगाई। इसमें चार लकड़ी के ज्वाएंट लगाए। अब एक लकड़ी की लंबी कांटी में गुलेल का फीता चढ़ा दिया जाता। इसमें मिट्टी की गोली रखी जाती। निशाना लगाकर बंदूक का घोडा दबाने पर गोली फायर हो जाती थी। निशाना सही लगने पर काम तमाम। अब वह बंदूक हमारे पास नहीं है। उसकी कोई तस्वीर भी हमारे पास नहीं है। अगर होती तो आज मैं उसका लाइसेंस पेटेंट करा लेता। यह लोकल पर वोकल होता। यह स्वदेशी नवोन्मेष में गिना जाता। पर अब उसके निर्माता महाराज मिस्त्री भी इस दुनिया में नहीं है। इसलिए अब वैसी बंदूक नहीं बन सकती।

खैर उस बंदूक को पाकर हम इतरा रहे थे। मैं और मेरे गांव में कुछ महीने साथ रहे अरविंद भैया उस बंदूक को लेकर हम पक्के शिकार बन गए थे। खेत और बगीचे में बंदूक लेकर कुलांच भरते। गांव के दूसरे बच्चे हमसे डरने लगे थे। हम बंदूक से पक्षियों का शिकार करते। वैसे बंदूक का निर्माण एक खास उद्देश्य से हुआ था। यह सब्जी के खेतों और पेड़ों से पक्षियों को भगाने के गुरुतर उद्देश्य को लेकर निर्मित हुआ था। इस काठ के बने महान यंत्र से उद्देश्यों की पूर्ति भी हो रही थी। एक फायर करने के बाद सब्जी के खेतों से छोटे मोटे जानवर फरार हो जाते। पेड़ पर फायर करने के बाद तो कोहराम ही मच जाता था। सारे पक्षी एक साथ झुंड में उड़ जाया करते थे।

गांव होने वाले शादी समारोह में भी हम अपनी बंदूक साथ लेकर जाते थे। बड़े बुजुर्ग लोगों के पास असली बंदूक होती थी तो हमारे पास अपनी लकड़ी की बंदूक। पर यह किसी असली से कम थोड़े ही न थी। और हमारे पास स्वनिर्मित गोलियों का बड़ा जखीरा होता था। अगर में उस बंदूक के साथ लंबे समय तक गांव में रह जाता तो शायद पक्का शिकार बन जाता। बाद में लोहे की बंदूक की मांग करने लगता। सो एक तरह से यह अच्छा ही हुआ। वरना पत्रकार बनने की जगह कहीं पुलिस या फौज में चला गया होता।
-         = विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-         ( SOHWALIA DAYS 32, WOOD MADE GUN, GULEL, MAHARAJ MISTRY, CARPAINTER  )

Monday, September 14, 2020

मिलवा सोहवलिया गांव की आटा चक्की और मुनीम जी

हमारे गांव सोहवलिया में एक मिल हुआ कराता था। मिल मतलब आटा चक्की, सरसों तेल निकालने वाला स्पेलर और धान कूट कर चावल निकालने वाली मशीन। सब कुछ एक परिसर में था। तो गांव का वह विशाल मिल था। इस लिए आसपास के लोग तो उस गांव मिलवा सोहवलिया ही कहने लगे थे। 

इस मिल के स्वामी संभवतः विक्रमा राय हुआ करते थे। पर मिल की गद्दी पर एक मुनीम जी बैठते थे। उनका असली नाम क्या था मालूम नहीं पर आसपास के गांव के सारे लोग उन्हें मुनीम जी ही कहते थे। वे आटा, धान, तेल पिसवाने वालों का बही में हिसाब रखते। लोग उन्हें बड़े हाकिमों जैसा सम्मान देते थे। कई बार लोग उनसे आग्रह करते कि थोड़ा जरती कम काटें। वे अपने को किसी अफसर से कम नहीं समझते थे।

हमारे खेतों में जो गेहूं होता था उसे पिसवा कर आटा बनवाने के लिए मैं दादा जी के साथ इस मिल में जाता था। ज्यादा मात्रा में गेहूं और धान होता तो हमलोग बैलगाड़ी से लेकर मिल तक जाते थे। इस विशाल मिल को चलते हुए देखना मुझे आश्चर्य चकित करता था। 



एक डीजल का विशाल इंजन था। उससे फीता (पाटा) लगाकर सामने के के तीन बड़े बड़े लोहे के पहियों को चलाया जाता था। फिर इन पहियों से फीता लगाकर क्रमशः धान कूटने वाली मशीन, आटा पिसने वाली चक्की और तेल निकालने वाले स्पेलर को चलाया जाता था। बड़े से चौकोर लोहे के ड्रम में गेहूं उलट दिया जाता था, फिर थोड़ी देर में नीचे झोली आटा गिरने लगता था। पर आटा उतना ही नहीं मिलता था जितना हम गेहूं देते थे। मुनीम जी उसमें से प्रति किलो की दर से जरती काट लेते थे। हालांकि आटे की पिसाई अलग से दी जाती थी। फिर भी जरती क्यों काटी जाती थी यह मेरी समझ में आज तक नहीं आया।

हमारे खेतों में हर साल इतनी सरसों और तीसी बोई जाती थी जिससे कि साल भर खाने भर तेल निकल जाता था। सरसों के तेल को पेरवाने पर उसके साथ खली निकलता था। हम उस खली को ले आते थे। वह खली जानवरों का खाने के लिए दिया जाता था।
मिलवा सोहवलिया के उस मिल के उपर एक विशाल भोंपू लगा हुआ था। जब मिल चलना शुरू होता उस भोंपू से आवाज आती थी। यह आवाज आसपास के कई गांवों तक सुनाई देती थी। कई बार सीजन में मिल दिन रात भी चलता रहता था।

एक बार की बात है मिल खराब हो गई। उसी समय हमारे लिए आटा पिसवाना जरूरी था। तो तय हुआ कि हमारे गांव से दो किलोमीटर दूर गांव बसतलवा में मिल चल रही है। तो दादा जी ने वहां जाकर आटा पिसवाने की तैयारी की। मेरी मां ने मेरे लिए पांच किलो की गठरी बना दी। हम दोनों चल पड़े आटा पिसवाने। बसतलवा गांव वाली मिल बिजली से चलती थी। इसलिए वहां आवाज बिल्कुल नहीं आती थी। हमारे आसपास ये एक ऐसा गांव था जहां बिजली आ चुकी थी।
हमलोग आटा पिसवाकर लौट तो आए। पर सिर पर पांच किलो वजन लाद कर दो किलोमीटर जाना और फिर आना इतना श्रम करने के कारण मुझे अगले दिन बुखार हो गया। ये बुखार कुछ दिनों तक रहा। नन्ही सी जान और इतना काम।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-         ( SOHWALIA DAYS 31, ATTA CHAKKI, SOHWALIA, MILL, BASTALWA )

Saturday, September 12, 2020

ढेका का कूटा चिवड़ा और जांता में पीसी दाल

अभी दिल्ली में फेसबुक पर एक समूह में विज्ञापन देखा जिसमें लिखा था कि अगर आपको जांता से पिसा हुआ अरहर या मसूर की दाल चाहिए तो आर्डर करें। रेट है 200 रुपये किलो। वह दाल आर्गेनिक होगी। ये अच्छी बात है। पर हमारे बचपन में तो ये आम बात थी ढेंका में कूटा हुआ पोहा ( चिवड़ा) और जांता की पीसी हुई दाल। 

गांव में सुबह उठते ही हमें भूख लग जाती थी। पर सुबह सुबह चूल्हा तो जलता नहीं था। चूल्हा जलाने के लिए पहले तैयारी करनी पड़ती। रात का सारा राख हटाकर रसोई घर को गोबर से लिपा जाता फिर सुबह सुबह चूल्हा जलाने का उपक्रम होता। पर हम बच्चों को इससे क्या। तो मां के पास विकल्प तैयार रहता था। वह हमें मउनी या डलिया में चावल का दाना (मूरी या फरही) और साथ गुड़ दे देती हैं। हम उसे नास्ते में फांक लेते। कई बार भूने हुए चने या फिर लाई या जिसे शहरी लोग चावल के लड्डू कहते हैं वह भी मिलता। सर्दी के दिनों में मेठी के लड्डू या फिर कसार जैसी कई चीजें। जब कुछ नहीं होता तो रात की बासी रोटी में नमक तेल लगाकर रोल बनाकर मां दे देती थीं। हम उसे खाते खाते दलान पर चले जाते थे। आज हम स्ट्रीट फूड में जिस तरह के रोल खाते हैं उनसे वह बासी रोटी को रोल ज्यादा स्वादिष्ट होता था। अब याद करने पर लगता है कि वह सेहतमंद नास्ता था। वह छोले कुलचे या छोले भठूरे की तरह आपको बीमार नहीं बनाता था।

जब तक हमारी गैया दूध देती थी तो दही चूड़ा भी नास्ते का विकल्प होता था। हमारे आंगन के एक बरामदे में मथानी लगी हुई थी। इस मथानी से मथ कर मां दही से मट्ठा (छाछ) बनाती थीं। इस दौरान जो छाली निकलती उससे घी बनाया जाता था। वह देसी घी होता था जिसे पढ़े लिखे लोग आयुर्वेदिक घी कहते हैं।
अगर दही की बात करें तो मुझे छाली वाली दही खाना पसंद था। अब शहरों में जो दही मिलती है उससे सारा घी तो पहले निकाला जा चुका रहता है तो छाली का सवाल की कहां उठता। गांव में जो दही बनती थी। उससे बनाने के लिए दूध को कई घंटे तक धीमी आंच पर उबाला जाता था। भोजपुरी में इसे दूध औंटना कहते थे। इसके बाद जो दही तैयार होती थी वह हल्के लाल रंग की होती थी। उसके ऊपर छाली की मोटी परत होती थी। अभी भी कभी गांव में रिश्तेदारी नातेदारी में चले जाने पर ऐसी दही खाने को मिल जाती है।

गांव के उस आंगन के बरामदे में हमारे पास ढेका भी हुआ करता था। इस ढेका में चिउड़ा भी कूट लिया जाता था। धान को छांट कर चावल भी निकाल लिया जाता था। इन कार्यों के लिए कम से कम दो महिलाओं को लगना पड़ता था। कई बार ढेका कूटते समय मैया और चाची गीत भी गाती रहती थीं।

आंगन के बरामदे में एक कोने में ढेका तो दूसरे कोने में एक जांता भी होता था। इस जांता में दाल दरा जाता था। चने की दाल और कई किस्म की दालें घर में ही तैयार हो जाती थीं। यह वही जांता  है जिसके बारे में कबीर ने लिखा है – पीस खाए संसार। अनादि पहली बार गांव गए तो उन्होंने चाचा के घर में जांता देखा तो उन्हें बड़ा कौतूहल हुआ। मैंने उन्हें इसकी प्रक्रिया समझाई। हालांकि अब गांव में मिक्सर ग्राइंडर पहुंच गए हैं पर घरों में जांता का वजूद अभी कायम है। 

जरूरत पड़े तो इससे आटा, सत्तू सब कुछ पीस लिया जाता है। कई तरह के मसाले भी इसमें पीसे जा सकते हैं। हालांकि हमारे बचपन में मसाला पीसकर पाउडर बनाकर रखने का चलन नहीं था। खड़े मसाले को हर रोज सिलवट पर लोढ़ा से पीसा जाता था। जब जांता पीसने का काम देर तक चलना होता तब दो महिलाएं साथ लग जातीं। देर तक पिसाई के साथ गीत भी गुनगुनाती रहतीं। जब छठ का त्योहार नजदीक आता तो इसके प्रसाद के लिए तैयार की जाने वाली हर सामग्री को घर में जांता में ही पीसा जाता था। इसके साथ ही छठी मैय्या के गीतों की शुरुआत भी हो जाती थी।  
-         विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( ( SOHWALIYA DAYS 30, DHEKA, JANTA, KUTAI, PISAI ) 

Thursday, September 10, 2020

हमारे घर आई शुभ शकुनी गौरी...


गांव में हर घर में एक लगहर का होना जरूरी होता है। लगहर मतलब दूध देने वाली गाय या भैंस। पर मेरे गांव में सदियों से भैंस पालने की पंरपरा नहीं है। हमलोग गाय ही पालते आए हैं। एक वक्त ऐसा आया जब मेरे घर की दुधारू गाय बूढ़ी होकर मर गई। उस गाय ने हमें गोला बैल दिया था। पर वह घरवैया बैल बड़ा शरारती था। गाय नहीं होने से हमारे घर में दूध की दिक्कत हो रही थी। तब एक दिन दादा जी ने कहा एक नई गाय लेकर आएंगे।

तो शुरू हो गई एक अदद गाय की तलाश। आसपास के कई गांव देखे गए। दादा जी नुआंव के मेले में भी गए। और एक दिन तलाश पूरी हुई दादा जी सफेद रंग की एक प्यारी सी गाभिन गाय लेकर आए। गाय का चेहरा देखने से ही ममतामयी प्रतीत हो रहा था। मैं कोई पांच साल का रहा होउंगा। अपने घर में आई गौ माता देखकर पूरे परिवार की खुशियों का ठिकाना नहीं था। हमने गाय के गले में एक घंटी बांध दी। जब वह गलियों में चलती तो उसके गले से रुनझुन की आवाज आती...वह संगीत आज भी कानों में गूंजता है।

कुछ दिन बाद गाय ने एक बछिया को जन्म दिया। इसके साथ ही घर में दूध की नदियां बहने लगी। पहले दो दिन का दूध पीया नहीं जाता। उसका फेनुस बनाया गया।
रोज सुबह शाम दादा जी बाल्टी लेकर गाय के थन से दूध निकालते। इस दूध निकालने में भी एक संगीत की प्रतिध्वनि आती। खाली बाल्टी में अलग संगीत, जब बाल्टी भरने को आता तो संगीत के सुर बदल जाते। हम उस सुर को रोज महसूस करते।

हम रोज शाम को गाय का ताजा दूध पीते गिलास में भरकर। हम इसे गोरस कहते। दोपहर में गैया को खेतों में ले जाकर चराने की जिम्मेवारी कभी कभी मेरी भी होती थी।

ठंड के दिनों में सुबह सुबह मां कपड़े का गांती बांध देती थीं। इससे कान भी ढक जाते थे और पीठ से नीचे तक भी। कई बार कपड़ा जमीन पर फैल कर गंदा होने लगता तो मां कहती थीं...

एक हाथ के गाजी मियां नौ हाथ के पोंछ
भागल जालें गाजी मियां सोहर जाला पोंछ

कई बार मैं गाय बछरू जानवरों को लेकर कोई गंभीर बात कर देता तो मां फटाक से कह उठतीं... कउवा ले कबेलेवे तेज... मां के पास भोजपुरी की कई कहावतों को खजाना था।


हमारी उस शुभशकुनी गैया ने एक बाद एक तीन बाछियां प्रदान कीं। ये सब बड़ी होकर गाय बनीं। कुछ को रिश्तेदारों नातेदारों को दे दिया गया। तीसरे बच्चे के बाद हमारी वो प्यारी गैया बूढ़ी होने लगी थी। एक समय ऐसा आया जब धीरे धीरे उसका दूध घटने लगा।
और शहर में हम खरीदते हैं ऐसा गाय का दूध 

पर हमारी गैया के दूध से मेरी छोटी बहन गुड्डी का कुछ यूं लगाव था कि वह रात को जब नींद खुलती गाय का दूध मांगने लगती। तो उसके सोने वाली जगह पर कटोरी में दूध रखा जाता था। जैसे मांगे तुरंत दूध हाजिर। मेरे छोटे भाई को ढाई तीन साल के रहे होंगे जब गाय ने धीरे धीरे दूध देना बंद कर दिया। पर अनुज को भी रोज शाम को गाय का ताजा दूध पीने की आदत पड़ गई थी। जब गाय ने दूध देना बंद किया तो भाई को भरोसा नहीं हो रहा था। वह रोज शाम होते ही मां से गाय के दूध की फरमाईश करते। मां लाख समझाती की अब गाय बिसुख गई है। वह दूध नहीं दे सकती।

पर भाई को भरोसा नहीं होता। वह मां से बड़े भावुक होकर नन्ही सी बाल्टी मांगते। उसे लेकर दलान पर जाते और दादाजी से कहते कि इसमें गाय के थन से दूध निकालो। दादा जी उनकी जिद पर गाय के पास जाते भी पर गाय दूध देने से इनकार कर देती। फिर मायूस होकर भाई घर लौट आते। ये सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। इस बीच उस गैया की सबसे बड़ी बछिया जो उन गाभिन थी, उसने एक बछड़े को जन्म दिया। और घर में एक बार फिर दूध की नदी बह निकली।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-         ( MY COW, MILK, SOHWALIA DAYS 29  ) 

Tuesday, September 8, 2020

सातु पिसान के गठरी चलेके लइका ददरी

मैं जो सुनाने जा रहा हूं ये कहानी है या फिर संस्मरण ये पाठक खुद तय करें। बलिया जिले के में ददरी में एक पशु मेला लगा करता है। हर साल। हमारे गांव से लोग इस मेले में जाते थे। बैल और गाय खरीदने। आजकल हमारे गांव में भी हल बैलों से खेती खत्म हो गई है। पर सत्तर अस्सी के दशक में जब में गांव मे रहता था बैल हमारे परिवार के अभिन्न सदस्य होते थे। हर घर में एक जोड़ी बैल का होना तो जरूरी होता था।

तो हमारे पास भी दो बैल थे। एक पिपरैला और दूसरा ददरिया। पिपरैला को पिपरा गांव के एक व्यक्ति से खरीदकर लाया गया था। इसलिए उसका ये नाम पड़ा था। वह बड़ा मरखाह बैल था। अपनी मस्ती में माकल चलता था। राह चलते किसी को भी अपनी सिंग से निशाना बना देता था। आते जाते लोग उससे डरकर चलते थे।

एक बैल हमारे पास हुआ करता था गोला। गोला बैल घरवैया था। घरवैया मतलब कि घर की गाय ने बछड़ा दिया। उससे तैयार हुआ बैल। पर घरवैया बैल लाड प्यार में पलता था। इसलिए वह ज्यादा बिगडैल हो जाता था। यही हाल उस गोले बैल के साथ भी था। वह गाहे बगाहे परिवार के हमारे सदस्यो पर भी हमला कर देता था। घरवैया होने के कारण हमलोग उसकी पिटाई नहीं करते थे। तो एक बार जब उसने मेरे पिताजी को भी नहीं बख्सा तो तय हुआ कि इसे बेच दिया जाए। तो बकसड़ा के किसान आए और उसे खरीदकर ले गए। 

पर गोला के चले जाने के बाद हमें एक बैल की सख्त जरूरत थी। तो दादा जी गांव के एक दो लोगों के साथ चल पड़े ददरी मेला। गांव से कोचस फिर चौसा फिर यूपी में ददरी। इतनी लंबी यात्रा पैदल पैदल। तो हमारे दादा जी कहावत कहते थे - सातु पिसान के गठरी चलेके लइका ददरी। इस सातु (सत्तू ) पिसान (आटा) साथ लेकर चलने से रास्ते में कहीं भी रुक कर लिट्टी लगाकर खाया जा सकता था। रास्ते में कहीं आलू भंटा मिल गया तो चोखा भी बन जाएगा। दादा जी एक और कहावत सुनाते थे - सेर चाउर पांव दाल खिचड़ी  बनाव खाव । मतलब एक सेर चावल में 250 ग्राम दाल मिलाकर खिचड़ी बनाओ और शान से खाओ।

गांव के आसपास के काफी लोग ददरी मेला जाते थे गाय और बैल खरीदने। तो दादाजी ददरी मेले से जो बैल लेकर आए उसका नाम रख दिया गया ददरिया बैल। तो घर में जोड़ी बन गई पिपरैला और ददरिया बैल की।

हमारा पिपरैला जो थोड़ा बिगड़ैल था किसी भी दंवनी में हमेशा सबसे दाहिने चलता था। अगर उसे बीच में दंवनी मे लगा दिया गया तो अपने दाहिने और बाएं के बैलों के मार मार कर घायल कर देता था। एक बार मेरे चाचा पिपरैला को मांग कर ले गए थे। उन्होंने यही गलती कर दी। पिपरैला ने न सिर्फ बाकी बैलोंको घायल किया बल्कि दंवनी की रस्सी को तोड़कर भाग निकला और आकर मेरे दरवाजे पर खड़ा हो गया। चाचा पीछे से दौड़ते हुए आए। हमने समझाया तब उन्हे अपनी गलती का अहसास हुआ।

दरअसल खलिहान में गेहूं की फसल से दाना निकालने के लिए आठ दस बैलों को एक साथ रस्सी से जोड़कर दंवनी की जाती थी। इससे बैलों के पांव लगातार दबाव पड़ने से फसल से दाने अलग हो जाते थे। इस दंवनी के दौरान बैल अनाज खा न जाएं इसलिए उनके चेहरे पर मास्क लगा दिया जाता था। इसे भोजपुरी में जाब कहते हैं। पर मेरा पिपरैला तो जाब लगाने पर भी विद्रोह कर देता था।

ददरिया बैल के आने से पहले हमारे पास एक और बैल हुआ करता था। वह थोड़ा बीमार और आलसी थी। तो वह किसी भी दवंनी में मेही चलता था। मतलब उसे दंवनी में सबसे बायीं तरफ लगाया जाता था। इस बैल को सबसे कम चलना पड़ता था। एक दिन वह इस दुनिया से रुखसत हो गया। पर हमारा ददरिया बैल हर मामले में परफेक्ट था। पिपरैला कौ ददरिया की जोड़ी लंबे समय तक कायम रही। उनके गले बंधी घंटी की आवाजें वातावरण में संगीत घोलती थीं। चाहे वे हल में नाधे जाएं फिर बैल गाड़ी में, वे दोनों अपनी सेवा में कोई कोताही नहीं करते थे। गांव के लोग इस जोड़ी को देखकर रस्क करते थे।

पर सन 1980 में वह दौर आया जब दादा जी ने बढ़ती उम्र के बाद खेतीबाड़ी बंद करके सासाराम की सरजमीं को छोड़कर जाकर पिताजी के साथ वैशाली जिले में रहना तय किया। तब भरे मन से पिपरैला और ददरिया बैल का सौदा कानडिहरा गांव के एक सज्जन से कर दिया गया। गांव के बाबू साहब आए और नकद पैसा देकर दोनों बैलों के ले गए। पर अगले दिन हमने क्या देखा। 

प्रेमचंद की कहानी दो बैलों की कथा की पुनरावृति। झूरी के दो बैल हीरा और मोती की तरह ही हमारे पिपरैला और ददरिया कानडिहरा गांव के खूंटे रस्सी तुड़वाकर भागकर आ गए थे। बिना किसी रस्सी के बड़े मौज से हमारे दरवाजे पर सानी खा रहे थे। दादा जी यह सब देखकर गुम थे । थोड़ी देर मे कानडिहरा गांव के बाबू साहब पहुंचे। बोले महतो जी, बैल त भाग आइल बाड़न सन। खैर एक बार फिर कोशिश हुई और बैलों को उनके नए मालिक के दरवाजे पर पहुंचाया गया।

-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
 ( BIHAR, SOHWALIA 28, DADARI MELA ) 

Sunday, September 6, 2020

मेरे दलान पर कदम का वह पेड़


गांव में हमारे दो घर थे। एक गलियों में घर जहां मां रहती थी, हम भी रहते थे। वहां खाना भी बनता था। दूसरा था दलान। गांव के दक्षिण कुआं के पास। इस दलान पर दादा जी रहते थे। वे खाना और नास्ता के समय गली वाले घर में आते थे। इस दलान से लगा हुआ विशाल कदम का पेड़ था। उसकी ऊंचाई तीन मंजिले मकान के बराबर थी। ऊंचाई पर जाने के बाद उसकी शाखाएं चारों तरफ फैली थीं। तो पेड़ छाया भी देता था और काफी दूर से नजर आता था। वह कदम का पेड़ हमारे छोटे से गांव की पहचान बना हुआ था।

इस विशाल कदम के पेड़ मे हर साल फल भी लगते थे। फल लगने से पहले उसमें फूल आते थे। ये फूल बड़े प्यारे दिखाई देते थे। मां कच्चे कदम की सब्जी भी बनाती थी। मुझे आज भी उस सब्जी का स्वाद याद आता है। हल्का सा खट्टापन लिए हुए होता था उसका स्वाद। उस कदम के पेड़ के साथ हमारी कितनी यादें जुड़ी हुई हैं।

भरी दुपहरिया में कदम की छांव तले बैठकर मैं देर तक अपना पाठ याद किया करता था। पर उस कदम के पेड़ की डालियों पर पंक्षियों का बसेरा हुआ करता था। कभी सुग्गों का बड़ा झुंड आता था। वे देर तक कदम की डालियों पर बैठकर सभा किया करते थे। तब मैं सुग्गों की भाषा समझता था। ये सुग्गे अपने समाज का आपसी विवाद सुलझाया करते थे। सभी विसर्जित होने पर अलग अलग मंजिलों के लिए उड़ जाते थे। ये सुग्गे तो शाकाहारी थे। 
पर कभी-कभी कदम के पेड़ पर बगुले भी आते थे। बगुलों की बैठक में लड़ाई होती थी खूब। ये बगुले कई बार नहर से मछलियां पकड़कर लाते थे। कदम की डालियों पर बैठकर मछलियों निवाला बनाते। कई बार मछलियों के टुकड़े नीचे गिरा देते थे।

हरि (विष्णु) को प्रिय है कदम : कदम को संस्कृत में कदम्ब या हरिप्रिय कहते हैं। यह वृक्ष कृष्ण यानी हरि को प्रिय था। वृंदावन में बालपन में कृष्ण इसी वृक्ष के नीचे बैठकर बांसुरी बजाया करते थे। इसका वानस्पतिक नाम है- रूबियेसी कदम्बा। पहले इसका नाम रखा गया था नॉक्लिया कदम्बा। इसे रूबियेसी परिवार से संबंधित माना जाता है। 

वैसे इसके पेड़ मुख्य रूप से अंडमान निकोबार, बंगाल और आसाम में पाया जाते हैं। आयुर्वेद के मुताबिक कदम का फल कई तरह की बीमारियों में कारगर है। इसके फल पुराने घाव को भरने में लाभकारी है। यह दाद खाज खुजली में भी लाभकारी है।

ऐसा होता है शहतूत का पेड़। 

हमारे दलान पर उस कदम के पेड़ से पहले पास में एक शहतूत (MULBERRY) का नन्हा सा पेड़ भी हुआ करता था। जब उसमें काले रंग के शहतूत पक कर तैयार हो जाते थे, तो उन्हें खाने में खूब आनंद आता था। दलान पर दादा जी ने छोटा सा बाग ही तैयार कर लिया था। छह कदम के पेड़। एक शहतूत  दो अमरूद के पेड़। एक नीम का पेड़। तीन आम के पेड़। इन आम के पेड़ों पर तो मैं फुर्ती से चढ़ जाया करता था। कई साल बाद महाराष्ट्र के महाबलेश्वर में शहतूत देखने मिला तो खाने को मन मचल गया। 

दोपहर में थके मांदे राहगीर आते तो कुआं से पानी निकालकर पीने के बाद कदम के पेड़ के नीचे आराम फरमाने के बाद आगे का सफर तय करते थे। दादा जी का निर्देश साफ था मैं रहूं या न रहूं अनजान राहगीरों का गुड़ और पानी से स्वागत जरूर होना चाहिए। दादा जी दालान पर मौजूद होते तो हर राहगीर को रोकर कहते – बइठीं, तनी सुस्ता लिहीं तब जाइब। दोपहर का समय हो तो भोजन के लिए भी पूछा जाता था। तब लोग एक गांव से दूसरे गांव और रिश्तेदारी नातेदारी में पैदल ही जाया करते थे।

अब कई नए पेड़ भी लग गए हैं पर अब वे सब पुराने पेड़ अब नहीं दिखाई देते। पर नींबू का वह पुराना पेड़ आज भी सलामत है। इसमें खूब रसीले नींबू फलते हैं। कभी गांव में रहने पर मां इस नींबू के पेड़ से नीबू तोड़कर निमकी बनाया करती थी, जिसे हम सालों भर खाते थे। पड़ोस के दूबे जी के गांव के बच्चे रात के अंधेरे में चोरी चोरी नींबू तोड़ने पहुंच जाते थे। तब दादा जी उन्हें ललकार कर भगाते थे।
उसी नींबू के पेड़ के साथ , साल 2014 में 
सात साल की उम्र गांव छोड़कर पिताजी के साथ चला गया तो कदम का ये पेड़ भी स्मृतियों में मेरे साथ गया। छुट्टियों में जब घर लौटता गांव की सीमा से काफी पहले कदम का वह पेड़ मुझे बुलाने लगता था। पर कई साल बाद जब एक बार गांव लौटा तो वहां कदम का पेड़ नहीं था। दलान के नए भवन के निर्माण के लिए कदम के उस पेड़ को काट डाला गया था। यूं लगा जैसे मेरा पूरा गांव ही ठूंठ हो गया हो।
-         - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(   ( SOHWALIA DAYS 27, KADAMB TREE , LEMON, SHAHTUT, MULBERRY ) 

Friday, September 4, 2020

सिसवार - जहां मैंने पहली बार बिजली का बल्ब देखा

फुल्ली मोड़ , जहां से सिसवार के लिए एक रास्ता जाता है....


मैं कोई छह साल का रहा होऊंगा। अक्तूबर का महीना था दादा जी के साथ दलान पर बैठा था। तभी मेरे गरभे वाले फूफा जी आए उनके साथ चार लोग और थे। उन्होंने मेरे दादा जी के से कहा, अपने बेटे चंदेश्वर  सिंह का दोंगा का दिन रखवाने जा रहा हूं। आप भी चलिए हमारे साथ। दादा बोले मैं तो नहीं जा पाउंगा, कुछ काम है। विकास को लेते जाइए। तो मैं उनलोगों के साथ चल पड़ा। हम पैदल चलते हुए कान डिहरा गांव में पहुंचे। यहां डोमा साह की दुकान में फूफा कुछ खरीददारी के लिए रुके। डोमा साह मुझे देखकर पहचान गए। उन्होंने मुझे खाने केलिए लेमनचूस दिया। तो हमलोग जा रहे हैं सिसवार गांव। तब वहां तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं थी। फुल्ली से पश्चिम सिसवार गांव स्थित है। जब हमने फुल्ली पार किया तो सिसवार गांव से पहले एक नदी आई। इस नदी पर कोई पुल नहीं था। नदी में बेहया की झाड़ लगी हुई थी। हमलोगों ने नदी के पानी में उतर कर नदी को पार किया। सिसवार गांव में रुचि सिंह के घर में भैया की ससुराल थी।

हमलोगों का वहां अच्छा स्वागत हुआ। एक दलान में हमारे ठहरने का इंतजाम किया गया था। रात को भोजन के लिए घर में ले जाया गया। वहां हमलोग आंगन के चौबारे में खाने पर बैठे। बाद में पता चला कि महिलाओं ने बैठने की बिछाई गई आसनी में लासा (गोंद ) जैसी चीज लगा दी थी। ये महिलाओं के हंसी मजाक का तरीका था। इससे कई लोगों के पांव में वह लासा चिपक गया। हमारे साथ एक कहार भी गया था। जो बोल नहीं पाता था। पर इशारों में बात करता था।

खाने के बाद हमलोग दलान में लौट आए। सिसवार वह गांव था जहां सन 1977 से पहले बिजली  आ चुकी थी। मैंने पहली बार बिजली का बल्ब वहीं देखा था। इस बल्ब को जलाने बुझाने के लिए काले रंग का एक बड़ा स्विच लगा हुआ था। गांव के एक सज्जन आए, उन्होंने स्विच को ऑफ और ऑन करके दिखाया ताकि हमलोग सोने से पहले बिजली बंद कर सकें। मेरे फूफा जी ने भी इसे ऑफ-ऑन करके तस्दीक किया। तब हमलोग निश्चिंत होकर सो सके।

अगले दो दिन हमलोग सिसवार गांव में ही रहे। सिसवार गांव में मैंने बिजली से चलने वाली आटा चक्की देखी। इस मिल के चलने पर डीजल के मिल की तरह कोई आवाज नहीं होता था। यह मेरे लिए बड़े अचरज की  बात थी। मेरे गांव का मिल तो जब चलता था तो उसके पुक-पुक की आवाज आसपास के दो गांव तक सुनाई देती थी।



सिसवार गांव के बीचों बीच एक ऊंचा डीह था। नवरात्र चल रहा था। इसी दौरान गांव के डीह पर दुर्गाजी की मूर्ति की स्थापना हुई। मां दुर्गा की जो मूर्ति आई उसे हमने देखा। मां को चार और चार आठ हाथ थे। वहीं पर हमने पहली बार दुर्गा पूजा का मेला देखा। हम बच्चे यह देखकर बड़े अचरज में थे कि दुर्गा जी के आठ हाथ हैंं।

सिसवार गांव में एक हाई स्कूल भी था। इस हाईस्कूल में मेरे एक चाचा जी शिक्षक थे। तुर्की गांव के भृगुनाथ मास्टर चाचा। वे मुझे अचानक सिसवार में मिल गए। पूछ बैठे तुम यहां कैसे आ गए हो। मैंने बताया कि दोंगा के बारात में आया हूं। बोले, अच्छा अच्छा... 
तीन दिन बाद हमलोग सिसवार से लौट आए। अब कई दशक बाद हमारे गांव में भी बिजली आ गई है। पर मुझे याद आता है कि तब सिसवार हमारे इलाके का प्रगतिशील गांव था। बात एक बार फिर चंदेश्वर भैया की। तो अब वे 60 के हो गए हैं। आजकल वे मोह माया का त्यागकर बौद्ध भिक्षु बन गए हैं। 
-         - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( ( SOHWALIA DAYS 26, SISWAR, GARBHE, KAIMUR, BIHAR )